आदि पर्व · अध्याय 173
कन्या की विनती और नन्हे बालक का वचन
माता-पिता का शोक सुनकर ब्राह्मण की कन्या कहती है कि त्यागी उसी को जानी चाहिए: सन्तान माता-पिता को पार लगाने के लिए ही होती है, और पिता के न रहने पर वंश और पितरों का पिण्डदान टूट जाएगा, जबकि वह स्वयं अनाथ भिखारिन बनकर रह जाएगी। तीनों रो पड़ते हैं, तभी छोटा पुत्र हँसते हुए एक तिनका उठाकर कहता है कि वह इससे नरभक्षी राक्षस को मार डालेगा। उनके इस क्षणिक हर्ष को देखकर कुन्ती उनके पास आकर बोलती हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.173.1)
तयोर्दुःखितयोर्वाक्यमतिमात्रं निशम्य तु । ततो दुःखपरीताङ्गी कन्या तावभ्यभाषत ॥
tayorduḥkhitayorvākyamatimātraṃ niśamya tu | tato duḥkhaparītāṅgī kanyā tāvabhyabhāṣata
दुःखी माता-पिता के अत्यन्त शोक भरे वचन सुनकर, दुःख से व्याकुल कन्या ने तब उन दोनों से कहा।
कन्योवाच
श्लोक 2 (1.173.2)
किमेवं भृशदुःखार्तौ रोरूयेतामनाथवत् । ममापि श्रूयतां वाक्यं श्रुत्वा च क्रियतां क्षमम् ॥
kimevaṃ bhṛśaduḥkhārtau rorūyetāmanāthavat | mamāpi śrūyatāṃ vākyaṃ śrutvā ca kriyatāṃ kṣamam
आप दोनों इतने दुःख से पीड़ित होकर अनाथों की तरह ऐसा विलाप क्यों कर रहे हैं? मेरी बात भी सुनिए, और सुनकर जो उचित हो वह कीजिए।
श्लोक 3 (1.173.3)
धर्मतोऽहं परित्याज्या युवयोर्नात्र संशयः । त्यक्तव्यां मां परित्यज्य त्राहि सर्वं मयैकया ॥
dharmato'haṃ parityājyā yuvayornātra saṃśayaḥ | tyaktavyāṃ māṃ parityajya trāhi sarvaṃ mayaikayā
धर्म के अनुसार आप दोनों को मुझे ही त्यागना चाहिए, इसमें कोई संशय नहीं। त्यागने योग्य मुझे त्यागकर अकेली मेरे द्वारा सब कुछ बचा लीजिए।
श्लोक 4 (1.173.4)
इत्यर्थमिष्यतेऽपत्यं तारयिष्यति मामिति । अस्मिन्नुपस्थिते काले तरध्वं प्लववन्मया ॥
ityarthamiṣyate'patyaṃ tārayiṣyati māmiti | asminnupasthite kāle taradhvaṃ plavavanmayā
सन्तान की कामना इसीलिए की जाती है कि 'यह मुझे पार लगाएगी'। अब जब वह समय आ गया है, तो नाव की भाँति मेरे सहारे पार हो जाइए।
श्लोक 5 (1.173.5)
इह वा तारयेद्दुर्गादुत वा प्रेत्य भारत । सर्वथा तारयेत्पुत्रः पुत्र इत्युच्यते बुधैः ॥
iha vā tārayeddurgāduta vā pretya bhārata | sarvathā tārayetputraḥ putra ityucyate budhaiḥ
हे भारत, चाहे इस लोक में संकट से, चाहे परलोक में — सन्तान को हर प्रकार से माता-पिता को तारना चाहिए; इसीलिए बुद्धिमान उसे 'पुत्र' कहते हैं।
श्लोक 6 (1.173.6)
