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आदि पर्व · अध्याय 16

कद्रू और विनता; अरुण और गरुड़ का जन्म

शौनक के अनुरोध पर सौति आस्तीक की कथा विस्तार से आरम्भ करते हैं। कश्यप अपनी पत्नियों कद्रू और विनता को वर देते हैं: कद्रू एक हज़ार नाग-पुत्र माँगती है और विनता ऐसे दो पुत्र जो उनसे बढ़कर हों। पाँच सौ वर्ष बाद अधीर होकर विनता एक अण्डा फोड़ देती है; अधूरे शरीर वाला अरुण उसे शाप देता है कि वह अपनी सौत की दासी बनेगी, जब तक उसका दूसरा पुत्र उसे मुक्त न करे, और वह सूर्य का सारथि बन जाता है। समय आने पर गरुड़ का जन्म होता है और वह भोजन की खोज में उड़ जाता है।

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शौनक उवाच

श्लोक 1 (1.16.1)

सौते त्वं कथयस्वेमां विस्तरेण कथां पुनः । आस्तीकस्य कवेः साधोः शुश्रूषा परमा हि नः ॥

saute tvaṃ kathayasvemāṃ vistareṇa kathāṃ punaḥ | āstīkasya kaveḥ sādhoḥ śuśrūṣā paramā hi naḥ

हे सौति! बुद्धिमान और साधु आस्तीक की यह कथा हमें फिर से, विस्तार के साथ सुनाओ। उसे सुनने की हमारी बड़ी उत्कंठा है।

श्लोक 2 (1.16.2)

मधुरं कथ्यते सौम्य श्लक्ष्णाक्षरपदं त्वया । प्रीयामहे भृशं तात पितेवेदं प्रभाषसे ॥

madhuraṃ kathyate saumya ślakṣṇākṣarapadaṃ tvayā | prīyāmahe bhṛśaṃ tāta pitevedaṃ prabhāṣase

हे सौम्य! तुम मधुर ढंग से, कोमल अक्षरों और पदों में कथा कहते हो। तात, हमें बहुत प्रसन्नता हो रही है; तुम अपने पिता की ही भाँति बोलते हो।

श्लोक 3 (1.16.3)

अस्मच्छुश्रूषणे नित्यं पिता हि निरतस्तव । आचष्टैतद्यथाऽऽख्यानं पिता ते त्वं तथा वद ॥

asmacchuśrūṣaṇe nityaṃ pitā hi niratastava | ācaṣṭaitadyathā''khyānaṃ pitā te tvaṃ tathā vada

तुम्हारे पिता सदा हमारी सुनने की इच्छा पूरी करने में लगे रहते थे। उन्होंने यह आख्यान जैसे सुनाया था, तुम भी वैसे ही कहो।

सौतिरुवाच

श्लोक 4 (1.16.4)

आयुष्मन्निदमाख्यानमास्तीकं कथयामि ते । यथाश्रुतं कथयतः सकाशाद्वै पितुर्मया ॥

āyuṣmannidamākhyānamāstīkaṃ kathayāmi te | yathāśrutaṃ kathayataḥ sakāśādvai piturmayā

हे आयुष्मन्! मैं तुम्हें आस्तीक का यह आख्यान वैसे ही सुनाता हूँ, जैसा मैंने अपने पिता के मुख से सुना था।

श्लोक 5 (1.16.5)

पुरा देवयुगे ब्रह्मन्प्रजापतिसुते शुभे । आस्तां भगिन्यौ रूपेण समुपेतेऽद्भुतेऽनघ ॥

purā devayuge brahmanprajāpatisute śubhe | āstāṃ bhaginyau rūpeṇa samupete'dbhute'nagha

हे निष्पाप ब्रह्मन्! बहुत पहले, देवयुग में, प्रजापति की दो सुन्दर कन्याएँ थीं — दोनों बहनें, अद्भुत रूप से सम्पन्न।

श्लोक 6 (1.16.6)

