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आदि पर्व · अध्याय 60

जनमेजय के यज्ञ में व्यास का आगमन

यह सुनकर कि जनमेजय सर्पसत्र के लिए दीक्षित हुए हैं, कृष्णद्वैपायन व्यास अपने शिष्यों के साथ वहाँ आते हैं। सौति बताते हैं कि व्यास कौन हैं — पराशर और कुमारी काली के पुत्र, जिन्होंने एक वेद को चार भागों में बाँटा और पाण्डु, धृतराष्ट्र तथा विदुर को जन्म दिया। राजा उनका स्वागत और पूजन करते हैं, फिर पूछते हैं कि कौरवों और पाण्डवों में फूट कैसे पड़ी और उनका महायुद्ध कैसे हुआ। व्यास अपने शिष्य वैशम्पायन से सब कुछ सुनाने को कहते हैं, और वैशम्पायन वह प्राचीन इतिहास सुनाने लगते हैं।

अध्याय 59अध्याय-सूचीअध्याय 61

सौतिरुवाच

श्लोक 1 (1.60.1)

श्रुत्वा तु सर्पसत्राय दीक्षितं जनमेजयम् । अभ्यगच्छदृषिर्विद्वान्कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥

śrutvā tu sarpasatrāya dīkṣitaṃ janamejayam | abhyagacchadṛṣirvidvānkṛṣṇadvaipāyanastadā

यह सुनकर कि जनमेजय सर्पसत्र के लिए दीक्षित हुए हैं, विद्वान् महर्षि कृष्णद्वैपायन वहाँ आए।

श्लोक 2 (1.60.2)

जनयामास यं काली शक्तेः पुत्रात्पराशरात् । कन्यैव यमुनाद्वीपे पाण्डवानां पितामहम् ॥

janayāmāsa yaṃ kālī śakteḥ putrātparāśarāt | kanyaiva yamunādvīpe pāṇḍavānāṃ pitāmaham

वे ही, जिन्हें काली ने कुमारी अवस्था में ही यमुना के द्वीप पर शक्ति-पुत्र पराशर से जन्म दिया था — पाण्डवों के पितामह।

श्लोक 3 (1.60.3)

जातमात्रश्च यः सद्य इष्ट्या देहमवीवृधत् । वेदांश्चाधिजगे साङ्गान्सेतिहासान्महायशाः ॥

jātamātraśca yaḥ sadya iṣṭyā dehamavīvṛdhat | vedāṃścādhijage sāṅgānsetihāsānmahāyaśāḥ

जन्म लेते ही उन्होंने अपनी इच्छा से अपने शरीर को तुरन्त बढ़ा लिया, और उन महायशस्वी ने अंगों और इतिहासों सहित वेदों का अध्ययन कर लिया।

श्लोक 4 (1.60.4)

यं नाति तपसा कश्चिन्न वेदाध्ययनेन च । न व्रतैर्नोपवासैश्च न प्रसूत्या न मन्युना ॥

yaṃ nāti tapasā kaścinna vedādhyayanena ca | na vratairnopavāsaiśca na prasūtyā na manyunā

तप में, वेदाध्ययन में, व्रतों में, उपवासों में, सन्तान में या तेजस्विता में कोई भी उनसे बढ़कर नहीं है।

श्लोक 5 (1.60.5)

विव्यासैकं चतुर्धा यो वेदं वेदविदां वरः । परावरज्ञो ब्रह्मर्षिः कविः सत्यव्रतः शुचिः ॥

vivyāsaikaṃ caturdhā yo vedaṃ vedavidāṃ varaḥ | parāvarajño brahmarṣiḥ kaviḥ satyavrataḥ śuciḥ

वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ उन्होंने एक वेद को चार भागों में विभक्त किया; वे परावर के ज्ञाता ब्रह्मर्षि, कवि, सत्यव्रती और पवित्र हैं।

श्लोक 6 (1.60.6)

यः पाण्डुं धृतराष्ट्रं च विदुरं चाप्यजीजनत् । शन्तनोः संततिं तन्वन्पुण्यकीर्तिर्महायशाः ॥

yaḥ pāṇḍuṃ dhṛtarāṣṭraṃ ca viduraṃ cāpyajījanat | śantanoḥ saṃtatiṃ tanvanpuṇyakīrtirmahāyaśāḥ

पवित्र कीर्ति वाले उन महायशस्वी ने शान्तनु की वंश-परम्परा को आगे बढ़ाते हुए पाण्डु, धृतराष्ट्र और विदुर को जन्म दिया।

श्लोक 7 (1.60.7)

जनमेजयस्य राजर्षेः स महात्मा सदस्तथा । विवेश सहितः शिष्यैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥

janamejayasya rājarṣeḥ sa mahātmā sadastathā | viveśa sahitaḥ śiṣyairvedavedāṅgapāragaiḥ

वे महात्मा वेदों और वेदांगों में पारंगत अपने शिष्यों के साथ राजर्षि जनमेजय की सभा में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 8 (1.60.8)

