आदि पर्व · अध्याय 123
किन्दम का शाप
पाण्डु दिग्विजय में जीता हुआ धन भीष्म, सत्यवती, कौसल्या और विदुर को भेंट करते हैं, और उसी धन से धृतराष्ट्र सौ अश्वमेध यज्ञ करते हैं। फिर पाण्डु कुन्ती और माद्री के साथ महल छोड़कर हिमालय की दक्षिणी ढलानों के वनों में चले जाते हैं और शिकार में रम जाते हैं। वहाँ वे मैथुनरत एक मृग और मृगी को बाणों से बींध देते हैं; वह मृग वास्तव में मृगरूपधारी मुनि किन्दम है। शिकार के धर्म पर दोनों के विवाद के बाद मरणासन्न मुनि पाण्डु को शाप देता है कि प्रिया के साथ समागम करते ही उनकी मृत्यु हो जाएगी।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.123.1)
धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातः स्वबाहुविजितं धनम् । भीष्माय सत्यवत्यै च मात्रे चोपजहार सः ॥
dhṛtarāṣṭrābhyanujñātaḥ svabāhuvijitaṃ dhanam | bhīṣmāya satyavatyai ca mātre copajahāra saḥ
वैशम्पायन ने कहा — धृतराष्ट्र की अनुमति लेकर पाण्डु ने अपने बाहुबल से जीता हुआ धन भीष्म, सत्यवती और अपनी माता को भेंट किया।
श्लोक 2 (1.123.2)
विदुराय च वै पाण्डुः प्रेषयामास तद्धनम् । सुहृदश्चापि धर्मात्मा धनेन समतर्पयत् ॥
vidurāya ca vai pāṇḍuḥ preṣayāmāsa taddhanam | suhṛdaścāpi dharmātmā dhanena samatarpayat
पाण्डु ने उस धन में से विदुर के पास भी भेजा, और उस धर्मात्मा ने अपने सुहृदों को भी धन देकर तृप्त किया।
श्लोक 3 (1.123.3)
ततः सत्यवतीं भीष्मं कौसल्यां च यशस्विनीम् । शुभैः पाण्डुर्जितैरर्थैस्तोषयामास भारत ॥
tataḥ satyavatīṃ bhīṣmaṃ kausalyāṃ ca yaśasvinīm | śubhaiḥ pāṇḍurjitairarthaistoṣayāmāsa bhārata
हे भारत, फिर पाण्डु ने अपने जीते हुए उत्तम धन से सत्यवती, भीष्म और यशस्विनी कौसल्या को संतुष्ट किया।
श्लोक 4 (1.123.4)
ननन्द माता कौसल्या तमप्रतिमतेजसम् । जयन्तमिव पौलोमी परिष्वज्य नर्षभम् ॥
nananda mātā kausalyā tamapratimatejasam | jayantamiva paulomī pariṣvajya narṣabham
माता कौसल्या उस अनुपम तेजस्वी नरश्रेष्ठ को हृदय से लगाकर वैसे ही आनन्दित हुईं, जैसे पौलोमी (शची) जयन्त को गले लगाकर होती हैं।
श्लोक 5 (1.123.5)
तस्य वीरस्य विक्रान्तैः सहस्रशतदक्षिणैः । अश्वमेधशतैरीजे धृतराष्ट्रो महामखैः ॥
tasya vīrasya vikrāntaiḥ sahasraśatadakṣiṇaiḥ | aśvamedhaśatairīje dhṛtarāṣṭro mahāmakhaiḥ
उस वीर के पराक्रम से प्राप्त धन से धृतराष्ट्र ने सौ महान अश्वमेध यज्ञ किए, जिनमें से प्रत्येक में लाख-लाख की दक्षिणा दी गई।
श्लोक 6 (1.123.6)
संप्रयुक्तस्तु कुन्त्या च माद्र्या च भरतर्षभ । जिततन्द्रीस्तदा पाण्डुर्बभूव वनगोचरः ॥
saṃprayuktastu kuntyā ca mādryā ca bharatarṣabha | jitatandrīstadā pāṇḍurbabhūva vanagocaraḥ
