आदि पर्व · अध्याय 3
सरमा का शाप और धौम्य के शिष्य
सौति बताते हैं कि यज्ञ में जनमेजय के भाइयों द्वारा अपने पिल्ले को पीटे जाने पर देवशुनी सरमा ने जनमेजय को शाप दिया, और राजा ने ऋषिपुत्र सोमश्रवा को अपना पुरोहित बनाया। फिर आयोद धौम्य के शिष्यों की परीक्षाओं का वर्णन है — आरुणि, जो खेत की मेड़ की दरार में लेट गए और उद्दालक कहलाए; उपमन्यु, जो आक के पत्ते खाकर अंधे हुए और अश्विनीकुमारों की स्तुति करके दृष्टि पाई; और वेद, जिन्होंने धैर्य से गुरु की सेवा की। वेद के शिष्य उत्तंक गुरुदक्षिणा में राजा पौष्य की रानी के कुंडल लेने जाते हैं, पौष्य के साथ परस्पर शाप देते हैं, नाग तक्षक के हाथों कुंडल खो देते हैं, इन्द्र की सहायता से नागलोक में उन्हें फिर प्राप्त करते हैं, और अंत में जनमेजय को सर्पयज्ञ द्वारा पिता परीक्षित् की मृत्यु का बदला लेने के लिए प्रेरित करते हैं।
सौतिरुवाच
श्लोक 1 (1.3.1)
जनमेजयः पारिक्षितः सह भ्रातृभिः कुरुक्षेत्रे दीर्घसत्रमुपास्ते । तस्य भ्रातरस्त्रयः श्रुतसेन उग्रसेनो भीमसेन इति । तेषु तत्सत्रमुपासीनेष्वभ्यागच्छत्सारमेयः ॥
janamejayaḥ pārikṣitaḥ saha bhrātṛbhiḥ kurukṣetre dīrghasatramupāste | tasya bhrātarastrayaḥ śrutasena ugraseno bhīmasena iti | teṣu tatsatramupāsīneṣvabhyāgacchatsārameyaḥ
परीक्षित् के पुत्र जनमेजय अपने भाइयों के साथ कुरुक्षेत्र में एक दीर्घ सत्र (लंबा यज्ञ) कर रहे थे। उनके तीन भाई थे — श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन। जब वे सब उस सत्र में बैठे थे, तब सरमा का पुत्र एक कुत्ता वहाँ आ पहुँचा।
श्लोक 2 (1.3.2)
जनमेजयस्य भ्रातृभिरभिहतो रोरूयमाणो मातुः समीपमुपागच्छत् ॥
janamejayasya bhrātṛbhirabhihato rorūyamāṇo mātuḥ samīpamupāgacchat
जनमेजय के भाइयों ने उसे पीटा, तो वह चीखता-रोता हुआ अपनी माँ के पास गया।
श्लोक 3 (1.3.3)
तं माता रोरूयमाणमुवाच । किं रोदिषि केनास्यभिहत इति ॥
taṃ mātā rorūyamāṇamuvāca | kiṃ rodiṣi kenāsyabhihata iti
उसे बार-बार रोते देखकर माँ ने उससे पूछा — "क्यों रो रहे हो? तुम्हें किसने मारा है?"
श्लोक 4 (1.3.4)
स एवमुक्तो मातरं प्रत्युवाच जनमेजयस्य भ्रातृभिरभिहतोऽस्मीति ॥
sa evamukto mātaraṃ pratyuvāca janamejayasya bhrātṛbhirabhihato'smīti
यह पूछे जाने पर उसने माँ को उत्तर दिया — "मुझे जनमेजय के भाइयों ने मारा है।"
श्लोक 5 (1.3.5)
तं माता प्रत्युवाच व्यक्तं त्वया तत्रापराद्धं येनास्यभिहत इति ॥
taṃ mātā pratyuvāca vyaktaṃ tvayā tatrāparāddhaṃ yenāsyabhihata iti
माँ ने कहा — "अवश्य ही तुमने वहाँ कोई अपराध किया होगा, जिसके कारण तुम्हें मारा गया।"
श्लोक 6 (1.3.6)
स तां पुनरुवाच नापराध्यामि किंचिन्नावेक्षे हवींषि नावलिह इति ॥
sa tāṃ punaruvāca nāparādhyāmi kiṃcinnāvekṣe havīṃṣi nāvaliha iti
उसने फिर कहा — "मैंने कोई अपराध नहीं किया। न मैंने हवि की ओर देखा, न उसे चाटा।"
श्लोक 7 (1.3.7)
तच्छ्रुत्वा तस्य माता सरमा पुत्रदुःखार्ता तत्सत्रमुपागच्छद्यत्र स जनमेजयः सह भ्रातृभिर्दीर्घसत्रमुपास्ते ॥
tacchrutvā tasya mātā saramā putraduḥkhārtā tatsatramupāgacchadyatra sa janamejayaḥ saha bhrātṛbhirdīrghasatramupāste
यह सुनकर पुत्र के दुःख से व्याकुल उसकी माता सरमा उस सत्र में पहुँची, जहाँ जनमेजय अपने भाइयों के साथ दीर्घ सत्र कर रहे थे।
श्लोक 8 (1.3.8)
स तया क्रुद्धया तत्रोक्तोऽयं मे पुत्रो न किंचिदपराध्यति नावेक्षते हवींषि नावलेढि किमर्थमभिहत इति ॥
sa tayā kruddhayā tatrokto'yaṃ me putro na kiṃcidaparādhyati nāvekṣate havīṃṣi nāvaleḍhi kimarthamabhihata iti
वहाँ क्रोध से भरी सरमा ने उनसे कहा — "मेरे इस पुत्र ने कोई अपराध नहीं किया। इसने न हवि की ओर देखा, न उसे चाटा। फिर इसे क्यों मारा गया?"
श्लोक 9 (1.3.9)
न किंचिदुक्तवन्तस्ते सा तानुवाच यस्मादयमभिहतोऽनपकारी तस्माददृष्टं त्वां भयमागमिष्यतीति ॥
na kiṃciduktavantaste sā tānuvāca yasmādayamabhihato'napakārī tasmādadṛṣṭaṃ tvāṃ bhayamāgamiṣyatīti
वे कुछ भी न बोले। तब सरमा ने उनसे कहा — "क्योंकि यह निरपराध होते हुए भी पीटा गया है, इसलिए तुम पर ऐसा भय आएगा जिसका तुम्हें अनुमान भी नहीं है।"
श्लोक 10 (1.3.10)
जनमेजय एवमुक्तो देवशुन्या सरमया भृशं संभ्रान्तो विषण्णश्चासीत् ॥
janamejaya evamukto devaśunyā saramayā bhṛśaṃ saṃbhrānto viṣaṇṇaścāsīt
देवताओं की कुतिया सरमा के ऐसा कहने पर जनमेजय बहुत घबरा गए और उदास हो गए।
श्लोक 11 (1.3.11)
स तस्मिन्सत्रे समाप्ते हास्तिनपुरं प्रत्येत्य पुरोहितमनुरूपमन्विच्छमानः परं यत्नमकरोद्यो मे पापकृत्यां शमयेदिति ॥
sa tasminsatre samāpte hāstinapuraṃ pratyetya purohitamanurūpamanvicchamānaḥ paraṃ yatnamakarodyo me pāpakṛtyāṃ śamayediti
सत्र समाप्त होने पर वे हस्तिनापुर लौट आए और यह सोचकर योग्य पुरोहित की खोज में बड़ा प्रयत्न करने लगे कि कोई ऐसा मिले जो मुझ पर आए इस पाप-संकट को शांत कर दे।
श्लोक 12 (1.3.12)
स कदाचिन्मृगयां गतः पारिक्षितो जनमेजयः कस्मिंश्चित्स्वविषय आश्रममपश्यत् ॥
sa kadācinmṛgayāṃ gataḥ pārikṣito janamejayaḥ kasmiṃścitsvaviṣaya āśramamapaśyat
एक बार परीक्षित्-पुत्र जनमेजय शिकार के लिए गए और अपने ही राज्य के किसी स्थान पर उन्होंने एक आश्रम देखा।
श्लोक 13 (1.3.13)
तत्र कश्चिदृषिरासाञ्चक्रे श्रुतश्रवा नाम । तस्य तपस्यभिरतः पुत्र आस्ते सोमश्रवा नाम ॥
tatra kaścidṛṣirāsāñcakre śrutaśravā nāma | tasya tapasyabhirataḥ putra āste somaśravā nāma
वहाँ श्रुतश्रवा नाम के एक ऋषि रहते थे। उनका तपस्या में लगा रहने वाला पुत्र सोमश्रवा था।
श्लोक 14 (1.3.14)
तस्य तं पुत्रमभिगम्य जनमेजयः पारिक्षितः पौरोहित्याय वव्रे ॥
tasya taṃ putramabhigamya janamejayaḥ pārikṣitaḥ paurohityāya vavre
परीक्षित्-पुत्र जनमेजय ने ऋषि के उस पुत्र के पास जाकर उसे अपना पुरोहित बनाने के लिए चुना।
श्लोक 15 (1.3.15)
स नमस्कृत्य तमृषिमुवाच भगवन्नयं तव पुत्रो मम पुरोहितोऽस्त्विति ॥
sa namaskṛtya tamṛṣimuvāca bhagavannayaṃ tava putro mama purohito'stviti
ऋषि को प्रणाम करके उन्होंने कहा — "भगवन्, आपका यह पुत्र मेरा पुरोहित बने।"
श्लोक 16 (1.3.16)
स एवमुक्तः प्रत्युवाच जनमेजयं भो जनमेजय पुत्रोऽयं मम सर्प्यां जातो महातपस्वी स्वाध्यायसंपन्नो मत्तपोवीर्यसंभृतो मच्छुक्रं पीतवत्यास्तस्याः कुक्षौ जातः ॥
sa evamuktaḥ pratyuvāca janamejayaṃ bho janamejaya putro'yaṃ mama sarpyāṃ jāto mahātapasvī svādhyāyasaṃpanno mattapovīryasaṃbhṛto macchukraṃ pītavatyāstasyāḥ kukṣau jātaḥ
यह सुनकर ऋषि ने जनमेजय को उत्तर दिया — "हे जनमेजय, मेरा यह पुत्र एक नागिन से उत्पन्न हुआ है। यह महातपस्वी है, वेदाध्ययन में निपुण है और मेरी तपस्या के बल से पुष्ट है। मेरा वीर्य पी लेने वाली उस नागिन के गर्भ से इसका जन्म हुआ है।"
श्लोक 17 (1.3.17)
समर्थोऽयं भवतः सर्वाः पापकृत्याः शमयितुमन्तरेण महादेवकृत्याम् ॥
samartho'yaṃ bhavataḥ sarvāḥ pāpakṛtyāḥ śamayitumantareṇa mahādevakṛtyām
"महादेव के द्वारा भेजे गए संकट को छोड़कर यह आपके सभी पाप-संकटों को शांत करने में समर्थ है।"
श्लोक 18 (1.3.18)
अस्य त्वेकमुपांशुव्रतं यदेनं कश्चिद्ब्राह्मणः कंचिदर्थमभियाचेत्तं तस्मै दद्यादयं यद्येतदुत्सहसे ततो नयस्वैनमिति ॥
asya tvekamupāṃśuvrataṃ yadenaṃ kaścidbrāhmaṇaḥ kaṃcidarthamabhiyācettaṃ tasmai dadyādayaṃ yadyetadutsahase tato nayasvainamiti
"किंतु इसका एक गुप्त व्रत है — यदि कोई ब्राह्मण इससे कुछ भी माँगे, तो यह उसे वह वस्तु दे देगा। यदि आप इसे स्वीकार कर सकें, तो इसे ले जाइए।"
श्लोक 19 (1.3.19)
तेनैवमुक्तो जनमेजयस्तं प्रत्युवाच भगवंस्तत्तथा भविष्यतीति ॥
tenaivamukto janamejayastaṃ pratyuvāca bhagavaṃstattathā bhaviṣyatīti
यह सुनकर जनमेजय ने उत्तर दिया — "भगवन्, ऐसा ही होगा।"
श्लोक 20 (1.3.20)
स तं पुरोहितमुपादायोपावृत्तो भ्रातॄनुवाच मयाऽयं वृत उपाध्यायो यदयं ब्रूयात्तत्कार्यमविचारयद्भिर्भवद्भिरिति । तेनैवमुक्ता भ्रातरस्तस्य तथा चक्रुः । स तथा भ्रातॄन्संदिश्य तक्षशिलां प्रत्यभिप्रतस्थे तं च देशं वशे स्थापयामास ॥
sa taṃ purohitamupādāyopāvṛtto bhrātṝnuvāca mayā'yaṃ vṛta upādhyāyo yadayaṃ brūyāttatkāryamavicārayadbhirbhavadbhiriti | tenaivamuktā bhrātarastasya tathā cakruḥ | sa tathā bhrātṝnsaṃdiśya takṣaśilāṃ pratyabhipratasthe taṃ ca deśaṃ vaśe sthāpayāmāsa
उस पुरोहित को साथ लेकर वे लौटे और अपने भाइयों से बोले — "मैंने इन्हें अपना उपाध्याय चुना है। ये जो भी कहें, उसे तुम लोग बिना सोच-विचार किए पूरा करना।" भाइयों ने वैसा ही किया। भाइयों को यह आदेश देकर वे तक्षशिला की ओर चल पड़े और उस देश को अपने वश में कर लिया।
श्लोक 21 (1.3.21)
एतस्मिन्नन्तरे कश्चिदृषिर्धौम्यो नामापोदस्तस्य शिष्यास्त्रयो बभूवुः ॥
etasminnantare kaścidṛṣirdhaumyo nāmāpodastasya śiṣyāstrayo babhūvuḥ
इसी बीच आयोद धौम्य नाम के एक ऋषि थे। उनके तीन शिष्य थे।
श्लोक 22 (1.3.22)
उपमन्युरारुणिर्बैदश्चेति स एकं शिष्यमारुणिं पाञ्चाल्यं प्रेषयामास गच्छ केदारखण्डं बधानेति ॥
upamanyurāruṇirbaidaśceti sa ekaṃ śiṣyamāruṇiṃ pāñcālyaṃ preṣayāmāsa gaccha kedārakhaṇḍaṃ badhāneti
वे थे उपमन्यु, आरुणि और वेद। उन्होंने एक शिष्य, पांचालदेश के आरुणि को यह कहकर भेजा — "जाओ, खेत की मेड़ में जो दरार है उसे बाँध दो।"
श्लोक 23 (1.3.23)
स उपाध्यायेन संदिष्ट आरुणिः पाञ्चाल्यस्तत्र गत्वा तत्केदारखण्डं बद्धुं नाशकत् । स क्लिश्यमानोऽपश्यदुपायं भवत्वेवं करिष्यामीति ॥
sa upādhyāyena saṃdiṣṭa āruṇiḥ pāñcālyastatra gatvā tatkedārakhaṇḍaṃ baddhuṃ nāśakat | sa kliśyamāno'paśyadupāyaṃ bhavatvevaṃ kariṣyāmīti
गुरु की आज्ञा पाकर पांचाल आरुणि वहाँ गए, पर मेड़ की उस दरार को बाँध न सके। बहुत परिश्रम करते हुए उन्हें एक उपाय सूझा — "ठीक है, मैं ऐसा ही करूँगा।"
श्लोक 24 (1.3.24)
स तत्र संविवेश केदारखण्डे शयाने च तथा तस्मिंस्तदुदकं तस्थौ ॥
sa tatra saṃviveśa kedārakhaṇḍe śayāne ca tathā tasmiṃstadudakaṃ tasthau
वे मेड़ की उस दरार में लेट गए, और उनके इस प्रकार लेटे रहने से वह पानी रुक गया।
श्लोक 25 (1.3.25)
ततः कदाचिदुपाध्याय आपोदो धौम्यः शिष्यावपृच्छत् क्व आरुणिः पाञ्चाल्यो गत इति ॥
tataḥ kadācidupādhyāya āpodo dhaumyaḥ śiṣyāvapṛcchat kva āruṇiḥ pāñcālyo gata iti
कुछ समय बाद गुरु आयोद धौम्य ने अपने दो शिष्यों से पूछा — "पांचाल आरुणि कहाँ गया है?"
