आदि पर्व · अध्याय 129
युधिष्ठिर, भीम और दुर्योधन का जन्म
पाण्डु की अनुमति से कुन्ती दुर्वासा के मंत्र से धर्म का आवाहन करती है और युधिष्ठिर को जन्म देती है, जिसकी महिमा आकाशवाणी घोषित करती है। दो वर्ष बाद भी प्रसव न होने पर गान्धारी दुःख में अपने उदर पर आघात करती है और एक मांसपिण्ड को जन्म देती है, जिसे व्यास एक सौ एक गर्भों में बाँटकर घी के कुण्डों में रखवाते हैं। फिर पाण्डु के कहने पर कुन्ती वायु का आवाहन करती है और भीम का जन्म होता है, जो माता की गोद से गिरकर शिला को चूर-चूर कर देता है; उससे पहली रात भयानक अपशकुनों के बीच दुर्योधन जन्म लेता है, और धृतराष्ट्र उसे त्यागने की विदुर और ब्राह्मणों की सलाह नहीं मानते। अध्याय सौ पुत्रों, एक कन्या और वैश्या से उत्पन्न धृतराष्ट्र-पुत्र युयुत्सु के जन्म के साथ समाप्त होता है।
कुन्त्युवाच
श्लोक 1 (1.129.1)
अपत्यकाम एवं स्यान्ममापत्यं भवेदिति । विप्रं वा गुणसंपन्नं सर्वभूतहिते रतम् ॥
apatyakāma evaṃ syānmamāpatyaṃ bhavediti | vipraṃ vā guṇasaṃpannaṃ sarvabhūtahite ratam
यदि आप संतान चाहते हैं और सोचते हैं कि 'मुझे संतान हो', तो किसी देवता को, अथवा सद्गुणों से संपन्न और सब प्राणियों के हित में लगे किसी ब्राह्मण को चुनिए।
श्लोक 2 (1.129.2)
अनुजानीहि भद्रं ते दैवतं हि पतिः स्त्रियः । यं त्वं वक्ष्यसि धर्मज्ञ देवं ब्राह्मणमेव च ॥
anujānīhi bhadraṃ te daivataṃ hi patiḥ striyaḥ | yaṃ tvaṃ vakṣyasi dharmajña devaṃ brāhmaṇameva ca
आपका कल्याण हो, मुझे अनुमति दीजिए, क्योंकि स्त्री के लिए पति ही देवता है। हे धर्मज्ञ, आप जिस देवता या ब्राह्मण का नाम लेंगे,
श्लोक 3 (1.129.3)
यथोद्दिष्टं त्वया वीर तत्कर्तास्मि महाभुज । देवात्पुत्रफलं सद्यो विप्रात्कालान्तरे भवेत् ॥
yathoddiṣṭaṃ tvayā vīra tatkartāsmi mahābhuja | devātputraphalaṃ sadyo viprātkālāntare bhavet
हे वीर, हे महाबाहु, आप जैसा निर्देश देंगे, मैं वैसा ही करूँगी। देवता से पुत्र-रूपी फल तुरंत मिलता है, ब्राह्मण से कुछ समय बाद।
श्लोक 4 (1.129.4)
आवाहयामि कं देवं कदा वा भरतर्षभ । त्वत्त आज्ञां प्रतीक्षन्तीं विद्ध्यस्मिन्कर्मणीप्सिते ॥
āvāhayāmi kaṃ devaṃ kadā vā bharatarṣabha | tvatta ājñāṃ pratīkṣantīṃ viddhyasminkarmaṇīpsite
हे भरतश्रेष्ठ, मैं किस देवता का आवाहन करूँ, और कब? जान लीजिए कि इस अभीष्ट कार्य में मैं आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रही हूँ।
पाण्डुरुवाच
श्लोक 5 (1.129.5)
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि त्वं नो धात्री कुलस्य हि । नमो महर्षये तस्मै येन दत्तो वरस्तव ॥
dhanyo'smyanugṛhīto'smi tvaṃ no dhātrī kulasya hi | namo maharṣaye tasmai yena datto varastava
मैं धन्य हूँ, मुझ पर अनुग्रह हुआ है। तुम ही हमारे कुल को धारण करने वाली हो। उस महर्षि को नमस्कार, जिसने तुम्हें यह वर दिया।
श्लोक 6 (1.129.6)
न चाधर्मेण धर्मज्ञे शक्याः पालयितुं प्रजाः । तस्मात्त्वं पुत्रलाभाय सन्तानाय ममैव च ॥
na cādharmeṇa dharmajñe śakyāḥ pālayituṃ prajāḥ | tasmāttvaṃ putralābhāya santānāya mamaiva ca
हे धर्मज्ञे, अधर्म के द्वारा प्रजा का पालन नहीं किया जा सकता। इसलिए पुत्र-प्राप्ति के लिए और मेरे ही वंश को आगे बढ़ाने के लिए
श्लोक 7 (1.129.7)
प्रवरं सर्वदेवानां धर्ममावाहयाबले ॥
pravaraṃ sarvadevānāṃ dharmamāvāhayābale
हे अबले, सब देवताओं में श्रेष्ठ धर्म का आवाहन करो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (1.129.8)
पाण्डुना समनुज्ञाता भारतेन यशस्विना । मतिं चक्रे महाराज धर्मस्यावाहने तदा ॥
pāṇḍunā samanujñātā bhāratena yaśasvinā | matiṃ cakre mahārāja dharmasyāvāhane tadā
हे महाराज, यशस्वी भरतवंशी पाण्डु की अनुमति पाकर कुन्ती ने तब धर्म का आवाहन करने का निश्चय किया।
पाण्डुरुवाच
श्लोक 9 (1.129.9)
अद्यैव त्वं वरारोहे प्रयतस्व यथाविधि । धार्मिकश्च कुरूणां हि भविष्यति न संशयः ॥
adyaiva tvaṃ varārohe prayatasva yathāvidhi | dhārmikaśca kurūṇāṃ hi bhaviṣyati na saṃśayaḥ
हे सुन्दरी, आज ही विधिपूर्वक यह प्रयत्न करो। वह कुरुओं में धर्मात्मा होगा, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 10 (1.129.10)
दत्तस्य तस्य धर्मेण नाधर्मे रंस्यते मनः । धर्मादिकं हि धर्मज्ञे धर्मान्तं धर्ममध्यमम् ॥
dattasya tasya dharmeṇa nādharme raṃsyate manaḥ | dharmādikaṃ hi dharmajñe dharmāntaṃ dharmamadhyamam
धर्म के दिए हुए पुत्र का मन कभी अधर्म में नहीं रमेगा। हे धर्मज्ञे, जिस संतान का आदि, मध्य और अन्त धर्म ही हो,