आकाङ्क्षन्ते च दौहित्रान्मयि नित्यं पितामहाः । तत्स्वयं वै परित्रास्ये रक्षन्ती जीवितं पितुः ॥
ākāṅkṣante ca dauhitrānmayi nityaṃ pitāmahāḥ | tatsvayaṃ vai paritrāsye rakṣantī jīvitaṃ pituḥ
पितर सदा मुझसे दौहित्रों (नातियों) की आशा रखते हैं; इसलिए मैं पिता के प्राण बचाकर स्वयं उनकी रक्षा करूँगी।
श्लोक 7 (1.173.7)
भ्राता च मम बालोऽयं गते लोकममुं त्वयि । अचिरेणैव कालेन विनश्येत न संशयः ॥
bhrātā ca mama bālo'yaṃ gate lokamamuṃ tvayi | acireṇaiva kālena vinaśyeta na saṃśayaḥ
और आपके परलोक चले जाने पर मेरा यह छोटा भाई थोड़े ही समय में नष्ट हो जाएगा, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 8 (1.173.8)
तातेऽपि हि गते स्वर्गं विनष्टे च ममानुजे । पिण्डः पितॄणां व्युच्छिद्येत्तत्तेषां विप्रियं भवेत् ॥
tāte'pi hi gate svargaṃ vinaṣṭe ca mamānuje | piṇḍaḥ pitṝṇāṃ vyucchidyettatteṣāṃ vipriyaṃ bhavet
पिता के स्वर्ग चले जाने और छोटे भाई के नष्ट हो जाने पर पितरों का पिण्डदान टूट जाएगा, और वह उन्हें अप्रिय होगा।
श्लोक 9 (1.173.9)
पित्रा त्यक्ता तथा मात्रा भ्रात्रा चाहमसंशयम् । दुःखाद्दुःखतरं प्राप्य म्रियेयमतथोचिता ॥
pitrā tyaktā tathā mātrā bhrātrā cāhamasaṃśayam | duḥkhādduḥkhataraṃ prāpya mriyeyamatathocitā
पिता, माता और भाई — सबसे परित्यक्त होकर मैं निश्चय ही दुःख से बढ़कर दुःख पाकर मर जाऊँगी, यद्यपि मैं इसके योग्य नहीं हूँ।
श्लोक 10 (1.173.10)
त्वयि त्वरोगे निर्मुक्ते माता भ्राता च मे शिशुः । सन्तानश्चैव पिण्डश्च प्रतिष्ठास्यत्यसंशयम् ॥
tvayi tvaroge nirmukte mātā bhrātā ca me śiśuḥ | santānaścaiva piṇḍaśca pratiṣṭhāsyatyasaṃśayam
किन्तु आपके मुक्त और स्वस्थ रहने पर मेरी माता, मेरा शिशु भाई, वंश-परम्परा और पिण्डदान — सब निश्चय ही बने रहेंगे।
श्लोक 11 (1.173.11)
आत्मा पुत्रः सखी भार्या कृच्छ्रं तु दुहिता किल । स कृच्छ्रान्मोचयात्मानं मां च धर्मे नियोजय ॥
ātmā putraḥ sakhī bhāryā kṛcchraṃ tu duhitā kila | sa kṛcchrānmocayātmānaṃ māṃ ca dharme niyojaya
पुत्र अपना ही स्वरूप है, पत्नी सखी है, पर पुत्री को संकट कहा गया है। इसलिए आप स्वयं को इस संकट से छुड़ाइए और मुझे धर्म में लगाइए।
श्लोक 12 (1.173.12)
अनाथा कृपणा बाला यत्र क्वचन गामिनी । भविष्यामि त्वया तात विहीना कृपणा सदा ॥
anāthā kṛpaṇā bālā yatra kvacana gāminī | bhaviṣyāmi tvayā tāta vihīnā kṛpaṇā sadā
हे तात, आपके बिना मैं अनाथ, दीन बालिका बनकर जहाँ-तहाँ भटकती रहूँगी और सदा दुखिया रहूँगी।
