आदि पर्व · अध्याय 130
दुःशला का जन्म
जनमेजय पूछते हैं कि जब व्यास ने गान्धारी को सौ पुत्रों का वर दिया था, तो उसकी पुत्री कैसे हुई। वैशम्पायन बताते हैं कि जब व्यास मांसपिण्ड का विभाजन कर रहे थे, तब गान्धारी ने मन ही मन एक पुत्री की भी कामना की, ताकि उसे दामाद का स्नेह मिले और उसके पति दौहित्र से प्राप्त होने वाले लोकों से वंचित न रहें। सौ भाग गिने जाने पर एक टुकड़ा बच गया; व्यास ने कहा कि यही उसकी इच्छित कन्या होगी और उसे घी के एक अलग घड़े में रख दिया, और समय आने पर सबसे छोटी दुःशला का जन्म हुआ।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (1.130.1)
धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामादितः कथितं त्वया । ऋषेः प्रसादात्तु शतं न च कन्या प्रकीर्तिता ॥
dhṛtarāṣṭrasya putrāṇāmāditaḥ kathitaṃ tvayā | ṛṣeḥ prasādāttu śataṃ na ca kanyā prakīrtitā
आपने आरम्भ से धृतराष्ट्र के पुत्रों का वर्णन किया — ऋषि की कृपा से उत्पन्न सौ पुत्र — किन्तु किसी कन्या का उल्लेख नहीं किया।
श्लोक 2 (1.130.2)
वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च कन्या चैका शताधिका । गान्धारराजदुहिता शतपुत्रेति चानघ ॥
vaiśyāputro yuyutsuśca kanyā caikā śatādhikā | gāndhārarājaduhitā śataputreti cānagha
अब वैश्यापुत्र युयुत्सु और सौ के ऊपर एक कन्या की बात आई है। पर हे निष्पाप, गान्धारराज की पुत्री को तो सौ पुत्रों की माता
श्लोक 3 (1.130.3)
उक्ता महर्षिणा तेन व्यासेनामिततेजसा । कथं त्विदानीं भगवन्कन्यां त्वं तु ब्रवीषि मे ॥
uktā maharṣiṇā tena vyāsenāmitatejasā | kathaṃ tvidānīṃ bhagavankanyāṃ tvaṃ tu bravīṣi me
उन अमित तेजस्वी महर्षि व्यास ने बताया था। तो हे भगवन्, अब आप मुझे कन्या की बात कैसे बता रहे हैं?
श्लोक 4 (1.130.4)
यदि भागशतं पेशी कृता तेन महर्षिणा । न प्रजास्यति चेद्भूयः सौबलेयी कथंचन ॥
yadi bhāgaśataṃ peśī kṛtā tena maharṣiṇā | na prajāsyati cedbhūyaḥ saubaleyī kathaṃcana
यदि उस महर्षि ने पिण्ड के सौ भाग किए थे, और यदि सुबलपुत्री फिर किसी प्रकार संतान उत्पन्न करने वाली नहीं थी,
श्लोक 5 (1.130.5)
कथं तु संभवस्तस्या दुःशलाया वदस्व मे । यथावदिह विप्रर्षे परं मेऽत्र कुतूहलम् ॥
kathaṃ tu saṃbhavastasyā duḥśalāyā vadasva me | yathāvadiha viprarṣe paraṃ me'tra kutūhalam
तो दुःशला का जन्म कैसे हुआ? हे विप्रर्षि, यह मुझे ठीक-ठीक बताइए, इस विषय में मुझे बड़ा कौतूहल है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (1.130.6)
साध्वयं प्रश्न उद्दिष्टः पाण्डवेय ब्रवीमि ते । तां मांसपेशीं भगवान्स्वयमेव महातपाः ॥