श्लोक 11 (1.129.11)
अपत्यमिष्टं लोकेषु यशःकीर्तिविवर्धनम् । तस्माद्धर्मं पुरस्कृत्य नियता त्वं शुचिस्मिते ॥
apatyamiṣṭaṃ lokeṣu yaśaḥkīrtivivardhanam | tasmāddharmaṃ puraskṛtya niyatā tvaṃ śucismite
वही लोकों में प्रिय होती है और यश तथा कीर्ति बढ़ाती है। इसलिए हे मधुर मुस्कान वाली, धर्म को आगे रखकर, संयम से रहते हुए,
श्लोक 12 (1.129.12)
आकाराचारसंपन्ना भजस्वाराधय स्वयम् ॥
ākārācārasaṃpannā bhajasvārādhaya svayam
उचित आचार-व्यवहार से युक्त होकर तुम स्वयं उसकी उपासना करो और उसे प्रसन्न करो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (1.129.13)
सा तथोक्ता तथेत्युक्त्वा तेन भर्त्रा वराङ्गना । अभिवाद्याभ्यनुज्ञाता प्रदक्षिणमथाकरोत् ॥
sā tathoktā tathetyuktvā tena bhartrā varāṅganā | abhivādyābhyanujñātā pradakṣiṇamathākarot
पति के ऐसा कहने पर उस सुन्दरी ने 'ऐसा ही हो' कहा, और उन्हें प्रणाम करके, उनकी अनुमति लेकर, उनकी प्रदक्षिणा की।
श्लोक 14 (1.129.14)
संवत्सरोषिते गर्भे गान्धार्या जनमेजय । आजुहाव ततो धर्मं कुन्ती गर्भार्थमच्युतम् ॥
saṃvatsaroṣite garbhe gāndhāryā janamejaya | ājuhāva tato dharmaṃ kuntī garbhārthamacyutam
हे जनमेजय, जब गान्धारी का गर्भ एक वर्ष का हो चुका था, तब कुन्ती ने गर्भ-प्राप्ति के लिए अच्युत धर्म का आवाहन किया।
श्लोक 15 (1.129.15)
सा बलिं त्वरिता देवी धर्मायोपजहार ह । जजाप विधिवज्जप्यं दत्तं दुर्वाससा पुरा ॥
sā baliṃ tvaritā devī dharmāyopajahāra ha | jajāpa vidhivajjapyaṃ dattaṃ durvāsasā purā
देवी कुन्ती ने शीघ्र ही धर्म को बलि अर्पित की और दुर्वासा द्वारा पहले दिए गए मंत्र का विधिपूर्वक जप किया।
श्लोक 16 (1.129.16)
जानन्ती धर्ममग्र्यं वै धर्मं वशमुपानयत् । आहूतो नियमात्कुन्त्या सर्वभूतनमस्कृतः ॥
jānantī dharmamagryaṃ vai dharmaṃ vaśamupānayat | āhūto niyamātkuntyā sarvabhūtanamaskṛtaḥ
धर्म को सर्वश्रेष्ठ जानकर उसने धर्म को अपने वश में किया। कुन्ती के नियमपूर्वक बुलाने पर, सब प्राणियों द्वारा वन्दित
श्लोक 17 (1.129.17)
आजगाम ततो देवीं धर्मो मन्त्रबलात्ततः । विमाने सूर्यसङ्काशे कुन्ती यत्र जपस्थिता ॥
ājagāma tato devīṃ dharmo mantrabalāttataḥ | vimāne sūryasaṅkāśe kuntī yatra japasthitā
धर्म तब मंत्र के बल से खिंचकर सूर्य के समान चमकते विमान में उस स्थान पर आए, जहाँ कुन्ती जप कर रही थी।
श्लोक 18 (1.129.18)
ददृशे भगवान्धर्मः सन्तानार्थाय पाण्डवे । विहस्य तां ततो ब्रूयाः कुन्ति किं ते ददाम्यहम् । सा तं विहस्यमानापि पुत्रं देह्यब्रवीदिदम् ॥
dadṛśe bhagavāndharmaḥ santānārthāya pāṇḍave | vihasya tāṃ tato brūyāḥ kunti kiṃ te dadāmyaham | sā taṃ vihasyamānāpi putraṃ dehyabravīdidam
भगवान धर्म पाण्डु की संतान के निमित्त प्रकट हुए। मुस्कुराकर उन्होंने उससे कहा — 'कुन्ती, मैं तुम्हें क्या दूँ?' उनके मुस्कुराने पर भी उसने यही कहा — 'मुझे पुत्र दीजिए।'
श्लोक 19 (1.129.19)
तस्मिन्बहुमृगेऽरण्ये शतशृङ्गे नगोत्तमे । पाण्डोरर्थे महाभागा कुन्ती धर्ममुपागमत् ॥
tasminbahumṛge'raṇye śataśṛṅge nagottame | pāṇḍorarthe mahābhāgā kuntī dharmamupāgamat
उस बहुत-से मृगों वाले वन में, पर्वतश्रेष्ठ शतशृंग पर, महाभागा कुन्ती पाण्डु के लिए धर्म के पास गई।
श्लोक 20 (1.129.20)
ऋतुकाले शुचिः स्नाता शुक्लवस्त्रा यशस्विनी । शय्यां जग्राह सुश्रोणी सह धर्मेण सुव्रता ॥
ṛtukāle śuciḥ snātā śuklavastrā yaśasvinī | śayyāṃ jagrāha suśroṇī saha dharmeṇa suvratā
ऋतुकाल में पवित्र होकर, स्नान करके, श्वेत वस्त्र पहने, वह यशस्विनी, सुन्दर कटि वाली, व्रतपरायण स्त्री धर्म के साथ शय्या पर गई।
श्लोक 21 (1.129.21)
धर्मेण सह संगम्य योगमूर्तिधरेण सा । लेभे पुत्रं महाबाहुं सर्वप्राणभृतां वरम् ॥
dharmeṇa saha saṃgamya yogamūrtidhareṇa sā | lebhe putraṃ mahābāhuṃ sarvaprāṇabhṛtāṃ varam
योगबल से शरीर धारण करने वाले धर्म से मिलकर उसने एक महाबाहु पुत्र पाया, जो सब प्राणियों में श्रेष्ठ था।
श्लोक 22 (1.129.22)
ऐन्द्रे चन्द्रमसा युक्ते मुहूर्तेऽभिजितेऽष्टमे । दिवा मध्यगते सूर्ये तिथौ पूर्णे हि पूजिते ॥
aindre candramasā yukte muhūrte'bhijite'ṣṭame | divā madhyagate sūrye tithau pūrṇe hi pūjite
जब चन्द्रमा इन्द्र के नक्षत्र (ज्येष्ठा) में था, आठवें मुहूर्त अभिजित् में, दिन के मध्य जब सूर्य आकाश के बीच था, पूर्णा नामक पूजनीय तिथि को,
श्लोक 23 (1.129.23)
