आदि पर्व · अध्याय 61
कौरव-पाण्डव विरोध की संक्षिप्त कथा
अपने गुरु व्यास को प्रणाम करके वैशम्पायन जनमेजय को पूरी कथा की रूपरेखा सुनाते हुए भारत-कथा आरम्भ करते हैं। वे बताते हैं कि दुर्योधन ने भीम को विष देकर और जल में फेंककर मारना चाहा और पाण्डवों को लाक्षागृह में भिजवाया, जहाँ से विदुर ने उन्हें बचाया; फिर उन्होंने हिडिम्ब और बक को मारा, द्रौपदी को पाया और खाण्डवप्रस्थ में बसकर चारों दिशाएँ जीतीं; अर्जुन ने सुभद्रा से विवाह किया, खाण्डव-दाह में गाण्डीव धनुष पाया और मय को बचाया, जिसने सभा बनाई। यह रूपरेखा द्यूत, वनवास, युद्ध और पाण्डवों के अन्तिम महाप्रस्थान तक चलती है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.61.1)
शृणु राजन्यथा वीरा भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः । विरोधमन्वगच्छन्त धार्तराष्ट्रैर्दुरात्मभिः ॥
śṛṇu rājanyathā vīrā bhrātaraḥ pañca pāṇḍavāḥ | virodhamanvagacchanta dhārtarāṣṭrairdurātmabhiḥ
हे राजन्, सुनो कि पाँचों वीर पाण्डव भाइयों का दुष्टात्मा धृतराष्ट्र-पुत्रों से विरोध कैसे हुआ।
श्लोक 2 (1.61.2)
गुरवे प्राङ्नमस्कृत्य मनोबुद्धिसमाधिभिः । संपूज्य च द्विजान्सर्वांस्तथान्यान्विदुषो जनान् ॥
gurave prāṅnamaskṛtya manobuddhisamādhibhiḥ | saṃpūjya ca dvijānsarvāṃstathānyānviduṣo janān
पहले मन, बुद्धि और एकाग्रता के साथ अपने गुरु को प्रणाम करके, और सब ब्राह्मणों तथा अन्य विद्वानों का सम्मान करके,
श्लोक 3 (1.61.3)
महर्षेर्विश्रुतस्येह सर्वलोकेषु धीमतः । प्रवक्ष्यामि मतं कृत्स्नं व्यासस्यामिततेजसः ॥
maharṣerviśrutasyeha sarvalokeṣu dhīmataḥ | pravakṣyāmi mataṃ kṛtsnaṃ vyāsasyāmitatejasaḥ
मैं सब लोकों में प्रसिद्ध, बुद्धिमान और अपार तेज वाले महर्षि व्यास के सम्पूर्ण मत का वर्णन करूँगा।
श्लोक 4 (1.61.4)
श्रोतुं पात्रं च राजंस्त्वं प्राप्येमां भारतीं कथाम् । गुरोर्वक्त्रपरिस्पन्दो मनः प्रोत्साहतीव मे ॥
śrotuṃ pātraṃ ca rājaṃstvaṃ prāpyemāṃ bhāratīṃ kathām | gurorvaktraparispando manaḥ protsāhatīva me
हे राजन्, तुम इसे सुनने के योग्य पात्र हो, और इस भारती कथा को पाकर गुरु के मुख से निकली वाणी का स्पन्दन मानो मेरे मन को उत्साहित कर रहा है।
श्लोक 5 (1.61.5)
शृणु राजन्यथा भेदः कुरुपाण्डवयोरभूत् । राज्यार्थे द्यूतसंभूतो वनवासस्तथैव च ॥
śṛṇu rājanyathā bhedaḥ kurupāṇḍavayorabhūt | rājyārthe dyūtasaṃbhūto vanavāsastathaiva ca
हे राजन्, सुनो कि कौरवों और पाण्डवों में फूट कैसे पड़ी — राज्य के लिए हुआ जुआ, और वैसे ही वनवास —
श्लोक 6 (1.61.6)
यथा च युद्धमभवत्पृथिवीक्षयकारकम् । तत्तेऽहं कथयिष्यामि पृच्छते भरतर्षभ ॥
