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आदि पर्व · अध्याय 125

तपस्वियों द्वारा पाण्डु को लौटाना

शतशृङ्ग पर तप करते हुए पाण्डु सिद्धों, चारणों और ऋषियों के प्रिय बन जाते हैं और ब्रह्मर्षि के समान हो जाते हैं। जब ऋषि अमावस्या को ब्रह्मा के दर्शन के लिए निकलते हैं, तो पाण्डु भी पत्नियों के साथ उनके पीछे उत्तर की ओर चल पड़ते हैं, पर तपस्वी उन्हें चेताते हैं कि वे दुर्गम ऊँचाइयाँ दोनों राजकुमारियों के लिए पार करने योग्य नहीं हैं। पाण्डु बताते हैं कि वे सन्तानहीन होने से दुःखी हैं, क्योंकि सन्तानहीन के लिए स्वर्ग का द्वार नहीं खुलता; तपस्वी दिव्य दृष्टि से उन्हें आश्वस्त करते हैं कि उन्हें गुणवान सन्तान मिलेगी और उसके लिए प्रयत्न करने को कहते हैं, तब पाण्डु यह जानकर चिन्ता में पड़ जाते हैं कि मृग के शाप ने उनकी सन्तानोत्पत्ति की शक्ति नष्ट कर दी है।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.125.1)

तत्रापि तपसि श्रेष्ठे वर्तमानः स वीर्यवान् । सिद्धचारणसङ्घानां बभूव प्रियदर्शनः ॥

tatrāpi tapasi śreṣṭhe vartamānaḥ sa vīryavān | siddhacāraṇasaṅghānāṃ babhūva priyadarśanaḥ

वैशम्पायन ने कहा — वहाँ भी श्रेष्ठ तप में लगे पराक्रमी पाण्डु सिद्धों और चारणों के समूहों के प्रिय बन गए।

श्लोक 2 (1.125.2)

शुश्रूषुरनहंवादी संयतात्मा जितेन्द्रियः । स्वर्गं गन्तुं पराक्रान्तः स्वेन वीर्येण भारत ॥

śuśrūṣuranahaṃvādī saṃyatātmā jitendriyaḥ | svargaṃ gantuṃ parākrāntaḥ svena vīryeṇa bhārata

हे भारत, सेवा-भाव से युक्त, अहंकाररहित, संयमी और जितेन्द्रिय पाण्डु अपने ही बल से स्वर्ग पाने का प्रयत्न करने लगे।

श्लोक 3 (1.125.3)

केषांचिदभवद्भ्राता केषांचिदभवत्सखा । ऋषयस्त्वपरे चैनं पुत्रवत्पर्यपालयन् ॥

keṣāṃcidabhavadbhrātā keṣāṃcidabhavatsakhā | ṛṣayastvapare cainaṃ putravatparyapālayan

वे किसी के भाई बन गए, किसी के मित्र, और दूसरे ऋषि उनका पुत्र के समान पालन करने लगे।

श्लोक 4 (1.125.4)

स तु कालेन महता प्राप्य निष्कल्मषं तपः । ब्रह्मर्षिसदृशः पाण्डुर्बभूव भरतर्षभ ॥

sa tu kālena mahatā prāpya niṣkalmaṣaṃ tapaḥ | brahmarṣisadṛśaḥ pāṇḍurbabhūva bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, बहुत समय बीतने पर निष्कलंक तप प्राप्त करके पाण्डु ब्रह्मर्षि के समान हो गए।

श्लोक 5 (1.125.5)

अमावास्यां तु सहिता ऋषयः संशितव्रताः । ब्रह्माणं द्रष्टुकामास्ते संप्रतस्थुर्महर्षयः ॥

amāvāsyāṃ tu sahitā ṛṣayaḥ saṃśitavratāḥ | brahmāṇaṃ draṣṭukāmāste saṃpratasthurmaharṣayaḥ

अमावस्या के दिन कठोर व्रतधारी ऋषि एकत्र हुए और वे महर्षि ब्रह्मा के दर्शन की इच्छा से चल पड़े।

श्लोक 6 (1.125.6)

संप्रयातानृषीन्दृष्ट्वा पाण्डुर्वचनमब्रवीत् । भवन्तः क्व गमिष्यन्ति ब्रूत मे वदतां वराः ॥

saṃprayātānṛṣīndṛṣṭvā pāṇḍurvacanamabravīt | bhavantaḥ kva gamiṣyanti brūta me vadatāṃ varāḥ

ऋषियों को जाते देखकर पाण्डु ने कहा — "आप लोग कहाँ जा रहे हैं? हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, मुझे बताइए।"