ते भार्ये कश्यपस्यास्तां कद्रूश्च विनता च ह । प्रादात्ताभ्यां वरं प्रीतः प्रजापतिसमः पतिः ॥

te bhārye kaśyapasyāstāṃ kadrūśca vinatā ca ha | prādāttābhyāṃ varaṃ prītaḥ prajāpatisamaḥ patiḥ

वे दोनों, कद्रू और विनता, कश्यप की पत्नियाँ थीं। प्रजापति के समान उनके पति ने उनसे प्रसन्न होकर उन्हें वर देने की बात कही।

श्लोक 7 (1.16.7)

कश्यपो धर्मपत्नीभ्यां मुदा परमया युतः । वरातिसर्गं श्रुत्वैवं कश्यपादुत्तमं च ते ॥

kaśyapo dharmapatnībhyāṃ mudā paramayā yutaḥ | varātisargaṃ śrutvaivaṃ kaśyapāduttamaṃ ca te

परम आनन्द से भरे कश्यप ने अपनी दोनों धर्मपत्नियों को वर देना चाहा। कश्यप से उत्तम वर मिलने की बात सुनकर

श्लोक 8 (1.16.8)

हर्षादप्रतिमां प्रीतिं प्रापतुः स्म वरस्त्रियौ । वव्रे कद्रूः सुतान्नागान्सहस्रं तुल्यवर्चसः ॥

harṣādapratimāṃ prītiṃ prāpatuḥ sma varastriyau | vavre kadrūḥ sutānnāgānsahasraṃ tulyavarcasaḥ

उन दोनों श्रेष्ठ स्त्रियों को अनुपम हर्ष हुआ। कद्रू ने समान तेज वाले एक हज़ार नागों को पुत्र रूप में माँगा।

श्लोक 9 (1.16.9)

द्वौ पुत्रौ विनता वव्रे कद्रूपुत्राधिकौ बले । तेजसा वपुषा चैव विक्रमेणाधिकौ च तौ ॥

dvau putrau vinatā vavre kadrūputrādhikau bale | tejasā vapuṣā caiva vikrameṇādhikau ca tau

विनता ने दो पुत्र माँगे, जो बल में कद्रू के पुत्रों से बढ़कर हों, और तेज, शरीर तथा पराक्रम में भी उनसे अधिक हों।

श्लोक 10 (1.16.10)

तस्यै भर्ता वरं प्रादादीदृशौ ते भविष्यतः । एवमस्त्विति तं चाह कश्यपं विनता तदा ॥

tasyai bhartā varaṃ prādādīdṛśau te bhaviṣyataḥ | evamastviti taṃ cāha kaśyapaṃ vinatā tadā

पति ने उसे वर दिया — 'तुम्हें ऐसे ही दो पुत्र होंगे।' तब विनता ने कश्यप से कहा — 'ऐसा ही हो।'

श्लोक 11 (1.16.11)

यथावत्प्रार्थितं लब्ध्वा वरं तुष्टाभवत्तदा । कृतकृत्या तु विनता लब्ध्वा वीर्याधिकौ सुतौ ॥

yathāvatprārthitaṃ labdhvā varaṃ tuṣṭābhavattadā | kṛtakṛtyā tu vinatā labdhvā vīryādhikau sutau

जैसा माँगा था, ठीक वैसा ही वर पाकर वह संतुष्ट हुई। अधिक पराक्रमी दो पुत्रों का वर पाकर विनता कृतार्थ हो गई,

श्लोक 12 (1.16.12)

कद्रूश्च लब्ध्वा पुत्राणां सहस्रं तुल्यवर्चसाम् । धार्यौ प्रयत्नतो गर्भावित्युक्त्वा स महातपाः ॥

kadrūśca labdhvā putrāṇāṃ sahasraṃ tulyavarcasām | dhāryau prayatnato garbhāvityuktvā sa mahātapāḥ

और कद्रू भी समान तेज वाले एक हज़ार पुत्रों का वर पाकर। 'गर्भों को यत्नपूर्वक धारण करना' — यह कहकर वे महातपस्वी कश्यप

श्लोक 13 (1.16.13)

ते भार्ये वरसंतुष्टे कश्यपो वनमाविशत् । कालेन महता कद्रूरण्डानां दशतीर्दश ॥

te bhārye varasaṃtuṣṭe kaśyapo vanamāviśat | kālena mahatā kadrūraṇḍānāṃ daśatīrdaśa