हे भरतश्रेष्ठ, तब कुन्ती और माद्री को साथ लेकर, आलस्य को जीत चुके पाण्डु वनवासी हो गए।
श्लोक 7 (1.123.7)
हित्वा प्रासादनिलयं शुभानि शयनानि च । अरण्यनित्यः सततं बभूव मृगयापरः ॥
hitvā prāsādanilayaṃ śubhāni śayanāni ca | araṇyanityaḥ satataṃ babhūva mṛgayāparaḥ
महल का निवास और सुन्दर शय्याएँ छोड़कर वे सदा वन में रहने लगे और निरन्तर मृगया में लगे रहे।
श्लोक 8 (1.123.8)
स चरन्दक्षिणं पार्श्वं रम्यं हिमवतो गिरेः । उवास गिरिपृष्ठेषु महाशालवनेषु च ॥
sa carandakṣiṇaṃ pārśvaṃ ramyaṃ himavato gireḥ | uvāsa giripṛṣṭheṣu mahāśālavaneṣu ca
हिमालय पर्वत की रमणीय दक्षिणी ढलान पर विचरते हुए वे पर्वत-शिखरों पर और ऊँचे शाल-वृक्षों के वनों में रहने लगे।
श्लोक 9 (1.123.9)
रराज कुन्त्या माद्र्या च पाण्डुः सह वने चरन् । करेण्वोरिव मध्यस्थः श्रीमान्पौरन्दरो गजः ॥
rarāja kuntyā mādryā ca pāṇḍuḥ saha vane caran | kareṇvoriva madhyasthaḥ śrīmānpaurandaro gajaḥ
कुन्ती और माद्री के साथ वन में विचरते पाण्डु ऐसे शोभित होते थे, जैसे दो हथिनियों के बीच इन्द्र का शोभाशाली हाथी।
श्लोक 10 (1.123.10)
भारतं सह भार्याभ्यां खड्गबाणधनुर्धरम् । विचित्रकवचं वीरं परमास्त्रविदं नृपम् । देवोऽयमित्यमन्यन्त चरन्तं वनवासिनः ॥
bhārataṃ saha bhāryābhyāṃ khaḍgabāṇadhanurdharam | vicitrakavacaṃ vīraṃ paramāstravidaṃ nṛpam | devo'yamityamanyanta carantaṃ vanavāsinaḥ
दोनों पत्नियों के साथ, खड्ग, बाण और धनुष धारण किए, विचित्र कवच पहने, उत्तम अस्त्रों के ज्ञाता उस वीर भरतवंशी राजा को विचरते देखकर वनवासी उसे देवता मानते थे।
श्लोक 11 (1.123.11)
तस्य कामांश्च भोगांश्च नरा नित्यमतन्द्रिताः । उपजह्रुर्वनान्तेषु धृतराष्ट्रेण चोदिताः ॥
tasya kāmāṃśca bhogāṃśca narā nityamatandritāḥ | upajahrurvanānteṣu dhṛtarāṣṭreṇa coditāḥ
धृतराष्ट्र की आज्ञा से लोग बिना थके सदा वन के भीतर उनकी मनचाही और भोग की सब वस्तुएँ पहुँचाते रहते थे।
श्लोक 12 (1.123.12)
तदासाद्य महारण्यं मृगव्यालनिषेवितम् । तत्र मैथुनकालस्थं ददर्श मृगयूथपम् ॥
tadāsādya mahāraṇyaṃ mṛgavyālaniṣevitam | tatra maithunakālasthaṃ dadarśa mṛgayūthapam
मृगों और हिंस्र पशुओं से भरे एक महावन में पहुँचकर उन्होंने वहाँ मैथुन में लगे एक यूथपति मृग को देखा।
श्लोक 13 (1.123.13)
ततस्तं च मृगीं चैव रुक्मपुङ्खैः सुपत्रिभिः । निर्बिभेद शरैस्तीक्ष्णैः पाण्डुः पञ्चभिराशुगैः ॥
tatastaṃ ca mṛgīṃ caiva rukmapuṅkhaiḥ supatribhiḥ | nirbibheda śaraistīkṣṇaiḥ pāṇḍuḥ pañcabhirāśugaiḥ
तब पाण्डु ने स्वर्णपंख वाले, सुन्दर पंखों से युक्त पाँच तीखे, शीघ्रगामी बाणों से उस मृग और मृगी दोनों को बींध डाला।
