आदि पर्व · अध्याय 124
पाण्डु का वैराग्य
मरे हुए मुनि और अपने व्यसन-पतन पर शोक करते हुए पाण्डु संसार त्यागने का निश्चय करते हैं और उस भिक्षु-जीवन का वर्णन करते हैं जिसे वे अपनाना चाहते हैं; दूसरों के आश्रित जीवन को वे कुत्तों का मार्ग बताते हैं। कुन्ती और माद्री पीछे छूटने से इनकार करती हैं और प्राण त्यागने की बात कहती हैं, तब पाण्डु उनके साथ कठोर वानप्रस्थ जीवन चुनते हैं। वे अपने आभूषण और धन ब्राह्मणों को दान कर देते हैं और सेवकों को हस्तिनापुर लौटा देते हैं, जहाँ धृतराष्ट्र उनके लिए शोक करते हैं। पाण्डु पत्नियों के साथ चैत्ररथ, कालकूट, हिमालय, गन्धमादन, इन्द्रद्युम्न सरोवर और हंसकूट को पार करके शतशृङ्ग पर्वत पर तप करने लगते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.124.1)
तं व्यतीतमुपक्रम्य राजा स्वमिव बान्धवम् । सभार्यः शोकदुःखार्तः पर्यदेवयदातुरः ॥
taṃ vyatītamupakramya rājā svamiva bāndhavam | sabhāryaḥ śokaduḥkhārtaḥ paryadevayadāturaḥ
वैशम्पायन ने कहा — पत्नियों सहित शोक और दुःख से पीड़ित राजा उस मृत मुनि के पास जाकर, मानो वह उनका अपना बन्धु हो, व्याकुल होकर विलाप करने लगे।
पाण्डुरुवाच
श्लोक 2 (1.124.2)
सतामपि कुले जाताः कर्मणा बत दुर्गतिम् । प्राप्नुवन्त्यकृतात्मानः कामजालविमोहिताः ॥
satāmapi kule jātāḥ karmaṇā bata durgatim | prāpnuvantyakṛtātmānaḥ kāmajālavimohitāḥ
पाण्डु ने कहा — "हाय! सज्जनों के कुल में जन्मे लोग भी, यदि उन्होंने अपने मन को वश में नहीं किया, तो काम के जाल में मोहित होकर अपने कर्मों से दुर्गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 3 (1.124.3)
शश्वद्धर्मात्मना जातो बाल एव पिता मम । जीवितान्तमनुप्राप्तः कामात्मैवेति नः श्रुतम् ॥
śaśvaddharmātmanā jāto bāla eva pitā mama | jīvitāntamanuprāptaḥ kāmātmaiveti naḥ śrutam
"हमने सुना है कि मेरे पिता, सदा धर्मात्मा रहे पिता से जन्म लेकर भी, कामासक्त होने के कारण बाल्यावस्था में ही जीवन के अन्त को प्राप्त हुए।
श्लोक 4 (1.124.4)
तस्य कामात्मनः क्षेत्रे राज्ञः संयतवागृषिः । कृष्णद्वैपायनः साक्षाद्भगवान्मामजीजनत् ॥
tasya kāmātmanaḥ kṣetre rājñaḥ saṃyatavāgṛṣiḥ | kṛṣṇadvaipāyanaḥ sākṣādbhagavānmāmajījanat
"उन्हीं कामासक्त राजा के क्षेत्र में संयमित वाणी वाले साक्षात् भगवान् ऋषि कृष्णद्वैपायन ने मुझे उत्पन्न किया।
श्लोक 5 (1.124.5)
तस्याद्य व्यसने बुद्धिः संजातेयं ममाधमा । त्यक्तस्य देवैरनयान्मृगयां परिधावतः ॥
