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आदि पर्व · अध्याय 128

श्वेतकेतु की मर्यादा और कुन्ती का मन्त्र

पाण्डु कुन्ती को उत्तर देते हैं कि प्राचीन काल में स्त्रियाँ स्वतन्त्र और बन्धन-रहित थीं, जैसे पशु और उत्तरकुरु के लोग आज भी हैं; फिर वे बताते हैं कि एक वृद्ध ब्राह्मण द्वारा माता को ले जाए जाने पर क्रुद्ध ऋषिपुत्र श्वेतकेतु ने पति-पत्नी को बाँधने वाली मर्यादा कैसे स्थापित की। मदयन्ती और व्यास से हुए अपने जन्म का उदाहरण देकर पाण्डु हाथ जोड़कर कुन्ती से किसी तपस्वी ब्राह्मण द्वारा पुत्र उत्पन्न करने का आग्रह करते हैं। तब कुन्ती बचपन में दुर्वासा से मिले उस मन्त्र का रहस्य बताती हैं, जिससे बुलाया गया कोई भी देवता उसे पुत्र देने को बाध्य है, और उसके प्रयोग के लिए पति की अनुमति माँगती हैं।

अध्याय 127अध्याय-सूचीअध्याय 129

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.128.1)

एवमुक्तस्तया राजा तां देवीं पुनरब्रवीत् । धर्मविद्धर्मसंयुक्तमिदं वचनमुत्तमम् ॥

evamuktastayā rājā tāṃ devīṃ punarabravīt | dharmaviddharmasaṃyuktamidaṃ vacanamuttamam

रानी के ऐसा कहने पर धर्म के ज्ञाता राजा ने उससे फिर धर्म से भरे ये उत्तम वचन कहे।

पाण्डुरुवाच

श्लोक 2 (1.128.2)

एवमेतत्पुरा कुन्ति व्युषिताश्वश्चकार ह । यथा त्वयोक्तं कल्याणि स ह्यासीदमरोपमः ॥

evametatpurā kunti vyuṣitāśvaścakāra ha | yathā tvayoktaṃ kalyāṇi sa hyāsīdamaropamaḥ

"कुन्ती, बात ठीक ऐसी ही है। हे कल्याणी, जैसा तुमने कहा, व्युषिताश्व ने पूर्वकाल में ऐसा ही किया था; वह तो देवताओं के समान था।"

श्लोक 3 (1.128.3)

अथ त्विदं प्रवक्ष्यामि धर्मतत्त्वं निबोध मे । पुराणमृषिभिर्दृष्टं धर्मविद्भिर्महात्मभिः ॥

atha tvidaṃ pravakṣyāmi dharmatattvaṃ nibodha me | purāṇamṛṣibhirdṛṣṭaṃ dharmavidbhirmahātmabhiḥ

"किन्तु अब मैं तुम्हें धर्म का तत्त्व बताता हूँ, उसे मुझसे समझो। यह वह प्राचीन धर्म है जिसे धर्म के ज्ञाता महात्मा ऋषियों ने देखा था।"

श्लोक 4 (1.128.4)

अनावृताः किल पुरा स्त्रिय आसन्वरानने । कामचारविहारिण्यः स्वतन्त्राश्चारुहासिनि ॥

anāvṛtāḥ kila purā striya āsanvarānane | kāmacāravihāriṇyaḥ svatantrāścāruhāsini

"हे सुमुखी, कहते हैं कि पूर्वकाल में स्त्रियाँ घरों में बँधकर नहीं रहती थीं। हे मधुर मुस्कान वाली, वे अपनी इच्छा से घूमतीं और आनन्द लेतीं; वे स्वतन्त्र थीं।"

श्लोक 5 (1.128.5)

तासां व्युच्चरमाणानां कौमारात्सुभगे पतीन् । नाधर्मोऽभूद्वरारोहे स हि धर्मः पुराऽभवत् ॥

tāsāṃ vyuccaramāṇānāṃ kaumārātsubhage patīn | nādharmo'bhūdvarārohe sa hi dharmaḥ purā'bhavat

"हे सौभाग्यवती, कुमारावस्था से ही पतियों का अतिक्रमण करने पर भी उन्हें अधर्म नहीं लगता था; हे सुन्दरी, क्योंकि उस समय वही धर्म था।"

श्लोक 6 (1.128.6)

तं चैव धर्मं पौराणं तिर्यग्योनिगताः प्रजाः । अद्याप्यनुविधीयन्ते कामक्रोधविवर्जिताः ॥

taṃ caiva dharmaṃ paurāṇaṃ tiryagyonigatāḥ prajāḥ | adyāpyanuvidhīyante kāmakrodhavivarjitāḥ

"पशु-पक्षी आदि योनियों में जन्मे प्राणी आज भी काम और क्रोध से रहित होकर उसी पुरातन धर्म के अनुसार चलते हैं।"

श्लोक 7 (1.128.7)

प्रमाणदृष्टो धर्मोऽयं पूज्यते च महर्षिभिः । उत्तरेषु च रम्भोरु कुरुष्वद्यापि पूज्यते । स्त्रीणामनुग्रहकरः स हि धर्मः सनातनः ॥

pramāṇadṛṣṭo dharmo'yaṃ pūjyate ca maharṣibhiḥ | uttareṣu ca rambhoru kuruṣvadyāpi pūjyate | strīṇāmanugrahakaraḥ sa hi dharmaḥ sanātanaḥ

