आदि पर्व · अध्याय 2
समन्तपञ्चक और पर्वों का संग्रह
ऋषियों के पूछने पर सौति बताते हैं कि समन्तपञ्चक का यह नाम कैसे पड़ा: वहाँ परशुराम ने क्षत्रियों के रक्त से पाँच सरोवर भरे थे, और वहीं बाद में कुरुक्षेत्र के युद्ध में अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र होकर नष्ट हुईं। वे एक अक्षौहिणी की इकाई-दर-इकाई संख्या और कौरव सेनापतियों के युद्ध के दिन बताते हैं। फिर वे महाभारत के सौ उपपर्वों की सूची देते हैं और अठारह मुख्य पर्वों में से प्रत्येक की घटनाओं का सार, उसके अध्यायों और श्लोकों की संख्या सहित, क्रम से बताते हैं; अन्त में हरिवंश नामक खिल भाग और इस ग्रन्थ के श्रवण के पुण्य का वर्णन है।
ऋषय ऊचुः
श्लोक 1 (1.2.1)
समन्तपञ्चकमिति यदुक्तं सूतनन्दन । एतत्सर्वं यथातत्त्वं श्रोतुमिच्छामहे वयम् ॥
samantapañcakamiti yaduktaṃ sūtanandana | etatsarvaṃ yathātattvaṃ śrotumicchāmahe vayam
हे सूतपुत्र, आपने जिस समन्तपञ्चक का उल्लेख किया, उसके विषय में हम सब कुछ यथार्थ रूप में सुनना चाहते हैं।
सौतिरुवाच
श्लोक 2 (1.2.2)
शृणुध्वं मम भो विप्रा ब्रुवतश्च कथाः शुभाः । समन्तपञ्चकाख्यं च श्रोतुमर्हथ सत्तमाः ॥
śṛṇudhvaṃ mama bho viprā bruvataśca kathāḥ śubhāḥ | samantapañcakākhyaṃ ca śrotumarhatha sattamāḥ
हे ब्राह्मणो, मैं जो शुभ कथाएँ कहता हूँ, उन्हें सुनिए। हे श्रेष्ठजनो, समन्तपञ्चक नामक स्थान का वृत्तान्त सुनने के आप अधिकारी हैं।
श्लोक 3 (1.2.3)
त्रेताद्वापरयोः सन्धौ रामः शस्त्रभृतां वरः । असकृत्पार्थिवं क्षत्रं जघानामर्षचोदितः ॥
tretādvāparayoḥ sandhau rāmaḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ | asakṛtpārthivaṃ kṣatraṃ jaghānāmarṣacoditaḥ
त्रेता और द्वापर युगों की सन्धि के समय शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ राम (परशुराम) ने असहनीय क्रोध से प्रेरित होकर पृथ्वी के क्षत्रिय राजाओं का बार-बार संहार किया।
श्लोक 4 (1.2.4)
स सर्वं क्षत्रमुत्साद्य स्ववीर्येणानलद्युतिः । समन्तपञ्चके पञ्च चकार रुधिरह्रदान् ॥
sa sarvaṃ kṣatramutsādya svavīryeṇānaladyutiḥ | samantapañcake pañca cakāra rudhirahradān
अग्नि के समान तेजस्वी परशुराम ने अपने पराक्रम से समस्त क्षत्रिय-वर्ग का विनाश करके समन्तपञ्चक में रक्त के पाँच सरोवर बना दिए।
श्लोक 5 (1.2.5)
स तेषु रुधिराम्भःसु ह्रदेषु क्रोधमूर्च्छितः । पितॄन्संतर्पयामास रुधिरेणेति नः श्रुतम् ॥
sa teṣu rudhirāmbhaḥsu hradeṣu krodhamūrcchitaḥ | pitṝnsaṃtarpayāmāsa rudhireṇeti naḥ śrutam
हमने सुना है कि क्रोध से विवेक खो बैठे परशुराम ने रक्त-जल वाले उन सरोवरों में रक्त से ही अपने पितरों का तर्पण किया।
श्लोक 6 (1.2.6)
अथर्चीकादयोऽभ्येत्य पितरो राममब्रुवन् । राम राम महाभाग प्रीताः स्म तव भार्गव ॥
atharcīkādayo'bhyetya pitaro rāmamabruvan | rāma rāma mahābhāga prītāḥ sma tava bhārgava
तब ऋचीक आदि पितर परशुराम के पास आए और बोले — "राम, राम, हे महाभाग भार्गव, हम तुमसे प्रसन्न हैं।
श्लोक 7 (1.2.7)
अनया पितृभक्त्या च विक्रमेण तव प्रभो । वरं वृणीष्व भद्रं ते यमिच्छसि महाद्युते ॥
anayā pitṛbhaktyā ca vikrameṇa tava prabho | varaṃ vṛṇīṣva bhadraṃ te yamicchasi mahādyute
हे प्रभो, पितरों के प्रति तुम्हारी इस भक्ति और तुम्हारे पराक्रम से (हम संतुष्ट हैं)। हे महातेजस्वी, तुम्हारा कल्याण हो; जो चाहो वह वर माँग लो।"
राम उवाच
श्लोक 8 (1.2.8)
यदि मे पितरः प्रीता यद्यनुग्राह्यता मयि । यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं मया ॥
yadi me pitaraḥ prītā yadyanugrāhyatā mayi | yacca roṣābhibhūtena kṣatramutsāditaṃ mayā
यदि मेरे पितर मुझ पर प्रसन्न हैं और मैं आपकी कृपा का पात्र हूँ, तो क्रोध के वश होकर मैंने जो क्षत्रियों का संहार किया है,
श्लोक 9 (1.2.9)
अतश्च पापान्मुच्येऽहमेष मे प्रार्थितो वरः । ह्रदाश्च तीर्थभूता मे भवेयुर्भुवि विश्रुताः ॥
ataśca pāpānmucye'hameṣa me prārthito varaḥ | hradāśca tīrthabhūtā me bhaveyurbhuvi viśrutāḥ
उस पाप से मैं मुक्त हो जाऊँ, यही वर मैं माँगता हूँ। और मेरे ये सरोवर पृथ्वी पर प्रसिद्ध तीर्थ बन जाएँ।
सौतिरुवाच
श्लोक 10 (1.2.10)
एवं भविष्यतीत्येवं पितरस्तमथाब्रुवन् । तं क्षमस्वेति निषिषिधुस्ततः स विरराम ह ॥
evaṃ bhaviṣyatītyevaṃ pitarastamathābruvan | taṃ kṣamasveti niṣiṣidhustataḥ sa virarāma ha
तब पितरों ने उससे कहा — "ऐसा ही होगा।" फिर "अब क्षमा करो" कहकर उन्होंने उसे रोका, और वह शान्त हो गया।
श्लोक 11 (1.2.11)
तेषां समीपे यो देशो ह्रदानां रुधिराम्भसाम् । समन्तपञ्चकमिति पुण्यं तत्परिकीर्तितम् ॥
teṣāṃ samīpe yo deśo hradānāṃ rudhirāmbhasām | samantapañcakamiti puṇyaṃ tatparikīrtitam
रक्त-जल वाले उन सरोवरों के आसपास का जो प्रदेश है, वह पवित्र "समन्तपञ्चक" के नाम से प्रसिद्ध है।
श्लोक 12 (1.2.12)
येन लिङ्गेन यो देशो युक्तः समुपलक्ष्यते । तेनैव नाम्ना तं देशं वाच्यमाहुर्मनीषिणः ॥
yena liṅgena yo deśo yuktaḥ samupalakṣyate | tenaiva nāmnā taṃ deśaṃ vācyamāhurmanīṣiṇaḥ
विद्वान कहते हैं कि जिस चिह्न से कोई प्रदेश पहचाना जाता है, उसी नाम से उस प्रदेश को पुकारना चाहिए।
श्लोक 13 (1.2.13)
अन्तरे चैव संप्राप्ते कलिद्वापरयोरभूत् । समन्तपञ्चके युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥
antare caiva saṃprāpte kalidvāparayorabhūt | samantapañcake yuddhaṃ kurupāṇḍavasenayoḥ
कलि और द्वापर के सन्धिकाल में समन्तपञ्चक में कौरवों और पाण्डवों की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ।
श्लोक 14 (1.2.14)
तस्मिन्परमधर्मिष्ठे देशे भूदोषवर्जिते । अष्टादश समाजग्मुरक्षौहिण्यो युयुत्सया ॥
tasminparamadharmiṣṭhe deśe bhūdoṣavarjite | aṣṭādaśa samājagmurakṣauhiṇyo yuyutsayā
भूमि के सब दोषों से रहित उस परम धर्ममय प्रदेश में युद्ध की इच्छा से अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हुईं।
श्लोक 15 (1.2.15)
समेत्य तं द्विजास्ताश्च तत्रैव निधनं गताः । एतन्नामाभिनिर्वृत्तं तस्य देशस्य वै द्विजाः ॥
sametya taṃ dvijāstāśca tatraiva nidhanaṃ gatāḥ | etannāmābhinirvṛttaṃ tasya deśasya vai dvijāḥ
हे द्विजो, वे सेनाएँ वहाँ एकत्र होकर वहीं नष्ट हो गईं। हे ब्राह्मणो, इसी प्रकार उस प्रदेश का यह नाम प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 16 (1.2.16)
पुण्यश्च रमणीयश्च स देशो वः प्रकीर्तितः । तदेतत्कथितं सर्वं मया ब्राह्मणसत्तमाः । यथा देशः स विख्यातस्त्रिषु लोकेषु सुव्रताः ॥
puṇyaśca ramaṇīyaśca sa deśo vaḥ prakīrtitaḥ | tadetatkathitaṃ sarvaṃ mayā brāhmaṇasattamāḥ | yathā deśaḥ sa vikhyātastriṣu lokeṣu suvratāḥ
वह पवित्र और रमणीय प्रदेश आपके सामने वर्णित हो गया। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, हे उत्तम व्रतधारियो, वह प्रदेश तीनों लोकों में किस प्रकार विख्यात हुआ, यह सब मैंने आपसे कह दिया।
ऋषय ऊचुः
श्लोक 17 (1.2.17)
अक्षौहिण्य इति प्रोक्तं यत्त्वया सूतनन्दन । एतदिच्छामहे श्रोतुं सर्वमेव यथातथम् ॥
akṣauhiṇya iti proktaṃ yattvayā sūtanandana | etadicchāmahe śrotuṃ sarvameva yathātatham
हे सूतपुत्र, आपने जिन "अक्षौहिणी" सेनाओं का उल्लेख किया, उनके विषय में हम सब कुछ ठीक-ठीक सुनना चाहते हैं।
श्लोक 18 (1.2.18)
अक्षौहिण्याः परीमाणं नराश्वरथदन्तिनाम् । यथावच्चैव नो ब्रूहि सर्वं हि विदितं तव ॥
akṣauhiṇyāḥ parīmāṇaṃ narāśvarathadantinām | yathāvaccaiva no brūhi sarvaṃ hi viditaṃ tava
एक अक्षौहिणी में कितने पैदल, घोड़े, रथ और हाथी होते हैं, यह परिमाण हमें ठीक-ठीक बताइए, क्योंकि आप सब कुछ जानते हैं।
सौतिरुवाच
श्लोक 19 (1.2.19)
एको रथो गजश्चैको नराः पञ्च पदातयः । त्रयश्च तुरगास्तज्ज्ञैः पत्तिरित्यभिधीयते ॥
eko ratho gajaścaiko narāḥ pañca padātayaḥ | trayaśca turagāstajjñaiḥ pattirityabhidhīyate
एक रथ, एक हाथी, पाँच पैदल सैनिक और तीन घोड़े — इसके जानकार इसे "पत्ति" कहते हैं।
श्लोक 20 (1.2.20)
पत्तिं तु त्रिगुणामेतामाहुः सेनामुखं बुधाः । त्रीणि सेनामुखान्येको गुल्म इत्यभिधीयते ॥
pattiṃ tu triguṇāmetāmāhuḥ senāmukhaṃ budhāḥ | trīṇi senāmukhānyeko gulma ityabhidhīyate
विद्वान तीन पत्तियों को "सेनामुख" कहते हैं; तीन सेनामुखों का एक "गुल्म" होता है।
श्लोक 21 (1.2.21)
त्रयो गुल्मा गणो नाम वाहिनी तु गणास्त्रयः । स्मृतास्तिस्रस्तु वाहिन्यः पृतनेति विचक्षणैः ॥
trayo gulmā gaṇo nāma vāhinī tu gaṇāstrayaḥ | smṛtāstisrastu vāhinyaḥ pṛtaneti vicakṣaṇaiḥ
तीन गुल्मों को "गण" कहते हैं, तीन गणों की एक "वाहिनी" होती है, और विद्वान तीन वाहिनियों को "पृतना" कहते हैं।
श्लोक 22 (1.2.22)
चमूस्तु पृतनास्तिस्रस्तिस्रश्चम्वस्त्वनीकिनी । अनीकिनीं दशगुणां प्राहुरक्षौहिणीं बुधाः ॥
camūstu pṛtanāstisrastisraścamvastvanīkinī | anīkinīṃ daśaguṇāṃ prāhurakṣauhiṇīṃ budhāḥ
तीन पृतनाओं की एक "चमू", तीन चमुओं की एक "अनीकिनी" होती है, और दस अनीकिनियों को विद्वान "अक्षौहिणी" कहते हैं।
श्लोक 23 (1.2.23)
अक्षौहिण्याः प्रसंख्याता रथानां द्विजसत्तमाः । संख्यागणिततत्त्वज्ञैः सहस्राण्येकविंशतिः ॥
akṣauhiṇyāḥ prasaṃkhyātā rathānāṃ dvijasattamāḥ | saṃkhyāgaṇitatattvajñaiḥ sahasrāṇyekaviṃśatiḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, गणना और संख्या-शास्त्र के तत्त्वज्ञों ने एक अक्षौहिणी में रथों की संख्या इक्कीस हज़ार
श्लोक 24 (1.2.24)
शतान्युपरि चैवाष्टौ तथा भूयश्च सप्ततिः । गजानां च परीमाणमेतदेव विनिर्दिशेत् ॥
śatānyupari caivāṣṭau tathā bhūyaśca saptatiḥ | gajānāṃ ca parīmāṇametadeva vinirdiśet
और उसके ऊपर आठ सौ सत्तर, अर्थात् 21,870 बताई है। हाथियों की संख्या भी इतनी ही बतानी चाहिए।
श्लोक 25 (1.2.25)
ज्ञेयं शतसहस्रं तु सहस्राणि नवैव तु । नराणामपि पञ्चाशच्छतानि त्रीणि चानघाः ॥
jñeyaṃ śatasahasraṃ tu sahasrāṇi navaiva tu | narāṇāmapi pañcāśacchatāni trīṇi cānaghāḥ
हे निष्पाप ब्राह्मणो, पैदल सैनिकों की संख्या एक लाख नौ हज़ार तीन सौ पचास, अर्थात् 1,09,350 जाननी चाहिए।
श्लोक 26 (1.2.26)
पञ्च षष्टिसहस्राणि तथाश्वानां शतानि च । दशोत्तराणि षट् प्राहुर्यथावदिह संख्यया ॥
pañca ṣaṣṭisahasrāṇi tathāśvānāṃ śatāni ca | daśottarāṇi ṣaṭ prāhuryathāvadiha saṃkhyayā
घोड़ों की संख्या, ठीक-ठीक गिनने पर, पैंसठ हज़ार छह सौ दस, अर्थात् 65,610 बताई जाती है।
श्लोक 27 (1.2.27)
एतामक्षौहिणीं प्राहुः संख्यातत्त्वविदो जनाः । यां वः कथितवानस्मि विस्तरेण तपोधनाः ॥
etāmakṣauhiṇīṃ prāhuḥ saṃkhyātattvavido janāḥ | yāṃ vaḥ kathitavānasmi vistareṇa tapodhanāḥ
हे तपोधनो, संख्या-तत्त्व के ज्ञाता इसी को अक्षौहिणी कहते हैं, जिसका मैंने आपसे विस्तार से वर्णन किया है।
श्लोक 28 (1.2.28)
एतया संख्यया ह्यासन्कुरुपाण्डवसेनयोः । अक्षौहिण्यो द्विजश्रेष्ठाः पिण्डिताष्टादशैव तु ॥
etayā saṃkhyayā hyāsankurupāṇḍavasenayoḥ | akṣauhiṇyo dvijaśreṣṭhāḥ piṇḍitāṣṭādaśaiva tu
हे श्रेष्ठ द्विजो, इसी गणना के अनुसार कौरवों और पाण्डवों की सेनाएँ मिलाकर अठारह अक्षौहिणी थीं।
श्लोक 29 (1.2.29)
समेतास्तत्र वै देशे तत्रैव निधनं गताः । कौरवान्कारणं कृत्वा कालेनाद्भुतकर्मणा ॥
sametāstatra vai deśe tatraiva nidhanaṃ gatāḥ | kauravānkāraṇaṃ kṛtvā kālenādbhutakarmaṇā
वे उसी प्रदेश में एकत्र हुईं और वहीं नष्ट हो गईं; अद्भुत कर्म करने वाले काल ने कौरवों को इसका निमित्त बनाया।
श्लोक 30 (1.2.30)
अहानि युयुधे भीष्मो दशैव परमास्त्रवित् । अहानि पञ्च द्रोणस्तु ररक्ष कुरुवाहिनीम् ॥
ahāni yuyudhe bhīṣmo daśaiva paramāstravit | ahāni pañca droṇastu rarakṣa kuruvāhinīm
परम अस्त्रों के ज्ञाता भीष्म ने दस दिन युद्ध किया; द्रोण ने पाँच दिन तक कौरव-सेना की रक्षा की।
श्लोक 31 (1.2.31)
अहनी युयुधे द्वे तु कर्णः परबलार्दनः । शल्योऽर्धदिवसं चैव गदायुद्धमतः परम् ॥
ahanī yuyudhe dve tu karṇaḥ parabalārdanaḥ | śalyo'rdhadivasaṃ caiva gadāyuddhamataḥ param
शत्रु-सेना का संहार करने वाले कर्ण ने दो दिन युद्ध किया और शल्य ने आधे दिन; इसके बाद गदा-युद्ध हुआ।
श्लोक 32 (1.2.32)
तस्यैव दिवसस्यान्ते द्रौणिहार्दिक्यगौतमाः । प्रसुप्तं निशि विश्वस्तं जघ्नुर्यौधिष्ठिरं बलम् ॥
tasyaiva divasasyānte drauṇihārdikyagautamāḥ | prasuptaṃ niśi viśvastaṃ jaghnuryaudhiṣṭhiraṃ balam
उसी दिन के अन्त में, रात के समय, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, हार्दिक्य कृतवर्मा और गौतम कृपाचार्य ने निश्चिन्त सोई हुई युधिष्ठिर की सेना का संहार कर दिया।
श्लोक 33 (1.2.33)
यत्तु शौनक सत्रे ते भारताख्यानमुत्तमम् । जनमेजयस्य तत्सत्रे व्यासशिष्येण धीमता ॥
yattu śaunaka satre te bhāratākhyānamuttamam | janamejayasya tatsatre vyāsaśiṣyeṇa dhīmatā
हे शौनक, आपके इस सत्र में जो उत्तम भारत-आख्यान कहा जा रहा है, वही जनमेजय के सत्र में व्यास के बुद्धिमान शिष्य ने
श्लोक 34 (1.2.34)
कथितं विस्तरार्थं च यशो वीर्यं महीक्षिताम् । पौष्यं तत्र च पौलोममास्तीकं चादितः स्मृतम् ॥
kathitaṃ vistarārthaṃ ca yaśo vīryaṃ mahīkṣitām | pauṣyaṃ tatra ca paulomamāstīkaṃ cāditaḥ smṛtam
राजाओं के यश और पराक्रम का वर्णन करते हुए विस्तार से कहा था; उसमें आरम्भ में पौष्य, पौलोम और आस्तीक (पर्व) रखे गए हैं।
श्लोक 35 (1.2.35)
विचित्रार्थपदाख्यानमनेकसमयान्वितम् । प्रतिपन्नं नरैः प्राज्ञैर्वैराग्यमिव मोक्षिभिः ॥
vicitrārthapadākhyānamanekasamayānvitam | pratipannaṃ naraiḥ prājñairvairāgyamiva mokṣibhiḥ
विचित्र अर्थों और पदों से युक्त तथा अनेक सिद्धान्तों को समेटे हुए इस आख्यान को बुद्धिमानों ने वैसे ही अपनाया है, जैसे मोक्ष चाहने वाले वैराग्य को अपनाते हैं।
श्लोक 36 (1.2.36)
आत्मेव वेदितव्येषु प्रियेष्विव हि जीवितम् । इतिहासः प्रधानार्थः श्रेष्ठः सर्वागमेष्वयम् ॥
ātmeva veditavyeṣu priyeṣviva hi jīvitam | itihāsaḥ pradhānārthaḥ śreṣṭhaḥ sarvāgameṣvayam
जैसे जानने योग्य वस्तुओं में आत्मा और प्रिय वस्तुओं में प्राण सर्वोपरि हैं, वैसे ही परम प्रयोजन को सिद्ध करने वाला यह इतिहास समस्त शास्त्रों में श्रेष्ठ है।
श्लोक 37 (1.2.37)
अनाश्रित्येदमाख्यानं कथा भुवि न विद्यते । आहारमनपाश्रित्य शरीरस्येव धारणम् ॥
anāśrityedamākhyānaṃ kathā bhuvi na vidyate | āhāramanapāśritya śarīrasyeva dhāraṇam
पृथ्वी पर ऐसी कोई कथा नहीं जो इस आख्यान पर आश्रित न हो, जैसे भोजन का सहारा लिए बिना शरीर टिक नहीं सकता।
श्लोक 38 (1.2.38)
तदेतद्भारतं नाम कविभिस्तूपजीव्यते । उदयप्रेप्सुभिर्भृत्यैरभिजात इवेश्वरः ॥
tadetadbhārataṃ nāma kavibhistūpajīvyate | udayaprepsubhirbhṛtyairabhijāta iveśvaraḥ
इसी "भारत" नामक ग्रन्थ का आश्रय लेकर कवि जीते हैं, जैसे उन्नति चाहने वाले सेवक किसी कुलीन स्वामी का आश्रय लेते हैं।
श्लोक 39 (1.2.39)
इतिहासोत्तमे यस्मिन्नर्पिता बुद्धिरुत्तमा । स्वरव्यञ्जनयोः कृत्स्ना लोकवेदाश्रयेव वाक् ॥
itihāsottame yasminnarpitā buddhiruttamā | svaravyañjanayoḥ kṛtsnā lokavedāśrayeva vāk
इस उत्तम इतिहास में श्रेष्ठ बुद्धि उसी प्रकार निहित है, जैसे लोक और वेद दोनों की सम्पूर्ण वाणी स्वरों और व्यञ्जनों पर आश्रित है।
श्लोक 40 (1.2.40)
तस्य प्रज्ञाभिपन्नस्य विचित्रपदपर्वणः । सूक्ष्मार्थन्याययुक्तस्य वेदार्थैर्भूषितस्य च ॥
tasya prajñābhipannasya vicitrapadaparvaṇaḥ | sūkṣmārthanyāyayuktasya vedārthairbhūṣitasya ca
जो प्रज्ञा से परिपूर्ण है, जिसके पद और पर्व विचित्र हैं, जो सूक्ष्म अर्थ और न्याय से युक्त है तथा वेदों के अर्थ से विभूषित है,
श्लोक 41 (1.2.41)
भारतस्येतिहासस्य श्रूयतां पर्वसंग्रहः । पर्वानुक्रमणी पूर्वं द्वितीयः पर्वसंग्रहः ॥
bhāratasyetihāsasya śrūyatāṃ parvasaṃgrahaḥ | parvānukramaṇī pūrvaṃ dvitīyaḥ parvasaṃgrahaḥ
उस भारत-इतिहास का पर्वसंग्रह सुनिए। पहला पर्व "पर्वानुक्रमणी" है और दूसरा "पर्वसंग्रह"।
श्लोक 42 (1.2.42)
पौष्यं पौलोममास्तीकमादिरंशावतारणम् । ततः संभवपर्वोक्तमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥
pauṣyaṃ paulomamāstīkamādiraṃśāvatāraṇam | tataḥ saṃbhavaparvoktamadbhutaṃ romaharṣaṇam
फिर पौष्य, पौलोम, आस्तीक और आदि-अंशावतरण (देवांशों का अवतरण); उसके बाद रोमांचित कर देने वाला अद्भुत सम्भव पर्व कहा गया है।
श्लोक 43 (1.2.43)
दाहो जतुगृहस्यात्र हैडिम्बं पर्व चोच्यते । ततो बकवधः पर्व पर्व चैत्ररथं ततः ॥
dāho jatugṛhasyātra haiḍimbaṃ parva cocyate | tato bakavadhaḥ parva parva caitrarathaṃ tataḥ
यहाँ लाक्षागृह-दाह और हैडिम्ब नामक पर्व आते हैं; फिर बकवध पर्व, और उसके बाद चैत्ररथ पर्व।
श्लोक 44 (1.2.44)
ततः स्वयंवरो देव्याः पाञ्चाल्याः पर्व चोच्यते । क्षात्रधर्मेण निर्जित्य ततो वैवाहिकं स्मृतम् ॥
tataḥ svayaṃvaro devyāḥ pāñcālyāḥ parva cocyate | kṣātradharmeṇa nirjitya tato vaivāhikaṃ smṛtam
फिर पाञ्चाल की राजकुमारी देवी द्रौपदी के स्वयंवर का पर्व कहा गया है; फिर क्षात्रधर्म से विजय पाने के बाद वैवाहिक पर्व।
श्लोक 45 (1.2.45)
विदुरागमनं पर्व राज्यलाभस्तथैव च । अर्जुनस्य वने वासः सुभद्राहरणं ततः ॥
vidurāgamanaṃ parva rājyalābhastathaiva ca | arjunasya vane vāsaḥ subhadrāharaṇaṃ tataḥ
विदुरागमन पर्व, फिर राज्यलाभ; अर्जुन का वनवास; फिर सुभद्राहरण।
श्लोक 46 (1.2.46)
सुभद्राहरणादूर्ध्वं ज्ञेया हरणहारिका । ततः खाण्डवदाहाख्यं तत्रैव मयदर्शनम् ॥
subhadrāharaṇādūrdhvaṃ jñeyā haraṇahārikā | tataḥ khāṇḍavadāhākhyaṃ tatraiva mayadarśanam
सुभद्राहरण के बाद हरणहारिका (दहेज लाने का पर्व) जाननी चाहिए; फिर खाण्डवदाह नामक पर्व, और उसी में मयदर्शन।