श्लोक 26 (1.3.26)
तौ तं प्रत्यूचतुर्भगवंस्त्वयैव प्रेषितो गच्छ केदारखण्डं बधानेति । स एवमुक्तस्तौ शिष्यौ प्रत्युवाच तस्मात्तत्र सर्वे गच्छामो यत्र स गत इति ॥
tau taṃ pratyūcaturbhagavaṃstvayaiva preṣito gaccha kedārakhaṇḍaṃ badhāneti | sa evamuktastau śiṣyau pratyuvāca tasmāttatra sarve gacchāmo yatra sa gata iti
उन्होंने कहा — "भगवन्, आपने ही तो उसे यह कहकर भेजा था कि 'जाओ, खेत की मेड़ की दरार बाँध दो।'" यह सुनकर गुरु ने दोनों शिष्यों से कहा — "तो चलो, हम सब वहीं चलें जहाँ वह गया है।"
श्लोक 27 (1.3.27)
स तत्र गत्वा तस्याह्वानाय शब्दं चकार । भो आरुणे पाञ्चाल्य क्वासि वत्सैहीति ॥
sa tatra gatvā tasyāhvānāya śabdaṃ cakāra | bho āruṇe pāñcālya kvāsi vatsaihīti
वहाँ पहुँचकर उन्होंने उसे पुकारा — "अरे पांचाल आरुणि, कहाँ हो? आओ, वत्स!"
श्लोक 28 (1.3.28)
स तच्छ्रुत्वा आरुणिरुपाध्यायवाक्यं तस्मात्केदारखण्डात्सहसोत्थाय तमुपाध्यायमुपतस्थे ॥
sa tacchrutvā āruṇirupādhyāyavākyaṃ tasmātkedārakhaṇḍātsahasotthāya tamupādhyāyamupatasthe
गुरु की आवाज़ सुनकर आरुणि उस मेड़ की दरार से तुरंत उठे और गुरु के सामने आ खड़े हुए।
श्लोक 29 (1.3.29)
प्रोवाच चैनमयमस्म्यत्र केदारखण्डे निःसरमाणमुदकमवारणीयं संरोद्धुं संविष्टो भगवच्छब्दं श्रुत्वैव सहसा विदार्य केदारखण्डं भवन्तमुपस्थितः ॥
provāca cainamayamasmyatra kedārakhaṇḍe niḥsaramāṇamudakamavāraṇīyaṃ saṃroddhuṃ saṃviṣṭo bhagavacchabdaṃ śrutvaiva sahasā vidārya kedārakhaṇḍaṃ bhavantamupasthitaḥ
और उन्होंने गुरु से कहा — "मैं यहाँ हूँ। बहते हुए उस पानी को, जो और किसी तरह रुक नहीं रहा था, रोकने के लिए मैं मेड़ की दरार में लेट गया था। आपकी आवाज़ सुनते ही मैं मेड़ को तोड़कर तुरंत आपके पास आ गया हूँ।"
श्लोक 30 (1.3.30)
तदभिवादये भगवन्तमाज्ञापयतु भवान्कमर्थं करवाणीति ॥
tadabhivādaye bhagavantamājñāpayatu bhavānkamarthaṃ karavāṇīti
"मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आज्ञा दीजिए, मैं कौन-सा कार्य करूँ?"
श्लोक 31 (1.3.31)
स एवमुक्त उपाध्यायः प्रत्युवाच यस्माद्भवान्केदारखण्डं विदार्योत्थितस्तस्मादुद्दालक एव नाम्ना भवान्भविष्यतीत्युपाध्यायेनानुगृहीतः ॥
sa evamukta upādhyāyaḥ pratyuvāca yasmādbhavānkedārakhaṇḍaṃ vidāryotthitastasmāduddālaka eva nāmnā bhavānbhaviṣyatītyupādhyāyenānugṛhītaḥ
यह सुनकर गुरु ने कहा — "क्योंकि तुम मेड़ को फाड़कर उठे हो, इसलिए तुम्हारा नाम उद्दालक होगा।" इस प्रकार गुरु ने उन पर अनुग्रह किया।
श्लोक 32 (1.3.32)
यस्माच्च त्वया मद्वचनमनुष्ठितं तस्माच्छ्रेयोऽवाप्स्यसि । सर्वे च ते वेदाः प्रतिभास्यन्ति सर्वाणि च धर्मशास्त्राणीति ॥
yasmācca tvayā madvacanamanuṣṭhitaṃ tasmācchreyo'vāpsyasi | sarve ca te vedāḥ pratibhāsyanti sarvāṇi ca dharmaśāstrāṇīti
"और क्योंकि तुमने मेरी आज्ञा का पालन किया है, इसलिए तुम्हें परम कल्याण प्राप्त होगा। सारे वेद और सारे धर्मशास्त्र तुम्हारे मन में स्वयं प्रकाशित हो जाएँगे।"
श्लोक 33 (1.3.33)
स एवमुक्त उपाध्यायेनेष्टं देशं जगाम ॥
sa evamukta upādhyāyeneṣṭaṃ deśaṃ jagāma
गुरु के ऐसा कहने पर वे अपने मनचाहे देश को चले गए।
श्लोक 34 (1.3.34)
अथापरः शिष्यस्तस्यैवापोदस्य धौम्यस्योपमन्युर्नाम । तं चोपाध्यायः प्रेषयामास वत्सोपमन्यो गा रक्षस्वेति ॥
athāparaḥ śiṣyastasyaivāpodasya dhaumyasyopamanyurnāma | taṃ copādhyāyaḥ preṣayāmāsa vatsopamanyo gā rakṣasveti
उन्हीं आयोद धौम्य का एक दूसरा शिष्य था, जिसका नाम उपमन्यु था। गुरु ने उसे यह कहकर भेजा — "वत्स उपमन्यु, गायों की रखवाली करो।"
श्लोक 35 (1.3.35)
स उपाध्यायवचनादरक्षद्गाः स चाहनि गा रक्षित्वा दिवसक्षये गुरुगृहमागम्योपाध्यायस्याग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ॥
sa upādhyāyavacanādarakṣadgāḥ sa cāhani gā rakṣitvā divasakṣaye gurugṛhamāgamyopādhyāyasyāgrataḥ sthitvā namaścakre
गुरु की आज्ञा से वह गायें चराने लगा। दिन भर गायों की रखवाली करके संध्या होने पर वह गुरु के घर लौटा और गुरु के सामने खड़ा होकर प्रणाम किया।
श्लोक 36 (1.3.36)
तमुपाध्यायः पीवानमपश्यदुवाच चैनं वत्सोपमन्यो केन वृत्तिं कल्पयसि पीवानसि दृढमिति ॥
tamupādhyāyaḥ pīvānamapaśyaduvāca cainaṃ vatsopamanyo kena vṛttiṃ kalpayasi pīvānasi dṛḍhamiti
गुरु ने देखा कि वह हृष्ट-पुष्ट है और उससे पूछा — "वत्स उपमन्यु, तुम अपना निर्वाह कैसे करते हो? तुम तो खूब मोटे-ताज़े हो।"
श्लोक 37 (1.3.37)
स उपाध्यायं प्रत्युवाच भो भैक्ष्येण वृत्तिं कल्पयामीति तमुपाध्यायः प्रत्युवाच ॥
sa upādhyāyaṃ pratyuvāca bho bhaikṣyeṇa vṛttiṃ kalpayāmīti tamupādhyāyaḥ pratyuvāca
उसने गुरु को उत्तर दिया — "गुरुदेव, मैं भिक्षा से निर्वाह करता हूँ।" तब गुरु ने उससे कहा —
श्लोक 38 (1.3.38)
मय्यनिवेद्य भैक्ष्यं नोपयोक्तव्यमिति । स तथेत्युक्तो भैक्ष्यं चरित्वोपाध्यायाय न्यवेदयत् ॥
mayyanivedya bhaikṣyaṃ nopayoktavyamiti | sa tathetyukto bhaikṣyaṃ caritvopādhyāyāya nyavedayat
"मुझे निवेदित किए बिना भिक्षा का उपयोग नहीं करना चाहिए।" उसने 'ठीक है' कहकर भिक्षा माँगी और उसे गुरु को अर्पित कर दिया।
श्लोक 39 (1.3.39)
स तस्मादुपाध्यायः सर्वमेव भैक्ष्यमगृह्णात् । स तथेत्युक्तः पुनररक्षद्गा अहनि रक्षित्वा निशामुखे गुरुकुलमागम्य गुरोरग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ॥
sa tasmādupādhyāyaḥ sarvameva bhaikṣyamagṛhṇāt | sa tathetyuktaḥ punararakṣadgā ahani rakṣitvā niśāmukhe gurukulamāgamya guroragrataḥ sthitvā namaścakre
गुरु ने उससे सारी भिक्षा ले ली। यह भी स्वीकार करके वह फिर गायों की रखवाली करने लगा। दिन भर रखवाली करके रात होने पर वह गुरु के घर आया और गुरु के सामने खड़ा होकर प्रणाम किया।
श्लोक 40 (1.3.40)
तमुपाध्यायस्तथापि पीवानमेव दृष्ट्वोवाच । वत्सोपमन्यो सर्वमशेषतस्ते भैक्ष्यं गृह्णामि केनेदानीं वृत्तिं कल्पयसीति ॥
tamupādhyāyastathāpi pīvānameva dṛṣṭvovāca | vatsopamanyo sarvamaśeṣataste bhaikṣyaṃ gṛhṇāmi kenedānīṃ vṛttiṃ kalpayasīti
उसे फिर भी मोटा-ताज़ा देखकर गुरु ने कहा — "वत्स उपमन्यु, मैं तुम्हारी सारी भिक्षा बिना कुछ छोड़े ले लेता हूँ। अब तुम किससे निर्वाह करते हो?"
श्लोक 41 (1.3.41)
स एवमुक्त उपाध्यायं प्रत्युवाच । भगवते निवेद्य पूर्वमपरं चरामि तेन वृत्तिं कल्पयामीति तमुपाध्यायः प्रत्युवाच ॥
sa evamukta upādhyāyaṃ pratyuvāca | bhagavate nivedya pūrvamaparaṃ carāmi tena vṛttiṃ kalpayāmīti tamupādhyāyaḥ pratyuvāca
यह पूछे जाने पर उसने गुरु को उत्तर दिया — "पहली भिक्षा आपको अर्पित करके मैं दूसरी बार भिक्षा माँगता हूँ, उसी से निर्वाह करता हूँ।" तब गुरु ने उससे कहा —
श्लोक 42 (1.3.42)
नैषा न्याय्या गुरुवृत्तिरन्येषामपि भैक्ष्योपजीविनां वृत्त्युपरोधं करोषि इत्येवं वर्तमानो लुब्धोऽसीति ॥
naiṣā nyāyyā guruvṛttiranyeṣāmapi bhaikṣyopajīvināṃ vṛttyuparodhaṃ karoṣi ityevaṃ vartamāno lubdho'sīti
"गुरु के प्रति शिष्य का यह उचित आचरण नहीं है। ऐसा करके तुम भिक्षा पर जीने वाले दूसरों की जीविका में भी बाधा डालते हो। तुम लोभी हो।"
श्लोक 43 (1.3.43)
स तथेत्युक्त्वा गा अरक्षद्रक्षित्वा च पुनरुपाध्यायगृहमागम्योपाध्यायस्याग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ॥
sa tathetyuktvā gā arakṣadrakṣitvā ca punarupādhyāyagṛhamāgamyopādhyāyasyāgrataḥ sthitvā namaścakre
उसने 'ठीक है' कहकर गायों की रखवाली की और रखवाली करके फिर गुरु के घर आकर उनके सामने खड़ा हो प्रणाम किया।
श्लोक 44 (1.3.44)
तमुपाध्यायस्तथापि पीवानमेव दृष्ट्वा पुनरुवाच । वत्सोपमन्यो अहं ते सर्वं भैक्ष्यं गृह्णामि न चान्यच्चरसि पीवानसि भृशं केन वृत्तिं कल्पयसीति ॥
tamupādhyāyastathāpi pīvānameva dṛṣṭvā punaruvāca | vatsopamanyo ahaṃ te sarvaṃ bhaikṣyaṃ gṛhṇāmi na cānyaccarasi pīvānasi bhṛśaṃ kena vṛttiṃ kalpayasīti
उसे फिर भी हृष्ट-पुष्ट देखकर गुरु ने दोबारा कहा — "वत्स उपमन्यु, मैं तुम्हारी सारी भिक्षा ले लेता हूँ और तुम दूसरी बार भिक्षा भी नहीं माँगते, फिर भी तुम बहुत मोटे-ताज़े हो। तुम किससे निर्वाह करते हो?"
श्लोक 45 (1.3.45)
स एवमुक्तस्तमुपाध्यायं प्रत्युवाच । भो एतासां गवां पयसा वृत्तिं कल्पयामीति । तमुवाचोपाध्यायो नैतन्न्याय्यं पय उपयोक्तुं भवतो मया नाभ्यनुज्ञातमिति ॥
sa evamuktastamupādhyāyaṃ pratyuvāca | bho etāsāṃ gavāṃ payasā vṛttiṃ kalpayāmīti | tamuvācopādhyāyo naitannyāyyaṃ paya upayoktuṃ bhavato mayā nābhyanujñātamiti
यह पूछे जाने पर उसने गुरु से कहा — "गुरुदेव, मैं इन गायों के दूध से निर्वाह करता हूँ।" गुरु ने उससे कहा — "तुम्हारा यह दूध पीना उचित नहीं है, क्योंकि मैंने इसकी अनुमति नहीं दी है।"
श्लोक 46 (1.3.46)
स तथेति प्रतिज्ञाय गा रक्षित्वा पुनरुपाध्यायगृहमेत्य गुरोरग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ॥
sa tatheti pratijñāya gā rakṣitvā punarupādhyāyagṛhametya guroragrataḥ sthitvā namaścakre
उसने वैसा ही करने का वचन दिया और गायों की रखवाली करके फिर गुरु के घर आकर उनके सामने खड़ा हो प्रणाम किया।
श्लोक 47 (1.3.47)
तमुपाध्यायः पीवानमेव दृष्ट्वोवाच । वत्सोपमन्यो भैक्ष्यं नाश्नासि न चान्यच्चरसि पयो न पिबसि पीवानसि भृशं केनेदानीं वृत्तिं कल्पयसीति ॥
tamupādhyāyaḥ pīvānameva dṛṣṭvovāca | vatsopamanyo bhaikṣyaṃ nāśnāsi na cānyaccarasi payo na pibasi pīvānasi bhṛśaṃ kenedānīṃ vṛttiṃ kalpayasīti
उसे अब भी मोटा-ताज़ा देखकर गुरु ने कहा — "वत्स उपमन्यु, तुम न भिक्षा खाते हो, न दूसरी बार भिक्षा माँगते हो, न दूध पीते हो, फिर भी बहुत हृष्ट-पुष्ट हो। अब तुम किससे निर्वाह करते हो?"