समृद्धयशसं कुन्ती सुषाव प्रवरं सुतम् । जातमात्रे सुते तस्मिन्वागुवाचाशरीरिणी ॥
samṛddhayaśasaṃ kuntī suṣāva pravaraṃ sutam | jātamātre sute tasminvāguvācāśarīriṇī
कुन्ती ने महान यश वाले एक श्रेष्ठ पुत्र को जन्म दिया। उस पुत्र के जन्म लेते ही आकाशवाणी हुई —
श्लोक 24 (1.129.24)
एष धर्मभृतां श्रेष्ठो भविष्यति नरोत्तमः । विक्रान्तः सत्यवाक्चैव राजा पृथ्व्यां भविष्यति ॥
eṣa dharmabhṛtāṃ śreṣṭho bhaviṣyati narottamaḥ | vikrāntaḥ satyavākcaiva rājā pṛthvyāṃ bhaviṣyati
"यह नरश्रेष्ठ धर्मधारियों में सर्वश्रेष्ठ होगा। पराक्रमी और सत्यवादी यह पृथ्वी का राजा होगा।
श्लोक 25 (1.129.25)
युधिष्ठिर इति ख्यातः पाण्डोः प्रथमजः सुतः । भविता प्रथितो राजा त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । यशसा तेजसा चैव वृत्तेन च समन्वितः ॥
yudhiṣṭhira iti khyātaḥ pāṇḍoḥ prathamajaḥ sutaḥ | bhavitā prathito rājā triṣu lokeṣu viśrutaḥ | yaśasā tejasā caiva vṛttena ca samanvitaḥ
युधिष्ठिर नाम से विख्यात पाण्डु का यह प्रथम पुत्र प्रसिद्ध राजा होगा, तीनों लोकों में विख्यात, और यश, तेज तथा सदाचार से संपन्न।"
श्लोक 26 (1.129.26)
संवत्सरे द्वितीये तु गान्धार्या उदरं महत् । न च प्राजायत तदा ततस्तां दुःखमाविशत् ॥
saṃvatsare dvitīye tu gāndhāryā udaraṃ mahat | na ca prājāyata tadā tatastāṃ duḥkhamāviśat
दूसरे वर्ष में गान्धारी का उदर बहुत बढ़ गया था, फिर भी प्रसव नहीं हुआ, और तब उसे दुःख ने घेर लिया।
श्लोक 27 (1.129.27)
श्रुत्वा कुन्तीसुतं जातं बालार्कसमतेजसम् । उदरस्यात्मनः स्थैर्यमुपालभ्य च सौबली ॥
śrutvā kuntīsutaṃ jātaṃ bālārkasamatejasam | udarasyātmanaḥ sthairyamupālabhya ca saubalī
यह सुनकर कि कुन्ती के बालसूर्य के समान तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ है, सुबल की पुत्री ने अपने गर्भ की निश्चलता को कोसते हुए,
श्लोक 28 (1.129.28)
कौरवस्यापरिज्ञातं यत्नेन महता स्वयम् । उदरं घातयामास गान्धारी शोकमूर्छिता ॥
kauravasyāparijñātaṃ yatnena mahatā svayam | udaraṃ ghātayāmāsa gāndhārī śokamūrchitā
कौरव (धृतराष्ट्र) को बताए बिना, स्वयं बड़े प्रयत्न से, शोक से मूर्छित गान्धारी ने अपने उदर पर आघात किया।
श्लोक 29 (1.129.29)
ततो जज्ञे मांसपेशी लोहाष्ठीलेव संहता । द्विवर्षसंभृता कुक्षौ तामुत्स्रष्टुं प्रचक्रमे ॥
tato jajñe māṃsapeśī lohāṣṭhīleva saṃhatā | dvivarṣasaṃbhṛtā kukṣau tāmutsraṣṭuṃ pracakrame
तब लोहे के गोले के समान कठोर एक मांसपिण्ड उत्पन्न हुआ। दो वर्ष तक गर्भ में धारण किए उस पिण्ड को वह फेंकने लगी।
श्लोक 30 (1.129.30)
अथ द्वैपायनो ज्ञात्वा त्वरितः समुपागमत् । तां स मांसमयीं पेशीं ददर्श जपतां वरः ॥
atha dvaipāyano jñātvā tvaritaḥ samupāgamat | tāṃ sa māṃsamayīṃ peśīṃ dadarśa japatāṃ varaḥ
तब द्वैपायन यह जानकर शीघ्र वहाँ पहुँचे। जप करने वालों में श्रेष्ठ उन मुनि ने वह मांसपिण्ड देखा।
श्लोक 31 (1.129.31)
ततोऽवदत्सौबलेयीं किमिदं ते चिकीर्षितम् । सा चात्मनो मतं सर्वं शशंस परमर्षये ॥
tato'vadatsaubaleyīṃ kimidaṃ te cikīrṣitam | sā cātmano mataṃ sarvaṃ śaśaṃsa paramarṣaye
उन्होंने सुबलपुत्री से कहा — 'तुम यह क्या करना चाहती हो?' और उसने महर्षि को अपने मन की सारी बात बता दी।
गान्धार्युवाच
श्लोक 32 (1.129.32)
ज्येष्ठं कुन्तीसुतं जातं श्रुत्वा रविसमप्रभम् । दुःखेन परमेणेदमुदरं घातितं मया ॥
jyeṣṭhaṃ kuntīsutaṃ jātaṃ śrutvā ravisamaprabham | duḥkhena parameṇedamudaraṃ ghātitaṃ mayā
"जब मैंने सुना कि कुन्ती का सूर्य के समान प्रभावान ज्येष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ है, तो अत्यन्त दुःख से मैंने अपने इस उदर पर आघात किया।
श्लोक 33 (1.129.33)
शतं च किल पुत्राणां वितीर्णं मे त्वया पुरा । इयं च मे मांसपेशी जाता पुत्रशताय वै ॥
śataṃ ca kila putrāṇāṃ vitīrṇaṃ me tvayā purā | iyaṃ ca me māṃsapeśī jātā putraśatāya vai
आपने पहले मुझे सौ पुत्रों का वर दिया था, और सौ पुत्रों के स्थान पर मुझे यह मांसपिण्ड उत्पन्न हुआ है।"
व्यास उवाच
श्लोक 34 (1.129.34)
एवमेतत्सौबलेयि नैतज्जात्वन्यथा भवेत् । वितथं नोक्तपूर्वं मे स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ॥
evametatsaubaleyi naitajjātvanyathā bhavet | vitathaṃ noktapūrvaṃ me svaireṣvapi kuto'nyathā
"हे सुबलपुत्री, यह वैसा ही होगा; यह कभी अन्यथा नहीं हो सकता। मैंने हँसी में भी कभी झूठ नहीं कहा, फिर यह अन्यथा कैसे होगा?
