आदि पर्व · अध्याय 174
ब्राह्मण द्वारा कुन्ती को बक राक्षस का वृत्तान्त
कुन्ती परिवार के शोक का कारण पूछती हैं, और ब्राह्मण उन्हें बक नामक नरभक्षी राक्षस के बारे में बताता है जो नगर के पास एक गुफा में रहता है और तेरह वर्षों से इस प्रदेश पर शासन कर रहा है। उसके मनमाने संहार को रोकने के लिए ब्राह्मणों ने एक समझौता किया: बारी-बारी से हर घर उसके पास भोजन-पेय का भारी भाग, दो काले बैल और एक मनुष्य भेजता है, और बदले में वह देश की रक्षा करता है। दुर्बल राजा कुछ नहीं करता, और अब बारी ब्राह्मण की आई है; किसी को खरीदकर भेजने के लिए उसके पास धन नहीं, इसलिए वह पूरे परिवार सहित राक्षस के पास जाने का निश्चय करता है।
कुन्त्युवाच
श्लोक 1 (1.174.1)
कुतोमूलमिदं दुःखं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः । विदित्वाप्यपकर्षेयं शक्यं चेदपकर्षितुम् ॥
kutomūlamidaṃ duḥkhaṃ jñātumicchāmi tattvataḥ | viditvāpyapakarṣeyaṃ śakyaṃ cedapakarṣitum
इस दुःख का मूल क्या है? मैं इसे ठीक-ठीक जानना चाहती हूँ। जानकर, यदि दूर करना सम्भव हो, तो मैं इसे दूर कर दूँ।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 2 (1.174.2)
उपपन्नं सतामेतद्यद्ब्रवीपि तपोधने । न तु दुःखमिदं शक्यं मानुषेण व्यपोहितुम् ॥
upapannaṃ satāmetadyadbravīpi tapodhane | na tu duḥkhamidaṃ śakyaṃ mānuṣeṇa vyapohitum
हे तपस्विनी, आपकी बात सज्जनों के योग्य है; किन्तु यह दुःख किसी मनुष्य द्वारा दूर नहीं किया जा सकता।
श्लोक 3 (1.174.3)
तथापि तत्त्वमाख्यास्ये दुःखस्यैतस्य संभवम् । शक्यं वा यदि वाऽशक्यं शृणु भद्रे यथातथम् ॥
tathāpi tattvamākhyāsye duḥkhasyaitasya saṃbhavam | śakyaṃ vā yadi vā'śakyaṃ śṛṇu bhadre yathātatham
फिर भी मैं इस दुःख की उत्पत्ति ठीक-ठीक बताता हूँ। इसका उपाय हो सके या न हो सके, हे भद्रे, यथार्थ बात सुनो।
श्लोक 4 (1.174.4)
समीपे नगरस्यास्य बको वसति राक्षसः । इतो गव्यूतिमात्रेऽस्ति यमुनागह्वरे गुहा ॥
samīpe nagarasyāsya bako vasati rākṣasaḥ | ito gavyūtimātre'sti yamunāgahvare guhā
इस नगर के समीप बक नाम का एक राक्षस रहता है। यहाँ से केवल दो कोस की दूरी पर यमुना के एक गह्वर में एक गुफा है।
श्लोक 5 (1.174.5)
तस्यां घोरः स वसति जिघांसुः पुरुषादकः । बकाभिधानो दुष्टात्मा राक्षसानां कुलाधमः ॥
tasyāṃ ghoraḥ sa vasati jighāṃsuḥ puruṣādakaḥ | bakābhidhāno duṣṭātmā rākṣasānāṃ kulādhamaḥ
उसमें वह भयंकर, हिंसा पर तुला हुआ नरभक्षी रहता है — बक नाम का दुष्टात्मा, राक्षसकुल का अधम।
श्लोक 6 (1.174.6)
ईशो जनपदस्यास्य पुरस्य च महाबलः । पुष्टो मानुषमांसेन दुर्बुद्धिः पुरुषादकः ॥
īśo janapadasyāsya purasya ca mahābalaḥ | puṣṭo mānuṣamāṃsena durbuddhiḥ puruṣādakaḥ
वह महाबली इस जनपद और इस नगर का स्वामी है; मनुष्य-मांस से पुष्ट, दुर्बुद्धि और नरभक्षी।
श्लोक 7 (1.174.7)
प्रबलः कामरूपी च राक्षसस्तु महाबलः । तेनोपसृष्टा नगरी वर्षमद्य त्रयोदशम् ॥