श्लोक 47 (1.2.47)
सभापर्व ततः प्रोक्तं मन्त्रपर्व ततः परम् । जरासन्धवधः पर्व पर्व दिग्विजयं तथा ॥
sabhāparva tataḥ proktaṃ mantraparva tataḥ param | jarāsandhavadhaḥ parva parva digvijayaṃ tathā
फिर सभापर्व कहा गया है, उसके बाद मन्त्रपर्व; जरासन्धवध पर्व और दिग्विजय पर्व।
श्लोक 48 (1.2.48)
पर्व दिग्विजयादूर्ध्वं राजसूयिकमुच्यते । ततश्चार्घाभिहरणं शिशुपालवधस्ततः ॥
parva digvijayādūrdhvaṃ rājasūyikamucyate | tataścārghābhiharaṇaṃ śiśupālavadhastataḥ
दिग्विजय पर्व के बाद राजसूयिक पर्व कहा जाता है; फिर अर्घाभिहरण, और फिर शिशुपालवध।
श्लोक 49 (1.2.49)
द्यूतपर्व ततः प्रोक्तमनुद्यूतमतः परम् । तत आरण्यकं पर्व किर्मीरवध एव च ॥
dyūtaparva tataḥ proktamanudyūtamataḥ param | tata āraṇyakaṃ parva kirmīravadha eva ca
फिर द्यूतपर्व कहा गया है, उसके बाद अनुद्यूत; फिर आरण्यक पर्व और किर्मीरवध।
श्लोक 50 (1.2.50)
अर्जुनस्याभिगमनं पर्व ज्ञेयमतः परम् । ईश्वरार्जुनयोर्युद्धं पर्व कैरातसंज्ञितम् ॥
arjunasyābhigamanaṃ parva jñeyamataḥ param | īśvarārjunayoryuddhaṃ parva kairātasaṃjñitam
इसके बाद अर्जुनाभिगमन पर्व जानना चाहिए; फिर ईश्वर (शिव) और अर्जुन का युद्ध, जो कैरात पर्व कहलाता है।
श्लोक 51 (1.2.51)
इन्द्रलोकाभिगमनं पर्व ज्ञेयमतः परम् । नलोपाख्यानमपि च धार्मिकं करुणोदयम् ॥
indralokābhigamanaṃ parva jñeyamataḥ param | nalopākhyānamapi ca dhārmikaṃ karuṇodayam
इसके बाद इन्द्रलोकाभिगमन पर्व जानना चाहिए; और धर्ममय तथा करुणा जगाने वाला नलोपाख्यान भी।
श्लोक 52 (1.2.52)
तीर्थयात्रा ततः पर्व कुरुराजस्य धीमतः । जटासुरवधः पर्व यक्षयुद्धमतः परम् ॥
tīrthayātrā tataḥ parva kururājasya dhīmataḥ | jaṭāsuravadhaḥ parva yakṣayuddhamataḥ param
फिर बुद्धिमान कुरुराज (युधिष्ठिर) का तीर्थयात्रा पर्व; जटासुरवध पर्व, और उसके बाद यक्षयुद्ध।
श्लोक 53 (1.2.53)
निवातकवचैर्युद्धं पर्व चाजगरं ततः । मार्कण्डेयसमास्या च पर्वानन्तरमुच्यते ॥
nivātakavacairyuddhaṃ parva cājagaraṃ tataḥ | mārkaṇḍeyasamāsyā ca parvānantaramucyate
निवातकवचों के साथ युद्ध, फिर आजगर पर्व; उसके बाद मार्कण्डेय-समास्या पर्व कहा गया है।
श्लोक 54 (1.2.54)
संवादश्च ततः पर्व द्रौपदीसत्यभामयोः । घोषयात्रा ततः पर्व ततः प्रायोपवेशनम् । मन्त्रस्य निश्चयं चैव मृगस्वप्नोद्भवं ततः ॥
saṃvādaśca tataḥ parva draupadīsatyabhāmayoḥ | ghoṣayātrā tataḥ parva tataḥ prāyopaveśanam | mantrasya niścayaṃ caiva mṛgasvapnodbhavaṃ tataḥ
फिर द्रौपदी और सत्यभामा के संवाद का पर्व; फिर घोषयात्रा पर्व; फिर प्रायोपवेशन; मन्त्रणा का निश्चय; और फिर मृगस्वप्नोद्भव।
श्लोक 55 (1.2.55)
व्रीहिद्रौणिकमाख्यानमैन्द्रद्युम्नं तथैव च । द्रौपदीहरणं पर्व जयद्रथविमोक्षणम् ॥
vrīhidrauṇikamākhyānamaindradyumnaṃ tathaiva ca | draupadīharaṇaṃ parva jayadrathavimokṣaṇam
व्रीहिद्रौणिक आख्यान और ऐन्द्रद्युम्न; द्रौपदीहरण पर्व और जयद्रथविमोक्षण।
श्लोक 56 (1.2.56)
रामोपाख्यानमत्रैव पर्व ज्ञेयमतः परम् । पतिव्रताया माहात्म्यं सावित्र्याश्चैवमद्भुतम् ॥
rāmopākhyānamatraiva parva jñeyamataḥ param | pativratāyā māhātmyaṃ sāvitryāścaivamadbhutam
इसके बाद यहीं रामोपाख्यान पर्व जानना चाहिए; और पतिव्रता सावित्री का अद्भुत माहात्म्य भी।
श्लोक 57 (1.2.57)
कुण्डलाहरणं पर्व ततः परमिहोच्यते । आरणेयं ततः पर्व वैराटं तदनन्तरम् । पाण्डवानां प्रवेशश्च समयस्य च पालनम् ॥
kuṇḍalāharaṇaṃ parva tataḥ paramihocyate | āraṇeyaṃ tataḥ parva vairāṭaṃ tadanantaram | pāṇḍavānāṃ praveśaśca samayasya ca pālanam
उसके बाद यहाँ कुण्डलाहरण पर्व कहा गया है; फिर आरणेय पर्व; फिर वैराट पर्व, जिसमें पाण्डवों का (विराटनगर में) प्रवेश और प्रतिज्ञा का पालन है।
श्लोक 58 (1.2.58)
कीचकानां वधः पर्व पर्व गोग्रहणं ततः । अभिमन्योश्च वैराट्याः पर्व वैवाहिकं स्मृतम् ॥
kīcakānāṃ vadhaḥ parva parva gograhaṇaṃ tataḥ | abhimanyośca vairāṭyāḥ parva vaivāhikaṃ smṛtam
कीचकवध पर्व, फिर गोग्रहण पर्व; और अभिमन्यु तथा विराट की पुत्री (उत्तरा) का वैवाहिक पर्व।
श्लोक 59 (1.2.59)
उद्योगपर्व विज्ञेयमत ऊर्ध्वं महाद्भुतम् । ततः संजययानाख्यं पर्व ज्ञेयमतः परम् ॥
udyogaparva vijñeyamata ūrdhvaṃ mahādbhutam | tataḥ saṃjayayānākhyaṃ parva jñeyamataḥ param
इसके बाद अत्यन्त अद्भुत उद्योगपर्व जानना चाहिए; फिर सञ्जययान नामक पर्व।
श्लोक 60 (1.2.60)
प्रजागरं तथा पर्व धृतराष्ट्रस्य चिन्तया । पर्व सानत्सुजातं वै गुह्यमध्यात्मदर्शनम् ॥
prajāgaraṃ tathā parva dhṛtarāṣṭrasya cintayā | parva sānatsujātaṃ vai guhyamadhyātmadarśanam
इसी प्रकार धृतराष्ट्र की चिन्ता से उत्पन्न प्रजागर पर्व; और गूढ़ अध्यात्म का दर्शन कराने वाला सनत्सुजात पर्व।
श्लोक 61 (1.2.61)
यानसन्धिस्ततः पर्व भगवद्यानमेव च । मातलीयमुपाख्यानं चरितं गालवस्य च ॥
yānasandhistataḥ parva bhagavadyānameva ca | mātalīyamupākhyānaṃ caritaṃ gālavasya ca
फिर यानसन्धि पर्व और भगवद्यान; मातलि का उपाख्यान और गालव का चरित्र।
श्लोक 62 (1.2.62)
सावित्रं वामदेव्यं च वैन्योपाख्यानमेव च । जामदग्न्यमुपाख्यानं पर्व षोडशराजकम् ॥
sāvitraṃ vāmadevyaṃ ca vainyopākhyānameva ca | jāmadagnyamupākhyānaṃ parva ṣoḍaśarājakam
सावित्र, वामदेव्य और वैन्य का उपाख्यान; जामदग्न्य (परशुराम) का उपाख्यान, और षोडशराजक पर्व।
श्लोक 63 (1.2.63)
सभाप्रवेशः कृष्णस्य विदुलापुत्रशासनम् । उद्योगः सैन्यनिर्याणं विश्वोपाख्यानमेव च ॥
sabhāpraveśaḥ kṛṣṇasya vidulāputraśāsanam | udyogaḥ sainyaniryāṇaṃ viśvopākhyānameva ca
कृष्ण का सभा-प्रवेश; विदुला का अपने पुत्र को उपदेश; युद्ध की तैयारी, सेनाओं का प्रस्थान, और विश्वोपाख्यान।
श्लोक 64 (1.2.64)
ज्ञेयं विवादपर्वात्र कर्णस्यापि महात्मनः । मन्त्रस्य निश्चयं कृत्वा कार्यस्य समनन्तरम् ॥
jñeyaṃ vivādaparvātra karṇasyāpi mahātmanaḥ | mantrasya niścayaṃ kṛtvā kāryasya samanantaram
यहीं महात्मा कर्ण का विवाद पर्व भी जानना चाहिए; करने योग्य कार्य का निश्चय करने के तुरन्त बाद मन्त्रणा का निर्णय;
श्लोक 65 (1.2.65)
श्वेतस्य वासुदेवेन चित्रं बहुकथाश्रयम् । निर्याणं च ततः पर्व कुरुपाण्डवसेनयोः ॥
śvetasya vāsudevena citraṃ bahukathāśrayam | niryāṇaṃ ca tataḥ parva kurupāṇḍavasenayoḥ
वासुदेव के साथ श्वेत का अनेक कथाओं से युक्त विचित्र वृत्तान्त; और फिर कौरव तथा पाण्डव सेनाओं का निर्याण पर्व।
श्लोक 66 (1.2.66)
रथातिरथसंख्या च पर्वोक्तं तदनन्तरम् । उलूकदूतागमनं पर्वामर्षविवर्धनम् ॥
rathātirathasaṃkhyā ca parvoktaṃ tadanantaram | ulūkadūtāgamanaṃ parvāmarṣavivardhanam
उसके बाद रथियों और अतिरथियों की गणना का पर्व कहा गया है; फिर क्रोध को बढ़ाने वाला उलूकदूतागमन पर्व।
श्लोक 67 (1.2.67)
अम्बोपाख्यानमत्रैव पर्व ज्ञेयमतः परम् । भीष्माभिषेचनं पर्व ततश्चाद्भुतमुच्यते ॥
ambopākhyānamatraiva parva jñeyamataḥ param | bhīṣmābhiṣecanaṃ parva tataścādbhutamucyate
इसके बाद यहीं अम्बोपाख्यान पर्व जानना चाहिए; फिर अद्भुत भीष्माभिषेचन पर्व कहा गया है।
श्लोक 68 (1.2.68)
जम्बूखण्डविनिर्माणं पर्वोक्तं तदनन्तरम् । भूमिपर्व ततः प्रोक्तं द्वीपविस्तारकीर्तनम् ॥
jambūkhaṇḍavinirmāṇaṃ parvoktaṃ tadanantaram | bhūmiparva tataḥ proktaṃ dvīpavistārakīrtanam
उसके बाद जम्बूखण्डविनिर्माण पर्व कहा गया है; फिर द्वीपों के विस्तार का वर्णन करने वाला भूमि पर्व।
श्लोक 69 (1.2.69)
दिव्यं चक्षुर्ददौ यत्र संजयाय महामुनिः । पर्वोक्तं भगवद्गीता पर्व भीष्मवधस्ततः । द्रोणाभिषेचनं पर्व संशप्तकवधस्ततः ॥
divyaṃ cakṣurdadau yatra saṃjayāya mahāmuniḥ | parvoktaṃ bhagavadgītā parva bhīṣmavadhastataḥ | droṇābhiṣecanaṃ parva saṃśaptakavadhastataḥ
जिसमें महामुनि (व्यास) ने सञ्जय को दिव्य दृष्टि दी; फिर भगवद्गीता पर्व, फिर भीष्मवध पर्व; द्रोणाभिषेचन पर्व, फिर संशप्तकवध।
श्लोक 70 (1.2.70)
अभिमन्युवधः पर्व प्रतिज्ञा पर्व चोच्यते । जयद्रथवधः पर्व घटोत्कचवधस्ततः ॥
abhimanyuvadhaḥ parva pratijñā parva cocyate | jayadrathavadhaḥ parva ghaṭotkacavadhastataḥ
अभिमन्युवध पर्व, और प्रतिज्ञा पर्व; जयद्रथवध पर्व, फिर घटोत्कचवध।
श्लोक 71 (1.2.71)
ततो द्रोणवधः पर्व विज्ञेयं लोमहर्षणम् । मोक्षो नारायणास्त्रस्य पर्वानन्तरमुच्यते ॥
tato droṇavadhaḥ parva vijñeyaṃ lomaharṣaṇam | mokṣo nārāyaṇāstrasya parvānantaramucyate
फिर रोंगटे खड़े कर देने वाला द्रोणवध पर्व जानना चाहिए; उसके बाद नारायणास्त्र-मोक्ष पर्व कहा गया है।
श्लोक 72 (1.2.72)
कर्णपर्व ततो ज्ञेयं शल्यपर्व ततः परम् । ह्रदप्रवेशनं पर्व गदायुद्धमतः परम् ॥
karṇaparva tato jñeyaṃ śalyaparva tataḥ param | hradapraveśanaṃ parva gadāyuddhamataḥ param
फिर कर्णपर्व जानना चाहिए, उसके बाद शल्यपर्व; ह्रदप्रवेशन पर्व, और उसके बाद गदायुद्ध।
श्लोक 73 (1.2.73)
सारस्वतं ततः पर्व तीर्थवंशानुकीर्तनम् । अत ऊर्ध्वं सुबीभत्सं पर्व सौप्तिकमुच्यते ॥
sārasvataṃ tataḥ parva tīrthavaṃśānukīrtanam | ata ūrdhvaṃ subībhatsaṃ parva sauptikamucyate
फिर तीर्थों और वंशों का वर्णन करने वाला सारस्वत पर्व; उसके बाद अत्यन्त वीभत्स सौप्तिक पर्व कहा गया है।
श्लोक 74 (1.2.74)
ऐषीकं पर्व चोद्दिष्टमत ऊर्ध्वं सुदारुणम् । जलप्रदानिकं पर्व स्त्रीविलापस्ततः परम् ॥
aiṣīkaṃ parva coddiṣṭamata ūrdhvaṃ sudāruṇam | jalapradānikaṃ parva strīvilāpastataḥ param
इसके बाद अत्यन्त भयंकर ऐषीक पर्व बताया गया है; जलप्रदानिक पर्व, और उसके बाद स्त्रीविलाप।
श्लोक 75 (1.2.75)
श्राद्धपर्व ततो ज्ञेयं कुरूणामौर्ध्वदेहिकम् । चार्वाकनिग्रहः पर्व रक्षसो ब्रह्मरूपिणः ॥
śrāddhaparva tato jñeyaṃ kurūṇāmaurdhvadehikam | cārvākanigrahaḥ parva rakṣaso brahmarūpiṇaḥ
फिर कौरवों की अन्त्येष्टि-क्रिया से सम्बन्धित श्राद्धपर्व जानना चाहिए; ब्राह्मण का रूप धारण करने वाले राक्षस (चार्वाक) के निग्रह का चार्वाकनिग्रह पर्व।
श्लोक 76 (1.2.76)
आभिषेचनिकं पर्व धर्मराजस्य धीमतः । प्रविभागो गृहाणां च पर्वोक्तं तदनन्तरम् ॥
ābhiṣecanikaṃ parva dharmarājasya dhīmataḥ | pravibhāgo gṛhāṇāṃ ca parvoktaṃ tadanantaram
बुद्धिमान धर्मराज का आभिषेचनिक पर्व; और उसके बाद भवनों के विभाजन (गृहप्रविभाग) का पर्व कहा गया है।
श्लोक 77 (1.2.77)
शान्तिपर्व ततो यत्र राजधर्मानुशासनम् । आपद्धर्मश्च पर्वोक्तं मोक्षधर्मस्ततः परम् ॥
śāntiparva tato yatra rājadharmānuśāsanam | āpaddharmaśca parvoktaṃ mokṣadharmastataḥ param
फिर शान्तिपर्व, जिसमें राजधर्मानुशासन है; आपद्धर्म पर्व; और उसके बाद मोक्षधर्म।
श्लोक 78 (1.2.78)
शुकप्रश्नाभिगमनं ब्रह्मप्रश्नानुशासनम् । प्रादुर्भावश्च दुर्वासःसंवादश्चैव मायया ॥
śukapraśnābhigamanaṃ brahmapraśnānuśāsanam | prādurbhāvaśca durvāsaḥsaṃvādaścaiva māyayā
शुकप्रश्नाभिगमन, ब्रह्मप्रश्नानुशासन, दुर्वासा का प्रादुर्भाव, और माया के साथ संवाद।
श्लोक 79 (1.2.79)
ततः पर्व परिज्ञेयमानुशासनिकं परम् । स्वर्गारोहणिकं चैव ततो भीष्मस्य धीमतः ॥
tataḥ parva parijñeyamānuśāsanikaṃ param | svargārohaṇikaṃ caiva tato bhīṣmasya dhīmataḥ
फिर उत्कृष्ट आनुशासनिक पर्व जानना चाहिए, और उसके बाद बुद्धिमान भीष्म का स्वर्गारोहणिक पर्व।
श्लोक 80 (1.2.80)
ततोऽश्वमेधिकं पर्व सर्वपापप्रणाशनम् । अनुगीता ततः पर्व ज्ञेयमध्यात्मवाचकम् ॥
tato'śvamedhikaṃ parva sarvapāpapraṇāśanam | anugītā tataḥ parva jñeyamadhyātmavācakam
फिर समस्त पापों का नाश करने वाला आश्वमेधिक पर्व; फिर अनुगीता पर्व, जिसे आत्मज्ञान का प्रतिपादक जानना चाहिए।
श्लोक 81 (1.2.81)
पर्व चाश्रमवासाख्यं पुत्रदर्शनमेव च । नारदागमनं पर्व ततः परमिहोच्यते ॥
parva cāśramavāsākhyaṃ putradarśanameva ca | nāradāgamanaṃ parva tataḥ paramihocyate
आश्रमवास नामक पर्व और पुत्रदर्शन; फिर यहाँ नारदागमन पर्व कहा गया है।
श्लोक 82 (1.2.82)
मौसलं पर्व चोद्दिष्टं ततो घोरं सुदारुणम् । महाप्रस्थानिकं पर्व स्वर्गारोहणिकं ततः ॥
mausalaṃ parva coddiṣṭaṃ tato ghoraṃ sudāruṇam | mahāprasthānikaṃ parva svargārohaṇikaṃ tataḥ
फिर घोर और अत्यन्त भयंकर मौसल पर्व बताया गया है; महाप्रस्थानिक पर्व, और फिर स्वर्गारोहणिक।
श्लोक 83 (1.2.83)
हरिवंशस्ततः पर्व पुराणं खिलसंज्ञितम् । विष्णुपर्व शिशोश्चर्या विष्णोः कंसवधस्तथा ॥
harivaṃśastataḥ parva purāṇaṃ khilasaṃjñitam | viṣṇuparva śiśoścaryā viṣṇoḥ kaṃsavadhastathā
फिर हरिवंश पर्व, जो खिल नामक पुराण है; विष्णु पर्व, विष्णु (कृष्ण) की बाल-लीलाएँ और कंसवध।
श्लोक 84 (1.2.84)
भविष्यं पर्व चाप्युक्तं खिलेष्वेवाद्भुतं महत् । एतत्पर्वशतं पूर्णं व्यासेनोक्तं महात्मना ॥
bhaviṣyaṃ parva cāpyuktaṃ khileṣvevādbhutaṃ mahat | etatparvaśataṃ pūrṇaṃ vyāsenoktaṃ mahātmanā
और खिल भागों में ही महान और अद्भुत भविष्य पर्व भी कहा गया है। महात्मा व्यास द्वारा कहे गए ये पूरे सौ पर्व हैं।
श्लोक 85 (1.2.85)
यथावत्सूतपुत्रेण रौमहर्षणिना ततः । उक्तानि नैमिशारण्ये पर्वाण्यष्टादशैव तु ॥
yathāvatsūtaputreṇa raumaharṣaṇinā tataḥ | uktāni naimiśāraṇye parvāṇyaṣṭādaśaiva tu
बाद में सूतपुत्र रौमहर्षणि ने नैमिषारण्य में इन्हें यथावत् अठारह पर्वों के रूप में सुनाया।
श्लोक 86 (1.2.86)
समासो भारतस्यायमत्रोक्तः पर्वसंग्रहः । पौष्यं पौलोममास्तीकमादिरंशावतारणम् ॥
samāso bhāratasyāyamatroktaḥ parvasaṃgrahaḥ | pauṣyaṃ paulomamāstīkamādiraṃśāvatāraṇam
भारत का यह संक्षेप, पर्वसंग्रह, यहाँ कहा गया। पौष्य, पौलोम, आस्तीक, आदि-अंशावतरण,
श्लोक 87 (1.2.87)
संभवो जतुवेश्माख्यं हिडिम्बबकयोर्वधः । तथा चैत्ररथं देव्याः पाञ्चाल्याश्च स्वयंवरः ॥
saṃbhavo jatuveśmākhyaṃ hiḍimbabakayorvadhaḥ | tathā caitrarathaṃ devyāḥ pāñcālyāśca svayaṃvaraḥ
सम्भव, जतुवेश्म (लाक्षागृह), हिडिम्ब और बक का वध, चैत्ररथ, और पाञ्चाल की राजकुमारी देवी द्रौपदी का स्वयंवर;
श्लोक 88 (1.2.88)
क्षात्रधर्मेण निर्जित्य ततो वैवाहिकं स्मृतम् । विदुरागमनं चैव राज्यलाभस्तथैव च ॥
kṣātradharmeṇa nirjitya tato vaivāhikaṃ smṛtam | vidurāgamanaṃ caiva rājyalābhastathaiva ca
फिर क्षात्रधर्म से विजय पाने के बाद वैवाहिक; विदुरागमन और राज्यलाभ;
श्लोक 89 (1.2.89)
वनवासोऽर्जुनस्यापि सुभद्राहरणं ततः । हरणाहरणं चैव दहनं खाण्डवस्य च ॥
vanavāso'rjunasyāpi subhadrāharaṇaṃ tataḥ | haraṇāharaṇaṃ caiva dahanaṃ khāṇḍavasya ca
अर्जुन का वनवास, फिर सुभद्राहरण, हरणाहरण (दहेज लाना), और खाण्डव-दहन।
श्लोक 90 (1.2.90)
पौष्ये पर्वणि माहात्म्यमुत्तङ्कस्योपवर्णितम् ॥
pauṣye parvaṇi māhātmyamuttaṅkasyopavarṇitam
पौष्य पर्व में उत्तङ्क की महिमा का वर्णन है।
श्लोक 91 (1.2.91)
पौलोमे भृगुवंशस्य विस्तारः परिकीर्तितः । आस्तीके सर्वनागानां गरुडस्य च संभवः ॥
paulome bhṛguvaṃśasya vistāraḥ parikīrtitaḥ | āstīke sarvanāgānāṃ garuḍasya ca saṃbhavaḥ
पौलोम पर्व में भृगुवंश का विस्तार से वर्णन है; आस्तीक पर्व में सभी नागों और गरुड़ की उत्पत्ति,
श्लोक 92 (1.2.92)
क्षीरोदमथनं चैव जन्मोच्चैःश्रवसस्तथा । यजतः सर्पसत्रेण राज्ञः पारिक्षितस्य च ॥
kṣīrodamathanaṃ caiva janmoccaiḥśravasastathā | yajataḥ sarpasatreṇa rājñaḥ pārikṣitasya ca
क्षीरसागर का मन्थन और उच्चैःश्रवा का जन्म; तथा राजा परीक्षित के पुत्र (जनमेजय) जब सर्पसत्र कर रहे थे, तब
श्लोक 93 (1.2.93)
कथेयमभिनिर्वृत्ता भारतानां महात्मनाम् । विविधाः संभवा राज्ञामुक्ताः संभवपर्वणि ॥
katheyamabhinirvṛttā bhāratānāṃ mahātmanām | vividhāḥ saṃbhavā rājñāmuktāḥ saṃbhavaparvaṇi
महात्मा भरतवंशियों की यह कथा प्रवृत्त हुई। सम्भव पर्व में राजाओं की विविध उत्पत्तियाँ कही गई हैं,
श्लोक 94 (1.2.94)
अन्येषां चैव शूराणामृषेर्द्वैपायनस्य च । अंशावतरणं चात्र देवानां परिकीर्तितम् ॥
anyeṣāṃ caiva śūrāṇāmṛṣerdvaipāyanasya ca | aṃśāvataraṇaṃ cātra devānāṃ parikīrtitam
और अन्य वीरों तथा ऋषि द्वैपायन की भी; यहीं देवताओं के अंशावतरण का भी वर्णन है,
श्लोक 95 (1.2.95)
दैत्यानां दानवानां च यक्षाणां च महौजसाम् । नागानामथ सर्पाणां गन्धर्वाणां पतत्त्रिणाम् ॥
daityānāṃ dānavānāṃ ca yakṣāṇāṃ ca mahaujasām | nāgānāmatha sarpāṇāṃ gandharvāṇāṃ patattriṇām
तथा दैत्यों, दानवों, महाबली यक्षों, नागों, सर्पों, गन्धर्वों, पक्षियों
श्लोक 96 (1.2.96)
अन्येषां चैव भूतानां विविधानां समुद्भवः । महर्षेराश्रमपदे कण्वस्य च तपस्विनः ॥
anyeṣāṃ caiva bhūtānāṃ vividhānāṃ samudbhavaḥ | maharṣerāśramapade kaṇvasya ca tapasvinaḥ
और अन्य विविध प्राणियों की उत्पत्ति भी। तपस्वी महर्षि कण्व के आश्रम में
श्लोक 97 (1.2.97)
शकुन्तलायां दुष्यन्ताद्भरतश्चापि जज्ञिवान् । यस्य लोकेषु नाम्नेदं प्रथितं भारतं कुलम् ॥
śakuntalāyāṃ duṣyantādbharataścāpi jajñivān | yasya lokeṣu nāmnedaṃ prathitaṃ bhārataṃ kulam
दुष्यन्त से शकुन्तला के गर्भ से भरत का जन्म हुआ, जिनके नाम से यह भरतवंश लोकों में प्रसिद्ध है।
श्लोक 98 (1.2.98)
वसूनां पुनरुत्पत्तिर्भागीरथ्यां महात्मनाम् । शन्तनोर्वेश्मनि पुनस्तेषां चारोहणं दिवि ॥
vasūnāṃ punarutpattirbhāgīrathyāṃ mahātmanām | śantanorveśmani punasteṣāṃ cārohaṇaṃ divi
गंगा के गर्भ से महात्मा वसुओं का पुनर्जन्म, और शन्तनु के घर से उनका फिर स्वर्ग लौट जाना;
श्लोक 99 (1.2.99)
तेजोंशानां च संपातो भीष्मस्याप्यत्र संभवः । राज्यान्निवर्तनं तस्य ब्रह्मचर्यव्रते स्थितिः ॥
tejoṃśānāṃ ca saṃpāto bhīṣmasyāpyatra saṃbhavaḥ | rājyānnivartanaṃ tasya brahmacaryavrate sthitiḥ