श्लोक 35 (1.129.35)
घृतपूर्णं कुण्डशतं क्षिप्रमेव विधीयताम् । सुगुप्तेषु च देशेषु रक्षा चैव विधीयताम् ॥
ghṛtapūrṇaṃ kuṇḍaśataṃ kṣiprameva vidhīyatām | sugupteṣu ca deśeṣu rakṣā caiva vidhīyatām
शीघ्र ही घी से भरे सौ कुण्ड तैयार करवाओ, और उन्हें छिपे हुए सुरक्षित स्थानों में रखकर उनकी रक्षा का प्रबंध करो।
श्लोक 36 (1.129.36)
शीताभिरद्भिरष्ठीलामिमां च परिषिञ्चय ॥
śītābhiradbhiraṣṭhīlāmimāṃ ca pariṣiñcaya
और इस पिण्ड को शीतल जल से सींचो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 37 (1.129.37)
सा सिच्यमाना ह्यष्ठीला ह्यभवच्छतधा तदा । अङ्गुष्ठपर्वमात्राणां गर्भाणां तत्क्षणं तथा ॥
sā sicyamānā hyaṣṭhīlā hyabhavacchatadhā tadā | aṅguṣṭhaparvamātrāṇāṃ garbhāṇāṃ tatkṣaṇaṃ tathā
सींचे जाने पर वह पिण्ड उसी क्षण सौ भागों में बँट गया — अँगूठे के पोर जितने बड़े गर्भों में —
श्लोक 38 (1.129.38)
एकाधिकशतं पूर्णं यथायोगं विशांपते । ततः कुण्डशतं तत्र आनाय्य तु महानृषिः ॥
ekādhikaśataṃ pūrṇaṃ yathāyogaṃ viśāṃpate | tataḥ kuṇḍaśataṃ tatra ānāyya tu mahānṛṣiḥ
हे प्रजानाथ, यथायोग्य पूरे एक सौ एक। तब महर्षि ने वहाँ सौ कुण्ड मँगवाए,
श्लोक 39 (1.129.39)
मांसपेश्यास्तदा राजन्क्रमशः कालपर्ययात् । ततस्तांस्तेषु कुण्डेषु गर्भान्सर्वान्समादधत् ॥
māṃsapeśyāstadā rājankramaśaḥ kālaparyayāt | tatastāṃsteṣu kuṇḍeṣu garbhānsarvānsamādadhat
और हे राजन्, क्रम से, समय के अनुसार, उन्होंने मांसपिण्ड से निकले सब गर्भों को उन कुण्डों में रख दिया।
श्लोक 40 (1.129.40)
स्वनुगुप्तेषु देशेषु रक्षां चैषां व्यधापयत् । शशास चैव कृष्णो वै गर्भाणां रक्षणं तथा ॥
svanugupteṣu deśeṣu rakṣāṃ caiṣāṃ vyadhāpayat | śaśāsa caiva kṛṣṇo vai garbhāṇāṃ rakṣaṇaṃ tathā
उन्होंने उन्हें सुरक्षित स्थानों में रखवाकर उनकी रक्षा का प्रबंध कराया, और कृष्णद्वैपायन ने गर्भों की रक्षा के लिए निर्देश भी दिए।
श्लोक 41 (1.129.41)
उवाच चैनां भगवान्कालेनैतावता पुनः । स्फुटमानेषु कुण्डेषु जाताञ्जानीहि शोभने ॥
uvāca caināṃ bhagavānkālenaitāvatā punaḥ | sphuṭamāneṣu kuṇḍeṣu jātāñjānīhi śobhane
और भगवान ने उससे कहा — 'हे शोभने, फिर इतना ही समय बीतने पर, जब कुण्ड फटने लगें, तब जानना कि वे जन्म ले चुके हैं।'
श्लोक 42 (1.129.42)
उद्घाटनीयान्येतानि कुण्डानीति च सौबलीम् । इत्युक्त्वा भगवान्व्यासस्तथा प्रतिविधाय च ॥
udghāṭanīyānyetāni kuṇḍānīti ca saubalīm | ityuktvā bhagavānvyāsastathā pratividhāya ca
उन्होंने सुबलपुत्री से कहा कि तब इन कुण्डों को खोलना चाहिए। यह कहकर और सब व्यवस्था करके भगवान व्यास,
श्लोक 43 (1.129.43)
जगाम तपसे धीमान्हिमवन्तं शिलोच्चयम् । अह्नोत्तराः कुमारास्ते कुण्डेभ्यस्तु समुत्थिताः ॥
jagāma tapase dhīmānhimavantaṃ śiloccayam | ahnottarāḥ kumārāste kuṇḍebhyastu samutthitāḥ
वे बुद्धिमान मुनि तप करने के लिए हिमालय पर्वत पर चले गए। राजकुमार दिन-प्रतिदिन एक-एक करके उन कुण्डों से निकले,
श्लोक 44 (1.129.44)
तेनैवैषां क्रमेणासीज्ज्येष्ठानुज्येष्ठता तदा । जन्मतश्च प्रमाणेन ज्येष्ठः कुन्तीसुतोऽभवत् ॥
tenaivaiṣāṃ krameṇāsījjyeṣṭhānujyeṣṭhatā tadā | janmataśca pramāṇena jyeṣṭhaḥ kuntīsuto'bhavat
और उसी क्रम से उनमें बड़े-छोटे का क्रम निश्चित हुआ। किन्तु जन्म के प्रमाण से कुन्ती का पुत्र ही सबसे ज्येष्ठ था।
श्लोक 45 (1.129.45)
धार्मिकं च सुतं दृष्ट्वा पाण्डुः कुन्तीमथाऽब्रवीत् । प्राहुः क्षत्रं बलज्येष्ठं बलज्येष्ठं सुतं वृणु ॥
dhārmikaṃ ca sutaṃ dṛṣṭvā pāṇḍuḥ kuntīmathā'bravīt | prāhuḥ kṣatraṃ balajyeṣṭhaṃ balajyeṣṭhaṃ sutaṃ vṛṇu
धर्मात्मा पुत्र को देखकर पाण्डु ने कुन्ती से कहा — 'कहते हैं कि क्षत्रिय बल में श्रेष्ठ होता है; इसलिए बल में श्रेष्ठ पुत्र का वरण करो।'
श्लोक 46 (1.129.46)
ततः कुन्तीमभिक्रम्य शशासातीव भारत । वायुमावाहयस्वेति स देवो बलवत्तरः ॥