श्लोक 13 (1.173.13)
अथवाहं करिष्यामि कुलस्यास्य विमोचनम् । फलसंस्था भविष्यामि कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥
athavāhaṃ kariṣyāmi kulasyāsya vimocanam | phalasaṃsthā bhaviṣyāmi kṛtvā karma suduṣkaram
अथवा मैं इस कुल को संकट से छुड़ाऊँगी; अत्यन्त कठिन कर्म करके मैं उसका फल पाऊँगी।
श्लोक 14 (1.173.14)
अथवा यास्यसे तत्र त्यक्त्वा मां द्विजसत्तम । पीडिताऽहं भविष्यामि तदवेक्षस्व मामपि ॥
athavā yāsyase tatra tyaktvā māṃ dvijasattama | pīḍitā'haṃ bhaviṣyāmi tadavekṣasva māmapi
अथवा हे द्विजश्रेष्ठ, यदि आप मुझे छोड़कर वहाँ जाएँगे, तो मैं पीड़ित हो जाऊँगी; इसलिए मेरी ओर भी देखिए।
श्लोक 15 (1.173.15)
तदस्मदर्थं धर्मार्थं प्रसवार्थं च सत्तम । आत्मानं परिरक्षस्व त्यक्तव्यां मां च संत्यज ॥
tadasmadarthaṃ dharmārthaṃ prasavārthaṃ ca sattama | ātmānaṃ parirakṣasva tyaktavyāṃ māṃ ca saṃtyaja
इसलिए हे सज्जन, हमारे लिए, धर्म के लिए और वंश के लिए अपनी रक्षा कीजिए, और त्यागने योग्य मुझे त्याग दीजिए।
श्लोक 16 (1.173.16)
अवश्यकरणीये च मा त्वां कालोऽत्यगादयम् । किं त्वतः परमं दुःखं यद्वयं स्वर्गते त्वयि ॥
avaśyakaraṇīye ca mā tvāṃ kālo'tyagādayam | kiṃ tvataḥ paramaṃ duḥkhaṃ yadvayaṃ svargate tvayi
जो अवश्य करना है, उसका यह समय आपके हाथ से न निकल जाए। इससे बड़ा दुःख और क्या होगा कि आपके स्वर्ग सिधार जाने पर हम
श्लोक 17 (1.173.17)
याचमानाः परादन्नं परिधावेमहि श्ववत् । त्वयि त्वरोगे निर्मुक्ते क्लेशादस्मात्सबान्धवे । अमृतेव सती लोके भविष्यामि सुखान्विता ॥
yācamānāḥ parādannaṃ paridhāvemahi śvavat | tvayi tvaroge nirmukte kleśādasmātsabāndhave | amṛteva satī loke bhaviṣyāmi sukhānvitā
दूसरों से अन्न माँगते हुए कुत्तों की तरह भटकते फिरें? पर यदि आप बन्धुओं सहित इस क्लेश से मुक्त होकर स्वस्थ रहेंगे, तो मैं संसार में मानो अमर रहकर सुख पाऊँगी।
श्लोक 18 (1.173.18)
इतः प्रदाने देवाश्च पितरश्चेति नः श्रुतम् । त्वया दत्तेन तोयेन भविष्यति हिताय वै ॥
itaḥ pradāne devāśca pitaraśceti naḥ śrutam | tvayā dattena toyena bhaviṣyati hitāya vai
हमने सुना है कि ऐसे दान से देवता और पितर प्रसन्न नहीं होते; फिर भी आपके द्वारा दिए गए जल (तर्पण) से यह हित में ही बदल जाएगा।
श्लोक 19 (1.173.19)
इत्येतदुभयं तात निशाम्य तव यद्धितम् । तद्व्यवस्य तथाम्बाया हितं स्वस्य सुतस्य च ॥
ityetadubhayaṃ tāta niśāmya tava yaddhitam | tadvyavasya tathāmbāyā hitaṃ svasya sutasya ca