yathā ca yuddhamabhavatpṛthivīkṣayakārakam | tatte'haṃ kathayiṣyāmi pṛcchate bharatarṣabha
और पृथ्वी का विनाश करने वाला युद्ध कैसे हुआ। हे भरतश्रेष्ठ, तुम पूछ रहे हो, इसलिए मैं तुम्हें यह सब बताऊँगा।
श्लोक 7 (1.61.7)
मृते पितरि ते वीरा वनादेत्य स्वमन्दिरम् । नचिरादेव विद्वांसो वेदे धनुषि चाभवन् ॥
mṛte pitari te vīrā vanādetya svamandiram | nacirādeva vidvāṃso vede dhanuṣi cābhavan
पिता की मृत्यु के बाद वे वीर वन से अपने घर लौट आए, और शीघ्र ही वेद तथा धनुर्विद्या में पारंगत हो गए।
श्लोक 8 (1.61.8)
तांस्तथा सत्ववीर्यौजःसंपन्नान्पौरसंमतान् । नामृष्यन्कुरवो दृष्ट्वा पाण्डवाञ्श्रीयशोभृतः ॥
tāṃstathā satvavīryaujaḥsaṃpannānpaurasaṃmatān | nāmṛṣyankuravo dṛṣṭvā pāṇḍavāñśrīyaśobhṛtaḥ
साहस, पराक्रम और ओज से सम्पन्न, पुरवासियों के प्रिय तथा लक्ष्मी और यश धारण करने वाले पाण्डवों को देखकर कौरव सहन न कर सके।
श्लोक 9 (1.61.9)
ततो दुर्योधनः क्रूरः कर्णश्च सहसौबलः । तेषां निग्रहनिर्वासान्विविधांस्ते समारभन् ॥
tato duryodhanaḥ krūraḥ karṇaśca sahasaubalaḥ | teṣāṃ nigrahanirvāsānvividhāṃste samārabhan
तब क्रूर दुर्योधन ने कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि के साथ मिलकर उन्हें दबाने और निकाल देने के अनेक उपाय आरम्भ किए।
श्लोक 10 (1.61.10)
ततो दुर्योधनः क्रूरः कुलिङ्गस्य मते स्थितः । पाण्डवान्विविधोपायै राज्यहेतोरपीडयत् ॥
tato duryodhanaḥ krūraḥ kuliṅgasya mate sthitaḥ | pāṇḍavānvividhopāyai rājyahetorapīḍayat
तब क्रूर दुर्योधन ने कुलिङ्ग की सलाह पर चलते हुए राज्य के लिए अनेक उपायों से पाण्डवों को सताया।
श्लोक 11 (1.61.11)
ददावथ विषं पापो भीमाय धृतराष्ट्रजः । जरयामास तद्वीरः सहान्नेन वृकोदरः ॥
dadāvatha viṣaṃ pāpo bhīmāya dhṛtarāṣṭrajaḥ | jarayāmāsa tadvīraḥ sahānnena vṛkodaraḥ
फिर उस पापी धृतराष्ट्र-पुत्र ने भीम को विष दे दिया; पर वीर वृकोदर उसे अन्न के साथ ही पचा गए।
श्लोक 12 (1.61.12)
प्रमाणकोट्यां संसुप्तं पुनर्बद्ध्वा वृकोदरम् । तोयेषु भीमं गङ्गायाः प्रक्षिप्य पुरमाव्रजत् ॥
pramāṇakoṭyāṃ saṃsuptaṃ punarbaddhvā vṛkodaram | toyeṣu bhīmaṃ gaṅgāyāḥ prakṣipya puramāvrajat
फिर प्रमाणकोटि में सोए हुए वृकोदर को बाँधकर उसने भीम को गंगा के जल में फेंक दिया और नगर लौट आया।
श्लोक 13 (1.61.13)
यदा विबुद्धः कौन्तेयस्तदा संछिद्य बन्धनम् । उदतिष्ठन्महाबाहुर्भीमसेनो गतव्यथः ॥
yadā vibuddhaḥ kaunteyastadā saṃchidya bandhanam | udatiṣṭhanmahābāhurbhīmaseno gatavyathaḥ
जब कुन्तीपुत्र जागे, तब बन्धन तोड़कर महाबाहु भीमसेन बिना किसी पीड़ा के उठ खड़े हुए।
श्लोक 14 (1.61.14)