"यह धर्म प्रमाणों से सिद्ध है और महर्षि इसका आदर करते हैं। हे रम्भोरु, उत्तरकुरु देश में आज भी इसका आदर होता है। स्त्रियों पर अनुग्रह करने वाला यह धर्म सनातन है।"

श्लोक 8 (1.128.8)

नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः । नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचनाः ॥

nāgnistṛpyati kāṣṭhānāṃ nāpagānāṃ mahodadhiḥ | nāntakaḥ sarvabhūtānāṃ na puṃsāṃ vāmalocanāḥ

"जैसे अग्नि लकड़ियों से, महासागर नदियों से और मृत्यु समस्त प्राणियों से कभी तृप्त नहीं होते, वैसे ही सुन्दर नेत्रों वाली स्त्रियाँ पुरुषों से तृप्त नहीं होतीं।"

श्लोक 9 (1.128.9)

एवं तृष्णा तु नारीणां पुरुषं पुरुषं प्रति । अगम्यागमनं स्त्रीणां नास्ति नित्यं शुचिस्मिते ॥

evaṃ tṛṣṇā tu nārīṇāṃ puruṣaṃ puruṣaṃ prati | agamyāgamanaṃ strīṇāṃ nāsti nityaṃ śucismite

"इसी प्रकार स्त्रियों की तृष्णा एक पुरुष से दूसरे पुरुष की ओर जाती है। हे शुचिस्मिते, स्त्रियों के लिए कोई भी संग कभी वर्जित नहीं होता।"

श्लोक 10 (1.128.10)

पुत्रं वा किल पौत्रं वा कासांचिद्धातरं तथा । रहसीह नरं दृष्ट्वा योनिरुत्क्लिद्यते तदा ॥

putraṃ vā kila pautraṃ vā kāsāṃciddhātaraṃ tathā | rahasīha naraṃ dṛṣṭvā yonirutklidyate tadā

"कहते हैं कि कुछ स्त्रियाँ एकान्त में किसी पुरुष को देखकर, चाहे वह पुत्र हो, पौत्र हो या भाई ही क्यों न हो, उसी क्षण काम से उत्तेजित हो उठती हैं।"

श्लोक 11 (1.128.11)

एतत्स्वाभाविकं स्त्रीणां न निमित्तकृतं शुभे । अस्मिंस्तु लोके नचिरान्मर्यादेयं शुचिस्मिते ॥

etatsvābhāvikaṃ strīṇāṃ na nimittakṛtaṃ śubhe | asmiṃstu loke nacirānmaryādeyaṃ śucismite

"हे शुभे, यह स्त्रियों का स्वभाव है, किसी बाहरी कारण से उत्पन्न नहीं। किन्तु हे शुचिस्मिते, इस लोक में कुछ ही समय पहले एक मर्यादा बाँधी गई।"

श्लोक 12 (1.128.12)

स्थापिता येन यस्माच्च तन्मे विस्तरतः शृणु । बभूवोद्दालको नाम महर्षिरिति नः श्रुतम् ॥

sthāpitā yena yasmācca tanme vistarataḥ śṛṇu | babhūvoddālako nāma maharṣiriti naḥ śrutam

"वह किसने और किस कारण स्थापित की, यह मुझसे विस्तार से सुनो। हमने सुना है कि उद्दालक नाम के एक महर्षि थे।"

श्लोक 13 (1.128.13)

श्वेतकेतुरिति ख्यातः पुत्रस्तस्याभवन्मुनिः । मर्यादेयं कृता तेन धर्म्या वै श्वेतकेतुना ॥

śvetaketuriti khyātaḥ putrastasyābhavanmuniḥ | maryādeyaṃ kṛtā tena dharmyā vai śvetaketunā

"उनके एक पुत्र थे, श्वेतकेतु नाम से प्रसिद्ध मुनि। इसी श्वेतकेतु ने यह धर्मसम्मत मर्यादा बनाई,"

श्लोक 14 (1.128.14)

कोपात्कमलपत्राक्षि यदर्थं तन्निबोध मे ॥

kopātkamalapatrākṣi yadarthaṃ tannibodha me

"और हे कमलनयनी, उन्होंने इसे क्रोध में बनाया था। इसका कारण मुझसे जानो।"

श्लोक 15 (1.128.15)

श्वेतकेतोः पिता देवि तप उग्रं समास्थितः । ग्रीष्मे पञ्चतपा भूत्वा वर्षास्वाकाशगोऽभवत् ॥

śvetaketoḥ pitā devi tapa ugraṃ samāsthitaḥ | grīṣme pañcatapā bhūtvā varṣāsvākāśago'bhavat

"हे देवी, श्वेतकेतु के पिता कठोर तप में लगे थे। ग्रीष्म में वे पंचाग्नि तप करते थे और वर्षा ऋतु में खुले आकाश के नीचे रहते थे;"

श्लोक 16 (1.128.16)

शिशिरे सलिलस्थायी सह पत्न्या महातपाः । उद्दालकं तपस्यन्तं नियमेन समाहितम् ॥

śiśire salilasthāyī saha patnyā mahātapāḥ | uddālakaṃ tapasyantaṃ niyamena samāhitam