हे तात, इन दोनों बातों पर विचार करके निश्चय कीजिए कि आपके लिए क्या हितकर है, और वैसे ही माता और अपने पुत्र के हित का भी।
श्लोक 20 (1.173.20)
मातापित्रोश्च पुत्रास्तु भवितारो गुणान्विताः । न तु पुत्रस्य पितरौ पुनर्जातु भविष्यतः ॥
mātāpitrośca putrāstu bhavitāro guṇānvitāḥ | na tu putrasya pitarau punarjātu bhaviṣyataḥ
माता-पिता को फिर से गुणवान पुत्र हो सकते हैं, पर पुत्र को उसके माता-पिता फिर कभी नहीं मिलते।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (1.173.21)
एवं बहुविधं तस्या निशम्य परिदेवितम् । पिता माता च सा चैव कन्या प्ररुरुदुस्त्रयः ॥
evaṃ bahuvidhaṃ tasyā niśamya paridevitam | pitā mātā ca sā caiva kanyā prarurudustrayaḥ
उसका इस प्रकार अनेक तरह का विलाप सुनकर पिता, माता और वह कन्या — तीनों रो पड़े।
श्लोक 22 (1.173.22)
ततः प्ररुदितान्सर्वान्निशम्याथ सुतस्तदा । उत्फुल्लनयनो बालः कलमव्यक्तमब्रवीत् ॥
tataḥ praruditānsarvānniśamyātha sutastadā | utphullanayano bālaḥ kalamavyaktamabravīt
तब सबको रोते सुनकर वह छोटा बालक आँखें फैलाकर मीठी, तुतलाती वाणी में बोला।
श्लोक 23 (1.173.23)
मा पिता रुद मा मातर्मा स्वसस्त्विति चाब्रवीत् । प्रहसन्निव सर्वांस्तानेकैकमनुसर्पति ॥
mā pitā ruda mā mātarmā svasastviti cābravīt | prahasanniva sarvāṃstānekaikamanusarpati
'पिताजी मत रोइए, माँ मत रोओ, दीदी मत रोओ' — ऐसा कहता हुआ वह मानो मुस्कराता हुआ एक-एक के पास गया।
श्लोक 24 (1.173.24)
ततः स तृणमादाय प्रहृष्टः पुनरब्रवीत् । अनेनाहं हनिष्यामि राक्षसं पुरुषादकम् ॥
tataḥ sa tṛṇamādāya prahṛṣṭaḥ punarabravīt | anenāhaṃ haniṣyāmi rākṣasaṃ puruṣādakam
फिर एक तिनका उठाकर वह प्रसन्न होकर बोला — 'इससे मैं उस नरभक्षी राक्षस को मार डालूँगा!'
श्लोक 25 (1.173.25)
तथापि तेषां दुःखेन परीतानां निशम्य तत् । बालस्य वाक्यमव्यक्तं हर्षः समभवन्महान् ॥
tathāpi teṣāṃ duḥkhena parītānāṃ niśamya tat | bālasya vākyamavyaktaṃ harṣaḥ samabhavanmahān
यद्यपि वे दुःख से घिरे थे, फिर भी बालक की वह तुतलाती बात सुनकर उनके मन में बड़ा हर्ष उत्पन्न हुआ।
श्लोक 26 (1.173.26)
अयं काल इति ज्ञात्वा कुन्ती समुपसृत्य तान् । गतासूनमृतेनेव जीवयन्तीदमब्रवीत् ॥
ayaṃ kāla iti jñātvā kuntī samupasṛtya tān | gatāsūnamṛteneva jīvayantīdamabravīt
'यही उचित समय है' — यह जानकर कुन्ती उनके पास गईं और मानो मृतकों को अमृत से जिलाती हुई यह बोलीं।