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आदि पर्व · अध्याय 126

विदुर का विवाह और पाण्डु की पुत्र-कामना

भीष्म राजा देवक की शूद्रा पत्नी से उत्पन्न कन्या के साथ विदुर का विवाह कराते हैं, और विदुर उससे पुत्र उत्पन्न करते हैं। वैशम्पायन धृतराष्ट्र के एक सौ एक पुत्रों और देवताओं से उत्पन्न पाण्डु के पाँच पुत्रों का उल्लेख करते हैं, और जनमेजय उनके जन्म की कथा विस्तार से सुनना चाहते हैं। गान्धारी व्यास को प्रसन्न करके सौ पुत्रों का वर पाती है और गर्भ धारण करती है; उधर मृग के शाप से दुःखी पाण्डु सोचते हैं कि पितृ-ऋण सन्तान से ही चुकता है। वे कुन्ती से किसी योग्य ब्राह्मण से पुत्र उत्पन्न करने का आग्रह करते हैं, बारह प्रकार के पुत्र गिनाते हैं और शारदण्डायन की पत्नी का उदाहरण देते हैं, जिसने पति की आज्ञा से एक ब्राह्मण से तीन पुत्र उत्पन्न किए।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.126.1)

अथ पारशवीं कन्यां देवकस्य महीपतेः । रूपयौवनसंपन्नां स शुश्रावापगासुतः ॥

atha pāraśavīṃ kanyāṃ devakasya mahīpateḥ | rūpayauvanasaṃpannāṃ sa śuśrāvāpagāsutaḥ

तब गंगापुत्र भीष्म ने राजा देवक की एक कन्या के विषय में सुना, जो शूद्रा माता से उत्पन्न थी और रूप तथा यौवन से सम्पन्न थी।

श्लोक 2 (1.126.2)

ततस्तु वरयित्वा तामानीय भरतर्षभः । विवाहं कारयामास विदुरस्य महामतेः ॥

tatastu varayitvā tāmānīya bharatarṣabhaḥ | vivāhaṃ kārayāmāsa vidurasya mahāmateḥ

भरतश्रेष्ठ भीष्म ने उसका वरण किया, उसे ले आए और महाबुद्धिमान विदुर का उसके साथ विवाह करा दिया।

श्लोक 3 (1.126.3)

तस्यां चोत्पादयामास विदुरः कुरुनन्दन । पुत्रान्विनयसंपन्नानात्मनः सदृशान्गुणैः ॥

tasyāṃ cotpādayāmāsa viduraḥ kurunandana | putrānvinayasaṃpannānātmanaḥ sadṛśānguṇaiḥ

हे कुरुनन्दन! विदुर ने उससे विनय से सम्पन्न और गुणों में अपने ही समान पुत्र उत्पन्न किए।

श्लोक 4 (1.126.4)

ततः पुत्रशतं जज्ञे गान्धार्या जनमेजय । धृतराष्ट्रस्य वैश्यायामेकश्चापि शतात्परः ॥

tataḥ putraśataṃ jajñe gāndhāryā janamejaya | dhṛtarāṣṭrasya vaiśyāyāmekaścāpi śatātparaḥ

हे जनमेजय! फिर गान्धारी से धृतराष्ट्र के सौ पुत्र उत्पन्न हुए, और एक वैश्य स्त्री से उन सौ के अतिरिक्त एक और पुत्र हुआ।

श्लोक 5 (1.126.5)

पाण्डोः कुन्त्यां च माद्र्यां च पुत्राः पञ्च महारथाः । देवेभ्यः समपद्यन्त सन्तानाय कुलस्य वै ॥

pāṇḍoḥ kuntyāṃ ca mādryāṃ ca putrāḥ pañca mahārathāḥ | devebhyaḥ samapadyanta santānāya kulasya vai

पाण्डु के कुन्ती और माद्री से, देवताओं के द्वारा, कुल की परम्परा चलाने के लिए पाँच महारथी पुत्र उत्पन्न हुए।

जनमेजय उवाच

श्लोक 6 (1.126.6)

कथं पुत्रशतं जज्ञे गान्धार्यां द्विजसत्तम । कियता चैव कालेन तेषामायुश्च किं परम् ॥

kathaṃ putraśataṃ jajñe gāndhāryāṃ dvijasattama | kiyatā caiva kālena teṣāmāyuśca kiṃ param

जनमेजय ने कहा — "हे द्विजश्रेष्ठ! गान्धारी से सौ पुत्र कैसे उत्पन्न हुए? कितने समय में, और उनकी पूरी आयु कितनी थी?

