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आदि पर्व · अध्याय 122

पाण्डु का माद्री से विवाह और दिग्विजय

भीष्म पाण्डु के लिए मद्रराज की बहन माद्री को माँगने मद्रराज के नगर जाते हैं। शल्य बताते हैं कि उनके कुल की रीति में कन्या-शुल्क लिया जाता है; भीष्म इसे प्राचीन काल से मान्य मानकर स्वीकार करते हैं और सोना, रत्न, हाथी, घोड़े और रथ देते हैं, और पाण्डु माद्री से विवाह करते हैं। दोनों पत्नियों के साथ तीस रातें बिताकर पाण्डु पृथ्वी-विजय को निकलते हैं और दशार्णों, राजगृह में मगध के दीर्घ, मिथिला में विदेहों तथा काशी, सुह्म और पुण्ड्र देशों को जीतते हैं; पराजित राजा कर लेकर आते हैं, और वे विजयी होकर हस्तिनापुर लौटते हैं, जहाँ भीष्म हर्ष के आँसुओं के साथ उन्हें गले लगाते हैं।

अध्याय 121अध्याय-सूचीअध्याय 123

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.122.1)

ततः शान्तनवो भीष्मो राज्ञः पाण्डोर्यशस्विनः । विवाहस्यापरस्यार्थे चकार मतिमान्मतिम् ॥

tataḥ śāntanavo bhīṣmo rājñaḥ pāṇḍoryaśasvinaḥ | vivāhasyāparasyārthe cakāra matimānmatim

वैशम्पायन ने कहा — तब बुद्धिमान शान्तनुपुत्र भीष्म ने यशस्वी राजा पाण्डु के दूसरे विवाह का विचार किया।

श्लोक 2 (1.122.2)

सोऽमात्यैः स्थविरैः सार्धं ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः । बलेन चतुरङ्गेण ययौ मद्रपतेः पुरम् ॥

so'mātyaiḥ sthaviraiḥ sārdhaṃ brāhmaṇaiśca maharṣibhiḥ | balena caturaṅgeṇa yayau madrapateḥ puram

वे वृद्ध मन्त्रियों, ब्राह्मणों और महर्षियों के साथ चतुरंगिणी सेना लेकर मद्रराज के नगर को गए।

श्लोक 3 (1.122.3)

तमागतमभिश्रुत्य भीष्मं वाहीकपुङ्गवः । प्रत्युद्गम्यार्चयित्वा च पुरं प्रावेशयन्नृपः ॥

tamāgatamabhiśrutya bhīṣmaṃ vāhīkapuṅgavaḥ | pratyudgamyārcayitvā ca puraṃ prāveśayannṛpaḥ

भीष्म का आगमन सुनकर वाहीकों में श्रेष्ठ राजा ने आगे बढ़कर उनका स्वागत-सत्कार किया और उन्हें नगर में ले आए।

श्लोक 4 (1.122.4)

दत्त्वा तस्यासनं शुभ्रं पाद्यमर्घ्यं तथैव च । मधुपर्कं च मद्रेशः पप्रच्छागमनेऽर्थिताम् ॥

dattvā tasyāsanaṃ śubhraṃ pādyamarghyaṃ tathaiva ca | madhuparkaṃ ca madreśaḥ papracchāgamane'rthitām

मद्रराज ने उन्हें उज्ज्वल आसन, पाद्य, अर्घ्य और मधुपर्क देकर उनके आने का प्रयोजन पूछा।

श्लोक 5 (1.122.5)

तं भीष्मः प्रत्युवाचेदं मद्रराजं कुरूद्वहः । आगतं मां विजानीहि कन्यार्थिनमरिन्दम ॥

taṃ bhīṣmaḥ pratyuvācedaṃ madrarājaṃ kurūdvahaḥ | āgataṃ māṃ vijānīhi kanyārthinamarindama

कुरुकुल के धुरन्धर भीष्म ने मद्रराज को उत्तर दिया — "हे शत्रुदमन! जानो कि मैं कन्या माँगने आया हूँ।"

