आदि पर्व · अध्याय 127
कुन्ती द्वारा व्युषिताश्व की कथा
कुन्ती पाण्डु का प्रस्ताव अस्वीकार करती है: वह उनके सिवा किसी से सन्तान नहीं चाहती और उनके साथ ही स्वर्ग जाना चाहती है। वह उन्हें पूरु-वंशी धर्मात्मा राजा व्युषिताश्व की प्राचीन कथा सुनाती है, जिनके यज्ञों से इन्द्र और देवता प्रसन्न हुए और जिन्होंने सारी पृथ्वी जीत ली। पत्नी भद्रा में अत्यधिक आसक्ति के कारण यक्ष्मा से क्षीण होकर वे उसे पुत्रहीन छोड़कर चल बसे; जब वह उनके शव पर विलाप कर रही थी, तब एक अदृश्य वाणी ने उसे सन्तान का वचन दिया, और शव के साथ शयन करके उसने तीन शाल्व और चार मद्र पुत्र उत्पन्न किए। कुन्ती कहती है कि इसी प्रकार पाण्डु भी अपने तप के बल से मन के द्वारा उसमें पुत्र उत्पन्न कर सकते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.127.1)
एवमुक्ता महाराज कुन्ती पाण्डुमभाषत । कुरूणामृषभं वीरं तदा भूमिपतिं पतिम् ॥
evamuktā mahārāja kuntī pāṇḍumabhāṣata | kurūṇāmṛṣabhaṃ vīraṃ tadā bhūmipatiṃ patim
हे महाराज! ऐसा कहे जाने पर कुन्ती ने तब कुरुश्रेष्ठ, वीर, पृथ्वीपति अपने पति पाण्डु से कहा।
कुन्त्युवाच
श्लोक 2 (1.127.2)
न मामर्हसि धर्मज्ञ वक्तुमेवं कथंचन । धर्मपत्नीमभिरतां त्वयि राजीवलोचने ॥
na māmarhasi dharmajña vaktumevaṃ kathaṃcana | dharmapatnīmabhiratāṃ tvayi rājīvalocane
कुन्ती ने कहा — "हे धर्मज्ञ! आपको मुझसे किसी भी प्रकार ऐसा नहीं कहना चाहिए। मैं आपकी धर्मपत्नी हूँ और आप कमलनयन में ही अनुरक्त हूँ।
श्लोक 3 (1.127.3)
त्वमेव तु महाबाहो मय्यपत्यानि भारत । वीर वीर्योपपन्नानि धर्मतो जनयिष्यसि ॥
tvameva tu mahābāho mayyapatyāni bhārata | vīra vīryopapannāni dharmato janayiṣyasi
"हे महाबाहु, हे भारत, हे वीर! आप ही मुझमें धर्मपूर्वक पराक्रम से सम्पन्न सन्तान उत्पन्न करेंगे।
श्लोक 4 (1.127.4)
स्वर्गं मनुजशार्दूल गच्छेयं सहिता त्वया । अपत्याय च मां गच्छ त्वमेव कुरुनन्दन ॥
svargaṃ manujaśārdūla gaccheyaṃ sahitā tvayā | apatyāya ca māṃ gaccha tvameva kurunandana
"हे नरश्रेष्ठ! मैं आपके साथ ही स्वर्ग जाऊँगी। हे कुरुनन्दन! सन्तान के लिए आप स्वयं ही मेरे पास आइए।
श्लोक 5 (1.127.5)
न ह्यहं मनसाप्यन्यं गच्छेयं त्वदृते नरम् । त्वत्तः प्रति विशिष्टश्च कोऽन्योऽस्ति भुवि मानवः ॥
na hyahaṃ manasāpyanyaṃ gaccheyaṃ tvadṛte naram | tvattaḥ prati viśiṣṭaśca ko'nyo'sti bhuvi mānavaḥ
"मैं मन से भी आपके सिवा किसी दूसरे पुरुष के पास नहीं जा सकती। और पृथ्वी पर आपसे बढ़कर दूसरा मनुष्य है ही कौन?