श्लोक 48 (1.3.48)
स एवमुक्त उपाध्यायं प्रत्युवाच । भोः फेनं पिबामि यमिमे वत्सा मातॄणां स्तनात्पिबन्त उद्गिरन्ति ॥
sa evamukta upādhyāyaṃ pratyuvāca | bhoḥ phenaṃ pibāmi yamime vatsā mātṝṇāṃ stanātpibanta udgiranti
यह पूछे जाने पर उसने गुरु से कहा — "गुरुदेव, ये बछड़े अपनी माताओं के थन से दूध पीते समय जो फेन उगल देते हैं, मैं वही पीता हूँ।"
श्लोक 49 (1.3.49)
तमुपाध्यायः प्रत्युवाच । एते त्वदनुकम्पया गुणवन्तो वत्साः प्रभूततरं फेनमुद्गिरन्ति । तदेषामपि वत्सानां वृत्त्युपरोधं करोष्येवं वर्तमानः । फेनमपि भवान्न पातुमर्हतीति स तथेति प्रतिश्रुत्य निराहारः पुनररक्षद्गाः ॥
tamupādhyāyaḥ pratyuvāca | ete tvadanukampayā guṇavanto vatsāḥ prabhūtataraṃ phenamudgiranti | tadeṣāmapi vatsānāṃ vṛttyuparodhaṃ karoṣyevaṃ vartamānaḥ | phenamapi bhavānna pātumarhatīti sa tatheti pratiśrutya nirāhāraḥ punararakṣadgāḥ
गुरु ने कहा — "ये गुणवान बछड़े तुम पर दया करके बहुत-सा फेन उगल देते हैं। इस तरह तो तुम इन बछड़ों की जीविका में भी बाधा डालते हो। तुम्हें फेन भी नहीं पीना चाहिए।" उसने 'ठीक है' कहकर वचन दिया और बिना कुछ खाए फिर गायें चराने लगा।
श्लोक 50 (1.3.50)
तथा प्रतिषिद्धो भैक्ष्यं नाश्नाति न चान्यच्चरति पयो न पिबति फेनं नोपयुङ्क्ते स कदाचिदरण्ये क्षुधार्तोऽर्कपत्राण्यभक्षयत् ॥
tathā pratiṣiddho bhaikṣyaṃ nāśnāti na cānyaccarati payo na pibati phenaṃ nopayuṅkte sa kadācidaraṇye kṣudhārto'rkapatrāṇyabhakṣayat
इस प्रकार रोक दिए जाने पर वह न भिक्षा खाता, न दूसरी बार भिक्षा माँगता, न दूध पीता, न फेन लेता। एक दिन वन में भूख से व्याकुल होकर उसने आक के पत्ते खा लिए।
श्लोक 51 (1.3.51)
स तैरर्कपत्रैर्भक्षितैः क्षारतिक्तकटुरूक्षैस्तीक्ष्णविपाकैश्चक्षुष्युपहतोऽन्धो बभूव । ततः सोऽन्धोऽपि चङ्क्रम्यमाणः कूपेऽपतत् ॥
sa tairarkapatrairbhakṣitaiḥ kṣāratiktakaṭurūkṣaistīkṣṇavipākaiścakṣuṣyupahato'ndho babhūva | tataḥ so'ndho'pi caṅkramyamāṇaḥ kūpe'patat
खारे, कड़वे, तीखे, रूखे और तीव्र असर वाले उन आक के पत्तों को खाने से उसकी आँखें नष्ट हो गईं और वह अंधा हो गया। अंधा होकर भी वह इधर-उधर भटकता रहा और एक कुएँ में गिर पड़ा।
श्लोक 52 (1.3.52)
अथ तस्मिन्ननागच्छति सूर्ये चास्ताचलावलम्बिनि उपाध्यायः शिष्यानवोचत् ॥
atha tasminnanāgacchati sūrye cāstācalāvalambini upādhyāyaḥ śiṣyānavocat
जब वह नहीं लौटा और सूर्य अस्ताचल पर जा टिका, तब गुरु ने शिष्यों से कहा —
श्लोक 53 (1.3.53)
मयोपमन्युः सर्वतः प्रतिषिद्धः स नियतं कुपितस्ततो नागच्छति चिरगतस्त्विति । ततोऽन्वेष्य इत्येवमुक्त्वा शिष्यैः सार्धमरण्यं गत्वा तस्याह्वानाय शब्दं चकार भो उपमन्यो क्वासि वत्सैहीति ॥
mayopamanyuḥ sarvataḥ pratiṣiddhaḥ sa niyataṃ kupitastato nāgacchati ciragatastviti | tato'nveṣya ityevamuktvā śiṣyaiḥ sārdhamaraṇyaṃ gatvā tasyāhvānāya śabdaṃ cakāra bho upamanyo kvāsi vatsaihīti
"मैंने उपमन्यु को सब ओर से रोक दिया है। निश्चय ही वह रूठ गया है, इसीलिए बहुत देर से गया हुआ भी वह नहीं लौट रहा। उसे खोजना चाहिए।" यह कहकर वे शिष्यों के साथ वन में गए और उसे पुकारा — "अरे उपमन्यु, कहाँ हो? आओ, वत्स!"
श्लोक 54 (1.3.54)
स उपाध्यायस्य आह्वानवचनं श्रुत्वा प्रत्युवाचोच्चैरयमस्मिन्कूपे पतितोऽहमिति । तमुपाध्यायः प्रत्युवाच कथं त्वमस्मिन्कूपे पतित इति ॥
sa upādhyāyasya āhvānavacanaṃ śrutvā pratyuvācoccairayamasminkūpe patito'hamiti | tamupādhyāyaḥ pratyuvāca kathaṃ tvamasminkūpe patita iti
गुरु की पुकार सुनकर उसने ऊँचे स्वर में उत्तर दिया — "मैं यहाँ हूँ, इस कुएँ में गिर पड़ा हूँ।" गुरु ने पूछा — "तुम इस कुएँ में कैसे गिर गए?"
श्लोक 55 (1.3.55)
स उपाध्यायं प्रत्युवाच अर्कपत्राणि भक्षयित्वान्धीभूतोऽस्म्यतश्चङ्क्रम्यमाणः कूपे पतित इति । तमुपाध्यायः प्रत्युवाच ॥
sa upādhyāyaṃ pratyuvāca arkapatrāṇi bhakṣayitvāndhībhūto'smyataścaṅkramyamāṇaḥ kūpe patita iti | tamupādhyāyaḥ pratyuvāca
उसने गुरु से कहा — "आक के पत्ते खाकर मैं अंधा हो गया, इसलिए भटकते हुए कुएँ में गिर पड़ा।" तब गुरु ने उससे कहा —
श्लोक 56 (1.3.56)
अश्विनौ स्तुहि तौ देवभिषजौ त्वां चक्षुष्मन्तं कर्ताराविति । स एवमुक्त उपाध्यायेनोपमन्युः स्तोतुमुपचक्रमे देवावश्विनौ वाग्भिर्ऋग्भिः ॥
aśvinau stuhi tau devabhiṣajau tvāṃ cakṣuṣmantaṃ kartārāviti | sa evamukta upādhyāyenopamanyuḥ stotumupacakrame devāvaśvinau vāgbhirṛgbhiḥ
"दोनों अश्विनीकुमारों की स्तुति करो। देवताओं के वे दोनों वैद्य तुम्हें फिर से आँखें दे देंगे।" गुरु के ऐसा कहने पर उपमन्यु ऋचाओं की वाणी में दोनों देवता अश्विनीकुमारों की स्तुति करने लगा।
उपमन्युरुवाच
श्लोक 57 (1.3.57)
प्रपूर्वगौ पूर्वजौ चित्रभानू । गिरा वां शंसामि तपसा ह्यनन्तौ । दिव्यौ सुपर्णौ विरजौ विमाना- । वधिक्षिपन्तौ भुवनानि विश्वा ॥
prapūrvagau pūrvajau citrabhānū | girā vāṃ śaṃsāmi tapasā hyanantau | divyau suparṇau virajau vimānā- | vadhikṣipantau bhuvanāni viśvā
हे सबसे आगे चलने वाले, सबसे पहले उत्पन्न, अद्भुत तेज वाले देवो! तप के कारण अनंत तुम दोनों की मैं वाणी से स्तुति करता हूँ। तुम दिव्य हो, सुंदर पंखों वाले हो, निर्मल हो, विमानों पर विचरते हो और समस्त लोकों को अपने तेज से ढक लेते हो।
श्लोक 58 (1.3.58)
हिरण्मयौ शकुनी सांपरायौ । नासत्यदस्रौ सुनसौ वैजयन्तौ । शुक्लं वयन्तौ तरसा सुवेमा- । वधिव्ययन्तावसितं विवस्वतः ॥
hiraṇmayau śakunī sāṃparāyau | nāsatyadasrau sunasau vaijayantau | śuklaṃ vayantau tarasā suvemā- | vadhivyayantāvasitaṃ vivasvataḥ
तुम दोनों स्वर्णमय पक्षी हो, परलोक तक पार पहुँचाने वाले — नासत्य और दस्र, सुंदर नासिका वाले, विजयी। अपने उत्तम करघे पर तुम वेग से उजला सूत बुनते हो और उस पर सूर्य का काला सूत भी बुन देते हो।
श्लोक 59 (1.3.59)
ग्रस्तां सुपर्णस्य बलेन वर्तिका- । ममुञ्चतामश्विनौ सौभगाय । तावत्सुवृत्तावनमन्त मायया । वसत्तमा गा अरुणा उदावहत् ॥
grastāṃ suparṇasya balena vartikā- | mamuñcatāmaśvinau saubhagāya | tāvatsuvṛttāvanamanta māyayā | vasattamā gā aruṇā udāvahat
हे अश्विनीकुमारो, गरुड़ के बल से पकड़ी गई बटेर को तुमने उसके सौभाग्य के लिए छुड़ा दिया। हे सुंदर आचरण वाले देवो, तुम्हारी अद्भुत शक्ति के आगे सब झुक गए, और श्रेष्ठ तेजस्वी ने लाल गायों को बाहर निकाला।
श्लोक 60 (1.3.60)
षष्टिश्च गावस्त्रिशताश्च धेनव । एकं वत्सं सुवते तं दुहन्ति । नानागोष्ठा विहिता एकदोहना- । स्तावश्विनौ दुहतो घर्ममुक्थ्यम् ॥
ṣaṣṭiśca gāvastriśatāśca dhenava | ekaṃ vatsaṃ suvate taṃ duhanti | nānāgoṣṭhā vihitā ekadohanā- | stāvaśvinau duhato gharmamukthyam
साठ गायें और तीन सौ दुधारू गायें एक ही बछड़े को जन्म देती हैं और उसी के लिए दूध देती हैं। वे अलग-अलग गोशालाओं में रखी गई हैं, फिर भी उनका दोहन एक साथ होता है; उनसे दोनों अश्विनीकुमार स्तुति के योग्य घर्म (तप्त दुग्ध) दुहते हैं।
श्लोक 61 (1.3.61)
एकां नाभिं सप्त शता अराः श्रिताः । प्रधिष्वन्या विंशतिरर्पिता अराः । अनेमि चक्रं परिवर्ततेऽजरं । मायाऽश्विनौ समनक्ति चर्षणी ॥
ekāṃ nābhiṃ sapta śatā arāḥ śritāḥ | pradhiṣvanyā viṃśatirarpitā arāḥ | anemi cakraṃ parivartate'jaraṃ | māyā'śvinau samanakti carṣaṇī
एक ही नाभि में सात सौ अरे लगे हुए हैं, और उसकी परिधि में बीस अरे और जुड़े हैं। बिना नेमि का यह अजर चक्र निरंतर घूमता रहता है। हे अश्विनीकुमारो, यह तुम्हारी ही अद्भुत शक्ति है जो इसे सब प्राणियों के बीच चलाती है।
श्लोक 62 (1.3.62)
एकं चक्रं वर्तते द्वादशारं । षण्णाभिमेकाक्षममृतस्य धारणम् । यस्मिन्देवा अधि विश्वे विषक्ता- । स्तावश्विनौ मुञ्चतो मा विषीदतम् ॥
ekaṃ cakraṃ vartate dvādaśāraṃ | ṣaṇṇābhimekākṣamamṛtasya dhāraṇam | yasmindevā adhi viśve viṣaktā- | stāvaśvinau muñcato mā viṣīdatam
बारह अरों वाला एक चक्र घूम रहा है; उसकी छह नाभियाँ और एक धुरी है, और वह अमृत को धारण करता है। उसी पर सब देवता टिके हुए हैं। हे अश्विनीकुमारो, मुझे मुक्त करो, मुझे निराश न होने दो।
श्लोक 63 (1.3.63)
अश्विनाविन्दुममृतं वृत्तभूयौ । तिरोधत्तामश्विनौ दासपत्नी । हित्वा गिरिमश्विनौ गामुदाचरन्तौ । तद्वृष्टिमह्नात्प्रस्थितौ बलस्य ॥
aśvināvindumamṛtaṃ vṛttabhūyau | tirodhattāmaśvinau dāsapatnī | hitvā girimaśvinau gāmudācarantau | tadvṛṣṭimahnātprasthitau balasya
महान कर्मों वाले अश्विनीकुमारों ने इन्दु (चन्द्रमा) रूपी अमृत को छिपा दिया; अश्विनीकुमारों ने दास के अधीन पड़े जलों को मुक्त किया। पर्वत को छोड़कर अश्विनीकुमारों ने गायों को बाहर निकाला और दिन होते ही चल पड़कर बल के रोके हुए जल को बरसा दिया।
श्लोक 64 (1.3.64)
युवां दिशो जनयथो दशाग्रे । समानं मूर्ध्नि रथयानं वियन्ति । तासां यातमृषयोऽनुप्रयान्ति । देवा मनुष्याः क्षितिमाचरन्ति ॥
yuvāṃ diśo janayatho daśāgre | samānaṃ mūrdhni rathayānaṃ viyanti | tāsāṃ yātamṛṣayo'nuprayānti | devā manuṣyāḥ kṣitimācaranti
तुम दोनों आदि में दसों दिशाओं को उत्पन्न करते हो; ऊपर आकाश में सब तुम्हारे एक ही रथ-मार्ग पर चलते हैं। ऋषि तुम्हारे मार्ग का अनुसरण करते हैं; देवता और मनुष्य पृथ्वी पर विचरते हैं।
श्लोक 65 (1.3.65)
युवां वर्णान्विकुरुथो विश्वरूपां- । स्तेऽधिक्षियन्ते भुवनानि विश्वा । ते भानवोऽप्यनुसृताश्चरन्ति । देवा मनुष्याः क्षितिमाचरन्ति ॥
yuvāṃ varṇānvikurutho viśvarūpāṃ- | ste'dhikṣiyante bhuvanāni viśvā | te bhānavo'pyanusṛtāścaranti | devā manuṣyāḥ kṣitimācaranti
तुम दोनों रंगों को अनेक रूपों में ढाल देते हो; उन्हीं पर सारे लोक टिके हैं। तेजस्वी किरणें भी तुम्हारे पीछे-पीछे चलती हैं; देवता और मनुष्य पृथ्वी पर विचरते हैं।
श्लोक 66 (1.3.66)
तौ नासत्यावश्विनौ वां महेऽहं । स्रजं च यां बिभृथः पुष्करस्य । तौ नासत्यावमृतावृतावृधा- । वृते देवास्तत्प्रपदेन सूते ॥
tau nāsatyāvaśvinau vāṃ mahe'haṃ | srajaṃ ca yāṃ bibhṛthaḥ puṣkarasya | tau nāsatyāvamṛtāvṛtāvṛdhā- | vṛte devāstatprapadena sūte
हे नासत्य अश्विनीकुमारो, मैं तुम दोनों की और तुम्हारी धारण की हुई कमल की माला की वंदना करता हूँ। हे अमर नासत्यो, तुम ऋत (सत्य की व्यवस्था) को बढ़ाने वाले हो; तुम्हारे बिना देवता भी असमर्थ हैं। वह पैर के अगले भाग से जन्म देती है।
श्लोक 67 (1.3.67)
मुखेन गर्भं लभतां युवानौ । गतासुरेतत्प्रपदेन सूते । सद्यो जातो मातरमत्ति गर्भ- । स्तावश्विनौ मुञ्चथो जीवसे गाम् ॥
mukhena garbhaṃ labhatāṃ yuvānau | gatāsuretatprapadena sūte | sadyo jāto mātaramatti garbha- | stāvaśvinau muñcatho jīvase gām
दोनों युवा मुख से गर्भ ग्रहण करते हैं; और प्राणहीन (माता) उसे पैर के अगले भाग से जन्म देती है। जन्म लेते ही वह गर्भ अपनी माता को खा जाता है। हे अश्विनीकुमारो, तुम जीवन के लिए गौ को मुक्त करते हो।
श्लोक 68 (1.3.68)
स्तोतुं न शक्नोमि गुणैर्भवन्तौ । चक्षुर्विहीनः पथि संप्रमोहः । दुर्गेऽहमस्मिन्पतितोऽस्मि कूपे । युवां शरण्यौ शरणं प्रपद्ये ॥
stotuṃ na śaknomi guṇairbhavantau | cakṣurvihīnaḥ pathi saṃpramohaḥ | durge'hamasminpatito'smi kūpe | yuvāṃ śaraṇyau śaraṇaṃ prapadye
मैं तुम्हारे गुणों के अनुरूप तुम्हारी स्तुति नहीं कर सकता। आँखें खोकर मैं मार्ग भटक गया और इस दुर्गम कुएँ में गिर पड़ा हूँ। तुम दोनों शरण देने वाले हो; मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ।