तेज के अंशों का एकत्र होना और यहीं भीष्म का जन्म; उनका राज्य से विमुख होना और ब्रह्मचर्य-व्रत में अटल रहना;
श्लोक 100 (1.2.100)
प्रतिज्ञापालनं चैव रक्षा चित्राङ्गदस्य च । हते चित्राङ्गदे चैव रक्षा भ्रातुर्यवीयसः ॥
pratijñāpālanaṃ caiva rakṣā citrāṅgadasya ca | hate citrāṅgade caiva rakṣā bhrāturyavīyasaḥ
उनकी प्रतिज्ञा का पालन, चित्राङ्गद की रक्षा, और चित्राङ्गद के मारे जाने पर छोटे भाई की रक्षा;
श्लोक 101 (1.2.101)
विचित्रवीर्यस्य तथा राज्ये संप्रतिपादनम् । धर्मस्य नृषु संभूतिरणीमाण्डव्यशापजा ॥
vicitravīryasya tathā rājye saṃpratipādanam | dharmasya nṛṣu saṃbhūtiraṇīmāṇḍavyaśāpajā
विचित्रवीर्य को राज्य सौंपना; अणीमाण्डव्य के शाप से धर्म का मनुष्यों में जन्म;
श्लोक 102 (1.2.102)
कृष्णद्वैपायनाच्चैव प्रसूतिर्वरदानजा । धृतराष्ट्रस्य पाण्डोश्च पाण्डवानां च संभवः ॥
kṛṣṇadvaipāyanāccaiva prasūtirvaradānajā | dhṛtarāṣṭrasya pāṇḍośca pāṇḍavānāṃ ca saṃbhavaḥ
कृष्णद्वैपायन के वरदान से धृतराष्ट्र और पाण्डु का जन्म, तथा पाण्डवों की उत्पत्ति;
श्लोक 103 (1.2.103)
वारणावतयात्रा च मन्त्रो दुर्योधनस्य च । कूटस्य धार्तराष्ट्रेण प्रेषणं पाण्डवान्प्रति ॥
vāraṇāvatayātrā ca mantro duryodhanasya ca | kūṭasya dhārtarāṣṭreṇa preṣaṇaṃ pāṇḍavānprati
वारणावत की यात्रा और दुर्योधन की कुमन्त्रणा; धृतराष्ट्र-पुत्र द्वारा पाण्डवों के पास कपटी (पुरोचन) को भेजना;
श्लोक 104 (1.2.104)
हितोपदेशश्च पथि धर्मराजस्य धीमतः । विदुरेण कृतो यत्र हितार्थं म्लेच्छभाषया ॥
hitopadeśaśca pathi dharmarājasya dhīmataḥ | vidureṇa kṛto yatra hitārthaṃ mlecchabhāṣayā
मार्ग में विदुर द्वारा बुद्धिमान धर्मराज को उनके हित के लिए म्लेच्छ-भाषा में दिया गया उपदेश;
श्लोक 105 (1.2.105)
विदुरस्य च वाक्येन सुरुङ्गोपक्रमक्रिया । निषाद्याः पञ्चपुत्रायाः सुप्ताया जतुवेश्मनि ॥
vidurasya ca vākyena suruṅgopakramakriyā | niṣādyāḥ pañcaputrāyāḥ suptāyā jatuveśmani
विदुर के कहने से सुरंग खोदने का कार्य; लाक्षागृह में अपने पाँच पुत्रों सहित सोई हुई निषाद स्त्री;
श्लोक 106 (1.2.106)
पुरोचनस्य चात्रैव दहनं संप्रकीर्तितम् । पाण्डवानां वने घोरे हिडिम्बायाश्च दर्शनम् ॥
purocanasya cātraiva dahanaṃ saṃprakīrtitam | pāṇḍavānāṃ vane ghore hiḍimbāyāśca darśanam
और यहीं पुरोचन के जल मरने का वर्णन है। भयानक वन में पाण्डवों का हिडिम्बा से मिलना;
श्लोक 107 (1.2.107)
तत्रैव च हिडिम्बस्य वधो भीमान्महाबलात् । घटोत्कचस्य चोत्पत्तिरत्रैव परिकीर्तिता ॥
tatraiva ca hiḍimbasya vadho bhīmānmahābalāt | ghaṭotkacasya cotpattiratraiva parikīrtitā
वहीं महाबली भीम द्वारा हिडिम्ब का वध; और यहीं घटोत्कच के जन्म का वर्णन है;
श्लोक 108 (1.2.108)
महर्षेर्दर्शनं चैव व्यासस्यामिततेजसः । तदाज्ञयैकचक्रायां ब्राह्मणस्य निवेशने ॥
maharṣerdarśanaṃ caiva vyāsasyāmitatejasaḥ | tadājñayaikacakrāyāṃ brāhmaṇasya niveśane
अपार तेज वाले महर्षि व्यास के दर्शन; और उनकी आज्ञा से एकचक्रा नगरी में एक ब्राह्मण के घर में
श्लोक 109 (1.2.109)
अज्ञातचर्यया वासो यत्र तेषां प्रकीर्तितः । बकस्य निधनं चैव नागराणां च विस्मयः ॥
ajñātacaryayā vāso yatra teṣāṃ prakīrtitaḥ | bakasya nidhanaṃ caiva nāgarāṇāṃ ca vismayaḥ
उनका छिपकर रहना, जिसका यहाँ वर्णन है; बक का वध और नगरवासियों का विस्मय;
श्लोक 110 (1.2.110)
संभवश्चैव कृष्णाया धृष्टद्युम्नस्य चैव ह । ब्राह्मणात्समुपश्रुत्य व्यासवाक्यप्रचोदिताः ॥
saṃbhavaścaiva kṛṣṇāyā dhṛṣṭadyumnasya caiva ha | brāhmaṇātsamupaśrutya vyāsavākyapracoditāḥ
कृष्णा (द्रौपदी) और धृष्टद्युम्न का जन्म। एक ब्राह्मण से यह सुनकर और व्यास के वचनों से प्रेरित होकर
श्लोक 111 (1.2.111)
द्रौपदीं प्रार्थयन्तस्ते स्वयंवरदिदृक्षया । पञ्चालानभितो जग्मुर्यत्र कौतूहलान्विताः ॥
draupadīṃ prārthayantaste svayaṃvaradidṛkṣayā | pañcālānabhito jagmuryatra kautūhalānvitāḥ
द्रौपदी को पाने की इच्छा से और स्वयंवर देखने की उत्सुकता में वे कौतूहल से भरकर पाञ्चाल देश की ओर चल पड़े।
श्लोक 112 (1.2.112)
अङ्गारपर्णं निर्जित्य गङ्गाकूलेऽर्जुनस्तदा । सख्यं कृत्वा ततस्तेन तस्मादेव च शुश्रुवे ॥
aṅgāraparṇaṃ nirjitya gaṅgākūle'rjunastadā | sakhyaṃ kṛtvā tatastena tasmādeva ca śuśruve
तब अर्जुन ने गंगा के तट पर अङ्गारपर्ण को पराजित किया, उससे मित्रता की, और उसी से सुना
श्लोक 113 (1.2.113)
तापत्यमथ वासिष्ठमौर्वं चाख्यानमुत्तमम् । भ्रातृभिः सहितः सर्वैः पञ्चालानभितो ययौ ॥
tāpatyamatha vāsiṣṭhamaurvaṃ cākhyānamuttamam | bhrātṛbhiḥ sahitaḥ sarvaiḥ pañcālānabhito yayau
तापत्य, वासिष्ठ और उत्तम और्व आख्यान; फिर अपने सब भाइयों के साथ वह पाञ्चाल देश की ओर बढ़ा।
श्लोक 114 (1.2.114)
पाञ्चालनगरे चापि लक्ष्यं भित्त्वा धनञ्जयः । द्रौपदीं लब्धवानत्र मध्ये सर्वमहीक्षिताम् ॥
pāñcālanagare cāpi lakṣyaṃ bhittvā dhanañjayaḥ | draupadīṃ labdhavānatra madhye sarvamahīkṣitām
पाञ्चाल नगर में धनञ्जय (अर्जुन) ने लक्ष्य-वेध करके सब राजाओं के बीच द्रौपदी को प्राप्त किया।
श्लोक 115 (1.2.115)
भीमसेनार्जुनौ यत्र संरब्धान्पृथिवीपतीन् । शल्यकर्णौ च तरसा जितवन्तौ महामृधे ॥
bhīmasenārjunau yatra saṃrabdhānpṛthivīpatīn | śalyakarṇau ca tarasā jitavantau mahāmṛdhe
वहाँ भीमसेन और अर्जुन ने महान युद्ध में क्रोधित राजाओं को तथा शल्य और कर्ण को शीघ्र ही जीत लिया।
श्लोक 116 (1.2.116)
दृष्ट्वा तयोश्च तद्वीर्यमप्रमेयममानुषम् । शङ्कमानौ पाण्डवांस्तान् रामकृष्णौ महामती ॥
dṛṣṭvā tayośca tadvīryamaprameyamamānuṣam | śaṅkamānau pāṇḍavāṃstān rāmakṛṣṇau mahāmatī
उन दोनों का अपार और अलौकिक पराक्रम देखकर, उनके पाण्डव होने का अनुमान करके, बुद्धिमान बलराम और कृष्ण
श्लोक 117 (1.2.117)
जग्मतुस्तैः समागन्तुं शालां भार्गववेश्मनि । पञ्चानामेकपत्नीत्वे विमर्शो द्रुपदस्य च ॥
jagmatustaiḥ samāgantuṃ śālāṃ bhārgavaveśmani | pañcānāmekapatnītve vimarśo drupadasya ca
उनसे मिलने कुम्हार के घर की शाला में गए। पाँचों की एक पत्नी होने पर द्रुपद का विचार-विमर्श;
श्लोक 118 (1.2.118)
पञ्चेन्द्राणामुपाख्यानमत्रैवाद्भुतमुच्यते । द्रौपद्या देवविहितो विवाहश्चाप्यमानुषः ॥
pañcendrāṇāmupākhyānamatraivādbhutamucyate | draupadyā devavihito vivāhaścāpyamānuṣaḥ
यहीं पाँच इन्द्रों का अद्भुत उपाख्यान, और द्रौपदी का देवताओं द्वारा विहित अलौकिक विवाह कहा गया है।
श्लोक 119 (1.2.119)
क्षत्तुश्च धार्तराष्ट्रेण प्रेषणं पाण्डवान्प्रति । विदुरस्य च संप्राप्तिर्दर्शनं केशवस्य च ॥
kṣattuśca dhārtarāṣṭreṇa preṣaṇaṃ pāṇḍavānprati | vidurasya ca saṃprāptirdarśanaṃ keśavasya ca
धृतराष्ट्र-पुत्र द्वारा क्षत्ता (विदुर) को पाण्डवों के पास भेजना; विदुर का आगमन और केशव के दर्शन;
श्लोक 120 (1.2.120)
खाण्डवप्रस्थवासश्च तथा राज्यार्धसर्जनम् । नारदस्याज्ञया चैव द्रौपद्याः समयक्रिया ॥
khāṇḍavaprasthavāsaśca tathā rājyārdhasarjanam | nāradasyājñayā caiva draupadyāḥ samayakriyā
खाण्डवप्रस्थ में निवास और आधा राज्य देना; तथा नारद की आज्ञा से द्रौपदी के विषय में नियम बनाना;
श्लोक 121 (1.2.121)
सुन्दोपसुन्दयोस्तद्वदाख्यानं परिकीर्तितम् । अनन्तरं च द्रौपद्या सहासीनं युधिष्ठिरम् ॥
sundopasundayostadvadākhyānaṃ parikīrtitam | anantaraṃ ca draupadyā sahāsīnaṃ yudhiṣṭhiram
इसी प्रकार सुन्द और उपसुन्द का आख्यान कहा गया है। इसके बाद जब युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ बैठे थे,
श्लोक 122 (1.2.122)
अनु प्रविश्य विप्रार्थे फाल्गुनो गृह्य चायुधम् । मोक्षयित्वा गृहं गत्वा विप्रार्थं कृतनिश्चयः ॥
anu praviśya viprārthe phālguno gṛhya cāyudham | mokṣayitvā gṛhaṃ gatvā viprārthaṃ kṛtaniścayaḥ
तब फाल्गुन (अर्जुन) ब्राह्मण के हित के लिए भीतर जाकर अपने अस्त्र उठा लाए; ब्राह्मण की रक्षा का निश्चय करके (उसका गोधन) छुड़ाने के बाद घर लौटकर
श्लोक 123 (1.2.123)
समयं पालयन्वीरो वनं यत्र जगाम ह । पार्थस्य वनवासे च उलूप्या पथि सङ्गमः ॥
samayaṃ pālayanvīro vanaṃ yatra jagāma ha | pārthasya vanavāse ca ulūpyā pathi saṅgamaḥ
वह वीर नियम का पालन करते हुए वन को चला गया; और पार्थ के वनवास में मार्ग में उलूपी से उनका संगम;
श्लोक 124 (1.2.124)
पुण्यतीर्थानुसंयानं बभ्रुवाहनजन्म च । तत्रैव मोक्षयामास पञ्च सोऽप्सरसः शुभाः ॥
puṇyatīrthānusaṃyānaṃ babhruvāhanajanma ca | tatraiva mokṣayāmāsa pañca so'psarasaḥ śubhāḥ
पवित्र तीर्थों की यात्रा और बभ्रुवाहन का जन्म; वहीं उन्होंने पाँच सुन्दर अप्सराओं का उद्धार किया,
श्लोक 125 (1.2.125)
शापाद्ग्राहत्वमापन्ना ब्राह्मणस्य तपस्विनः । प्रभासतीर्थे पार्थेन कृष्णस्य च समागमः ॥
śāpādgrāhatvamāpannā brāhmaṇasya tapasvinaḥ | prabhāsatīrthe pārthena kṛṣṇasya ca samāgamaḥ
जो एक तपस्वी ब्राह्मण के शाप से ग्राह (मगर) बन गई थीं; प्रभास तीर्थ में पार्थ का कृष्ण से मिलन;
श्लोक 126 (1.2.126)
द्वारकायां सुभद्रा च कामयानेन कामिनी । वासुदेवस्यानुमते प्राप्ता चैव किरीटिना ॥
dvārakāyāṃ subhadrā ca kāmayānena kāminī | vāsudevasyānumate prāptā caiva kirīṭinā
और द्वारका में, वासुदेव की अनुमति से, उसे चाहने वाले किरीटी (अर्जुन) ने प्रेममयी सुभद्रा को प्राप्त किया;
श्लोक 127 (1.2.127)
गृहीत्वा हरणं प्राप्ते कृष्णे देवकिनन्दने । अभिमन्योः सुभद्रायां जन्म चोत्तमतेजसः ॥
gṛhītvā haraṇaṃ prāpte kṛṣṇe devakinandane | abhimanyoḥ subhadrāyāṃ janma cottamatejasaḥ
देवकीनन्दन कृष्ण का दहेज लेकर आना; सुभद्रा के गर्भ से परम तेजस्वी अभिमन्यु का जन्म;
श्लोक 128 (1.2.128)
द्रौपद्यास्तनयानां च संभवोऽनुप्रकीर्तितः । विहारार्थं च गतयोः कृष्णयोर्यमुनामनु ॥
draupadyāstanayānāṃ ca saṃbhavo'nuprakīrtitaḥ | vihārārthaṃ ca gatayoḥ kṛṣṇayoryamunāmanu
द्रौपदी के पुत्रों के जन्म का वर्णन; और जब दोनों कृष्ण (कृष्ण और अर्जुन) विहार के लिए यमुना के तट पर गए,
श्लोक 129 (1.2.129)
संप्राप्तिश्चक्रधनुषोः खाण्डवस्य च दाहनम् । मयस्य मोक्षो ज्वलनाद्भुजङ्गस्य च मोक्षणम् ॥
saṃprāptiścakradhanuṣoḥ khāṇḍavasya ca dāhanam | mayasya mokṣo jvalanādbhujaṅgasya ca mokṣaṇam
तब उन्हें चक्र और धनुष की प्राप्ति, और खाण्डव-दहन; अग्नि से मय का बच निकलना और सर्प का छूटना;
श्लोक 130 (1.2.130)
महर्षेर्मन्दपालस्य शार्ङ्ग्या तनयसंभवः । इत्येतदादिपर्वोक्तं प्रथमं बहु विस्तरम् ॥
maharṣermandapālasya śārṅgyā tanayasaṃbhavaḥ | ityetadādiparvoktaṃ prathamaṃ bahu vistaram
और महर्षि मन्दपाल के शार्ङ्गी से पुत्रों का जन्म। इस प्रकार यह अत्यन्त विस्तृत प्रथम आदिपर्व कहा गया।
श्लोक 131 (1.2.131)
अध्यायानां शते द्वे तु संख्याते परमर्षिणा । सप्तविंशतिरध्याया व्यासेनोत्तमतेजसा ॥
adhyāyānāṃ śate dve tu saṃkhyāte paramarṣiṇā | saptaviṃśatiradhyāyā vyāsenottamatejasā
परम ऋषि महातेजस्वी व्यास ने इसमें दो सौ और सत्ताईस, अर्थात् 227 अध्याय गिनाए हैं।
श्लोक 132 (1.2.132)
अष्टौ श्लोकसहस्राणि अष्टौ श्लोकशतानि च । श्लोकाश्च चतुराशीतिर्मुनिनोक्ता महात्मना ॥
aṣṭau ślokasahasrāṇi aṣṭau ślokaśatāni ca | ślokāśca caturāśītirmuninoktā mahātmanā
महात्मा मुनि ने इसमें आठ हज़ार आठ सौ चौरासी, अर्थात् 8,884 श्लोक कहे हैं।
श्लोक 133 (1.2.133)
द्वितीयं तु सभापर्व बहुवृत्तान्तमुच्यते । सभाक्रिया पाण्डवानां किङ्कराणां च दर्शनम् ॥
dvitīyaṃ tu sabhāparva bahuvṛttāntamucyate | sabhākriyā pāṇḍavānāṃ kiṅkarāṇāṃ ca darśanam
दूसरा सभापर्व अनेक वृत्तान्तों से भरा कहा गया है — पाण्डवों द्वारा सभा का निर्माण, और किङ्करों (सभा के रक्षक राक्षसों) का दर्शन;
श्लोक 134 (1.2.134)
लोकपालसभाख्यानं नारदाद्देवदर्शिनः । राजसूयस्य चारम्भो जरासन्धवधस्तथा ॥
lokapālasabhākhyānaṃ nāradāddevadarśinaḥ | rājasūyasya cārambho jarāsandhavadhastathā
फिर देवताओं का दर्शन करने वाले नारद द्वारा कहा गया लोकपालों की सभाओं का वर्णन, राजसूय यज्ञ का आरम्भ और जरासन्ध का वध;
श्लोक 135 (1.2.135)
गिरिव्रजे निरुद्धानां राज्ञां कृष्णेन मोक्षणम् । तथा दिग्विजयोऽत्रैव पाण्डवानां प्रकीर्तितः ॥
girivraje niruddhānāṃ rājñāṃ kṛṣṇena mokṣaṇam | tathā digvijayo'traiva pāṇḍavānāṃ prakīrtitaḥ
गिरिव्रज में बन्दी बनाए गए राजाओं को कृष्ण द्वारा छुड़ाया जाना; और यहीं पाण्डवों की दिग्विजय का भी वर्णन है;
श्लोक 136 (1.2.136)
राज्ञामागमनं चैव सार्हणानां महाक्रतौ । राजसूयेऽर्घसंवादे शिशुपालवधस्तथा ॥
rājñāmāgamanaṃ caiva sārhaṇānāṃ mahākratau | rājasūye'rghasaṃvāde śiśupālavadhastathā
उस महायज्ञ में उपहार लेकर राजाओं का आगमन; और राजसूय में अर्घ्य को लेकर हुआ विवाद तथा शिशुपाल का वध;
श्लोक 137 (1.2.137)
यज्ञे विभूतिं तां दृष्ट्वा दुःखामर्षान्वितस्य च । दुर्योधनस्यावहासो भीमेन च सभातले ॥
yajñe vibhūtiṃ tāṃ dṛṣṭvā duḥkhāmarṣānvitasya ca | duryodhanasyāvahāso bhīmena ca sabhātale
उस यज्ञ का वैभव देखकर दुःख और क्रोध से भरे दुर्योधन का सभा-भवन में भीम द्वारा उपहास,
श्लोक 138 (1.2.138)
यत्रास्य मन्युरुद्भूतो येन द्यूतमकारयत् । यत्र धर्मसुतं द्यूते शकुनिः कितवोऽजयत् ॥
yatrāsya manyurudbhūto yena dyūtamakārayat | yatra dharmasutaṃ dyūte śakuniḥ kitavo'jayat
जिससे उसके मन में क्रोध उपजा और जिसके कारण उसने द्यूत करवाया, जिसमें कपटी शकुनि ने धर्मपुत्र युधिष्ठिर को जुए में जीत लिया;
श्लोक 139 (1.2.139)
यत्र द्यूतार्णवे मग्नां द्रौपदीं नौरिवार्णवात् । धृतराष्ट्रो महाप्राज्ञः स्नुषां परमदुःखिताम् ॥
yatra dyūtārṇave magnāṃ draupadīṃ naurivārṇavāt | dhṛtarāṣṭro mahāprājñaḥ snuṣāṃ paramaduḥkhitām
जहाँ महाबुद्धिमान धृतराष्ट्र ने द्यूत रूपी सागर में डूबी हुई, अत्यन्त दुःखी अपनी पुत्रवधू द्रौपदी को, जैसे नाव समुद्र से पार लगाती है, वैसे
श्लोक 140 (1.2.140)
तारयामास तांस्तीर्णाञ्ज्ञात्वा दुर्योधनो नृपः । पुनरेव ततो द्यूते समाह्वयत पाण्डवान् ॥
tārayāmāsa tāṃstīrṇāñjñātvā duryodhano nṛpaḥ | punareva tato dyūte samāhvayata pāṇḍavān
पार लगाया। उन्हें संकट से निकला जानकर राजा दुर्योधन ने फिर से पाण्डवों को जुए के लिए बुलाया,
श्लोक 141 (1.2.141)
जित्वा स वनवासाय प्रेषयामास तांस्ततः । एतत्सर्वं सभापर्व समाख्यातं महात्मना ॥
jitvā sa vanavāsāya preṣayāmāsa tāṃstataḥ | etatsarvaṃ sabhāparva samākhyātaṃ mahātmanā
और उन्हें जीतकर वनवास के लिए भेज दिया। महात्मा मुनि ने यह सब सभापर्व के रूप में कहा है।
श्लोक 142 (1.2.142)
अध्यायाः सप्ततिर्ज्ञेयास्तथा चाष्टौ प्रसंख्यया । श्लोकानां द्वे सहस्रे तु पञ्च श्लोकशतानि च ॥
adhyāyāḥ saptatirjñeyāstathā cāṣṭau prasaṃkhyayā | ślokānāṃ dve sahasre tu pañca ślokaśatāni ca
इसमें अध्यायों की संख्या सत्तर और आठ, अर्थात् अठहत्तर जाननी चाहिए; और श्लोक दो हज़ार पाँच सौ
श्लोक 143 (1.2.143)
श्लोकाश्चैकादश ज्ञेयाः पर्वण्यस्मिन्द्विजोत्तमाः । अतः परं तृतीयं तु ज्ञेयमारण्यकं महत् ॥
ślokāścaikādaśa jñeyāḥ parvaṇyasmindvijottamāḥ | ataḥ paraṃ tṛtīyaṃ tu jñeyamāraṇyakaṃ mahat
और ग्यारह, अर्थात् दो हज़ार पाँच सौ ग्यारह, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, इस पर्व में जानने चाहिए। इसके बाद तीसरा महान आरण्यक पर्व जानो।
श्लोक 144 (1.2.144)
वनवासं प्रयातेषु पाण्डवेषु महात्मसु । पौरानुगमनं चैव धर्मपुत्रस्य धीमतः ॥
vanavāsaṃ prayāteṣu pāṇḍaveṣu mahātmasu | paurānugamanaṃ caiva dharmaputrasya dhīmataḥ
जब महात्मा पाण्डव वनवास के लिए चल पड़े, तब नगरवासियों का बुद्धिमान धर्मपुत्र युधिष्ठिर के पीछे-पीछे जाना;
श्लोक 145 (1.2.145)
अन्नौषधीनां च कृते पाण्डवेन महात्मना । द्विजानां भरणार्थं च कृतमाराधनं रवेः ॥
annauṣadhīnāṃ ca kṛte pāṇḍavena mahātmanā | dvijānāṃ bharaṇārthaṃ ca kṛtamārādhanaṃ raveḥ
और ब्राह्मणों के भरण-पोषण के लिए अन्न और ओषधियाँ पाने हेतु महात्मा युधिष्ठिर द्वारा सूर्य की आराधना;
श्लोक 146 (1.2.146)
धौम्योपदेशात्तिग्मांशुप्रसादादन्नसंभवः । हितं च ब्रुवतः क्षत्तुः परित्यागोऽम्बिकासुतात् ॥
dhaumyopadeśāttigmāṃśuprasādādannasaṃbhavaḥ | hitaṃ ca bruvataḥ kṣattuḥ parityāgo'mbikāsutāt
धौम्य के उपदेश से सूर्यदेव की कृपा द्वारा अन्न की प्राप्ति; और हितकारी बात कहने वाले विदुर का अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्र द्वारा त्याग;
श्लोक 147 (1.2.147)
त्यक्तस्य पाण्डुपुत्राणां समीपगमनं तथा । पुनरागमनं चैव धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥
tyaktasya pāṇḍuputrāṇāṃ samīpagamanaṃ tathā | punarāgamanaṃ caiva dhṛtarāṣṭrasya śāsanāt
त्यागे गए विदुर का पाण्डुपुत्रों के पास जाना, और फिर धृतराष्ट्र की आज्ञा से उनका लौट आना;
श्लोक 148 (1.2.148)
कर्णप्रोत्साहनाच्चैव धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः । वनस्थान्पाण्डवान्हन्तुं मन्त्रो दुर्योधनस्य च ॥
karṇaprotsāhanāccaiva dhārtarāṣṭrasya durmateḥ | vanasthānpāṇḍavānhantuṃ mantro duryodhanasya ca
और कर्ण के उकसाने पर दुर्बुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन की वनवासी पाण्डवों को मार डालने की मन्त्रणा;
श्लोक 149 (1.2.149)
तं दुष्टभावं विज्ञाय व्यासस्यागमनं द्रुतम् । निर्याणप्रतिषेधश्च सुरभ्याख्यानमेव च ॥
taṃ duṣṭabhāvaṃ vijñāya vyāsasyāgamanaṃ drutam | niryāṇapratiṣedhaśca surabhyākhyānameva ca
उस दुष्ट इरादे को जानकर व्यास का तुरन्त आना और उस अभियान को रोकना; तथा सुरभि का आख्यान;
श्लोक 150 (1.2.150)