भीष्म उवाच

श्लोक 6 (1.122.6)

श्रूयते भवतः साध्वी स्वसा माद्री यशस्विनी । तामहं वरयिष्यामि पाण्डोरर्थे यशस्विनीम् ॥

śrūyate bhavataḥ sādhvī svasā mādrī yaśasvinī | tāmahaṃ varayiṣyāmi pāṇḍorarthe yaśasvinīm

भीष्म ने कहा — "सुना जाता है कि आपकी माद्री नाम की एक साध्वी और यशस्विनी बहन है। मैं पाण्डु के लिए उस यशस्विनी का वरण करना चाहता हूँ।

श्लोक 7 (1.122.7)

युक्तरूपो हि संबन्धे त्वं नो राजन्वयं तव । एतत्संचिन्त्य मद्रेश गृहाणास्मान्यथाविधि ॥

yuktarūpo hi saṃbandhe tvaṃ no rājanvayaṃ tava | etatsaṃcintya madreśa gṛhāṇāsmānyathāvidhi

"हे राजन्! सम्बन्ध के लिए आप हमारे योग्य हैं और हम आपके। हे मद्रेश, इस पर विचार करके विधिपूर्वक हमें स्वीकार कीजिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (1.122.8)

तमेवंवादिनं भीष्मं प्रत्यभाषत मद्रपः । न हि मेऽन्यो वरस्त्वत्तः श्रेयानिति मतिर्मम ॥

tamevaṃvādinaṃ bhīṣmaṃ pratyabhāṣata madrapaḥ | na hi me'nyo varastvattaḥ śreyāniti matirmama

वैशम्पायन ने कहा — ऐसा कहने वाले भीष्म से मद्रराज बोले — "मेरी समझ में आपके घर से बढ़कर कोई दूसरा वर श्रेष्ठ नहीं है।"

शल्य उवाच

श्लोक 9 (1.122.9)

पूर्वैः प्रवर्तितं किंचित्कुलेऽस्मिन्नृपसत्तमैः । साधु वा यदि वाऽसाधु तन्नातिक्रान्तुमुत्सहे ॥

pūrvaiḥ pravartitaṃ kiṃcitkule'sminnṛpasattamaiḥ | sādhu vā yadi vā'sādhu tannātikrāntumutsahe

शल्य ने कहा — "किन्तु इस कुल में पूर्वज श्रेष्ठ राजाओं ने एक रीति चलाई है। वह अच्छी हो या बुरी, मैं उसका उल्लंघन नहीं कर सकता।

श्लोक 10 (1.122.10)

व्यक्तं तद्भवतश्चापि विदितं नात्र संशयः । न च युक्तं तथा वक्तुं भवान्देहीति सत्तम ॥

vyaktaṃ tadbhavataścāpi viditaṃ nātra saṃśayaḥ | na ca yuktaṃ tathā vaktuṃ bhavāndehīti sattama

"यह आपको भी भली भाँति विदित है, इसमें सन्देह नहीं। और हे सज्जनश्रेष्ठ, आपका केवल इतना कहना कि 'दे दीजिए', उचित नहीं है।

श्लोक 11 (1.122.11)

कुलधर्मः स नो वीर प्रमाणं परमं च तत् । तेन त्वां न ब्रवीम्येतदसंदिग्धं वचोऽरिहन् ॥

kuladharmaḥ sa no vīra pramāṇaṃ paramaṃ ca tat | tena tvāṃ na bravīmyetadasaṃdigdhaṃ vaco'rihan

"हे वीर! वह हमारा कुलधर्म है और वही हमारे लिए परम प्रमाण है। इसी कारण, हे शत्रुनाशक, मैं आपसे सीधी स्वीकृति का वचन नहीं कह रहा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (1.122.12)

तं भीष्मः प्रत्युवाचेदं मद्रराजं जनाधिपः । धर्म एष परो राजन्स्वयमुक्तः स्वयंभुवा ॥

taṃ bhīṣmaḥ pratyuvācedaṃ madrarājaṃ janādhipaḥ | dharma eṣa paro rājansvayamuktaḥ svayaṃbhuvā