श्लोक 14 (1.123.14)
स च राजन्महातेजा ऋषिपुत्रस्तपोधनः । भार्यया सह तेजस्वी मृगरूपेण सङ्गतः ॥
sa ca rājanmahātejā ṛṣiputrastapodhanaḥ | bhāryayā saha tejasvī mṛgarūpeṇa saṅgataḥ
हे राजन्, वह मृग वास्तव में एक महातेजस्वी, तपोधन ऋषिपुत्र था, जो मृग का रूप धरकर अपनी पत्नी के साथ समागम कर रहा था।
श्लोक 15 (1.123.15)
स संयुक्तस्तया मृग्या मानुषीं वाचमीरयन् । क्षणेन पतितो भूमौ विललापातुरो मृगः ॥
sa saṃyuktastayā mṛgyā mānuṣīṃ vācamīrayan | kṣaṇena patito bhūmau vilalāpāturo mṛgaḥ
मृगी से संयुक्त वह मृग क्षण भर में भूमि पर गिर पड़ा और व्याकुल होकर मनुष्य की वाणी में विलाप करने लगा।
मृग उवाच
श्लोक 16 (1.123.16)
काममन्युवशं प्राप्ता बुद्ध्यन्तरगता अपि । वर्जयन्ति नृशंसानि पापेष्वपि रता नराः ॥
kāmamanyuvaśaṃ prāptā buddhyantaragatā api | varjayanti nṛśaṃsāni pāpeṣvapi ratā narāḥ
मृग ने कहा — "काम और क्रोध के वश में पड़े, बुद्धि से भटके हुए, पापों में रमे हुए मनुष्य भी क्रूर कर्मों से बचते हैं।
श्लोक 17 (1.123.17)
न विधिं ग्रसते प्रज्ञा प्रज्ञां तु ग्रसते विधिः । विधिपर्यागतानर्थान्प्रज्ञावान्प्रतिपद्यते ॥
na vidhiṃ grasate prajñā prajñāṃ tu grasate vidhiḥ | vidhiparyāgatānarthānprajñāvānpratipadyate
"बुद्धि विधाता को नहीं निगलती, विधाता ही बुद्धि को निगल लेता है। बुद्धिमान मनुष्य भाग्य से आई वस्तुओं को स्वीकार कर लेता है।
श्लोक 18 (1.123.18)
शश्वद्धर्मात्मनां मुख्ये कुले जातस्य भारत । कामलोभाभिभूतस्य कथं ते चलिता मतिः ॥
śaśvaddharmātmanāṃ mukhye kule jātasya bhārata | kāmalobhābhibhūtasya kathaṃ te calitā matiḥ
"हे भारत, तुम सदा धर्मात्मा रहे लोगों के श्रेष्ठ कुल में जन्मे हो; फिर काम और लोभ से अभिभूत होकर तुम्हारी बुद्धि कैसे डगमगा गई?"
पाण्डुरुवाच
श्लोक 19 (1.123.19)
शत्रूणां या वधे वृत्तिः सा मृगाणां वधे स्मृता । राज्ञां मृग न मां मोहात्त्वं गर्हयितुमर्हसि ॥
śatrūṇāṃ yā vadhe vṛttiḥ sā mṛgāṇāṃ vadhe smṛtā | rājñāṃ mṛga na māṃ mohāttvaṃ garhayitumarhasi
पाण्डु ने कहा — "राजाओं के लिए शत्रुओं के वध में जो आचार माना गया है, वही मृगों के वध में भी माना गया है। हे मृग, तुम्हें अज्ञानवश मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिए।
श्लोक 20 (1.123.20)
अच्छद्मनाऽमायया च मृगाणां वध इष्यते । स एव धर्मो राज्ञां तु तद्धि त्वं किं नु गर्हसे ॥
acchadmanā'māyayā ca mṛgāṇāṃ vadha iṣyate | sa eva dharmo rājñāṃ tu taddhi tvaṃ kiṃ nu garhase
"बिना छल और कपट के मृगों का वध उचित माना गया है। यही राजाओं का धर्म है; फिर तुम उसकी निन्दा क्यों करते हो?