tataḥ kuntīmabhikramya śaśāsātīva bhārata | vāyumāvāhayasveti sa devo balavattaraḥ
हे भारत, तब उन्होंने कुन्ती के पास जाकर उसे आग्रहपूर्वक समझाया — 'वायु का आवाहन करो, वह देवता अधिक बलवान है।'
पाण्डुरुवाच
श्लोक 47 (1.129.47)
अश्वमेधः क्रतुश्रेष्ठो ज्योतिःश्रेष्ठो दिवाकरः । ब्राह्मणो द्विपदां श्रेष्ठो देवश्रेष्ठश्च मारुतः ॥
aśvamedhaḥ kratuśreṣṭho jyotiḥśreṣṭho divākaraḥ | brāhmaṇo dvipadāṃ śreṣṭho devaśreṣṭhaśca mārutaḥ
"अश्वमेध यज्ञों में श्रेष्ठ है, सूर्य ज्योतियों में श्रेष्ठ है, ब्राह्मण मनुष्यों में श्रेष्ठ है, और वायु देवताओं में श्रेष्ठ है।
श्लोक 48 (1.129.48)
मारुतं मरुतां श्रेष्ठं सर्वप्राणिभिरीडितम् । आवाहय त्वं नियमात्पुत्रार्थं वरवर्णिनि ॥
mārutaṃ marutāṃ śreṣṭhaṃ sarvaprāṇibhirīḍitam | āvāhaya tvaṃ niyamātputrārthaṃ varavarṇini
हे सुन्दरी, सब प्राणियों द्वारा स्तुत, मरुतों में श्रेष्ठ वायु का नियमपूर्वक पुत्र के लिए आवाहन करो।
श्लोक 49 (1.129.49)
स नो यं दास्यति सुतं स प्राणबलवान्नृषु । भविष्यति वरारोहे बलज्येष्ठा हि भूमिपाः ॥
sa no yaṃ dāsyati sutaṃ sa prāṇabalavānnṛṣu | bhaviṣyati varārohe balajyeṣṭhā hi bhūmipāḥ
हे वरारोहे, वह हमें जो पुत्र देगा, वह मनुष्यों में प्राणबल से सबसे बलवान होगा, क्योंकि राजाओं को बल में श्रेष्ठ होना चाहिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 50 (1.129.50)
तथोक्तवति सा काले वायुमेवाजुहाव ह । द्वितीयेनोपहारेण तेनोक्तविधिना पुनः ॥
tathoktavati sā kāle vāyumevājuhāva ha | dvitīyenopahāreṇa tenoktavidhinā punaḥ
उनके ऐसा कहने पर उसने उचित समय पर, दूसरी भेंट के साथ, पहले बताई गई विधि से वायु का आवाहन किया।
श्लोक 51 (1.129.51)
तैरेव नियमैः स्थित्वा मन्त्रग्राममुदैरयत् । आजगाम ततो वायुः किं करोमीति चाब्रवीत् ॥
taireva niyamaiḥ sthitvā mantragrāmamudairayat | ājagāma tato vāyuḥ kiṃ karomīti cābravīt
उन्हीं नियमों का पालन करते हुए उसने मंत्र-समूह का उच्चारण किया। तब वायु आए और बोले — 'मैं क्या करूँ?'
श्लोक 52 (1.129.52)
लज्जान्विता ततः कुन्ती पुत्रमैच्छन्महाबलम् । तथास्त्विति च तां वायुः समालभ्य दिवं गतः ॥
lajjānvitā tataḥ kuntī putramaicchanmahābalam | tathāstviti ca tāṃ vāyuḥ samālabhya divaṃ gataḥ
तब कुन्ती ने लज्जा से भरकर महाबलवान पुत्र की इच्छा की। 'ऐसा ही हो' कहकर वायु ने उसका आलिंगन किया और स्वर्ग लौट गए।
श्लोक 53 (1.129.53)
तस्यां जज्ञे महावीर्यो भीमो भीमपराक्रमः । तमप्यतिबलं जातं वागुवाचाशरीरिणी ॥
tasyāṃ jajñe mahāvīryo bhīmo bhīmaparākramaḥ | tamapyatibalaṃ jātaṃ vāguvācāśarīriṇī
उससे महापराक्रमी, भयंकर पराक्रम वाले भीम का जन्म हुआ। उस अत्यन्त बलवान बालक के जन्म पर भी आकाशवाणी हुई —
श्लोक 54 (1.129.54)
सर्वेषां बलिनां श्रेष्ठो जातोऽयमिति भारत । जातमात्रे कुमारे तु सर्वलोकस्य पार्थिवाः ॥
sarveṣāṃ balināṃ śreṣṭho jāto'yamiti bhārata | jātamātre kumāre tu sarvalokasya pārthivāḥ
'यह जो जन्मा है, सब बलवानों में श्रेष्ठ है,' हे भारत। उस राजकुमार के जन्म लेते ही संसार के सब राजा
श्लोक 55 (1.129.55)
मूत्रं प्रसुस्रुवुः सर्वे व्यथां चापि प्रपेदिरे । वाहनानि व्यशीर्यन्त व्यमुञ्चन्नश्रुबिन्दवः ॥
mūtraṃ prasusruvuḥ sarve vyathāṃ cāpi prapedire | vāhanāni vyaśīryanta vyamuñcannaśrubindavaḥ
भय से मूत्र त्यागने लगे और व्याकुल हो गए; उनके वाहन टूट-फूट गए, और उनकी आँखों से आँसू गिरने लगे।
श्लोक 56 (1.129.56)
यथाऽनिलः समुद्भूतः समर्थः कम्पने भुवः । तथा ह्युपचिताङ्गो वै भीमो भीमपराक्रमः ॥
yathā'nilaḥ samudbhūtaḥ samarthaḥ kampane bhuvaḥ | tathā hyupacitāṅgo vai bhīmo bhīmaparākramaḥ
जैसे उठी हुई वायु पृथ्वी को कँपा देने में समर्थ होती है, वैसे ही भयंकर पराक्रमी भीम पुष्ट अंगों वाले थे।
श्लोक 57 (1.129.57)
इदं चाद्भुतमत्रासीज्जातमात्रे वृकोदरे । यदङ्कात्पतितो मातुः शिलां गात्रैरचूर्णयत् ॥