वैशम्पायन ने कहा — जनाधिप भीष्म ने मद्रराज को उत्तर दिया — "हे राजन्, यह परम धर्म है, जिसे स्वयं स्वयम्भू ने कहा है।"

भीष्म उवाच

श्लोक 13 (1.122.13)

नात्र कश्चन दोषोऽस्ति पूर्वैर्विधिरयं कृतः । विदितेयं च ते शल्य मर्यादा साधुसंमता ॥

nātra kaścana doṣo'sti pūrvairvidhirayaṃ kṛtaḥ | viditeyaṃ ca te śalya maryādā sādhusaṃmatā

भीष्म ने कहा — "इसमें कोई दोष नहीं है; यह विधि पूर्वजों ने बनाई है। हे शल्य, तुम्हारी यह मर्यादा प्रसिद्ध है और सज्जनों द्वारा मान्य है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (1.122.14)

इत्युक्त्वा स महातेजाः शातकुम्भं कृताकृतम् । रत्नानि च विचित्राणि शल्यायादात्सहस्रशः ॥

ityuktvā sa mahātejāḥ śātakumbhaṃ kṛtākṛtam | ratnāni ca vicitrāṇi śalyāyādātsahasraśaḥ

वैशम्पायन ने कहा — यह कहकर महातेजस्वी भीष्म ने शल्य को गढ़ा और अनगढ़ा सोना तथा हज़ारों अद्भुत रत्न दिए।

श्लोक 15 (1.122.15)

गजानश्वान्रथांश्चैव वासांस्याभरणानि च । मणिमुक्ताप्रवालं च गाङ्गेयो व्यसृजच्छुभम् ॥

gajānaśvānrathāṃścaiva vāsāṃsyābharaṇāni ca | maṇimuktāpravālaṃ ca gāṅgeyo vyasṛjacchubham

हाथी, घोड़े और रथ, वस्त्र और आभूषण, मणि, मोती और मूँगे: ये सुन्दर उपहार गंगापुत्र ने दिए।

श्लोक 16 (1.122.16)

तत्प्रगृह्य धनं सर्वं शल्यः संप्रीतमानसः । ददौ तां समलङ्कृत्य स्वसारं कौरवर्षभे ॥

tatpragṛhya dhanaṃ sarvaṃ śalyaḥ saṃprītamānasaḥ | dadau tāṃ samalaṅkṛtya svasāraṃ kauravarṣabhe

प्रसन्नचित्त शल्य ने वह सारा धन स्वीकार किया और अपनी बहन को अलंकृत करके कौरवश्रेष्ठ को सौंप दिया।

श्लोक 17 (1.122.17)

स तां माद्रीमुपादाय भीष्मः सागरगासुतः । आजगाम पुरीं धीमान्प्रविष्टो गजसाह्वयम् ॥

sa tāṃ mādrīmupādāya bhīṣmaḥ sāgaragāsutaḥ | ājagāma purīṃ dhīmānpraviṣṭo gajasāhvayam

माद्री को साथ लेकर सागरगामिनी गंगा के बुद्धिमान पुत्र भीष्म लौट आए और हस्तिनापुर में प्रवेश किया।

श्लोक 18 (1.122.18)

तत इष्टेऽहनि प्राप्ते मुहूर्ते साधुसंमते । विवाहं कारयामास भीष्मः पाण्डोर्महात्मनः । जग्राह विधिवत्पाणिं माद्र्याः पाण्डुर्नराधिपः ॥

tata iṣṭe'hani prāpte muhūrte sādhusaṃmate | vivāhaṃ kārayāmāsa bhīṣmaḥ pāṇḍormahātmanaḥ | jagrāha vidhivatpāṇiṃ mādryāḥ pāṇḍurnarādhipaḥ

फिर शुभ दिन आने पर, सज्जनों द्वारा अनुमोदित मुहूर्त में भीष्म ने महात्मा पाण्डु का विवाह कराया, और राजा पाण्डु ने विधिपूर्वक माद्री का पाणिग्रहण किया।