तत्र राजानमासीनं ददर्श जनमेजयम् । वृतं सदस्यैर्बहुभिर्देवैरिव पुरन्दरम् ॥

tatra rājānamāsīnaṃ dadarśa janamejayam | vṛtaṃ sadasyairbahubhirdevairiva purandaram

वहाँ उन्होंने राजा जनमेजय को बैठे देखा, जो बहुत-से सदस्यों से उसी प्रकार घिरे थे जैसे देवताओं से इन्द्र,

श्लोक 9 (1.60.9)

तथा मूर्धाभिषिक्तैश्च नानाजनपदेश्वरैः । ऋत्विग्भिर्ब्रह्मकल्पैश्च कुशलैर्यज्ञसंस्तरे ॥

tathā mūrdhābhiṣiktaiśca nānājanapadeśvaraiḥ | ṛtvigbhirbrahmakalpaiśca kuśalairyajñasaṃstare

तथा अनेक देशों के अभिषिक्त राजाओं से, और यज्ञ के विधान में कुशल, ब्रह्मा के समान ऋत्विजों से घिरे थे।

श्लोक 10 (1.60.10)

जनमेजयस्तु राजर्षिर्दृष्ट्वा तमृषिमागतम् । सगणोऽभ्युद्ययौ तूर्णं प्रीत्या भरतसत्तमः ॥

janamejayastu rājarṣirdṛṣṭvā tamṛṣimāgatam | sagaṇo'bhyudyayau tūrṇaṃ prītyā bharatasattamaḥ

भरतश्रेष्ठ राजर्षि जनमेजय उन ऋषि को आया देखकर अपने अनुचरों सहित तुरन्त उठे और प्रेमपूर्वक उनकी अगवानी के लिए आगे बढ़े।

श्लोक 11 (1.60.11)

काञ्चनं विष्टरं तस्मै सदस्यानुमतः प्रभुः । आसनं कल्पयामास यथा शक्रो बृहस्पतेः ॥

kāñcanaṃ viṣṭaraṃ tasmai sadasyānumataḥ prabhuḥ | āsanaṃ kalpayāmāsa yathā śakro bṛhaspateḥ

सदस्यों की अनुमति से राजा ने उनके लिए सोने का आसन बिछवाया, जैसे इन्द्र बृहस्पति के लिए बिछवाते हैं।

श्लोक 12 (1.60.12)

तत्रोपविष्टं वरदं देवर्षिगणपूजितम् । पूजयामास राजेन्द्रः शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥

tatropaviṣṭaṃ varadaṃ devarṣigaṇapūjitam | pūjayāmāsa rājendraḥ śāstradṛṣṭena karmaṇā

देवर्षियों द्वारा पूजित वे वरदाता जब उस पर बैठ गए, तब राजेन्द्र ने शास्त्रविधि के अनुसार उनका पूजन किया।

श्लोक 13 (1.60.13)

पाद्यमाचमनीयं च अर्घ्यं गां च विधानतः । पितामहाय कृष्णाय तदर्हाय न्यवेदयत् ॥

pādyamācamanīyaṃ ca arghyaṃ gāṃ ca vidhānataḥ | pitāmahāya kṛṣṇāya tadarhāya nyavedayat

उन्होंने अपने पितामह कृष्णद्वैपायन को, जो इनके अधिकारी थे, विधिपूर्वक पाद्य, आचमनीय, अर्घ्य और गौ अर्पित की।

श्लोक 14 (1.60.14)

प्रतिगृह्य तु तां पूजां पाण्डवाज्जनमेजयात् । गां चैव समनुज्ञाय व्यासः प्रीतोऽभवत्तदा ॥

pratigṛhya tu tāṃ pūjāṃ pāṇḍavājjanamejayāt | gāṃ caiva samanujñāya vyāsaḥ prīto'bhavattadā

पाण्डववंशी जनमेजय से वह पूजा ग्रहण करके और गौ के विषय में अनुमति देकर व्यास तब प्रसन्न हुए।

श्लोक 15 (1.60.15)

तथा च पूजयित्वा तं प्रणयात्प्रपितामहम् । उपोपविश्य प्रीतात्मा पर्यपृच्छदनामयम् ॥

tathā ca pūjayitvā taṃ praṇayātprapitāmaham | upopaviśya prītātmā paryapṛcchadanāmayam

इस प्रकार प्रेमपूर्वक अपने प्रपितामह का पूजन करके राजा प्रसन्नचित्त होकर उनके निकट बैठ गए और उनका कुशल-क्षेम पूछा।

श्लोक 16 (1.60.16)

भगवानपि तं दृष्ट्वा कुशलं प्रतिवेद्य च । सदस्यैः पूजितः सर्वैः सदस्यान्प्रत्यपूजयत् ॥

bhagavānapi taṃ dṛṣṭvā kuśalaṃ prativedya ca | sadasyaiḥ pūjitaḥ sarvaiḥ sadasyānpratyapūjayat