मैत्रेयागमनं चात्र राज्ञश्चैवानुशासनम् । शापोत्सर्गश्च तेनैव राज्ञो दुर्योधनस्य च ॥
maitreyāgamanaṃ cātra rājñaścaivānuśāsanam | śāpotsargaśca tenaiva rājño duryodhanasya ca
यहीं मैत्रेय का आगमन और राजा को उनका उपदेश, तथा उन्हीं के द्वारा राजा दुर्योधन को दिया गया शाप;
श्लोक 151 (1.2.151)
किर्मीरस्य वधश्चात्र भीमसेनेन संयुगे । वृष्णीनामागमश्चात्र पाञ्चालानां च सर्वशः ॥
kirmīrasya vadhaścātra bhīmasenena saṃyuge | vṛṣṇīnāmāgamaścātra pāñcālānāṃ ca sarvaśaḥ
यहाँ युद्ध में भीमसेन द्वारा किर्मीर का वध; और यहीं वृष्णियों तथा समस्त पाञ्चालों का आगमन,
श्लोक 152 (1.2.152)
श्रुत्वा शकुनिना द्यूते निकृत्या निर्जितांश्च तान् । क्रुद्धस्यानुप्रशमनं हरेश्चैव किरीटिना ॥
śrutvā śakuninā dyūte nikṛtyā nirjitāṃśca tān | kruddhasyānupraśamanaṃ hareścaiva kirīṭinā
जिन्होंने सुना था कि शकुनि ने छल से पाण्डवों को जुए में हरा दिया; और किरीटधारी अर्जुन द्वारा क्रुद्ध हरि (कृष्ण) को शान्त करना;
श्लोक 153 (1.2.153)
परिदेवनं च पाञ्चाल्या वासुदेवस्य सन्निधौ । आश्वासनं च कृष्णेन दुःखार्तायाः प्रकीर्तितम् ॥
paridevanaṃ ca pāñcālyā vāsudevasya sannidhau | āśvāsanaṃ ca kṛṣṇena duḥkhārtāyāḥ prakīrtitam
वासुदेव के सामने पाञ्चाली (द्रौपदी) का विलाप, और दुःख से पीड़ित द्रौपदी को कृष्ण द्वारा ढाढ़स बँधाना वर्णित है;
श्लोक 154 (1.2.154)
तथा सौभवधाख्यानमत्रैवोक्तं महर्षिणा । सुभद्रायाः सपुत्रायाः कृष्णेन द्वारकां पुरीम् ॥
tathā saubhavadhākhyānamatraivoktaṃ maharṣiṇā | subhadrāyāḥ saputrāyāḥ kṛṣṇena dvārakāṃ purīm
इसी प्रकार महर्षि ने यहीं सौभ-वध का आख्यान कहा है; कृष्ण द्वारा पुत्र सहित सुभद्रा को द्वारका नगरी
श्लोक 155 (1.2.155)
नयनं द्रौपदेयानां धृष्टद्युम्नेन चैव ह । प्रवेशः पाण्डवेयानां रम्ये द्वैतवने ततः ॥
nayanaṃ draupadeyānāṃ dhṛṣṭadyumnena caiva ha | praveśaḥ pāṇḍaveyānāṃ ramye dvaitavane tataḥ
ले जाना, और धृष्टद्युम्न द्वारा द्रौपदी के पुत्रों को ले जाना; फिर पाण्डवों का रमणीय द्वैतवन में प्रवेश;
श्लोक 156 (1.2.156)
धर्मराजस्य चात्रैव संवादः कृष्णया सह । संवादश्च तथा राज्ञा भीमस्यापि प्रकीर्तितः ॥
dharmarājasya cātraiva saṃvādaḥ kṛṣṇayā saha | saṃvādaśca tathā rājñā bhīmasyāpi prakīrtitaḥ
यहीं धर्मराज का कृष्णा (द्रौपदी) के साथ संवाद, और राजा के साथ भीम का संवाद भी कहा गया है;
श्लोक 157 (1.2.157)
समीपं पाण्डुपुत्राणां व्यासस्यागमनं तथा । प्रतिश्रुत्याथ विद्याया दानं राज्ञो महर्षिणा ॥
samīpaṃ pāṇḍuputrāṇāṃ vyāsasyāgamanaṃ tathā | pratiśrutyātha vidyāyā dānaṃ rājño maharṣiṇā
इसी प्रकार पाण्डुपुत्रों के पास व्यास का आगमन, और वचन के अनुसार महर्षि द्वारा राजा को एक विद्या का दान;
श्लोक 158 (1.2.158)
गमनं काम्यके चापि व्यासे प्रतिगते ततः । अस्त्रहेतोर्विवासश्च पार्थस्यामिततेजसः ॥
gamanaṃ kāmyake cāpi vyāse pratigate tataḥ | astrahetorvivāsaśca pārthasyāmitatejasaḥ
व्यास के लौट जाने पर काम्यक वन में जाना; और अपार तेजस्वी पार्थ (अर्जुन) का अस्त्रों के लिए प्रवास;
श्लोक 159 (1.2.159)
महादेवेन युद्धं च किरातवपुषा सह । दर्शनं लोकपालानामस्त्रप्राप्तिस्तथैव च ॥
mahādevena yuddhaṃ ca kirātavapuṣā saha | darśanaṃ lokapālānāmastraprāptistathaiva ca
किरात का रूप धारण किए महादेव के साथ युद्ध; लोकपालों का दर्शन और इसी प्रकार अस्त्रों की प्राप्ति;
श्लोक 160 (1.2.160)
महेन्द्रलोकगमनमस्त्रार्थे च किरीटिनः । यत्र चिन्ता समुत्पन्ना धृतराष्ट्रस्य भूयसी ॥
mahendralokagamanamastrārthe ca kirīṭinaḥ | yatra cintā samutpannā dhṛtarāṣṭrasya bhūyasī
अस्त्रों के लिए किरीटी अर्जुन का महेन्द्रलोक जाना, जिस पर धृतराष्ट्र के मन में भारी चिन्ता उत्पन्न हुई;
श्लोक 161 (1.2.161)
दर्शनं बृहदश्वस्य महर्षेर्भावितात्मनः । युधिष्ठिरस्य चार्तस्य व्यसने परिदेवनम् ॥
darśanaṃ bṛhadaśvasya maharṣerbhāvitātmanaḥ | yudhiṣṭhirasya cārtasya vyasane paridevanam
शुद्ध अन्तःकरण वाले महर्षि बृहदश्व का दर्शन, और विपत्ति में दुःखी युधिष्ठिर का विलाप;
श्लोक 162 (1.2.162)
नलोपाख्यानमत्रैव धर्मिष्ठं करुणोदयम् । दमयन्त्याः स्थितिर्यत्र नलस्य चरितं तथा ॥
nalopākhyānamatraiva dharmiṣṭhaṃ karuṇodayam | damayantyāḥ sthitiryatra nalasya caritaṃ tathā
यहीं धर्ममय और करुणा जगाने वाला नलोपाख्यान, जिसमें दमयन्ती की दृढ़ता और नल का चरित्र वर्णित है;
श्लोक 163 (1.2.163)
तथाक्षहृदयप्राप्तिस्तस्मादेव महर्षितः । लोमशस्यागमस्तत्र स्वर्गात्पाण्डुसुतान्प्रति ॥
tathākṣahṛdayaprāptistasmādeva maharṣitaḥ | lomaśasyāgamastatra svargātpāṇḍusutānprati
उन्हीं महर्षि से अक्षहृदय (पासों के रहस्य) की प्राप्ति; और स्वर्ग से वहाँ पाण्डुपुत्रों के पास लोमश का आगमन;
श्लोक 164 (1.2.164)
वनवासगतानां च पाण्डवानां महात्मनाम् । स्वर्गे प्रवृत्तिराख्याता लोमशेनार्जुनस्य वै ॥
vanavāsagatānāṃ ca pāṇḍavānāṃ mahātmanām | svarge pravṛttirākhyātā lomaśenārjunasya vai
और वन में रह रहे महात्मा पाण्डवों को लोमश द्वारा स्वर्ग में अर्जुन का समाचार सुनाना;
श्लोक 165 (1.2.165)
संदेशादर्जुनस्यात्र तीर्थाभिगमनक्रिया । तीर्थानां च फलप्राप्तिः पुण्यत्वं चापि कीर्तितम् ॥
saṃdeśādarjunasyātra tīrthābhigamanakriyā | tīrthānāṃ ca phalaprāptiḥ puṇyatvaṃ cāpi kīrtitam
यहाँ अर्जुन के सन्देश पर तीर्थयात्रा का आरम्भ; और तीर्थों से मिलने वाले फल तथा उनकी पवित्रता का वर्णन;
श्लोक 166 (1.2.166)
पुलस्त्यतीर्थयात्रा च नारदेन महर्षिणा । तीर्थयात्रा च तत्रैव पाण्डवानां महात्मनां ॥
pulastyatīrthayātrā ca nāradena maharṣiṇā | tīrthayātrā ca tatraiva pāṇḍavānāṃ mahātmanāṃ
महर्षि नारद द्वारा कही गई पुलस्त्य की तीर्थयात्रा; और वहीं महात्मा पाण्डवों की तीर्थयात्रा;
श्लोक 167 (1.2.167)
तथा यज्ञविभूतिश्च गयस्यात्र प्रकीर्तिता ॥
tathā yajñavibhūtiśca gayasyātra prakīrtitā
इसी प्रकार यहाँ गय के यज्ञ के वैभव का वर्णन है;
श्लोक 168 (1.2.168)
आगस्त्यमपि चाख्यानं यत्र वातापिभक्षणम् । लोपामुद्राभिगमनमपत्यार्थमृषेस्तथा ॥
āgastyamapi cākhyānaṃ yatra vātāpibhakṣaṇam | lopāmudrābhigamanamapatyārthamṛṣestathā
अगस्त्य का आख्यान भी, जिसमें वातापि का भक्षण है, और इसी प्रकार सन्तान के लिए ऋषि का लोपामुद्रा के पास जाना;
श्लोक 169 (1.2.169)
ऋश्यशृङ्गस्य चरितं कौमारब्रह्मचारिणः । जामदग्न्यस्य रामस्य चरितं भूरितेजसः ॥
ṛśyaśṛṅgasya caritaṃ kaumārabrahmacāriṇaḥ | jāmadagnyasya rāmasya caritaṃ bhūritejasaḥ
बाल्यकाल से ब्रह्मचारी ऋष्यशृङ्ग का चरित्र; और महातेजस्वी जमदग्निपुत्र परशुराम का चरित्र,
श्लोक 170 (1.2.170)
कार्तवीर्यवधो यत्र हैहयानां च वर्ण्यते । प्रभासतीर्थे पाण्डूनां वृष्णिभिश्च समागमः ॥
kārtavīryavadho yatra haihayānāṃ ca varṇyate | prabhāsatīrthe pāṇḍūnāṃ vṛṣṇibhiśca samāgamaḥ
जिसमें कार्तवीर्य और हैहयों के वध का वर्णन है; प्रभास तीर्थ में पाण्डवों का वृष्णियों से मिलन;
श्लोक 171 (1.2.171)
सौकन्यमपि चाख्यानं च्यवनो यत्र भार्गवः । शर्यातियज्ञे नासत्यौ कृतवान्सोमपीथिनौ ॥
saukanyamapi cākhyānaṃ cyavano yatra bhārgavaḥ | śaryātiyajñe nāsatyau kṛtavānsomapīthinau
सुकन्या का आख्यान भी, जिसमें भृगुवंशी च्यवन ने शर्याति के यज्ञ में दोनों नासत्यों (अश्विनीकुमारों) को सोमपान का अधिकारी बनाया,
श्लोक 172 (1.2.172)
ताभ्यां च यत्र स मुनिर्यौवनं प्रतिपादितः । मान्धातुश्चाप्युपाख्यानं राज्ञोऽत्रैव प्रकीर्तितं ॥
tābhyāṃ ca yatra sa muniryauvanaṃ pratipāditaḥ | māndhātuścāpyupākhyānaṃ rājño'traiva prakīrtitaṃ
और जिसमें उन दोनों ने उस मुनि को फिर से यौवन दिलाया; राजा मान्धाता का उपाख्यान भी यहीं कहा गया है;
श्लोक 173 (1.2.173)
जन्तूपाख्यानमत्रैव यत्र पुत्रेण सोमकः । पुत्रार्थमयजद्राजा लेभे पुत्रशतं च सः ॥
jantūpākhyānamatraiva yatra putreṇa somakaḥ | putrārthamayajadrājā lebhe putraśataṃ ca saḥ
यहीं जन्तु का उपाख्यान, जिसमें राजा सोमक ने पुत्रों की कामना से अपने पुत्र की आहुति देकर यज्ञ किया और सौ पुत्र पाए;
श्लोक 174 (1.2.174)
ततः श्येनकपोतीयमुपाख्यानमनुत्तमम् । इन्द्राग्नी यत्र धर्मश्चाप्यजिज्ञासञ्शिबिं नृपम् ॥
tataḥ śyenakapotīyamupākhyānamanuttamam | indrāgnī yatra dharmaścāpyajijñāsañśibiṃ nṛpam
फिर अनुपम श्येन-कपोत (बाज़ और कबूतर) का उपाख्यान, जिसमें इन्द्र, अग्नि और धर्म ने राजा शिबि की परीक्षा ली;
श्लोक 175 (1.2.175)
अष्टावक्रीयमत्रैव विवादो यत्र बन्दिना । अष्टावक्रस्य विप्रर्षेर्जनकस्याध्वरेऽभवत् ॥
aṣṭāvakrīyamatraiva vivādo yatra bandinā | aṣṭāvakrasya viprarṣerjanakasyādhvare'bhavat
यहीं अष्टावक्र का उपाख्यान, जिसमें जनक के यज्ञ में ब्रह्मर्षि अष्टावक्र का बन्दी के साथ शास्त्रार्थ हुआ,
श्लोक 176 (1.2.176)
नैयायिकानां मुख्येन वरुणस्यात्मजेन च । पराजितो यत्र बन्दी विवादेन महात्मना ॥
naiyāyikānāṃ mukhyena varuṇasyātmajena ca | parājito yatra bandī vivādena mahātmanā
जहाँ वरुण के पुत्र और नैयायिकों में अग्रणी बन्दी को उस महात्मा ने शास्त्रार्थ में हरा दिया;
श्लोक 177 (1.2.177)
विजित्य सागरं प्राप्तं पितरं लब्धवानृषिः । यवक्रीतस्य चाख्यानं रैभ्यस्य च महात्मनः । गन्धमादनयात्रा च वासो नारायणाश्रमे ॥
vijitya sāgaraṃ prāptaṃ pitaraṃ labdhavānṛṣiḥ | yavakrītasya cākhyānaṃ raibhyasya ca mahātmanaḥ | gandhamādanayātrā ca vāso nārāyaṇāśrame
विजय पाकर उस ऋषि ने सागर में गए अपने पिता को फिर पा लिया। यवक्रीत और महात्मा रैभ्य का आख्यान; गन्धमादन की यात्रा और नारायणाश्रम में निवास;
श्लोक 178 (1.2.178)
नियुक्तो भीमसेनश्च द्रौपद्या गन्धमादने । व्रजन्पथि महाबाहुर्दृष्टवान्पवनात्मजम् ॥
niyukto bhīmasenaśca draupadyā gandhamādane | vrajanpathi mahābāhurdṛṣṭavānpavanātmajam
गन्धमादन पर द्रौपदी के भेजे हुए महाबाहु भीमसेन ने मार्ग में चलते हुए पवनपुत्र को देखा,
श्लोक 179 (1.2.179)
कदलीषण्डमध्यस्थं हनूमन्तं महाबलम् । यत्र मन्दारपुष्पार्थे नलिनीं तामधर्षयत् ॥
kadalīṣaṇḍamadhyasthaṃ hanūmantaṃ mahābalam | yatra mandārapuṣpārthe nalinīṃ tāmadharṣayat
केले के वन के बीच बैठे महाबली हनुमान को; और जहाँ मन्दार के फूलों के लिए उन्होंने उस कमल-सरोवर को रौंद डाला;
श्लोक 180 (1.2.180)
यत्रास्य युद्धमभवत्सुमहद्राक्षसैः सह । यक्षैश्चैव महावीर्यैर्मणिमत्प्रमुखैस्तथा ॥
yatrāsya yuddhamabhavatsumahadrākṣasaiḥ saha | yakṣaiścaiva mahāvīryairmaṇimatpramukhaistathā
जहाँ उनका राक्षसों के साथ, और मणिमान् के नेतृत्व वाले महापराक्रमी यक्षों के साथ भी भारी युद्ध हुआ;
श्लोक 181 (1.2.181)
जटासुरस्य च वधो राक्षसस्य वृकोदरात् । वृषपर्वणो राजर्षेस्ततोऽभिगमनं स्मृतम् ॥
jaṭāsurasya ca vadho rākṣasasya vṛkodarāt | vṛṣaparvaṇo rājarṣestato'bhigamanaṃ smṛtam
वृकोदर (भीम) द्वारा जटासुर राक्षस का वध; फिर राजर्षि वृषपर्वा के पास जाने का वर्णन;
श्लोक 182 (1.2.182)
आर्ष्टिषेणाश्रमे चैषां गमनं वास एव च । प्रोत्साहनं च पाञ्चाल्या भीमस्यात्र महात्मनः ॥
ārṣṭiṣeṇāśrame caiṣāṃ gamanaṃ vāsa eva ca | protsāhanaṃ ca pāñcālyā bhīmasyātra mahātmanaḥ
आर्ष्टिषेण के आश्रम में उनका जाना और वहाँ रहना; और यहाँ द्रौपदी द्वारा महात्मा भीम को उत्साहित करना;
श्लोक 183 (1.2.183)
कैलासारोहणं प्रोक्तं यत्र यक्षैर्बलोत्कटैः । युद्धमासीन्महाघोरं मणिमत्प्रमुखैः सह ॥
kailāsārohaṇaṃ proktaṃ yatra yakṣairbalotkaṭaiḥ | yuddhamāsīnmahāghoraṃ maṇimatpramukhaiḥ saha
कैलास पर चढ़ने का वर्णन, जहाँ मणिमान् आदि बलशाली यक्षों के साथ अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ;
श्लोक 184 (1.2.184)
समागमश्च पाण्डूनां यत्र वैश्रवणेन च । समागमश्चार्जुनस्य तत्रैव भ्रातृभिः सह ॥
samāgamaśca pāṇḍūnāṃ yatra vaiśravaṇena ca | samāgamaścārjunasya tatraiva bhrātṛbhiḥ saha
पाण्डवों का वैश्रवण (कुबेर) से मिलन, और वहीं अर्जुन का अपने भाइयों से फिर मिलना;
श्लोक 185 (1.2.185)
अवाप्य दिव्यान्यस्त्राणि गुर्वर्थं सव्यसाचिना । निवातकवचैर्युद्धं हिरण्यपुरवासिभिः ॥
avāpya divyānyastrāṇi gurvarthaṃ savyasācinā | nivātakavacairyuddhaṃ hiraṇyapuravāsibhiḥ
दिव्य अस्त्र पाकर सव्यसाची अर्जुन का गुरु के हित के लिए हिरण्यपुर में रहने वाले निवातकवचों से युद्ध;
श्लोक 186 (1.2.186)
निवातकवचैर्घोरैर्दानवैः सुरशत्रुभिः । पौलोमैः कालकेयैश्च यत्र युद्धं किरीटिनः ॥
nivātakavacairghorairdānavaiḥ suraśatrubhiḥ | paulomaiḥ kālakeyaiśca yatra yuddhaṃ kirīṭinaḥ
जहाँ किरीटी अर्जुन ने देवताओं के शत्रु भयंकर दानवों, अर्थात् निवातकवचों, पौलोमों और कालकेयों से युद्ध किया;
श्लोक 187 (1.2.187)
वधश्चैषां समाख्यातो राज्ञस्तेनैव धीमता । अस्त्रसंदर्शनारम्भो धर्मराजस्य सन्निधौ ॥
vadhaścaiṣāṃ samākhyāto rājñastenaiva dhīmatā | astrasaṃdarśanārambho dharmarājasya sannidhau
उसी बुद्धिमान वीर द्वारा उनके और उनके राजा के वध का वर्णन; धर्मराज की उपस्थिति में अस्त्र-प्रदर्शन का आरम्भ;
श्लोक 188 (1.2.188)
पार्थस्य प्रतिषेधश्च नारदेन सुरर्षिणा । अवरोहणं पुनश्चैव पाण्डूनां गन्धमादनात् ॥
pārthasya pratiṣedhaśca nāradena surarṣiṇā | avarohaṇaṃ punaścaiva pāṇḍūnāṃ gandhamādanāt
देवर्षि नारद द्वारा पार्थ को रोकना; और पाण्डवों का फिर गन्धमादन से उतरना;
श्लोक 189 (1.2.189)
भीमस्य ग्रहणं चात्र पर्वताभोगवर्ष्मणा । भुजगेन्द्रेण बलिना तस्मिन्सुगहने वने ॥
bhīmasya grahaṇaṃ cātra parvatābhogavarṣmaṇā | bhujagendreṇa balinā tasminsugahane vane
यहाँ उस घने वन में पर्वत के समान विशाल शरीर वाले बलवान नागराज द्वारा भीम का पकड़ा जाना,
श्लोक 190 (1.2.190)
अमोक्षयद्यत्र चैनं प्रश्नानुक्त्वा युधिष्ठिरः । काम्यकागमनं चैव पुनस्तेषां महात्मनाम् ॥
amokṣayadyatra cainaṃ praśnānuktvā yudhiṣṭhiraḥ | kāmyakāgamanaṃ caiva punasteṣāṃ mahātmanām
जिससे युधिष्ठिर ने प्रश्नों के उत्तर देकर उन्हें छुड़ाया; और उन महात्माओं का फिर काम्यक वन में लौटना;
श्लोक 191 (1.2.191)
तत्रस्थांश्च पुनर्द्रष्टुं पाण्डवान्पुरुषर्षभान् । वासुदेवस्यागमनमत्रैव परिकीर्तितम् ॥
tatrasthāṃśca punardraṣṭuṃ pāṇḍavānpuruṣarṣabhān | vāsudevasyāgamanamatraiva parikīrtitam
और यहीं वहाँ ठहरे हुए नरश्रेष्ठ पाण्डवों से फिर मिलने के लिए वासुदेव के आगमन का वर्णन है;
श्लोक 192 (1.2.192)
मार्कण्डेयसमास्यायामुपाख्यानानि सर्वशः । पृथोर्वैन्यस्य यत्रोक्तमाख्यानं परमर्षिणा ॥
mārkaṇḍeyasamāsyāyāmupākhyānāni sarvaśaḥ | pṛthorvainyasya yatroktamākhyānaṃ paramarṣiṇā
मार्कण्डेय के साथ हुई सभा में कहे गए सम्पूर्ण उपाख्यान; जहाँ परम ऋषि ने वेनपुत्र पृथु का आख्यान सुनाया;
श्लोक 193 (1.2.193)
संवादश्च सरस्वत्यास्तार्क्ष्यर्षेः सुमहात्मनः । मत्स्योपाख्यानमत्रैव प्रोच्यते तदनन्तरम् ॥
saṃvādaśca sarasvatyāstārkṣyarṣeḥ sumahātmanaḥ | matsyopākhyānamatraiva procyate tadanantaram
सरस्वती का महात्मा तार्क्ष्य ऋषि के साथ संवाद; और उसके बाद यहीं मत्स्य का उपाख्यान कहा गया है;
श्लोक 194 (1.2.194)
मार्कण्डेयसमास्या च पुराणं परिकीर्त्यते । ऐन्द्रद्युम्नमुपाख्यानं तथैवाङ्गिरसं स्मृतम् ॥
mārkaṇḍeyasamāsyā ca purāṇaṃ parikīrtyate | aindradyumnamupākhyānaṃ tathaivāṅgirasaṃ smṛtam
मार्कण्डेय-समागम, जिसमें पुराण का कथन है; इन्द्रद्युम्न का उपाख्यान, और इसी प्रकार आङ्गिरस आख्यान;
श्लोक 195 (1.2.195)
पतिव्रतायाश्चाख्यानं तथैवाङ्गिरसं स्मृतम् । द्रौपद्याः कीर्तितश्चात्र संवादः सत्यभामया ॥
pativratāyāścākhyānaṃ tathaivāṅgirasaṃ smṛtam | draupadyāḥ kīrtitaścātra saṃvādaḥ satyabhāmayā
पतिव्रता का आख्यान, और इसी प्रकार आङ्गिरस आख्यान; और यहीं द्रौपदी का सत्यभामा के साथ संवाद वर्णित है;
श्लोक 196 (1.2.196)
पुनर्द्वैतवनं चैव पाण्डवाः समुपागताः । घोषयात्रा च गन्धर्वैर्यत्र बद्धः सुयोधनः ॥
punardvaitavanaṃ caiva pāṇḍavāḥ samupāgatāḥ | ghoṣayātrā ca gandharvairyatra baddhaḥ suyodhanaḥ
पाण्डव फिर द्वैतवन में आए; घोषयात्रा, जिसमें गन्धर्वों ने सुयोधन (दुर्योधन) को बन्दी बना लिया,
श्लोक 197 (1.2.197)
ह्रियमाणस्तु मन्दात्मा मोक्षितोऽसौ किरीटिना । धर्मराजस्य चात्रैव मृगस्वप्ननिदर्शनात् ॥
hriyamāṇastu mandātmā mokṣito'sau kirīṭinā | dharmarājasya cātraiva mṛgasvapnanidarśanāt
और ले जाए जा रहे उस मन्दबुद्धि को किरीटी अर्जुन ने छुड़ाया; और यहीं धर्मराज के स्वप्न में हिरणों के दिखाई देने पर
श्लोक 198 (1.2.198)
काम्यके काननश्रेष्ठे पुनर्गमनमुच्यते । व्रीहिद्रौणिकमाख्यानमत्रैव बहुविस्तरम् ॥
kāmyake kānanaśreṣṭhe punargamanamucyate | vrīhidrauṇikamākhyānamatraiva bahuvistaram
उत्तम काम्यक वन में फिर लौटने का वर्णन; यहीं विस्तार से व्रीहिद्रौणिक (द्रोण भर धान का) आख्यान;
श्लोक 199 (1.2.199)
दुर्वाससोऽप्युपाख्यानमत्रैव परिकीर्तितम् । जयद्रथेनापहारो द्रौपद्याश्चाश्रमान्तरात् ॥
durvāsaso'pyupākhyānamatraiva parikīrtitam | jayadrathenāpahāro draupadyāścāśramāntarāt
दुर्वासा का उपाख्यान भी यहीं कहा गया है; जयद्रथ द्वारा आश्रम के भीतर से द्रौपदी का हरण,
श्लोक 200 (1.2.200)
यत्रैनमन्वयाद्भीमो वायुवेगसमो जवे । चक्रे चैनं पञ्चशिखं यत्र भीमो महाबलः ॥
yatrainamanvayādbhīmo vāyuvegasamo jave | cakre cainaṃ pañcaśikhaṃ yatra bhīmo mahābalaḥ
जहाँ वायु के समान वेगवाले भीम ने उसका पीछा किया, और जहाँ महाबली भीम ने उसका सिर मूँडकर पाँच चोटियाँ छोड़ दीं;
श्लोक 201 (1.2.201)
रामायणमुपाख्यानमत्रैव बहुविस्तरम् । यत्र रामेण विक्रम्य निहतो रावणो युधि ॥