श्लोक 7 (1.126.7)

कथं चैकः स वैश्यायां धृतराष्ट्रसुतोऽभवत् । कथं च सदृशीं भार्यां गान्धारीं धर्मचारिणीम् ॥

kathaṃ caikaḥ sa vaiśyāyāṃ dhṛtarāṣṭrasuto'bhavat | kathaṃ ca sadṛśīṃ bhāryāṃ gāndhārīṃ dharmacāriṇīm

"वैश्य स्त्री से धृतराष्ट्र का वह एक पुत्र कैसे हुआ? और धृतराष्ट्र ने अपने योग्य, धर्म का आचरण करनेवाली पत्नी गान्धारी का अतिक्रमण कैसे किया,

श्लोक 8 (1.126.8)

आनुकूल्ये वर्तमानां धृतराष्ट्रोऽत्यवर्तत । कथं च शप्तस्य सतः पाण्डोस्तेन महात्मना ॥

ānukūlye vartamānāṃ dhṛtarāṣṭro'tyavartata | kathaṃ ca śaptasya sataḥ pāṇḍostena mahātmanā

"जो सदा उसके अनुकूल चलती थी? और उन महात्मा के द्वारा शापित होने पर भी पाण्डु के

श्लोक 9 (1.126.9)

समुत्पन्ना दैवतेभ्यः पुत्राः पञ्च महारथाः । एतद्विद्वन्यथान्यायं विस्तरेण तपोधन ॥

samutpannā daivatebhyaḥ putrāḥ pañca mahārathāḥ | etadvidvanyathānyāyaṃ vistareṇa tapodhana

"देवताओं से पाँच महारथी पुत्र कैसे उत्पन्न हुए? हे विद्वन्, हे तपोधन! यह सब यथोचित रूप से विस्तारपूर्वक

श्लोक 10 (1.126.10)

कथयस्व न मे तृप्तिः कथ्यमानेषु बन्धुषु । ऋषिं बुभुक्षितं श्रान्तं द्वैपायनमुपस्थितम् ॥

kathayasva na me tṛptiḥ kathyamāneṣu bandhuṣu | ṛṣiṃ bubhukṣitaṃ śrāntaṃ dvaipāyanamupasthitam

"कहिए, क्योंकि अपने बन्धुओं की कथा सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती।" वैशम्पायन ने कहा — जब भूखे और थके हुए महर्षि द्वैपायन (गान्धारी के यहाँ) पधारे,

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 11 (1.126.11)

तोषयामास गान्धारी व्यासस्तस्यै वरं ददौ । सा वव्रे सदृशं भर्तुः पुत्राणां शतमात्मनः ॥

toṣayāmāsa gāndhārī vyāsastasyai varaṃ dadau | sā vavre sadṛśaṃ bhartuḥ putrāṇāṃ śatamātmanaḥ

गान्धारी ने उन्हें सन्तुष्ट किया और व्यास ने उसे वर दिया। उसने अपने लिए पति के समान सौ पुत्रों का वर माँगा।

श्लोक 12 (1.126.12)

ततः कालेन सा गर्भमगृह्णाज्ज्ञानचक्षुषः ॥

tataḥ kālena sā garbhamagṛhṇājjñānacakṣuṣaḥ

समय आने पर उसने ज्ञान ही जिनका नेत्र था, उन धृतराष्ट्र से गर्भ धारण किया।

श्लोक 13 (1.126.13)

गान्धार्यामाहिते गर्भे पाण्डुरम्बालिकासुतः । अगच्छत्परमं दुःखमपत्यार्थमरिन्दम ॥

gāndhāryāmāhite garbhe pāṇḍurambālikāsutaḥ | agacchatparamaṃ duḥkhamapatyārthamarindama

हे शत्रुदमन! गान्धारी के गर्भ धारण कर लेने पर अम्बालिका के पुत्र पाण्डु सन्तान के लिए अत्यन्त दुःखी हो गए।

श्लोक 14 (1.126.14)

गर्भिण्यामथ गान्धार्यां पाण्डुः परमदुःखितः । मृगाभिशापादात्मानं शोचन्नुपरतक्रियः ॥

garbhiṇyāmatha gāndhāryāṃ pāṇḍuḥ paramaduḥkhitaḥ | mṛgābhiśāpādātmānaṃ śocannuparatakriyaḥ