prabalaḥ kāmarūpī ca rākṣasastu mahābalaḥ | tenopasṛṣṭā nagarī varṣamadya trayodaśam
वह इच्छानुसार रूप धारण करने वाला, अत्यन्त बलवान, प्रबल राक्षस है; उसके द्वारा यह नगरी आज तेरह वर्षों से पीड़ित है।
श्लोक 8 (1.174.8)
तत्कृते परचक्राच्च भूतेभ्यश्च न नो भयम् । पुरुषादेन रौद्रेण भक्ष्यमाणा दुरात्मना ॥
tatkṛte paracakrācca bhūtebhyaśca na no bhayam | puruṣādena raudreṇa bhakṣyamāṇā durātmanā
उसके कारण हमें शत्रु-सेनाओं से और अन्य प्राणियों से भय नहीं है। पर उस भयंकर दुष्टात्मा नरभक्षी द्वारा खाई जाती हुई
श्लोक 9 (1.174.9)
अनाथा नगरी नाथं त्रातारं नाधिगच्छति । गुहायां च वसंस्तत्र बाधते सततं जनम् ॥
anāthā nagarī nāthaṃ trātāraṃ nādhigacchati | guhāyāṃ ca vasaṃstatra bādhate satataṃ janam
यह अनाथ नगरी किसी रक्षक स्वामी को नहीं पाती। उस गुफा में रहता हुआ वह लोगों को निरन्तर सताता है —
श्लोक 10 (1.174.10)
स्त्रियो बालांश्च वृद्धांश्च यूनश्चापि दुरात्मवान् । अत्र मन्त्रैश्च होमैश्च भोजनैश्च स राक्षसः ॥
striyo bālāṃśca vṛddhāṃśca yūnaścāpi durātmavān | atra mantraiśca homaiśca bhojanaiśca sa rākṣasaḥ
स्त्रियों, बालकों, बूढ़ों और युवकों को भी, वह दुष्ट। यहाँ उस राक्षस की मन्त्रों, होमों और भोजन से
श्लोक 11 (1.174.11)
ईडितो द्विजमुख्यैश्च पूजितश्च दुरात्मवान् । यदा च सकलानेवं प्रसूदयति राक्षसः ॥
īḍito dvijamukhyaiśca pūjitaśca durātmavān | yadā ca sakalānevaṃ prasūdayati rākṣasaḥ
श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने स्तुति और पूजा की, फिर भी वह दुष्ट ही बना रहा। और जब वह राक्षस इस प्रकार सबका संहार करने लगा,
श्लोक 12 (1.174.12)
अथैनं ब्राह्मणाः सर्वे समये समयोजयन् । मा स्म कामाद्वधी रक्षो दास्यामस्ते सदा वयं ॥
athainaṃ brāhmaṇāḥ sarve samaye samayojayan | mā sma kāmādvadhī rakṣo dāsyāmaste sadā vayaṃ
तब सब ब्राह्मणों ने उसे एक समझौते में बाँधा — 'हे राक्षस, अपनी इच्छा से वध मत करो; हम तुम्हें सदा देते रहेंगे,
श्लोक 13 (1.174.13)
पर्यायेण यथाकाममिह मांसोदनं प्रभो । अन्नं मांससमायुक्तं तिलचूर्णसमन्वितम् ॥
paryāyeṇa yathākāmamiha māṃsodanaṃ prabho | annaṃ māṃsasamāyuktaṃ tilacūrṇasamanvitam
हे प्रभो, यहाँ बारी-बारी से, तुम्हारी इच्छा के अनुसार मांस और भात — मांस मिला हुआ, तिल के चूर्ण से युक्त अन्न,
श्लोक 14 (1.174.14)
सर्पिषा च समायुक्तं व्यञ्जनैश्च समन्वितम् । सूपांस्त्रीन्सतिलान्पिण्डाँल्लाजापूपसुरासवान् ॥
sarpiṣā ca samāyuktaṃ vyañjanaiśca samanvitam | sūpāṃstrīnsatilānpiṇḍām̐llājāpūpasurāsavān
घी से युक्त और व्यंजनों सहित; तीन प्रकार की दालें, तिल के पिण्ड, लावा, पुए, सुरा और आसव;
श्लोक 15 (1.174.15)
शृताशृतान्पानकुम्भान्स्थूलमांसं शृताशृतम् । वनमाहिषवाराहभाल्लूकं च शृताशृतम् ॥
śṛtāśṛtānpānakumbhānsthūlamāṃsaṃ śṛtāśṛtam | vanamāhiṣavārāhabhāllūkaṃ ca śṛtāśṛtam
पके और कच्चे पेय के घड़े; पका और कच्चा मोटा मांस; जंगली भैंसे, सूअर और भालू का मांस, पका और कच्चा;