sādhvayaṃ praśna uddiṣṭaḥ pāṇḍaveya bravīmi te | tāṃ māṃsapeśīṃ bhagavānsvayameva mahātapāḥ
हे पाण्डववंशी, तुमने अच्छा प्रश्न उठाया है; मैं तुम्हें बताता हूँ। महातपस्वी भगवान ने स्वयं उस मांसपिण्ड को
श्लोक 7 (1.130.7)
शीताभिरद्भिरासिच्य भागं भागमकल्पयत् । यो यथा कल्पितो भागस्तं तं धात्र्या तथा नृप ॥
śītābhiradbhirāsicya bhāgaṃ bhāgamakalpayat | yo yathā kalpito bhāgastaṃ taṃ dhātryā tathā nṛpa
शीतल जल से सींचकर भाग-भाग करके बाँटा; और हे राजन्, जैसे-जैसे जो भाग बनता गया, उसे उन्होंने धाय के हाथों
श्लोक 8 (1.130.8)
घृतपूर्णेषु कुण्डेषु एकैकं प्राक्षिपत्तदा । एतस्मिन्नन्तरे साध्वी गान्धारी सुदृढव्रता ॥
ghṛtapūrṇeṣu kuṇḍeṣu ekaikaṃ prākṣipattadā | etasminnantare sādhvī gāndhārī sudṛḍhavratā
घी से भरे कुण्डों में एक-एक करके रखवा दिया। इसी बीच दृढ़ व्रत वाली साध्वी गान्धारी,
श्लोक 9 (1.130.9)
दुहितुः स्नेहसंयोगमनुध्याय वराङ्गना । नाब्रवीत्तमृषिं किंचिद्गौरवाच्च यशस्विनी । मनसा चिन्तयद्देवी एतत्पुत्रशतं मम ॥
duhituḥ snehasaṃyogamanudhyāya varāṅganā | nābravīttamṛṣiṃ kiṃcidgauravācca yaśasvinī | manasā cintayaddevī etatputraśataṃ mama
उस श्रेष्ठ नारी ने, पुत्री के प्रति होने वाले स्नेह का ध्यान किया। उस यशस्विनी ने आदरवश ऋषि से कुछ नहीं कहा, पर रानी ने मन में सोचा — 'ये मेरे सौ पुत्र होंगे,
श्लोक 10 (1.130.10)
भविष्यति न संदेहो न ब्रवीत्यन्यथा मुनिः । ममेयं परमा तुष्टिर्दुहिता मे भवेद्यदि ॥
bhaviṣyati na saṃdeho na bravītyanyathā muniḥ | mameyaṃ paramā tuṣṭirduhitā me bhavedyadi
इसमें संदेह नहीं, क्योंकि मुनि कभी असत्य नहीं कहते। पर मेरी सबसे बड़ी प्रसन्नता तो तब होगी जब मेरी एक पुत्री हो,
श्लोक 11 (1.130.11)
एका शताधिका बाला भविष्यति कनीयसी । ततो दौहित्रजाल्लोकादबाह्योऽसौ पतिर्मम ॥
ekā śatādhikā bālā bhaviṣyati kanīyasī | tato dauhitrajāllokādabāhyo'sau patirmama
सौ के ऊपर एक कन्या, जो सबसे छोटी हो। तब मेरे पति दौहित्र (पुत्री के पुत्र) से प्राप्त होने वाले लोकों से वंचित नहीं रहेंगे।
श्लोक 12 (1.130.12)
अधिका किल नारीणां प्रीतिर्जामातृजा भवेत् । यदि नाम ममापि स्याद्दुहितैका शताधिका ॥
adhikā kila nārīṇāṃ prītirjāmātṛjā bhavet | yadi nāma mamāpi syādduhitaikā śatādhikā
कहते हैं कि स्त्रियों को दामाद से विशेष प्रेम होता है। यदि मेरी भी सौ के ऊपर एक पुत्री हो जाए,
श्लोक 13 (1.130.13)
कृतकृत्या भवेयं वै पुत्रदौहित्रसंवृता । यदि सत्यं तपस्तप्तं दत्तं वाऽप्यथवा हुतम् ॥
kṛtakṛtyā bhaveyaṃ vai putradauhitrasaṃvṛtā | yadi satyaṃ tapastaptaṃ dattaṃ vā'pyathavā hutam