ऋषय ऊचुः

श्लोक 7 (1.125.7)

समवायो महानद्य ब्रह्मलोके महात्मनाम् । देवानां च ऋषीणां च पितॄणां च महात्मनाम् । वयं तत्र गमिष्यामो द्रष्टुकामाः स्वयंभुवम् ॥

samavāyo mahānadya brahmaloke mahātmanām | devānāṃ ca ṛṣīṇāṃ ca pitṝṇāṃ ca mahātmanām | vayaṃ tatra gamiṣyāmo draṣṭukāmāḥ svayaṃbhuvam

ऋषियों ने कहा — "आज ब्रह्मलोक में महात्माओं का — देवताओं, ऋषियों और महात्मा पितरों का — एक बड़ा समागम है। हम स्वयम्भू ब्रह्मा के दर्शन की इच्छा से वहीं जा रहे हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (1.125.8)

पाण्डुरुत्थाय सहसा गन्तुकामो महर्षिभिः । स्वर्गपारं तितीर्षुः स शतशृङ्गादुदङ्मुखः ॥

pāṇḍurutthāya sahasā gantukāmo maharṣibhiḥ | svargapāraṃ titīrṣuḥ sa śataśṛṅgādudaṅmukhaḥ

वैशम्पायन ने कहा — पाण्डु महर्षियों के साथ जाने की इच्छा से तुरन्त उठ खड़े हुए। स्वर्ग के उस पार पहुँचने की इच्छा से वे शतशृङ्ग से उत्तर की ओर

श्लोक 9 (1.125.9)

प्रतस्थे सह पत्नीभ्यामब्रुवंस्तं च तापसाः । उपर्युपरि गच्छन्तः शैलराजमुदङ्मुखाः ॥

pratasthe saha patnībhyāmabruvaṃstaṃ ca tāpasāḥ | uparyupari gacchantaḥ śailarājamudaṅmukhāḥ

अपनी पत्नियों के साथ चल पड़े; तब उत्तर की ओर मुख करके पर्वतराज पर ऊपर-ही-ऊपर चढ़ते हुए तपस्वियों ने उनसे कहा —

ऋषय ऊचुः

श्लोक 10 (1.125.10)

दृष्टवन्तो गिरौ रम्ये दुर्गान्देशान्बहून्वयम् । विमानशतसंबाधां गीतस्वरनिनादिताम् । आक्रीडभूमिं देवानां गन्धर्वाप्सरसां तथा ॥

dṛṣṭavanto girau ramye durgāndeśānbahūnvayam | vimānaśatasaṃbādhāṃ gītasvaranināditām | ākrīḍabhūmiṃ devānāṃ gandharvāpsarasāṃ tathā

ऋषियों ने कहा — "इस रमणीय पर्वत पर हमने बहुत-से दुर्गम प्रदेश देखे हैं — देवताओं, गन्धर्वों और अप्सराओं की क्रीडाभूमि, जो सैकड़ों विमानों से भरी और गीतों के स्वर से गूँजती रहती है;

श्लोक 11 (1.125.11)

उद्यानानि कुबेरस्य समानि विषमाणि च । महानदीनितम्बांश्च गहनान्गिरिगह्वरान् ॥

udyānāni kuberasya samāni viṣamāṇi ca | mahānadīnitambāṃśca gahanāngirigahvarān

"कुबेर के सम और विषम भूमि वाले उद्यान, महानदियों के तट और गहरी पर्वत-कन्दराएँ।

श्लोक 12 (1.125.12)

सन्ति नित्यहिमा देशा निर्वृक्षमृगपक्षिणः । सन्ति क्वचिन्महादर्यो दुर्गाः काश्चिद्दुरासदाः ॥

santi nityahimā deśā nirvṛkṣamṛgapakṣiṇaḥ | santi kvacinmahādaryo durgāḥ kāściddurāsadāḥ

"वहाँ सदा हिम से ढके ऐसे प्रदेश हैं जहाँ न वृक्ष हैं, न पशु, न पक्षी; कहीं बड़ी-बड़ी घाटियाँ हैं, कुछ दुर्गम और कुछ जिनके पास पहुँचना ही कठिन है,

श्लोक 13 (1.125.13)

नातिक्रामेत पक्षी यान्कुत एवेतरे मृगाः । वायुरेको हि यात्यत्र सिद्धाश्च परमर्षयः ॥

nātikrāmeta pakṣī yānkuta evetare mṛgāḥ | vāyureko hi yātyatra siddhāśca paramarṣayaḥ