tasyādya vyasane buddhiḥ saṃjāteyaṃ mamādhamā | tyaktasya devairanayānmṛgayāṃ paridhāvataḥ
"फिर भी आज उन्हीं के पुत्र, मुझ में, जो अपनी दुर्नीति के कारण देवताओं द्वारा त्याग दिया गया हूँ और शिकार के पीछे दौड़ता फिरता हूँ, व्यसन की यह अधम बुद्धि उत्पन्न हो गई।
श्लोक 6 (1.124.6)
मोक्षमेव व्यवस्यामि बन्धो हि व्यसनं महत् । सुवृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम् ॥
mokṣameva vyavasyāmi bandho hi vyasanaṃ mahat | suvṛttimanuvartiṣye tāmahaṃ pituravyayām
"मैं अब मोक्ष का ही निश्चय करता हूँ, क्योंकि बन्धन बड़ा भारी संकट है। मैं अपने पिता मुनि के उस अक्षय सदाचार का अनुसरण करूँगा।
श्लोक 7 (1.124.7)
अतीव तपसात्मानं योजयिष्याम्यसंशयम् । तस्मादेकाहमेकाहमेकैकस्मिन्वनस्पतौ ॥
atīva tapasātmānaṃ yojayiṣyāmyasaṃśayam | tasmādekāhamekāhamekaikasminvanaspatau
"निःसन्देह मैं अपने को अत्यन्त कठोर तप में लगाऊँगा। इसलिए अकेला, एक-एक वृक्ष के नीचे एक-एक दिन रहकर,
श्लोक 8 (1.124.8)
चरन्भैक्षं मुनिर्मुण्डश्चरिष्याम्याश्रमानिमान् । पांसुना समवच्छन्नः शून्यागारकृतालयः ॥
caranbhaikṣaṃ munirmuṇḍaścariṣyāmyāśramānimān | pāṃsunā samavacchannaḥ śūnyāgārakṛtālayaḥ
"भिक्षा पर जीता हुआ, मुण्डित-सिर मुनि बनकर, धूल से ढका, सूने घरों को अपना निवास बनाकर मैं इन आश्रमों में विचरूँगा,
श्लोक 9 (1.124.9)
वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रियाप्रियः । न शोचन्न प्रहृष्यंश्च तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥
vṛkṣamūlaniketo vā tyaktasarvapriyāpriyaḥ | na śocanna prahṛṣyaṃśca tulyanindātmasaṃstutiḥ
"या वृक्ष की जड़ को घर बनाकर; प्रिय और अप्रिय सब कुछ त्यागकर, न शोक करता हुआ न हर्षित होता हुआ, निन्दा और प्रशंसा को समान मानता हुआ,
श्लोक 10 (1.124.10)
निराशीर्निर्नमस्कारो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः । न चाप्यवहसन्कंचिन्न कुर्वन्भ्रुकुटीं क्वचित् ॥
nirāśīrnirnamaskāro nirdvandvo niṣparigrahaḥ | na cāpyavahasankaṃcinna kurvanbhrukuṭīṃ kvacit
"कामनाओं से रहित, किसी को नमस्कार न करता हुआ, द्वन्द्वों से मुक्त, परिग्रह-रहित, न किसी का उपहास करता हुआ, न कभी किसी पर भौंहें चढ़ाता हुआ,
श्लोक 11 (1.124.11)
प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वभूतहिते रतः । जङ्गमाजङ्गमं सर्वमविहिंसंश्चतुर्विधम् ॥
prasannavadano nityaṃ sarvabhūtahite rataḥ | jaṅgamājaṅgamaṃ sarvamavihiṃsaṃścaturvidham