"और शीत ऋतु में वे महातपस्वी अपनी पत्नी के साथ जल में खड़े रहते थे। जब उद्दालक नियम से एकाग्र होकर तप कर रहे थे,"

श्लोक 17 (1.128.17)

तस्य पुत्रः श्वेतकेतुः परिचर्यां चकार ह । अभ्यागच्छद्द्विजः कश्चिद्वलीपलितसंततः ॥

tasya putraḥ śvetaketuḥ paricaryāṃ cakāra ha | abhyāgacchaddvijaḥ kaścidvalīpalitasaṃtataḥ

"तब उनका पुत्र श्वेतकेतु उनकी सेवा करता था। उसी समय झुर्रियों और पके बालों से भरा एक ब्राह्मण वहाँ आया।"

श्लोक 18 (1.128.18)

तं दृष्ट्वैव मुनिः प्रीतः पूजयामास शास्त्रतः । स्वागतेन च पाद्येन मृदुवाक्यैश्च भारत ॥

taṃ dṛṣṭvaiva muniḥ prītaḥ pūjayāmāsa śāstrataḥ | svāgatena ca pādyena mṛduvākyaiśca bhārata

"उसे देखते ही मुनि प्रसन्न हो गए और हे भारत, उन्होंने शास्त्र की विधि से स्वागत के वचनों, पैर धोने के जल और मधुर वाणी से उसका सत्कार किया;"

श्लोक 19 (1.128.19)

शाकमूलफलाद्यैश्च वन्यैरन्यैरपूजयत् । क्षुत्पिपासाश्रमेणार्तः पूजितश्च महर्षिणा ॥

śākamūlaphalādyaiśca vanyairanyairapūjayat | kṣutpipāsāśrameṇārtaḥ pūjitaśca maharṣiṇā

"साथ ही साग, कन्द-मूल, फल और वन के अन्य पदार्थों से उसका पूजन किया। भूख, प्यास और थकान से पीड़ित उस ब्राह्मण का महर्षि ने इस प्रकार सम्मान किया।"

श्लोक 20 (1.128.20)

विश्रान्तो मुनिमासाद्य पर्यपृच्छद्द्विजस्तदा । उद्दालक महर्षे त्वं सत्यं मे ब्रूहि माऽनृतम् ॥

viśrānto munimāsādya paryapṛcchaddvijastadā | uddālaka maharṣe tvaṃ satyaṃ me brūhi mā'nṛtam

"विश्राम कर लेने पर उस ब्राह्मण ने मुनि के पास जाकर पूछा, 'महर्षि उद्दालक, मुझे सच बताइए, झूठ नहीं।'"

श्लोक 21 (1.128.21)

ऋषिपुत्रः कुमारोऽयं दर्शनीयो विशेषतः । तव पुत्रमिमं मन्ये कृतकृत्योऽसि तद्वद ॥

ṛṣiputraḥ kumāro'yaṃ darśanīyo viśeṣataḥ | tava putramimaṃ manye kṛtakṛtyo'si tadvada

"'यह ऋषिकुमार विशेष रूप से सुन्दर है। मैं समझता हूँ कि यह आपका पुत्र है। तब तो आप कृतार्थ हो चुके हैं; बताइए।'"

उद्दालक उवाच

श्लोक 22 (1.128.22)

मम पत्नी महाप्राज्ञ कुशिकस्य सुता मता । मामेवानुगता पत्नी मम नित्यमनुव्रता ॥

mama patnī mahāprājña kuśikasya sutā matā | māmevānugatā patnī mama nityamanuvratā

"हे महाप्राज्ञ, मेरी पत्नी कुशिक की पुत्री मानी जाती है। वही एकमात्र पत्नी मेरे साथ चलती आई है और सदा मेरे प्रति समर्पित रहती है।"

श्लोक 23 (1.128.23)

अरुन्धतीव पत्नीनां तपसा कर्शितस्तनी । अस्यां जातः श्वेतकेतुर्मम पुत्रो महातपाः ॥

arundhatīva patnīnāṃ tapasā karśitastanī | asyāṃ jātaḥ śvetaketurmama putro mahātapāḥ

"पत्नियों में वह अरुन्धती के समान है; तप से उसके स्तन कृश हो गए हैं। उसी से मेरा महातपस्वी पुत्र श्वेतकेतु उत्पन्न हुआ है।"

श्लोक 24 (1.128.24)

वेदवेदाङ्गविद्विप्र मच्छासनपरायणः । लोकज्ञः सर्वलोकेषु विश्रुतः सत्यवाग्घृणी ॥

vedavedāṅgavidvipra macchāsanaparāyaṇaḥ | lokajñaḥ sarvalokeṣu viśrutaḥ satyavāgghṛṇī

"हे विप्र, वह वेद और वेदांगों का ज्ञाता है और मेरी आज्ञा के पालन में तत्पर रहता है। वह लोक-व्यवहार जानता है, सब लोकों में प्रसिद्ध है, सत्यवादी और दयालु है।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 25 (1.128.25)

अपुत्री भार्यया चार्थी वृद्धोऽहं मन्दचाक्षुषः । पित्र्यादृणादनिर्मुक्तः पूर्वमेवाकृतस्त्रियः ॥

aputrī bhāryayā cārthī vṛddho'haṃ mandacākṣuṣaḥ | pitryādṛṇādanirmuktaḥ pūrvamevākṛtastriyaḥ