श्लोक 21 (1.123.21)
अगस्त्यः सत्रमासीनश्चकार मृगयामृषिः । आरण्यान्सर्वदैवत्यान्मृगान्प्रोक्ष्य महावने ॥
agastyaḥ satramāsīnaścakāra mṛgayāmṛṣiḥ | āraṇyānsarvadaivatyānmṛgānprokṣya mahāvane
"सत्र में बैठे महर्षि अगस्त्य ने भी मृगया की थी; उन्होंने महावन के वनैले मृगों का प्रोक्षण करके उन्हें सब देवताओं के लिए अर्पित किया था।
श्लोक 22 (1.123.22)
प्रमाणदृष्टधर्मेण कथमस्मान्विगर्हसे । अगस्त्यस्याभिचारेण युष्माकं विहितो वधः ॥
pramāṇadṛṣṭadharmeṇa kathamasmānvigarhase | agastyasyābhicāreṇa yuṣmākaṃ vihito vadhaḥ
"जब यह धर्म प्रमाण से सिद्ध है, तो तुम हमारी निन्दा क्यों करते हो? अगस्त्य के अनुष्ठान से ही तुम्हारा वध विहित हुआ है।"
मृग उवाच
श्लोक 23 (1.123.23)
न रिपून्वै समुद्दिश्य विमुञ्चन्ति नराः शरान् । रन्ध्र एषां विशेषेण वधकालः प्रशस्यते ॥
na ripūnvai samuddiśya vimuñcanti narāḥ śarān | randhra eṣāṃ viśeṣeṇa vadhakālaḥ praśasyate
मृग ने कहा — "मनुष्य अपने शत्रुओं पर भी, जब वे असहाय या असावधान हों, बाण नहीं छोड़ते; उनके वध के लिए विशेष रूप से प्रशंसित समय तो आमने-सामने का युद्ध ही है।"
पाण्डुरुवाच
श्लोक 24 (1.123.24)
प्रमत्तमप्रमत्तं वा विवृतं घ्नन्ति चौजसा । उपायैर्विविधैस्तीक्ष्णैः कस्मान्मृग विगर्हसे ॥
pramattamapramattaṃ vā vivṛtaṃ ghnanti caujasā | upāyairvividhaistīkṣṇaiḥ kasmānmṛga vigarhase
पाण्डु ने कहा — "मृग असावधान हों या सावधान, लोग उन्हें खुले रूप में, बलपूर्वक, अनेक तीखे उपायों से मारते हैं। तब हे मृग, तुम मेरी निन्दा क्यों करते हो?"
मृग उवाच
श्लोक 25 (1.123.25)
नाहं घ्नन्तं मृगान्राजन्विगर्हे चात्मकारणात् । मैथुनं तु प्रतीक्ष्यं मे त्वयेहाद्यानृशंस्यतः ॥
nāhaṃ ghnantaṃ mṛgānrājanvigarhe cātmakāraṇāt | maithunaṃ tu pratīkṣyaṃ me tvayehādyānṛśaṃsyataḥ
मृग ने कहा — "हे राजन्, मैं न तो मृगों को मारने के लिए तुम्हारी निन्दा करता हूँ, न अपने कारण। परन्तु दया करके तुम्हें मेरे मैथुन के पूरा होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए थी।
श्लोक 26 (1.123.26)
सर्वभूतहिते काले सर्वभूतेप्सिते तथा । को हि विद्वान्मृगं हन्याच्चरन्तं मैथुनं वने ॥
sarvabhūtahite kāle sarvabhūtepsite tathā | ko hi vidvānmṛgaṃ hanyāccarantaṃ maithunaṃ vane
"जो समय सब प्राणियों के लिए हितकर और सबको अभीष्ट है, उस समय वन में मैथुन करते मृग को कौन समझदार मनुष्य मारेगा?