"सदा प्रसन्नमुख, सब प्राणियों के हित में रत, चारों प्रकार के समस्त चर-अचर जीवों में से किसी की हिंसा न करता हुआ,
श्लोक 12 (1.124.12)
स्वासु प्रजास्विव सदा समः प्राणभृतः प्रति । एककालं चरन्भैक्षं कुलानि दश पञ्च च ॥
svāsu prajāsviva sadā samaḥ prāṇabhṛtaḥ prati | ekakālaṃ caranbhaikṣaṃ kulāni daśa pañca ca
"सब प्राणियों के प्रति सदा अपनी सन्तान के समान समभाव रखता हुआ; दिन में एक बार पन्द्रह घरों से भिक्षा माँगता हुआ,
श्लोक 13 (1.124.13)
असंभवे वा भैक्षस्य चरन्ननशनान्यपि । अल्पमल्पं च भुञ्जानः पूर्वालाभे न जातुचित् ॥
asaṃbhave vā bhaikṣasya carannanaśanānyapi | alpamalpaṃ ca bhuñjānaḥ pūrvālābhe na jātucit
"या भिक्षा न मिलने पर उपवास करता हुआ; थोड़ा-थोड़ा खाता हुआ, और पहले घरों से कुछ न मिलने पर भी कभी
श्लोक 14 (1.124.14)
अन्यान्यपि चरँल्लोभादलाभे सप्त पूरयन् । अलाभे यदि वा लाभे समदर्शी महातपाः ॥
anyānyapi caram̐llobhādalābhe sapta pūrayan | alābhe yadi vā lābhe samadarśī mahātapāḥ
"लोभवश दूसरे घरों में न जाता हुआ, कुछ न मिलने पर सात घरों का क्रम पूरा करता हुआ; मिलने या न मिलने में समदृष्टि रखता हुआ, महान तपस्वी बनकर,
श्लोक 15 (1.124.15)
वास्यैकं तक्षतो बाहुं चन्दनेनैकमुक्षतः । नाकल्याणं न कल्याणं चिन्तयन्नुभयोस्तयोः ॥
vāsyaikaṃ takṣato bāhuṃ candanenaikamukṣataḥ | nākalyāṇaṃ na kalyāṇaṃ cintayannubhayostayoḥ
"एक बाँह को बसूले से छीलनेवाले और दूसरी पर चन्दन लगानेवाले — दोनों के लिए न अमंगल सोचता हुआ, न मंगल,
श्लोक 16 (1.124.16)
न जिजीविषुवत्किंचिन्न मुमूर्षुवदाचरन् । जीवितं मरणं चैव नाभिनन्दन्न च द्विषन् ॥
na jijīviṣuvatkiṃcinna mumūrṣuvadācaran | jīvitaṃ maraṇaṃ caiva nābhinandanna ca dviṣan
"न जीने की इच्छावाले के समान आचरण करता हुआ, न मरने की इच्छावाले के समान; न जीवन और मृत्यु का अभिनन्दन करता हुआ, न उनसे द्वेष करता हुआ,
श्लोक 17 (1.124.17)
याः काश्चिज्जीवता शक्याः कर्तुमभ्युदयक्रियाः । ताः सर्वाः समतिक्रम्य निमेषादिव्यवस्थितः ॥
yāḥ kāścijjīvatā śakyāḥ kartumabhyudayakriyāḥ | tāḥ sarvāḥ samatikramya nimeṣādivyavasthitaḥ
"जीवित मनुष्य द्वारा किए जा सकनेवाले अभ्युदय के सब कर्मों को लाँघकर, केवल पलक झपकने जैसे जीवन-निर्वाह के कर्मों में स्थित रहता हुआ,
श्लोक 18 (1.124.18)
तासु चाप्यनवस्थासु त्यक्तसर्वेन्द्रियक्रियः । संपरित्यक्तधर्मार्थः सुनिर्णिक्तात्मकल्मषः ॥