"मेरा कोई पुत्र नहीं है और मुझे पत्नी की आवश्यकता है; मैं बूढ़ा हूँ और मेरी आँखें कमजोर हैं। मैं पितृ-ऋण से मुक्त नहीं हुआ, क्योंकि मैंने पहले कभी विवाह नहीं किया।"

श्लोक 26 (1.128.26)

प्रजारणिस्तु पत्नी ते कुलशीलसमन्विता । सदृशी मम गोत्रेण वहाम्येनां क्षमस्व मे ॥

prajāraṇistu patnī te kulaśīlasamanvitā | sadṛśī mama gotreṇa vahāmyenāṃ kṣamasva me

"तुम्हारी पत्नी संतान उत्पन्न करने वाली अरणी के समान है, उत्तम कुल और शील से युक्त है, और मेरे गोत्र के योग्य है। मैं इसे अपने साथ ले जाता हूँ; मुझे क्षमा करना।"

पाण्डुरुवाच

श्लोक 27 (1.128.27)

इत्युक्त्वा मृगशावाक्षीं चीरकृष्णाजिनाम्बराम् । यष्ट्याधारः स्रस्तगात्रो मन्दचक्षुरबुद्धिमान् ॥

ityuktvā mṛgaśāvākṣīṃ cīrakṛṣṇājināmbarām | yaṣṭyādhāraḥ srastagātro mandacakṣurabuddhimān

"यह कहकर लाठी के सहारे खड़े, ढीले अंगों वाले, मन्द दृष्टि और बुद्धिहीन उस ब्राह्मण ने वल्कल और काला मृगचर्म पहने उस मृगनयनी पर अधिकार जताया,"

श्लोक 28 (1.128.28)

स्वव्यापाराक्षमां श्रेष्ठामचित्तामात्मनि द्विजः । श्वेतकेतोः किल पुरा समक्षं मातरं पितुः ॥

svavyāpārākṣamāṃ śreṣṭhāmacittāmātmani dvijaḥ | śvetaketoḥ kila purā samakṣaṃ mātaraṃ pituḥ

"उस श्रेष्ठ स्त्री पर, जो अपने बचाव में असमर्थ थी और मन से अनिच्छुक थी। कहते हैं, पूर्वकाल में श्वेतकेतु के पिता की आँखों के सामने ही एक ब्राह्मण ने श्वेतकेतु की माता का"

श्लोक 29 (1.128.29)

जग्राह ब्राह्मणः पाणौ गच्छाव इति चाब्रवीत् । ऋषिपुत्रस्तदा कोपं चकारामर्षितस्तदा ॥

jagrāha brāhmaṇaḥ pāṇau gacchāva iti cābravīt | ṛṣiputrastadā kopaṃ cakārāmarṣitastadā

"हाथ पकड़ लिया और कहा, 'चलो, हम चलें।' तब ऋषिपुत्र इसे सहन न कर सका और क्रोध से भर गया,"

श्लोक 30 (1.128.30)

मातरं तां तथा दृष्ट्वा नीयमानां बलादिव । तपसा दीप्तवीर्यो हि श्वेतकेतुर्न चक्षमे ॥

mātaraṃ tāṃ tathā dṛṣṭvā nīyamānāṃ balādiva | tapasā dīptavīryo hi śvetaketurna cakṣame

"जब उसने अपनी माता को मानो बलपूर्वक ले जाया जाता देखा। तप से प्रदीप्त तेज वाले श्वेतकेतु ने यह सहन नहीं किया।"

श्लोक 31 (1.128.31)

संगृह्य मातरं हस्ते श्वेतकेतुरभाषत । दुर्ब्राह्मण विमुञ्च त्वं मातरं मे पतिव्रताम् ॥

saṃgṛhya mātaraṃ haste śvetaketurabhāṣata | durbrāhmaṇa vimuñca tvaṃ mātaraṃ me pativratām

"माता का हाथ थामकर श्वेतकेतु बोला, 'दुष्ट ब्राह्मण, मेरी माता को छोड़ दो; वे पतिव्रता हैं।'"

श्लोक 32 (1.128.32)

स्वयं पिता मे ब्रह्मर्षिः क्षमावान्ब्रह्मवित्तमः । शापानुग्रहयोः शक्तः तूष्णींभूतो महाव्रतः ॥

svayaṃ pitā me brahmarṣiḥ kṣamāvānbrahmavittamaḥ | śāpānugrahayoḥ śaktaḥ tūṣṇīṃbhūto mahāvrataḥ

"'मेरे पिता स्वयं ब्रह्मर्षि हैं, क्षमाशील और ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ; वे शाप देने और वर देने दोनों में समर्थ हैं, फिर भी वे महाव्रती चुप बैठे हैं।'"

श्लोक 33 (1.128.33)

तस्य पत्नी दमोपेता मम माता विशेषतः । पतिव्रतां तपोवृद्धां साध्वाचारैरलङ्कृताम् ॥

tasya patnī damopetā mama mātā viśeṣataḥ | pativratāṃ tapovṛddhāṃ sādhvācārairalaṅkṛtām

"'उनकी पत्नी, जो विशेष रूप से मेरी माता हैं, संयमी, पतिव्रता, तप में बढ़ी हुई और सदाचार से विभूषित हैं।'"