आशीविषैः कृष्णसर्पैः सुप्तं चैनमदंशयत् । सर्वेष्वेवाङ्गदेशेषु न ममार स शत्रुहा ॥
āśīviṣaiḥ kṛṣṇasarpaiḥ suptaṃ cainamadaṃśayat | sarveṣvevāṅgadeśeṣu na mamāra sa śatruhā
उसने सोते हुए भीम को विषैले काले साँपों से उनके सारे अंगों में डँसवाया; फिर भी वह शत्रुनाशक नहीं मरे।
श्लोक 15 (1.61.15)
तेषां तु विप्रकारेषु तेषु तेषु महामतिः । मोक्षणे प्रतिकारे च विदुरोऽवहितोऽभवत् ॥
teṣāṃ tu viprakāreṣu teṣu teṣu mahāmatiḥ | mokṣaṇe pratikāre ca viduro'vahito'bhavat
उन सभी अत्याचारों में महाबुद्धिमान विदुर उन्हें छुड़ाने और उनका प्रतिकार करने में सदा सावधान रहे।
श्लोक 16 (1.61.16)
स्वर्गस्थो जीवलोकस्य यथा शक्रः सुखावहः । पाण्डवानां तथा नित्यं विदुरोऽपि सुखावहः ॥
svargastho jīvalokasya yathā śakraḥ sukhāvahaḥ | pāṇḍavānāṃ tathā nityaṃ viduro'pi sukhāvahaḥ
जैसे स्वर्ग में स्थित इन्द्र जीवलोक को सुख देते हैं, वैसे ही विदुर भी सदा पाण्डवों को सुख देते रहे।
श्लोक 17 (1.61.17)
यदा तु विविधोपायैः संवृतैर्विवृतैरपि । नाशकद्विनिहन्तुं तान्दैवभाव्यर्थरक्षितान् ॥
yadā tu vividhopāyaiḥ saṃvṛtairvivṛtairapi | nāśakadvinihantuṃ tāndaivabhāvyartharakṣitān
पर जब छिपे और खुले अनेक उपायों से भी वह उन्हें मार न सका, क्योंकि भावी दैव उनकी रक्षा कर रहा था,
श्लोक 18 (1.61.18)
ततः संमन्त्र्य सचिवैर्वृषदुःशासनादिभिः । धृतराष्ट्रमनुज्ञाप्य जातुषं गृहमादिशत् ॥
tataḥ saṃmantrya sacivairvṛṣaduḥśāsanādibhiḥ | dhṛtarāṣṭramanujñāpya jātuṣaṃ gṛhamādiśat
तब वृष (कर्ण), दुःशासन आदि मन्त्रियों से सलाह करके और धृतराष्ट्र की अनुमति लेकर उसने लाख का घर बनवाने की आज्ञा दी।
श्लोक 19 (1.61.19)
तत्र तान्वासयामास पाण्डवानमितौजसः । सुतप्रियैषी तान्राजा पाण्डवानम्बिकासुतः । ततो विवासयामास राज्यभोगबुभुक्षया ॥
tatra tānvāsayāmāsa pāṇḍavānamitaujasaḥ | sutapriyaiṣī tānrājā pāṇḍavānambikāsutaḥ | tato vivāsayāmāsa rājyabhogabubhukṣayā
उसने अपार तेजस्वी पाण्डवों को वहाँ ठहराया। अपने पुत्र का प्रिय चाहने वाले अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र ने राज्य-भोग की लालसा से पाण्डवों को नगर से बाहर भेज दिया।
श्लोक 20 (1.61.20)
ते प्रातिष्ठन्त सहिता नगरान्नागसाह्वयात् । प्रस्थाने चाभवन्मन्त्री क्षत्ता तेषां महात्मनाम् ॥
te prātiṣṭhanta sahitā nagarānnāgasāhvayāt | prasthāne cābhavanmantrī kṣattā teṣāṃ mahātmanām
वे सब एक साथ हस्तिनापुर से निकले, और प्रस्थान के समय विदुर उन महात्माओं के मन्त्रदाता बने।
श्लोक 21 (1.61.21)
तेन मुक्ता जतुगृहान्निशीथे प्राद्रवन्वनम् । ततः संप्राप्य कौन्तेया नगरं वारणावतम् ॥