tāsu cāpyanavasthāsu tyaktasarvendriyakriyaḥ | saṃparityaktadharmārthaḥ sunirṇiktātmakalmaṣaḥ
"और उन क्षणिक कर्मों में भी सब इन्द्रियों के व्यापार को त्यागकर; धर्म और अर्थ को पूरी तरह छोड़कर, अपने अन्तःकरण के मल को भली-भाँति धोकर,
श्लोक 19 (1.124.19)
निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यो व्यतीतः सर्ववागुराः । न वशे कस्यचित्तिष्ठन्सधर्मा मातरिश्वनः ॥
nirmuktaḥ sarvapāpebhyo vyatītaḥ sarvavāgurāḥ | na vaśe kasyacittiṣṭhansadharmā mātariśvanaḥ
"सब पापों से मुक्त, सारे जालों से परे, किसी के वश में न रहता हुआ, वायु के समान स्वच्छन्द,
श्लोक 20 (1.124.20)
एतया सततं वृत्त्या चरन्नेवंप्रकारया । देहं संस्थापयिष्यामि निर्भयं मार्गमास्थितः ॥
etayā satataṃ vṛttyā carannevaṃprakārayā | dehaṃ saṃsthāpayiṣyāmi nirbhayaṃ mārgamāsthitaḥ
"सदा इसी प्रकार की वृत्ति से जीता हुआ, निर्भय मार्ग पर स्थित होकर मैं इस देह का अन्त करूँगा।
श्लोक 21 (1.124.21)
नाहं सुकृपणे मार्गे स्ववीर्यक्षयशोचिते । स्वधर्मात्सततापेते चरेयं वीर्यवर्जितः ॥
nāhaṃ sukṛpaṇe mārge svavīryakṣayaśocite | svadharmātsatatāpete careyaṃ vīryavarjitaḥ
"मैं पौरुषहीन होकर उस अत्यन्त दीन मार्ग पर नहीं चलूँगा, जो अपने बल के क्षय पर शोक करने योग्य है और जो सदा अपने धर्म से गिरा हुआ है।
श्लोक 22 (1.124.22)
सत्कृतोऽसत्कृतो वाऽपि योऽन्यां कृपणचक्षुषा । उपैति वृत्तिं कामात्मा स शुनां वर्तते पथि ॥
satkṛto'satkṛto vā'pi yo'nyāṃ kṛpaṇacakṣuṣā | upaiti vṛttiṃ kāmātmā sa śunāṃ vartate pathi
"जो मनुष्य, सम्मानित हो या अपमानित, कामनाओं के वश होकर दीन दृष्टि से दूसरे की दी हुई जीविका का आश्रय लेता है, वह कुत्तों के मार्ग पर चलता है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (1.124.23)
एवमुक्त्वा सुदुःखार्तो निःश्वासपरमो नृपः । अवेक्षमाणः कुन्तीं च माद्रीं च समभाषत ॥
evamuktvā suduḥkhārto niḥśvāsaparamo nṛpaḥ | avekṣamāṇaḥ kuntīṃ ca mādrīṃ ca samabhāṣata
वैशम्पायन ने कहा — ऐसा कहकर अत्यन्त दुःखी, लम्बी साँसें लेते हुए राजा ने कुन्ती और माद्री की ओर देखकर उनसे कहा —
पाण्डुरुवाच
श्लोक 24 (1.124.24)
कौसल्या विदुरः क्षत्ता राजा च सह बन्धुभिः । आर्या सत्यवती भीष्मस्ते च राजपुरोहिताः ॥
kausalyā viduraḥ kṣattā rājā ca saha bandhubhiḥ | āryā satyavatī bhīṣmaste ca rājapurohitāḥ
पाण्डु ने कहा — "कौसल्या, क्षत्ता विदुर, बन्धुओं सहित राजा, आर्या सत्यवती, भीष्म और वे राजपुरोहित,
श्लोक 25 (1.124.25)
