जनक उवाच ॥ मय्यनंतमहांभोधौ विश्वपोत इतस्ततः। भ्रमति स्वांतवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता॥७-१॥
janaka uvāca || mayyanaṁtamahāṁbhodhau viśvapota itastataḥ| bhramati svāṁtavātena na mamāstyasahiṣṇutā ||7-1||
।।74।। जनक बोले: मुझ अनन्त महासागर में जगत् की नौका इधर-उधर, अपने ही स्वभाव की वायु से चालित होकर भटकती है। मुझे इससे कोई अधीरता नहीं है।
Modern Reflection
।।74।। यह वह श्लोक है जहाँ संवाद मुड़ता है। छह अध्यायों तक अष्टावक्र सिखाते रहे हैं; अब पहली बार जनक उत्तर देते हैं, प्रश्न से नहीं बल्कि पहले से पहुँची हुई एक अनुभूति से, अपनी ही आवाज़ और अपनी ही छवि में कहते हुए। 'मय्यनन्तमहाम्भोधौ', मुझ अनन्त महासागर में — जनक यह नहीं कहते कि वे सागर-आत्मा की शिक्षा समझ गए हैं, वे केवल सागर के रूप में बोलते हैं। 'विश्वपोतः', जगत् की नौका, 'इतस्ततः' इधर-उधर बहती हुई, 'स्वान्तवातेन' अपने ही स्वभाव की वायु से चालित — जनक अपने राज्य को ही वर्णित कर रहे हैं, मन्त्रियों, युद्धों, कोष, राजदरबार की साज़िशों, मिथिला के शासन की सम्पूर्ण व्यवस्था को, एक ऐसी नौका के रूप में जो ऐसी हवाओं से हिलती है जिन्हें शान्त करना उनकी चिन्ता नहीं। 'असहिष्णुता', अधीरता या असहनशीलता, वह शब्द है जिसे वे नकारते हैं — परिणामों से विरक्ति नहीं, बल्कि स्वयं भटकाव से उत्पन्न होने वाली खीज का अभाव। यह अध्याय इस ग्रन्थ के लगभग किसी भी अन्य अध्याय से अधिक उद्धृत होता है, ठीक इसलिए कि यह वह क्षण है जब अभी भी राज्य करता हुआ एक राजा, कोई संन्यासी नहीं, अचल सागर के रूप में बोलता है।