गान्धारी के गर्भवती होने पर पाण्डु अत्यन्त दुःखी हुए; मृग के शाप के कारण अपने लिए शोक करते हुए उन्होंने सब कर्म त्याग दिए।

श्लोक 15 (1.126.15)

स गत्वा तपसा सिद्धिं विश्वामित्रो यथा भुवि । देहन्यासे कृतमना इदं वचनमब्रवीत् ॥

sa gatvā tapasā siddhiṃ viśvāmitro yathā bhuvi | dehanyāse kṛtamanā idaṃ vacanamabravīt

पृथ्वी पर विश्वामित्र की भाँति तपस्या से सिद्धि प्राप्त करके और देह-त्याग का निश्चय करके उन्होंने यह वचन कहा —

पाण्डुरुवाच

श्लोक 16 (1.126.16)

चतुर्भिर्ऋणवानित्थं जायते मनुजो भुवि । पितृदेवमनुष्याणामृषीणामथ भामिनि ॥

caturbhirṛṇavānitthaṃ jāyate manujo bhuvi | pitṛdevamanuṣyāṇāmṛṣīṇāmatha bhāmini

पाण्डु ने कहा — "हे भामिनि! मनुष्य पृथ्वी पर इस प्रकार चार ऋणों से बँधकर जन्म लेता है — पितरों का, देवताओं का, मनुष्यों का और ऋषियों का।

श्लोक 17 (1.126.17)

एतेभ्यस्तु यथाकालं यो न मुच्येत धर्मवित् । न तस्य लोकाः सन्तीति तथा लोकविदो विदुः ॥

etebhyastu yathākālaṃ yo na mucyeta dharmavit | na tasya lokāḥ santīti tathā lokavido viduḥ

"जो धर्म को जानते हुए भी समय रहते इन ऋणों से मुक्त नहीं होता, उसके लिए (पुण्य) लोक नहीं हैं — ऐसा लोक के ज्ञाता बताते हैं।

श्लोक 18 (1.126.18)

यज्ञेन देवान्प्रीणाति स्वाध्यायात्तपसा ऋषीन् । पुत्रैः श्राद्धैरपि पितॄनानृशंस्येन मानवान् ॥

yajñena devānprīṇāti svādhyāyāttapasā ṛṣīn | putraiḥ śrāddhairapi pitṝnānṛśaṃsyena mānavān

"यज्ञ से मनुष्य देवताओं को प्रसन्न करता है, स्वाध्याय और तप से ऋषियों को, पुत्रों और श्राद्धों से पितरों को, और दयालुता से मनुष्यों को।

श्लोक 19 (1.126.19)

ऋषिदेवमनुष्याणामृणान्मुक्तोऽस्मि धर्मतः । पितॄणां तु न मुक्तोऽस्मि तच्च तेभ्यो विशिष्यते ॥

ṛṣidevamanuṣyāṇāmṛṇānmukto'smi dharmataḥ | pitṝṇāṃ tu na mukto'smi tacca tebhyo viśiṣyate

"धर्म के अनुसार मैं ऋषियों, देवताओं और मनुष्यों के ऋण से मुक्त हूँ; परन्तु पितरों के ऋण से मुक्त नहीं हूँ, और वही इन सबसे बढ़कर है।

श्लोक 20 (1.126.20)

देहनाशे भवेन्नाशः पितॄणामेष निश्चयः । इतरेषां त्रयाणां तु नाशे ह्यात्मा विनश्यति ॥

dehanāśe bhavennāśaḥ pitṝṇāmeṣa niścayaḥ | itareṣāṃ trayāṇāṃ tu nāśe hyātmā vinaśyati

"देह के नष्ट होने पर पितरों का भी नाश हो जाता है — यह निश्चित है; किन्तु अन्य तीन ऋण न चुकाने पर तो अपना ही नाश होता है।

श्लोक 21 (1.126.21)

इह तस्मात्प्रजालाभे प्रयतन्ते द्विजोत्तमाः । यथैवाहं पितुः क्षेत्रे सृष्टस्तेन महात्मना ॥

iha tasmātprajālābhe prayatante dvijottamāḥ | yathaivāhaṃ pituḥ kṣetre sṛṣṭastena mahātmanā