श्लोक 6 (1.127.6)
इमां च तावद्धर्मात्मन्पौराणीं शृणु मे कथाम् । परिश्रुतां विशालाक्ष कीर्तयिष्यामि यामहम् ॥
imāṃ ca tāvaddharmātmanpaurāṇīṃ śṛṇu me kathām | pariśrutāṃ viśālākṣa kīrtayiṣyāmi yāmaham
"हे धर्मात्मन्! पहले मुझसे यह प्राचीन कथा सुनिए। हे विशालनेत्र! इसे मैंने सुना है और अब मैं इसे सुनाती हूँ।
श्लोक 7 (1.127.7)
व्युषिताश्व इति ख्यातो बभूव किल पार्थिवः । पुरा परमधर्मिष्ठः पूरोर्वंशविवर्धनः ॥
vyuṣitāśva iti khyāto babhūva kila pārthivaḥ | purā paramadharmiṣṭhaḥ pūrorvaṃśavivardhanaḥ
"कहते हैं, प्राचीन काल में व्युषिताश्व नाम से विख्यात एक राजा हुए, जो परम धर्मात्मा थे और पूरु के वंश को बढ़ानेवाले थे।
श्लोक 8 (1.127.8)
तस्मिंश्च यजमाने वै धर्मात्मनि महाभुजे । उपागमंस्ततो देवाः सेन्द्रा देवर्षिभिः सह ॥
tasmiṃśca yajamāne vai dharmātmani mahābhuje | upāgamaṃstato devāḥ sendrā devarṣibhiḥ saha
"जब वे धर्मात्मा, महाबाहु राजा यज्ञ कर रहे थे, तब इन्द्र सहित देवता देवर्षियों के साथ वहाँ आए।
श्लोक 9 (1.127.9)
अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः । व्युषिताश्वस्य राजर्षेस्ततो यज्ञे महात्मनः ॥
amādyadindraḥ somena dakṣiṇābhirdvijātayaḥ | vyuṣitāśvasya rājarṣestato yajñe mahātmanaḥ
"उन महात्मा राजर्षि व्युषिताश्व के यज्ञ में इन्द्र सोम से और ब्राह्मण दक्षिणाओं से तृप्त होकर मस्त हो गए।
श्लोक 10 (1.127.10)
देवा ब्रह्मर्षयश्चैव चक्रुः कर्म स्वयं तदा । व्युषिताश्वस्ततो राजन्नति मर्त्यान्व्यरोचत ॥
devā brahmarṣayaścaiva cakruḥ karma svayaṃ tadā | vyuṣitāśvastato rājannati martyānvyarocata
"देवताओं और ब्रह्मर्षियों ने स्वयं वहाँ कर्म सम्पन्न किए। हे राजन्! तब व्युषिताश्व सब मनुष्यों से बढ़कर शोभित हुए,
श्लोक 11 (1.127.11)
सर्वभूतान्प्रति यथा तपनः शिशिरात्यये । स विजित्य गृहीत्वा च नृपतीन्राजसत्तमः ॥
sarvabhūtānprati yathā tapanaḥ śiśirātyaye | sa vijitya gṛhītvā ca nṛpatīnrājasattamaḥ
"जैसे शिशिर ऋतु के बीतने पर सूर्य सब प्राणियों से बढ़कर चमकता है। उन श्रेष्ठ राजा ने राजाओं को जीतकर और बन्दी बनाकर
श्लोक 12 (1.127.12)
प्राच्यानुदीच्यान्पाश्चात्यान्दाक्षिणात्यानकालयत् । अश्वमेधे महायज्ञे व्युषिताश्वः प्रतापवान् ॥
prācyānudīcyānpāścātyāndākṣiṇātyānakālayat | aśvamedhe mahāyajñe vyuṣitāśvaḥ pratāpavān
"पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण के राजाओं को अपने वश में कर लिया। महान अश्वमेध यज्ञ में प्रतापी व्युषिताश्व,
श्लोक 13 (1.127.13)
बभूव स हि राजेन्द्रो दशनागबलान्वितः । अप्यत्र गाथां गायन्ति ये पुराणविदो जनाः ॥
babhūva sa hi rājendro daśanāgabalānvitaḥ | apyatra gāthāṃ gāyanti ye purāṇavido janāḥ
"वे राजेन्द्र, दस हाथियों के बल से युक्त हो गए। पुराणों के ज्ञाता लोग इस विषय में एक गाथा गाते हैं,
श्लोक 14 (1.127.14)