tena muktā jatugṛhānniśīthe prādravanvanam | tataḥ saṃprāpya kaunteyā nagaraṃ vāraṇāvatam
उन्हीं के द्वारा लाक्षागृह से मुक्त होकर वे आधी रात को वन की ओर भाग निकले। फिर वारणावत नगर पहुँचकर कुन्तीपुत्र —
श्लोक 22 (1.61.22)
न्यवसन्त महात्मानो मात्रा सह परन्तपाः । धृतराष्ट्रेण चाज्ञप्ता उषिता जातुषे गृहे ॥
nyavasanta mahātmāno mātrā saha parantapāḥ | dhṛtarāṣṭreṇa cājñaptā uṣitā jātuṣe gṛhe
वे शत्रुओं को तपाने वाले महात्मा — माता के साथ वहाँ रहे, और धृतराष्ट्र की आज्ञा से लाक्षागृह में निवास किया।
श्लोक 23 (1.61.23)
पुरोचनाद्रक्षमाणाः संवत्सरमतन्द्रिताः । सुरुङ्गां कारयित्वा तु विदुरेण प्रचोदिताः ॥
purocanādrakṣamāṇāḥ saṃvatsaramatandritāḥ | suruṅgāṃ kārayitvā tu vidureṇa pracoditāḥ
वे एक वर्ष तक बिना आलस्य के पुरोचन से अपनी रक्षा करते रहे। फिर विदुर की प्रेरणा से उन्होंने एक सुरंग खुदवाई,
श्लोक 24 (1.61.24)
आदीप्य जातुषं वेश्म दग्ध्वा चैव पुरोचनम् । प्राद्रवन्भयसंविग्ना मात्रा सह परन्तपाः ॥
ādīpya jātuṣaṃ veśma dagdhvā caiva purocanam | prādravanbhayasaṃvignā mātrā saha parantapāḥ
और लाक्षागृह में आग लगाकर तथा पुरोचन को जलाकर, वे शत्रुओं को तपाने वाले भय से व्याकुल होकर माता के साथ भाग निकले।
श्लोक 25 (1.61.25)
ददृशुर्दारुणं रक्षो हिडिम्बं वननिर्झरे । हत्वा च तं राक्षसेन्द्रं भीताः समवबोधनात् ॥
dadṛśurdāruṇaṃ rakṣo hiḍimbaṃ vananirjhare | hatvā ca taṃ rākṣasendraṃ bhītāḥ samavabodhanāt
वन के एक झरने के पास उन्होंने हिडिम्ब नामक भयानक राक्षस को देखा। उस राक्षसराज को मारकर, पहचान लिए जाने के भय से,
श्लोक 26 (1.61.26)
निशि संप्राद्रवन्पार्था धार्तराष्ट्रभयार्दिताः । प्राप्ता हिडिम्बा भीमेन यत्र जातो घटोत्कचः ॥
niśi saṃprādravanpārthā dhārtarāṣṭrabhayārditāḥ | prāptā hiḍimbā bhīmena yatra jāto ghaṭotkacaḥ
पृथा के पुत्र धृतराष्ट्र-पुत्रों के भय से पीड़ित होकर रात में ही भाग चले। वहीं भीम ने हिडिम्बा को पाया, जिससे घटोत्कच का जन्म हुआ।
श्लोक 27 (1.61.27)
एकचक्रां ततो गत्वा पाण्डवाः संशितव्रताः । वेदाध्ययनसंपन्नास्तेऽभवन्ब्रह्मचारिणः ॥
ekacakrāṃ tato gatvā pāṇḍavāḥ saṃśitavratāḥ | vedādhyayanasaṃpannāste'bhavanbrahmacāriṇaḥ
फिर एकचक्रा नगरी में जाकर दृढ़व्रती पाण्डव वेदाध्ययन में लगे हुए ब्रह्मचारी बनकर रहने लगे।
श्लोक 28 (1.61.28)
ते तत्र नियताः कालं कंचिदूषुर्नरर्षभाः । मात्रा सहैकचक्रायां ब्राह्मणस्य निवेशने ॥
te tatra niyatāḥ kālaṃ kaṃcidūṣurnararṣabhāḥ | mātrā sahaikacakrāyāṃ brāhmaṇasya niveśane
वे नरश्रेष्ठ कुछ समय तक संयमपूर्वक माता के साथ एकचक्रा में एक ब्राह्मण के घर रहे।