श्लोक 34 (1.128.34)

अप्रमादेन ते ब्रह्मन्मातृभूतां विमुञ्च वै ॥

apramādena te brahmanmātṛbhūtāṃ vimuñca vai

"'हे ब्रह्मन्, सावधान होकर इन्हें छोड़ दो; ये तुम्हारे लिए माता के समान हैं।'"

श्लोक 35 (1.128.35)

एवमुक्त्वा तु याचन्तं विमुञ्चेति मुहुर्मुहुः । प्रत्यवोचद्द्विजो राजन्नप्रगल्भमिदं वचः ॥

evamuktvā tu yācantaṃ vimuñceti muhurmuhuḥ | pratyavocaddvijo rājannapragalbhamidaṃ vacaḥ

"जब श्वेतकेतु बार-बार 'छोड़ दो' कहकर याचना करने लगा, तब हे राजन्, उस ब्राह्मण ने नम्रता से यह उत्तर दिया।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 36 (1.128.36)

अपत्यार्थी श्वेतकेतो वृद्धोऽहं मन्दचाक्षुषः । पिता ते ऋणनिर्मुक्तस्त्वया पुत्रेण काश्यप ॥

apatyārthī śvetaketo vṛddho'haṃ mandacākṣuṣaḥ | pitā te ṛṇanirmuktastvayā putreṇa kāśyapa

"'श्वेतकेतु, मैं संतान चाहता हूँ; मैं बूढ़ा हूँ और मेरी आँखें कमजोर हैं। हे काश्यप, तुम जैसे पुत्र के कारण तुम्हारे पिता ऋण से मुक्त हो चुके हैं।'"

श्लोक 37 (1.128.37)

ऋणादहमनिर्मुक्तो वृद्धोऽहं विगतस्पृहः । मम को दास्यति सुतां कन्यां संप्राप्तयौवनाम् ॥

ṛṇādahamanirmukto vṛddho'haṃ vigataspṛhaḥ | mama ko dāsyati sutāṃ kanyāṃ saṃprāptayauvanām

"'मैं ऋण से मुक्त नहीं हुआ हूँ; मैं बूढ़ा हूँ और मेरी कामनाएँ जा चुकी हैं। युवावस्था को प्राप्त अपनी कन्या मुझे कौन देगा?'"

श्लोक 38 (1.128.38)

प्रजारणिमिमां पत्नीं विमुञ्च त्वं महातपः । एकया प्रजया प्रीतो मातरं ते ददाम्यहम् ॥

prajāraṇimimāṃ patnīṃ vimuñca tvaṃ mahātapaḥ | ekayā prajayā prīto mātaraṃ te dadāmyaham

"'हे महातपस्वी, संतान की अरणी के समान इस पत्नी को छोड़ दो। एक ही संतान से संतुष्ट होकर मैं तुम्हारी माता तुम्हें लौटा दूँगा।'"

पाण्डुरुवाच

श्लोक 39 (1.128.39)

एवमुक्तः श्वेतकेतुर्लज्जया क्रोधमेयिवान् । क्रुद्धं तं तु पिता दृष्ट्वा श्वेतकेतुमुवाच ह ॥

evamuktaḥ śvetaketurlajjayā krodhameyivān | kruddhaṃ taṃ tu pitā dṛṣṭvā śvetaketumuvāca ha

"यह सुनकर श्वेतकेतु लज्जा के कारण क्रोध से भर गया। उसे क्रुद्ध देखकर पिता ने श्वेतकेतु से कहा,"

श्लोक 40 (1.128.40)

मा तात कोपं कार्षीस्त्वमेष धर्मः सनातनः । अनावृता हि सर्वेषां वर्णानामङ्गना भुवि ॥

mā tāta kopaṃ kārṣīstvameṣa dharmaḥ sanātanaḥ | anāvṛtā hi sarveṣāṃ varṇānāmaṅganā bhuvi

"'तात, क्रोध मत करो; यह सनातन धर्म है। पृथ्वी पर सभी वर्णों की स्त्रियाँ बन्धन-रहित हैं।'"

श्लोक 41 (1.128.41)

यथा गावः स्थिताः पुत्र स्वेस्वे वर्णे तथा प्रजाः । तथैव च कुटुम्बेषु न प्रमाद्यन्ति कर्हिचित् ॥

yathā gāvaḥ sthitāḥ putra svesve varṇe tathā prajāḥ | tathaiva ca kuṭumbeṣu na pramādyanti karhicit

"'पुत्र, जैसे गौएँ रहती हैं, वैसे ही प्रजा अपने-अपने वर्ण में रहती है। फिर भी अपने कुटुम्बों में वे कभी असावधानी नहीं करती थीं;'"

श्लोक 42 (1.128.42)

ऋतुकाले तु संप्राप्ते भर्तारं न जहुस्तदा । ऋषिपुत्रोऽथ तं धर्मं श्वेतकेतुर्न चक्षमे ॥

ṛtukāle tu saṃprāpte bhartāraṃ na jahustadā | ṛṣiputro'tha taṃ dharmaṃ śvetaketurna cakṣame

"'ऋतुकाल आने पर वे अपने पति को नहीं छोड़ती थीं।' किन्तु ऋषिपुत्र श्वेतकेतु ने उस धर्म को स्वीकार नहीं किया,"