idaṃ cādbhutamatrāsījjātamātre vṛkodare | yadaṅkātpatito mātuḥ śilāṃ gātrairacūrṇayat
वृकोदर के जन्म के कुछ ही समय बाद यह अद्भुत घटना भी हुई कि माता की गोद से गिरकर उसने अपने शरीर से एक शिला को चूर-चूर कर दिया।
श्लोक 58 (1.129.58)
कुन्ती तु सह पुत्रेण याता सुरुचिरं सरः । स्नात्वा च सुतमादाय दशमेऽहनि यादवी ॥
kuntī tu saha putreṇa yātā suruciraṃ saraḥ | snātvā ca sutamādāya daśame'hani yādavī
कुन्ती अपने पुत्र के साथ एक सुन्दर सरोवर पर गई थी। दसवें दिन स्नान करके, पुत्र को गोद में लेकर, वह यदुवंशी
श्लोक 59 (1.129.59)
दैवतान्यर्चयिष्यन्ती निर्जगामाश्रमात्पृथा । शैलाभ्याशेन गच्छन्त्यास्तदा भरतसत्तम ॥
daivatānyarcayiṣyantī nirjagāmāśramātpṛthā | śailābhyāśena gacchantyāstadā bharatasattama
पृथा देवताओं की पूजा करने के लिए आश्रम से निकली। हे भरतश्रेष्ठ, जब वह पर्वत के पास से जा रही थी,
श्लोक 60 (1.129.60)
निश्चक्राम महाव्याघ्रो जिघांसुर्गिरिगह्वरात् । तमापतन्तं शार्दूलं विकृष्य धनुरुत्तमम् ॥
niścakrāma mahāvyāghro jighāṃsurgirigahvarāt | tamāpatantaṃ śārdūlaṃ vikṛṣya dhanuruttamam
तब एक विशाल बाघ मारने की इच्छा से पर्वत की गुफा से निकला। उस झपटते बाघ को देखकर पाण्डु ने अपना उत्तम धनुष खींचा
श्लोक 61 (1.129.61)
निर्बिभेद शरैः पाण्डुस्त्रिभिस्त्रिदशविक्रमः । नादेन महता तां तु पूरयन्तं गिरेर्गुहाम् ॥
nirbibheda śaraiḥ pāṇḍustribhistridaśavikramaḥ | nādena mahatā tāṃ tu pūrayantaṃ girerguhām
और देवताओं के समान पराक्रम वाले पाण्डु ने तीन बाणों से उसे बींध दिया। उसे अपनी भारी गर्जना से पर्वत की गुफा को गुँजाते देखकर
श्लोक 62 (1.129.62)
दृष्ट्वा शैलमुपारोढुमैच्छत्कुन्ती भयात्तदा । त्रासात्तस्याः सुतस्त्वङ्कात्पपात भरतर्षभ ॥
dṛṣṭvā śailamupāroḍhumaicchatkuntī bhayāttadā | trāsāttasyāḥ sutastvaṅkātpapāta bharatarṣabha
कुन्ती ने भय से पर्वत पर चढ़ना चाहा। हे भरतश्रेष्ठ, उसकी घबराहट में पुत्र उसकी गोद से गिर पड़ा।
श्लोक 63 (1.129.63)
पर्वतस्योपरिस्थायामधस्तादपतच्छिशुः । स शिलां चूर्णयामास वज्रवद्वज्रिचोदितः ॥
parvatasyoparisthāyāmadhastādapatacchiśuḥ | sa śilāṃ cūrṇayāmāsa vajravadvajricoditaḥ
पर्वत के ऊपर खड़ी माता की गोद से बालक नीचे गिरा, और उसने इन्द्र के चलाए वज्र की भाँति शिला को चूर-चूर कर दिया।
श्लोक 64 (1.129.64)
पुत्रस्नेहात्ततः पाण्डुरभ्यधावद्गिरेस्तटम् । पतता तेन शतधा शिला गात्रैर्विचूर्णिता ॥
putrasnehāttataḥ pāṇḍurabhyadhāvadgirestaṭam | patatā tena śatadhā śilā gātrairvicūrṇitā
पुत्र-स्नेह से पाण्डु पर्वत की ढलान की ओर दौड़े। गिरते हुए उस बालक के शरीर से शिला के सौ टुकड़े हो गए थे।
श्लोक 65 (1.129.65)
शिलां च चूर्णितां दृष्ट्वा परं विस्मयमागमत् । स तु जन्मनि भीमस्य विनदन्तं विनादितम् ॥
śilāṃ ca cūrṇitāṃ dṛṣṭvā paraṃ vismayamāgamat | sa tu janmani bhīmasya vinadantaṃ vināditam
शिला को चूर-चूर हुआ देखकर वे अत्यन्त विस्मित हुए। भीम के जन्म के समय उन्होंने
श्लोक 66 (1.129.66)
ददर्श गिरिशृङ्गस्थं व्याघ्रं व्याघ्रपराक्रमः । दारसंरक्षणार्थाय पुत्रसंरक्षणाय च ॥
dadarśa giriśṛṅgasthaṃ vyāghraṃ vyāghraparākramaḥ | dārasaṃrakṣaṇārthāya putrasaṃrakṣaṇāya ca
पर्वत-शिखर पर ज़ोर से गरजते हुए बाघ को देखा था; इसलिए बाघ के समान पराक्रम वाले वे पत्नी और पुत्र की रक्षा के लिए
श्लोक 67 (1.129.67)
सदा बाणधनुष्पाणिरभवत्कुरुनन्दनः । मघे चन्द्रमसा युक्ते सिंहे चाभ्युदिते गुरौ ॥
sadā bāṇadhanuṣpāṇirabhavatkurunandanaḥ | maghe candramasā yukte siṃhe cābhyudite gurau
कुरुनन्दन पाण्डु सदा धनुष-बाण हाथ में लिए रहते थे। जब चन्द्रमा मघा नक्षत्र में था और बृहस्पति सिंह राशि में उदित थे,
श्लोक 68 (1.129.68)
दिवा मध्यगते सूर्ये तिथौ पुण्ये त्रयोदशे । पित्र्ये मुहूर्ते सा कुन्ती सुषुवे भीममच्युतम् ॥
divā madhyagate sūrye tithau puṇye trayodaśe | pitrye muhūrte sā kuntī suṣuve bhīmamacyutam