rāmāyaṇamupākhyānamatraiva bahuvistaram | yatra rāmeṇa vikramya nihato rāvaṇo yudhi
यहीं विस्तार से रामायण का उपाख्यान, जिसमें राम ने पराक्रम करके युद्ध में रावण का वध किया;
श्लोक 202 (1.2.202)
सावित्र्याश्चाप्युपाख्यानमत्रैव परिकीर्तितम् । कर्णस्य परिमोक्षोऽत्र कुण्डलाभ्यां पुरंदरात् ॥
sāvitryāścāpyupākhyānamatraiva parikīrtitam | karṇasya parimokṣo'tra kuṇḍalābhyāṃ puraṃdarāt
सावित्री का उपाख्यान भी यहीं कहा गया है; यहीं इन्द्र के द्वारा कर्ण का कुण्डलों से रहित किया जाना,
श्लोक 203 (1.2.203)
यत्रास्य शक्तिं तुष्टोऽसावदादेकवधाय च । आरणेयमुपाख्यानं यत्र धर्मोऽन्वशात्सुतम् ॥
yatrāsya śaktiṃ tuṣṭo'sāvadādekavadhāya ca | āraṇeyamupākhyānaṃ yatra dharmo'nvaśātsutam
जहाँ प्रसन्न होकर इन्द्र ने उसे एक ही वीर का वध करने वाली शक्ति दी; आरणेय उपाख्यान, जिसमें धर्म ने अपने पुत्र को उपदेश दिया;
श्लोक 204 (1.2.204)
जग्मुर्लब्धवरा यत्र पाण्डवाः पश्चिमां दिशम् । एतदारण्यकं पर्व तृतीयं परिकीर्तितम् ॥
jagmurlabdhavarā yatra pāṇḍavāḥ paścimāṃ diśam | etadāraṇyakaṃ parva tṛtīyaṃ parikīrtitam
और जहाँ वर पाकर पाण्डव पश्चिम दिशा की ओर गए। यह तीसरा आरण्यक पर्व कहा गया है।
श्लोक 205 (1.2.205)
अत्राध्यायशते द्वे तु संख्यया परिकीर्तिते । एकोनसप्ततिश्चैव तथाऽध्यायाः प्रकीर्तिताः ॥
atrādhyāyaśate dve tu saṃkhyayā parikīrtite | ekonasaptatiścaiva tathā'dhyāyāḥ prakīrtitāḥ
इसमें गिनती से दो सौ अध्याय कहे गए हैं, और उनके अतिरिक्त उनहत्तर अध्याय और बताए गए हैं, अर्थात् कुल दो सौ उनहत्तर;
श्लोक 206 (1.2.206)
एकादश सहस्राणि श्लोकानां षट् शतानि च । चतुःषष्टिस्तथा श्लोकाः पर्वण्यस्मिन्प्रकीर्तिताः ॥
ekādaśa sahasrāṇi ślokānāṃ ṣaṭ śatāni ca | catuḥṣaṣṭistathā ślokāḥ parvaṇyasminprakīrtitāḥ
और इस पर्व में ग्यारह हज़ार छह सौ श्लोक तथा चौंसठ श्लोक और, अर्थात् कुल ग्यारह हज़ार छह सौ चौंसठ श्लोक कहे गए हैं।
श्लोक 207 (1.2.207)
अतः परं निबोधेदं वैराटं पर्व विस्तरम् । विराटनगरे गत्वा श्मशाने विपुलां शमीम् ॥
ataḥ paraṃ nibodhedaṃ vairāṭaṃ parva vistaram | virāṭanagare gatvā śmaśāne vipulāṃ śamīm
इसके बाद विस्तार सहित विराट पर्व सुनो। विराट नगर जाकर श्मशान में एक विशाल शमी वृक्ष
श्लोक 208 (1.2.208)
दृष्ट्वा संनिदधुस्तत्र पाण्डवा ह्यायुधान्युत । यत्र प्रविश्य नगरं छद्मना न्यवसंस्तु ते ॥
dṛṣṭvā saṃnidadhustatra pāṇḍavā hyāyudhānyuta | yatra praviśya nagaraṃ chadmanā nyavasaṃstu te
देखकर पाण्डवों ने वहाँ अपने अस्त्र-शस्त्र रख दिए; जहाँ नगर में प्रवेश करके वे वेश बदलकर रहे;
श्लोक 209 (1.2.209)
पाञ्चालीं प्रार्थयानस्य कामोपहतचेतसः । दुष्टात्मनो वधो यत्र कीचकस्य वृकोदरात् ॥
pāñcālīṃ prārthayānasya kāmopahatacetasaḥ | duṣṭātmano vadho yatra kīcakasya vṛkodarāt
जहाँ काम से विवेक खो बैठे, पाञ्चाली को पाने के लिए उसके पीछे पड़े दुष्टात्मा कीचक का वृकोदर (भीम) द्वारा वध हुआ;
श्लोक 210 (1.2.210)
पाण्डवान्वेषणार्थं च राज्ञो दुर्योधनस्य च । चाराः प्रस्थापिताश्चात्र निपुणाः सर्वतोदिशं ॥
pāṇḍavānveṣaṇārthaṃ ca rājño duryodhanasya ca | cārāḥ prasthāpitāścātra nipuṇāḥ sarvatodiśaṃ
और यहाँ राजा दुर्योधन ने पाण्डवों की खोज के लिए चतुर गुप्तचरों को सब दिशाओं में भेजा;
श्लोक 211 (1.2.211)
न च प्रवृत्तिस्तैर्लब्धा पाण्डवानां महात्मनाम् । गोग्रहश्च विराटस्य त्रिगर्तैः प्रथमं कृतः ॥
na ca pravṛttistairlabdhā pāṇḍavānāṃ mahātmanām | gograhaśca virāṭasya trigartaiḥ prathamaṃ kṛtaḥ
पर उन्हें महात्मा पाण्डवों का कोई समाचार नहीं मिला। पहले त्रिगर्तों ने विराट की गायों का हरण किया,
श्लोक 212 (1.2.212)
यत्रास्य युद्धं सुमहत्तैरासील्लोमहर्षणम् । ह्रियमाणश्च यत्रासौ भीमसेनेन मोक्षितः ॥
yatrāsya yuddhaṃ sumahattairāsīllomaharṣaṇam | hriyamāṇaśca yatrāsau bhīmasenena mokṣitaḥ
जहाँ उनके साथ विराट का रोमांचकारी भारी युद्ध हुआ, और जहाँ बन्दी बनाकर ले जाए जा रहे विराट को भीमसेन ने छुड़ाया;
श्लोक 213 (1.2.213)
गोधनं च विराटस्य मोक्षितं यत्र पाण्डवैः । अनन्तरं च कुरुभिस्तस्य गोग्रहणं कृतम् ॥
godhanaṃ ca virāṭasya mokṣitaṃ yatra pāṇḍavaiḥ | anantaraṃ ca kurubhistasya gograhaṇaṃ kṛtam
जहाँ पाण्डवों ने विराट का गोधन छुड़ाया; और उसके बाद कौरवों ने उसकी गायों का हरण किया,
श्लोक 214 (1.2.214)
समस्ता यत्र पार्थेन निर्जिताः कुरवो युधि । प्रत्याहृतं गोधनं च विक्रमेण किरीटिना ॥
samastā yatra pārthena nirjitāḥ kuravo yudhi | pratyāhṛtaṃ godhanaṃ ca vikrameṇa kirīṭinā
जहाँ पार्थ ने युद्ध में समस्त कौरवों को हरा दिया, और किरीटी ने पराक्रम से गोधन वापस छीन लिया;
श्लोक 215 (1.2.215)
विराटेनोत्तरा दत्ता स्नुषा यत्र किरीटिनः । अभिमन्युं समुद्दिश्य सौभद्रमरिघातिनम् ॥
virāṭenottarā dattā snuṣā yatra kirīṭinaḥ | abhimanyuṃ samuddiśya saubhadramarighātinam
जहाँ विराट ने शत्रुनाशक सुभद्रापुत्र अभिमन्यु के लिए उत्तरा को किरीटी अर्जुन की पुत्रवधू के रूप में दे दिया।
श्लोक 216 (1.2.216)
चतुर्थमेतद्विपुलं वैराटं पर्व वर्णितम् । अत्रापि परिसंख्याता अध्यायाः परमर्षिणा ॥
caturthametadvipulaṃ vairāṭaṃ parva varṇitam | atrāpi parisaṃkhyātā adhyāyāḥ paramarṣiṇā
यह चौथा विस्तृत विराट पर्व कहा गया है। इसमें भी परम ऋषि ने अध्यायों की गणना की है:
श्लोक 217 (1.2.217)
सप्तषष्टिरथो पूर्णाः श्लोकानामपि मे शृणु । श्लोकानां द्वे सहस्रे तु श्लोकाः पञ्चाशदेव तु ॥
saptaṣaṣṭiratho pūrṇāḥ ślokānāmapi me śṛṇu | ślokānāṃ dve sahasre tu ślokāḥ pañcāśadeva tu
पूरे सड़सठ। अब मुझसे श्लोकों की संख्या भी सुनो: दो हज़ार पचास श्लोक
श्लोक 218 (1.2.218)
उक्तानि वेदविदुषा पर्वण्यस्मिन्महर्षिणा । उद्योगपर्व विज्ञेयं पञ्चमं शृण्वतः परम् ॥
uktāni vedaviduṣā parvaṇyasminmaharṣiṇā | udyogaparva vijñeyaṃ pañcamaṃ śṛṇvataḥ param
वेदों के ज्ञाता महर्षि ने इस पर्व में कहे हैं। इसके आगे पाँचवाँ उद्योग पर्व सुनो।
श्लोक 219 (1.2.219)
उपप्लाव्ये निविष्टेषु पाण्डवेषु जिगीषया । दुर्योधनोऽर्जुनश्चैव वासुदेवमुपस्थितौ ॥
upaplāvye niviṣṭeṣu pāṇḍaveṣu jigīṣayā | duryodhano'rjunaścaiva vāsudevamupasthitau
जब विजय की इच्छा से पाण्डव उपप्लव्य में डेरा डाले हुए थे, तब दुर्योधन और अर्जुन दोनों वासुदेव के पास पहुँचे:
श्लोक 220 (1.2.220)
साहाय्यमस्मिन्समरे भवान्नौ कर्तुमर्हति । इत्युक्ते वचने कृष्णो यत्रोवाच महामतिः ॥
sāhāyyamasminsamare bhavānnau kartumarhati | ityukte vacane kṛṣṇo yatrovāca mahāmatiḥ
"इस युद्ध में आप हम दोनों की सहायता करें।" यह कहे जाने पर महाबुद्धिमान कृष्ण ने कहा:
श्लोक 221 (1.2.221)
अयुध्यमानमात्मानं मन्त्रिणं पुरुषर्षभौ । अक्षौहिणीं वा सैन्यस्य कस्य किं वा ददाम्यहम् ॥
ayudhyamānamātmānaṃ mantriṇaṃ puruṣarṣabhau | akṣauhiṇīṃ vā sainyasya kasya kiṃ vā dadāmyaham
"हे नरश्रेष्ठो, युद्ध न करने वाले मन्त्री के रूप में मैं स्वयं, या एक अक्षौहिणी सेना: तुममें से किसे क्या दूँ?"
श्लोक 222 (1.2.222)
वव्रे दुर्योधनः सैन्यं मन्दात्मा यत्र दुर्मतिः । अयुध्यमानं सचिवं वव्रे कृष्णं धनंजयः ॥
vavre duryodhanaḥ sainyaṃ mandātmā yatra durmatiḥ | ayudhyamānaṃ sacivaṃ vavre kṛṣṇaṃ dhanaṃjayaḥ
जहाँ मन्दबुद्धि और दुर्मति दुर्योधन ने सेना चुनी, और धनञ्जय ने युद्ध न करने वाले सचिव के रूप में कृष्ण को चुना;
श्लोक 223 (1.2.223)
मद्रराजं च राजानमायान्तं पाण्डवान्प्रति । उपहारैर्वञ्चयित्वा वर्त्मन्येव सुयोधनः ॥
madrarājaṃ ca rājānamāyāntaṃ pāṇḍavānprati | upahārairvañcayitvā vartmanyeva suyodhanaḥ
और पाण्डवों की ओर आ रहे मद्रराज शल्य को सुयोधन ने रास्ते में ही उपहारों से छलकर
श्लोक 224 (1.2.224)
वरदं तं वरं वव्रे साहाय्यं क्रियतां मम । शल्यस्तस्मै प्रतिश्रुत्य जगामोद्दिश्य पाण्डवान् ॥
varadaṃ taṃ varaṃ vavre sāhāyyaṃ kriyatāṃ mama | śalyastasmai pratiśrutya jagāmoddiśya pāṇḍavān
उस वरदाता से वर माँगा: "मेरी सहायता कीजिए।" शल्य उसे वचन देकर पाण्डवों के पास गए;
श्लोक 225 (1.2.225)
शान्तिपूर्वं चाकथयद्यत्रेन्द्रविजयं नृपः । पुरोहितप्रेषणं च पाण्डवैः कौरवान्प्रति ॥
śāntipūrvaṃ cākathayadyatrendravijayaṃ nṛpaḥ | purohitapreṣaṇaṃ ca pāṇḍavaiḥ kauravānprati
जहाँ राजा शल्य ने सान्त्वना देते हुए इन्द्रविजय का आख्यान सुनाया; पाण्डवों द्वारा कौरवों के पास पुरोहित को भेजना;
श्लोक 226 (1.2.226)
वैचित्रवीर्यस्य वचः समादाय पुरोधसः । तथेन्द्रविजयं चापि यानं चैव पुरोधसः ॥
vaicitravīryasya vacaḥ samādāya purodhasaḥ | tathendravijayaṃ cāpi yānaṃ caiva purodhasaḥ
विचित्रवीर्यपुत्र धृतराष्ट्र द्वारा पुरोहित का सन्देश ग्रहण करना; इसी प्रकार इन्द्रविजय और पुरोहित की यात्रा;
श्लोक 227 (1.2.227)
संजयं प्रेषयामास शमार्थी पाण्डवान्प्रति । यत्र दूतं महाराजो धृतराष्ट्रः प्रतापवान् ॥
saṃjayaṃ preṣayāmāsa śamārthī pāṇḍavānprati | yatra dūtaṃ mahārājo dhṛtarāṣṭraḥ pratāpavān
जहाँ प्रतापी महाराज धृतराष्ट्र ने शान्ति की इच्छा से संजय को दूत बनाकर पाण्डवों के पास भेजा;
श्लोक 228 (1.2.228)
श्रुत्वा च पाण्डवान्यत्र वासुदेवपुरोगमान् । प्रजागरः संप्रजज्ञे धृतराष्ट्रस्य चिन्तया ॥
śrutvā ca pāṇḍavānyatra vāsudevapurogamān | prajāgaraḥ saṃprajajñe dhṛtarāṣṭrasya cintayā
जहाँ वासुदेव को आगे रखे पाण्डवों के बारे में सुनकर चिन्ता के कारण धृतराष्ट्र की नींद उड़ गई;
श्लोक 229 (1.2.229)
विदुरो यत्र वाक्यानि विचित्राणि हितानि च । श्रावयामास राजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् ॥
viduro yatra vākyāni vicitrāṇi hitāni ca | śrāvayāmāsa rājānaṃ dhṛtarāṣṭraṃ manīṣiṇam
जहाँ विदुर ने मनीषी राजा धृतराष्ट्र को अनेक प्रकार के हितकारी वचन सुनाए;
श्लोक 230 (1.2.230)
तथा सनत्सुजातेन यत्राध्यात्ममनुत्तमम् । मनस्तापान्वितो राजा श्रावितः शोकलालसः ॥
tathā sanatsujātena yatrādhyātmamanuttamam | manastāpānvito rājā śrāvitaḥ śokalālasaḥ
और जहाँ सनत्सुजात ने मानसिक सन्ताप से भरे, शोकाकुल राजा को उत्तम अध्यात्मज्ञान सुनाया;
श्लोक 231 (1.2.231)
प्रभाते राजसमितौ संजयो यत्र वा विभो । ऐकात्म्यं वासुदेवस्य प्रोक्तवानर्जुनस्य च ॥
prabhāte rājasamitau saṃjayo yatra vā vibho | aikātmyaṃ vāsudevasya proktavānarjunasya ca
जहाँ प्रातःकाल राजसभा में, हे प्रभो, संजय ने वासुदेव और अर्जुन की एकात्मता बताई;
श्लोक 232 (1.2.232)
यत्र कृष्णो दयापन्नः सन्धिमिच्छन्महामतिः । स्वयमागाच्छमं कर्तुं नगरं नागसाह्वयम् ॥
yatra kṛṣṇo dayāpannaḥ sandhimicchanmahāmatiḥ | svayamāgācchamaṃ kartuṃ nagaraṃ nāgasāhvayam
जहाँ करुणा से भरे, सन्धि चाहने वाले महाबुद्धिमान कृष्ण स्वयं शान्ति स्थापित करने हस्तिनापुर आए;
श्लोक 233 (1.2.233)
प्रत्याख्यानं च कृष्णस्य राज्ञा दुर्योधनेन वै । शमार्थे याचमानस्य पक्षयोरुभयोर्हितम् ॥
pratyākhyānaṃ ca kṛṣṇasya rājñā duryodhanena vai | śamārthe yācamānasya pakṣayorubhayorhitam
और दोनों पक्षों के हित के लिए शान्ति की याचना करने वाले कृष्ण को राजा दुर्योधन द्वारा ठुकराया जाना;
श्लोक 234 (1.2.234)
दम्भोद्भवस्य चाख्यानमत्रैव परिकीर्तितम् । वरान्वेषणमत्रैव मातलेश्च महात्मनः ॥
dambhodbhavasya cākhyānamatraiva parikīrtitam | varānveṣaṇamatraiva mātaleśca mahātmanaḥ
यहीं दम्भोद्भव का आख्यान कहा गया है; यहीं महात्मा मातलि द्वारा वर की खोज;
श्लोक 235 (1.2.235)
महर्षेश्चापि चरितं कथितं गालवस्य वै । विदुलायाश्च पुत्रस्य प्रोक्तं चाप्यनुशासनम् ॥
maharṣeścāpi caritaṃ kathitaṃ gālavasya vai | vidulāyāśca putrasya proktaṃ cāpyanuśāsanam
महर्षि गालव का चरित्र भी कहा गया है; और विदुला द्वारा अपने पुत्र को दिया गया उपदेश;
श्लोक 236 (1.2.236)
कर्णदुर्योधनादीनां दुष्टं विज्ञाय मन्त्रितम् । योगेश्वरत्वं कृष्णेन यत्र राज्ञां प्रदर्शितम् ॥
karṇaduryodhanādīnāṃ duṣṭaṃ vijñāya mantritam | yogeśvaratvaṃ kṛṣṇena yatra rājñāṃ pradarśitam
जहाँ कर्ण, दुर्योधन आदि की दुष्ट मन्त्रणा जानकर कृष्ण ने राजाओं को अपना योगेश्वर-रूप दिखाया;
श्लोक 237 (1.2.237)
रथमारोप्य कृष्णेन यत्र कर्णोऽनुमन्त्रितः । उपायपूर्वं शौटीर्यात्प्रत्याख्यातश्च तेन सः ॥
rathamāropya kṛṣṇena yatra karṇo'numantritaḥ | upāyapūrvaṃ śauṭīryātpratyākhyātaśca tena saḥ
जहाँ कृष्ण ने कर्ण को अपने रथ पर बैठाकर युक्तिपूर्वक समझाया, और कर्ण ने अभिमानवश उनकी बात ठुकरा दी;
श्लोक 238 (1.2.238)
आगम्य हास्तिनपुरादुपप्लाव्यमरिंदमः । पाण्डवानां यथावृत्तं सर्वमाख्यातवान्हरिः ॥
āgamya hāstinapurādupaplāvyamariṃdamaḥ | pāṇḍavānāṃ yathāvṛttaṃ sarvamākhyātavānhariḥ
हस्तिनापुर से उपप्लव्य आकर शत्रुदमन हरि ने पाण्डवों को सब कुछ जैसा हुआ था वैसा कह सुनाया;
श्लोक 239 (1.2.239)
ते तस्य वचनं श्रुत्वा मन्त्रयित्वा च यद्धितम् । साङ्ग्रामिकं ततः सर्वं सज्जं चक्रुः परंतपाः ॥
te tasya vacanaṃ śrutvā mantrayitvā ca yaddhitam | sāṅgrāmikaṃ tataḥ sarvaṃ sajjaṃ cakruḥ paraṃtapāḥ
उनकी बात सुनकर और हितकर उपाय पर विचार करके उन शत्रुतापन वीरों ने युद्ध की सारी सामग्री तैयार कर ली;
श्लोक 240 (1.2.240)
ततो युद्धाय निर्याता नराश्वरथदन्तिनः । नगराद्धास्तिनपुराद्बलसंख्यानमेव च ॥
tato yuddhāya niryātā narāśvarathadantinaḥ | nagarāddhāstinapurādbalasaṃkhyānameva ca
फिर हस्तिनापुर नगर से पैदल सैनिक, घोड़े, रथ और हाथी युद्ध के लिए निकले, और सेना की गिनती हुई;
श्लोक 241 (1.2.241)
यत्र राज्ञा ह्युलूकस्य प्रेषणं पाण्डवान्प्रति । श्वोभाविनि महायुद्धे दौत्येन कृतवान्प्रभुः ॥
yatra rājñā hyulūkasya preṣaṇaṃ pāṇḍavānprati | śvobhāvini mahāyuddhe dautyena kṛtavānprabhuḥ
जहाँ अगले दिन होने वाले महायुद्ध से पहले राजा दुर्योधन ने उलूक को दूत बनाकर पाण्डवों के पास भेजा;
श्लोक 242 (1.2.242)
रथातिरथसंख्यानमम्बोपाख्यानमेव च । एतत्सुबहुवृत्तान्तं पञ्चमं पर्व भारते ॥
rathātirathasaṃkhyānamambopākhyānameva ca | etatsubahuvṛttāntaṃ pañcamaṃ parva bhārate
रथियों और अतिरथियों की गणना, तथा अम्बा का उपाख्यान। महाभारत का यह पाँचवाँ पर्व, जिसमें बहुत-सी घटनाएँ हैं,
श्लोक 243 (1.2.243)
उद्योगपर्व निर्दिष्टं सन्धिविग्रहमिश्रितम् । अध्यायानां शतं प्रोक्तं षडशीतिर्महर्षिणा ॥
udyogaparva nirdiṣṭaṃ sandhivigrahamiśritam | adhyāyānāṃ śataṃ proktaṃ ṣaḍaśītirmaharṣiṇā
सन्धि और विग्रह से मिला-जुला उद्योग पर्व कहा गया है। महर्षि ने इसके अध्याय एक सौ छियासी बताए हैं;
श्लोक 244 (1.2.244)
श्लोकानां षट् सहस्राणि तावन्त्येव शतानि च । श्लोकाश्च नवतिः प्रोक्तास्तथैवाष्टौ महात्मना ॥
ślokānāṃ ṣaṭ sahasrāṇi tāvantyeva śatāni ca | ślokāśca navatiḥ proktāstathaivāṣṭau mahātmanā
और श्लोक छह हज़ार, उतने ही सौ (छह सौ) और अट्ठानबे, अर्थात् कुल छह हज़ार छह सौ अट्ठानबे, महात्मा
श्लोक 245 (1.2.245)
व्यासेनोदारमतिना पर्वण्यस्मिंस्तपोधनाः । अतः परं विचित्रार्थं भीष्मपर्व प्रचक्षते ॥
vyāsenodāramatinā parvaṇyasmiṃstapodhanāḥ | ataḥ paraṃ vicitrārthaṃ bhīṣmaparva pracakṣate
उदारबुद्धि व्यास ने इस पर्व में कहे हैं, हे तपोधनो। इसके बाद विचित्र विषयों वाला भीष्म पर्व कहा जाता है,
श्लोक 246 (1.2.246)
जम्बूखण्डविनिर्माणं यत्रोक्तं संजयेन ह । यत्र यौधिष्ठिरं सैन्यं विषादमगमत्परम् ॥
jambūkhaṇḍavinirmāṇaṃ yatroktaṃ saṃjayena ha | yatra yaudhiṣṭhiraṃ sainyaṃ viṣādamagamatparam
जिसमें संजय ने जम्बूखण्ड की रचना का वर्णन किया; जिसमें युधिष्ठिर की सेना घोर विषाद में डूब गई;
श्लोक 247 (1.2.247)
यत्र युद्धमभूद्धोरं दशाहानि सुदारुणम् । कश्मलं यत्र पार्थस्य वासुदेवो महामतिः ॥
yatra yuddhamabhūddhoraṃ daśāhāni sudāruṇam | kaśmalaṃ yatra pārthasya vāsudevo mahāmatiḥ
जिसमें दस दिनों तक अत्यन्त भीषण युद्ध हुआ; जिसमें महाबुद्धिमान वासुदेव ने पार्थ की
श्लोक 248 (1.2.248)
मोहजं नाशयामास हेतुभिर्मोक्षदर्शिभिः । समीक्ष्याधोक्षजः क्षिप्रं युधिष्ठिरहिते रतः ॥
mohajaṃ nāśayāmāsa hetubhirmokṣadarśibhiḥ | samīkṣyādhokṣajaḥ kṣipraṃ yudhiṣṭhirahite rataḥ
मोह से उत्पन्न व्याकुलता को मोक्ष का मार्ग दिखाने वाले तर्कों से दूर किया; जहाँ युधिष्ठिर के हित में लगे अधोक्षज ने स्थिति को देखकर
श्लोक 249 (1.2.249)
रथादाप्लुत्य वेगेन स्वयं कृष्ण उदारधीः । प्रतोदपाणिराधावद्भीष्मं हन्तुं व्यपेतभीः ॥
rathādāplutya vegena svayaṃ kṛṣṇa udāradhīḥ | pratodapāṇirādhāvadbhīṣmaṃ hantuṃ vyapetabhīḥ
उदारबुद्धि कृष्ण स्वयं वेग से रथ से कूदकर, हाथ में चाबुक लिए, निर्भय होकर भीष्म को मारने दौड़े;
श्लोक 250 (1.2.250)
वाक्यप्रतोदाभिहतो यत्र कृष्णेन पाण्डवः । गाण्डीवधन्वा समरे सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥
vākyapratodābhihato yatra kṛṣṇena pāṇḍavaḥ | gāṇḍīvadhanvā samare sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ
जहाँ सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, गाण्डीवधारी पाण्डव अर्जुन रणभूमि में कृष्ण के वचन रूपी चाबुक से आहत हुए;
श्लोक 251 (1.2.251)
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य यत्र पार्थो महाधनुः । विनिघ्नन्निशितैर्बाणै रथाद्भीष्ममपातयत् ॥
śikhaṇḍinaṃ puraskṛtya yatra pārtho mahādhanuḥ | vinighnanniśitairbāṇai rathādbhīṣmamapātayat
जहाँ महाधनुर्धर पार्थ ने शिखण्डी को आगे करके तीखे बाणों से प्रहार करते हुए भीष्म को रथ से गिरा दिया;
श्लोक 252 (1.2.252)