"इसीलिए श्रेष्ठ द्विज यहाँ सन्तान पाने का प्रयत्न करते हैं। जैसे मैं अपने पिता के क्षेत्र में उन महात्मा के द्वारा उत्पन्न किया गया,

श्लोक 22 (1.126.22)

तथैवास्मिन्मम क्षेत्रे कथं सृज्येत वै प्रजा । स समानीय कुन्तीं च माद्रीं च भरतर्षभः ॥

tathaivāsminmama kṣetre kathaṃ sṛjyeta vai prajā | sa samānīya kuntīṃ ca mādrīṃ ca bharatarṣabhaḥ

"वैसे ही मेरे इस क्षेत्र में सन्तान कैसे उत्पन्न हो?" वैशम्पायन ने कहा — तब भरतश्रेष्ठ पाण्डु ने कुन्ती और माद्री को साथ बुलाकर

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (1.126.23)

आचष्ट पुत्रलाभस्य व्युष्टिं सर्वक्रियाधिकाम् । उत्तमादवराः पुंसः काङ्क्षन्ते पुत्रमापदि ॥

ācaṣṭa putralābhasya vyuṣṭiṃ sarvakriyādhikām | uttamādavarāḥ puṃsaḥ kāṅkṣante putramāpadi

उन्हें पुत्र-प्राप्ति का वह फल बताया जो सब कर्मों से बढ़कर है — कि आपत्ति के समय हीन पुरुष किसी उत्तम पुरुष से पुत्र की कामना करते हैं;

श्लोक 24 (1.126.24)

अपत्यं धर्मफलदं श्रेष्ठादिच्छन्ति साधवः । अनुनीय तु ते सम्यङ्महाब्राह्मणसंसदि । ब्राह्मणं गुणवन्तं हि चिन्तयामास धर्मवित् ॥

apatyaṃ dharmaphaladaṃ śreṣṭhādicchanti sādhavaḥ | anunīya tu te samyaṅmahābrāhmaṇasaṃsadi | brāhmaṇaṃ guṇavantaṃ hi cintayāmāsa dharmavit

सज्जन धर्म का फल देनेवाली सन्तान किसी श्रेष्ठ पुरुष से चाहते हैं। उन दोनों को भली-भाँति समझा-मनाकर उस धर्मज्ञ ने महान ब्राह्मणों की सभा में से किसी गुणवान ब्राह्मण का विचार किया।

श्लोक 25 (1.126.25)

सोऽब्रवीद्विजने कुन्तीं धर्मपत्नीं यशस्विनीम् । अपत्योत्पादने यत्नमापदि त्वं समर्थय ॥

so'bravīdvijane kuntīṃ dharmapatnīṃ yaśasvinīm | apatyotpādane yatnamāpadi tvaṃ samarthaya

उन्होंने एकान्त में अपनी यशस्विनी धर्मपत्नी कुन्ती से कहा — "इस आपत्ति के समय तुम सन्तान उत्पन्न करने का प्रयत्न करो।

पाण्डुरुवाच

श्लोक 26 (1.126.26)

अपत्यं नाम लोकेषु प्रतिष्ठा धर्मसंहिता । इति कुन्ति विदुर्धीराः शाश्वतं धर्मवादिनः ॥

apatyaṃ nāma lokeṣu pratiṣṭhā dharmasaṃhitā | iti kunti vidurdhīrāḥ śāśvataṃ dharmavādinaḥ

"हे कुन्ती! संसार में सन्तान ही धर्म से युक्त प्रतिष्ठा है — ऐसा धर्म का प्रतिपादन करनेवाले धीर पुरुष सदा से जानते आए हैं।

श्लोक 27 (1.126.27)

इष्टं दत्तं तपस्तप्तं नियमश्च स्वनुष्ठितः । सर्वमेवानपत्यस्य न पावनमिहोच्यते ॥

iṣṭaṃ dattaṃ tapastaptaṃ niyamaśca svanuṣṭhitaḥ | sarvamevānapatyasya na pāvanamihocyate

"किया हुआ यज्ञ, दिया हुआ दान, तपा हुआ तप और भली-भाँति पाला हुआ नियम — सन्तानहीन के लिए इनमें से कुछ भी यहाँ पवित्र करनेवाला नहीं कहा गया।

श्लोक 28 (1.126.28)