श्लोक 43 (1.128.43)

चकार चैव मर्यादामिमां स्त्रीपुंसयोर्भुवि । मानुषेषु महाभागे न त्वेवान्येषु जन्तुषु ॥

cakāra caiva maryādāmimāṃ strīpuṃsayorbhuvi | mānuṣeṣu mahābhāge na tvevānyeṣu jantuṣu

"और उन्होंने पृथ्वी पर स्त्री और पुरुष के लिए यह मर्यादा स्थापित की; हे महाभागे, यह मनुष्यों के लिए है, अन्य प्राणियों के लिए नहीं।"

श्लोक 44 (1.128.44)

तदाप्रभृति मर्यादा स्थितेयमिति नः श्रुतम् । व्युच्चरन्त्याः पतिं नार्या अद्यप्रभृति पातकम् ॥

tadāprabhṛti maryādā sthiteyamiti naḥ śrutam | vyuccarantyāḥ patiṃ nāryā adyaprabhṛti pātakam

"हमने सुना है कि तभी से यह मर्यादा स्थिर है: 'आज से जो स्त्री पति का अतिक्रमण करेगी, उसे पाप लगेगा,"

श्लोक 45 (1.128.45)

भ्रूणहत्यासमं घोरं भविष्यत्यसुखावहम् । अद्याप्यनुविधीयन्ते कामक्रोधविवर्जिताः ॥

bhrūṇahatyāsamaṃ ghoraṃ bhaviṣyatyasukhāvaham | adyāpyanuvidhīyante kāmakrodhavivarjitāḥ

"भ्रूणहत्या के समान घोर पाप, जो दुःख देने वाला होगा।' पशु-पक्षी आज भी काम और क्रोध से रहित होकर पुराने धर्म के अनुसार चलते हैं,"

श्लोक 46 (1.128.46)

उत्तरेषु महाभागे कुरुष्वेवं यशस्विनि । पुराणदृष्टो धर्मोऽयं पूज्यते च महर्षिभिः ॥

uttareṣu mahābhāge kuruṣvevaṃ yaśasvini | purāṇadṛṣṭo dharmo'yaṃ pūjyate ca maharṣibhiḥ

"और हे महाभागे, हे यशस्विनी, उत्तरकुरु में भी ऐसा ही है। प्राचीन काल से देखा गया यह धर्म महर्षियों द्वारा आदर पाता है।"

श्लोक 47 (1.128.47)

भार्यां तथा व्युच्चरतः कौमारब्रह्मचारिणीम् । पतिव्रतामेतदेव भविता पातकं भुवि ॥

bhāryāṃ tathā vyuccarataḥ kaumārabrahmacāriṇīm | pativratāmetadeva bhavitā pātakaṃ bhuvi

"और जो पुरुष कौमार्य से ब्रह्मचारिणी रही अपनी पतिव्रता पत्नी का अतिक्रमण करेगा, उसे भी पृथ्वी पर यही पाप लगेगा।"

श्लोक 48 (1.128.48)

नियुक्ता पतिना भार्या यद्यपत्यस्य कारणात् । न कुर्यात्तत्तथा भीरु सैनः सुमहदाप्नुयात् । इति तेन पुरा भीरु मर्यादा स्थापिता बलात् ॥

niyuktā patinā bhāryā yadyapatyasya kāraṇāt | na kuryāttattathā bhīru sainaḥ sumahadāpnuyāt | iti tena purā bhīru maryādā sthāpitā balāt

"'हे भीरु, जो पत्नी संतान के लिए पति द्वारा नियुक्त की जाने पर भी वैसा नहीं करती, वह महान पाप की भागी होती है।' हे भीरु, इस प्रकार पूर्वकाल में यह मर्यादा दृढ़ता से स्थापित की गई"

श्लोक 49 (1.128.49)

उद्दालकस्य पुत्रेण धर्म्या वै श्वेतकेतुना । सौदासेन च रम्भोरु नियुक्ता पुत्रजन्मनि ॥

uddālakasya putreṇa dharmyā vai śvetaketunā | saudāsena ca rambhoru niyuktā putrajanmani

"उद्दालक के धर्मात्मा पुत्र श्वेतकेतु द्वारा। और हे रम्भोरु, सौदास ने जब पुत्र-जन्म के लिए उसे नियुक्त किया,"

श्लोक 50 (1.128.50)

मदयन्ती जगामर्षिं वसिष्ठमिति नः श्रुतम् । तस्माल्लेभे च सा पुत्रमश्मकं नाम भामिनी ॥

madayantī jagāmarṣiṃ vasiṣṭhamiti naḥ śrutam | tasmāllebhe ca sā putramaśmakaṃ nāma bhāminī

"तब मदयन्ती महर्षि वसिष्ठ के पास गई, ऐसा हमने सुना है; और उस सुन्दरी ने उनसे अश्मक नाम का पुत्र प्राप्त किया।"

श्लोक 51 (1.128.51)

एवं कृतवती सापि भर्तुः प्रियचिकीर्षया । अस्माकमपि ते जन्म विदितं कमलेक्षणे ॥

evaṃ kṛtavatī sāpi bhartuḥ priyacikīrṣayā | asmākamapi te janma viditaṃ kamalekṣaṇe