श्लोक 19 (1.122.19)

ततो विवाहे निर्वृत्ते स राजा कुरुनन्दनः । स्थापयामास तां भार्यां शुभे वेश्मनि भामिनीम् ॥

tato vivāhe nirvṛtte sa rājā kurunandanaḥ | sthāpayāmāsa tāṃ bhāryāṃ śubhe veśmani bhāminīm

विवाह सम्पन्न होने पर कुरुनन्दन राजा ने अपनी उस सुन्दर पत्नी को एक सुन्दर भवन में बसाया।

श्लोक 20 (1.122.20)

स ताभ्यां व्यचरत्सार्धं भार्याभ्यां राजसत्तमः । कुन्त्या माद्र्या च राजेन्द्रो यथाकामं यथासुखम् ॥

sa tābhyāṃ vyacaratsārdhaṃ bhāryābhyāṃ rājasattamaḥ | kuntyā mādryā ca rājendro yathākāmaṃ yathāsukham

वे राजश्रेष्ठ अपनी दोनों पत्नियों, कुन्ती और माद्री, के साथ इच्छानुसार सुखपूर्वक विहार करने लगे।

श्लोक 21 (1.122.21)

ततः स कौरवो राजा विहृत्य त्रिदशा निशाः । जिगीषया महीं पाण्डुर्निरक्रामत्पुरात्प्रभो ॥

tataḥ sa kauravo rājā vihṛtya tridaśā niśāḥ | jigīṣayā mahīṃ pāṇḍurnirakrāmatpurātprabho

हे प्रभो! फिर तीस रातें विहार करके कौरव राजा पाण्डु पृथ्वी को जीतने की इच्छा से नगर से निकल पड़े।

श्लोक 22 (1.122.22)

स भीष्मप्रमुखान्वृद्धानभिवाद्य प्रणम्य च । धृतराष्ट्रं च कौरव्यं तथान्यान्कुरुसत्तमान् । आमन्त्र्य प्रययौ राजा तैश्चैवाप्यनुमोदितः ॥

sa bhīṣmapramukhānvṛddhānabhivādya praṇamya ca | dhṛtarāṣṭraṃ ca kauravyaṃ tathānyānkurusattamān | āmantrya prayayau rājā taiścaivāpyanumoditaḥ

भीष्म आदि वृद्धों को अभिवादन और प्रणाम करके, तथा कुरुवंशी धृतराष्ट्र और अन्य श्रेष्ठ कौरवों से विदा लेकर, उनकी अनुमति पाकर राजा चल पड़े।

श्लोक 23 (1.122.23)

मङ्गलाचारयुक्ताभिराशीर्भिरभिनन्दितः । गजवाजिरथौघेन बलेन महताऽगमत् ॥

maṅgalācārayuktābhirāśīrbhirabhinanditaḥ | gajavājirathaughena balena mahatā'gamat

मंगलाचार से युक्त आशीर्वादों से अभिनन्दित होकर वे हाथियों, घोड़ों और रथों के समूह वाली विशाल सेना के साथ चले।

श्लोक 24 (1.122.24)

स राजा देवगर्भाभो विजिगीषुर्वसुन्धराम् । हृष्टपुष्टबलैः प्रायात्पाण्डुः शत्रूननेकशः ॥

sa rājā devagarbhābho vijigīṣurvasundharām | hṛṣṭapuṣṭabalaiḥ prāyātpāṇḍuḥ śatrūnanekaśaḥ

देवपुत्र के समान तेजस्वी, पृथ्वी-विजय के इच्छुक राजा पाण्डु अपनी प्रसन्न और हृष्ट-पुष्ट सेना के साथ अनेक शत्रुओं पर चढ़ाई करने निकले।

श्लोक 25 (1.122.25)

