आदि पर्व · अध्याय 13
जरत्कारु ने पितरों को गड्ढे में लटकते देखा
शौनक सौति से पूछते हैं कि जनमेजय ने सर्पसत्र क्यों किया और आस्तीक ने सर्पों को क्यों बचाया, और सौति अपने पिता लोमहर्षण से सुनी आस्तीक की कथा आरम्भ करते हैं। आस्तीक के पिता, घुमक्कड़ तपस्वी जरत्कारु, अपने पितरों को एक गड्ढे में घास के गुच्छे से उलटे लटकते देखते हैं, जिसे एक चूहा कुतर रहा है, क्योंकि उनका वंश जरत्कारु पर ही समाप्त होने वाला है। पितरों के आग्रह पर वे इस शर्त पर विवाह करना स्वीकार करते हैं कि कन्या उन्हीं के नाम की हो और भिक्षा की तरह स्वेच्छा से दी जाए।
शौनक उवाच
श्लोक 1 (1.13.1)
किमर्थं राजशार्दूलः स राजा जनमेजयः । सर्पसत्रेण सर्पाणां गतोऽन्तं तद्वदस्व मे । निखिलेन यथातत्त्वं सौते सर्वमशेषतः ॥
kimarthaṃ rājaśārdūlaḥ sa rājā janamejayaḥ | sarpasatreṇa sarpāṇāṃ gato'ntaṃ tadvadasva me | nikhilena yathātattvaṃ saute sarvamaśeṣataḥ
हे सौति, राजाओं में सिंह के समान राजा जनमेजय ने सर्पसत्र के द्वारा सर्पों का अन्त क्यों किया? यह सब मुझे पूरी तरह, यथार्थ रूप से, बिना कुछ छोड़े बताओ।
श्लोक 2 (1.13.2)
आस्तीकश्च द्विजश्रेष्ठः किमर्थं जपतां वरः । मोक्षयामास भुजगान्प्रदीप्ताद्वसुरेतसः ॥
āstīkaśca dvijaśreṣṭhaḥ kimarthaṃ japatāṃ varaḥ | mokṣayāmāsa bhujagānpradīptādvasuretasaḥ
और जप करनेवालों में श्रेष्ठ ब्राह्मणवर आस्तीक ने सर्पों को प्रज्वलित अग्नि से क्यों बचाया?
श्लोक 3 (1.13.3)
कस्य पुत्रः स राजासीत्सर्पसत्रं य आहरत् । स च द्विजातिप्रवरः कस्य पुत्रोऽभिधत्स्व मे ॥
kasya putraḥ sa rājāsītsarpasatraṃ ya āharat | sa ca dvijātipravaraḥ kasya putro'bhidhatsva me
जिस राजा ने सर्पसत्र किया था, वह किसका पुत्र था? और वह श्रेष्ठ ब्राह्मण किसका पुत्र था? मुझे बताओ।
सौतिरुवाच
श्लोक 4 (1.13.4)
महदाख्यानमास्तीकं यथैतत्प्रोच्यते द्विज । सर्वमेतदशेषेण शृणु मे वदतां वर ॥
mahadākhyānamāstīkaṃ yathaitatprocyate dvija | sarvametadaśeṣeṇa śṛṇu me vadatāṃ vara
हे ब्राह्मण, आस्तीक का आख्यान बहुत बड़ा है। हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, जैसा यह कहा जाता है, वह सब बिना कुछ छोड़े मुझसे सुनो।
शौनक उवाच
श्लोक 5 (1.13.5)
श्रोतुमिच्छाम्यशेषेण कथामेतां मनोरमाम् । आस्तीकस्य पुराणर्षेर्ब्राह्मणस्य यशस्विनः ॥
śrotumicchāmyaśeṣeṇa kathāmetāṃ manoramām | āstīkasya purāṇarṣerbrāhmaṇasya yaśasvinaḥ