"उसने भी पति का प्रिय करने की इच्छा से ऐसा किया। हे कमलनयनी, हमारा अपना जन्म भी तुम जानती हो,"

श्लोक 52 (1.128.52)

कृष्णद्वैपायनाद्भीरु कुरूणां वंशवृद्धये । अत एतानि सर्वाणि कारणानि समीक्ष्य वै ॥

kṛṣṇadvaipāyanādbhīru kurūṇāṃ vaṃśavṛddhaye | ata etāni sarvāṇi kāraṇāni samīkṣya vai

"हे भीरु, कुरुवंश की वृद्धि के लिए कृष्णद्वैपायन से। इसलिए इन सब कारणों पर विचार करके"

श्लोक 53 (1.128.53)

ममैतद्वचनं धर्म्यं कर्तुमर्हस्यनिन्दिते । ऋतावृतौ राजपुत्रि स्त्रिया भर्ता पतिव्रते ॥

mamaitadvacanaṃ dharmyaṃ kartumarhasyanindite | ṛtāvṛtau rājaputri striyā bhartā pativrate

"हे अनिन्दिते, तुम्हें मेरा यह धर्मसम्मत वचन पूरा करना चाहिए। हे राजपुत्री, हे पतिव्रते, प्रत्येक ऋतुकाल में स्त्री को अपने पति का उल्लंघन नहीं करना चाहिए;"

श्लोक 54 (1.128.54)

नातिवर्तव्य इत्येवं धर्मं धर्मविदो विदुः । शेषेष्वन्येषु कालेषु स्वातन्त्र्यं स्त्री किलार्हति ॥

nātivartavya ityevaṃ dharmaṃ dharmavido viduḥ | śeṣeṣvanyeṣu kāleṣu svātantryaṃ strī kilārhati

"धर्म के ज्ञाता इसे ही धर्म मानते हैं। शेष अन्य समयों में, कहते हैं, स्त्री स्वतन्त्रता की अधिकारिणी है।"

श्लोक 55 (1.128.55)

धर्ममेवं जनाः सन्तः पुराणं परिचक्षते । भर्ता भार्यां राजपुत्रि धर्म्यं वाऽधर्म्यमेव वा ॥

dharmamevaṃ janāḥ santaḥ purāṇaṃ paricakṣate | bhartā bhāryāṃ rājaputri dharmyaṃ vā'dharmyameva vā

"सज्जन इसी को प्राचीन धर्म बताते हैं। हे राजपुत्री, पति अपनी पत्नी से जो कुछ कहे, चाहे वह धर्मसम्मत हो या धर्म के विरुद्ध,"

श्लोक 56 (1.128.56)

यद्ब्रूयात्तत्तथा कार्यमिति वेदविदो विदुः । विशेषतः पुत्रगृद्धी हीनः प्रजननात्स्वयम् ॥

yadbrūyāttattathā kāryamiti vedavido viduḥ | viśeṣataḥ putragṛddhī hīnaḥ prajananātsvayam

"वह वैसा ही करना चाहिए, वेद के ज्ञाता ऐसा मानते हैं। विशेषकर तब, जब वह पुत्र की लालसा रखता हो और स्वयं संतान उत्पन्न करने में असमर्थ हो,"

श्लोक 57 (1.128.57)

यथाऽहमनवद्याङ्गि पुत्रदर्शनलालसः । अयं रक्ताङ्गुलिनखः पद्मपत्रनिभः शुभे ॥

yathā'hamanavadyāṅgi putradarśanalālasaḥ | ayaṃ raktāṅgulinakhaḥ padmapatranibhaḥ śubhe

"जैसे हे अनवद्यांगी, पुत्र का मुख देखने के लिए लालायित मैं हूँ। हे शुभे, लाल नखों वाली और कमल-पत्र के समान मेरी यह अंजलि"

श्लोक 58 (1.128.58)

प्रसादनार्थं सुश्रोणि शिरस्यभ्युद्यतोऽञ्जलिः । मन्नियोगात्सुकेशान्ते द्विजातेस्तपसाऽधिकात् ॥

prasādanārthaṃ suśroṇi śirasyabhyudyato'ñjaliḥ | manniyogātsukeśānte dvijātestapasā'dhikāt

"हे सुश्रोणी, तुम्हें प्रसन्न करने के लिए मेरे सिर पर उठी है। हे सुन्दर केशों वाली, मेरी आज्ञा से तप में बढ़े हुए किसी ब्राह्मण से"

श्लोक 59 (1.128.59)

पुत्रान्गुणसमायुक्तानुत्पादयितुमर्हसि । त्वत्कृतेऽहं पृथुश्रोणि गच्छेयं पुत्रिणां गतिम् ॥

putrānguṇasamāyuktānutpādayitumarhasi | tvatkṛte'haṃ pṛthuśroṇi gaccheyaṃ putriṇāṃ gatim

"तुम गुणवान पुत्र उत्पन्न करो। हे पृथुश्रोणी, तुम्हारे द्वारा मैं पुत्रवानों की गति प्राप्त करूँ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 60 (1.128.60)

एवमुक्ता ततः कुन्ती पाण्डुं परपुरञ्जयम् । प्रत्युवाच वरारोहा भर्तुः प्रियहिते रता ॥

evamuktā tataḥ kuntī pāṇḍuṃ parapurañjayam | pratyuvāca varārohā bhartuḥ priyahite ratā