श्लोक 27 (1.123.27)
अस्यां मृग्यां च राजेन्द्र हर्षान्मैथुनमाचरम् । पुरुषार्थफलं कर्तुं तत्त्वया विफलीकृतम् ॥
asyāṃ mṛgyāṃ ca rājendra harṣānmaithunamācaram | puruṣārthaphalaṃ kartuṃ tattvayā viphalīkṛtam
"हे राजेन्द्र, मैं पुरुषार्थ का फल पाने के लिए इस मृगी के साथ हर्षपूर्वक समागम कर रहा था, और तुमने उसे निष्फल कर दिया।
श्लोक 28 (1.123.28)
पौरवाणां महाराज तेषामक्लिष्टकर्मणाम् । वंशे जातस्य कौरव्य नानुरूपमिदं तव ॥
pauravāṇāṃ mahārāja teṣāmakliṣṭakarmaṇām | vaṃśe jātasya kauravya nānurūpamidaṃ tava
"हे महाराज, हे कौरव्य, निष्कलंक कर्म करनेवाले पौरवों के वंश में जन्मे तुम्हारे लिए यह शोभा नहीं देता।
श्लोक 29 (1.123.29)
नृशंसं कर्म सुमहत्सर्वलोकविगर्हितम् । अस्वर्ग्यमयशस्यं चाप्यधर्मिष्ठं च भारत ॥
nṛśaṃsaṃ karma sumahatsarvalokavigarhitam | asvargyamayaśasyaṃ cāpyadharmiṣṭhaṃ ca bhārata
"हे भारत, यह अत्यन्त क्रूर कर्म है, सारे संसार में निन्दित, स्वर्ग से वंचित करनेवाला, अपयश देनेवाला और घोर अधर्म।
श्लोक 30 (1.123.30)
स्त्रीभोगानां विशेषज्ञः शास्त्रधर्मार्थतत्त्ववित् । नार्हस्त्वं सुरसङ्काश कर्तुमस्वर्ग्यमीदृशम् ॥
strībhogānāṃ viśeṣajñaḥ śāstradharmārthatattvavit | nārhastvaṃ surasaṅkāśa kartumasvargyamīdṛśam
"तुम स्त्री-सुख के मर्म को जानते हो, शास्त्र, धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानते हो; हे देवतुल्य, तुम्हें ऐसा स्वर्ग से गिरानेवाला कर्म नहीं करना चाहिए।
श्लोक 31 (1.123.31)
त्वया नृशंसकर्तारः पापाचाराश्च मानवाः । निग्राह्याः पार्थिवश्रेष्ठ त्रिवर्गपरिवर्जिताः ॥
tvayā nṛśaṃsakartāraḥ pāpācārāśca mānavāḥ | nigrāhyāḥ pārthivaśreṣṭha trivargaparivarjitāḥ
"हे राजश्रेष्ठ, क्रूर कर्म करनेवाले, पापाचारी और धर्म-अर्थ-काम तीनों से रहित मनुष्यों को दण्ड देना तो तुम्हारा काम है।
श्लोक 32 (1.123.32)
किं कृतं ते नरश्रेष्ठ मामिहानागसं घ्नतः । मुनिं मूलफलाहारं मृगवेषधरं नृप ॥
kiṃ kṛtaṃ te naraśreṣṭha māmihānāgasaṃ ghnataḥ | muniṃ mūlaphalāhāraṃ mṛgaveṣadharaṃ nṛpa
"हे नरश्रेष्ठ, हे राजन्, मुझ निरपराध को, कन्द-मूल-फल खानेवाले, मृग का वेश धरे मुनि को यहाँ मारकर तुम्हें क्या मिला,
श्लोक 33 (1.123.33)
वसमानमरण्येषु नित्यं शमपरायणम् । त्वयाऽहं हिंसितो यस्मात्तस्मात्त्वामप्यनागसः ॥
vasamānamaraṇyeṣu nityaṃ śamaparāyaṇam | tvayā'haṃ hiṃsito yasmāttasmāttvāmapyanāgasaḥ
"जो सदा वनों में रहता है और शान्ति में लीन रहता है? क्योंकि तुमने मुझ निर्दोष का वध किया है, इसलिए तुम पर भी,
श्लोक 34 (1.123.34)
द्वयोर्नृशंसकर्तारमवशं काममोहितम् । जीवितान्तकरो भावो मैथुने समुपैष्यति ॥
dvayornṛśaṃsakartāramavaśaṃ kāmamohitam | jīvitāntakaro bhāvo maithune samupaiṣyati