सौतिरुवाच
श्लोक 69 (1.3.69)
एवमृग्भिश्चान्यैरस्तुवत् । इत्येवं तेनाभिष्टुतावश्विनावाजग्मतुराहतुश्चैनं प्रीतौ स्व एष तेऽपूपोऽशानैनमिति ॥
evamṛgbhiścānyairastuvat | ityevaṃ tenābhiṣṭutāvaśvināvājagmaturāhatuścainaṃ prītau sva eṣa te'pūpo'śānainamiti
इस प्रकार उसने इन और अन्य ऋचाओं से उनकी स्तुति की। उसके द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर अश्विनीकुमार वहाँ आए और उससे बोले — "हम प्रसन्न हैं। यह तुम्हारे लिए पुआ है, इसे खा लो।"
श्लोक 70 (1.3.70)
स एवमुक्तः प्रत्युवाच नानृतमूचतुर्भगवन्तौ नत्वहमेतमपूपमुपयोक्तुमुत्सहे गुरवेऽनिवेद्येति ॥
sa evamuktaḥ pratyuvāca nānṛtamūcaturbhagavantau natvahametamapūpamupayoktumutsahe gurave'nivedyeti
यह सुनकर उसने कहा — "आप दोनों भगवानों ने असत्य नहीं कहा। परंतु गुरु को निवेदित किए बिना मैं यह पुआ खाने का साहस नहीं कर सकता।"
श्लोक 71 (1.3.71)
ततस्तमश्विनावूचतुः । आवाभ्यां पुरस्ताद्भवत उपाध्यायेनैवमेवाभिष्टुताभ्यामपूपोदत्त उपयुक्तः स तेनानिवेद्य गुरवे त्वमपि तथैव कुरुष्व यथा कृतमुपाध्यायेनेति ॥
tatastamaśvināvūcatuḥ | āvābhyāṃ purastādbhavata upādhyāyenaivamevābhiṣṭutābhyāmapūpodatta upayuktaḥ sa tenānivedya gurave tvamapi tathaiva kuruṣva yathā kṛtamupādhyāyeneti
तब अश्विनीकुमारों ने उससे कहा — "पहले तुम्हारे गुरु ने भी ठीक इसी प्रकार हमारी स्तुति की थी; हमने उन्हें पुआ दिया और उन्होंने उसे अपने गुरु को निवेदित किए बिना खा लिया। तुम भी वैसा ही करो जैसा तुम्हारे गुरु ने किया था।"
श्लोक 72 (1.3.72)
स एवमुक्तः प्रत्युवाच एतत्प्रत्यनुनये भवन्तावश्विनौ नोत्सहेऽहमनिवेद्य गुरवेऽपूपमुपयोक्तुमिति ॥
sa evamuktaḥ pratyuvāca etatpratyanunaye bhavantāvaśvinau notsahe'hamanivedya gurave'pūpamupayoktumiti
यह सुनकर उसने कहा — "हे अश्विनीकुमारो, इस विषय में मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ; गुरु को निवेदित किए बिना मैं पुआ नहीं खा सकता।"
श्लोक 73 (1.3.73)
तमश्विनावाहतुः प्रीतौ स्वस्तवानया गुरुभक्त्या । उपाध्यायस्य ते कार्ष्णायसा दन्ता भवतोऽपि हिरण्मया भविष्यन्ति चक्षुष्मांश्च भविष्यसि श्रेयश्चावाप्स्यसीति ॥
tamaśvināvāhatuḥ prītau svastavānayā gurubhaktyā | upādhyāyasya te kārṣṇāyasā dantā bhavato'pi hiraṇmayā bhaviṣyanti cakṣuṣmāṃśca bhaviṣyasi śreyaścāvāpsyasīti
अश्विनीकुमारों ने उससे कहा — "तुम्हारी इस गुरुभक्ति से हम प्रसन्न हैं। तुम्हारे गुरु के दाँत काले लोहे के हैं; तुम्हारे दाँत सोने के हो जाएँगे। तुम्हें आँखें मिल जाएँगी और तुम्हारा कल्याण होगा।"
श्लोक 74 (1.3.74)
स एवमुक्तोऽश्विभ्यां लब्धचक्षुरुपाध्यायसकाशमागम्याभ्यवादयत् ॥
sa evamukto'śvibhyāṃ labdhacakṣurupādhyāyasakāśamāgamyābhyavādayat
अश्विनीकुमारों के ऐसा कहने पर उसे दृष्टि मिल गई। वह गुरु के पास आया और उन्हें प्रणाम किया।
श्लोक 75 (1.3.75)
आचचक्षे च स चास्य प्रीतिमान्बभूव ॥
ācacakṣe ca sa cāsya prītimānbabhūva
उसने गुरु को सारा वृत्तांत सुनाया, और गुरु उस पर प्रसन्न हुए।
श्लोक 76 (1.3.76)
आह चैनं यथाऽश्विनावाहतुस्तथा त्वं श्रेयोऽवाप्स्यसीति ॥
āha cainaṃ yathā'śvināvāhatustathā tvaṃ śreyo'vāpsyasīti
और उन्होंने उससे कहा — "जैसा अश्विनीकुमारों ने कहा है, वैसे ही तुम्हें कल्याण प्राप्त होगा।"
श्लोक 77 (1.3.77)
सर्वे च ते वेदाःप्रतिभास्यन्ति सर्वाणि च धर्मशास्त्राणीति । एषा तस्यापि परीक्षोपमन्योः ॥
sarve ca te vedāḥpratibhāsyanti sarvāṇi ca dharmaśāstrāṇīti | eṣā tasyāpi parīkṣopamanyoḥ
"सारे वेद और सारे धर्मशास्त्र तुम्हारे मन में स्वयं प्रकाशित हो जाएँगे।" यह थी उपमन्यु की परीक्षा।
श्लोक 78 (1.3.78)
अथापरः शिष्यस्तस्यैवापोदस्य धौम्यस्य बैदो नाम तमुपाध्यायः समादिदेश वत्स बैद इहास्यतां तावन्मम गृहे कंचित्कालं शुश्रूषुणा च भवितव्यं श्रेयस्ते भविष्यतीति ॥
athāparaḥ śiṣyastasyaivāpodasya dhaumyasya baido nāma tamupādhyāyaḥ samādideśa vatsa baida ihāsyatāṃ tāvanmama gṛhe kaṃcitkālaṃ śuśrūṣuṇā ca bhavitavyaṃ śreyaste bhaviṣyatīti
उन्हीं आयोद धौम्य का एक और शिष्य था, जिसका नाम वेद था। गुरु ने उसे आदेश दिया — "वत्स वेद, कुछ समय तक मेरे घर में रहो और मेरी सेवा करो। इससे तुम्हारा कल्याण होगा।"
श्लोक 79 (1.3.79)
स तथेत्युक्त्वा गुरुकुले दीर्घकालं गुरुशुश्रूषणपरोऽवसत् । गौरिव नित्यं गुरुणा धूर्षु नियोज्यमानः शीतोष्णक्षुत्तृष्णादुःखसहः सर्वत्राप्रतिकूलस्तस्य महता कालेन गुरुः परितोषं जगाम ॥
sa tathetyuktvā gurukule dīrghakālaṃ guruśuśrūṣaṇaparo'vasat | gauriva nityaṃ guruṇā dhūrṣu niyojyamānaḥ śītoṣṇakṣuttṛṣṇāduḥkhasahaḥ sarvatrāpratikūlastasya mahatā kālena guruḥ paritoṣaṃ jagāma
उसने 'ठीक है' कहकर बहुत समय तक गुरुकुल में रहकर गुरु की सेवा की। बैल की तरह गुरु उसे सदा भारी कामों में जोतते रहे, और वह सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास और कष्ट सहता हुआ कभी किसी बात में विरोध नहीं करता था। बहुत समय बीतने पर गुरु उससे संतुष्ट हुए।
श्लोक 80 (1.3.80)
तत्परितोषाच्च श्रेयः सर्वज्ञतां चावाप । एषा तस्यापि परीक्षा बैदस्य ॥
tatparitoṣācca śreyaḥ sarvajñatāṃ cāvāpa | eṣā tasyāpi parīkṣā baidasya
गुरु के संतोष से उसे कल्याण और सर्वज्ञता प्राप्त हुई। यह थी वेद की परीक्षा।
श्लोक 81 (1.3.81)
स उपाध्यायेनानुज्ञातः समावृत्तस्तस्माद्गुरुकुलवासाद्गृहाश्रमं प्रत्यपद्यत । तस्यापि स्वगृहे वसतस्त्रयः शिष्या बभूवुः स शिष्यान्न किंचिदुवाच कर्म वा क्रियतां गुरुशुश्रूषा वेति । दुःखाभिज्ञो हि गुरुकुलवासस्य शिष्यान्परिक्लेशेन योजयितुं नेयेष ॥
sa upādhyāyenānujñātaḥ samāvṛttastasmādgurukulavāsādgṛhāśramaṃ pratyapadyata | tasyāpi svagṛhe vasatastrayaḥ śiṣyā babhūvuḥ sa śiṣyānna kiṃciduvāca karma vā kriyatāṃ guruśuśrūṣā veti | duḥkhābhijño hi gurukulavāsasya śiṣyānparikleśena yojayituṃ neyeṣa
गुरु की आज्ञा पाकर वह गुरुकुल-वास पूरा करके घर लौटा और गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया। अपने घर में रहते हुए उसके भी तीन शिष्य हुए। वह अपने शिष्यों से कभी कुछ नहीं कहता था — न यह कि 'यह काम करो', न यह कि 'गुरु की सेवा करो'। गुरुकुल-वास के कष्टों को जानने के कारण वह शिष्यों को क्लेश में डालना नहीं चाहता था।
श्लोक 82 (1.3.82)
अथ कस्मिंश्चित्काले बैदं ब्राह्मणं जनमेजयः पौष्यश्च क्षत्रियावुपेत्योपाध्यायं वरयाञ्चक्रतुः ॥
atha kasmiṃścitkāle baidaṃ brāhmaṇaṃ janamejayaḥ pauṣyaśca kṣatriyāvupetyopādhyāyaṃ varayāñcakratuḥ
कुछ समय बाद दो क्षत्रिय, जनमेजय और पौष्य, ब्राह्मण वेद के पास आए और उन्हें अपना उपाध्याय (पुरोहित) चुना।
श्लोक 83 (1.3.83)
स कदाचिद्याज्यकार्येणाभिप्रस्थित उत्तङ्कनामानं शिष्यं नियोजयामास ॥
sa kadācidyājyakāryeṇābhiprasthita uttaṅkanāmānaṃ śiṣyaṃ niyojayāmāsa
एक बार यजमान के कार्य से बाहर जाते समय उन्होंने उत्तंक नामक शिष्य को घर का भार सौंपा।
श्लोक 84 (1.3.84)
भो यत्किंचिदस्मद्गृहे परिहीयते तदिच्छाम्यहमपरिहीयमानं भवता क्रियमाणमिति स एवं प्रतिसंदिश्योत्तङ्कं बैदः प्रवासं जगाम ॥
bho yatkiṃcidasmadgṛhe parihīyate tadicchāmyahamaparihīyamānaṃ bhavatā kriyamāṇamiti sa evaṃ pratisaṃdiśyottaṅkaṃ baidaḥ pravāsaṃ jagāma
"सुनो, मेरे घर में जो कुछ भी कम पड़े, मैं चाहता हूँ कि तुम उसकी कमी न होने दो।" उत्तंक को ऐसा आदेश देकर वेद प्रवास पर चले गए।
श्लोक 85 (1.3.85)
अथोत्तङ्कः शुश्रूषुर्गुरुनियोगमनुतिष्ठमानो गुरुकुले वसति स्म । स तत्र वसमान उपाध्यायस्त्रीभिः सहिताभिराहूयोक्तः ॥
athottaṅkaḥ śuśrūṣurguruniyogamanutiṣṭhamāno gurukule vasati sma | sa tatra vasamāna upādhyāyastrībhiḥ sahitābhirāhūyoktaḥ
उत्तंक सेवा-भाव से गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए गुरुकुल में रहने लगे। वहाँ रहते समय गुरु के घर की स्त्रियों ने मिलकर उन्हें बुलाया और कहा —
श्लोक 86 (1.3.86)
उपाध्यायानी ते ऋतुमती उपाध्यायश्च प्रोषितोऽस्या यथाऽयमृतुर्वन्ध्यो न भवति तथा क्रियतामेषा विषीदतीति ॥
upādhyāyānī te ṛtumatī upādhyāyaśca proṣito'syā yathā'yamṛturvandhyo na bhavati tathā kriyatāmeṣā viṣīdatīti
"तुम्हारी गुरुपत्नी ऋतुमती हैं और गुरु प्रवास पर हैं। ऐसा उपाय करो कि उनका यह ऋतुकाल निष्फल न जाए; वे इससे दुखी हैं।"
श्लोक 87 (1.3.87)
एवमुक्तस्ताः स्त्रियः प्रत्युवाच । न मया स्त्रीणां वचनादिदमकार्यं करणीयम् । न ह्यहमुपाध्यायेन संदिष्टोऽकार्यमपि त्वया कार्यमिति ॥
evamuktastāḥ striyaḥ pratyuvāca | na mayā strīṇāṃ vacanādidamakāryaṃ karaṇīyam | na hyahamupādhyāyena saṃdiṣṭo'kāryamapi tvayā kāryamiti
यह सुनकर उन्होंने उन स्त्रियों को उत्तर दिया — "स्त्रियों के कहने से मुझे यह अनुचित कार्य नहीं करना चाहिए। गुरु ने मुझे यह आदेश नहीं दिया है कि अनुचित कार्य भी कर डालना।"
श्लोक 88 (1.3.88)
तस्य पुनरुपाध्यायः कालान्तरेण गृहमाजगाम तस्मात्प्रवासात् । स तु तद्वृत्तं तस्याशेषमुपलभ्य प्रीतिमानभूत् ॥
tasya punarupādhyāyaḥ kālāntareṇa gṛhamājagāma tasmātpravāsāt | sa tu tadvṛttaṃ tasyāśeṣamupalabhya prītimānabhūt
कुछ समय बाद गुरु प्रवास से घर लौटे। सारा वृत्तांत जानकर वे उत्तंक पर प्रसन्न हुए।
श्लोक 89 (1.3.89)
उवाच चैनं वत्सोत्तङ्कं किं ते प्रियं करवाणीति । धर्मतो हि शुश्रूषितोऽस्मि भवता तेन प्रीतिः परस्परेण नौ संवृद्धा तदनुजाने भवन्तं सर्वानेव कामानवाप्स्यसि गम्यतामिति ॥
uvāca cainaṃ vatsottaṅkaṃ kiṃ te priyaṃ karavāṇīti | dharmato hi śuśrūṣito'smi bhavatā tena prītiḥ paraspareṇa nau saṃvṛddhā tadanujāne bhavantaṃ sarvāneva kāmānavāpsyasi gamyatāmiti
उन्होंने उनसे कहा — "वत्स उत्तंक, मैं तुम्हारा क्या प्रिय करूँ? तुमने धर्मपूर्वक मेरी सेवा की है, इससे हम दोनों का परस्पर स्नेह बढ़ा है। मैं तुम्हें जाने की अनुमति देता हूँ। तुम्हारी सारी कामनाएँ पूरी होंगी। जाओ।"
श्लोक 90 (1.3.90)
स एवमुक्तः प्रत्युवाच किं ते प्रियं करवाणीति एवं ह्याहुः ॥
sa evamuktaḥ pratyuvāca kiṃ te priyaṃ karavāṇīti evaṃ hyāhuḥ
यह सुनकर उत्तंक ने कहा — "मैं ही आपका क्या प्रिय करूँ? क्योंकि ऐसा कहा गया है —"
श्लोक 91 (1.3.91)
यश्चाधर्मेण वै ब्रूयाद्यश्चाधर्मेण पृच्छति । तयोरन्यतरः प्रैति विद्वेषं चाधिगच्छति ॥
yaścādharmeṇa vai brūyādyaścādharmeṇa pṛcchati | tayoranyataraḥ praiti vidveṣaṃ cādhigacchati
"जो अधर्म से विद्या देता है और जो अधर्म से उसे पूछता है, उन दोनों में से कोई एक नष्ट हो जाता है या वैर को प्राप्त होता है।"
श्लोक 92 (1.3.92)
सोऽहमनुज्ञातो भवता इच्छामीष्टं गुर्वर्थमुपहर्तुमिति । तेनैवमुक्त उपाध्यायः प्रत्युवाच वत्सोत्तङ्क उष्यतां तावदिति ॥
so'hamanujñāto bhavatā icchāmīṣṭaṃ gurvarthamupahartumiti | tenaivamukta upādhyāyaḥ pratyuvāca vatsottaṅka uṣyatāṃ tāvaditi
"इसलिए आपकी अनुमति पाकर मैं गुरुदक्षिणा के रूप में आपकी मनचाही वस्तु लाना चाहता हूँ।" यह सुनकर गुरु ने कहा — "वत्स उत्तंक, अभी कुछ समय और रहो।"
श्लोक 93 (1.3.93)
स कदाचित्तमुपाध्यायमाहोत्तङ्क आज्ञापयतु भवान्किं ते प्रियमुपाहरामि गुर्वर्थमिति ॥
sa kadācittamupādhyāyamāhottaṅka ājñāpayatu bhavānkiṃ te priyamupāharāmi gurvarthamiti
एक दिन उत्तंक ने गुरु से कहा — "आज्ञा दीजिए, गुरुदक्षिणा में मैं आपके लिए कौन-सी प्रिय वस्तु लाऊँ?"
