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आदि पर्व · अध्याय 175

कुन्ती का अपने पुत्र को भेजने का प्रस्ताव

कुन्ती ब्राह्मण से कहती हैं कि वे निराश न हों: न उन्हें, न उनकी पत्नी या बच्चों को जाना है, क्योंकि उनके पाँच पुत्रों में से एक राक्षस के पास बलि लेकर जाएगा। ब्राह्मण अपने लिए किसी ब्राह्मण और अतिथि के प्राण देने को तैयार नहीं, क्योंकि ब्राह्मण-वध ऐसा पाप है जिसका कोई प्रायश्चित्त नहीं। कुन्ती उन्हें आश्वस्त करती हैं कि उनका पुत्र पराक्रमी और मन्त्रसिद्ध है और अनेक राक्षसों को मार चुका है, और केवल इतना चाहती हैं कि यह बात गुप्त रखी जाए। पति-पत्नी प्रसन्न होकर मान जाते हैं, और कुन्ती तथा ब्राह्मण वायुपुत्र भीम से यह कार्य करने को कहते हैं; भीम स्वीकार कर लेते हैं।

अध्याय 174अध्याय-सूचीअध्याय 176

कुन्त्युवाच

श्लोक 1 (1.175.1)

न विषादस्त्वया कार्यो भयादस्मात्कथंचन । उपायः परिदृष्टोऽत्र तस्मान्मोक्षाय रक्षसः ॥

na viṣādastvayā kāryo bhayādasmātkathaṃcana | upāyaḥ paridṛṣṭo'tra tasmānmokṣāya rakṣasaḥ

इस भय के कारण आपको किसी प्रकार विषाद नहीं करना चाहिए। मैंने उस राक्षस से छुटकारे का उपाय देख लिया है।

श्लोक 2 (1.175.2)

नैव स्वयं सपुत्रस्य गमनं तत्र रोचये । एकस्तव सुतो बालः कन्या चैका तपस्विनी । न चैतयोस्तथा पत्न्या गमनं तव रोचये ॥

naiva svayaṃ saputrasya gamanaṃ tatra rocaye | ekastava suto bālaḥ kanyā caikā tapasvinī | na caitayostathā patnyā gamanaṃ tava rocaye

मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि आप स्वयं पुत्र सहित वहाँ जाएँ। आपका एक ही छोटा पुत्र है और एक ही बेचारी कन्या; इन दोनों का या आपकी पत्नी का वहाँ जाना भी मुझे उचित नहीं लगता।

श्लोक 3 (1.175.3)

मम पञ्च सुता ब्रह्मंस्तेषामेको गमिष्यति । त्वदर्थं बलिमादाय तस्य पापस्य रक्षसः ॥

mama pañca sutā brahmaṃsteṣāmeko gamiṣyati | tvadarthaṃ balimādāya tasya pāpasya rakṣasaḥ

हे ब्रह्मन्, मेरे पाँच पुत्र हैं; उनमें से एक आपके लिए उस पापी राक्षस की बलि लेकर जाएगा।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 4 (1.175.4)

नाहमेतत्करिष्यामि जीवितार्थी कथंचन । ब्राह्मणस्यातिथेश्चैव स्वार्थे प्राणान्वियोजयन् ॥

nāhametatkariṣyāmi jīvitārthī kathaṃcana | brāhmaṇasyātitheścaiva svārthe prāṇānviyojayan

अपने प्राण बचाने की इच्छा से मैं ऐसा कदापि नहीं करूँगा कि अपने स्वार्थ के लिए एक ब्राह्मण और अतिथि के प्राण ले लूँ।

श्लोक 5 (1.175.5)

न त्वेतदकुलीनासु नाधर्मिष्ठासु विद्यते । यद्ब्राह्मणार्थं विसृजेदात्मानमपि चात्मजम् ॥

na tvetadakulīnāsu nādharmiṣṭhāsu vidyate | yadbrāhmaṇārthaṃ visṛjedātmānamapi cātmajam

नीच कुल की या अधर्मी स्त्रियों में ऐसा नहीं पाया जाता कि कोई ब्राह्मण के लिए अपने को और अपने पुत्र को भी त्याग दे।

श्लोक 6 (1.175.6)