व्युषिताश्वे यशोवृद्धे मनुष्येन्द्रे कुरूत्तम । व्युषिताश्वः समुद्रान्तां विजित्येमां वसुन्धराम् ॥
vyuṣitāśve yaśovṛddhe manuṣyendre kurūttama | vyuṣitāśvaḥ samudrāntāṃ vijityemāṃ vasundharām
"हे कुरुश्रेष्ठ! यश में बढ़े हुए नरेन्द्र व्युषिताश्व के विषय में — 'व्युषिताश्व ने समुद्र तक फैली इस पृथ्वी को जीतकर
श्लोक 15 (1.127.15)
अपालयत्सर्ववर्णान्पिता पुत्रानिवौरसान् । यजमानो महायज्ञैर्ब्राह्मणेभ्यो धनं ददौ ॥
apālayatsarvavarṇānpitā putrānivaurasān | yajamāno mahāyajñairbrāhmaṇebhyo dhanaṃ dadau
"सब वर्णों का वैसे ही पालन किया जैसे पिता अपने औरस पुत्रों का करता है। बड़े-बड़े यज्ञ करते हुए उन्होंने ब्राह्मणों को धन दिया।
श्लोक 16 (1.127.16)
अनन्तरत्नान्यादाय स जहार महाक्रतून् । सुषाव च बहून्सोमान्सोमसंस्थास्ततान च ॥
anantaratnānyādāya sa jahāra mahākratūn | suṣāva ca bahūnsomānsomasaṃsthāstatāna ca
"अनन्त रत्न लेकर उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ किए; बहुत बार सोम का अभिषव किया और सोमयाग की सभी संस्थाओं का अनुष्ठान किया।'
श्लोक 17 (1.127.17)
आसीत्काक्षीवती चास्य भार्या परमसंमता । भद्रा नाम मनुष्येन्द्र रूपेणासदृशी भुवि ॥
āsītkākṣīvatī cāsya bhāryā paramasaṃmatā | bhadrā nāma manuṣyendra rūpeṇāsadṛśī bhuvi
"हे नरेन्द्र! उनकी भद्रा नाम की पत्नी थी, जो कक्षीवान की पुत्री थी; वह उन्हें अत्यन्त प्रिय थी और रूप में पृथ्वी पर अनुपम थी।
श्लोक 18 (1.127.18)
कामयामासतुस्तौ च परस्परमिति श्रुतम् । स तस्यां कामसंपन्नो यक्ष्मणा समपद्यत ॥
kāmayāmāsatustau ca parasparamiti śrutam | sa tasyāṃ kāmasaṃpanno yakṣmaṇā samapadyata
"सुना जाता है कि वे दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते थे। उसमें अत्यन्त कामासक्त रहने के कारण राजा को यक्ष्मा रोग हो गया।
श्लोक 19 (1.127.19)
तेनाचिरेण कालेन जगामास्तमिवांशुमान् । तस्मिन्प्रेते मनुष्येन्द्रे भार्याऽस्य भृशदुःखिता ॥
tenācireṇa kālena jagāmāstamivāṃśumān | tasminprete manuṣyendre bhāryā'sya bhṛśaduḥkhitā
"थोड़े ही समय में वे सूर्य की भाँति अस्त हो गए। उन नरेन्द्र के मर जाने पर उनकी पत्नी अत्यन्त दुःखी हुई,
श्लोक 20 (1.127.20)
अपुत्रा पुरुषव्याघ्र विललापेति नः श्रुतम् । भद्रा परमदुःखार्ता तन्निबोध जनाधिप ॥
aputrā puruṣavyāghra vilalāpeti naḥ śrutam | bhadrā paramaduḥkhārtā tannibodha janādhipa
"हे पुरुषसिंह! हमने सुना है कि पुत्रहीन भद्रा ने परम दुःख से पीड़ित होकर विलाप किया। हे जनाधिप! उस विलाप को सुनिए।
भद्रोवाच
श्लोक 21 (1.127.21)
नारी परमधर्मज्ञ सर्वा भर्तृविनाकृता । पतिं विना जीवति या न सा जीवति दुःखिता ॥
nārī paramadharmajña sarvā bhartṛvinākṛtā | patiṃ vinā jīvati yā na sā jīvati duḥkhitā
भद्रा ने कहा — "हे परम धर्मज्ञ! पति से बिछुड़ी हुई हर स्त्री — जो पति के बिना जीती है, वह जीती नहीं, केवल दुःख भोगती है।