ब्राह्मणाश्च महात्मानः सोमपाः संशितव्रताः । पौरवृद्धाश्च ये तत्र निवसन्त्यस्मदाश्रयाः । प्रसाद्य सर्वे वक्तव्याः पाण्डुः प्रव्राजितो वने ॥
brāhmaṇāśca mahātmānaḥ somapāḥ saṃśitavratāḥ | pauravṛddhāśca ye tatra nivasantyasmadāśrayāḥ | prasādya sarve vaktavyāḥ pāṇḍuḥ pravrājito vane
"सोमपान करनेवाले, कठोर व्रतधारी महात्मा ब्राह्मण और वहाँ हमारे आश्रय में रहनेवाले नगर के वृद्धजन — इन सबको प्रसन्न करके कहना कि 'पाण्डु संन्यास लेकर वन में चले गए।'"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (1.124.26)
निशम्य वचनं भर्तुस्त्यागधर्मकृतात्मनः । तत्समं वचनं कुन्ती माद्री च समभाषताम् ॥
niśamya vacanaṃ bhartustyāgadharmakṛtātmanaḥ | tatsamaṃ vacanaṃ kuntī mādrī ca samabhāṣatām
वैशम्पायन ने कहा — त्यागधर्म में मन लगाए अपने पति के ये वचन सुनकर कुन्ती और माद्री ने उन्हें उसी के अनुरूप उत्तर दिया —
कुन्तीमाद्र्यावूचतुः
श्लोक 27 (1.124.27)
अन्येऽपि ह्याश्रमाः सन्ति ये शक्या भरतर्षभ । आवाभ्यां सह वस्तुं वै धर्ममाश्रित्य चिन्त्यताम् । आवाभ्यां धर्मपत्नीभ्यां सह तप्तुं तपो महत् ॥
anye'pi hyāśramāḥ santi ye śakyā bharatarṣabha | āvābhyāṃ saha vastuṃ vai dharmamāśritya cintyatām | āvābhyāṃ dharmapatnībhyāṃ saha taptuṃ tapo mahat
कुन्ती और माद्री ने कहा — "हे भरतश्रेष्ठ, और भी आश्रम हैं जिन्हें आप अपना सकते हैं। धर्म का आश्रय लेकर हमारे साथ रहने का विचार कीजिए, और हम धर्मपत्नियों के साथ महान तप कीजिए,
श्लोक 28 (1.124.28)
शरीरस्यापि मोक्षाय धर्मं प्राप्य महाफलम् । त्वमेव भविता भर्ता स्वर्गस्यापि न संशयः ॥
śarīrasyāpi mokṣāya dharmaṃ prāpya mahāphalam | tvameva bhavitā bhartā svargasyāpi na saṃśayaḥ
"शरीर से मुक्ति के लिए भी, महान फल देनेवाले धर्म को पाकर; आप ही स्वर्ग के भी स्वामी होंगे, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 29 (1.124.29)
प्रणिधायेन्द्रियग्रामं भर्तृलोकपरायणे । त्यक्त्वा कामसुखे ह्यावां तप्स्यावो विपुलं तपः ॥
praṇidhāyendriyagrāmaṃ bhartṛlokaparāyaṇe | tyaktvā kāmasukhe hyāvāṃ tapsyāvo vipulaṃ tapaḥ
"इन्द्रियों के समूह को वश में करके, पतिलोक को ही लक्ष्य मानकर, काम-सुख त्यागकर हम दोनों भी विपुल तप करेंगी।
श्लोक 30 (1.124.30)
यदि चावां महाप्राज्ञ त्यक्ष्यसि त्वं विशांपते । अद्यैवावां प्रहास्यावो जीवितं नात्र संशयः ॥
yadi cāvāṃ mahāprājña tyakṣyasi tvaṃ viśāṃpate | adyaivāvāṃ prahāsyāvo jīvitaṃ nātra saṃśayaḥ