"जिन्हें पक्षी भी पार नहीं कर सकते, फिर दूसरे पशुओं की तो बात ही क्या। वहाँ केवल वायु जाता है, और सिद्ध तथा परमर्षि।

श्लोक 14 (1.125.14)

गच्छन्त्यौ शैलराजेऽस्मिन्राजपुत्र्यौ कथं न्विमे । न सीदेतामदुःखार्हे मा गमो भरतर्षभ ॥

gacchantyau śailarāje'sminrājaputryau kathaṃ nvime | na sīdetāmaduḥkhārhe mā gamo bharatarṣabha

"दुःख सहने के योग्य न होनेवाली ये दोनों राजकुमारियाँ इस पर्वतराज पर चलती हुई कैसे कष्ट न पाएँगी? हे भरतश्रेष्ठ, आप मत जाइए।"

पाण्डुरुवाच

श्लोक 15 (1.125.15)

अप्रजस्य महाभागा न द्वारं परिचक्षते । स्वर्गे तेनाभितप्तोऽहमप्रजस्तु ब्रवीमि वः ॥

aprajasya mahābhāgā na dvāraṃ paricakṣate | svarge tenābhitapto'hamaprajastu bravīmi vaḥ

पाण्डु ने कहा — "हे महाभाग ऋषियो, कहा जाता है कि सन्तानहीन के लिए स्वर्ग का द्वार नहीं खुलता। मैं सन्तानहीन हूँ, इसी से सन्तप्त हूँ, इसलिए आपसे यह कहता हूँ।

श्लोक 16 (1.125.16)

सोऽहमुग्रेण तपसा सभार्यस्त्यक्तजीवितः । अनपत्योऽपि विन्देयं स्वर्गमुग्रेण कर्मणा ॥

so'hamugreṇa tapasā sabhāryastyaktajīvitaḥ | anapatyo'pi vindeyaṃ svargamugreṇa karmaṇā

"इसलिए मैं पत्नियों सहित, उग्र तप में जीवन की परवाह छोड़कर, सन्तानहीन होते हुए भी कठोर कर्म से स्वर्ग पाना चाहता हूँ।"

ऋषय ऊचुः

श्लोक 17 (1.125.17)

अस्ति वै तव धर्मात्मन्विद्म देवोपम शुभम् । अपत्यमनघं राजन्वयं दिव्येन चक्षुषा ॥

asti vai tava dharmātmanvidma devopama śubham | apatyamanaghaṃ rājanvayaṃ divyena cakṣuṣā

ऋषियों ने कहा — "हे धर्मात्मा, हे देवतुल्य राजन्, हम दिव्य दृष्टि से जानते हैं कि आपके लिए शुभ और निष्पाप सन्तान निश्चित है।

श्लोक 18 (1.125.18)

दैवोद्दिष्टं नरव्याघ्र कर्मणेहोपपादय । अक्लिष्टं फलमव्यग्रो विन्दते बुद्धिमान्नरः ॥

daivoddiṣṭaṃ naravyāghra karmaṇehopapādaya | akliṣṭaṃ phalamavyagro vindate buddhimānnaraḥ

"हे नरव्याघ्र, भाग्य ने जो निर्धारित किया है, उसे यहाँ अपने कर्म से सिद्ध कीजिए। शान्त रहनेवाला बुद्धिमान मनुष्य बिना क्लेश के फल पाता है।

श्लोक 19 (1.125.19)

तस्मिन्दृष्टे फले राजन्प्रयत्नं कर्तुमर्हसि । अपत्यं गुणसंपन्नं लब्धा प्रीतिकरं ह्यसि ॥

tasmindṛṣṭe phale rājanprayatnaṃ kartumarhasi | apatyaṃ guṇasaṃpannaṃ labdhā prītikaraṃ hyasi

"हे राजन्, जब यह फल दिखाई दे चुका है, तो आपको प्रयत्न करना चाहिए; क्योंकि आप गुणों से सम्पन्न और आनन्द देनेवाली सन्तान अवश्य पाएँगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 20 (1.125.20)

तच्छ्रुत्वा तापसवचः पाण्डुश्चिन्तापरोऽभवत् । आत्मनो मृगशापेन जानन्नुपहतां क्रियाम् ॥

tacchrutvā tāpasavacaḥ pāṇḍuścintāparo'bhavat | ātmano mṛgaśāpena jānannupahatāṃ kriyām

वैशम्पायन ने कहा — तपस्वियों के वचन सुनकर पाण्डु चिन्ता में डूब गए, क्योंकि वे जानते थे कि मृग के शाप से उनकी सन्तानोत्पत्ति की क्रिया नष्ट हो चुकी है।

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