अष्टावक्र उवाच ॥ भावाभावविकारश्च स्वभावादिति निश्चयी। निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति॥११-१॥
aṣṭāvakra uvāca || bhāvābhāvavikāraśca svabhāvāditi niścayī| nirvikāro gatakleśaḥ sukhenaivopaśāmyati ||11-1||
।।99।। अष्टावक्र बोले: भाव और अभाव का विकार स्वभाव से ही होता है। यह निश्चय जानकर, निर्विकार, क्लेश-रहित, व्यक्ति सहजता से ही शान्त हो जाता है।
Modern Reflection
।।99।। अध्याय ग्यारह एक नया आवर्तन खोलता है, 'निश्चयी', वह जिसके पास 'निश्चय' है, स्थिर दृढ़ता या निर्णायक विश्वास, जो सभी आठों श्लोकों के अन्त में दोहराया जाता है — यह अध्याय छह के चतुर्विध आवर्तन जैसा एक संरचनात्मक संकेत है, कि अध्याय का वास्तविक विषय कोई एक शिक्षा नहीं बल्कि 'निश्चय' का मनोवैज्ञानिक रुख़ ही है। 'भावाभावविकारश्च स्वभावात्', वस्तुओं का उठना और मिटना उनके अपने स्वभाव से ही होता है, वाराणसी के एक दुकानदार को सम्बोधित करता है जो हर वर्ष उन्हीं दुकानों को खुलते-बन्द होते, वही माल आते-बिकते देखता है, और अब हर विशेष दुकान के असफल होने या दूसरी के फलने-फूलने का कारण समझने की आवश्यकता नहीं रखता। 'स्वभावात्', अपने ही स्वभाव से, उसे हर उतार-चढ़ाव के लिए स्पष्टीकरण गढ़ने से मुक्त कर देता है; वस्तुएँ बस वही करती हैं जो उनका स्वभाव करता है। श्लोक का वादा किया गया परिणाम, 'सुखेनैवोपशाम्यति', सहजता से ही शान्त हो जाता है, ज़ोर देता है कि यह शमन बिना किसी प्रयास के, केवल 'निश्चय' से, हर परिवर्तन का हिसाब माँगना छोड़ने के निर्णय से आता है।