वर से संतुष्ट अपनी दोनों पत्नियों को छोड़कर वन में चले गए। बहुत समय बीतने पर कद्रू ने दस-दस सौ, अर्थात् एक हज़ार अण्डे दिए,

श्लोक 14 (1.16.14)

जनयामास विप्रेन्द्र द्वे चाण्डे विनता तदा । तयोरण्डानि निदधुः प्रहृष्टाः परिचारिकाः ॥

janayāmāsa viprendra dve cāṇḍe vinatā tadā | tayoraṇḍāni nidadhuḥ prahṛṣṭāḥ paricārikāḥ

और हे विप्रश्रेष्ठ, विनता ने दो अण्डे दिए। प्रसन्न परिचारिकाओं ने उनके अण्डों को

श्लोक 15 (1.16.15)

सोपस्वेदेषु भाण्डेषु पञ्चवर्षशतानि च । ततः पञ्चशते काले कद्रूपुत्रा विनिःसृताः ॥

sopasvedeṣu bhāṇḍeṣu pañcavarṣaśatāni ca | tataḥ pañcaśate kāle kadrūputrā viniḥsṛtāḥ

पाँच सौ वर्षों के लिए गरम और नम पात्रों में रख दिया। फिर पाँच सौ वर्ष पूरे होने पर कद्रू के पुत्र बाहर निकल आए।

श्लोक 16 (1.16.16)

अण्डाभ्यां विनतायास्तु मिथुनं न व्यदृश्यत । ततः पुत्रार्थिनी देवी व्रीडिता च तपस्विनी ॥

aṇḍābhyāṃ vinatāyāstu mithunaṃ na vyadṛśyata | tataḥ putrārthinī devī vrīḍitā ca tapasvinī

परन्तु विनता के दोनों अण्डों से जोड़ा दिखाई नहीं दिया। तब पुत्र की इच्छा रखने वाली, लज्जित तपस्विनी देवी

श्लोक 17 (1.16.17)

अण्डं बिभेद विनता तत्र पुत्रमपश्यत । पूर्वार्धकायसंपन्नमितरेणाप्रकाशता ॥

aṇḍaṃ bibheda vinatā tatra putramapaśyata | pūrvārdhakāyasaṃpannamitareṇāprakāśatā

विनता ने एक अण्डा फोड़ दिया और उसमें पुत्र को देखा। उसके शरीर का ऊपरी आधा भाग पूर्ण था, दूसरा भाग अभी प्रकट नहीं हुआ था।

श्लोक 18 (1.16.18)

स पुत्रः क्रोधसंरब्धः शशापैनामिति श्रुतिः । योऽहमेवं कृतो मातस्त्वया लोभपरीतया ॥

sa putraḥ krodhasaṃrabdhaḥ śaśāpaināmiti śrutiḥ | yo'hamevaṃ kṛto mātastvayā lobhaparītayā

वह पुत्र क्रोध से भर उठा और उसने उसे शाप दिया — ऐसा सुना जाता है — 'माता! लोभ के वश होकर तुमने मुझे ऐसा बना दिया है,

श्लोक 19 (1.16.19)

शरीरेणासमग्रेण तस्माद्दासी भविष्यसि । पञ्च वर्षशतान्यस्या यया विस्पर्धसे सह ॥

śarīreṇāsamagreṇa tasmāddāsī bhaviṣyasi | pañca varṣaśatānyasyā yayā vispardhase saha

अधूरे शरीर वाला; इसलिए तुम पाँच सौ वर्षों तक उसी स्त्री की दासी बनोगी, जिससे तुम होड़ करती हो।

श्लोक 20 (1.16.20)

एष च त्वां सुतो मातर्दासीत्वान्मोचयिष्यति । यद्येनमपि मातस्त्वं मामिवाण्डविभेदनात् ॥

eṣa ca tvāṃ suto mātardāsītvānmocayiṣyati | yadyenamapi mātastvaṃ māmivāṇḍavibhedanāt