श्लोक 29 (1.61.29)
तत्राससाद क्षुधितं पुरुषादं वृकोदरः । भीमसेनो महाबाहुर्बकं नाम महाबलम् ॥
tatrāsasāda kṣudhitaṃ puruṣādaṃ vṛkodaraḥ | bhīmaseno mahābāhurbakaṃ nāma mahābalam
वहाँ महाबाहु भीमसेन वृकोदर का सामना बक नामक एक भूखे, महाबली नरभक्षी राक्षस से हुआ।
श्लोक 30 (1.61.30)
तं चापि पुरुषव्याघ्रो बाहुवीर्येण पाण्डवः । निहत्य तरसा वीरो नागरान्पर्यसान्त्वयत् ॥
taṃ cāpi puruṣavyāghro bāhuvīryeṇa pāṇḍavaḥ | nihatya tarasā vīro nāgarānparyasāntvayat
उस पुरुषसिंह वीर पाण्डव ने अपने बाहुबल से उसे भी शीघ्र ही मार डाला और नगरवासियों को ढाढ़स बँधाया।
श्लोक 31 (1.61.31)
ततस्ते शुश्रुवुः कृष्णां पञ्चालेषु स्वयंवराम् । श्रुत्वा चैवाभ्यगच्छन्त गत्वा चैवालभन्त ताम् ॥
tataste śuśruvuḥ kṛṣṇāṃ pañcāleṣu svayaṃvarām | śrutvā caivābhyagacchanta gatvā caivālabhanta tām
फिर उन्होंने सुना कि पाञ्चाल देश में कृष्णा (द्रौपदी) का स्वयंवर हो रहा है। यह सुनकर वे वहाँ गए और जाकर उसे प्राप्त किया।
श्लोक 32 (1.61.32)
ते तत्र द्रौपदीं लब्ध्वा परिसंवत्सरोषिताः । विदिता हास्तिनपुरं प्रत्याजग्मुररिन्दमाः ॥
te tatra draupadīṃ labdhvā parisaṃvatsaroṣitāḥ | viditā hāstinapuraṃ pratyājagmurarindamāḥ
वहाँ द्रौपदी को पाकर और पूरा एक वर्ष रहकर, सबको ज्ञात हो जाने पर वे शत्रुदमन हस्तिनापुर लौट आए।
श्लोक 33 (1.61.33)
ते उक्ता धृतराष्ट्रेण राज्ञा शान्तनवेन च । भ्रातृभिर्विग्रहस्तात कथं वो न भवेदिति ॥
te uktā dhṛtarāṣṭreṇa rājñā śāntanavena ca | bhrātṛbhirvigrahastāta kathaṃ vo na bhavediti
राजा धृतराष्ट्र और शान्तनुनन्दन भीष्म ने उनसे कहा — "तात, जिससे तुम्हारा अपने भाइयों से कलह न हो,
श्लोक 34 (1.61.34)
अस्माभिः खाण्डवप्रस्थे युष्मद्वासोऽनुचिन्तितः । तस्माज्जनपदोपेतं सुविभक्तमहापथम् ॥
asmābhiḥ khāṇḍavaprasthe yuṣmadvāso'nucintitaḥ | tasmājjanapadopetaṃ suvibhaktamahāpatham
इसलिए हमने तुम्हारा निवास खाण्डवप्रस्थ में निश्चित किया है। अतः जनपदों से युक्त और सुव्यवस्थित राजमार्गों वाले खाण्डवप्रस्थ में
श्लोक 35 (1.61.35)
वासाय खाण्डवप्रस्थं व्रजध्वं गतमत्सराः । तयोस्ते वचनाज्जग्मुः सह सर्वैः सुहृज्जनैः ॥
vāsāya khāṇḍavaprasthaṃ vrajadhvaṃ gatamatsarāḥ | tayoste vacanājjagmuḥ saha sarvaiḥ suhṛjjanaiḥ
ईर्ष्या त्यागकर रहने के लिए जाओ।" उन दोनों के कहने पर पाण्डव अपने सब सुहृदों के साथ
श्लोक 36 (1.61.36)
नगरं खाण्डवप्रस्थं रत्नान्यादाय सर्वशः । तत्र ते न्यवसन्पार्थाः संवत्सरगणान्बहून् ॥
nagaraṃ khāṇḍavaprasthaṃ ratnānyādāya sarvaśaḥ | tatra te nyavasanpārthāḥ saṃvatsaragaṇānbahūn