"हे महाप्राज्ञ, हे प्रजानाथ, यदि आप हमें त्याग देंगे, तो हम आज ही प्राण त्याग देंगी, इसमें कोई सन्देह नहीं।"
पाण्डुरुवाच
श्लोक 31 (1.124.31)
यदि व्यवसितं ह्येतद्युवयोर्धर्मसंहितम् । स्ववृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम् ॥
yadi vyavasitaṃ hyetadyuvayordharmasaṃhitam | svavṛttimanuvartiṣye tāmahaṃ pituravyayām
पाण्डु ने कहा — "यदि तुम दोनों का यही धर्मसम्मत निश्चय है, तो मैं अपने पिता की उसी अक्षय वृत्ति का अनुसरण करूँगा।
श्लोक 32 (1.124.32)
त्यक्त्वा ग्राम्यसुखाहारं तप्यमानो महत्तपः । वल्कली फलमूलाशी चरिष्यामि महावने ॥
tyaktvā grāmyasukhāhāraṃ tapyamāno mahattapaḥ | valkalī phalamūlāśī cariṣyāmi mahāvane
"गाँव के सुखों और आहार को त्यागकर, महान तप करता हुआ, वल्कल पहनकर और फल-मूल खाकर मैं महावन में विचरूँगा,
श्लोक 33 (1.124.33)
अग्नौ जुह्वन्नुभौ कालावुभौ कालावुपस्पृशन् । कृशः परिमिताहारश्चीरचर्मजटाधरः ॥
agnau juhvannubhau kālāvubhau kālāvupaspṛśan | kṛśaḥ parimitāhāraścīracarmajaṭādharaḥ
"दोनों समय अग्नि में आहुति देता हुआ और दोनों समय स्नान करता हुआ, दुबला, मिताहारी, चीर, मृगचर्म और जटा धारण किए,
श्लोक 34 (1.124.34)
शीतवातातपसहः क्षुत्पिपासानवेक्षकः । तपसा दुश्चरेणेदं शरीरमुपशोषयन् ॥
śītavātātapasahaḥ kṣutpipāsānavekṣakaḥ | tapasā duścareṇedaṃ śarīramupaśoṣayan
"सर्दी, हवा और धूप सहता हुआ, भूख-प्यास की परवाह न करता हुआ, कठिन तप से इस शरीर को सुखाता हुआ,
श्लोक 35 (1.124.35)
एकान्तशीली विमृशन्पक्वापक्वेन वर्तयन् । पितॄन्देवांश्च वन्येन वाग्भिरद्भिश्च तर्पयन् ॥
ekāntaśīlī vimṛśanpakvāpakvena vartayan | pitṝndevāṃśca vanyena vāgbhiradbhiśca tarpayan
"एकान्त में रहकर चिन्तन करता हुआ, पके-अधपके से निर्वाह करता हुआ, वन के आहार से, वाणी से और जल से पितरों और देवताओं को तृप्त करता हुआ।
श्लोक 36 (1.124.36)
वानप्रस्थजनस्यापि दर्शनं कुलवासिनः । नाप्रियाण्याचरिष्यामि किं पुनर्ग्रामवासिनाम् ॥
vānaprasthajanasyāpi darśanaṃ kulavāsinaḥ | nāpriyāṇyācariṣyāmi kiṃ punargrāmavāsinām
"मैं वानप्रस्थों और गृहस्थों का भी कोई अप्रिय नहीं करूँगा, फिर गाँववालों की तो बात ही क्या।
श्लोक 37 (1.124.37)
एवमारण्यशास्त्राणामुग्रमुग्रतरं विधिम् । काङ्क्षमाणोऽहमास्थास्ये देहस्यास्याऽऽसमापनात् ॥
evamāraṇyaśāstrāṇāmugramugrataraṃ vidhim | kāṅkṣamāṇo'hamāsthāsye dehasyāsyā''samāpanāt