श्लोक 94 (1.3.94)
तमुपाध्यायः प्रत्युवाच वत्सोत्तङ्क बहुशो मां चोदयसि गुर्वर्थमुपाहरामीति तद्गच्छैनां प्रविश्योपाध्यायानीं पृच्छ किमुपाहरामीति एषा यद्ब्रवीति तदुपाहरस्वेति ॥
tamupādhyāyaḥ pratyuvāca vatsottaṅka bahuśo māṃ codayasi gurvarthamupāharāmīti tadgacchaināṃ praviśyopādhyāyānīṃ pṛccha kimupāharāmīti eṣā yadbravīti tadupāharasveti
गुरु ने कहा — "वत्स उत्तंक, तुम बार-बार मुझसे आग्रह करते हो कि गुरुदक्षिणा लाऊँ। तो भीतर जाकर इन अपनी गुरुपत्नी से पूछो कि क्या लाऊँ। ये जो कहें, वही ले आओ।"
श्लोक 95 (1.3.95)
स एवमुक्त उपाध्यायेनोपाध्यायानीमपृच्छद्भवत्युपाध्यायेनास्म्यनुज्ञातो गृहं गन्तुमिच्छामीष्टं ते गुर्वर्थमुपहृत्यानृणो गन्तुं तदाज्ञापयतु भवती किमुपाहरामि गुर्वर्थमिति ॥
sa evamukta upādhyāyenopādhyāyānīmapṛcchadbhavatyupādhyāyenāsmyanujñāto gṛhaṃ gantumicchāmīṣṭaṃ te gurvarthamupahṛtyānṛṇo gantuṃ tadājñāpayatu bhavatī kimupāharāmi gurvarthamiti
गुरु के ऐसा कहने पर उत्तंक ने गुरुपत्नी से पूछा — "देवी, गुरुदेव ने मुझे घर जाने की अनुमति दे दी है। मैं आपकी मनचाही वस्तु गुरुदक्षिणा के रूप में लाकर ऋण-मुक्त होकर जाना चाहता हूँ। अतः आप आज्ञा दीजिए, गुरुदक्षिणा में क्या लाऊँ?"
श्लोक 96 (1.3.96)
सैवमुक्तोपाध्यायानी तमुत्तङ्कं प्रत्युवाच गच्छ पौष्यं प्रति राजानं कुण्डले भिक्षितुं तस्य क्षत्रियया पिनद्धे ॥
saivamuktopādhyāyānī tamuttaṅkaṃ pratyuvāca gaccha pauṣyaṃ prati rājānaṃ kuṇḍale bhikṣituṃ tasya kṣatriyayā pinaddhe
यह सुनकर गुरुपत्नी ने उत्तङ्क से कहा — "राजा पौष्य के पास जाओ और उनकी रानी जो दो कुण्डल पहनती हैं, उन्हें माँग लाओ।
श्लोक 97 (1.3.97)
आनयस्वेतश्चतुर्थेऽहनि पुण्यकर्म भविता ताभ्यामाबद्धाभ्यां शोभमाना ब्राह्मणान्परिवेष्टुमिच्छामि । तत्संपादयस्व एवं हि कुर्वतः श्रेयो भविताऽन्यथा कुतः श्रेय इति ॥
ānayasvetaścaturthe'hani puṇyakarma bhavitā tābhyāmābaddhābhyāṃ śobhamānā brāhmaṇānpariveṣṭumicchāmi | tatsaṃpādayasva evaṃ hi kurvataḥ śreyo bhavitā'nyathā kutaḥ śreya iti
उन्हें यहाँ ले आओ। आज से चौथे दिन एक पुण्य-कर्म होगा, और मैं उन कुण्डलों को पहनकर, उनसे सुशोभित होकर ब्राह्मणों को भोजन परोसना चाहती हूँ। यह कार्य पूरा करो। ऐसा करोगे तो तुम्हारा कल्याण होगा, अन्यथा कल्याण कहाँ से होगा?"
श्लोक 98 (1.3.98)
स एवमुक्तस्तयोपाध्यायान्या प्रातिष्ठतोत्तङ्कः स पथि गच्छन्नपश्यदृषभमतिप्रमाणं तमधिरूढं च पुरुषमतिप्रमाणमेव स पुरुष उत्तङ्कमभ्यभाषत ॥
sa evamuktastayopādhyāyānyā prātiṣṭhatottaṅkaḥ sa pathi gacchannapaśyadṛṣabhamatipramāṇaṃ tamadhirūḍhaṃ ca puruṣamatipramāṇameva sa puruṣa uttaṅkamabhyabhāṣata
गुरुपत्नी के ऐसा कहने पर उत्तङ्क चल पड़ा। मार्ग में चलते हुए उसने एक अत्यन्त विशाल बैल देखा, और उस पर सवार एक पुरुष को, जो स्वयं भी अत्यन्त विशाल था। उस पुरुष ने उत्तङ्क से कहा —
श्लोक 99 (1.3.99)
भो उत्तङ्कैतत्पुरीषमस्य ऋषभस्य भक्षयस्वेति स एवमुक्तो नैच्छत् ॥
bho uttaṅkaitatpurīṣamasya ṛṣabhasya bhakṣayasveti sa evamukto naicchat
"हे उत्तङ्क, इस बैल का गोबर खा लो।" यह सुनकर भी उसने खाना नहीं चाहा।
श्लोक 100 (1.3.100)
तमाह पुरुषो भूयो भक्षयस्वोत्तङ्क मा विचारयोपाध्यायेनापि ते भक्षितं पूर्वमिति । स एवमुक्तो बाढमित्युक्त्वा तदा तदृषभस्य मूत्रं पुरीषं च भक्षयित्वोत्तङ्कः संभ्रमादुत्थित एवापोऽनुस्पृश्य प्रतस्थे ॥
tamāha puruṣo bhūyo bhakṣayasvottaṅka mā vicārayopādhyāyenāpi te bhakṣitaṃ pūrvamiti | sa evamukto bāḍhamityuktvā tadā tadṛṣabhasya mūtraṃ purīṣaṃ ca bhakṣayitvottaṅkaḥ saṃbhramādutthita evāpo'nuspṛśya pratasthe
वह पुरुष फिर बोला — "उत्तङ्क, खा लो, सोच-विचार मत करो। तुम्हारे गुरु ने भी पहले इसे खाया था।" यह सुनकर उत्तङ्क ने "बहुत अच्छा" कहा और उस बैल का मूत्र और गोबर खा लिया। फिर हड़बड़ी में उठकर उसने खड़े-खड़े ही जल से आचमन किया और आगे चल दिया।
श्लोक 101 (1.3.101)
यत्र स क्षत्रियः पौष्यस्तमुपेत्यासीनमपश्यदुत्तङ्कः । स उत्तङ्कस्तमुपेत्याशीर्भिरभिनन्द्योवाच ॥
yatra sa kṣatriyaḥ pauṣyastamupetyāsīnamapaśyaduttaṅkaḥ | sa uttaṅkastamupetyāśīrbhirabhinandyovāca
जहाँ क्षत्रिय राजा पौष्य थे, वहाँ पहुँचकर उत्तङ्क ने उन्हें आसन पर बैठे देखा। उनके पास जाकर उत्तङ्क ने आशीर्वादों से उनका अभिनन्दन किया और कहा —
श्लोक 102 (1.3.102)
अर्थी भवन्तमुपागतोऽस्मीति स एनमभिवाद्योवाच । भगवन्पौष्यः खल्वहं किं करवाणीति ॥
arthī bhavantamupāgato'smīti sa enamabhivādyovāca | bhagavanpauṣyaḥ khalvahaṃ kiṃ karavāṇīti
"मैं आपके पास याचक बनकर आया हूँ।" राजा ने उन्हें प्रणाम करके कहा — "भगवन्, मैं ही पौष्य हूँ। बताइए, मैं क्या सेवा करूँ?"
श्लोक 103 (1.3.103)
स तमुवाच गुर्वर्थं कुण्डलयोरर्थेनाभ्यागतोऽस्मि । ये वै ते क्षत्रियया पिनद्धे कुण्डले ते भवान्दातुमर्हतीति ॥
sa tamuvāca gurvarthaṃ kuṇḍalayorarthenābhyāgato'smi | ye vai te kṣatriyayā pinaddhe kuṇḍale te bhavāndātumarhatīti
उत्तङ्क ने उनसे कहा — "मैं गुरुदक्षिणा के लिए दो कुण्डलों के निमित्त आया हूँ। आपकी रानी जो कुण्डल पहनती हैं, वे आप मुझे देने की कृपा करें।"
श्लोक 104 (1.3.104)
तं प्रत्युवाच पौष्यः प्रविश्यान्तःपुरं क्षत्रिया याच्यतामिति । स तेनैवमुक्तः प्रविश्यान्तःपुरं क्षत्रियां नापश्यत् ॥
taṃ pratyuvāca pauṣyaḥ praviśyāntaḥpuraṃ kṣatriyā yācyatāmiti | sa tenaivamuktaḥ praviśyāntaḥpuraṃ kṣatriyāṃ nāpaśyat
पौष्य ने उत्तर दिया — "अन्तःपुर में जाकर रानी से माँग लीजिए।" ऐसा कहे जाने पर वह अन्तःपुर में गया, किन्तु उसे रानी दिखाई नहीं दीं।
श्लोक 105 (1.3.105)
स पौष्यं पुनरुवाच न युक्तं भवताऽहमनृतेनोपचरितुं न हि तेऽन्तःपुरे क्षत्रिया सन्निहिता नैनां पश्यामि ॥
sa pauṣyaṃ punaruvāca na yuktaṃ bhavatā'hamanṛtenopacarituṃ na hi te'ntaḥpure kṣatriyā sannihitā naināṃ paśyāmi
उसने फिर पौष्य से कहा — "आपको मेरे साथ झूठा व्यवहार करना उचित नहीं। आपकी रानी अन्तःपुर में नहीं हैं; वे मुझे दिखाई नहीं दे रहीं।"
श्लोक 106 (1.3.106)
स एवमुक्तः पौष्यः क्षणमात्रं विमृश्योत्तङ्कं प्रत्युवाच । नियतं भवानुच्छिष्टः स्मर तावन्न हि सा क्षत्रिया उच्छिष्टेनाशुचिना शक्या द्रष्टुं पतिव्रतात्वात्सैषा नाशुचेर्दर्शनमुपैतीति ॥
sa evamuktaḥ pauṣyaḥ kṣaṇamātraṃ vimṛśyottaṅkaṃ pratyuvāca | niyataṃ bhavānucchiṣṭaḥ smara tāvanna hi sā kṣatriyā ucchiṣṭenāśucinā śakyā draṣṭuṃ pativratātvātsaiṣā nāśucerdarśanamupaitīti
यह सुनकर पौष्य ने क्षण-भर विचार किया और उत्तङ्क से कहा — "निश्चय ही आप भोजन के बाद अशुद्ध हैं; ज़रा स्मरण कीजिए। कोई अशुद्ध और अपवित्र व्यक्ति उस रानी को नहीं देख सकता। वह पतिव्रता है, इसलिए अशुद्ध व्यक्ति की दृष्टि में नहीं आती।"
श्लोक 107 (1.3.107)
अथैवमुक्त उत्तङ्कः स्मृत्वोवाचास्ति खलु मया तु भक्षितं नोपस्पृष्टमागच्छतेति । तं पौष्यः प्रत्युवाच एष ते व्यतिक्रमो नोत्थितेनोपस्पृष्टं भवति शीघ्रमागच्छतेति ॥
athaivamukta uttaṅkaḥ smṛtvovācāsti khalu mayā tu bhakṣitaṃ nopaspṛṣṭamāgacchateti | taṃ pauṣyaḥ pratyuvāca eṣa te vyatikramo notthitenopaspṛṣṭaṃ bhavati śīghramāgacchateti
यह सुनकर उत्तङ्क को स्मरण हुआ और उसने कहा — "हाँ, सचमुच मैंने कुछ खाया था, और जल्दी में चलते-चलते मैंने ठीक से आचमन नहीं किया।" पौष्य ने उससे कहा — "यही आपकी चूक है। खड़े-खड़े या जल्दी में चलते हुए किया गया आचमन शुद्धि नहीं होता।"
श्लोक 108 (1.3.108)
अथोत्तङ्कस्तं तथेत्युक्त्वा प्राङ्मुख उपविश्य सुप्रक्षालितपाणिपादवदनो निःशब्दाभिरफेनाभिरनुष्णाभिर्हृद्गताभिरद्भिस्त्रिः पीत्वा द्विः परिमृज्य खान्यद्भिरुपस्पृश्य चान्तःपुरं प्रविवेश ॥
athottaṅkastaṃ tathetyuktvā prāṅmukha upaviśya suprakṣālitapāṇipādavadano niḥśabdābhiraphenābhiranuṣṇābhirhṛdgatābhiradbhistriḥ pītvā dviḥ parimṛjya khānyadbhirupaspṛśya cāntaḥpuraṃ praviveśa
तब उत्तङ्क "ठीक है" कहकर पूर्व की ओर मुख करके बैठ गया। उसने हाथ, पैर और मुख भली-भाँति धोए; फिर बिना शब्द, बिना झाग वाला, ठंडा और हृदय तक पहुँचने वाला जल तीन बार पिया, दो बार होंठ पोंछे, जल से इन्द्रियों के छिद्रों का स्पर्श किया और अन्तःपुर में प्रवेश किया।
श्लोक 109 (1.3.109)
ततस्तां क्षत्रियामपश्यत्सा च दृष्ट्वैवोत्तङ्कं प्रत्युत्थायाभिवाद्योवाच स्वागतं ते भगवन्नाज्ञापय किं करवाणीति ॥
tatastāṃ kṣatriyāmapaśyatsā ca dṛṣṭvaivottaṅkaṃ pratyutthāyābhivādyovāca svāgataṃ te bhagavannājñāpaya kiṃ karavāṇīti
तब उसे रानी दिखाई दीं। उत्तङ्क को देखते ही वे उठ खड़ी हुईं और प्रणाम करके बोलीं — "भगवन्, आपका स्वागत है। आज्ञा दीजिए, मैं क्या करूँ?"