पूर्वमागस्कृतो गत्वा दशार्णाः समरे जिताः । पाण्डुना नरसिंहेन कौरवाणां यशोभृता ॥

pūrvamāgaskṛto gatvā daśārṇāḥ samare jitāḥ | pāṇḍunā narasiṃhena kauravāṇāṃ yaśobhṛtā

सबसे पहले उन्होंने अपराधी दशार्णों पर चढ़ाई की, और कौरवों के यश को धारण करने वाले नरसिंह पाण्डु ने उन्हें युद्ध में जीत लिया।

श्लोक 26 (1.122.26)

ततः सेनामुपादाय पाण्डुर्नानाविधध्वजाम् । प्रभूतहस्त्यश्वयुतां पदातिरथसंकुलाम् ॥

tataḥ senāmupādāya pāṇḍurnānāvidhadhvajām | prabhūtahastyaśvayutāṃ padātirathasaṃkulām

फिर पाण्डु ने नाना प्रकार की ध्वजाओं वाली, बहुत-से हाथियों और घोड़ों से युक्त तथा पैदलों और रथों से भरी सेना ली,

श्लोक 27 (1.122.27)

आगस्कारी महीपानां बहूनां बलदर्पितः । गोप्ता मगधराष्ट्रस्य दीर्घो राजगृहे हतः ॥

āgaskārī mahīpānāṃ bahūnāṃ baladarpitaḥ | goptā magadharāṣṭrasya dīrgho rājagṛhe hataḥ

और अपने बल के घमण्ड में अनेक राजाओं का अपराध करने वाला, मगध राज्य का रक्षक दीर्घ राजगृह में मारा गया।

श्लोक 28 (1.122.28)

ततः कोशं समादाय वाहनानि च भूरिशः । पाण्डुना मिथिलां गत्वा विदेहाः समरे जिताः ॥

tataḥ kośaṃ samādāya vāhanāni ca bhūriśaḥ | pāṇḍunā mithilāṃ gatvā videhāḥ samare jitāḥ

फिर कोश और बहुत-से वाहन लेकर पाण्डु मिथिला गए और विदेहों को युद्ध में परास्त किया।

श्लोक 29 (1.122.29)

तथा काशिषु सुह्मेषु पुण्ड्रेषु च नरर्षभ । स्वबाहुबलवीर्येण कुरूणामकरोद्यशः ॥

tathā kāśiṣu suhmeṣu puṇḍreṣu ca nararṣabha | svabāhubalavīryeṇa kurūṇāmakarodyaśaḥ

हे नरश्रेष्ठ! इसी प्रकार काशी, सुह्म और पुण्ड्र देशों में भी उन्होंने अपने बाहुबल और पराक्रम से कुरुओं का यश फैलाया।

श्लोक 30 (1.122.30)

तं शरौघमहाज्वालं शस्त्रार्चिषमरिन्दमम् । पाण्डुपावकमासाद्य व्यदह्यन्त नराधिपाः ॥

taṃ śaraughamahājvālaṃ śastrārciṣamarindamam | pāṇḍupāvakamāsādya vyadahyanta narādhipāḥ

बाणों की बौछार जिसकी विशाल लपटें थीं और शस्त्र जिसकी ज्वालाएँ थीं, उस शत्रुदमन पाण्डु-रूपी अग्नि के सामने आकर राजा जलकर भस्म हो गए।

श्लोक 31 (1.122.31)

ते ससेनाः ससेनेन विध्वंसितबला नृपाः । पाण्डुना वशगाः कृत्वा कुरुकर्मसु योजिताः ॥

te sasenāḥ sasenena vidhvaṃsitabalā nṛpāḥ | pāṇḍunā vaśagāḥ kṛtvā kurukarmasu yojitāḥ

अपनी सेनाओं सहित वे राजा, जिनकी शक्ति सेना-सहित पाण्डु ने छिन्न-भिन्न कर दी थी, उनके वश में करके कुरुओं के कार्यों में लगा दिए गए।

श्लोक 32 (1.122.32)