सोऽहमेवं विदित्वैतत्प्रपश्यामि शुचिस्मिते । अनपत्यः शुभाँल्लोकान्नप्राप्स्यामीति चिन्तयन् ॥

so'hamevaṃ viditvaitatprapaśyāmi śucismite | anapatyaḥ śubhām̐llokānnaprāpsyāmīti cintayan

"हे शुचिस्मिते! यह जानकर मैं स्पष्ट देखता हूँ और यही सोचता रहता हूँ कि सन्तानहीन होने के कारण मैं शुभ लोकों को नहीं पाऊँगा।

श्लोक 29 (1.126.29)

अनपत्यो हि मरणं कामये नैव जीवितम् । मृगाभिशापं जानासि विजने मम केवलम् । नृशंसकर्मणा कृत्स्नं यथा ह्युपहतं तथा ॥

anapatyo hi maraṇaṃ kāmaye naiva jīvitam | mṛgābhiśāpaṃ jānāsi vijane mama kevalam | nṛśaṃsakarmaṇā kṛtsnaṃ yathā hyupahataṃ tathā

"सन्तानहीन होकर मैं मृत्यु चाहता हूँ, जीवन नहीं। निर्जन वन में केवल मुझे मिले मृग के शाप को तुम जानती हो, और यह भी कि एक क्रूर कर्म के कारण किस प्रकार सब कुछ नष्ट हो गया है।

श्लोक 30 (1.126.30)

इमे वै बन्धुदायादाः षट् पुत्रा धर्मदर्शने । षडेवाबन्धुदायादाः पुत्रास्ताञ्छृणु मे पृथे ॥

ime vai bandhudāyādāḥ ṣaṭ putrā dharmadarśane | ṣaḍevābandhudāyādāḥ putrāstāñchṛṇu me pṛthe

"धर्मशास्त्र में छः प्रकार के पुत्र बन्धु और उत्तराधिकारी कहे गए हैं, और छः प्रकार के पुत्र न बन्धु हैं, न उत्तराधिकारी। हे पृथा! उन्हें मुझसे सुनो।

श्लोक 31 (1.126.31)

स्वयंजातः प्रणीतश्च परिक्रीतश्च यः सुतः । पौनर्भवश्च कानीनः स्वैरिण्यां यश्च जायते ॥

svayaṃjātaḥ praṇītaśca parikrītaśca yaḥ sutaḥ | paunarbhavaśca kānīnaḥ svairiṇyāṃ yaśca jāyate

"स्वयं उत्पन्न किया हुआ पुत्र; किसी योग्य पुरुष द्वारा अपनी पत्नी से उत्पन्न कराया गया पुत्र; शुल्क देकर नियुक्त पुरुष से उत्पन्न पुत्र; पुनर्विवाहिता स्त्री का पुत्र; कुमारी अवस्था में उत्पन्न (कानीन) पुत्र; और स्वैरिणी स्त्री से उत्पन्न पुत्र;

श्लोक 32 (1.126.32)

दत्तः क्रीतः कृत्रिमश्च उपगच्छेत्स्वयं च यः । सहोढो ज्ञातिरेताश्च हीनयोनिधृतश्च यः ॥

dattaḥ krītaḥ kṛtrimaśca upagacchetsvayaṃ ca yaḥ | sahoḍho jñātiretāśca hīnayonidhṛtaśca yaḥ

"दिया हुआ (दत्तक) पुत्र; खरीदा हुआ पुत्र; बनाया हुआ (कृत्रिम) पुत्र; जो स्वयं आकर पुत्र बन जाए; विवाह के समय गर्भवती कन्या के साथ आया (सहोढ) पुत्र; जाति-बन्धु के वीर्य से उत्पन्न पुत्र; और हीन योनि की स्त्री से उत्पन्न पुत्र।

श्लोक 33 (1.126.33)

पूर्वपूर्वतमाभावं मत्वा लिप्सेत वै सुतम् । उत्तमाद्देवरात्पुंसः काङ्क्षन्ते पुत्रमापदि ॥

pūrvapūrvatamābhāvaṃ matvā lipseta vai sutam | uttamāddevarātpuṃsaḥ kāṅkṣante putramāpadi

"पहले-पहले प्रकार के पुत्र का अभाव देखकर (क्रम से अगले प्रकार का) पुत्र पाने की इच्छा करनी चाहिए। आपत्ति के समय लोग किसी उत्तम पुरुष से, अथवा देवर से, पुत्र की कामना करते हैं।