श्लोक 16 (1.174.16)
सर्पिःकुम्भांश्च विविधान्दधिकुम्भांस्तथा बहून् । सद्यःसिद्धसमायुक्तं तिलचूर्णैः समाकुलम् ॥
sarpiḥkumbhāṃśca vividhāndadhikumbhāṃstathā bahūn | sadyaḥsiddhasamāyuktaṃ tilacūrṇaiḥ samākulam
नाना प्रकार के घी के घड़े और बहुत से दही के घड़े, ताज़ा पका भोजन, तिल के चूर्ण से भरा हुआ;
श्लोक 17 (1.174.17)
कुलाच्च पुरुषं चैकं बलीवर्दौ च कालकौ । प्राप्स्यसि त्वमसंक्रुद्धो रक्षोभागं प्रकल्पितम् ॥
kulācca puruṣaṃ caikaṃ balīvardau ca kālakau | prāpsyasi tvamasaṃkruddho rakṣobhāgaṃ prakalpitam
और एक कुल से एक पुरुष तथा दो काले बैल — राक्षस के लिए नियत यह भाग तुम बिना क्रोध के पाओगे।
श्लोक 18 (1.174.18)
तिष्ठेह समयेऽस्माकमित्ययाचन्त तं द्विजाः । बाढमित्येव तद्रक्षस्तद्वचः प्रत्यगृह्णत ॥
tiṣṭheha samaye'smākamityayācanta taṃ dvijāḥ | bāḍhamityeva tadrakṣastadvacaḥ pratyagṛhṇata
हमारे इस समझौते पर यहाँ टिके रहो।' ऐसी ब्राह्मणों ने उससे याचना की, और उस राक्षस ने 'ठीक है' कहकर उनकी बात मान ली।
श्लोक 19 (1.174.19)
परचक्राटवीकेभ्यो रक्षणं स करोति च । तस्मिन्भागे सुनिर्दिष्टे स्थितः स समये बली ॥
paracakrāṭavīkebhyo rakṣaṇaṃ sa karoti ca | tasminbhāge sunirdiṣṭe sthitaḥ sa samaye balī
और वह शत्रु-सेनाओं तथा वनवासी लुटेरों से हमारी रक्षा करता है। वह भाग भली-भाँति नियत हो जाने पर वह बलवान समझौते पर टिका हुआ है।
श्लोक 20 (1.174.20)
एकैकं चैव पुरुषं संप्रयच्छन्ति वेतनम् । स वारो बहुभिर्वर्षैर्भवत्यसुकरो नरैः ॥
ekaikaṃ caiva puruṣaṃ saṃprayacchanti vetanam | sa vāro bahubhirvarṣairbhavatyasukaro naraiḥ
लोग बारी-बारी से एक-एक पुरुष उसे वेतन के रूप में देते हैं। वह बारी बहुत वर्षों पर आती है, पर मनुष्यों के लिए उसे निभाना कठिन है।
श्लोक 21 (1.174.21)
तद्विमोक्षाय ये केचिद्यतन्ते पुरुषाः क्वचित् । सपुत्रदारांस्तान्हत्वा तद्रक्षो भक्षयत्युत ॥
tadvimokṣāya ye kecidyatante puruṣāḥ kvacit | saputradārāṃstānhatvā tadrakṣo bhakṣayatyuta
जो कोई पुरुष कहीं उससे छुटकारे का प्रयत्न करते हैं, उन्हें वह राक्षस पुत्रों और पत्नियों सहित मारकर खा जाता है।
श्लोक 22 (1.174.22)
वेत्रकीयगृहे राजा नायं नयमिहास्थितः । उपायं तं न कुरुते यत्नादपि स मन्दधीः । अनामयं जनस्यास्य येन स्यादद्य शाश्वतम् ॥
vetrakīyagṛhe rājā nāyaṃ nayamihāsthitaḥ | upāyaṃ taṃ na kurute yatnādapi sa mandadhīḥ | anāmayaṃ janasyāsya yena syādadya śāśvatam
वेत्रकीयगृह में रहने वाला राजा यहाँ उचित नीति नहीं अपनाता। वह मन्दबुद्धि प्रयत्न करके भी वह उपाय नहीं करता जिससे इन लोगों का स्थायी कल्याण हो।
श्लोक 23 (1.174.23)
एतदर्हा वयं नूनं वसामो दुर्बलस्य ये । विषये नित्यवास्तव्याः कुराजानमुपाश्रिताः ॥
etadarhā vayaṃ nūnaṃ vasāmo durbalasya ye | viṣaye nityavāstavyāḥ kurājānamupāśritāḥ