श्लोक 110 (1.3.110)
स तामुवाचैते कुण्डले गुर्वर्थं मे भिक्षिते दातुमर्हसीति । सा प्रीता तेन तस्य सद्भावेन पात्रमयमनतिक्रमणीयश्चेति मत्वा ते कुण्डले अवमुच्यास्मै प्रायच्छदाह चैनमेते कुण्डले तक्षको नागराजः सुभृशं प्रार्थयत्यप्रमत्तो नेतुमर्हसीति ॥
sa tāmuvācaite kuṇḍale gurvarthaṃ me bhikṣite dātumarhasīti | sā prītā tena tasya sadbhāvena pātramayamanatikramaṇīyaśceti matvā te kuṇḍale avamucyāsmai prāyacchadāha cainamete kuṇḍale takṣako nāgarājaḥ subhṛśaṃ prārthayatyapramatto netumarhasīti
उसने उनसे कहा — "ये कुण्डल मैं गुरुदक्षिणा के लिए माँग रहा हूँ; कृपया मुझे दे दीजिए।" उसकी सच्ची भावना से प्रसन्न होकर और यह सोचकर कि "यह सुपात्र है, इसे लौटाया नहीं जा सकता", रानी ने वे कुण्डल उतारकर उसे दे दिए। और उससे कहा — "नागराज तक्षक इन कुण्डलों को पाने की बड़ी इच्छा रखता है। आप इन्हें पूरी सावधानी से ले जाइए।"
श्लोक 111 (1.3.111)
स एवमुक्तस्तां क्षत्रियां प्रत्युवाच भवती सुनिर्वृता भवतु । न मां शक्तस्तक्षको नागराजो धर्षयितुमिति ॥
sa evamuktastāṃ kṣatriyāṃ pratyuvāca bhavatī sunirvṛtā bhavatu | na māṃ śaktastakṣako nāgarājo dharṣayitumiti
यह सुनकर उसने रानी से कहा — "आप पूरी तरह निश्चिन्त रहें। नागराज तक्षक मुझे परास्त नहीं कर सकता।"
श्लोक 112 (1.3.112)
स एवमुक्त्वा तां क्षत्रियामामन्त्र्य पौष्यसकाशमागच्छत् । आह चैनं भोः पौष्य प्रीतोऽस्मीति तमुत्तङ्कं पौष्यः प्रत्युवाच ॥
sa evamuktvā tāṃ kṣatriyāmāmantrya pauṣyasakāśamāgacchat | āha cainaṃ bhoḥ pauṣya prīto'smīti tamuttaṅkaṃ pauṣyaḥ pratyuvāca
यह कहकर वह रानी से विदा लेकर पौष्य के पास आया और बोला — "हे पौष्य, मैं प्रसन्न हूँ।" तब पौष्य ने उत्तङ्क से कहा —
श्लोक 113 (1.3.113)
भगवंश्चिरेण पात्रमासाद्यते भवांश्च गुणवानतिथिस्तदिच्छे श्राद्धं कर्तुं क्रियतां क्षण इति ॥
bhagavaṃścireṇa pātramāsādyate bhavāṃśca guṇavānatithistadicche śrāddhaṃ kartuṃ kriyatāṃ kṣaṇa iti
"भगवन्, सुपात्र बहुत समय बाद मिलता है, और आप गुणवान अतिथि हैं। इसलिए मैं श्राद्ध करना चाहता हूँ; कृपया उसके लिए निमन्त्रण स्वीकार कीजिए।"
श्लोक 114 (1.3.114)
तमुत्तङ्कः प्रत्युवाच कृतक्षण एवास्मि शीघ्रमिच्छामि यथोपपन्नमन्नमुपस्कृतं भवतेति स तथेत्युक्त्वा यथोपपन्नेनान्नेनैनं भोजयामास ॥
tamuttaṅkaḥ pratyuvāca kṛtakṣaṇa evāsmi śīghramicchāmi yathopapannamannamupaskṛtaṃ bhavateti sa tathetyuktvā yathopapannenānnenainaṃ bhojayāmāsa
उत्तङ्क ने उत्तर दिया — "मैंने निमन्त्रण स्वीकार कर लिया है, पर मुझे जल्दी है; जो भी भोजन तैयार हो, वही परोस दीजिए।" राजा ने "ठीक है" कहकर जो अन्न उपस्थित था उसी से उसे भोजन कराया।
श्लोक 115 (1.3.115)
अथोत्तङ्कः सकेशं शीतमन्नं दृष्ट्वा अशुच्येतदिति मत्वा तं पौष्यमुवाच । यस्मान्मे अशुच्यन्नं ददासि तस्मादन्धो भविष्यसीति ॥
athottaṅkaḥ sakeśaṃ śītamannaṃ dṛṣṭvā aśucyetaditi matvā taṃ pauṣyamuvāca | yasmānme aśucyannaṃ dadāsi tasmādandho bhaviṣyasīti
तब उत्तङ्क ने देखा कि अन्न ठंडा है और उसमें बाल पड़ा है। उसे अशुद्ध मानकर उसने पौष्य से कहा — "तुम मुझे अपवित्र अन्न दे रहे हो, इसलिए तुम अन्धे हो जाओगे।"
श्लोक 116 (1.3.116)
तं पौष्यः प्रत्युवाच । यस्मात्त्वमदुष्टमन्नं दूषयसि तस्मादनपत्यो भविष्यसीति तमुत्तङ्कः प्रत्युवाच ॥
taṃ pauṣyaḥ pratyuvāca | yasmāttvamaduṣṭamannaṃ dūṣayasi tasmādanapatyo bhaviṣyasīti tamuttaṅkaḥ pratyuvāca
पौष्य ने उत्तर दिया — "तुम निर्दोष अन्न को दूषित बता रहे हो, इसलिए तुम सन्तानहीन हो जाओगे।" तब उत्तङ्क ने उससे कहा —
श्लोक 117 (1.3.117)
न युक्तं भवताऽन्नमशुचि दत्त्वा प्रतिशापं दातुं तस्मादन्नमेव प्रत्यक्षीकुरु । ततः पौष्यस्तदन्नमशुचि दृष्ट्वा तस्याशुचिभावमपरोक्षयामास ॥
na yuktaṃ bhavatā'nnamaśuci dattvā pratiśāpaṃ dātuṃ tasmādannameva pratyakṣīkuru | tataḥ pauṣyastadannamaśuci dṛṣṭvā tasyāśucibhāvamaparokṣayāmāsa
"अपवित्र अन्न देकर बदले में शाप देना आपको उचित नहीं। स्वयं अन्न को देख लीजिए।" तब पौष्य ने उस अन्न को देखा और उसकी अशुद्धता को प्रत्यक्ष जान लिया।
श्लोक 118 (1.3.118)
अथ तदन्नं मुक्तकेश्या स्त्रियोपहृतमनुष्णं सकेशं चाशुच्येतदिति मत्वा तमृषिमुत्तङ्कं प्रसादयामास ॥
atha tadannaṃ muktakeśyā striyopahṛtamanuṣṇaṃ sakeśaṃ cāśucyetaditi matvā tamṛṣimuttaṅkaṃ prasādayāmāsa
यह जानकर कि वह अन्न खुले केशों वाली स्त्री लाई थी, वह ठंडा था और उसमें बाल था, इसलिए अशुद्ध है — उसने ऋषि उत्तङ्क को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया।
श्लोक 119 (1.3.119)
भगवन्नेतदज्ञानादन्नं सकेशमुपाहृतं शीतं च । तत्क्षामये भवन्तं न भवेयमन्ध इति । तमुत्तङ्कः प्रत्युवाच ॥
bhagavannetadajñānādannaṃ sakeśamupāhṛtaṃ śītaṃ ca | tatkṣāmaye bhavantaṃ na bhaveyamandha iti | tamuttaṅkaḥ pratyuvāca
"भगवन्, यह अन्न अनजाने में ठंडा और बाल सहित परोसा गया। इसके लिए मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ; मैं अन्धा न होऊँ।" उत्तङ्क ने उससे कहा —
श्लोक 120 (1.3.120)
न मृषा ब्रवीमि भूत्वा त्वमन्धो नचिरादनन्धो भविष्यसीति । ममापि शापो भवता दत्तो न भवेदिति ॥
na mṛṣā bravīmi bhūtvā tvamandho nacirādanandho bhaviṣyasīti | mamāpi śāpo bhavatā datto na bhavediti
"मैं झूठ नहीं बोलता। तुम अन्धे होगे, पर शीघ्र ही फिर देखने लगोगे। अब तुम्हारा दिया हुआ शाप भी मुझ पर न लगे।"
श्लोक 121 (1.3.121)
तं पौष्यः प्रत्युवाच न चाहं शक्तः शापं प्रत्यादातुं न हि मे मन्युरद्याप्युपशमं गच्छति किं चैतद्भवता न ज्ञायते । यथा ॥
taṃ pauṣyaḥ pratyuvāca na cāhaṃ śaktaḥ śāpaṃ pratyādātuṃ na hi me manyuradyāpyupaśamaṃ gacchati kiṃ caitadbhavatā na jñāyate | yathā
पौष्य ने उत्तर दिया — "मैं शाप वापस लेने में समर्थ नहीं हूँ, क्योंकि मेरा क्रोध अब तक शान्त नहीं हुआ। क्या आप यह नहीं जानते? जैसा कहा गया है —
श्लोक 122 (1.3.122)
नवनीतं हृदयं ब्राह्मणस्य । वाचि क्षुरो निहितस्तीक्ष्णधारः । तदुभयमेतद्विपरीतं क्षत्रियस्य । वाङ्नवनीतं हृदयं तीक्ष्णधारम् इति ॥
navanītaṃ hṛdayaṃ brāhmaṇasya | vāci kṣuro nihitastīkṣṇadhāraḥ | tadubhayametadviparītaṃ kṣatriyasya | vāṅnavanītaṃ hṛdayaṃ tīkṣṇadhāram iti
'ब्राह्मण का हृदय मक्खन-सा कोमल होता है, पर उसकी वाणी में तीखी धार वाला छुरा रखा रहता है। क्षत्रिय के लिए ये दोनों उलटे हैं — उसकी वाणी मक्खन-सी होती है और हृदय तीखी धार वाला।'
श्लोक 123 (1.3.123)
तदेवंगते न शक्तोऽहं तीक्ष्णहृदयत्वात्तं शापमन्यथाकर्तुं गम्यतामिति । तमुत्तङ्कः प्रत्युवाच ॥
tadevaṃgate na śakto'haṃ tīkṣṇahṛdayatvāttaṃ śāpamanyathākartuṃ gamyatāmiti | tamuttaṅkaḥ pratyuvāca
ऐसी स्थिति में, हृदय कठोर होने के कारण, मैं उस शाप को बदल नहीं सकता। आप जाइए।" तब उत्तङ्क ने उससे कहा —
श्लोक 124 (1.3.124)
भवताऽहमन्नस्याशुचिभावमालक्ष्य प्रत्यनुनीतः । प्राक् च तेऽभिहितं यस्माददुष्टमन्नं दूषयसि तस्मादनपत्यो भविष्यसीति । दुष्टे चान्ने नैष मम शापो भविष्यतीति ॥
bhavatā'hamannasyāśucibhāvamālakṣya pratyanunītaḥ | prāk ca te'bhihitaṃ yasmādaduṣṭamannaṃ dūṣayasi tasmādanapatyo bhaviṣyasīti | duṣṭe cānne naiṣa mama śāpo bhaviṣyatīti
"अन्न की अशुद्धता देखकर आपने मुझे मनाया है। और आपने पहले कहा था — 'तुम निर्दोष अन्न को दूषित बता रहे हो, इसलिए सन्तानहीन होगे।' पर अन्न तो सचमुच दूषित था, इसलिए आपका यह शाप मुझ पर नहीं लगेगा।"
श्लोक 125 (1.3.125)
साधयामस्तावदित्युक्त्वा प्रातिष्ठतोत्तङ्कस्ते कुण्डले गृहीत्वा । सोऽपश्यदथ पथि नग्नं क्षपणकमागच्छन्तं मुहुर्मुहुर्दृश्यमानमदृश्यमानं च ॥
sādhayāmastāvadityuktvā prātiṣṭhatottaṅkaste kuṇḍale gṛhītvā | so'paśyadatha pathi nagnaṃ kṣapaṇakamāgacchantaṃ muhurmuhurdṛśyamānamadṛśyamānaṃ ca
"अब मैं अपना कार्य साधता हूँ" — यह कहकर उत्तङ्क कुण्डल लेकर चल पड़ा। फिर मार्ग में उसने एक नग्न क्षपणक (भिक्षु) को आते देखा, जो बार-बार दिखाई देता और फिर अदृश्य हो जाता था।
श्लोक 126 (1.3.126)
अथोत्तङ्कस्ते कुण्डले संन्यस्य भूमावुदकार्थं प्रचक्रमे । एतस्मिन्नन्तरे स क्षपणकस्त्वरमाण उपसृत्य ते कुण्डले गृहीत्वा प्राद्रवत् ॥
athottaṅkaste kuṇḍale saṃnyasya bhūmāvudakārthaṃ pracakrame | etasminnantare sa kṣapaṇakastvaramāṇa upasṛtya te kuṇḍale gṛhītvā prādravat
तब उत्तङ्क कुण्डलों को भूमि पर रखकर जल-कार्य (शौच-आचमन) के लिए गया। इसी बीच वह क्षपणक फुर्ती से पास आया और कुण्डल उठाकर भाग गया।
श्लोक 127 (1.3.127)
तमुत्तङ्कोऽभिसृत्य कृतोदककार्यः शुचिः प्रयतो नमो देवेभ्यो गुरुभ्यश्च कृत्वा महता जवेन तमन्वयात् ॥
tamuttaṅko'bhisṛtya kṛtodakakāryaḥ śuciḥ prayato namo devebhyo gurubhyaśca kṛtvā mahatā javena tamanvayāt
उत्तङ्क ने जल-कार्य पूरा किया और शुद्ध तथा संयत होकर देवताओं और गुरुओं को नमस्कार करके बड़े वेग से उसका पीछा किया।
श्लोक 128 (1.3.128)
तस्य तक्षको दृढमासन्नः स तं जग्राह । गृहीतमात्रः स तद्रूपं विहाय तक्षकस्वरूपं कृत्वा सहसा धरण्यां विवृतं महाबिलं प्रविवेश ॥
tasya takṣako dṛḍhamāsannaḥ sa taṃ jagrāha | gṛhītamātraḥ sa tadrūpaṃ vihāya takṣakasvarūpaṃ kṛtvā sahasā dharaṇyāṃ vivṛtaṃ mahābilaṃ praviveśa
तक्षक अब उसके बिलकुल पास था, और उत्तङ्क ने उसे कसकर पकड़ लिया। पकड़े जाते ही उसने वह रूप त्यागकर अपना तक्षक-रूप धारण किया और सहसा धरती में खुले एक बड़े बिल में घुस गया।
श्लोक 129 (1.3.129)
प्रविश्य च नागलोकं स्वभवनमगच्छत् । अथोत्तङ्कस्तस्याः क्षत्रियाया वचः स्मृत्वा तं तक्षकमन्वगच्छत् ॥
praviśya ca nāgalokaṃ svabhavanamagacchat | athottaṅkastasyāḥ kṣatriyāyā vacaḥ smṛtvā taṃ takṣakamanvagacchat
नागलोक में प्रवेश करके वह अपने भवन में चला गया। तब उत्तङ्क रानी की बात स्मरण करके तक्षक के पीछे-पीछे गया।
श्लोक 130 (1.3.130)
स तद्बिलं दण्डकाष्ठेन चखान न चाशकत् । तं क्लिश्यमानमिन्द्रोऽपश्यत्स वज्रं प्रेषयामास । गच्छास्य ब्राह्मणस्य साहाय्यं कुरुष्वेति ॥
sa tadbilaṃ daṇḍakāṣṭhena cakhāna na cāśakat | taṃ kliśyamānamindro'paśyatsa vajraṃ preṣayāmāsa | gacchāsya brāhmaṇasya sāhāyyaṃ kuruṣveti
उसने लकड़ी के डंडे से उस बिल को खोदा, पर सफल न हो सका। उसे कष्ट उठाते देख इन्द्र ने अपना वज्र भेजा और कहा — "जाओ, इस ब्राह्मण की सहायता करो।"
श्लोक 131 (1.3.131)
अथ वज्रं दण्डकाष्ठमनुप्रविश्य तद्बिलमदारयत् ॥
atha vajraṃ daṇḍakāṣṭhamanupraviśya tadbilamadārayat
तब वज्र ने उस डंडे में प्रवेश करके बिल को फाड़ दिया।
श्लोक 132 (1.3.132)
तमुत्तङ्कोऽनुविवेश तेनैव बिलेन प्रविश्य च तं नागलोकमपर्यन्तमनेकविधप्रासादहर्म्यवलभीनिर्यूहशतसंकुलमुच्चावचक्रीडाश्चर्यस्थानावकीर्णमपश्यत् ॥
tamuttaṅko'nuviveśa tenaiva bilena praviśya ca taṃ nāgalokamaparyantamanekavidhaprāsādaharmyavalabhīniryūhaśatasaṃkulamuccāvacakrīḍāścaryasthānāvakīrṇamapaśyat
उत्तङ्क भी उसी बिल से भीतर गया। भीतर पहुँचकर उसने नागलोक देखा — जिसका कोई अन्त नहीं था, जो अनेक प्रकार के सैकड़ों प्रासादों, महलों, छज्जों और बुर्जों से भरा था, और छोटे-बड़े क्रीडा-स्थलों तथा आश्चर्यजनक स्थानों से युक्त था।
श्लोक 133 (1.3.133)
स तत्र नागांस्तानस्तुवदेभिः श्लोकैः । य ऐरावतराजानः सर्पाः समितिशोभनाः । क्षरन्त इव जीमूताः सविद्युत्पवनेरिताः ॥
sa tatra nāgāṃstānastuvadebhiḥ ślokaiḥ | ya airāvatarājānaḥ sarpāḥ samitiśobhanāḥ | kṣaranta iva jīmūtāḥ savidyutpavaneritāḥ
वहाँ उसने इन श्लोकों से उन नागों की स्तुति की — "ऐरावत जिनके राजा हैं, जो युद्ध में शोभा पाते हैं, वे सर्प बिजली से युक्त और वायु से प्रेरित बरसते मेघों के समान हैं।