"जोड़े पर क्रूरता करनेवाले, काम से मोहित और विवश तुम पर, मैथुन के समय ही प्राण हरनेवाली दशा आ पड़ेगी।
श्लोक 35 (1.123.35)
अहं हि किंदमो नाम तपसा भावितो मुनिः । व्यपत्रपन्मनुष्याणां मृग्यां मैथुनमाचरम् ॥
ahaṃ hi kiṃdamo nāma tapasā bhāvito muniḥ | vyapatrapanmanuṣyāṇāṃ mṛgyāṃ maithunamācaram
"मैं किन्दम नाम का मुनि हूँ, तप से पवित्र। मनुष्यों से लज्जा के कारण मैं मृगी के साथ समागम कर रहा था।
श्लोक 36 (1.123.36)
मृगो भूत्वा मृगैः सार्धं चरामि गहने वने । न तु ते ब्रह्महत्येयं भविष्यत्यविजानतः ॥
mṛgo bhūtvā mṛgaiḥ sārdhaṃ carāmi gahane vane | na tu te brahmahatyeyaṃ bhaviṣyatyavijānataḥ
"मृग बनकर मैं मृगों के साथ घने वन में विचरता हूँ। फिर भी तुम्हें ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगेगा, क्योंकि तुम यह नहीं जानते थे
श्लोक 37 (1.123.37)
मृगरूपधरं हत्वा मामेवं काममोहितम् । अस्य तु त्वं फलं मूढ प्राप्स्यसीदृशमेव हि ॥
mṛgarūpadharaṃ hatvā māmevaṃ kāmamohitam | asya tu tvaṃ phalaṃ mūḍha prāpsyasīdṛśameva hi
"जब तुमने काम से मोहित, मृगरूपधारी मुझको मारा। पर हे मूढ़, इसका फल तुम्हें ठीक ऐसा ही मिलेगा —
श्लोक 38 (1.123.38)
प्रियया सह संवासं प्राप्य कामविमोहितः । त्वमप्यस्यामवस्थायां प्रेतलोकं गमिष्यसि ॥
priyayā saha saṃvāsaṃ prāpya kāmavimohitaḥ | tvamapyasyāmavasthāyāṃ pretalokaṃ gamiṣyasi
"काम से मोहित होकर जब तुम अपनी प्रिया से समागम करोगे, तब तुम भी इसी अवस्था में प्रेतलोक को जाओगे।
श्लोक 39 (1.123.39)
अन्तकाले हि संवासं यया गन्तासि कान्तया । प्रेतराजपुरं प्राप्तं सर्वभूतदुरत्ययम् । भक्त्या मतिमतां श्रेष्ठ सैव त्वाऽनुगमिष्यति ॥
antakāle hi saṃvāsaṃ yayā gantāsi kāntayā | pretarājapuraṃ prāptaṃ sarvabhūtaduratyayam | bhaktyā matimatāṃ śreṣṭha saiva tvā'nugamiṣyati
"हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, अन्तकाल में जिस प्रिया के साथ तुम समागम करोगे, वही भक्तिवश तुम्हारे पीछे-पीछे उस प्रेतराज के नगर में जाएगी, जिसे पार करना किसी प्राणी के वश में नहीं।
श्लोक 40 (1.123.40)
वर्तमानः सुखे दुःखं यथाऽहं प्रापितस्त्वया । तथा त्वां च सुखं प्राप्तं दुःखमभ्यागमिष्यति ॥
vartamānaḥ sukhe duḥkhaṃ yathā'haṃ prāpitastvayā | tathā tvāṃ ca sukhaṃ prāptaṃ duḥkhamabhyāgamiṣyati
"जैसे तुमने सुख में डूबे मुझको दुःख पहुँचाया है, वैसे ही सुख पाते ही तुम पर भी दुःख आ पड़ेगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 41 (1.123.41)
एवमुक्त्वा सुदुःखार्तो जीवितात्स व्यमुच्यत । मृगः पाण्डुश्च दुःखार्तः क्षणेन समपद्यत ॥
evamuktvā suduḥkhārto jīvitātsa vyamucyata | mṛgaḥ pāṇḍuśca duḥkhārtaḥ kṣaṇena samapadyata
वैशम्पायन ने कहा — ऐसा कहकर अत्यन्त दुःखी मृग ने प्राण त्याग दिए, और पाण्डु भी उसी क्षण शोक से व्याकुल हो गए।