सारे रत्न लेकर खाण्डवप्रस्थ नगर को गए। वहाँ पृथापुत्र बहुत वर्षों तक रहे,
श्लोक 37 (1.61.37)
वशे शस्त्रप्रतापेन कुर्वन्तोऽन्यान्महीभृतः । एवं धर्मप्रधानास्ते सत्यव्रतपरायणाः ॥
vaśe śastrapratāpena kurvanto'nyānmahībhṛtaḥ | evaṃ dharmapradhānāste satyavrataparāyaṇāḥ
और शस्त्रों के प्रताप से दूसरे राजाओं को अपने वश में करते रहे। इस प्रकार धर्म को प्रधान मानने वाले, सत्य-व्रत में तत्पर,
श्लोक 38 (1.61.38)
अप्रमत्तोत्थिताः क्षान्ताः प्रतपन्तोऽहितान्बहून् । अजयद्भीमसेनस्तु दिशं प्राचीं महायशाः ॥
apramattotthitāḥ kṣāntāḥ pratapanto'hitānbahūn | ajayadbhīmasenastu diśaṃ prācīṃ mahāyaśāḥ
सावधान, उद्यमी और क्षमाशील पाण्डवों ने बहुत-से शत्रुओं को संतप्त किया। महायशस्वी भीमसेन ने पूर्व दिशा जीती,
श्लोक 39 (1.61.39)
उदीचीमर्जुनो वीरः प्रतीचीं नकुलस्तथा । दक्षिणां सहदेवस्तु विजिग्ये परवीरहा ॥
udīcīmarjuno vīraḥ pratīcīṃ nakulastathā | dakṣiṇāṃ sahadevastu vijigye paravīrahā
वीर अर्जुन ने उत्तर, नकुल ने पश्चिम, और शत्रु-वीरों का संहार करने वाले सहदेव ने दक्षिण दिशा पर विजय पाई।
श्लोक 40 (1.61.40)
एवं चक्रुरिमां सर्वे वशे कृत्स्नां वसुन्धराम् । पञ्चभिः सूर्यसङ्काशैः सूर्येण च विराजता ॥
evaṃ cakrurimāṃ sarve vaśe kṛtsnāṃ vasundharām | pañcabhiḥ sūryasaṅkāśaiḥ sūryeṇa ca virājatā
इस प्रकार सबने मिलकर इस सारी पृथ्वी को अपने वश में कर लिया। सूर्य के समान तेजस्वी उन पाँचों से और स्वयं प्रकाशमान सूर्य से
श्लोक 41 (1.61.41)
षट्सूर्येवाभवत्पृथ्वी पाण्डवैः सत्यविक्रमैः । ततो निमित्ते कस्मिंश्चिद्धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥
ṣaṭsūryevābhavatpṛthvī pāṇḍavaiḥ satyavikramaiḥ | tato nimitte kasmiṃściddharmarājo yudhiṣṭhiraḥ
सच्चे पराक्रम वाले पाण्डवों के कारण पृथ्वी मानो छह सूर्यों वाली हो गई। फिर किसी कारणवश धर्मराज युधिष्ठिर ने
श्लोक 42 (1.61.42)
वनं प्रस्थापयामास तेजस्वी सत्यविक्रमः । प्राणेभ्योऽपि प्रियतरं भ्रातरं सव्यसाचिनम् ॥
vanaṃ prasthāpayāmāsa tejasvī satyavikramaḥ | prāṇebhyo'pi priyataraṃ bhrātaraṃ savyasācinam
जो तेजस्वी और सत्यपराक्रमी थे, अपने प्राणों से भी प्यारे भाई सव्यसाची को वन में भेज दिया —
श्लोक 43 (1.61.43)
अर्जुनं पुरुषव्याघ्रं स्थिरात्मानं गुणैर्युतम् । स वै संवत्सरं पूर्णं मासं चैकं वने वसन् ॥
arjunaṃ puruṣavyāghraṃ sthirātmānaṃ guṇairyutam | sa vai saṃvatsaraṃ pūrṇaṃ māsaṃ caikaṃ vane vasan
पुरुषसिंह, स्थिरचित्त और गुणवान अर्जुन को। वे पूरे एक वर्ष और एक मास तक वन में रहे,
श्लोक 44 (1.61.44)