मैं प्राचीन ऋषि, यशस्वी ब्राह्मण आस्तीक की यह मनोहर कथा पूरी-पूरी सुनना चाहता हूँ।
सौतिरुवाच
श्लोक 6 (1.13.6)
इतिहासमिमं विप्राः पुराणं परिचक्षते । कृष्णद्वैपायनप्रोक्तं नैमिषारण्यवासिषु ॥
itihāsamimaṃ viprāḥ purāṇaṃ paricakṣate | kṛṣṇadvaipāyanaproktaṃ naimiṣāraṇyavāsiṣu
ब्राह्मण इस इतिहास को प्राचीन कहते हैं; इसे कृष्णद्वैपायन ने कहा था। नैमिषारण्य के निवासियों के बीच
श्लोक 7 (1.13.7)
पूर्वं प्रचोदितः सूतः पिता मे लोमहर्षणः । शिष्यो व्यासस्य मेधावी ब्राह्मणेष्विदमुक्तवान् ॥
pūrvaṃ pracoditaḥ sūtaḥ pitā me lomaharṣaṇaḥ | śiṣyo vyāsasya medhāvī brāhmaṇeṣvidamuktavān
पहले मेरे पिता सूत लोमहर्षण ने, जो व्यास के मेधावी शिष्य थे, प्रेरित किए जाने पर इसे ब्राह्मणों को सुनाया था।
श्लोक 8 (1.13.8)
तस्मादहमुपश्रुत्य प्रवक्ष्यामि यथातथम् । इदमास्तीकमाख्यानं तुभ्यं शौनक पृच्छते । कथयिष्याम्यशेषेण सर्वपापप्रणाशनम् ॥
tasmādahamupaśrutya pravakṣyāmi yathātatham | idamāstīkamākhyānaṃ tubhyaṃ śaunaka pṛcchate | kathayiṣyāmyaśeṣeṇa sarvapāpapraṇāśanam
उनसे सुनकर मैं इसे ज्यों-का-त्यों कहूँगा। हे शौनक, तुम पूछ रहे हो, इसलिए सब पापों का नाश करनेवाला यह आस्तीक-आख्यान मैं तुम्हें पूरा सुनाऊँगा।
श्लोक 9 (1.13.9)
आस्तीकस्य पिता ह्यासीत्प्रजापतिसमः प्रभुः । ब्रह्मचारी यताहारस्तपस्युग्रे रतः सदा ॥
āstīkasya pitā hyāsītprajāpatisamaḥ prabhuḥ | brahmacārī yatāhārastapasyugre rataḥ sadā
आस्तीक के पिता प्रजापति के समान सामर्थ्यवान् थे; वे ब्रह्मचारी थे, आहार पर संयम रखते थे और सदा उग्र तप में लगे रहते थे।
श्लोक 10 (1.13.10)
जरत्कारुरिति ख्यात ऊर्ध्वरेता महातपाः । यायावराणां प्रवरो धर्मज्ञः संशितव्रतः ॥
jaratkāruriti khyāta ūrdhvaretā mahātapāḥ | yāyāvarāṇāṃ pravaro dharmajñaḥ saṃśitavrataḥ
वे जरत्कारु नाम से विख्यात थे — ऊर्ध्वरेता, महान तपस्वी, यायावरों में श्रेष्ठ, धर्म के ज्ञाता और कठोर व्रत का पालन करनेवाले।
श्लोक 11 (1.13.11)
स कदाचिन्महाभागस्तपोबलसमन्वितः । चचार पृथिवीं सर्वां यत्रसायंगृहो मुनिः ॥
sa kadācinmahābhāgastapobalasamanvitaḥ | cacāra pṛthivīṃ sarvāṃ yatrasāyaṃgṛho muniḥ
एक बार तपोबल से सम्पन्न वे महाभाग मुनि सारी पृथ्वी पर घूमते रहे; जहाँ साँझ हो जाती, वहीं उनका घर होता।
श्लोक 12 (1.13.12)
तीर्थेषु च समाप्लावं कुर्वन्नटति सर्वशः । चरन्दीक्षां महातेजा दुश्चरामकृतात्मभिः ॥