उत्तङ्क उवाच
श्लोक 134 (1.3.134)
सुरूपा बहुरूपाश्च तथा कल्माषकुण्डलाः । आदित्यवन्नाकपृष्ठे रेजुरैरावतोद्भवाः ॥
surūpā bahurūpāśca tathā kalmāṣakuṇḍalāḥ | ādityavannākapṛṣṭhe rejurairāvatodbhavāḥ
सुन्दर और अनेक रूपों वाले, चितकबरे कुण्डल धारण किए हुए ऐरावत के वंशज स्वर्ग के शिखर पर सूर्य के समान चमक रहे थे।
श्लोक 135 (1.3.135)
बहूनि नागवेश्मानि गङ्गायास्तीर उत्तरे । तत्रस्थानपि संस्तौमि महतः पन्नगानहम् ॥
bahūni nāgaveśmāni gaṅgāyāstīra uttare | tatrasthānapi saṃstaumi mahataḥ pannagānaham
गङ्गा के उत्तरी तट पर नागों के अनेक निवास हैं; वहाँ रहने वाले महान नागों की भी मैं स्तुति करता हूँ।
श्लोक 136 (1.3.136)
इच्छेत्कोऽर्कांशुसेनायां चर्तुमैरावतं विना । शतान्यशीतिरष्टौ च सहस्राणि च विंशतिः ॥
icchetko'rkāṃśusenāyāṃ cartumairāvataṃ vinā | śatānyaśītiraṣṭau ca sahasrāṇi ca viṃśatiḥ
ऐरावत के सिवा सूर्य की किरणों की सेना के बीच कौन विचरना चाहेगा? बीस हज़ार आठ सौ अस्सी
श्लोक 137 (1.3.137)
सर्पाणां प्रग्रहा यान्ति धृतराष्ट्रो यदैजति । ये चैनमुपसर्पन्ति ये च दूरपथं गताः ॥
sarpāṇāṃ pragrahā yānti dhṛtarāṣṭro yadaijati | ye cainamupasarpanti ye ca dūrapathaṃ gatāḥ
सर्प धृतराष्ट्र (नाग) के चलने पर उसके अनुचर बनकर चलते हैं। जो उसके पास आते हैं और जो दूर के मार्ग पर चले गए हैं —
श्लोक 138 (1.3.138)
अहमैरावतज्येष्ठभ्रातृभ्योऽकरवं नमः । यस्य वासः कुरुक्षेत्रे खाण्डवे चाभवत्पुरा ॥
ahamairāvatajyeṣṭhabhrātṛbhyo'karavaṃ namaḥ | yasya vāsaḥ kurukṣetre khāṇḍave cābhavatpurā
उन भाइयों को, जिनमें ऐरावत ज्येष्ठ है, मैंने नमस्कार किया है। और जिसका निवास पहले कुरुक्षेत्र और खाण्डव वन में था —
श्लोक 139 (1.3.139)
तं नागराजमस्तौषं कुण्डलार्थाय तक्षकम् । तक्षकश्चाश्वसेनश्च नित्यं सहचरावुभौ ॥
taṃ nāgarājamastauṣaṃ kuṇḍalārthāya takṣakam | takṣakaścāśvasenaśca nityaṃ sahacarāvubhau
उस नागराज तक्षक की मैंने कुण्डलों के लिए स्तुति की है। तक्षक और अश्वसेन, जो सदा साथ रहने वाले हैं, दोनों
श्लोक 140 (1.3.140)
कुरुक्षेत्रं च वसतां नदीमिक्षुमतीमनु । जघन्यजस्तक्षकस्य श्रुतसेनेति यः सुतः ॥
kurukṣetraṃ ca vasatāṃ nadīmikṣumatīmanu | jaghanyajastakṣakasya śrutaseneti yaḥ sutaḥ
इक्षुमती नदी के किनारे कुरुक्षेत्र में रहते हैं। तक्षक का सबसे छोटा पुत्र, जो श्रुतसेन नाम से प्रसिद्ध है,
श्लोक 141 (1.3.141)
अवसद्यो महद्द्युम्नि प्रार्थयन्नागमुख्यताम् । करवाणि सदा चाहं नमस्तस्मै महात्मने ॥
avasadyo mahaddyumni prārthayannāgamukhyatām | karavāṇi sadā cāhaṃ namastasmai mahātmane
जो नागों में प्रधानता पाने की इच्छा से महद्द्युम्न नामक स्थान में रहता था — उस महात्मा को मैं सदा नमस्कार करता रहूँगा।"
सौतिरुवाच
श्लोक 142 (1.3.142)
एवं स्तुत्वा स विप्रर्षिरुत्तङ्को भुजगोत्तमान् । नैव ते कुण्डले लेभे ततश्चिन्तामुपागमत् ॥
evaṃ stutvā sa viprarṣiruttaṅko bhujagottamān | naiva te kuṇḍale lebhe tataścintāmupāgamat
इस प्रकार श्रेष्ठ नागों की स्तुति करके भी ब्रह्मर्षि उत्तङ्क को वे कुण्डल नहीं मिले, तब वह चिन्ता में पड़ गया।
श्लोक 143 (1.3.143)
एवं स्तुवन्नपि नागान्यदा ते कुण्डले नालभत्तदाऽपश्यत्स्त्रियौ तन्त्रे अधिरोप्य सुवेमे पटं वयन्त्यौ । तस्मिंस्तन्त्रे कृष्णाः सिताश्च तन्तवश्चक्रं चापश्यद्द्वादशारं षड्भिः कुमारैः परिवर्त्यमानं पुरुषं चापश्यदश्वं च दर्शनीयम् ॥
evaṃ stuvannapi nāgānyadā te kuṇḍale nālabhattadā'paśyatstriyau tantre adhiropya suveme paṭaṃ vayantyau | tasmiṃstantre kṛṣṇāḥ sitāśca tantavaścakraṃ cāpaśyaddvādaśāraṃ ṣaḍbhiḥ kumāraiḥ parivartyamānaṃ puruṣaṃ cāpaśyadaśvaṃ ca darśanīyam
जब इस प्रकार नागों की स्तुति करने पर भी उसे कुण्डल नहीं मिले, तब उसने दो स्त्रियों को देखा जो सुन्दर ढरकी वाले करघे पर वस्त्र चढ़ाकर बुन रही थीं। उस करघे में काले और सफ़ेद धागे थे। उसने बारह अरों वाला एक चक्र भी देखा जिसे छह कुमार घुमा रहे थे, और एक पुरुष तथा एक दर्शनीय घोड़ा भी देखा।
श्लोक 144 (1.3.144)
स तान्सर्वांस्तुष्टाव एभिर्मन्त्रवादश्लोकैः ॥
sa tānsarvāṃstuṣṭāva ebhirmantravādaślokaiḥ
उसने इन मन्त्र-रूपी श्लोकों से उन सबकी स्तुति की —
उत्तङ्क उवाच
श्लोक 145 (1.3.145)
त्रीण्यर्पितान्यत्र शतानि मध्ये । षष्टिश्च नित्यं चरति ध्रुवेऽस्मिन् । चक्रे चतुर्विंशतिपर्वयोगे । षड्वै कुमाराः परिवर्तयन्ति ॥
trīṇyarpitānyatra śatāni madhye | ṣaṣṭiśca nityaṃ carati dhruve'smin | cakre caturviṃśatiparvayoge | ṣaḍvai kumārāḥ parivartayanti
"इस अटल, निरन्तर घूमने वाले चक्र के मध्य में तीन सौ साठ (अरे) जुड़े हैं; चौबीस पर्वों (जोड़ों) वाले इस चक्र को छह कुमार घुमाते रहते हैं।
श्लोक 146 (1.3.146)
तन्त्रं चेदं विश्वरूपे युवत्यौ । वयतस्तन्तून्सततं वर्तयन्त्यौ । कृष्णान्सितांश्चैव विवर्तयन्त्यौ । भूतान्यजस्रं भुवनानि चैव ॥
tantraṃ cedaṃ viśvarūpe yuvatyau | vayatastantūnsatataṃ vartayantyau | kṛṣṇānsitāṃścaiva vivartayantyau | bhūtānyajasraṃ bhuvanāni caiva
और विश्वरूपा ये दो युवतियाँ इस करघे पर निरन्तर धागे घुमाती हुई बुनती हैं; काले और सफ़ेद धागों को फेरती हुई वे निरन्तर प्राणियों और लोकों की रचना करती रहती हैं।
श्लोक 147 (1.3.147)
वज्रस्य भर्ता भुवनस्य गोप्ता । वृत्रस्य हन्ता नमुचेर्निहन्ता । कृष्णे वसानो वसने महात्मा । सत्यानृते यो विविनक्ति लोके ॥
vajrasya bhartā bhuvanasya goptā | vṛtrasya hantā namucernihantā | kṛṣṇe vasāno vasane mahātmā | satyānṛte yo vivinakti loke
जो वज्र धारण करते हैं, लोक के रक्षक हैं, वृत्र का वध करने वाले और नमुचि के संहारक हैं; जो महात्मा दो काले वस्त्र पहनते हैं और संसार में सत्य और असत्य को अलग-अलग करते हैं;
श्लोक 148 (1.3.148)
यो वाजिनं गर्भमपां पुराणं । वैश्वानरं वाहनमभ्युपैति । नमोऽस्तु तस्मै जगदीश्वराय । लोकत्रयेशाय पुरंदराय ॥
yo vājinaṃ garbhamapāṃ purāṇaṃ | vaiśvānaraṃ vāhanamabhyupaiti | namo'stu tasmai jagadīśvarāya | lokatrayeśāya puraṃdarāya
जो जल से उत्पन्न प्राचीन अश्व वैश्वानर (अग्नि) को अपने वाहन के रूप में ग्रहण करते हैं — उन जगदीश्वर, तीनों लोकों के स्वामी पुरन्दर (इन्द्र) को नमस्कार है।"
सौतिरुवाच
श्लोक 149 (1.3.149)
ततः स एनं पुरुषः प्राह प्रीतोऽस्मि तेऽहमनेन स्तोत्रेण किं ते प्रियं करवाणीति । स तमुवाच नागा मे वशमीयुरिति ॥
tataḥ sa enaṃ puruṣaḥ prāha prīto'smi te'hamanena stotreṇa kiṃ te priyaṃ karavāṇīti | sa tamuvāca nāgā me vaśamīyuriti
तब उस पुरुष ने उससे कहा — "तुम्हारी इस स्तुति से मैं प्रसन्न हूँ। बताओ, तुम्हारा क्या प्रिय करूँ?" उसने कहा — "नाग मेरे वश में आ जाएँ।"
श्लोक 150 (1.3.150)
स चैनं पुरुषः पुनरुवाच एतमश्वमपाने धमस्वेति । ततोऽश्वस्यापानमधमत्ततोऽश्वाद्धम्यमानात्सर्वस्रोतोभ्यः पावकार्चिषः सधूमा निष्पेतुः ॥
sa cainaṃ puruṣaḥ punaruvāca etamaśvamapāne dhamasveti | tato'śvasyāpānamadhamattato'śvāddhamyamānātsarvasrotobhyaḥ pāvakārciṣaḥ sadhūmā niṣpetuḥ
उस पुरुष ने फिर कहा — "इस घोड़े की गुदा में फूँक मारो।" तब उसने घोड़े की गुदा में फूँका, और फूँके जाते घोड़े के सभी छिद्रों से धुएँ सहित आग की लपटें निकल पड़ीं।
श्लोक 151 (1.3.151)
ताभिर्नागलोक उपधूपितेऽथ संभ्रान्तस्तक्षकोऽग्नेस्तेजोभयाद्विषण्णः कुण्डले गृहीत्वा सहसा भवनान्निष्क्रम्योत्तङ्कमुवाच ॥
tābhirnāgaloka upadhūpite'tha saṃbhrāntastakṣako'gnestejobhayādviṣaṇṇaḥ kuṇḍale gṛhītvā sahasā bhavanānniṣkramyottaṅkamuvāca
उन लपटों के धुएँ से नागलोक भर गया। तब घबराया हुआ तक्षक अग्नि के तेज के भय से व्याकुल होकर कुण्डल लिए सहसा अपने भवन से निकला और उत्तङ्क से बोला —
श्लोक 152 (1.3.152)
इमे कुण्डले गृह्णातु भवानिति । स ते प्रतिजग्राहोत्तङ्कः प्रतिगृह्य च कुण्डलेऽचिन्तयत् ॥
ime kuṇḍale gṛhṇātu bhavāniti | sa te pratijagrāhottaṅkaḥ pratigṛhya ca kuṇḍale'cintayat
"आप ये कुण्डल ले लीजिए।" उत्तङ्क ने उन्हें ले लिया, और कुण्डल पाकर वह सोचने लगा —
श्लोक 153 (1.3.153)
अद्य तत्पुण्यकमुपाध्यायान्या दूरं चाहमभ्यागतः स कथं संभावयेयमिति ॥
adya tatpuṇyakamupādhyāyānyā dūraṃ cāhamabhyāgataḥ sa kathaṃ saṃbhāvayeyamiti
"आज ही गुरुपत्नी का वह पुण्य-कर्म है, और मैं बहुत दूर आ गया हूँ। मैं उसे समय पर कैसे पूरा कर सकूँगा?"
श्लोक 154 (1.3.154)
तत एनं चिन्तयानमेव स पुरुष उवाच । उत्तङ्क एनमेवाश्वमधिरोह त्वां क्षणेनैवोपाध्यायकुलं प्रापयिष्यतीति ॥
tata enaṃ cintayānameva sa puruṣa uvāca | uttaṅka enamevāśvamadhiroha tvāṃ kṣaṇenaivopādhyāyakulaṃ prāpayiṣyatīti
वह यह सोच ही रहा था कि उस पुरुष ने उससे कहा — "उत्तङ्क, इसी घोड़े पर चढ़ जाओ। यह तुम्हें क्षण-भर में गुरु के घर पहुँचा देगा।"
श्लोक 155 (1.3.155)
स तथेत्युक्त्वा तमश्वमधिरुह्य प्रत्याजगामोपाध्यायकुलं । उपाध्यायानी च स्नाता केशानावापयन्त्युपविष्टोत्तङ्को नागच्छतीति शापायास्य मनो दधे ॥
sa tathetyuktvā tamaśvamadhiruhya pratyājagāmopādhyāyakulaṃ | upādhyāyānī ca snātā keśānāvāpayantyupaviṣṭottaṅko nāgacchatīti śāpāyāsya mano dadhe
उसने "ठीक है" कहा और घोड़े पर चढ़कर गुरु के घर लौट आया। उधर गुरुपत्नी स्नान करके बैठी अपने केश सँवरवा रही थीं, और "उत्तङ्क नहीं आ रहा" — यह सोचकर उन्होंने उसे शाप देने का मन बना लिया था।
श्लोक 156 (1.3.156)
अथैतस्मिन्नन्तरे स उत्तङ्कः प्रविश्य उपाध्यायकुलं उपाध्यायानीमभ्यवादयत्ते चास्यै कुण्डले प्रायच्छत्सा चैनं प्रत्युवाच ॥
athaitasminnantare sa uttaṅkaḥ praviśya upādhyāyakulaṃ upādhyāyānīmabhyavādayatte cāsyai kuṇḍale prāyacchatsā cainaṃ pratyuvāca
इसी बीच उत्तङ्क ने गुरु के घर में प्रवेश किया, गुरुपत्नी को प्रणाम किया और उन्हें कुण्डल दे दिए। तब उन्होंने उससे कहा —
श्लोक 157 (1.3.157)
उत्तङ्क देशे कालेऽभ्यागतः स्वागतं ते वत्स इदानीं यद्यनागतोऽसि कोपितया मया शप्तो भविष्यसि श्रेयस्तवोपस्थितं सिद्धिमाप्नुहीति ॥
uttaṅka deśe kāle'bhyāgataḥ svāgataṃ te vatsa idānīṃ yadyanāgato'si kopitayā mayā śapto bhaviṣyasi śreyastavopasthitaṃ siddhimāpnuhīti
"उत्तङ्क, तुम ठीक स्थान पर और ठीक समय पर आ गए। वत्स, तुम्हारा स्वागत है। यदि तुम अभी न आते तो मैं क्रोध में आकर तुम्हें शाप दे देती। तुम्हारा कल्याण निकट है; तुम्हें सिद्धि प्राप्त हो।"
श्लोक 158 (1.3.158)
अथोत्तङ्क उपाध्यायमभ्यवादयत् । तमुपाध्यायः प्रत्युवाच वत्सोत्तङ्क स्वागतं ते किं चिरं कृतमिति ॥
athottaṅka upādhyāyamabhyavādayat | tamupādhyāyaḥ pratyuvāca vatsottaṅka svāgataṃ te kiṃ ciraṃ kṛtamiti
फिर उत्तङ्क ने गुरु को प्रणाम किया। गुरु ने उससे कहा — "वत्स उत्तङ्क, तुम्हारा स्वागत है। इतनी देर क्यों लगी?"
श्लोक 159 (1.3.159)
तमुत्तङ्क उपाध्यायं प्रत्युवाच । भोस्तक्षकेण मे नागराजेन विघ्नः कृतोऽस्मिन्कर्मणि तेनास्मि नागलोकं गतः ॥
tamuttaṅka upādhyāyaṃ pratyuvāca | bhostakṣakeṇa me nāgarājena vighnaḥ kṛto'sminkarmaṇi tenāsmi nāgalokaṃ gataḥ
उत्तङ्क ने गुरु से कहा — "भगवन्, नागराज तक्षक ने इस कार्य में विघ्न डाला, और उसी के कारण मुझे नागलोक जाना पड़ा।
श्लोक 160 (1.3.160)
तत्र च मया दृष्टे स्त्रियौ तन्त्रेऽधिरोप्य पटं वयन्त्यौ तस्मिंश्च कृष्णाः सिताश्च तन्तवः । किं तत् ॥
tatra ca mayā dṛṣṭe striyau tantre'dhiropya paṭaṃ vayantyau tasmiṃśca kṛṣṇāḥ sitāśca tantavaḥ | kiṃ tat
वहाँ मैंने दो स्त्रियों को देखा जो करघे पर वस्त्र चढ़ाकर बुन रही थीं, और उसमें काले और सफ़ेद धागे थे। वह क्या था?