आत्मनस्तु वधः श्रेयो बोद्धव्यमिति रोचते । ब्रह्मवध्याऽऽत्मवध्या वा श्रेयानात्मवधो मम ॥

ātmanastu vadhaḥ śreyo boddhavyamiti rocate | brahmavadhyā''tmavadhyā vā śreyānātmavadho mama

मुझे तो यही उचित लगता है कि अपना वध ही श्रेयस्कर है। ब्राह्मण-वध और आत्म-वध में मेरे लिए आत्म-वध ही श्रेष्ठ है।

श्लोक 7 (1.175.7)

ब्रह्मवध्या परं पापं निष्कृतिर्नात्र विद्यते । अबुद्धिपूर्वं कृत्वापि प्रत्यवायो हि विद्यते ॥

brahmavadhyā paraṃ pāpaṃ niṣkṛtirnātra vidyate | abuddhipūrvaṃ kṛtvāpi pratyavāyo hi vidyate

ब्राह्मण-वध सबसे बड़ा पाप है; इसका कोई प्रायश्चित्त नहीं। अनजाने में करने पर भी इसका दोष लगता ही है।

श्लोक 8 (1.175.8)

न त्वहं वधमाकाङ्क्षे स्वयमेवात्मनः शुभे । परैः कृते वधे पापं न किंचिन्मयि विद्यते ॥

na tvahaṃ vadhamākāṅkṣe svayamevātmanaḥ śubhe | paraiḥ kṛte vadhe pāpaṃ na kiṃcinmayi vidyate

हे शुभे, मैं स्वयं अपना वध नहीं चाहता; पर दूसरों द्वारा वध किए जाने पर मुझे कोई पाप नहीं लगता।

श्लोक 9 (1.175.9)

अभिसंधौ कृते तस्मिन्ब्राह्मणस्य वधे मया । निष्कृतिं न प्रपश्यामि नृशंसं क्षुद्रमेव च ॥

abhisaṃdhau kṛte tasminbrāhmaṇasya vadhe mayā | niṣkṛtiṃ na prapaśyāmi nṛśaṃsaṃ kṣudrameva ca

किन्तु यदि मैं जान-बूझकर किसी ब्राह्मण का वध कराऊँ, तो उसका कोई प्रायश्चित्त मुझे नहीं दिखता; वह क्रूर और नीच कर्म होगा।

श्लोक 10 (1.175.10)

आगतस्य गृहं त्यागस्तथैव शरणार्थिनः । याचमानस्य च वधो नृशंसो गर्हितो बुधैः ॥

āgatasya gṛhaṃ tyāgastathaiva śaraṇārthinaḥ | yācamānasya ca vadho nṛśaṃso garhito budhaiḥ

घर आए हुए का त्याग, उसी प्रकार शरण माँगने वाले का त्याग, और याचना करने वाले का वध — बुद्धिमान इसे क्रूर और निन्दनीय मानते हैं।

श्लोक 11 (1.175.11)

कुर्यान्न निन्दितं कर्म न नृशंसं कथंचन । इति पूर्वे महात्मान आपद्धर्मविदो विदुः ॥

kuryānna ninditaṃ karma na nṛśaṃsaṃ kathaṃcana | iti pūrve mahātmāna āpaddharmavido viduḥ

निन्दित और क्रूर कर्म कभी नहीं करना चाहिए — ऐसा आपद्धर्म के ज्ञाता प्राचीन महात्मा मानते आए हैं।

श्लोक 12 (1.175.12)

श्रेयांस्तु सहदारस्य विनाशोऽद्य मम स्वयम् । ब्राह्मणस्य वधं नाहमनुमंस्ये कदाचन ॥

śreyāṃstu sahadārasya vināśo'dya mama svayam | brāhmaṇasya vadhaṃ nāhamanumaṃsye kadācana

आज पत्नी सहित मेरा स्वयं नष्ट हो जाना ही श्रेयस्कर है; ब्राह्मण के वध की अनुमति मैं कभी नहीं दूँगा।

कुन्त्युवाच

श्लोक 13 (1.175.13)

ममाप्येषा मतिर्ब्रह्मन्विप्रा रक्ष्या इति स्थिरा । न चाप्यनिष्टः पुत्रो मे यदि पुत्रशतं भवेत् ॥

mamāpyeṣā matirbrahmanviprā rakṣyā iti sthirā | na cāpyaniṣṭaḥ putro me yadi putraśataṃ bhavet