दिन के मध्य जब सूर्य आकाश के बीच था, पवित्र त्रयोदशी तिथि को, पितरों के मुहूर्त में कुन्ती ने अच्युत भीम को जन्म दिया।
श्लोक 69 (1.129.69)
यस्मिन्नहनि भीमस्तु जज्ञे भीमपराक्रमः । तामेव रात्रिं पूर्वां तु जज्ञे दुर्योधनो नृपः ॥
yasminnahani bhīmastu jajñe bhīmaparākramaḥ | tāmeva rātriṃ pūrvāṃ tu jajñe duryodhano nṛpaḥ
जिस दिन भयंकर पराक्रमी भीम का जन्म हुआ, उसी दिन की पिछली रात को राजा दुर्योधन का जन्म हुआ था।
श्लोक 70 (1.129.70)
स जातमात्र एवाथ धृतराष्ट्रसुतो नृप । रासभारावसदृशं रुराव च ननाद च ॥
sa jātamātra evātha dhṛtarāṣṭrasuto nṛpa | rāsabhārāvasadṛśaṃ rurāva ca nanāda ca
हे राजन्, जन्म लेते ही धृतराष्ट्र का वह पुत्र गधे के रेंकने जैसी आवाज़ में रोया और चिल्लाया।
श्लोक 71 (1.129.71)
तं खराः प्रत्यभाषन्त गृध्रगोमायुवायसाः । क्रव्यादाः प्राणदन्घोराः शिवाश्चाशिवनिस्वनाः ॥
taṃ kharāḥ pratyabhāṣanta gṛdhragomāyuvāyasāḥ | kravyādāḥ prāṇadanghorāḥ śivāścāśivanisvanāḥ
उसके उत्तर में गधे, गिद्ध, गीदड़ और कौए बोलने लगे; भयानक मांसभक्षी जीव चिल्लाने लगे और सियारिनें अमंगल स्वर में रोने लगीं।
श्लोक 72 (1.129.72)
वाताश्च प्रववुश्चापि दिग्दाहश्चाभवत्तदा । ततस्तु भीतवद्राजा धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ॥
vātāśca pravavuścāpi digdāhaścābhavattadā | tatastu bhītavadrājā dhṛtarāṣṭro'bravīdidam
प्रचण्ड हवाएँ चलने लगीं और दिशाएँ जलती-सी दिखने लगीं। तब राजा धृतराष्ट्र ने मानो भयभीत होकर यह कहा,
श्लोक 73 (1.129.73)
समानीय बहून्विप्रान्भीष्मं विदुरमेव च । अन्यांश्च सुहृदो राजन्कुरून्सर्वांस्तथैव च ॥
samānīya bahūnviprānbhīṣmaṃ vidurameva ca | anyāṃśca suhṛdo rājankurūnsarvāṃstathaiva ca
बहुत-से ब्राह्मणों, भीष्म, विदुर, अन्य सुहृदों तथा सब कुरुओं को बुलाकर, हे राजन्:
श्लोक 74 (1.129.74)
युधिष्ठिरो राजपुत्रो ज्येष्ठो नः कुलवर्धनः । प्राप्तः स्वगुणतो राज्यं न तस्मिन्वाच्यमस्तिनः ॥
yudhiṣṭhiro rājaputro jyeṣṭho naḥ kulavardhanaḥ | prāptaḥ svaguṇato rājyaṃ na tasminvācyamastinaḥ
"राजकुमार युधिष्ठिर हमारे कुल को बढ़ाने वाला ज्येष्ठ पुत्र है। अपने गुणों से उसने राज्य पा लिया है; उसके विषय में हमें कुछ नहीं कहना।
श्लोक 75 (1.129.75)
अयं त्वनन्तरस्तस्मादपि राजा भविष्यति । एतद्विब्रूत मे तथ्यं यदत्र भविता ध्रुवम् ॥
ayaṃ tvanantarastasmādapi rājā bhaviṣyati | etadvibrūta me tathyaṃ yadatra bhavitā dhruvam
किन्तु क्या यह, जो उसके ठीक बाद जन्मा है, वह भी राजा होगा? इस विषय में जो निश्चित होने वाला है, वह मुझे सच-सच बताओ।
श्लोक 76 (1.129.76)
अस्मिञ्जाते निमित्तानि शंसन्ति हाशिवं महत् । अतो ब्रवीमि विदुर द्रुतं मां भयमाविशत् ॥
asmiñjāte nimittāni śaṃsanti hāśivaṃ mahat | ato bravīmi vidura drutaṃ māṃ bhayamāviśat
इसके जन्म पर होने वाले अपशकुन बड़े अनिष्ट की सूचना दे रहे हैं। इसीलिए, हे विदुर, मैं कहता हूँ — मुझे सहसा भय ने घेर लिया है।"
श्लोक 77 (1.129.77)
वाक्यस्यैतस्य निधने दिक्षु सर्वासु भारत । क्रव्यादाः प्राणदन्घोराः शिवाश्चाशिवनिस्वनाः ॥
vākyasyaitasya nidhane dikṣu sarvāsu bhārata | kravyādāḥ prāṇadanghorāḥ śivāścāśivanisvanāḥ
हे भारत, इन वचनों के समाप्त होते ही सब दिशाओं में भयानक मांसभक्षी जीव चिल्लाने लगे और सियार अमंगल स्वर में रोने लगे।
श्लोक 78 (1.129.78)
लक्षयित्वा निमित्तानि तानि घोराणि सर्वशः । तेऽब्रुवन्ब्राह्मणा राजन्विदुरश्च महामतिः ॥
lakṣayitvā nimittāni tāni ghorāṇi sarvaśaḥ | te'bruvanbrāhmaṇā rājanviduraśca mahāmatiḥ
हे राजन्, उन सब भयानक अपशकुनों को देखकर ब्राह्मणों ने और महाबुद्धिमान विदुर ने कहा —
श्लोक 79 (1.129.79)
यथेमानि निमित्तानि घोराणि मनुजाधिप । उत्थितानि सुते जाते ज्येष्ठे ते पुरुषर्षभ ॥
yathemāni nimittāni ghorāṇi manujādhipa | utthitāni sute jāte jyeṣṭhe te puruṣarṣabha