श्लोक 34 (1.126.34)

अपत्यं धर्मफलदं श्रेष्ठं विन्दन्ति मानवाः । आत्मशुक्रादपि पृथे मनुः स्वायंभुवोऽब्रवीत् ॥

apatyaṃ dharmaphaladaṃ śreṣṭhaṃ vindanti mānavāḥ | ātmaśukrādapi pṛthe manuḥ svāyaṃbhuvo'bravīt

"हे पृथा! मनुष्य धर्म का फल देनेवाली ऐसी सन्तान पाते हैं जो अपने वीर्य से उत्पन्न सन्तान से भी श्रेष्ठ होती है — ऐसा स्वायम्भुव मनु ने कहा है।

श्लोक 35 (1.126.35)

तस्मात्प्रहेष्याम्यद्य त्वां हीनः प्रजननात्स्वयम् ॥

tasmātpraheṣyāmyadya tvāṃ hīnaḥ prajananātsvayam

"इसलिए स्वयं सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति से हीन होने के कारण मैं आज तुम्हें (इस कार्य के लिए) प्रेरित करता हूँ।

श्लोक 36 (1.126.36)

सदृशाच्छ्रेयसो वा त्वं विद्ध्यपत्यं यशस्विनि । शृणु कुन्ति कथामेतां शारदण्डायनीं प्रति ॥

sadṛśācchreyaso vā tvaṃ viddhyapatyaṃ yaśasvini | śṛṇu kunti kathāmetāṃ śāradaṇḍāyanīṃ prati

"हे यशस्विनी! मेरे समान अथवा मुझसे श्रेष्ठ पुरुष से तुम सन्तान प्राप्त करो। हे कुन्ती! शारदण्डायन की पत्नी के विषय में यह कथा सुनो।

श्लोक 37 (1.126.37)

या हि ते भगिनी साध्वी श्रुतसेना यशस्विनी । उवाह तां तु कैकेयः शारदण्डायनिर्महान् ॥

yā hi te bhaginī sādhvī śrutasenā yaśasvinī | uvāha tāṃ tu kaikeyaḥ śāradaṇḍāyanirmahān

"तुम्हारी साध्वी और यशस्विनी बहन श्रुतसेना से केकय-वंशी महान शारदण्डायनि ने विवाह किया था।

श्लोक 38 (1.126.38)

सा वीरपत्नी गुरुणा नियुक्ता पुत्रजन्मनि । पुष्पेण प्रयता स्नाता निशि कुन्ति चतुष्पथे ॥

sā vīrapatnī guruṇā niyuktā putrajanmani | puṣpeṇa prayatā snātā niśi kunti catuṣpathe

"उस वीर की पत्नी ने, पति के द्वारा पुत्र उत्पन्न करने के लिए नियुक्त होकर, ऋतुकाल के बाद स्नान करके पवित्र हो, हे कुन्ती, रात में एक चौराहे पर जाकर

श्लोक 39 (1.126.39)

वरयित्वा द्विजं सिद्धं हुत्वा पुंसवनेऽनलम् । कर्मण्यवसिते तस्मिन्सा तेनैव सहावसत् ॥

varayitvā dvijaṃ siddhaṃ hutvā puṃsavane'nalam | karmaṇyavasite tasminsā tenaiva sahāvasat

"एक सिद्ध ब्राह्मण का वरण किया और पुंसवन संस्कार में अग्नि में आहुति दी। वह कर्म पूरा होने पर वह उसी ब्राह्मण के साथ रही।

श्लोक 40 (1.126.40)

तत्र त्रीञ्जनयामास दुर्जयादीन्महारथान् । तथा त्वमपि कल्याणि ब्राह्मणात्तपसाधिकात् । मन्नियोगाद्यत क्षिप्रमपत्योत्पादनं प्रति ॥

tatra trīñjanayāmāsa durjayādīnmahārathān | tathā tvamapi kalyāṇi brāhmaṇāttapasādhikāt | manniyogādyata kṣipramapatyotpādanaṃ prati

"वहाँ उसने दुर्जय आदि तीन महारथी पुत्र उत्पन्न किए। हे कल्याणी! उसी प्रकार तुम भी मेरी आज्ञा से तप में बढ़े-चढ़े किसी ब्राह्मण से शीघ्र सन्तान उत्पन्न करने का प्रयत्न करो।"

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