निश्चय ही हम इसी के योग्य हैं, जो एक दुर्बल राजा के राज्य में स्थायी रूप से बसे हुए, कुराजा के आश्रय में रहते हैं।
श्लोक 24 (1.174.24)
ब्राह्मणाः कस्य वक्तव्याः कस्य वाच्छन्दचारिणः । गुणैरेते हि वत्स्यन्ति कामगाः पक्षिणो यथा ॥
brāhmaṇāḥ kasya vaktavyāḥ kasya vācchandacāriṇaḥ | guṇairete hi vatsyanti kāmagāḥ pakṣiṇo yathā
ब्राह्मण किसके अधीन हैं, या स्वेच्छा से विचरने वाले वे किसके वश में हैं? इच्छानुसार उड़ने वाले पक्षियों की भाँति वे वहीं बसते हैं जहाँ गुण हों।
श्लोक 25 (1.174.25)
राजानं प्रथमं विन्देत्ततो भार्यां ततो धनम् । राजन्यसति लोकेऽस्मिन्कुतो भार्या कुतो धनम् । त्रयस्य संचयेनास्य ज्ञातीन्पुत्रांश्च तारयेत् ॥
rājānaṃ prathamaṃ vindettato bhāryāṃ tato dhanam | rājanyasati loke'sminkuto bhāryā kuto dhanam | trayasya saṃcayenāsya jñātīnputrāṃśca tārayet
मनुष्य पहले राजा को पाए, फिर पत्नी को, फिर धन को। इस संसार में राजा न हो तो पत्नी कहाँ और धन कहाँ? इन तीनों के संचय से ही वह अपने बन्धुओं और पुत्रों को पार लगाता है।
श्लोक 26 (1.174.26)
विपरीतं मया चेदं त्रयं सर्वमुपार्जितम् । तदिमामापदं प्राप्य भृशं तप्यामहे वयम् ॥
viparītaṃ mayā cedaṃ trayaṃ sarvamupārjitam | tadimāmāpadaṃ prāpya bhṛśaṃ tapyāmahe vayam
पर मैंने ये तीनों उलटे क्रम से अर्जित किए; इसलिए इस आपत्ति में पड़कर हम अत्यन्त सन्तप्त हैं।
श्लोक 27 (1.174.27)
सोऽयमस्माननुप्राप्तो वारः कुलविनाशनः । भोजनं पुरुषश्चैकः प्रदेयं वेतनं मया ॥
so'yamasmānanuprāpto vāraḥ kulavināśanaḥ | bhojanaṃ puruṣaścaikaḥ pradeyaṃ vetanaṃ mayā
अब कुल का नाश करने वाली वह बारी हम पर आ पड़ी है; मुझे भोजन और एक पुरुष वेतन के रूप में देना है।
श्लोक 28 (1.174.28)
न च मे विद्यते वित्तं संक्रेतुं पुरुषं क्वचित् । सुहृज्जनं प्रदातुं च न शक्ष्यामि कदाचन ॥
na ca me vidyate vittaṃ saṃkretuṃ puruṣaṃ kvacit | suhṛjjanaṃ pradātuṃ ca na śakṣyāmi kadācana
मेरे पास कहीं से एक पुरुष खरीदने के लिए धन नहीं है, और अपने किसी सुहृद को मैं कभी नहीं दे सकूँगा।
श्लोक 29 (1.174.29)
गतिं चान्यां न पश्यामि तस्मान्मोक्षाय रक्षसः । सोऽहं दुःखार्णवे मग्नो महत्यसुकरे भृशम् ॥
gatiṃ cānyāṃ na paśyāmi tasmānmokṣāya rakṣasaḥ | so'haṃ duḥkhārṇave magno mahatyasukare bhṛśam
राक्षस से छुटकारे का मुझे कोई दूसरा मार्ग नहीं दिखता। इसलिए मैं दुःख के विशाल और दुस्तर सागर में गहरा डूबा हुआ हूँ।
श्लोक 30 (1.174.30)
सहैवैतैर्गमिष्यामि बान्धवैरद्य राक्षसम् । ततो नः सहितान्क्षुद्रः सर्वानेवोपभोक्ष्यति ॥
sahaivaitairgamiṣyāmi bāndhavairadya rākṣasam | tato naḥ sahitānkṣudraḥ sarvānevopabhokṣyati
आज मैं इन सब बन्धुओं के साथ ही राक्षस के पास जाऊँगा; तब वह नीच हम सबको एक साथ खा जाएगा।
श्लोक 31 (1.174.31)
दुःखमूलमिदं भद्रे मयोक्तं प्रश्नतोऽनघे ॥
duḥkhamūlamidaṃ bhadre mayoktaṃ praśnato'naghe
हे भद्रे, हे निष्पापे, तुम्हारे पूछने पर मैंने इस दुःख का मूल बता दिया।