हे ब्रह्मन्, मेरा भी यही दृढ़ मत है कि ब्राह्मणों की रक्षा करनी चाहिए। और मुझे अपना पुत्र अप्रिय भी नहीं है — चाहे मेरे सौ पुत्र ही क्यों न हों।

श्लोक 14 (1.175.14)

न चासौ राक्षसः शक्तो मम पुत्रविनाशने । वीर्यवान्मन्त्रसिद्धश्च तेजस्वी च सुतो मम ॥

na cāsau rākṣasaḥ śakto mama putravināśane | vīryavānmantrasiddhaśca tejasvī ca suto mama

किन्तु वह राक्षस मेरे पुत्र का नाश करने में समर्थ नहीं है। मेरा पुत्र पराक्रमी, मन्त्रसिद्ध और तेजस्वी है।

श्लोक 15 (1.175.15)

राक्षसाय च तत्सर्वं प्रापयिष्यति भोजनम् । मोक्षयिष्यति चात्मानमिति मे निश्चिता मतिः ॥

rākṣasāya ca tatsarvaṃ prāpayiṣyati bhojanam | mokṣayiṣyati cātmānamiti me niścitā matiḥ

वह राक्षस तक वह सारा भोजन पहुँचा देगा और अपने को भी छुड़ा लाएगा — ऐसा मेरा निश्चित मत है।

श्लोक 16 (1.175.16)

समागताश्च वीरेण दृष्टपूर्वाश्च राक्षसाः । बलवन्तो महाकाया निहताश्चाप्यनेकशः ॥

samāgatāśca vīreṇa dṛṣṭapūrvāśca rākṣasāḥ | balavanto mahākāyā nihatāścāpyanekaśaḥ

बड़े-बड़े शरीर वाले अनेक बलवान राक्षस पहले उस वीर से भिड़ चुके हैं, और मैंने उन्हें उसके हाथों मरते देखा है।

श्लोक 17 (1.175.17)

न त्विदं केषुचिद्ब्रह्मन्व्याहर्तव्यं कथंचन । विद्यार्थिनो हि मे पुत्रान्विप्रकुर्युः कुतूहलात् ॥

na tvidaṃ keṣucidbrahmanvyāhartavyaṃ kathaṃcana | vidyārthino hi me putrānviprakuryuḥ kutūhalāt

किन्तु हे ब्रह्मन्, यह बात किसी से कदापि न कहिएगा; क्योंकि विद्या के इच्छुक लोग कौतूहलवश मेरे पुत्रों को तंग करेंगे।

श्लोक 18 (1.175.18)

गुरुणा चाननुज्ञातो ग्राहयेद्यः सुतो मम । न स कुर्यात्तथा कार्यं विद्ययेति सतां मतम् ॥

guruṇā cānanujñāto grāhayedyaḥ suto mama | na sa kuryāttathā kāryaṃ vidyayeti satāṃ matam

और मेरा जो पुत्र गुरु की आज्ञा के बिना वह विद्या किसी को सिखा दे, वह उस विद्या से अपना कार्य सिद्ध नहीं कर पाएगा — ऐसा सज्जनों का मत है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 19 (1.175.19)

एवमुक्तस्तु पृथया स विप्रो भार्यया सह । हृष्टः संपूजयामास तद्वाक्यममृतोपमम् ॥

evamuktastu pṛthayā sa vipro bhāryayā saha | hṛṣṭaḥ saṃpūjayāmāsa tadvākyamamṛtopamam

पृथा के ऐसा कहने पर वह ब्राह्मण अपनी पत्नी सहित हर्षित हुआ और उसने उनके अमृत-समान वचनों का आदर किया।

श्लोक 20 (1.175.20)

ततः कुन्ती च विप्रश्च सहितावनिलात्मजम् । तमब्रूतां कुरुष्वेति स तथेत्यब्रवीच्च तौ ॥

tataḥ kuntī ca vipraśca sahitāvanilātmajam | tamabrūtāṃ kuruṣveti sa tathetyabravīcca tau

तब कुन्ती और ब्राह्मण ने मिलकर वायुपुत्र (भीम) से कहा — 'यह कार्य करो', और उसने उन दोनों से कहा — 'ऐसा ही होगा।'

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