tīrtheṣu ca samāplāvaṃ kurvannaṭati sarvaśaḥ | carandīkṣāṃ mahātejā duścarāmakṛtātmabhiḥ
तीर्थों में स्नान करते हुए वे महातेजस्वी सब ओर विचरते रहे, और ऐसी दीक्षा का पालन करते रहे जो असंयमी लोगों के लिए अत्यन्त कठिन है।
श्लोक 13 (1.13.13)
वायुभक्षो निराहारः शुष्यन्ननिमिषो मुनिः । इतस्ततः परिचरन्दीप्तपावकसप्रभः ॥
vāyubhakṣo nirāhāraḥ śuṣyannanimiṣo muniḥ | itastataḥ paricarandīptapāvakasaprabhaḥ
केवल वायु पीकर, निराहार रहकर, सूखते हुए और पलक तक न झपकाते हुए वे मुनि प्रज्वलित अग्नि के समान तेज से इधर-उधर विचरते रहे।
श्लोक 14 (1.13.14)
अटमानः कदाचित्स्वान्स ददर्श पितामहान् । लम्बमानान्महागर्ते पादैरूर्ध्वैरवाङ्मुखान् ॥
aṭamānaḥ kadācitsvānsa dadarśa pitāmahān | lambamānānmahāgarte pādairūrdhvairavāṅmukhān
घूमते-घूमते एक बार उन्होंने अपने पितरों को एक बड़े गड्ढे में पैर ऊपर और मुँह नीचे किए लटकते देखा।
श्लोक 15 (1.13.15)
तानब्रवीत्स दृष्ट्वैव जरत्कारुः पितामहान् । के भवन्तोऽवलम्बन्ते गर्ते ह्यस्मिन्नधोमुखाः ॥
tānabravītsa dṛṣṭvaiva jaratkāruḥ pitāmahān | ke bhavanto'valambante garte hyasminnadhomukhāḥ
उन पितरों को देखते ही जरत्कारु ने उनसे कहा — "आप कौन हैं, जो इस गड्ढे में नीचे मुँह किए लटक रहे हैं,
जरत्कारुरुवाच
श्लोक 16 (1.13.16)
वीरणस्तम्बके लग्नाः सर्वतः परिभक्षिते । मूषकेन निगूढेन गर्तेऽस्मिन्नित्यवासिना ॥
vīraṇastambake lagnāḥ sarvataḥ paribhakṣite | mūṣakena nigūḍhena garte'sminnityavāsinā
वीरण घास के उस गुच्छे को पकड़े हुए, जिसे इस गड्ढे में सदा रहनेवाला एक छिपा हुआ चूहा चारों ओर से कुतर चुका है?"
पितर ऊचुः
श्लोक 17 (1.13.17)
यायावरा नाम वयमृषयः संशितव्रताः । संतानप्रक्षयाद्ब्रह्मन्नधो गच्छाम मेदिनीम् ॥
yāyāvarā nāma vayamṛṣayaḥ saṃśitavratāḥ | saṃtānaprakṣayādbrahmannadho gacchāma medinīm
हम यायावर नाम के कठोर व्रतवाले ऋषि हैं। हे ब्राह्मण, वंश के नष्ट होने के कारण हम नीचे धरती में धँसते जा रहे हैं।
श्लोक 18 (1.13.18)
अस्माकं संततिस्त्वेको जरत्कारुरिति स्मृतः । मन्दभाग्योऽल्पभाग्यानां तप एकं समास्थितः ॥
asmākaṃ saṃtatistveko jaratkāruriti smṛtaḥ | mandabhāgyo'lpabhāgyānāṃ tapa ekaṃ samāsthitaḥ
हमारी एक ही सन्तान बची है, जो जरत्कारु नाम से जानी जाती है। हम अभागों में भी वह सबसे बड़ा अभागा केवल तप में ही लगा है।
श्लोक 19 (1.13.19)
न स पुत्राञ्जनयितुं दारान्मूढश्चिकीर्षति । तेन लम्बामहे गर्ते संतानस्य क्षयादिह ॥