तीर्थयात्रां च कृतवान्नागकन्यामवाप च । पाण्ड्यस्य तनयां लब्ध्वा तत्र ताभ्यां सहोषितः ॥
tīrthayātrāṃ ca kṛtavānnāgakanyāmavāpa ca | pāṇḍyasya tanayāṃ labdhvā tatra tābhyāṃ sahoṣitaḥ
उन्होंने तीर्थयात्रा की और एक नागकन्या को प्राप्त किया; फिर पाण्ड्यराज की पुत्री को भी पाकर वे वहाँ उन दोनों के साथ रहे।
श्लोक 45 (1.61.45)
ततोऽगच्छद्धृषीकेशं द्वारवत्यां कदाचन । लब्धवांस्तत्र बीभत्सुर्भार्यां राजीवलोचनाम् ॥
tato'gacchaddhṛṣīkeśaṃ dvāravatyāṃ kadācana | labdhavāṃstatra bībhatsurbhāryāṃ rājīvalocanām
फिर एक समय वे द्वारका में हृषीकेश के पास गए, और वहाँ बीभत्सु ने कमलनयनी पत्नी पाई —
श्लोक 46 (1.61.46)
अनुजां वासुदेवस्य सुभद्रां भद्रभाषिणीम् । सा शचीव महेन्द्रेण श्रीः कृष्णेनेव सङ्गता ॥
anujāṃ vāsudevasya subhadrāṃ bhadrabhāṣiṇīm | sā śacīva mahendreṇa śrīḥ kṛṣṇeneva saṅgatā
वासुदेव की छोटी बहन, मधुरभाषिणी सुभद्रा। जैसे शची महेन्द्र से और श्री कृष्ण से मिलीं,
श्लोक 47 (1.61.47)
सुभद्रा युयुजे प्रीत्या पाण्डवेनार्जुनेन ह । अतर्पयच्च कौन्तेयः खाण्डवे हव्यवाहनम् ॥
subhadrā yuyuje prītyā pāṇḍavenārjunena ha | atarpayacca kaunteyaḥ khāṇḍave havyavāhanam
वैसे ही सुभद्रा प्रेमपूर्वक पाण्डुपुत्र अर्जुन से मिलीं। और कुन्तीपुत्र ने खाण्डव वन में हव्यवाहन अग्नि को तृप्त किया —
श्लोक 48 (1.61.48)
बीभत्सुर्वासुदेवेन सहितो नृपसत्तम । नातिभारो हि पार्थस्य केशवेन सहाभवत् ॥
bībhatsurvāsudevena sahito nṛpasattama | nātibhāro hi pārthasya keśavena sahābhavat
हे नृपश्रेष्ठ, बीभत्सु ने यह वासुदेव के साथ मिलकर किया। केशव के साथ होने से पार्थ के लिए यह कोई बड़ा भार न था,
श्लोक 49 (1.61.49)
व्यवसायसहायस्य विष्णोः शत्रुवधेष्विव । पार्थायाग्निर्ददौ चापि गाण्डीवं धनुरुत्तमम् ॥
vyavasāyasahāyasya viṣṇoḥ śatruvadheṣviva | pārthāyāgnirdadau cāpi gāṇḍīvaṃ dhanuruttamam
जैसे दृढ़ निश्चय को सहायक बनाए विष्णु के लिए शत्रुओं का वध भार नहीं होता। अग्नि ने पार्थ को उत्तम गाण्डीव धनुष दिया,
श्लोक 50 (1.61.50)
इषुधी चाक्षयैर्बाणै रथं च कपिलक्षणम् । मोक्षयामास बीभत्सुर्मयं यत्र महासुरम् ॥
iṣudhī cākṣayairbāṇai rathaṃ ca kapilakṣaṇam | mokṣayāmāsa bībhatsurmayaṃ yatra mahāsuram
अक्षय बाणों वाले दो तरकश और वानर-ध्वज वाला रथ भी दिया। वहीं बीभत्सु ने महान असुर मय को बचाया,
श्लोक 51 (1.61.51)
स चकार सभां दिव्यां सर्वरत्नसमाचिताम् । तस्यां दुर्योधनो मन्दो लोभं चक्रे सुदुर्मतिः ॥
sa cakāra sabhāṃ divyāṃ sarvaratnasamācitām | tasyāṃ duryodhano mando lobhaṃ cakre sudurmatiḥ
और मय ने सब प्रकार के रत्नों से जड़ी एक दिव्य सभा बनाई। उसे देखकर मूर्ख और दुर्बुद्धि दुर्योधन के मन में लोभ जाग उठा।