"हे नरेश, हे पुरुषश्रेष्ठ, आपके ज्येष्ठ पुत्र के जन्म पर जैसे ये भयानक अपशकुन उठे हैं,
श्लोक 80 (1.129.80)
व्यक्तं कुलान्तकरणो भवितैष सुतस्तव । तस्य शान्तिः परित्यागे गुप्तावपनयो महान् ॥
vyaktaṃ kulāntakaraṇo bhavitaiṣa sutastava | tasya śāntiḥ parityāge guptāvapanayo mahān
उससे स्पष्ट है कि आपका यह पुत्र कुल का नाश करने वाला होगा। उसे त्याग देने में शान्ति है; उसकी रक्षा करने में बड़ा अनर्थ है।
श्लोक 81 (1.129.81)
एष दुर्योधनो राजा मधुपिङ्गललोचनः । न केवलं कुलस्यान्तं क्षत्रियान्तं करिष्यति ॥
eṣa duryodhano rājā madhupiṅgalalocanaḥ | na kevalaṃ kulasyāntaṃ kṣatriyāntaṃ kariṣyati
मधु के समान पिंगल नेत्रों वाला यह राजा दुर्योधन केवल कुल का ही नहीं, क्षत्रियों का भी अन्त कर देगा।
श्लोक 82 (1.129.82)
शतमेकोनमप्यस्तु पुत्राणां ते महीपते । त्यजैनमेकं शान्तिं चेत्कुलस्येच्छसि भारत ॥
śatamekonamapyastu putrāṇāṃ te mahīpate | tyajainamekaṃ śāntiṃ cetkulasyecchasi bhārata
हे पृथ्वीपति, आपके सौ में एक कम पुत्र ही रहें। हे भारत, यदि आप कुल की शान्ति चाहते हैं, तो इस एक को त्याग दीजिए।
श्लोक 83 (1.129.83)
एकेन कुरु वै क्षेमं कुलस्य जगतस्तथा । त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ॥
ekena kuru vai kṣemaṃ kulasya jagatastathā | tyajedekaṃ kulasyārthe grāmasyārthe kulaṃ tyajet
इस एक के द्वारा कुल और जगत् दोनों का कल्याण कीजिए। कुल के लिए एक व्यक्ति को त्याग दे, गाँव के लिए कुल को त्याग दे,
श्लोक 84 (1.129.84)
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् । स तथा विदुरेणोक्तस्तैश्च सर्वैर्द्विजोत्तमैः ॥
grāmaṃ janapadasyārthe ātmārthe pṛthivīṃ tyajet | sa tathā vidureṇoktastaiśca sarvairdvijottamaiḥ
देश के लिए गाँव को त्याग दे, और आत्मा के लिए पृथ्वी को भी त्याग दे।" विदुर और उन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणों के इस प्रकार कहने पर भी
श्लोक 85 (1.129.85)
न चकार तथा राजा पुत्रस्नेहसमन्वितः । ततः पुत्रशतं पूर्णं धृतराष्ट्रस्य पार्थिव ॥
na cakāra tathā rājā putrasnehasamanvitaḥ | tataḥ putraśataṃ pūrṇaṃ dhṛtarāṣṭrasya pārthiva
पुत्र-स्नेह में बँधे राजा ने वैसा नहीं किया। तब, हे राजन्, धृतराष्ट्र के पूरे सौ पुत्र
श्लोक 86 (1.129.86)
अह्नांशतेन संजज्ञे कन्या चैका शताधिका । गान्धार्यां क्लिश्यमानायामुदरेण विवर्धता ॥
ahnāṃśatena saṃjajñe kanyā caikā śatādhikā | gāndhāryāṃ kliśyamānāyāmudareṇa vivardhatā
सौ दिनों के भीतर उत्पन्न हुए, और सौ के अतिरिक्त एक कन्या भी। जब गान्धारी बढ़ते हुए उदर से कष्ट पा रही थी,
श्लोक 87 (1.129.87)
वैश्या सा त्वम्बिकापुत्रं कन्या परिचचार ह । तया समभवद्राजा धृतराष्ट्रो यदृच्छया ॥
vaiśyā sā tvambikāputraṃ kanyā paricacāra ha | tayā samabhavadrājā dhṛtarāṣṭro yadṛcchayā
एक वैश्य कन्या अम्बिका-पुत्र धृतराष्ट्र की सेवा करती थी, और संयोगवश राजा धृतराष्ट्र का उससे संसर्ग हुआ।
श्लोक 88 (1.129.88)
तस्मिन्संवत्सरे राजन्धृतराष्ट्रान्महायशाः । जज्ञे धीमांस्ततस्तस्यां युयुत्सुः करणो नृप । एवं पुत्रशतं जज्ञे धृतराष्ट्रस्य धीमतः ॥
tasminsaṃvatsare rājandhṛtarāṣṭrānmahāyaśāḥ | jajñe dhīmāṃstatastasyāṃ yuyutsuḥ karaṇo nṛpa | evaṃ putraśataṃ jajñe dhṛtarāṣṭrasya dhīmataḥ
हे राजन्, उसी वर्ष धृतराष्ट्र से उस वैश्या के गर्भ से महायशस्वी, बुद्धिमान युयुत्सु उत्पन्न हुआ, जो करण (क्षत्रिय पिता और वैश्य माता की संतान) था। इस प्रकार बुद्धिमान धृतराष्ट्र के सौ पुत्र हुए,
श्लोक 89 (1.129.89)
महारथानां वीराणां कन्या चैका शताधिका । युयुत्सुश्च महातेजा वैश्यापुत्रः प्रतापवान् ॥
mahārathānāṃ vīrāṇāṃ kanyā caikā śatādhikā | yuyutsuśca mahātejā vaiśyāputraḥ pratāpavān
सब वीर और महारथी; और सौ के ऊपर एक कन्या; तथा महातेजस्वी, प्रतापी वैश्यापुत्र युयुत्सु भी।