तेन ते निर्जिताः सर्वे पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः । तमेकं मेनिरे शूरं देवेष्विव पुरन्दरम् ॥

tena te nirjitāḥ sarve pṛthivyāṃ sarvapārthivāḥ | tamekaṃ menire śūraṃ deveṣviva purandaram

उनसे पराजित पृथ्वी के सभी राजा उन्हें वैसे ही एकमात्र वीर मानने लगे जैसे देवता इन्द्र को मानते हैं।

श्लोक 33 (1.122.33)

तं कृताञ्जलयः सर्वे प्रणता वसुधाधिपाः । उपाजग्मुर्धनं गृह्य रत्नानि विविधानि च ॥

taṃ kṛtāñjalayaḥ sarve praṇatā vasudhādhipāḥ | upājagmurdhanaṃ gṛhya ratnāni vividhāni ca

सब भूपति हाथ जोड़कर, सिर झुकाए, धन और नाना प्रकार के रत्न लेकर उनके पास आए:

श्लोक 34 (1.122.34)

मणिमुक्ताप्रवालं च सुवर्णं रजतं बहु । गोरत्नान्यश्वरत्नानि रथरत्नानि कुञ्जरान् ॥

maṇimuktāpravālaṃ ca suvarṇaṃ rajataṃ bahu | goratnānyaśvaratnāni ratharatnāni kuñjarān

मणि, मोती और मूँगे, बहुत-सा सोना और चाँदी, उत्तम गौएँ, उत्तम घोड़े, उत्तम रथ और हाथी;

श्लोक 35 (1.122.35)

खरोष्ट्रमहिषांश्चैव यच्च किंचिदजाविकम् । कम्बलाजिनरत्नानि राङ्कवास्तरणानि च । तत्सर्वं प्रतिजग्राह राजा नागपुराधिपः ॥

kharoṣṭramahiṣāṃścaiva yacca kiṃcidajāvikam | kambalājinaratnāni rāṅkavāstaraṇāni ca | tatsarvaṃ pratijagrāha rājā nāgapurādhipaḥ

गधे, ऊँट और भैंसे, जितनी भी बकरियाँ और भेड़ें थीं, उत्तम कम्बल और मृगचर्म, तथा रंकु मृग के ऊन के बिछौने: यह सब नागपुर के स्वामी राजा ने स्वीकार किया।

श्लोक 36 (1.122.36)

तदादाय ययौ पाण्डुः पुनर्मुदितवाहनः । हर्षयिष्यन्स्वराष्ट्राणि पुरं च गजसाह्वयम् ॥

tadādāya yayau pāṇḍuḥ punarmuditavāhanaḥ | harṣayiṣyansvarāṣṭrāṇi puraṃ ca gajasāhvayam

वह सब लेकर पाण्डु, जिनके वाहन भी प्रसन्न थे, अपने राज्यों और हस्तिनापुर को हर्षित करने के लिए लौट चले।

श्लोक 37 (1.122.37)

शान्तनो राजसिंहस्य भरतस्य च धीमतः । प्रनष्टः कीर्तिजः शब्दः पाण्डुना पुनराहृतः ॥

śāntano rājasiṃhasya bharatasya ca dhīmataḥ | pranaṣṭaḥ kīrtijaḥ śabdaḥ pāṇḍunā punarāhṛtaḥ

"राजसिंह शान्तनु और बुद्धिमान भरत की कीर्ति का जो घोष लुप्त हो गया था, उसे पाण्डु ने फिर लौटा दिया है।

श्लोक 38 (1.122.38)

ये पुरा कुरुराष्ट्राणि जह्रुः कुरुधनानि च । ते नागपुरसिंहेन पाण्डुना करदीकृताः ॥

ye purā kururāṣṭrāṇi jahruḥ kurudhanāni ca | te nāgapurasiṃhena pāṇḍunā karadīkṛtāḥ

"जिन्होंने पहले कुरुओं के राज्य और कुरुओं का धन छीन लिया था, उन्हें नागपुर के सिंह पाण्डु ने करदाता बना दिया है।"

श्लोक 39 (1.122.39)