शरतल्पगतश्चैव भीष्मो यत्र बभूव ह । षष्ठमेतत्समाख्यातं भारते पर्व विस्तृतम् ॥
śaratalpagataścaiva bhīṣmo yatra babhūva ha | ṣaṣṭhametatsamākhyātaṃ bhārate parva vistṛtam
और जहाँ भीष्म बाणों की शय्या पर लेट गए। यह महाभारत का छठा विस्तृत पर्व कहा गया है।
श्लोक 253 (1.2.253)
अध्यायानां शतं प्रोक्तं तथा सप्तदशापरे । पञ्च श्लोकसहस्राणि संख्ययाष्टौ शतानि च ॥
adhyāyānāṃ śataṃ proktaṃ tathā saptadaśāpare | pañca ślokasahasrāṇi saṃkhyayāṣṭau śatāni ca
इसके अध्याय एक सौ और उनके अतिरिक्त सत्रह, अर्थात् एक सौ सत्रह कहे गए हैं; और गिनती में पाँच हज़ार आठ सौ श्लोक
श्लोक 254 (1.2.254)
श्लोकाश्च चतुराशीतिरस्मिन्पर्वणि कीर्तिताः । व्यासेन वेदविदुषा संख्याता भीष्मपर्वणि ॥
ślokāśca caturāśītirasminparvaṇi kīrtitāḥ | vyāsena vedaviduṣā saṃkhyātā bhīṣmaparvaṇi
और चौरासी श्लोक इस पर्व में कहे गए हैं, अर्थात् कुल पाँच हज़ार आठ सौ चौरासी, जिन्हें वेदज्ञ व्यास ने भीष्म पर्व में गिनाया है।
श्लोक 255 (1.2.255)
द्रोणपर्व ततश्चित्रं बहुवृत्तान्तमुच्यते । सैनापत्येऽभिषिक्तोऽथ यत्राचार्यः प्रतापवान् ॥
droṇaparva tataścitraṃ bahuvṛttāntamucyate | saināpatye'bhiṣikto'tha yatrācāryaḥ pratāpavān
फिर विचित्र और अनेक घटनाओं से भरा द्रोण पर्व कहा जाता है, जिसमें प्रतापी आचार्य सेनापति के पद पर अभिषिक्त हुए,
श्लोक 256 (1.2.256)
दुर्योधनस्य प्रीत्यर्थं प्रतिजज्ञे महास्त्रवित् । ग्रहणं धर्मराजस्य पाण्डुपुत्रस्य धीमतः ॥
duryodhanasya prītyarthaṃ pratijajñe mahāstravit | grahaṇaṃ dharmarājasya pāṇḍuputrasya dhīmataḥ
और दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए महान अस्त्रों के ज्ञाता द्रोण ने पाण्डुपुत्र बुद्धिमान धर्मराज को बन्दी बनाने की प्रतिज्ञा की;
श्लोक 257 (1.2.257)
यत्र संशप्तकाः पार्थमपनिन्यू रणाजिरात् । भगदत्तो महाराजो यत्र शक्रसमो युधि ॥
yatra saṃśaptakāḥ pārthamapaninyū raṇājirāt | bhagadatto mahārājo yatra śakrasamo yudhi
जिसमें संशप्तक पार्थ को रणभूमि से दूर ले गए; जिसमें युद्ध में इन्द्र के समान महाराज भगदत्त
श्लोक 258 (1.2.258)
सुप्रतीकेन नागेन स हि शान्तः किरीटिना । यत्राभिमन्युं बहवो जघ्नुरेकं महारथाः ॥
supratīkena nāgena sa hi śāntaḥ kirīṭinā | yatrābhimanyuṃ bahavo jaghnurekaṃ mahārathāḥ
अपने हाथी सुप्रतीक सहित किरीटी अर्जुन द्वारा शान्त कर दिए गए; जिसमें बहुत-से महारथियों ने मिलकर अकेले अभिमन्यु को मार डाला,
श्लोक 259 (1.2.259)
जयद्रथमुखा बालं शूरमप्राप्तयौवनम् । हतेऽभिमन्यौ क्रुद्धेन यत्र पार्थेन संयुगे ॥
jayadrathamukhā bālaṃ śūramaprāptayauvanam | hate'bhimanyau kruddhena yatra pārthena saṃyuge
जयद्रथ आदि ने, उस वीर बालक को जो अभी युवावस्था तक नहीं पहुँचा था; जिसमें अभिमन्यु के मारे जाने पर क्रोधित पार्थ ने युद्ध में
श्लोक 260 (1.2.260)
अक्षौहिणीः सप्त हत्वा हतो राजा जयद्रथः । यत्र भीमो महाबाहुः सात्यकिश्च महारथः ॥
akṣauhiṇīḥ sapta hatvā hato rājā jayadrathaḥ | yatra bhīmo mahābāhuḥ sātyakiśca mahārathaḥ
सात अक्षौहिणी सेनाओं का संहार किया और राजा जयद्रथ मारा गया; जिसमें महाबाहु भीम और महारथी सात्यकि
श्लोक 261 (1.2.261)
अन्वेषणार्थं पार्थस्य युधिष्ठिरनृपाज्ञया । प्रविष्टौ भारतीं सेनामप्रधृष्यां सुरैरपि ॥
anveṣaṇārthaṃ pārthasya yudhiṣṭhiranṛpājñayā | praviṣṭau bhāratīṃ senāmapradhṛṣyāṃ surairapi
राजा युधिष्ठिर की आज्ञा से पार्थ को खोजने के लिए उस भारती सेना में घुस गए, जिसे देवता भी नहीं दबा सकते थे;
श्लोक 262 (1.2.262)
संशप्तकावशेषं च कृतं निःशेषमाहवे । संशप्तकानां वीराणां कोट्यो नव महात्मनाम् ॥
saṃśaptakāvaśeṣaṃ ca kṛtaṃ niḥśeṣamāhave | saṃśaptakānāṃ vīrāṇāṃ koṭyo nava mahātmanām
और संशप्तकों के बचे हुए भाग को युद्ध में पूरी तरह नष्ट कर दिया गया; वीर, महात्मा संशप्तकों के नौ करोड़ योद्धाओं को
श्लोक 263 (1.2.263)
किरीटिनाभिनिष्क्रम्य प्रापिता यमसादनम् । धृतराष्ट्रस्य पुत्राश्च तथा पाषाणयोधिनः ॥
kirīṭinābhiniṣkramya prāpitā yamasādanam | dhṛtarāṣṭrasya putrāśca tathā pāṣāṇayodhinaḥ
किरीटी ने आगे बढ़कर यमलोक पहुँचा दिया; और धृतराष्ट्र के पुत्र, तथा पत्थरों से लड़ने वाले योद्धा,
श्लोक 264 (1.2.264)
नारायणाश्च गोपालाः समरे चित्रयोधिनः । अलम्बुषः श्रुतायुश्च जलसन्धश्च वीर्यवान् ॥
nārāyaṇāśca gopālāḥ samare citrayodhinaḥ | alambuṣaḥ śrutāyuśca jalasandhaśca vīryavān
विचित्र ढंग से लड़ने वाले नारायण गोप; अलम्बुष, श्रुतायु और पराक्रमी जलसन्ध,
श्लोक 265 (1.2.265)
सौमदत्तिर्विराटश्च द्रुपदश्च महारथः । घटोत्कचादयश्चान्ये निहता द्रोणपर्वणि ॥
saumadattirvirāṭaśca drupadaśca mahārathaḥ | ghaṭotkacādayaścānye nihatā droṇaparvaṇi
सोमदत्त का पुत्र, विराट, महारथी द्रुपद, तथा घटोत्कच आदि अन्य वीर भी द्रोण पर्व में मारे गए।
श्लोक 266 (1.2.266)
अश्वत्थामापि चात्रैव द्रोणे युधि निपातिते । अस्त्रं प्रादुश्चकारोग्रं नारायणममर्षितः ॥
aśvatthāmāpi cātraiva droṇe yudhi nipātite | astraṃ prāduścakārograṃ nārāyaṇamamarṣitaḥ
और इसी पर्व में युद्ध में द्रोण के मारे जाने पर अश्वत्थामा ने असहनीय क्रोध में भयंकर नारायणास्त्र प्रकट किया।
श्लोक 267 (1.2.267)
आग्नेयं कीर्त्यते यत्र रुद्रमाहात्म्यमुत्तमम् । व्यासस्य चाप्यागमनं माहात्म्यं कृष्णपार्थयोः ॥
āgneyaṃ kīrtyate yatra rudramāhātmyamuttamam | vyāsasya cāpyāgamanaṃ māhātmyaṃ kṛṣṇapārthayoḥ
इसमें आग्नेयास्त्र का वर्णन है, रुद्र की उत्तम महिमा, व्यास जी का आगमन और श्रीकृष्ण तथा अर्जुन की महिमा भी कही गई है।
श्लोक 268 (1.2.268)
सप्तमं भारते पर्व महदेतदुदाहृतम् । यत्र ते पृथिवीपालाः प्रायशो निधनं गताः ॥
saptamaṃ bhārate parva mahadetadudāhṛtam | yatra te pṛthivīpālāḥ prāyaśo nidhanaṃ gatāḥ
यह भारत का महान सातवाँ पर्व कहा गया है, जिसमें वे पृथ्वीपाल राजा अधिकतर मृत्यु को प्राप्त हुए —
श्लोक 269 (1.2.269)
द्रोणपर्वणि ये शूरा निर्दिष्टाः पुरुषर्षभाः । अत्राध्यायशतं प्रोक्तं तथाध्यायाश्च सप्ततिः ॥
droṇaparvaṇi ye śūrā nirdiṣṭāḥ puruṣarṣabhāḥ | atrādhyāyaśataṃ proktaṃ tathādhyāyāśca saptatiḥ
वे शूरवीर पुरुषश्रेष्ठ, जिनका नाम द्रोणपर्व में आया है। इस पर्व में एक सौ अध्याय और उनके अतिरिक्त सत्तर अध्याय कहे गए हैं;
श्लोक 270 (1.2.270)
अष्टौ श्लोकसहस्राणि तथा नव शतानि च । श्लोका नव तथैवात्र संख्यातास्तत्त्वदर्शिना ॥
aṣṭau ślokasahasrāṇi tathā nava śatāni ca | ślokā nava tathaivātra saṃkhyātāstattvadarśinā
आठ हज़ार नौ सौ श्लोक और उनके अतिरिक्त नौ श्लोक यहाँ तत्त्वदर्शी ने गिनाए हैं —
श्लोक 271 (1.2.271)
पाराशर्येण मुनिना संचिन्त्य द्रोणपर्वणि । अतः परं कर्णपर्व प्रोच्यते परमाद्भुतम् ॥
pārāśaryeṇa muninā saṃcintya droṇaparvaṇi | ataḥ paraṃ karṇaparva procyate paramādbhutam
पराशरपुत्र मुनि ने द्रोणपर्व में भली-भाँति विचार करके। इसके बाद परम अद्भुत कर्णपर्व कहा जाता है,
श्लोक 272 (1.2.272)
सारथ्ये विनियोगश्च मद्रराजस्य धीमतः । आख्यातं यत्र पौराणं त्रिपुरस्य निपातनम् ॥
sārathye viniyogaśca madrarājasya dhīmataḥ | ākhyātaṃ yatra paurāṇaṃ tripurasya nipātanam
जिसमें बुद्धिमान मद्रराज (शल्य) को सारथि बनाया गया है और जिसमें त्रिपुर के विनाश की प्राचीन कथा कही गई है;
श्लोक 273 (1.2.273)
प्रयाणे परुषश्चात्र संवादः कर्णशल्ययोः । हंसकाकीयमाख्यानं तत्रैवाक्षेपसंहितम् ॥
prayāṇe paruṣaścātra saṃvādaḥ karṇaśalyayoḥ | haṃsakākīyamākhyānaṃ tatraivākṣepasaṃhitam
इसी में युद्ध के लिए निकलते समय कर्ण और शल्य का कटु संवाद है, और वहीं ताने के रूप में कही गई हंस और कौए की कथा भी है;
श्लोक 274 (1.2.274)
वधः पाण्ड्यस्य च तथा अश्वत्थाम्ना महात्मना । दण्डसेनस्य च ततो दण्डस्य च वधस्तथा ॥
vadhaḥ pāṇḍyasya ca tathā aśvatthāmnā mahātmanā | daṇḍasenasya ca tato daṇḍasya ca vadhastathā
महात्मा अश्वत्थामा द्वारा पाण्ड्य का वध, और फिर दण्डसेन तथा दण्ड का वध;
श्लोक 275 (1.2.275)
द्वैरथे यत्र कर्णेन धर्मराजो युधिष्ठिरः । संशयं गमितो युद्धे मिषतां सर्वधन्विनाम् ॥
dvairathe yatra karṇena dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | saṃśayaṃ gamito yuddhe miṣatāṃ sarvadhanvinām
जहाँ द्वन्द्व-युद्ध में कर्ण ने सब धनुर्धारियों के देखते-देखते धर्मराज युधिष्ठिर को संकट में डाल दिया;
श्लोक 276 (1.2.276)
अन्योन्यं प्रति च क्रोधो युधिष्ठिरकिरीटिनोः । यत्रैवानुनयः प्रोक्तो माधवेनार्जुनस्य हि ॥
anyonyaṃ prati ca krodho yudhiṣṭhirakirīṭinoḥ | yatraivānunayaḥ prokto mādhavenārjunasya hi
युधिष्ठिर और किरीटी (अर्जुन) का एक-दूसरे पर क्रोध, और जहाँ माधव (श्रीकृष्ण) द्वारा अर्जुन को मनाने का वर्णन है;
श्लोक 277 (1.2.277)
प्रतिज्ञापूर्वकं चापि वक्षो दुःशासनस्य च । भित्त्वा वृकोदरो रक्तं पीतवान्यत्र संयुगे ॥
pratijñāpūrvakaṃ cāpi vakṣo duḥśāsanasya ca | bhittvā vṛkodaro raktaṃ pītavānyatra saṃyuge
और जहाँ अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार वृकोदर (भीम) ने युद्ध में दुःशासन की छाती फाड़कर उसका रक्त पिया;
श्लोक 278 (1.2.278)
द्वैरथे यत्र पार्थेन हतः कर्णो महारथः । अष्टमं पर्व निर्दिष्टमेतद्भारतचिन्तकैः ॥
dvairathe yatra pārthena hataḥ karṇo mahārathaḥ | aṣṭamaṃ parva nirdiṣṭametadbhāratacintakaiḥ
जहाँ द्वन्द्व-युद्ध में अर्जुन ने महारथी कर्ण का वध किया। भारत का चिन्तन करने वालों ने इसे आठवाँ पर्व बताया है।
श्लोक 279 (1.2.279)
एकोनसप्ततिः प्रोक्ता अध्यायाः कर्णपर्वणि । चत्वार्येव सहस्राणि नव श्लोकशतानि च ॥
ekonasaptatiḥ proktā adhyāyāḥ karṇaparvaṇi | catvāryeva sahasrāṇi nava ślokaśatāni ca
कर्णपर्व में उनहत्तर अध्याय कहे गए हैं, और चार हज़ार नौ सौ श्लोक,
श्लोक 280 (1.2.280)
चतुःषष्टिस्तथा श्लोकाः पर्वण्यस्मिन्प्रकीर्तिताः । अतः परं विचित्रार्थं शल्यपर्व प्रकीर्तितम् ॥
catuḥṣaṣṭistathā ślokāḥ parvaṇyasminprakīrtitāḥ | ataḥ paraṃ vicitrārthaṃ śalyaparva prakīrtitam
तथा इस पर्व में चौंसठ श्लोक और बताए गए हैं। इसके बाद विचित्र विषयों वाला शल्यपर्व कहा गया है,
श्लोक 281 (1.2.281)
हतप्रवीरे सैन्ये तु नेता मद्रेश्वरोऽभवत् । यत्र कौमारमाख्यानमभिषेकस्य कर्म च ॥
hatapravīre sainye tu netā madreśvaro'bhavat | yatra kaumāramākhyānamabhiṣekasya karma ca
जिसमें सेना के प्रमुख वीरों के मारे जाने पर मद्रराज (शल्य) उसका सेनापति बना; और जिसमें कुमार (स्कन्द) की कथा तथा उनके अभिषेक का विधान कहा गया है;
श्लोक 282 (1.2.282)
वृत्तानि चाथ युद्धानि कीर्त्यन्ते यत्र भागशः । विनाशः कुरुमुख्यानां शल्यपर्वणि कीर्त्यते ॥
vṛttāni cātha yuddhāni kīrtyante yatra bhāgaśaḥ | vināśaḥ kurumukhyānāṃ śalyaparvaṇi kīrtyate
जहाँ हुए युद्धों का क्रम से वर्णन है; शल्यपर्व में प्रमुख कौरवों का विनाश कहा गया है;
श्लोक 283 (1.2.283)
शल्यस्य निधनं चात्र धर्मराजान्महात्मनः । शकुनेश्च वधोऽत्रैव सहदेवेन संयुगे ॥
śalyasya nidhanaṃ cātra dharmarājānmahātmanaḥ | śakuneśca vadho'traiva sahadevena saṃyuge
इसी में महात्मा धर्मराज के हाथों शल्य की मृत्यु है, और यहीं युद्ध में सहदेव द्वारा शकुनि का वध भी है;
श्लोक 284 (1.2.284)
सैन्ये च हतभूयिष्ठे किंचिच्छिष्टे सुयोधनः । ह्रदं प्रविश्य यत्रासौ संस्तभ्यापो व्यवस्थितः ॥
sainye ca hatabhūyiṣṭhe kiṃcicchiṣṭe suyodhanaḥ | hradaṃ praviśya yatrāsau saṃstabhyāpo vyavasthitaḥ
जहाँ सेना के लगभग पूरी तरह नष्ट हो जाने और थोड़ा-सा ही शेष रहने पर सुयोधन एक सरोवर में प्रवेश कर, उसके जल को स्तम्भित करके उसमें ठहर गया;
श्लोक 285 (1.2.285)
प्रवृत्तिस्तत्र चाख्याता यत्र भीमस्य लुब्धकैः । क्षेपयुक्तैर्वचोभिश्च धर्मराजस्य धीमतः ॥
pravṛttistatra cākhyātā yatra bhīmasya lubdhakaiḥ | kṣepayuktairvacobhiśca dharmarājasya dhīmataḥ
जहाँ शिकारियों ने भीम को उसका समाचार दिया; और जहाँ बुद्धिमान धर्मराज के ताने भरे वचनों से
श्लोक 286 (1.2.286)
ह्रदात्समुत्थितो यत्र धार्तराष्ट्रोऽत्यमर्षणः । भीमेन गदया युद्धं यत्रासौ कृतवान्सह ॥
hradātsamutthito yatra dhārtarāṣṭro'tyamarṣaṇaḥ | bhīmena gadayā yuddhaṃ yatrāsau kṛtavānsaha
अत्यन्त असहिष्णु धृतराष्ट्रपुत्र सरोवर से बाहर निकला, और जहाँ उसने भीम के साथ गदायुद्ध किया;
श्लोक 287 (1.2.287)
समवाये च युद्धस्य रामस्यागमनं स्मृतम् । सरस्वत्याश्च तीर्थानां पुण्यता परिकीर्तिता ॥
samavāye ca yuddhasya rāmasyāgamanaṃ smṛtam | sarasvatyāśca tīrthānāṃ puṇyatā parikīrtitā
और उस युद्ध के जुटने पर बलराम के आगमन का वर्णन है, तथा सरस्वती के तीर्थों की पवित्रता बताई गई है;
श्लोक 288 (1.2.288)
गदायुद्धं च तुमुलमत्रैव परिकीर्तितम् । दुर्योधनस्य राज्ञोऽथ यत्र भीमेन संयुगे ॥
gadāyuddhaṃ ca tumulamatraiva parikīrtitam | duryodhanasya rājño'tha yatra bhīmena saṃyuge
यहीं घमासान गदायुद्ध का वर्णन है, जिसमें भीम के साथ युद्ध में राजा दुर्योधन की
श्लोक 289 (1.2.289)
ऊरू भग्नौ प्रसह्याजौ गदया भीमवेगया । नवमं पर्व निर्दिष्टमेतदद्भुतमर्थवत् ॥
ūrū bhagnau prasahyājau gadayā bhīmavegayā | navamaṃ parva nirdiṣṭametadadbhutamarthavat
दोनों जाँघें भयंकर वेग वाली गदा से बलपूर्वक तोड़ दी गईं। यह अद्भुत और सार्थक नवाँ पर्व बताया गया है।
श्लोक 290 (1.2.290)
एकोनषष्टिरध्यायाः पर्वण्यत्र प्रकीर्तिताः । संख्याता बहुवृत्तान्ताः श्लोकसंख्याऽत्र कथ्यते ॥
ekonaṣaṣṭiradhyāyāḥ parvaṇyatra prakīrtitāḥ | saṃkhyātā bahuvṛttāntāḥ ślokasaṃkhyā'tra kathyate
इस पर्व में अनेक घटनाओं से भरे उनसठ अध्याय गिनाए गए हैं; अब इसकी श्लोक-संख्या बताई जाती है —
श्लोक 291 (1.2.291)
त्रीणि श्लोकसहस्राणि द्वे शते विंशतिस्तथा । मुनिना संप्रणीतानि कौरवाणां यशोभृता ॥
trīṇi ślokasahasrāṇi dve śate viṃśatistathā | muninā saṃpraṇītāni kauravāṇāṃ yaśobhṛtā
तीन हज़ार दो सौ बीस, जिन्हें कौरवों के यश को धारण करने वाले मुनि ने रचा है।
श्लोक 292 (1.2.292)
अतः परं प्रवक्ष्यामि सौप्तिकं पर्व दारुणम् । भग्नोरुं यत्र राजानं दुर्योधनममर्षणम् ॥
ataḥ paraṃ pravakṣyāmi sauptikaṃ parva dāruṇam | bhagnoruṃ yatra rājānaṃ duryodhanamamarṣaṇam
इसके बाद मैं भयानक सौप्तिक पर्व कहूँगा, जिसमें टूटी जाँघों वाले, क्रोध न छोड़ने वाले राजा दुर्योधन का प्रसंग है।
श्लोक 293 (1.2.293)
अपयातेषु पार्थेषु त्रयस्तेऽभ्याययू रथाः । कृतवर्मा कृपो द्रौणिः सायाह्ने रुधिरोक्षितम् ॥
apayāteṣu pārtheṣu trayaste'bhyāyayū rathāḥ | kṛtavarmā kṛpo drauṇiḥ sāyāhne rudhirokṣitam
पाण्डवों के चले जाने पर वे तीन रथी — कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा — सायंकाल रक्त से सने हुए उस राजा के पास आए,
श्लोक 294 (1.2.294)
समेत्य ददृशुर्भूमौ पतितं रणमूर्धनि । प्रतिजज्ञे दृढक्रोधो द्रौणिर्यत्र महारथः ॥
sametya dadṛśurbhūmau patitaṃ raṇamūrdhani | pratijajñe dṛḍhakrodho drauṇiryatra mahārathaḥ
और साथ मिलकर उन्होंने उसे रणभूमि के अग्रभाग में धरती पर पड़ा देखा। वहीं दृढ़ क्रोध वाले महारथी अश्वत्थामा ने प्रतिज्ञा की —
श्लोक 295 (1.2.295)
अहत्वा सर्वपाञ्चालान्धृष्टद्युम्नपुरोगमान् । पाण्डवांश्च सहामात्यान्न विमोक्ष्यामि दंशनं ॥
ahatvā sarvapāñcālāndhṛṣṭadyumnapurogamān | pāṇḍavāṃśca sahāmātyānna vimokṣyāmi daṃśanaṃ
“धृष्टद्युम्न आदि सब पाञ्चालों को और मन्त्रियों सहित पाण्डवों को मारे बिना मैं अपना कवच नहीं उतारूँगा।”
श्लोक 296 (1.2.296)
यत्रैवमुक्त्वा राजानमपक्रम्य त्रयो रथाः । सूर्यास्तमनवेलायामासेदुस्ते महद्वनम् ॥
yatraivamuktvā rājānamapakramya trayo rathāḥ | sūryāstamanavelāyāmāseduste mahadvanam
वहाँ राजा से ऐसा कहकर वे तीनों रथी चले गए और सूर्यास्त के समय एक विशाल वन में पहुँचे,
श्लोक 297 (1.2.297)
न्यग्रोधस्याथ महतो यत्राधस्ताद्व्यवस्थिताः । ततः काकान्बहून्रात्रौ दृष्ट्वोलूकेन हिंसितान् ॥
nyagrodhasyātha mahato yatrādhastādvyavasthitāḥ | tataḥ kākānbahūnrātrau dṛṣṭvolūkena hiṃsitān
जहाँ वे एक विशाल बरगद के नीचे ठहरे। तब रात में एक उल्लू द्वारा बहुत-से कौओं को मारा गया देखकर
श्लोक 298 (1.2.298)
द्रौणिः क्रोधसमाविष्टः पितुर्वधमनुस्मरन् । पाञ्चालानां प्रसुप्तानां वधं प्रति मनो दधे ॥
drauṇiḥ krodhasamāviṣṭaḥ piturvadhamanusmaran | pāñcālānāṃ prasuptānāṃ vadhaṃ prati mano dadhe
क्रोध से भरे अश्वत्थामा ने अपने पिता के वध को स्मरण करते हुए सोए हुए पाञ्चालों को मारने का निश्चय किया।
श्लोक 299 (1.2.299)
गत्वा च शिबिरद्वारि दुर्दर्शं तत्र राक्षसम् । घोररूपमपश्यत्स दिवमावृत्य धिष्ठितम् ॥
gatvā ca śibiradvāri durdarśaṃ tatra rākṣasam | ghorarūpamapaśyatsa divamāvṛtya dhiṣṭhitam
शिविर के द्वार पर जाकर उसने वहाँ एक भयंकर रूप वाले, देखने में कठिन राक्षस को आकाश को ढककर खड़ा देखा।
श्लोक 300 (1.2.300)
तेन व्याघातमस्त्राणां क्रियमाणमवेक्ष्य च । द्रौणिर्यत्र विरूपाक्षं रुद्रमाराध्य सत्वरः ॥
tena vyāghātamastrāṇāṃ kriyamāṇamavekṣya ca | drauṇiryatra virūpākṣaṃ rudramārādhya satvaraḥ
उसके द्वारा अपने अस्त्रों को निष्फल होते देखकर अश्वत्थामा ने शीघ्र ही विरूपाक्ष रुद्र की आराधना की, और फिर
श्लोक 301 (1.2.301)
प्रसुप्तान्निशि विश्वस्तान्धृष्टद्युम्नपुरोगमान् । पाञ्चालान्सपरीवारान्द्रौपदेयांश्च सर्वशः ॥
prasuptānniśi viśvastāndhṛṣṭadyumnapurogamān | pāñcālānsaparīvārāndraupadeyāṃśca sarvaśaḥ
रात में निश्चिन्त सोए हुए धृष्टद्युम्न आदि पाञ्चालों को, उनके परिजनों सहित, और द्रौपदी के सभी पुत्रों को मार डाला,