श्लोक 161 (1.3.161)
तत्र च मया चक्रं दृष्टं द्वादशारं षट्चैनं कुमाराः परिवर्तयन्ति तदपि किं । पुरुषश्चापि मया दृष्टः स चापि कः । अश्वश्चातिप्रमाणो दृष्टः स चापि कः ॥
tatra ca mayā cakraṃ dṛṣṭaṃ dvādaśāraṃ ṣaṭcainaṃ kumārāḥ parivartayanti tadapi kiṃ | puruṣaścāpi mayā dṛṣṭaḥ sa cāpi kaḥ | aśvaścātipramāṇo dṛṣṭaḥ sa cāpi kaḥ
वहाँ मैंने बारह अरों वाला एक चक्र भी देखा, जिसे छह कुमार घुमा रहे थे — वह क्या था? मैंने एक पुरुष भी देखा — वह कौन था? और एक अत्यन्त विशाल घोड़ा देखा — वह कौन था?
श्लोक 162 (1.3.162)
पथि गच्छता च मया ऋषभो दृष्टस्तं च पुरुषोऽधिरूढस्तेनास्मि सोपचारमुक्त उत्तङ्कास्य ऋषभस्य पुरीषं भक्षय उपाध्यायेनापि ते भक्षितमिति ॥
pathi gacchatā ca mayā ṛṣabho dṛṣṭastaṃ ca puruṣo'dhirūḍhastenāsmi sopacāramukta uttaṅkāsya ṛṣabhasya purīṣaṃ bhakṣaya upādhyāyenāpi te bhakṣitamiti
और मार्ग में जाते हुए मैंने एक बैल देखा, जिस पर एक पुरुष सवार था। उसने मुझसे आदरपूर्वक कहा — "उत्तङ्क, इस बैल का गोबर खा लो; तुम्हारे गुरु ने भी इसे खाया है।"
श्लोक 163 (1.3.163)
ततस्तस्य वचनान्मया तदृषभस्य पुरीषमुपयुक्तं स चापि कः । तदेतद्भवतोपदिष्टमिच्छेयं श्रोतुं किं तदिति । स तेनैवमुक्त उपाध्यायः प्रत्युवाच ॥
tatastasya vacanānmayā tadṛṣabhasya purīṣamupayuktaṃ sa cāpi kaḥ | tadetadbhavatopadiṣṭamiccheyaṃ śrotuṃ kiṃ taditi | sa tenaivamukta upādhyāyaḥ pratyuvāca
उसके कहने पर मैंने उस बैल का गोबर खा लिया। वह कौन था? मैं आपसे सुनना चाहता हूँ कि यह सब क्या था।" उसके ऐसा कहने पर गुरु ने उत्तर दिया —
श्लोक 164 (1.3.164)
ये ते स्त्रियौ धाता विधाता च ये च ते कृष्णाः सितास्तन्तवस्ते रात्र्यहनी । यदपि तच्चक्रं द्वादशारं षट्कुमाराः परिवर्तयन्ति तेऽपि षड्ऋतवः द्वादशारा द्वादश मासाः संवत्सरश्चक्रम् ॥
ye te striyau dhātā vidhātā ca ye ca te kṛṣṇāḥ sitāstantavaste rātryahanī | yadapi taccakraṃ dvādaśāraṃ ṣaṭkumārāḥ parivartayanti te'pi ṣaḍṛtavaḥ dvādaśārā dvādaśa māsāḥ saṃvatsaraścakram
"वे दो स्त्रियाँ धाता और विधाता हैं, और वे काले-सफ़ेद धागे रात और दिन हैं। जिस बारह अरों वाले चक्र को छह कुमार घुमाते हैं — वे छह कुमार छह ऋतुएँ हैं, बारह अरे बारह महीने हैं, और वह चक्र संवत्सर (वर्ष) है।
श्लोक 165 (1.3.165)
यः पुरुषः स पर्जन्यः योऽश्वः सोऽग्निः य ऋषभस्त्वया पथि गच्छता दृष्टः स ऐरावतो नागराट् ॥
yaḥ puruṣaḥ sa parjanyaḥ yo'śvaḥ so'gniḥ ya ṛṣabhastvayā pathi gacchatā dṛṣṭaḥ sa airāvato nāgarāṭ
वह पुरुष पर्जन्य (वर्षा के देवता) है; वह घोड़ा अग्नि है; और मार्ग में जाते हुए तुमने जो बैल देखा, वह नागराज ऐरावत है।
श्लोक 166 (1.3.166)
यश्चैनमधिरूढः पुरुषः स चेन्द्रः यदपि ते भक्षितं तस्य ऋषभस्य पुरीषं तदमृतं तेन खल्वसि तस्मिन्नागभवने न व्यापन्नस्त्वम् ॥
yaścainamadhirūḍhaḥ puruṣaḥ sa cendraḥ yadapi te bhakṣitaṃ tasya ṛṣabhasya purīṣaṃ tadamṛtaṃ tena khalvasi tasminnāgabhavane na vyāpannastvam
उस पर सवार पुरुष इन्द्र हैं, और तुमने उस बैल का जो गोबर खाया वह अमृत था। इसी कारण तुम उस नागभवन में नष्ट नहीं हुए।
श्लोक 167 (1.3.167)
स हि भगवानिन्द्रो मम सखा त्वदनुक्रोशादिममनुग्रहं कृतवान् । तस्मात्कुण्डले गृहीत्वा पुनरागतोऽसि ॥
sa hi bhagavānindro mama sakhā tvadanukrośādimamanugrahaṃ kṛtavān | tasmātkuṇḍale gṛhītvā punarāgato'si
भगवान इन्द्र मेरे मित्र हैं; तुम पर करुणा करके उन्होंने यह अनुग्रह किया। इसी से तुम कुण्डल लेकर लौट आए हो।
श्लोक 168 (1.3.168)
तत्सौम्य गम्यतामनुजाने भवन्तं श्रेयोऽवाप्स्यसीति । स उपाध्यायेनानुज्ञातो भगवानुत्तङ्कः क्रुद्धस्तक्षकं प्रतिचिकीर्षमाणो हास्तिनपुरं प्रतस्थे ॥
tatsaumya gamyatāmanujāne bhavantaṃ śreyo'vāpsyasīti | sa upādhyāyenānujñāto bhagavānuttaṅkaḥ kruddhastakṣakaṃ praticikīrṣamāṇo hāstinapuraṃ pratasthe
अतः सौम्य, अब जाओ; मैं तुम्हें अनुमति देता हूँ। तुम्हारा कल्याण होगा।" गुरु की अनुमति पाकर पूज्य उत्तङ्क, तक्षक पर क्रुद्ध होकर उससे बदला लेने की इच्छा से, हस्तिनापुर की ओर चल पड़ा।
श्लोक 169 (1.3.169)
स हास्तिनपुरं प्राप्य नचिराद्विप्रसत्तमः । समागच्छत राजानमुत्तङ्को जनमेजयम् ॥
sa hāstinapuraṃ prāpya nacirādviprasattamaḥ | samāgacchata rājānamuttaṅko janamejayam
विप्रश्रेष्ठ उत्तङ्क शीघ्र ही हस्तिनापुर पहुँचकर राजा जनमेजय से मिला,
श्लोक 170 (1.3.170)
पुरा तक्षशिलासंस्थं निवृत्तमपराजितम् । सम्यग्विजयिनं दृष्ट्वा समन्तान्मन्त्रिभिर्वृतम् ॥
purā takṣaśilāsaṃsthaṃ nivṛttamaparājitam | samyagvijayinaṃ dṛṣṭvā samantānmantribhirvṛtam
जो पहले तक्षशिला से अपराजित होकर, पूर्ण विजय पाकर लौटे थे। उसने उन्हें चारों ओर से मन्त्रियों से घिरा देखा।
श्लोक 171 (1.3.171)
तस्मै जयाशिषः पूर्वं यथान्यायं प्रयुज्य सः । उवाचैनं वचः काले शब्दसंपन्नया गिरा ॥
tasmai jayāśiṣaḥ pūrvaṃ yathānyāyaṃ prayujya saḥ | uvācainaṃ vacaḥ kāle śabdasaṃpannayā girā
पहले उसने उन्हें यथाविधि विजय के आशीर्वाद दिए, फिर उचित अवसर पर शुद्ध और सुगठित वाणी में उनसे कहा —
उत्तङ्क उवाच
श्लोक 172 (1.3.172)
अन्यस्मिन्करणीये तु कार्ये पार्थिवसत्तम । बाल्यादिवान्यदेव त्वं कुरुषे नृपसत्तम ॥
anyasminkaraṇīye tu kārye pārthivasattama | bālyādivānyadeva tvaṃ kuruṣe nṛpasattama
"हे राजश्रेष्ठ, करने योग्य कार्य तो दूसरा है, पर हे नृपश्रेष्ठ, आप मानो बालबुद्धि से कुछ और ही कर रहे हैं।"
सौतिरुवाच
श्लोक 173 (1.3.173)
एवमुक्तस्तु विप्रेण स राजा जनमेजयः । अर्चयित्वा यथान्यायं प्रत्युवाच द्विजोत्तमम् ॥
evamuktastu vipreṇa sa rājā janamejayaḥ | arcayitvā yathānyāyaṃ pratyuvāca dvijottamam
ब्राह्मण के ऐसा कहने पर राजा जनमेजय ने उन श्रेष्ठ ब्राह्मण का यथाविधि पूजन करके उत्तर दिया —
जनमेजय उवाच
श्लोक 174 (1.3.174)
आसां प्रजानां परिपालनेन । स्वं क्षत्रधर्मं परिपालयामि । प्रब्रूहि मे किं करणीयमद्य । येनासि कार्येण समागतस्त्वम् ॥
āsāṃ prajānāṃ paripālanena | svaṃ kṣatradharmaṃ paripālayāmi | prabrūhi me kiṃ karaṇīyamadya | yenāsi kāryeṇa samāgatastvam
"इन प्रजाओं का पालन करके मैं अपने क्षत्रिय-धर्म का पालन करता हूँ। मुझे बताइए, आज क्या करना है? आप किस कार्य से पधारे हैं?"
सौतिरुवाच
श्लोक 175 (1.3.175)
स एवमुक्तस्तु नृपोत्तमेन । द्विजोत्तमः पुण्यकृतां वरिष्ठः । उवाच राजानमदीनसत्त्वं । स्वमेव कार्यं नृपते कुरुष्व ॥
sa evamuktastu nṛpottamena | dvijottamaḥ puṇyakṛtāṃ variṣṭhaḥ | uvāca rājānamadīnasattvaṃ | svameva kāryaṃ nṛpate kuruṣva
नृपश्रेष्ठ के ऐसा कहने पर पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ उस द्विजोत्तम ने अदम्य साहस वाले राजा से कहा — "हे राजन्, आप अपना ही कार्य कीजिए।
उत्तङ्क उवाच
श्लोक 176 (1.3.176)
तक्षकेण महीन्द्रेन्द्र येन ते हिंसितः पिता । तस्मै प्रतिकुरुष्व त्वं पन्नगाय दुरात्मने ॥
takṣakeṇa mahīndrendra yena te hiṃsitaḥ pitā | tasmai pratikuruṣva tvaṃ pannagāya durātmane
हे राजाधिराज, जिस तक्षक ने आपके पिता की हत्या की, उस दुष्टात्मा सर्प से आप बदला लीजिए।
श्लोक 177 (1.3.177)
कार्यकालं हि मन्येऽहं विधिदृष्टस्य कर्मणः । तद्गच्छापचितिं राजन्पितुस्तस्य महात्मनः ॥
kāryakālaṃ hi manye'haṃ vidhidṛṣṭasya karmaṇaḥ | tadgacchāpacitiṃ rājanpitustasya mahātmanaḥ
मेरे विचार में शास्त्रविहित कर्म का समय आ गया है। अतः हे राजन्, अपने महात्मा पिता का प्रतिशोध लीजिए।
श्लोक 178 (1.3.178)
तेन ह्यनपराधी स दष्टो दुष्टान्तरात्मना । पञ्चत्वमगमद्राजा वज्राहत इव द्रुमः ॥
tena hyanaparādhī sa daṣṭo duṣṭāntarātmanā | pañcatvamagamadrājā vajrāhata iva drumaḥ
उस दुष्ट-हृदय ने निरपराध राजा को डस लिया, और वे वज्र से आहत वृक्ष की भाँति मृत्यु को प्राप्त हुए।
श्लोक 179 (1.3.179)
बलदर्पसमुत्सिक्तस्तक्षकः पन्नगाधमः । अकार्यं कृतवान्पापो योऽदशत्पितरं तव ॥
baladarpasamutsiktastakṣakaḥ pannagādhamaḥ | akāryaṃ kṛtavānpāpo yo'daśatpitaraṃ tava
बल के घमण्ड में चूर, सर्पों में अधम उस पापी तक्षक ने न करने योग्य कर्म किया — उसने आपके पिता को डस लिया।
श्लोक 180 (1.3.180)
राजर्षिवंशगोप्तारममरप्रतिमं नृपम् । यियासुं काश्यपं चैव न्यवर्तयत पापकृत् ॥
rājarṣivaṃśagoptāramamarapratimaṃ nṛpam | yiyāsuṃ kāśyapaṃ caiva nyavartayata pāpakṛt
राजर्षियों के वंश के रक्षक, देवताओं के समान उस राजा के पास जाने को उद्यत काश्यप को भी उस पापी ने लौटा दिया।
श्लोक 181 (1.3.181)
होतुमर्हसि तं पापं ज्वलिते हव्यवाहने । सर्पसत्रे महाराज त्वरितं तद्विधीयताम् ॥
hotumarhasi taṃ pāpaṃ jvalite havyavāhane | sarpasatre mahārāja tvaritaṃ tadvidhīyatām
हे महाराज, सर्पसत्र में आप उस पापी की प्रज्वलित अग्नि में आहुति दें। इसकी व्यवस्था शीघ्र की जाए।
श्लोक 182 (1.3.182)
एवं पितुश्चापचितिं कृतवांस्त्वं भविष्यसि । मम प्रियं च सुमहत्कृतं राजन् भविष्यति ॥
evaṃ pituścāpacitiṃ kṛtavāṃstvaṃ bhaviṣyasi | mama priyaṃ ca sumahatkṛtaṃ rājan bhaviṣyati
इस प्रकार आप अपने पिता का प्रतिशोध भी ले लेंगे, और हे राजन्, मेरा भी बहुत बड़ा प्रिय कार्य हो जाएगा।
श्लोक 183 (1.3.183)
कर्मणः पृथिवीपाल मम येन दुरात्मना । विघ्नः कृतो महाराज गुर्वर्थं चरतोऽनघ ॥
karmaṇaḥ pṛthivīpāla mama yena durātmanā | vighnaḥ kṛto mahārāja gurvarthaṃ carato'nagha
क्योंकि हे पृथ्वीपालक, हे निष्पाप महाराज, जब मैं गुरु के लिए कार्य कर रहा था, तब उसी दुष्टात्मा ने मेरे कार्य में विघ्न डाला था।"
सौतिरुवाच
श्लोक 184 (1.3.184)
एतच्छ्रुत्वा तु नृपतिस्तक्षकाय चुकोप ह । उत्तङ्कवाक्यहविषा दीप्तोऽग्निर्हविषा यथा ॥
etacchrutvā tu nṛpatistakṣakāya cukopa ha | uttaṅkavākyahaviṣā dīpto'gnirhaviṣā yathā
यह सुनकर राजा तक्षक पर कुपित हो उठे — जैसे आहुति पाकर अग्नि भड़क उठती है, वैसे ही उत्तङ्क के वचन-रूपी हवि से वे प्रज्वलित हो गए।
श्लोक 185 (1.3.185)
अपृच्छत्स तदा राजा मन्त्रिणः स्वान्सुदुःखितः । उत्तङ्कस्यैव सांनिध्ये पितुः स्वर्गगतिं प्रति ॥
apṛcchatsa tadā rājā mantriṇaḥ svānsuduḥkhitaḥ | uttaṅkasyaiva sāṃnidhye pituḥ svargagatiṃ prati
तब अत्यन्त दुःखी होकर राजा ने उत्तङ्क के सामने ही अपने मन्त्रियों से पिता के स्वर्गवास के विषय में पूछा।
श्लोक 186 (1.3.186)
तदैव हि स राजेन्द्रो दुःखशोकाप्लुतोऽभवत् । यदैव वृत्तं पितरमुत्तङ्कादशृणोत्तदा ॥
tadaiva hi sa rājendro duḥkhaśokāpluto'bhavat | yadaiva vṛttaṃ pitaramuttaṅkādaśṛṇottadā
जिस क्षण उन्होंने उत्तङ्क से अपने पिता के साथ हुई घटना सुनी, उसी क्षण वे राजेन्द्र दुःख और शोक में डूब गए।