इत्यभाषन्त राजानो राजामात्याश्च सङ्गताः । प्रतीतमनसो हृष्टाः पौरजानपदैः सह ॥

ityabhāṣanta rājāno rājāmātyāśca saṅgatāḥ | pratītamanaso hṛṣṭāḥ paurajānapadaiḥ saha

इस प्रकार एकत्र हुए राजा और राजमन्त्री, नगर और जनपद के लोगों के साथ, प्रसन्न और सन्तुष्ट मन से कहने लगे।

श्लोक 40 (1.122.40)

प्रत्युद्ययुश्च तं प्राप्तं सर्वे भीष्मपुरोगमाः । ते नदूरमिवाध्वानं गत्वा नागपुरालयाः ॥

pratyudyayuśca taṃ prāptaṃ sarve bhīṣmapurogamāḥ | te nadūramivādhvānaṃ gatvā nāgapurālayāḥ

और भीष्म को आगे करके सब लोग उनके आगमन पर अगवानी के लिए निकले। नागपुर के वे निवासी, जिन्हें मार्ग मानो तनिक भी लम्बा नहीं लगा,

श्लोक 41 (1.122.41)

आवृतं ददृशुर्हृष्टा लोकं बहुविधैर्धनैः । नानायानसमानीतै रत्नैरुच्चावचैस्तदा ॥

āvṛtaṃ dadṛśurhṛṣṭā lokaṃ bahuvidhairdhanaiḥ | nānāyānasamānītai ratnairuccāvacaistadā

हर्षित होकर देखने लगे कि सारा जगत् नाना प्रकार के धन से भरा है, अनेक वाहनों पर लाए गए छोटे-बड़े रत्नों से,

श्लोक 42 (1.122.42)

हस्त्यश्वरथरत्नैश्च गोभिरुष्ट्रैस्तथाऽऽविभिः । नान्तं ददृशुरासाद्य भीष्मेण सह कौरवाः ॥

hastyaśvaratharatnaiśca gobhiruṣṭraistathā''vibhiḥ | nāntaṃ dadṛśurāsādya bhīṣmeṇa saha kauravāḥ

उत्तम हाथियों, घोड़ों और रथों से, गौओं, ऊँटों और भेड़ों से; पास पहुँचकर भी भीष्म सहित कौरव उसका अन्त नहीं देख सके।

श्लोक 43 (1.122.43)

सोऽभिवाद्य पितुः पादौ कौसल्यानन्दवर्धनः । यथाऽर्हं मानयामास पौरजानपदानपि ॥

so'bhivādya pituḥ pādau kausalyānandavardhanaḥ | yathā'rhaṃ mānayāmāsa paurajānapadānapi

कौसल्या का आनन्द बढ़ाने वाले पाण्डु ने पिता के चरणों में प्रणाम किया और नगर तथा जनपद के लोगों का यथायोग्य सम्मान किया।

श्लोक 44 (1.122.44)

प्रमृद्य परराष्ट्राणि कृतार्थं पुनरागतम् । पुत्रमाश्लिष्य भीष्मस्तु हर्षादश्रूण्यवर्तयत् ॥

pramṛdya pararāṣṭrāṇi kṛtārthaṃ punarāgatam | putramāśliṣya bhīṣmastu harṣādaśrūṇyavartayat

दूसरे राज्यों को रौंदकर कृतार्थ होकर लौटे पुत्र को गले लगाकर भीष्म हर्ष के आँसू बहाने लगे।

श्लोक 45 (1.122.45)

स तूर्यशतशङ्खानां भेरीणां च महास्वनैः । हर्षयन्सर्वशः पौरान्विवेश गजसाह्वयम् ॥

sa tūryaśataśaṅkhānāṃ bherīṇāṃ ca mahāsvanaiḥ | harṣayansarvaśaḥ paurānviveśa gajasāhvayam

सैकड़ों तुरहियों, शंखों और नगाड़ों की ऊँची ध्वनि से सब ओर नगरवासियों को हर्षित करते हुए उन्होंने हस्तिनापुर में प्रवेश किया।

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