श्लोक 22 (1.127.22)
पतिं विना मृतं श्रेयो नार्याः क्षत्रियपुंगव । त्वद्गतिं गन्तुमिच्छामि प्रसीदस्व नयस्व माम् ॥
patiṃ vinā mṛtaṃ śreyo nāryāḥ kṣatriyapuṃgava | tvadgatiṃ gantumicchāmi prasīdasva nayasva mām
"हे क्षत्रियश्रेष्ठ! स्त्री के लिए पति के बिना मर जाना ही श्रेयस्कर है। मैं आपकी गति को जाना चाहती हूँ; प्रसन्न होइए और मुझे भी ले चलिए।
श्लोक 23 (1.127.23)
त्वया हीना क्षणमपि नाहं जीवितुमुत्सहे । प्रसादं कुरु मे राजन्नितस्तूर्णं नयस्व माम् ॥
tvayā hīnā kṣaṇamapi nāhaṃ jīvitumutsahe | prasādaṃ kuru me rājannitastūrṇaṃ nayasva mām
"आपके बिना मैं क्षण भर भी जीवित नहीं रह सकती। हे राजन्! मुझ पर कृपा कीजिए और मुझे यहाँ से शीघ्र ले चलिए।
श्लोक 24 (1.127.24)
पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि समेषु विषमेषु च । त्वामहं नरशार्दूल गच्छन्तमनिवर्तितुम् ॥
pṛṣṭhato'nugamiṣyāmi sameṣu viṣameṣu ca | tvāmahaṃ naraśārdūla gacchantamanivartitum
"हे नरश्रेष्ठ! समतल और विषम मार्गों पर मैं आपके पीछे-पीछे चलूँगी, जो आप जाकर फिर लौटनेवाले नहीं हैं।
श्लोक 25 (1.127.25)
छायेवानुगता राजन्सततं वशवर्तिनी । भविष्यामि नरव्याघ्र नित्यं प्रियहिते रता ॥
chāyevānugatā rājansatataṃ vaśavartinī | bhaviṣyāmi naravyāghra nityaṃ priyahite ratā
"हे राजन्, हे पुरुषसिंह! मैं छाया की भाँति सदा आपके पीछे चलूँगी, आपके वश में रहूँगी और नित्य आपके प्रिय और हित में लगी रहूँगी।
श्लोक 26 (1.127.26)
अद्यप्रभृति मां राजन्कष्टा हृदयशोषणाः । आधयोऽभिभविष्यन्ति त्वामृते पुष्करेक्षण ॥
adyaprabhṛti māṃ rājankaṣṭā hṛdayaśoṣaṇāḥ | ādhayo'bhibhaviṣyanti tvāmṛte puṣkarekṣaṇa
"हे राजन्, हे कमलनयन! आज से आपके बिना हृदय को सुखा देनेवाली कठोर मानसिक पीड़ाएँ मुझे घेर लेंगी।
श्लोक 27 (1.127.27)
अभाग्यया मया नूनं वियुक्ताः सहचारिणः । तेन मे विप्रयोगोऽयमुपपन्नस्त्वया सह ॥
abhāgyayā mayā nūnaṃ viyuktāḥ sahacāriṇaḥ | tena me viprayogo'yamupapannastvayā saha
"निश्चय ही मुझ अभागिनी ने (पूर्वजन्म में) साथ रहनेवाले साथियों को बिछुड़ाया होगा; इसी से आपके साथ मेरा यह वियोग हुआ है।
श्लोक 28 (1.127.28)
विप्रयुक्ता तु या पत्या मुहूर्तमपि जीवति । दुःखं जीवति सा पापा नरकस्थेव पार्थिव ॥
viprayuktā tu yā patyā muhūrtamapi jīvati | duḥkhaṃ jīvati sā pāpā narakastheva pārthiva
"हे राजन्! पति से बिछुड़कर जो स्त्री एक मुहूर्त भी जीती है, वह अभागिनी नरक में पड़ी हुई-सी दुःख से जीती है।
श्लोक 29 (1.127.29)
संयुक्ता विप्रयुक्ताश्च पूर्वदेहे कृता मया । तदिदं कर्मभिः पापैः पूर्वदेहेषु संचितम् ॥
saṃyuktā viprayuktāśca pūrvadehe kṛtā mayā | tadidaṃ karmabhiḥ pāpaiḥ pūrvadeheṣu saṃcitam
"पूर्व देह में मैंने जुड़े हुए जोड़ों को अलग किया था; पूर्वजन्मों में पाप-कर्मों से संचित यही
श्लोक 30 (1.127.30)