श्लोक 52 (1.61.52)
ततोऽक्षैर्वञ्चयित्वा च सौबलेन युधिष्ठिरम् । वनं प्रस्थापयामास सप्तवर्षाणि पञ्च च ॥
tato'kṣairvañcayitvā ca saubalena yudhiṣṭhiram | vanaṃ prasthāpayāmāsa saptavarṣāṇi pañca ca
फिर सुबलपुत्र शकुनि के द्वारा पासों से युधिष्ठिर को छलकर उसने उन्हें सात और पाँच वर्षों के लिए वन भेज दिया,
श्लोक 53 (1.61.53)
अज्ञातमेकं राष्ट्रे च ततो वर्षं त्रयोदशम् । ततश्चतुर्दशे वर्षे याचमानाः स्वकं वसु ॥
ajñātamekaṃ rāṣṭre ca tato varṣaṃ trayodaśam | tataścaturdaśe varṣe yācamānāḥ svakaṃ vasu
और फिर तेरहवाँ वर्ष किसी राज्य में अज्ञात रहकर बिताने के लिए। फिर चौदहवें वर्ष जब उन्होंने अपना धन माँगा,
श्लोक 54 (1.61.54)
नालभन्त महाराज ततो युद्धमवर्तत । ततस्ते क्षत्रमुत्साद्य हत्वा दुर्योधनं नृपम् ॥
nālabhanta mahārāja tato yuddhamavartata | tataste kṣatramutsādya hatvā duryodhanaṃ nṛpam
तो हे महाराज, उन्हें वह नहीं मिला; तब युद्ध छिड़ गया। फिर क्षत्रियों का संहार करके और राजा दुर्योधन को मारकर
श्लोक 55 (1.61.55)
राज्यं विहतभूयिष्ठं प्रत्यपद्यन्त पाण्डवाः । इष्ट्वा क्रतूंश्च विविधानश्वमेधादिकान्बहून् ॥
rājyaṃ vihatabhūyiṣṭhaṃ pratyapadyanta pāṇḍavāḥ | iṣṭvā kratūṃśca vividhānaśvamedhādikānbahūn
पाण्डवों ने अपना राज्य फिर पाया, जिसका अधिकांश भाग उजड़ चुका था। अश्वमेध आदि अनेक प्रकार के यज्ञ करके,
श्लोक 56 (1.61.56)
धृतराष्ट्रे गते स्वर्गं विदुरे पञ्चतां गते । गमयित्वा क्रियां स्वर्ग्यां राज्ञाममिततेजसाम् ॥
dhṛtarāṣṭre gate svargaṃ vidure pañcatāṃ gate | gamayitvā kriyāṃ svargyāṃ rājñāmamitatejasām
धृतराष्ट्र के स्वर्ग चले जाने और विदुर के देह त्याग देने पर, तथा अपार तेज वाले राजाओं की स्वर्ग दिलाने वाली क्रियाएँ सम्पन्न कराकर,
श्लोक 57 (1.61.57)
स्वं धाम याते वार्ष्णेये कृष्णदारान्प्ररक्ष्य च । महाप्रस्थानिकं कृत्वा गताः स्वर्गमनुत्तमम् ॥
svaṃ dhāma yāte vārṣṇeye kṛṣṇadārānprarakṣya ca | mahāprasthānikaṃ kṛtvā gatāḥ svargamanuttamam
वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण के अपने धाम चले जाने पर, और श्रीकृष्ण की पत्नियों की रक्षा करके, वे महाप्रस्थान करके परम स्वर्ग को चले गए।
श्लोक 58 (1.61.58)
एवमेतत्पुरावृत्तं तेषामक्लिष्टकर्मणाम् । भेदो राज्यविनाशश्च जयश्च जयतां वर ॥
evametatpurāvṛttaṃ teṣāmakliṣṭakarmaṇām | bhedo rājyavināśaśca jayaśca jayatāṃ vara
हे विजेताओं में श्रेष्ठ, इस प्रकार अनथक कर्म करने वाले उन वीरों के साथ प्राचीन काल में यह सब घटित हुआ — आपसी फूट, राज्य का नाश और फिर विजय।