na sa putrāñjanayituṃ dārānmūḍhaścikīrṣati | tena lambāmahe garte saṃtānasya kṣayādiha
वह मूर्ख पुत्र उत्पन्न करने के लिए विवाह करना ही नहीं चाहता। इसीलिए वंश के क्षय के कारण हम यहाँ इस गड्ढे में लटक रहे हैं।
श्लोक 20 (1.13.20)
अनाथास्तेन नाथेन यथा दुष्कृतिनस्तथा । येषां तु संततिर्नास्ति मर्त्यलोके सुखावहा ॥
anāthāstena nāthena yathā duṣkṛtinastathā | yeṣāṃ tu saṃtatirnāsti martyaloke sukhāvahā
ऐसे रक्षक के रहते हम पापियों की तरह अनाथ हैं। जिनकी मनुष्यलोक में सुख देनेवाली सन्तान नहीं होती,
श्लोक 21 (1.13.21)
न ते लभन्ते वसतिं स्वर्गे पुण्यकृतोऽपि हि । कस्त्वं बन्धुरिवास्माकमनुशोचसि सत्तम ॥
na te labhante vasatiṃ svarge puṇyakṛto'pi hi | kastvaṃ bandhurivāsmākamanuśocasi sattama
वे पुण्यात्मा होने पर भी स्वर्ग में निवास नहीं पाते। हे सज्जन, आप कौन हैं जो किसी बन्धु की तरह हमारे लिए शोक कर रहे हैं?
श्लोक 22 (1.13.22)
ज्ञातुमिच्छामहे ब्रह्मन्को भवानिह नः स्थितः । किमर्थं चैव नः शोच्याननुशोचसि सत्तम ॥
jñātumicchāmahe brahmanko bhavāniha naḥ sthitaḥ | kimarthaṃ caiva naḥ śocyānanuśocasi sattama
हे ब्राह्मण, हम जानना चाहते हैं कि यहाँ हमारे पास खड़े आप कौन हैं, और हे सज्जन, आप हम शोचनीय लोगों के लिए क्यों शोक कर रहे हैं।
जरत्कारुरुवाच
श्लोक 23 (1.13.23)
मम पूर्वे भवन्तो वै पितरः सपितामहाः । ब्रूत किं करवाण्यद्य जरत्कारुरहं स्वयम् ॥
mama pūrve bhavanto vai pitaraḥ sapitāmahāḥ | brūta kiṃ karavāṇyadya jaratkārurahaṃ svayam
आप ही मेरे पूर्वज हैं — मेरे पिता और पितामह। बताइए, अब मैं क्या करूँ? मैं स्वयं जरत्कारु हूँ।
पितर ऊचुः
श्लोक 24 (1.13.24)
यतस्व यत्नवांस्तात संतानाय कुलस्य नः । आत्मनोऽर्थेऽस्मदर्थे च धर्म इत्येव वा विभो ॥
yatasva yatnavāṃstāta saṃtānāya kulasya naḥ | ātmano'rthe'smadarthe ca dharma ityeva vā vibho
हे तात, हे प्रभो, अपने लिए और हमारे लिए भी, हमारे कुल की सन्तान-परम्परा चलाने का पूरा यत्न करो, क्योंकि यही धर्म है।
श्लोक 25 (1.13.25)
न हि धर्मफलैस्तात न तपोभिः सुसंचितैः । तां गतिं प्राप्नुवन्तीह पुत्रिणो यां व्रजन्ति वै ॥
na hi dharmaphalaistāta na tapobhiḥ susaṃcitaiḥ | tāṃ gatiṃ prāpnuvantīha putriṇo yāṃ vrajanti vai
हे तात, न धर्म के फलों से और न भली-भाँति संचित तपस्या से लोग यहाँ वह गति पाते हैं, जो पुत्रवालों को मिलती है।