तो पुत्रों और दौहित्रों से घिरकर मैं कृतार्थ हो जाऊँगी। यदि मैंने सचमुच तप किया है, दान दिया है या हवन किया है,
श्लोक 14 (1.130.14)
गुरवस्तोषिता वापि तथाऽस्तु दुहिता मम । एतस्मिन्नेव काले तु कृष्णद्वैपायनः स्वयम् ॥
guravastoṣitā vāpi tathā'stu duhitā mama | etasminneva kāle tu kṛṣṇadvaipāyanaḥ svayam
या गुरुजनों को संतुष्ट किया है, तो मुझे पुत्री प्राप्त हो।' उसी समय स्वयं कृष्णद्वैपायन,
श्लोक 15 (1.130.15)
व्यभजत्स तदा पेशीं भगवानृषिसत्तमः । गण्यमानेषु कुण्डेषु शते पूर्णे महात्मना ॥
vyabhajatsa tadā peśīṃ bhagavānṛṣisattamaḥ | gaṇyamāneṣu kuṇḍeṣu śate pūrṇe mahātmanā
ऋषियों में श्रेष्ठ भगवान, उस पिण्ड का विभाजन कर रहे थे। कुण्डों की गिनती होते हुए जब उन महात्मा ने सौ पूरे कर लिए,
श्लोक 16 (1.130.16)
अभवच्चापरं खण्डं वामहस्ते तदा किल । गणयित्वा शतं पूर्णमंशानामाह सौबलीम् ॥
abhavaccāparaṃ khaṇḍaṃ vāmahaste tadā kila | gaṇayitvā śataṃ pūrṇamaṃśānāmāha saubalīm
तब कहा जाता है कि उनके बाएँ हाथ में एक और टुकड़ा बच रहा। सौ भाग पूरे गिनकर उन्होंने सुबलपुत्री से कहा —
व्यास उवाच
श्लोक 17 (1.130.17)
पूर्णं पुत्रशतं त्वेतन्न मिथ्या वागुदाहृता । दैवयोगाच्च भागैकः परिशिष्टः शतात्परः ॥
pūrṇaṃ putraśataṃ tvetanna mithyā vāgudāhṛtā | daivayogācca bhāgaikaḥ pariśiṣṭaḥ śatātparaḥ
"ये तुम्हारे पूरे सौ पुत्र हैं; मेरी कही बात मिथ्या नहीं हुई। और दैवयोग से सौ के अतिरिक्त एक भाग बच गया है।
श्लोक 18 (1.130.18)
एषा ते सुभगा कन्या भविष्यति यथेप्सिता । ततोऽन्यं घृतकुम्भं च समानाय्य महातपाः ॥
eṣā te subhagā kanyā bhaviṣyati yathepsitā | tato'nyaṃ ghṛtakumbhaṃ ca samānāyya mahātapāḥ
यह तुम्हारी सौभाग्यशालिनी कन्या होगी, जैसी तुमने चाही थी।" तब महातपस्वी ने घी का एक और घड़ा मँगवाया,
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (1.130.19)
तं चापि प्राक्षिपत्तत्र कन्याभागं तपोधनः । संभूता चैव कालेन सर्वेषां च यवीयसी ॥
taṃ cāpi prākṣipattatra kanyābhāgaṃ tapodhanaḥ | saṃbhūtā caiva kālena sarveṣāṃ ca yavīyasī
और उस तपोधन ने कन्या वाला भाग उसमें रख दिया। समय आने पर वह उत्पन्न हुई, सबसे छोटी।
श्लोक 20 (1.130.20)
एतत्ते कथितं राजन्दुःशलाजन्म भारत । ब्रूहि राजेन्द्र किं भूयो वर्तयिष्यामि तेऽनघ ॥
etatte kathitaṃ rājanduḥśalājanma bhārata | brūhi rājendra kiṃ bhūyo vartayiṣyāmi te'nagha
हे राजन्, हे भारत, यह मैंने तुम्हें दुःशला के जन्म की कथा सुनाई। हे राजेन्द्र, हे निष्पाप, बताओ, अब मैं तुम्हें और क्या सुनाऊँ?