भगवान् व्यास ने भी उनकी ओर देखकर अपना कुशल बताया, और सब सदस्यों से सम्मानित होकर उन्होंने भी सदस्यों का सम्मान किया।

श्लोक 17 (1.60.17)

ततस्तु सहितः सर्वैः सदस्यैर्जनमेजयः । इदं पश्चाद्द्विजश्रेष्ठं पर्यपृच्छत्कृताञ्जलिः ॥

tatastu sahitaḥ sarvaiḥ sadasyairjanamejayaḥ | idaṃ paścāddvijaśreṣṭhaṃ paryapṛcchatkṛtāñjaliḥ

तब सब सदस्यों के साथ जनमेजय ने हाथ जोड़कर उन द्विजश्रेष्ठ से यह पूछा —

जनमेजय उवाच

श्लोक 18 (1.60.18)

कुरूणां पाण्डवानां च भवान्प्रत्यक्षदर्शिवान् । तेषां चरितमिच्छामि कथ्यमानं त्वया द्विज ॥

kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca bhavānpratyakṣadarśivān | teṣāṃ caritamicchāmi kathyamānaṃ tvayā dvija

हे द्विज, आपने कौरवों और पाण्डवों को अपनी आँखों से देखा है। मैं उनका चरित्र आपके मुख से सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 19 (1.60.19)

कथं समभवद्भेदस्तेषामक्लिष्टकर्मणाम् । तच्च युद्धं कथं वृत्तं भूतान्तकरणं महत् ॥

kathaṃ samabhavadbhedasteṣāmakliṣṭakarmaṇām | tacca yuddhaṃ kathaṃ vṛttaṃ bhūtāntakaraṇaṃ mahat

अनिन्द्य कर्म करने वाले उन लोगों में फूट कैसे पड़ी? और प्राणियों का संहार करने वाला वह महायुद्ध कैसे हुआ,

श्लोक 20 (1.60.20)

पितामहानां सर्वेषां दैवेनाविष्टचेतसाम् । कार्त्स्न्येनैतन्ममाचक्ष्व यथा वृत्तं द्विजोत्तम । इच्छामि तत्त्वतः श्रोतुं भगवन्कुशलो ह्यसि ॥

pitāmahānāṃ sarveṣāṃ daivenāviṣṭacetasām | kārtsnyenaitanmamācakṣva yathā vṛttaṃ dvijottama | icchāmi tattvataḥ śrotuṃ bhagavankuśalo hyasi

मेरे उन सब पितामहों में, जिनके मन दैव के वश में हो गए थे? हे द्विजोत्तम, जैसा हुआ था वह सब पूरा-पूरा मुझे बताइए। हे भगवन्, मैं इसे यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ, क्योंकि आप इसमें कुशल हैं।

सौतिरुवाच

श्लोक 21 (1.60.21)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कृष्णद्वैपायनस्तदा । शशास शिष्यमासीनं वैशंपायनमन्तिके ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā kṛṣṇadvaipāyanastadā | śaśāsa śiṣyamāsīnaṃ vaiśaṃpāyanamantike

उनकी यह बात सुनकर कृष्णद्वैपायन ने पास बैठे अपने शिष्य वैशम्पायन को आदेश दिया —

व्यास उवाच

श्लोक 22 (1.60.22)

कुरूणां पाण्डवानां च यथा भेदोऽभवत्पुरा । तदस्मै सर्वमाचक्ष्व यन्मत्तः श्रुतवानसि ॥

kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca yathā bhedo'bhavatpurā | tadasmai sarvamācakṣva yanmattaḥ śrutavānasi

कौरवों और पाण्डवों में पहले जिस प्रकार फूट पड़ी थी, वह सब, जैसा तुमने मुझसे सुना है, इन्हें सुनाओ।

सौतिरुवाच

श्लोक 23 (1.60.23)

गुरोर्वचनमाज्ञाय स तु विप्रर्षभस्तदा । आचचक्षे ततः सर्वमितिहासं पुरातनम् ॥

gurorvacanamājñāya sa tu viprarṣabhastadā | ācacakṣe tataḥ sarvamitihāsaṃ purātanam

गुरु की आज्ञा मानकर उन श्रेष्ठ ब्राह्मण ने तब वह सम्पूर्ण प्राचीन इतिहास सुनाया

श्लोक 24 (1.60.24)

राज्ञे तस्मै सदस्येभ्यः पार्थिवेभ्यश्च सर्वशः । भेदं सर्वविनाशं च कुरुपाण्डवयोस्तदा ॥

rājñe tasmai sadasyebhyaḥ pārthivebhyaśca sarvaśaḥ | bhedaṃ sarvavināśaṃ ca kurupāṇḍavayostadā

राजा को, सदस्यों को और वहाँ उपस्थित सब राजाओं को — कौरवों और पाण्डवों के बीच की फूट और सबके विनाश की कथा।

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