और माता, यह दूसरा पुत्र तुम्हें दासता से छुड़ाएगा — यदि तुम मेरी ही तरह अण्डा फोड़कर इस तपस्वी को भी

श्लोक 21 (1.16.21)

न करिष्यस्यनङ्गं वा व्यङ्गं वापि तपस्विनम् । प्रतिपालयितव्यस्ते जन्मकालोऽस्य धीरया ॥

na kariṣyasyanaṅgaṃ vā vyaṅgaṃ vāpi tapasvinam | pratipālayitavyaste janmakālo'sya dhīrayā

अंगहीन या विकलांग न कर दो। धैर्य रखकर तुम्हें उसके जन्म-समय की प्रतीक्षा करनी होगी,

श्लोक 22 (1.16.22)

विशिष्टं बलमीप्सन्त्या पञ्चवर्षशतात्परः । एवं शप्त्वा ततः पुत्रो विनतामन्तरिक्षगः ॥

viśiṣṭaṃ balamīpsantyā pañcavarṣaśatātparaḥ | evaṃ śaptvā tataḥ putro vinatāmantarikṣagaḥ

यदि तुम उसके लिए विशिष्ट बल चाहती हो — पाँच सौ वर्ष और।' विनता को इस प्रकार शाप देकर वह पुत्र आकाश में चला गया।

श्लोक 23 (1.16.23)

अरुणोऽदृश्यत ब्रह्मन्प्रभातसमये तदा । उद्यन्नथ सहस्रांशुर्दृष्ट्वा तमरुणं प्रभुः ॥

aruṇo'dṛśyata brahmanprabhātasamaye tadā | udyannatha sahasrāṃśurdṛṣṭvā tamaruṇaṃ prabhuḥ

हे ब्रह्मन्, वही अरुण था, जो तब प्रभात-वेला में दिखाई दिया। उदय होते हुए सहस्र-किरण भगवान सूर्य ने उस अरुण को देखा,

श्लोक 24 (1.16.24)

स्वतेजसा प्रज्वलन्तमात्मनः समतेजसम् । सारथ्ये कल्पयामास प्रीयमाणस्तमोनुदः ॥

svatejasā prajvalantamātmanaḥ samatejasam | sārathye kalpayāmāsa prīyamāṇastamonudaḥ

जो अपने तेज से दमक रहा था और उन्हीं के समान तेजस्वी था; तब अन्धकार का नाश करने वाले सूर्य ने प्रसन्न होकर उसे अपना सारथि बना लिया।

श्लोक 25 (1.16.25)

सोऽपि तं रथमारुह्य भानोरमिततेजसः । सर्वलोकप्रदीपस्य ह्यमरोऽप्यरुणोऽभवत् ॥

so'pi taṃ rathamāruhya bhānoramitatejasaḥ | sarvalokapradīpasya hyamaro'pyaruṇo'bhavat

अरुण भी अपरिमित तेज वाले, समस्त लोकों के दीपक सूर्य के रथ पर आरूढ़ होकर अमर हो गया।

श्लोक 26 (1.16.26)

गरुडोऽपि यथाकालं जज्ञे पन्नगभोजनः । स जातमात्रो विनतां परित्यज्य खमाविशत् ॥

garuḍo'pi yathākālaṃ jajñe pannagabhojanaḥ | sa jātamātro vinatāṃ parityajya khamāviśat

समय आने पर सर्पों का भक्षक गरुड़ भी उत्पन्न हुआ। जन्म लेते ही वह विनता को छोड़कर आकाश में उड़ गया,

श्लोक 27 (1.16.27)

आदास्यन्नात्मनो भोज्यमन्नं विहितमस्य यत् । विधात्रा भृगुशार्दूल क्षुधितः पतगेश्वरः ॥

ādāsyannātmano bhojyamannaṃ vihitamasya yat | vidhātrā bhṛguśārdūla kṣudhitaḥ patageśvaraḥ

हे भृगुश्रेष्ठ, विधाता ने उसके लिए जो भोजन निश्चित किया था, उसे ग्रहण करने के लिए; क्योंकि वह पक्षिराज भूखा था।

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