श्लोक 302 (1.2.302)
कृतवर्मणा च सहितः कृपेण च निजघ्निवान् । यत्रामुच्यन्त ते पार्थाः पञ्च कृष्णबलाश्रयात् ॥
kṛtavarmaṇā ca sahitaḥ kṛpeṇa ca nijaghnivān | yatrāmucyanta te pārthāḥ pañca kṛṣṇabalāśrayāt
कृतवर्मा और कृपाचार्य के साथ मिलकर। वहाँ पाँचों पाण्डव श्रीकृष्ण के बल का आश्रय लेने से बच गए,
श्लोक 303 (1.2.303)
सात्यकिश्च महेष्वासः शेषाश्च निधनं गताः । पाञ्चालानां प्रसुप्तानां यत्र द्रोणसुताद्वधः ॥
sātyakiśca maheṣvāsaḥ śeṣāśca nidhanaṃ gatāḥ | pāñcālānāṃ prasuptānāṃ yatra droṇasutādvadhaḥ
और महाधनुर्धर सात्यकि भी; शेष सब मृत्यु को प्राप्त हुए। वहाँ द्रोणपुत्र द्वारा सोए हुए पाञ्चालों के वध का समाचार
श्लोक 304 (1.2.304)
धृष्टद्युम्नस्य सूतेन पाण्डवेषु निवेदितः । द्रौपदी पुत्रशोकार्ता पितृभ्रातृवधार्दिता ॥
dhṛṣṭadyumnasya sūtena pāṇḍaveṣu niveditaḥ | draupadī putraśokārtā pitṛbhrātṛvadhārditā
धृष्टद्युम्न के सारथि ने पाण्डवों को सुनाया। पुत्रों के शोक से व्याकुल और पिता तथा भाइयों के वध से पीड़ित द्रौपदी
श्लोक 305 (1.2.305)
कृतानशनसंकल्पा यत्र भर्तॄनुपाविशत् । द्रौपदीवचनाद्यत्र भीमो भीमपराक्रमः ॥
kṛtānaśanasaṃkalpā yatra bhartṝnupāviśat | draupadīvacanādyatra bhīmo bhīmaparākramaḥ
आमरण अनशन का संकल्प करके अपने पतियों के सामने बैठ गई। तब द्रौपदी के कहने पर भयानक पराक्रमी भीम
श्लोक 306 (1.2.306)
प्रियं तस्याश्चिकीर्षन्वै गदामादाय वीर्यवान् । अन्वधावत्सुसंक्रुद्धो भारद्वाजं गुरोः सुतम् ॥
priyaṃ tasyāścikīrṣanvai gadāmādāya vīryavān | anvadhāvatsusaṃkruddho bhāradvājaṃ guroḥ sutam
उसका प्रिय करने की इच्छा से गदा उठाकर, अत्यन्त क्रुद्ध होकर, भरद्वाजवंशी गुरुपुत्र (अश्वत्थामा) के पीछे दौड़े।
श्लोक 307 (1.2.307)
भीमसेनभयाद्यत्र दैवेनाभिप्रचोदितः । अपाण्डवायेति रुषा द्रौणिरस्त्रमवासृजत् ॥
bhīmasenabhayādyatra daivenābhipracoditaḥ | apāṇḍavāyeti ruṣā drauṇirastramavāsṛjat
वहाँ भीमसेन के भय से और दैव की प्रेरणा से अश्वत्थामा ने क्रोध में “पाण्डवों का नाश हो” कहकर अस्त्र छोड़ दिया।
श्लोक 308 (1.2.308)
मैवमित्यब्रवीत्कृष्णः शमयंस्तस्य तद्वचः । यत्रास्त्रमस्त्रेण च तच्छमयामास फाल्गुनः ॥
maivamityabravītkṛṣṇaḥ śamayaṃstasya tadvacaḥ | yatrāstramastreṇa ca tacchamayāmāsa phālgunaḥ
श्रीकृष्ण ने “ऐसा नहीं” कहकर उसके वचन को शान्त किया, और अर्जुन ने अपने अस्त्र से उस अस्त्र को शान्त कर दिया।
श्लोक 309 (1.2.309)
द्रौणेश्च द्रोहबुद्धित्वं वीक्ष्य पापात्मनस्तदा । द्रौणिद्वैपायनादीनां शापाश्चान्योन्यकारिताः ॥
drauṇeśca drohabuddhitvaṃ vīkṣya pāpātmanastadā | drauṇidvaipāyanādīnāṃ śāpāścānyonyakāritāḥ
तब उस पापी अश्वत्थामा के मन में द्रोह देखकर अश्वत्थामा, द्वैपायन (व्यास) तथा अन्य लोगों ने परस्पर शाप दिए।
श्लोक 310 (1.2.310)
मणिं तथा समादाय द्रोणपुत्रान्महारथात् । पाण्डवाः प्रददुर्हृष्टा द्रौपद्यै जितकाशिनः ॥
maṇiṃ tathā samādāya droṇaputrānmahārathāt | pāṇḍavāḥ pradadurhṛṣṭā draupadyai jitakāśinaḥ
और विजय से शोभित, प्रसन्न पाण्डवों ने महारथी द्रोणपुत्र से मणि लेकर द्रौपदी को दे दी।
श्लोक 311 (1.2.311)
एतद्वै दशमं पर्व सौप्तिकं समुदाहृतम् । अष्टादशास्मिन्नध्यायाः पर्वण्युक्ता महात्मना ॥
etadvai daśamaṃ parva sauptikaṃ samudāhṛtam | aṣṭādaśāsminnadhyāyāḥ parvaṇyuktā mahātmanā
यह दसवाँ पर्व सौप्तिक कहा गया है। इस पर्व में महात्मा ने अठारह अध्याय कहे हैं;
श्लोक 312 (1.2.312)
श्लोकानां कथितान्यत्र शतान्यष्टौ प्रसंख्यया । श्लोकाश्च सप्ततिः प्रोक्ता मुनिना ब्रह्मवादिना ॥
ślokānāṃ kathitānyatra śatānyaṣṭau prasaṃkhyayā | ślokāśca saptatiḥ proktā muninā brahmavādinā
इसमें गिनती से आठ सौ श्लोक कहे गए हैं, और सत्तर श्लोक और, जिन्हें ब्रह्मवादी मुनि ने कहा है —
श्लोक 313 (1.2.313)
सौप्तिकैषीकसंबन्धे पर्वण्युत्तमतेजसा । अत ऊर्ध्वमिदं प्राहुः स्त्रीपर्व करुणोदयम् ॥
sauptikaiṣīkasaṃbandhe parvaṇyuttamatejasā | ata ūrdhvamidaṃ prāhuḥ strīparva karuṇodayam
उत्तम तेज वाले उन मुनि ने, सौप्तिक और ऐषीक से जुड़े इस पर्व में। इसके बाद करुणा जगाने वाला स्त्रीपर्व कहा जाता है,
श्लोक 314 (1.2.314)
पुत्रशोकाभिसंतप्तः प्रज्ञाचक्षुर्नराधिपः । कृष्णोपनीतां यत्रासावायसीं प्रतिमां दृढां ॥
putraśokābhisaṃtaptaḥ prajñācakṣurnarādhipaḥ | kṛṣṇopanītāṃ yatrāsāvāyasīṃ pratimāṃ dṛḍhāṃ
जहाँ पुत्रशोक से सन्तप्त, प्रज्ञा को ही नेत्र मानने वाले राजा ने श्रीकृष्ण द्वारा लाई गई लोहे की दृढ़ प्रतिमा को
श्लोक 315 (1.2.315)
भीमसेनद्रोहबुद्धिर्धृतराष्ट्रो बभञ्ज ह । तथा शोकाभितप्तस्य धृतराष्ट्रस्य धीमतः ॥
bhīmasenadrohabuddhirdhṛtarāṣṭro babhañja ha | tathā śokābhitaptasya dhṛtarāṣṭrasya dhīmataḥ
भीमसेन से द्रोह की बुद्धि रखने वाले धृतराष्ट्र ने चूर-चूर कर दिया। उसी प्रकार शोक से सन्तप्त बुद्धिमान धृतराष्ट्र को
श्लोक 316 (1.2.316)
संसारदहनं बुद्ध्या हेतुभिर्मोक्षदर्शनैः । विदुरेण च यत्रास्य राज्ञ आश्वासनं कृतम् ॥
saṃsāradahanaṃ buddhyā hetubhirmokṣadarśanaiḥ | vidureṇa ca yatrāsya rājña āśvāsanaṃ kṛtam
बुद्धि से संसार को भस्म करने वाले, मोक्ष का मार्ग दिखाने वाले तर्कों द्वारा — यहाँ विदुर ने राजा को सान्त्वना दी।
श्लोक 317 (1.2.317)
धृतराष्ट्रस्य चात्रैव कौरवायोधनं तथा । सान्तःपुरस्य गमनं शोकार्तस्य प्रकीर्तितम् ॥
dhṛtarāṣṭrasya cātraiva kauravāyodhanaṃ tathā | sāntaḥpurasya gamanaṃ śokārtasya prakīrtitam
यहीं यह भी बताया गया है कि शोक से व्याकुल धृतराष्ट्र अन्तःपुर की स्त्रियों के साथ कौरवों की रणभूमि पर गए;
श्लोक 318 (1.2.318)
विलापो वीरपत्नीनां यत्रातिकरुणः स्मृतः । क्रोधावेशः प्रमोहश्च गान्धारीधृतराष्ट्रयोः ॥
vilāpo vīrapatnīnāṃ yatrātikaruṇaḥ smṛtaḥ | krodhāveśaḥ pramohaśca gāndhārīdhṛtarāṣṭrayoḥ
जहाँ वीरों की पत्नियों का अत्यन्त करुण विलाप वर्णित है, और गान्धारी तथा धृतराष्ट्र का क्रोधावेश और मोह भी;
श्लोक 319 (1.2.319)
यत्र तान्क्षत्रियाः शूरान्सङ्ग्रामेष्वनिवर्तिनः । पुत्रान्भ्रातृन्पितॄंश्चैव ददृशुर्निहतान्रणे ॥
yatra tānkṣatriyāḥ śūrānsaṅgrāmeṣvanivartinaḥ | putrānbhrātṛnpitṝṃścaiva dadṛśurnihatānraṇe
जहाँ क्षत्रियों ने युद्ध में कभी पीठ न दिखाने वाले उन शूरवीरों को — अपने पुत्रों, भाइयों और पिताओं को — रणभूमि में मरा पड़ा देखा;
श्लोक 320 (1.2.320)
पुत्रपौत्रवधार्तायास्तथात्रैव प्रकीर्तिता । गान्धार्याश्चापि कृष्णेन क्रोधोपशमनक्रिया ॥
putrapautravadhārtāyāstathātraiva prakīrtitā | gāndhāryāścāpi kṛṣṇena krodhopaśamanakriyā
और यहीं पुत्रों और पौत्रों के वध से पीड़ित गान्धारी के क्रोध को श्रीकृष्ण द्वारा शान्त करने का वर्णन भी है;
श्लोक 321 (1.2.321)
यत्र राजा महाप्राज्ञः सर्वधर्मभृतां वरः । राज्ञां तानि शरीराणि दाहयामास शास्त्रतः ॥
yatra rājā mahāprājñaḥ sarvadharmabhṛtāṃ varaḥ | rājñāṃ tāni śarīrāṇi dāhayāmāsa śāstrataḥ
जहाँ सब धर्मात्माओं में श्रेष्ठ, परम बुद्धिमान राजा (युधिष्ठिर) ने उन राजाओं के शरीरों का शास्त्रविधि से दाह-संस्कार कराया;
श्लोक 322 (1.2.322)
तोयकर्मणि चारब्धे राज्ञामुदकदानिके । गूढोत्पन्नस्य चाख्यानं कर्णस्य पृथयात्मनः ॥
toyakarmaṇi cārabdhe rājñāmudakadānike | gūḍhotpannasya cākhyānaṃ karṇasya pṛthayātmanaḥ
और जल-क्रिया आरम्भ होने पर, राजाओं को जलांजलि देते समय, पृथा (कुन्ती) के गुप्त रूप से उत्पन्न पुत्र कर्ण का वृत्तान्त
श्लोक 323 (1.2.323)
सुतस्यैतदिह प्रोक्तं व्यासेन परमर्षिणा । एतदेकादशं पर्व शोकवैक्लव्यकारणम् ॥
sutasyaitadiha proktaṃ vyāsena paramarṣiṇā | etadekādaśaṃ parva śokavaiklavyakāraṇam
— यह यहाँ परमर्षि व्यास ने कहा है। यह ग्यारहवाँ पर्व शोक और व्याकुलता का कारण है,
श्लोक 324 (1.2.324)
प्रणीतं सज्जनमनोवैक्लव्याश्रुप्रवर्तकम् । सप्तविंशतिरध्यायाः पर्वण्यस्मिन्प्रकीर्तिताः ॥
praṇītaṃ sajjanamanovaiklavyāśrupravartakam | saptaviṃśatiradhyāyāḥ parvaṇyasminprakīrtitāḥ
जो सज्जनों के मन को विचलित करने और उनके आँसू बहाने वाला रचा गया है। इस पर्व में सत्ताईस अध्याय बताए गए हैं,
श्लोक 325 (1.2.325)
श्लोकसप्तशती चापि पञ्चसप्ततिसंयुता । संख्यया भारताख्यानमुक्तं व्यासेन धीमता ॥
ślokasaptaśatī cāpi pañcasaptatisaṃyutā | saṃkhyayā bhāratākhyānamuktaṃ vyāsena dhīmatā
और गिनती से सात सौ पचहत्तर श्लोक — इस प्रकार बुद्धिमान व्यास ने भारत की कथा कही है।
श्लोक 326 (1.2.326)
अतः परं शान्तिपर्व द्वादशं बुद्धिवर्धनम् । यत्र निर्वेदमापन्नो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥
ataḥ paraṃ śāntiparva dvādaśaṃ buddhivardhanam | yatra nirvedamāpanno dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ
इसके बाद बुद्धि को बढ़ाने वाला बारहवाँ शान्तिपर्व है, जिसमें धर्मराज युधिष्ठिर विरक्ति में डूब गए,
श्लोक 327 (1.2.327)
घातयित्वा पितॄन्भ्रातॄन्पुत्रान्संबन्धिमातुलान् । शान्तिपर्वणि धर्माश्च व्याख्याताः शारतल्पिकाः ॥
ghātayitvā pitṝnbhrātṝnputrānsaṃbandhimātulān | śāntiparvaṇi dharmāśca vyākhyātāḥ śāratalpikāḥ
पितरों, भाइयों, पुत्रों, सम्बन्धियों और मामाओं को मरवाकर। शान्तिपर्व में शरशय्या पर कहे गए धर्मों की व्याख्या है,
श्लोक 328 (1.2.328)
राजभिर्वेदितव्यास्ते सम्यग्ज्ञानबुभुत्सुभिः । आपद्धर्माश्च तत्रैव कालहेतुप्रदर्शिनः ॥
rājabhirveditavyāste samyagjñānabubhutsubhiḥ | āpaddharmāśca tatraiva kālahetupradarśinaḥ
जिन्हें सम्यक् ज्ञान के इच्छुक राजाओं को भली-भाँति जानना चाहिए; और वहीं समय तथा कारण को दिखाने वाले आपद्धर्म भी हैं,
श्लोक 329 (1.2.329)
यान्बुद्ध्वा पुरुषः सम्यक्सर्वज्ञत्वमवाप्नुयात् । मोक्षधर्माश्च कथिता विचित्रा बहुविस्तराः ॥
yānbuddhvā puruṣaḥ samyaksarvajñatvamavāpnuyāt | mokṣadharmāśca kathitā vicitrā bahuvistarāḥ
जिन्हें जानकर मनुष्य भली-भाँति सर्वज्ञता पा सकता है; और अनेक प्रकार के, बहुत विस्तृत मोक्षधर्म भी कहे गए हैं।
श्लोक 330 (1.2.330)
द्वादशं पर्व निर्दिष्टमेतत्प्राज्ञजनप्रियम् । अत्र पर्वणि विज्ञेयमध्यायानां शतत्रयम् ॥
dvādaśaṃ parva nirdiṣṭametatprājñajanapriyam | atra parvaṇi vijñeyamadhyāyānāṃ śatatrayam
यह बारहवाँ पर्व बताया गया है, जो ज्ञानी जनों को प्रिय है। इस पर्व में तीन सौ अध्याय जानने चाहिए,
श्लोक 331 (1.2.331)
विंशच्चैव तथाध्याया नव चैव तपोधनाः । चतुर्दशसहस्राणि तथा सप्तशतानि च ॥
viṃśaccaiva tathādhyāyā nava caiva tapodhanāḥ | caturdaśasahasrāṇi tathā saptaśatāni ca
और बीस अध्याय तथा नौ अध्याय और, हे तपोधनो; तथा चौदह हज़ार सात सौ
श्लोक 332 (1.2.332)
सप्तश्लोकास्तथैवात्र पञ्चविंशतिसंख्यया । अत ऊर्ध्वं च विज्ञेयमनुशासनमुत्तमम् ॥
saptaślokāstathaivātra pañcaviṃśatisaṃkhyayā | ata ūrdhvaṃ ca vijñeyamanuśāsanamuttamam
श्लोक, तथा सात और पच्चीस श्लोक और (कुल चौदह हज़ार सात सौ बत्तीस)। इसके बाद उत्तम अनुशासनपर्व जानना चाहिए,
श्लोक 333 (1.2.333)
यत्र प्रकृतिमापन्नः श्रुत्वा धर्मविनिश्चयम् । भीष्माद्भागीरथीपुत्रात्कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥
yatra prakṛtimāpannaḥ śrutvā dharmaviniścayam | bhīṣmādbhāgīrathīputrātkururājo yudhiṣṭhiraḥ
जिसमें कुरुराज युधिष्ठिर भागीरथी (गंगा) के पुत्र भीष्म से धर्म का निर्णय सुनकर फिर से स्वस्थ चित्त हुए।
श्लोक 334 (1.2.334)
व्यवहारोऽत्र कार्त्स्न्येन धर्मार्थीयः प्रकीर्तितः । विविधानां च दानानां फलयोगाः प्रकीर्तिताः ॥
vyavahāro'tra kārtsnyena dharmārthīyaḥ prakīrtitaḥ | vividhānāṃ ca dānānāṃ phalayogāḥ prakīrtitāḥ
इसमें धर्म और अर्थ से सम्बन्धित व्यवहार का पूरा वर्णन है, और विविध प्रकार के दानों के फल बताए गए हैं;
श्लोक 335 (1.2.335)
तथा पात्रविशेषाश्च दानानां च परो विधिः । आचारविधियोगश्च सत्यस्य च परा गतिः ॥
tathā pātraviśeṣāśca dānānāṃ ca paro vidhiḥ | ācāravidhiyogaśca satyasya ca parā gatiḥ
इसी प्रकार दान के पात्रों की विशेषताएँ, दान की श्रेष्ठ विधि, आचार का विधान और सत्य की परम गति भी;
श्लोक 336 (1.2.336)
महाभाग्यं गवां चैव ब्राह्मणानां तथैव च । रहस्यं चैव धर्माणां देशकालोपसंहितम् ॥
mahābhāgyaṃ gavāṃ caiva brāhmaṇānāṃ tathaiva ca | rahasyaṃ caiva dharmāṇāṃ deśakālopasaṃhitam
गौओं और ब्राह्मणों का महान सौभाग्य, और देश-काल के अनुसार धर्मों का रहस्य।
श्लोक 337 (1.2.337)
एतत्सुबहुवृत्तान्तमुत्तमं चानुशासनम् । भीष्मस्यात्रैव संप्राप्तिः स्वर्गस्य परिकीर्तिता ॥
etatsubahuvṛttāntamuttamaṃ cānuśāsanam | bhīṣmasyātraiva saṃprāptiḥ svargasya parikīrtitā
यह अनेक वृत्तान्तों वाला उत्तम अनुशासनपर्व है; इसी में भीष्म के स्वर्ग जाने का भी वर्णन है।
श्लोक 338 (1.2.338)
एतत्त्रयोदशं पर्व धर्मनिश्चयकारकम् । अध्यायानां शतं त्वत्र षट्चत्वारिंशदेव तु ॥
etattrayodaśaṃ parva dharmaniścayakārakam | adhyāyānāṃ śataṃ tvatra ṣaṭcatvāriṃśadeva tu
यह धर्म का निश्चय कराने वाला तेरहवाँ पर्व है। इसमें एक सौ छियालीस अध्याय हैं,
श्लोक 339 (1.2.339)
श्लोकानां तु सहस्राणि प्रोक्तान्यष्टौ प्रसंख्यया । ततोऽश्वमेधिकं नाम पर्व प्रोक्तं चतुर्दशम् ॥
ślokānāṃ tu sahasrāṇi proktānyaṣṭau prasaṃkhyayā | tato'śvamedhikaṃ nāma parva proktaṃ caturdaśam
और गिनती से आठ हज़ार श्लोक कहे गए हैं। फिर आश्वमेधिक नाम का चौदहवाँ पर्व कहा गया है,
श्लोक 340 (1.2.340)
तत्संवर्तमरुत्तीयं यत्राख्यानमनुत्तमम् । सुवर्णकोशसंप्राप्तिर्जन्म चोक्तं परीक्षितः ॥
tatsaṃvartamaruttīyaṃ yatrākhyānamanuttamam | suvarṇakośasaṃprāptirjanma coktaṃ parīkṣitaḥ
जिसमें संवर्त और मरुत्त का अनुपम आख्यान है; सोने के खज़ाने की प्राप्ति और परीक्षित का जन्म भी कहा गया है,
श्लोक 341 (1.2.341)
दग्धस्यास्त्राग्निना पूर्वं कृष्णात्संजीवनं पुनः । चर्यायां हयमुत्सृष्टं पाण्डवस्यानुगच्छतः ॥
dagdhasyāstrāgninā pūrvaṃ kṛṣṇātsaṃjīvanaṃ punaḥ | caryāyāṃ hayamutsṛṣṭaṃ pāṇḍavasyānugacchataḥ
और पहले अस्त्र की अग्नि से जले हुए उस बालक को श्रीकृष्ण द्वारा फिर जीवित करना; तथा विचरने के लिए छोड़े गए घोड़े के पीछे चलते हुए पाण्डव (अर्जुन) के
श्लोक 342 (1.2.342)
तत्र तत्र च युद्धानि राजपुत्रैरमर्षणैः । चित्राङ्गदायाः पुत्रेण स्वपुत्रेण धनंजयः ॥
tatra tatra ca yuddhāni rājaputrairamarṣaṇaiḥ | citrāṅgadāyāḥ putreṇa svaputreṇa dhanaṃjayaḥ
जगह-जगह क्रोधी राजकुमारों से युद्ध हुए; और यह कि धनंजय (अर्जुन) चित्रांगदा के पुत्र, अपने ही पुत्र
श्लोक 343 (1.2.343)
सङ्ग्रामे बभ्रुवाहेन संशयं चात्र जग्मिवान् । सुदर्शनं तथाऽऽख्यानं वैष्णवं धर्ममेव च । अश्वमेधे महायज्ञे नकुलाख्यानमेव च ॥
saṅgrāme babhruvāhena saṃśayaṃ cātra jagmivān | sudarśanaṃ tathā''khyānaṃ vaiṣṇavaṃ dharmameva ca | aśvamedhe mahāyajñe nakulākhyānameva ca
बभ्रुवाहन के साथ युद्ध में संकट में पड़ गए; सुदर्शन का आख्यान, वैष्णव धर्म, और अश्वमेध महायज्ञ में नेवले का आख्यान भी।
श्लोक 344 (1.2.344)
इत्याश्वमेधिकं पर्व प्रोक्तमेतन्महाद्भुतम् । अध्यायानां शतं चैव त्रयोऽध्यायाश्च कीर्तिताः ॥
ityāśvamedhikaṃ parva proktametanmahādbhutam | adhyāyānāṃ śataṃ caiva trayo'dhyāyāśca kīrtitāḥ
इस प्रकार यह परम अद्भुत आश्वमेधिक पर्व कहा गया है। इसमें एक सौ अध्याय और तीन अध्याय और बताए गए हैं;
श्लोक 345 (1.2.345)
त्रीणि श्लोकसहस्राणि तावन्त्येव शतानि च । विंशतिश्च तथा श्लोकाः संख्यातास्तत्त्वदर्शिना ॥
trīṇi ślokasahasrāṇi tāvantyeva śatāni ca | viṃśatiśca tathā ślokāḥ saṃkhyātāstattvadarśinā
तीन हज़ार श्लोक, उतने ही सौ (तीन सौ) और बीस श्लोक और, तत्त्वदर्शी ने गिनाए हैं।
श्लोक 346 (1.2.346)
ततस्त्वाश्रमवासाख्यं पर्व पञ्चदशं स्मृतम् । यत्र राज्यं समुत्सृज्य गान्धार्या सहितो नृपः ॥
tatastvāśramavāsākhyaṃ parva pañcadaśaṃ smṛtam | yatra rājyaṃ samutsṛjya gāndhāryā sahito nṛpaḥ
फिर आश्रमवासिक नाम का पर्व पन्द्रहवाँ माना गया है, जिसमें राज्य छोड़कर गान्धारी के साथ राजा
श्लोक 347 (1.2.347)
धृतराष्ट्राश्रमपदं विदुरश्च जगाम ह । यं दृष्ट्वा प्रस्थितं साध्वी पृथाप्यनुययौ तदा ॥
dhṛtarāṣṭrāśramapadaṃ viduraśca jagāma ha | yaṃ dṛṣṭvā prasthitaṃ sādhvī pṛthāpyanuyayau tadā
धृतराष्ट्र आश्रम को चले गए, और विदुर भी। उन्हें जाते देखकर साध्वी पृथा (कुन्ती) भी तब उनके पीछे चल पड़ीं,
श्लोक 348 (1.2.348)
पुत्रराज्यं परित्यज्य गुरुशुश्रूषणे रता । यत्र राजा हतान्पुत्रान्पौत्रानन्यांश्च पार्थिवान् ॥
putrarājyaṃ parityajya guruśuśrūṣaṇe ratā | yatra rājā hatānputrānpautrānanyāṃśca pārthivān
पुत्रों का राज्य छोड़कर, बड़ों की सेवा में लगी हुई। वहाँ राजा ने अपने मारे गए पुत्रों, पौत्रों और अन्य राजाओं को
श्लोक 349 (1.2.349)
लोकान्तरगतान्वीरानपश्यत्पुनरागतान् । ऋषेः प्रसादात्कृष्णस्य दृष्ट्वाश्चर्यमनुत्तमम् ॥
lokāntaragatānvīrānapaśyatpunarāgatān | ṛṣeḥ prasādātkṛṣṇasya dṛṣṭvāścaryamanuttamam
परलोक गए उन वीरों को महर्षि कृष्णद्वैपायन की कृपा से फिर लौटा हुआ देखा; और उस अनुपम आश्चर्य को देखकर
श्लोक 350 (1.2.350)
त्यक्त्वा शोकं सदारश्च सिद्धिं परमिकां गतः । यत्र धर्मं समाश्रित्य विदुरः सुगतिं गतः ॥
tyaktvā śokaṃ sadāraśca siddhiṃ paramikāṃ gataḥ | yatra dharmaṃ samāśritya viduraḥ sugatiṃ gataḥ
वे शोक त्यागकर पत्नी सहित परम सिद्धि को प्राप्त हुए। वहाँ धर्म का आश्रय लेकर विदुर ने सद्गति पाई,
श्लोक 351 (1.2.351)
संजयश्च सहामात्यो विद्वान्गावल्गणिर्वशी । ददर्श नारदं यत्र धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥
saṃjayaśca sahāmātyo vidvāngāvalgaṇirvaśī | dadarśa nāradaṃ yatra dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ
और मन्त्रियों सहित विद्वान, संयमी गवल्गणपुत्र संजय ने भी। वहाँ धर्मराज युधिष्ठिर ने नारद को देखा
श्लोक 352 (1.2.352)
नारदाच्चैव शुश्राव वृष्णीनां कदनं महत् । एतदाश्रमवासाख्यं पर्वोक्तं महदद्भुतम् ॥
nāradāccaiva śuśrāva vṛṣṇīnāṃ kadanaṃ mahat | etadāśramavāsākhyaṃ parvoktaṃ mahadadbhutam
और नारद से वृष्णियों के महान संहार का समाचार सुना। यह आश्रमवासिक पर्व कहा गया है, जो महान और अद्भुत है।
श्लोक 353 (1.2.353)
द्विचत्वारिंशदध्यायाः पर्वैतदभिसङ्ख्यया । सहस्रमेकं श्लोकानां पञ्चश्लोकशतानि च ॥
dvicatvāriṃśadadhyāyāḥ parvaitadabhisaṅkhyayā | sahasramekaṃ ślokānāṃ pañcaślokaśatāni ca
गिनती से इस पर्व में बयालीस अध्याय हैं, और एक हज़ार पाँच सौ श्लोक
श्लोक 354 (1.2.354)
षडेव च तथा श्लोकाः संख्यातास्तत्त्वदर्शिना । अतः परं निबोधेदं मौसलं पर्व दारुणम् ॥
ṣaḍeva ca tathā ślokāḥ saṃkhyātāstattvadarśinā | ataḥ paraṃ nibodhedaṃ mausalaṃ parva dāruṇam
और छह श्लोक और, जिन्हें तत्त्वदर्शी ने गिनाया है। इसके बाद भयानक मौसल पर्व को जानो,
श्लोक 355 (1.2.355)
यत्र ते पुरुषव्याघ्राः शस्त्रस्पर्शहता युधि । ब्रह्मदण्डविनिष्पिष्टाः समीपे लवणाम्भसः ॥
yatra te puruṣavyāghrāḥ śastrasparśahatā yudhi | brahmadaṇḍaviniṣpiṣṭāḥ samīpe lavaṇāmbhasaḥ
जिसमें वे पुरुषसिंह, युद्ध में शस्त्रों के स्पर्श से मारे गए, ब्राह्मण के शापरूपी दण्ड से पिसे हुए, खारे समुद्र के पास,
श्लोक 356 (1.2.356)
आपाने पानकलिता दैवेनाभिप्रचोदिताः । एरकारूपिभिर्वज्रैर्निजघ्नुरितरेतरम् ॥
āpāne pānakalitā daivenābhipracoditāḥ | erakārūpibhirvajrairnijaghnuritaretaram
मदिरापान के उत्सव में नशे में चूर और दैव की प्रेरणा से, एरका घास के रूप में बने वज्रों से एक-दूसरे को मार बैठे;
श्लोक 357 (1.2.357)
यत्र सर्वक्षयं कृत्वा तावुभौ रामकेशवौ । नातिचक्रामतुः कालं प्राप्तं सर्वहरं महत् ॥
yatra sarvakṣayaṃ kṛtvā tāvubhau rāmakeśavau | nāticakrāmatuḥ kālaṃ prāptaṃ sarvaharaṃ mahat
जिसमें सबका विनाश करके बलराम और केशव दोनों भी आए हुए, सब कुछ हर लेने वाले महान काल का उल्लंघन न कर सके;
श्लोक 358 (1.2.358)
यत्रार्जुनो द्वारवतीमेत्य वृष्णिविनाकृताम् । दृष्ट्वा विपादमगमत्परां चार्तिं नरर्षभः ॥
yatrārjuno dvāravatīmetya vṛṣṇivinākṛtām | dṛṣṭvā vipādamagamatparāṃ cārtiṃ nararṣabhaḥ
जिसमें नरश्रेष्ठ अर्जुन वृष्णियों से रहित द्वारका पहुँचकर उसे देख विषाद और गहरी पीड़ा में डूब गए;
श्लोक 359 (1.2.359)
स संस्कृत्य नरश्रेष्ठं मातुलं शौरिमात्मनः । ददर्श यदुवीराणामापाने वैशसं महत् ॥
sa saṃskṛtya naraśreṣṭhaṃ mātulaṃ śaurimātmanaḥ | dadarśa yaduvīrāṇāmāpāne vaiśasaṃ mahat
उन्होंने अपने मामा नरश्रेष्ठ शौरि (वसुदेव) का अन्तिम संस्कार किया और मदिरापान-स्थल पर यदुवीरों का भयंकर संहार देखा;
श्लोक 360 (1.2.360)
शरीरं वासुदेवस्य रामस्य च महात्मनः । संस्कारं लम्भयामास वृष्णीनां च प्रधानतः ॥
śarīraṃ vāsudevasya rāmasya ca mahātmanaḥ | saṃskāraṃ lambhayāmāsa vṛṣṇīnāṃ ca pradhānataḥ
उन्होंने वासुदेव (श्रीकृष्ण), महात्मा बलराम और प्रमुख वृष्णियों के शरीरों का संस्कार करवाया;
श्लोक 361 (1.2.361)
सवृद्धबालमादाय द्वारवत्यास्ततो जनम् । ददर्शापदि कष्टायां गाण्डीवस्य पराभवम् ॥
savṛddhabālamādāya dvāravatyāstato janam | dadarśāpadi kaṣṭāyāṃ gāṇḍīvasya parābhavam
फिर द्वारका के बूढ़ों और बच्चों सहित सब लोगों को साथ लेकर चलते हुए उन्होंने उस घोर विपत्ति में गाण्डीव की पराजय देखी,
श्लोक 362 (1.2.362)
सर्वेषां चैव दिव्यानामस्त्राणामप्रसन्नताम् । नाशं वृष्णिकलत्राणां प्रभावानामनित्यताम् ॥
sarveṣāṃ caiva divyānāmastrāṇāmaprasannatām | nāśaṃ vṛṣṇikalatrāṇāṃ prabhāvānāmanityatām
अपने सभी दिव्य अस्त्रों का साथ न देना, वृष्णियों की स्त्रियों का खो जाना, और प्रभाव की अनित्यता;
श्लोक 363 (1.2.363)
दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नो व्यासवाक्यप्रचोदितः । धर्मराजं समासाद्य संन्यासं समरोचयत् ॥
dṛṣṭvā nirvedamāpanno vyāsavākyapracoditaḥ | dharmarājaṃ samāsādya saṃnyāsaṃ samarocayat
यह सब देखकर वे विरक्त हो गए और व्यास जी के वचनों से प्रेरित होकर धर्मराज के पास जाकर संन्यास की इच्छा प्रकट की।
श्लोक 364 (1.2.364)
इत्येतन्मौसलं पर्व षोडशं परिकीर्तितम् । अध्यायाष्टौ समाख्याताः श्लोकानां च शतत्रयम् ॥
ityetanmausalaṃ parva ṣoḍaśaṃ parikīrtitam | adhyāyāṣṭau samākhyātāḥ ślokānāṃ ca śatatrayam
इस प्रकार यह सोलहवाँ मौसल पर्व कहा गया है। इसमें आठ अध्याय बताए गए हैं, और तीन सौ श्लोक
श्लोक 365 (1.2.365)
श्लोकानां विंशतिश्चैव संख्याता तत्त्वदर्शिना । महाप्रस्थानिकं तस्मादूर्ध्वं सप्तदशं स्मृतम् ॥
ślokānāṃ viṃśatiścaiva saṃkhyātā tattvadarśinā | mahāprasthānikaṃ tasmādūrdhvaṃ saptadaśaṃ smṛtam
और बीस श्लोक और, जिन्हें तत्त्वदर्शी ने गिनाया है। उसके बाद सत्रहवाँ महाप्रास्थानिक पर्व माना गया है,
श्लोक 366 (1.2.366)
यत्र राज्यं परित्यज्य पाण्डवाः पुरुषर्षभाः । द्रौपद्या सहिता देव्या महाप्रस्थानमास्थिताः ॥
yatra rājyaṃ parityajya pāṇḍavāḥ puruṣarṣabhāḥ | draupadyā sahitā devyā mahāprasthānamāsthitāḥ
जिसमें पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव राज्य छोड़कर देवी द्रौपदी के साथ महाप्रस्थान पर निकल पड़े;
श्लोक 367 (1.2.367)
यत्र तेऽग्निं ददृशिरे लौहित्यं प्राप्य सागरम् । यत्राग्निना चोदितश्च पार्थस्तस्मै महात्मने ॥
yatra te'gniṃ dadṛśire lauhityaṃ prāpya sāgaram | yatrāgninā coditaśca pārthastasmai mahātmane
जिसमें लौहित्य सागर पर पहुँचकर उन्होंने अग्निदेव को देखा; और जिसमें अग्नि की प्रेरणा से अर्जुन ने उन महात्मा का पूजन करके
श्लोक 368 (1.2.368)
ददौ संपूज्य तद्दिव्यं गाण्डीवं धनुरुत्तमम् । यत्र भ्रातृन्निपतितान्द्रौपदीं च युधिष्ठिरः ॥
dadau saṃpūjya taddivyaṃ gāṇḍīvaṃ dhanuruttamam | yatra bhrātṛnnipatitāndraupadīṃ ca yudhiṣṭhiraḥ
उन्हें वह दिव्य, श्रेष्ठ गाण्डीव धनुष लौटा दिया; और जिसमें युधिष्ठिर अपने भाइयों और द्रौपदी को गिरा हुआ
श्लोक 369 (1.2.369)
दृष्ट्वा हित्वा जगामैव सर्वाननवलोकयन् । एतत्सप्तदशं पर्व महाप्रस्थानिकं स्मृतम् ॥
dṛṣṭvā hitvā jagāmaiva sarvānanavalokayan | etatsaptadaśaṃ parva mahāprasthānikaṃ smṛtam
देखकर भी उन्हें छोड़ किसी की ओर मुड़कर देखे बिना आगे बढ़ते गए। यह सत्रहवाँ महाप्रास्थानिक पर्व कहा गया है,
श्लोक 370 (1.2.370)
यत्राध्यायास्त्रयः प्रोक्ताः श्लोकानां च शतत्रयम् । विंशतिश्च तथा श्लोकाः संख्यातास्तत्त्वदर्शिना ॥
yatrādhyāyāstrayaḥ proktāḥ ślokānāṃ ca śatatrayam | viṃśatiśca tathā ślokāḥ saṃkhyātāstattvadarśinā
जिसमें तीन अध्याय कहे गए हैं, और तीन सौ श्लोक तथा बीस श्लोक और, जिन्हें तत्त्वदर्शी ने गिनाया है।
श्लोक 371 (1.2.371)
स्वर्गपर्व ततो ज्ञेयं दिव्यं यत्तदमानुषम् । प्राप्तं दैवरथं स्वर्गान्नेष्टवान्यत्र धर्मराट् ॥
svargaparva tato jñeyaṃ divyaṃ yattadamānuṣam | prāptaṃ daivarathaṃ svargānneṣṭavānyatra dharmarāṭ
फिर स्वर्गपर्व जानना चाहिए, जो दिव्य और अलौकिक है, जिसमें स्वर्ग से आए दिव्य रथ पर धर्मराज ने
श्लोक 372 (1.2.372)
आरोढुं सुमहाप्राज्ञ आनृशंस्याच्छुना विना । तामस्याविचलां ज्ञात्वा स्थितिं धर्मे महात्मनः ॥
āroḍhuṃ sumahāprājña ānṛśaṃsyācchunā vinā | tāmasyāvicalāṃ jñātvā sthitiṃ dharme mahātmanaḥ
परम बुद्धिमान होने के कारण, दया-भाव से, कुत्ते के बिना चढ़ना स्वीकार नहीं किया। उन महात्मा की धर्म में उस अटल स्थिति को जानकर
श्लोक 373 (1.2.373)
श्वरूपं यत्र तत्त्यक्त्वा धर्मेणासौ समन्वितः । स्वर्गं प्राप्तः स च तथा यातनाविपुला भृशम् ॥
śvarūpaṃ yatra tattyaktvā dharmeṇāsau samanvitaḥ | svargaṃ prāptaḥ sa ca tathā yātanāvipulā bhṛśam
धर्मदेव ने कुत्ते का रूप त्यागकर उनका साथ दिया। वे स्वर्ग पहुँचे; और वहाँ भी अत्यन्त भारी यातनाओं से भरा
श्लोक 374 (1.2.374)
देवदूतेन नरकं यत्र व्याजेन दर्शितम् । शुश्राव यत्र धर्मात्मा भ्रातॄणां करुणागिरः ॥
devadūtena narakaṃ yatra vyājena darśitam | śuśrāva yatra dharmātmā bhrātṝṇāṃ karuṇāgiraḥ
नरक देवदूत ने छल से उन्हें दिखाया; वहाँ धर्मात्मा युधिष्ठिर ने अपने भाइयों की करुण पुकार सुनी,
श्लोक 375 (1.2.375)
निदेशे वर्तमानानां देशे तत्रैव वर्तताम् । अनुदर्शितश्च धर्मेण देवराज्ञा च पाण्डवः ॥
nideśe vartamānānāṃ deśe tatraiva vartatām | anudarśitaśca dharmeṇa devarājñā ca pāṇḍavaḥ
जो आज्ञा के अधीन उसी स्थान पर रहने को विवश थे; और फिर धर्मदेव तथा देवराज इन्द्र ने पाण्डुपुत्र को सत्य दिखाया।
श्लोक 376 (1.2.376)
आप्लुत्याकाशगङ्गायां देहं त्यक्त्वा स मानुषम् । स्वधर्मनिर्जितं स्थानं स्वर्गे प्राप्य स धर्मराट् ॥
āplutyākāśagaṅgāyāṃ dehaṃ tyaktvā sa mānuṣam | svadharmanirjitaṃ sthānaṃ svarge prāpya sa dharmarāṭ
आकाशगंगा में स्नान करके उन्होंने मनुष्य-शरीर त्याग दिया, और अपने धर्म से जीते हुए स्वर्ग के स्थान को पाकर धर्मराज
श्लोक 377 (1.2.377)
मुमुदे पूजितः सर्वैः सेन्द्रैः सुरगणैः सह । एतदष्टादशं पर्व प्रोक्तं व्यासेन धीमता ॥
mumude pūjitaḥ sarvaiḥ sendraiḥ suragaṇaiḥ saha | etadaṣṭādaśaṃ parva proktaṃ vyāsena dhīmatā
इन्द्र सहित सब देवगणों से पूजित होकर आनन्दित हुए। यह अठारहवाँ पर्व बुद्धिमान व्यास ने कहा है।
श्लोक 378 (1.2.378)
अध्यायाः पञ्च संख्याताः पर्वण्यस्मिन्महात्मना । श्लोकानां द्वे शते चैव प्रसंख्याते तपोधनाः ॥
adhyāyāḥ pañca saṃkhyātāḥ parvaṇyasminmahātmanā | ślokānāṃ dve śate caiva prasaṃkhyāte tapodhanāḥ
इस पर्व में महात्मा ने पाँच अध्याय गिनाए हैं, और हे तपोधनो, दो सौ श्लोक गिने गए हैं,
श्लोक 379 (1.2.379)
नव श्लोकास्तथैवान्ये संख्याताः परमर्षिणा । अष्टादशैवमेतानि पर्वाण्येतान्यशेषतः ॥
nava ślokāstathaivānye saṃkhyātāḥ paramarṣiṇā | aṣṭādaśaivametāni parvāṇyetānyaśeṣataḥ
और उनके अतिरिक्त नौ श्लोक और, जिन्हें परमर्षि ने गिनाया है। इस प्रकार ये अठारह पर्व पूरे कहे गए।
श्लोक 380 (1.2.380)
खिलेषु हरिवंशश्च भविष्यं च प्रकीर्तितम् । दश श्लोकसहस्राणि विंशच्छ्लोकशतानि च ॥
khileṣu harivaṃśaśca bhaviṣyaṃ ca prakīrtitam | daśa ślokasahasrāṇi viṃśacchlokaśatāni ca
खिलों (परिशिष्टों) में हरिवंश और भविष्य पर्व कहे गए हैं। दस हज़ार श्लोक और बीस सौ श्लोक
श्लोक 381 (1.2.381)
खिलेषु हरिवंशे च संख्यातानि महर्षिणा । एतत्सर्वं समाख्यातं भारते पर्वसंग्रहः ॥
khileṣu harivaṃśe ca saṃkhyātāni maharṣiṇā | etatsarvaṃ samākhyātaṃ bhārate parvasaṃgrahaḥ
महर्षि ने खिलों में, हरिवंश में गिनाए हैं। यह सब कह दिया गया — यही भारत का पर्वसंग्रह है।
श्लोक 382 (1.2.382)
अष्टादश समाजग्मुरक्षौहिण्यो ययुत्सया । तन्महादारुणं युद्धमहान्यष्टादशाभवत् ॥
aṣṭādaśa samājagmurakṣauhiṇyo yayutsayā | tanmahādāruṇaṃ yuddhamahānyaṣṭādaśābhavat
युद्ध की इच्छा से अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हुईं, और वह अत्यन्त भयंकर युद्ध अठारह दिन चला।
श्लोक 383 (1.2.383)
यो विद्याच्चतुरो वेदान्साङ्गोपनिषदो द्विजः । न चाख्यानमिदं विद्यान्नैव स स्याद्विचक्षणः ॥
yo vidyāccaturo vedānsāṅgopaniṣado dvijaḥ | na cākhyānamidaṃ vidyānnaiva sa syādvicakṣaṇaḥ
जो द्विज अंगों और उपनिषदों सहित चारों वेदों को जानता है, पर इस आख्यान को नहीं जानता, वह वास्तव में विद्वान नहीं है।
श्लोक 384 (1.2.384)
अर्थशास्त्रमिदं प्रोक्तं धर्मशास्त्रमिदं महत् । कामशास्त्रमिदं प्रोक्तं व्यासेनामितबुद्धिना ॥
arthaśāstramidaṃ proktaṃ dharmaśāstramidaṃ mahat | kāmaśāstramidaṃ proktaṃ vyāsenāmitabuddhinā
अपार बुद्धि वाले व्यास ने इसे अर्थशास्त्र कहा है, यही महान धर्मशास्त्र है, और यही कामशास्त्र भी कहा गया है।
श्लोक 385 (1.2.385)
श्रुत्वा त्विदमुपाख्यानं श्राव्यमन्यन्न रोचते । पुंस्कोकिलगिरं श्रुत्वा रूक्षा ध्वाङ्क्षस्य वागिव ॥
śrutvā tvidamupākhyānaṃ śrāvyamanyanna rocate | puṃskokilagiraṃ śrutvā rūkṣā dhvāṅkṣasya vāgiva
इस आख्यान को सुन लेने के बाद कोई दूसरी सुनने योग्य कथा अच्छी नहीं लगती, जैसे नर कोयल की कूक सुनने के बाद कौए की कर्कश बोली नहीं भाती।
श्लोक 386 (1.2.386)
इतिहासोत्तमादस्माञ्जायन्ते कविबुद्धयः । पञ्चभ्य इव भूतेभ्यो लोकसंविधयस्त्रयः ॥
itihāsottamādasmāñjāyante kavibuddhayaḥ | pañcabhya iva bhūtebhyo lokasaṃvidhayastrayaḥ
इस श्रेष्ठ इतिहास से कवियों की कल्पनाएँ जन्म लेती हैं, जैसे पाँच महाभूतों से तीनों लोकों की रचनाएँ उत्पन्न होती हैं।
श्लोक 387 (1.2.387)
अस्याख्यानस्य विषये पुराणं वर्तते द्विजाः । अन्तरिक्षस्य विषये प्रजा इव चतुर्विधाः ॥
asyākhyānasya viṣaye purāṇaṃ vartate dvijāḥ | antarikṣasya viṣaye prajā iva caturvidhāḥ
हे ब्राह्मणो, पुराण इस आख्यान के क्षेत्र में ही स्थित है, जैसे चारों प्रकार के प्राणी आकाश के क्षेत्र में रहते हैं।
श्लोक 388 (1.2.388)
क्रियागुणानां सर्वेषामिदमाख्यानमाश्रयः । इन्द्रियाणां समस्तानां चित्रा इव मनः क्रियाः ॥
kriyāguṇānāṃ sarveṣāmidamākhyānamāśrayaḥ | indriyāṇāṃ samastānāṃ citrā iva manaḥ kriyāḥ
यह आख्यान कर्म के सभी गुणों का आधार है, जैसे मन की विविध क्रियाओं का आधार सारी इन्द्रियाँ हैं।
श्लोक 389 (1.2.389)
अनाश्रित्यैतदाख्यानं कथा भुवि न विद्यते । आहारमनपाश्रित्य शरीरस्येव धारणम् ॥
anāśrityaitadākhyānaṃ kathā bhuvi na vidyate | āhāramanapāśritya śarīrasyeva dhāraṇam
पृथ्वी पर ऐसी कोई कथा नहीं जो इस आख्यान पर आश्रित न हो, जैसे भोजन का सहारा लिए बिना शरीर टिक नहीं सकता।
श्लोक 390 (1.2.390)
इदं कविवरैः सर्वैराख्यानमुपजीव्यते । उदयप्रेप्सुभिर्भृत्यैरभिजात इवेश्वरः ॥
idaṃ kavivaraiḥ sarvairākhyānamupajīvyate | udayaprepsubhirbhṛtyairabhijāta iveśvaraḥ
सभी श्रेष्ठ कवि इस आख्यान के सहारे जीते हैं, जैसे उन्नति चाहने वाले सेवक किसी कुलीन स्वामी के सहारे जीते हैं।
श्लोक 391 (1.2.391)
अस्य काव्यस्य कवयो न समर्था विशेषणे । साधोरिव गृहस्थस्य शेषास्त्रय इवाश्रमाः ॥
asya kāvyasya kavayo na samarthā viśeṣaṇe | sādhoriva gṛhasthasya śeṣāstraya ivāśramāḥ
कवि इस काव्य से बढ़कर कुछ रचने में समर्थ नहीं, जैसे शेष तीनों आश्रम सज्जन गृहस्थ से बढ़कर नहीं हो सकते।
श्लोक 392 (1.2.392)
धर्मे मतिर्भवतु वः सततोत्थितानां । स ह्येक एव परलोकगतस्य बन्धुः । अर्थाः स्त्रियश्च निपुणैरपि सेव्यमाना । नैवाप्तभावमुपयान्ति न च स्थिरत्वम् ॥
dharme matirbhavatu vaḥ satatotthitānāṃ | sa hyeka eva paralokagatasya bandhuḥ | arthāḥ striyaśca nipuṇairapi sevyamānā | naivāptabhāvamupayānti na ca sthiratvam
सदा उद्यम में लगे रहने वाले आप लोगों की बुद्धि धर्म में लगी रहे; क्योंकि परलोक जाने वाले का एकमात्र बन्धु वही है। धन और स्त्रियाँ, कुशल लोगों द्वारा भोगे जाने पर भी, न सच में अपने होते हैं और न स्थिर रहते हैं।
श्लोक 393 (1.2.393)
द्वैपायनौष्ठपुटनिःसृतमप्रमेयं । पुण्यं पवित्रमथ पापहरं शिवं च । यो भारतं समधिगच्छति वाच्यमानं । किं तस्य पुष्करजलैरभिषेचनेन ॥
dvaipāyanauṣṭhapuṭaniḥsṛtamaprameyaṃ | puṇyaṃ pavitramatha pāpaharaṃ śivaṃ ca | yo bhārataṃ samadhigacchati vācyamānaṃ | kiṃ tasya puṣkarajalairabhiṣecanena
द्वैपायन के मुख से निकले, अपार, पुण्यमय, पवित्र, पापनाशक और मंगलमय भारत को जो पाठ होते समय भली-भाँति ग्रहण करता है, उसे पुष्कर के जल में स्नान करने की क्या आवश्यकता?
श्लोक 394 (1.2.394)
यदह्ना कुरुते पापं ब्राह्मणस्त्विन्द्रियैश्चरन् । महाभारतमाख्याय सन्ध्यां मुच्यति पश्चिमाम् ॥
yadahnā kurute pāpaṃ brāhmaṇastvindriyaiścaran | mahābhāratamākhyāya sandhyāṃ mucyati paścimām
इन्द्रियों के विषयों में विचरता हुआ ब्राह्मण दिन में जो पाप करता है, उससे वह सायं-सन्ध्या के समय महाभारत का पाठ करके मुक्त हो जाता है।
श्लोक 395 (1.2.395)
यद्रात्रौ कुरुते पापं कर्मणा मनसा गिरा । महाभारतमाख्याय पूर्वां सन्ध्यां प्रमुच्यते ॥
yadrātrau kurute pāpaṃ karmaṇā manasā girā | mahābhāratamākhyāya pūrvāṃ sandhyāṃ pramucyate
रात में कर्म, मन या वाणी से जो पाप होता है, उससे वह प्रातः-सन्ध्या के समय महाभारत का पाठ करके छूट जाता है।
श्लोक 396 (1.2.396)
यो गोशतं कनकशृङ्गमयं ददाति । विप्राय वेदविदुषे च बहुश्रुताय । पुण्यां च भारतकथां शृणुयाच्च नित्यं । तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव ॥
yo gośataṃ kanakaśṛṅgamayaṃ dadāti | viprāya vedaviduṣe ca bahuśrutāya | puṇyāṃ ca bhāratakathāṃ śṛṇuyācca nityaṃ | tulyaṃ phalaṃ bhavati tasya ca tasya caiva
कोई वेदज्ञ और बहुश्रुत ब्राह्मण को सोने से मढ़े सींगों वाली सौ गायें दान करता है, और कोई प्रतिदिन भारत की पुण्य कथा सुनता है — दोनों को समान फल मिलता है।
श्लोक 397 (1.2.397)
आख्यानं तदिदमनुत्तमं महार्थं । विज्ञेयं महदिह पर्वसंग्रहेण । श्रुत्वादौ भवति नृणां सुखावगाहं । विस्तीर्णं लवणजलं यथा प्लवेन ॥
ākhyānaṃ tadidamanuttamaṃ mahārthaṃ | vijñeyaṃ mahadiha parvasaṃgraheṇa | śrutvādau bhavati nṛṇāṃ sukhāvagāhaṃ | vistīrṇaṃ lavaṇajalaṃ yathā plavena
यह अनुपम और महान अर्थ वाला आख्यान यहाँ पर्वसंग्रह के द्वारा अपनी महत्ता में जानना चाहिए। आरम्भ में इसे सुन लेने पर मनुष्यों के लिए इसमें उतरना वैसे ही सरल हो जाता है, जैसे नाव से विशाल खारे समुद्र में।