"इस प्रकार वनवासियों के शास्त्रों की उग्र से उग्रतर विधि की आकांक्षा करता हुआ मैं इस शरीर के अन्त तक इसी में स्थित रहूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 38 (1.124.38)
इत्येवमुक्त्वा भार्ये ते राजा कौरवनन्दनः । ततश्चूडामणिं निष्कमङ्गदे कुण्डलानि च ॥
ityevamuktvā bhārye te rājā kauravanandanaḥ | tataścūḍāmaṇiṃ niṣkamaṅgade kuṇḍalāni ca
वैशम्पायन ने कहा — अपनी दोनों पत्नियों से ऐसा कहकर कौरवों को आनन्द देनेवाले राजा ने अपनी चूड़ामणि, कण्ठहार, बाजूबन्द और कुण्डल,
श्लोक 39 (1.124.39)
वासांसि च महार्हाणि स्त्रीणामाभरणानि च । वाहनानि च मुख्यानि शस्त्राणि कवचानि च ॥
vāsāṃsi ca mahārhāṇi strīṇāmābharaṇāni ca | vāhanāni ca mukhyāni śastrāṇi kavacāni ca
बहुमूल्य वस्त्र और स्त्रियों के आभूषण, उत्तम वाहन, शस्त्र और कवच,
श्लोक 40 (1.124.40)
हेमभाण्डानि दिव्यानि पर्यङ्कास्तरणानि च । मणिमुक्ताप्रवालानि रत्नानि विविधानि च ॥
hemabhāṇḍāni divyāni paryaṅkāstaraṇāni ca | maṇimuktāpravālāni ratnāni vividhāni ca
दिव्य स्वर्ण-पात्र, पलंग और बिछौने, मणि, मोती, मूँगे और नाना प्रकार के रत्न —
श्लोक 41 (1.124.41)
प्रदाय सर्वं विप्रेभ्यः पाण्डुर्भृत्यानभाषत । गत्वा नागपुरं वाच्यं पाण्डुः प्रव्राजितो वने । अर्थं कामं सुखं चैव रतिं च परमात्मिकाम् ॥
pradāya sarvaṃ viprebhyaḥ pāṇḍurbhṛtyānabhāṣata | gatvā nāgapuraṃ vācyaṃ pāṇḍuḥ pravrājito vane | arthaṃ kāmaṃ sukhaṃ caiva ratiṃ ca paramātmikām
यह सब ब्राह्मणों को दान करके पाण्डु ने सेवकों से कहा — "हस्तिनापुर जाकर कहना कि 'पाण्डु संन्यास लेकर वन में चले गए।'" फिर अर्थ, काम, सुख और परम रति को त्यागकर,
श्लोक 42 (1.124.42)
प्रतस्थे सर्वमुत्सृज्य सभार्यः कुरुनन्दनः । ततस्तस्यानुयातारस्ते चैव परिचारकाः ॥
pratasthe sarvamutsṛjya sabhāryaḥ kurunandanaḥ | tatastasyānuyātāraste caiva paricārakāḥ
सब कुछ छोड़कर कुरुनन्दन पत्नियों के साथ चल पड़े। तब उनके अनुयायी और सेवक,
श्लोक 43 (1.124.43)
श्रुत्वा भरतसिंहस्य विविधाः करुणा गिरः । भीममार्तस्वरं कृत्वा हाहेति परिचुक्रुशुः ॥
śrutvā bharatasiṃhasya vividhāḥ karuṇā giraḥ | bhīmamārtasvaraṃ kṛtvā hāheti paricukruśuḥ
भरतसिंह के नाना प्रकार के करुण वचन सुनकर, भयानक आर्तनाद करते हुए 'हाय, हाय!' कहकर चिल्लाने लगे।
श्लोक 44 (1.124.44)
उष्णमश्रु विमुञ्चन्तस्तं विहाय महीपतिम् । ययुर्नागपुरं तूर्णं सर्वमादाय तद्धनम् ॥