दुःखं मामनुसंप्राप्तं राजंस्त्वद्विप्रयोगजम् । अद्यप्रभृत्यहं राजन्कुशसंस्तरशायिनी । भविष्याम्यसुखाविष्टा त्वद्दर्शनपरायणा ॥
duḥkhaṃ māmanusaṃprāptaṃ rājaṃstvadviprayogajam | adyaprabhṛtyahaṃ rājankuśasaṃstaraśāyinī | bhaviṣyāmyasukhāviṣṭā tvaddarśanaparāyaṇā
"आपके वियोग से उत्पन्न यह दुःख, हे राजन्, मुझ पर आ पड़ा है। हे राजन्! आज से मैं कुश की शय्या पर सोऊँगी, दुःख में डूबी हुई और केवल आपके दर्शन की आस लगाए हुए।
श्लोक 31 (1.127.31)
दर्शयस्व नरव्याघ्र शाधि मामसुखान्विताम् । कृपणां चाथ करुणं विलपन्तीं नरेश्वर ॥
darśayasva naravyāghra śādhi māmasukhānvitām | kṛpaṇāṃ cātha karuṇaṃ vilapantīṃ nareśvara
"हे पुरुषसिंह! मुझे दर्शन दीजिए। हे नरेश्वर! दुःख से भरी, दीन और करुण विलाप करती हुई मुझको मार्ग दिखाइए।"
कुन्त्युवाच
श्लोक 32 (1.127.32)
एवं बहुविधं तस्यां विलपन्त्यां पुनःपुनः । तं शवं संपरिष्वज्य वाक्किलाऽन्तर्हिताऽब्रवीत् ॥
evaṃ bahuvidhaṃ tasyāṃ vilapantyāṃ punaḥpunaḥ | taṃ śavaṃ saṃpariṣvajya vākkilā'ntarhitā'bravīt
कुन्ती ने कहा — "जब वह शव से लिपटकर बार-बार अनेक प्रकार से विलाप कर रही थी, तब, कहते हैं, एक अदृश्य वाणी ने कहा —
श्लोक 33 (1.127.33)
उत्तिष्ठ भद्रे गच्छ त्वं ददानीह वरं तव । जनयिष्याम्यपत्यानि त्वय्यहं चारुहासिनि ॥
uttiṣṭha bhadre gaccha tvaṃ dadānīha varaṃ tava | janayiṣyāmyapatyāni tvayyahaṃ cāruhāsini
"'भद्रे! उठो और जाओ; मैं तुम्हें यहीं वर देता हूँ। हे चारुहासिनी! मैं तुमसे सन्तान उत्पन्न करूँगा।
श्लोक 34 (1.127.34)
आत्मकीये वरारोहे शयनीये चतुर्दशीम् । अष्टमीं वा ऋतुस्नाता संविशेथा मया सह ॥
ātmakīye varārohe śayanīye caturdaśīm | aṣṭamīṃ vā ṛtusnātā saṃviśethā mayā saha
"'हे सुन्दरी! ऋतुस्नान करके चतुर्दशी अथवा अष्टमी की रात को अपनी ही शय्या पर मेरे साथ शयन करना।'
श्लोक 35 (1.127.35)
एवमुक्ता तु सा देवी तथा चक्रे पतिव्रता । यथोक्तमेव तद्वाक्यं भद्रा पुत्रार्थिनी तदा ॥
evamuktā tu sā devī tathā cakre pativratā | yathoktameva tadvākyaṃ bhadrā putrārthinī tadā
"ऐसा कहे जाने पर पुत्र की इच्छा रखनेवाली उस पतिव्रता रानी भद्रा ने वैसा ही किया, जैसा उससे कहा गया था।
श्लोक 36 (1.127.36)
सा तेन सुषुवे देवी शवेन भरतर्षभ । त्रीञ्शाल्वांश्चतुरो मद्रान्सुतान्भरतसत्तम ॥
sā tena suṣuve devī śavena bharatarṣabha | trīñśālvāṃścaturo madrānsutānbharatasattama
"हे भरतश्रेष्ठ! उस रानी ने उस शव से पुत्र उत्पन्न किए — तीन शाल्व और चार मद्र।
श्लोक 37 (1.127.37)
तथा त्वमपि मय्येवं मनसा भरतर्षभ । शक्तो जनयितुं पुत्रांस्तपोयोगबलान्वितः ॥
tathā tvamapi mayyevaṃ manasā bharatarṣabha | śakto janayituṃ putrāṃstapoyogabalānvitaḥ
"हे भरतश्रेष्ठ! उसी प्रकार आप भी तप और योग के बल से सम्पन्न होने के कारण मन के द्वारा मुझमें पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ हैं।"