श्लोक 26 (1.13.26)
तद्दारग्रहणे यत्नं संतत्यां च मनः कुरु । पुत्रकास्मन्नियोगात्त्वमेतन्नः परमं हितम् ॥
taddāragrahaṇe yatnaṃ saṃtatyāṃ ca manaḥ kuru | putrakāsmanniyogāttvametannaḥ paramaṃ hitam
इसलिए हे पुत्र, हमारी आज्ञा से विवाह करने का यत्न करो और सन्तान की ओर मन लगाओ। यही हमारा परम हित है।
जरत्कारुरुवाच
श्लोक 27 (1.13.27)
न दारान्वै करिष्येऽहं न धनं जीवितार्थतः । भवतां तु हितार्थाय करिष्ये दारसंग्रहम् ॥
na dārānvai kariṣye'haṃ na dhanaṃ jīvitārthataḥ | bhavatāṃ tu hitārthāya kariṣye dārasaṃgraham
मैं न तो विवाह करूँगा और न जीविका के लिए धन जुटाऊँगा। परन्तु आपके हित के लिए मैं पत्नी ग्रहण करूँगा।
श्लोक 28 (1.13.28)
समयेन च कर्ताऽहमनेन विधिपूर्वकम् । तथा यद्युपलप्स्यामि करिष्ये नान्यथा ह्यहम् ॥
samayena ca kartā'hamanena vidhipūrvakam | tathā yadyupalapsyāmi kariṣye nānyathā hyaham
और यह मैं इस शर्त पर, विधिपूर्वक करूँगा: यदि मुझे वैसी कन्या मिल गई तो विवाह करूँगा, अन्यथा नहीं।
श्लोक 29 (1.13.29)
सनाम्नी या भवित्री मे दित्सिता चैव बन्धुभिः । भैक्ष्यवत्तामहं कन्यामुपयंस्ये विधानतः ॥
sanāmnī yā bhavitrī me ditsitā caiva bandhubhiḥ | bhaikṣyavattāmahaṃ kanyāmupayaṃsye vidhānataḥ
जो कन्या मेरे ही नाम की हो और जिसके बन्धु-बान्धव उसे देना चाहें, उसी कन्या से मैं भिक्षा की भाँति, विधिपूर्वक विवाह करूँगा।
श्लोक 30 (1.13.30)
दरिद्राय हि मे भार्यां को दास्यति विशेषतः । प्रतिग्रहीष्ये भिक्षां तु यदि कश्चित्प्रदास्यति ॥
daridrāya hi me bhāryāṃ ko dāsyati viśeṣataḥ | pratigrahīṣye bhikṣāṃ tu yadi kaścitpradāsyati
मुझ जैसे दरिद्र को भला कौन पत्नी देगा? परन्तु यदि कोई देगा, तो मैं उसे भिक्षा के रूप में स्वीकार करूँगा।
श्लोक 31 (1.13.31)
एवं दारक्रियाहेतोः प्रयतिष्ये पितामहाः । अनेन विधिना शश्वन्न करिष्येऽहमन्यथा ॥
evaṃ dārakriyāhetoḥ prayatiṣye pitāmahāḥ | anena vidhinā śaśvanna kariṣye'hamanyathā
हे पितामहो, इस प्रकार मैं विवाह के लिए प्रयत्न करूँगा, सदा इसी नियम से; इसके विपरीत कुछ नहीं करूँगा।
श्लोक 32 (1.13.32)
तत्र चोत्पत्स्यते जन्तुर्भवतां तारणाय वै । शाश्वतं स्थानमासाद्य मोदन्तां पितरो मम ॥
tatra cotpatsyate janturbhavatāṃ tāraṇāya vai | śāśvataṃ sthānamāsādya modantāṃ pitaro mama
और उससे आपके उद्धार के लिए एक सन्तान उत्पन्न होगी। मेरे पितर शाश्वत लोक को पाकर आनन्दित हों।