uṣṇamaśru vimuñcantastaṃ vihāya mahīpatim | yayurnāgapuraṃ tūrṇaṃ sarvamādāya taddhanam
गरम आँसू बहाते हुए वे राजा को छोड़कर वह सारा धन लेकर शीघ्र हस्तिनापुर चले गए।
श्लोक 45 (1.124.45)
ते गत्वा नगरं राज्ञो यथावृत्तं महात्मनः । कथयांचक्रिरे राज्ञस्तद्धनं विविधं ददुः ॥
te gatvā nagaraṃ rājño yathāvṛttaṃ mahātmanaḥ | kathayāṃcakrire rājñastaddhanaṃ vividhaṃ daduḥ
नगर में पहुँचकर उन्होंने राजा को महात्मा पाण्डु का सारा वृत्तान्त सुनाया और वह नाना प्रकार का धन सौंप दिया।
श्लोक 46 (1.124.46)
श्रुत्वा तेभ्यस्ततः सर्वं यथावृत्तं महावने । धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठः पाण्डुमेवान्वशोचत ॥
śrutvā tebhyastataḥ sarvaṃ yathāvṛttaṃ mahāvane | dhṛtarāṣṭro naraśreṣṭhaḥ pāṇḍumevānvaśocata
उनसे महावन का सारा वृत्तान्त सुनकर नरश्रेष्ठ धृतराष्ट्र पाण्डु के लिए शोक करने लगे।
श्लोक 47 (1.124.47)
न शय्यासनभोगेषु रतिं विन्दति कर्हिचित् । भ्रातृशोकसमाविष्टस्तमेवार्थं विचिन्तयन् ॥
na śayyāsanabhogeṣu ratiṃ vindati karhicit | bhrātṛśokasamāviṣṭastamevārthaṃ vicintayan
भाई के शोक में डूबे और उसी बात को सोचते हुए उन्हें शय्या, आसन और भोगों में कभी कोई रुचि नहीं होती थी।
श्लोक 48 (1.124.48)
राजपुत्रस्तु कौरव्य पाण्डुर्मूलफलाशनः । जगाम सह पत्नीभ्यां ततो नागशतं गिरिम् ॥
rājaputrastu kauravya pāṇḍurmūlaphalāśanaḥ | jagāma saha patnībhyāṃ tato nāgaśataṃ girim
इधर कुरुवंशी राजकुमार पाण्डु कन्द-मूल-फल खाते हुए अपनी पत्नियों के साथ नागशत पर्वत पर गए।
श्लोक 49 (1.124.49)
स चैत्ररथमासाद्य कालकूटमतीत्य च । हिमवन्तमतिक्रम्य प्रययौ गन्धमादनम् ॥
sa caitrarathamāsādya kālakūṭamatītya ca | himavantamatikramya prayayau gandhamādanam
चैत्ररथ पहुँचकर और कालकूट को पार करके, हिमालय को लाँघकर वे गन्धमादन पर्वत पर गए।
श्लोक 50 (1.124.50)
रक्ष्यमाणो महाभूतैः सिद्धैश्च परमर्षिभिः । उवास स महाराज समेषु विषमेषु च ॥
rakṣyamāṇo mahābhūtaiḥ siddhaiśca paramarṣibhiḥ | uvāsa sa mahārāja sameṣu viṣameṣu ca
हे महाराज, महाभूतों, सिद्धों और महर्षियों द्वारा रक्षित होकर वे वहाँ सम और विषम भूमि पर रहने लगे।
श्लोक 51 (1.124.51)
इन्द्रद्युम्नसरः प्राप्य हंसकूटमतीत्य च । शतशृङ्गे महाराज तापसः समतप्यत ॥
indradyumnasaraḥ prāpya haṃsakūṭamatītya ca | śataśṛṅge mahārāja tāpasaḥ samatapyata
हे महाराज, इन्द्रद्युम्न सरोवर पहुँचकर और हंसकूट को पार करके वे शतशृङ्ग पर्वत पर तपस्वी बनकर तप करने लगे।