ऐसा कहे जाने पर पति के प्रिय और हित में लगी रहने वाली सुन्दरी कुन्ती ने शत्रुओं के नगर जीतने वाले पाण्डु को उत्तर दिया।

कुन्त्युवाच

श्लोक 61 (1.128.61)

अधर्मः सुमहानेष स्त्रीणां भरतसत्तम । यत्प्रसादयते भर्ता प्रसाद्यः क्षत्रियर्षभ । शृणु चेदं महाबाहो मम प्रीतिकरं वचः ॥

adharmaḥ sumahāneṣa strīṇāṃ bharatasattama | yatprasādayate bhartā prasādyaḥ kṣatriyarṣabha | śṛṇu cedaṃ mahābāho mama prītikaraṃ vacaḥ

"हे भरतश्रेष्ठ, स्त्रियों के लिए यह बड़ा अधर्म है कि पति उन्हें मनाए, जबकि हे क्षत्रियश्रेष्ठ, प्रसन्न करने योग्य तो पति ही है। हे महाबाहो, अब मेरी यह बात सुनिए, जिसे कहते हुए मुझे प्रसन्नता है।"

श्लोक 62 (1.128.62)

पितृवेश्मन्यहं बाला नियुक्ताऽतिथिपूजने । उग्रं पर्यचरं तत्र ब्राह्मणं संशितव्रतम् ॥

pitṛveśmanyahaṃ bālā niyuktā'tithipūjane | ugraṃ paryacaraṃ tatra brāhmaṇaṃ saṃśitavratam

"जब मैं बालिका थी और पिता के घर में अतिथियों के सत्कार पर नियुक्त थी, तब मैंने वहाँ कठोर व्रत वाले एक उग्र ब्राह्मण की सेवा की,"

श्लोक 63 (1.128.63)

निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदुः । तमहं संशितात्मानं सर्वयत्नैरतोषयम् ॥

nigūḍhaniścayaṃ dharme yaṃ taṃ durvāsasaṃ viduḥ | tamahaṃ saṃśitātmānaṃ sarvayatnairatoṣayam

"जिनका धर्म-विषयक निश्चय गूढ़ रहता है और जिन्हें दुर्वासा के नाम से जाना जाता है। उन संयमी महात्मा को मैंने हर प्रकार के प्रयत्न से संतुष्ट किया।"

श्लोक 64 (1.128.64)

स मेऽभिचारसंयुक्तमाचष्ट भगवान्वरम् । मन्त्रं त्विमं च मे प्रादादब्रवीच्चैव मामिदम् ॥

sa me'bhicārasaṃyuktamācaṣṭa bhagavānvaram | mantraṃ tvimaṃ ca me prādādabravīccaiva māmidam

"उन भगवान ने मुझे आवाहन की शक्ति से युक्त वर दिया। उन्होंने मुझे यह मन्त्र दिया और मुझसे यह कहा,"

श्लोक 65 (1.128.65)

यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि । अकामो वा सकामो वा वशं ते समुपैष्यति ॥

yaṃ yaṃ devaṃ tvametena mantreṇāvāhayiṣyasi | akāmo vā sakāmo vā vaśaṃ te samupaiṣyati

"'इस मन्त्र से तुम जिस-जिस देवता का आवाहन करोगी, वह चाहे इच्छुक हो या अनिच्छुक, तुम्हारे वश में आ जाएगा।"

श्लोक 66 (1.128.66)

तस्य तस्य प्रसादात्ते राज्ञि पुत्रो भविष्यति । इत्युक्ताऽहं तदा तेन पितृवेश्मनि भारत ॥

tasya tasya prasādātte rājñi putro bhaviṣyati | ityuktā'haṃ tadā tena pitṛveśmani bhārata

"और हे रानी, उस-उस देवता की कृपा से तुम्हें पुत्र होगा।' हे भारत, उस समय पिता के घर में उन्होंने मुझसे ऐसा कहा था।"

श्लोक 67 (1.128.67)

ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तस्य कालोऽयमागतः । अनुज्ञाता त्वया देवमाह्वयेयमहं नृप ॥

brāhmaṇasya vacastathyaṃ tasya kālo'yamāgataḥ | anujñātā tvayā devamāhvayeyamahaṃ nṛpa

"उस ब्राह्मण का वचन सत्य था, और अब उसका समय आ गया है। हे राजन्, आपकी अनुमति हो तो मैं किसी देवता का आवाहन करूँ।"

श्लोक 68 (1.128.68)

यां मे विद्यां महाराज अददात्स महायशाः । तयाऽऽहूतः सुरः पुत्रं प्रदास्यति सुरोपमम् । अनपत्यकृतं यस्ते शोकं वीर विनेष्यति ॥

yāṃ me vidyāṃ mahārāja adadātsa mahāyaśāḥ | tayā''hūtaḥ suraḥ putraṃ pradāsyati suropamam | anapatyakṛtaṃ yaste śokaṃ vīra vineṣyati

"हे महाराज, उन महायशस्वी ने मुझे जो विद्या दी थी, उससे बुलाया गया कोई देवता आपको देवतुल्य पुत्र देगा, जो हे वीर, संतान न होने से उपजे आपके शोक को दूर कर देगा।"

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