आदि पर्व · अध्याय 62
भारत-श्रवण की महिमा
संक्षेप में महाभारत सुन चुके जनमेजय वैशम्पायन से उसे विस्तार से सुनाने का अनुरोध करते हैं और पूछते हैं कि पाण्डवों ने इतने अपमान इतने संयम से कैसे सहे। कथा आरम्भ करने से पहले वैशम्पायन व्यास द्वारा तीन वर्षों में रचे गए इस ग्रन्थ की प्रशंसा करते हैं — उसका विस्तार और विभाजन, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के शास्त्र के रूप में उसका स्थान, और उसे सुनने, सुनाने या दान करने का पुण्य। अन्त में वे राजा को वह प्राचीन इतिहास सुनने के लिए आमन्त्रित करते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (1.62.1)
कथितं वै समासेन त्वया सर्वं द्विजोत्तम । महाभारतमाख्यानं कुरूणां चरितं महत् ॥
kathitaṃ vai samāsena tvayā sarvaṃ dvijottama | mahābhāratamākhyānaṃ kurūṇāṃ caritaṃ mahat
हे द्विजश्रेष्ठ, आपने कुरुओं के महान चरित्र वाला सम्पूर्ण महाभारत-आख्यान मुझे संक्षेप में सुना दिया है।
श्लोक 2 (1.62.2)
कथां त्वनघ चित्रार्थां कथयस्व तपोधन । विस्तरश्रवणे जातं कौतूहलमतीव मे ॥
kathāṃ tvanagha citrārthāṃ kathayasva tapodhana | vistaraśravaṇe jātaṃ kautūhalamatīva me
हे निष्पाप तपोधन, अब वह विचित्र अर्थों वाली कथा कहिए। उसे विस्तार से सुनने की मेरे मन में बड़ी उत्सुकता जाग उठी है।
श्लोक 3 (1.62.3)
स भवान्विस्तरेणेमां पुनराख्यातुमर्हति । न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ॥
sa bhavānvistareṇemāṃ punarākhyātumarhati | na hi tṛpyāmi pūrveṣāṃ śṛṇvānaścaritaṃ mahat
अतः आप इसे फिर से विस्तारपूर्वक कहने की कृपा करें। अपने पूर्वजों का महान चरित्र सुनते हुए मैं तृप्त नहीं होता।
श्लोक 4 (1.62.4)
न तत्कारणमल्पं वै धर्मज्ञा यत्र पाण्डवाः । अवध्यान्सर्वशो जघ्नुः प्रशस्यन्ते च मानवैः ॥
na tatkāraṇamalpaṃ vai dharmajñā yatra pāṇḍavāḥ | avadhyānsarvaśo jaghnuḥ praśasyante ca mānavaiḥ
वह कोई छोटा कारण नहीं हो सकता, जिसके चलते धर्म को जानने वाले पाण्डवों ने अवध्य लोगों का भी सब ओर से वध किया, और फिर भी मनुष्य उनकी प्रशंसा करते हैं।
श्लोक 5 (1.62.5)
किमर्थं ते नरव्याघ्राः शक्ताः सन्तो ह्यनागसः । प्रयुज्यमानान्संक्लेशान्क्षान्तवन्तो दुरात्मनाम् ॥
kimarthaṃ te naravyāghrāḥ śaktāḥ santo hyanāgasaḥ | prayujyamānānsaṃkleśānkṣāntavanto durātmanām
वे नरश्रेष्ठ निर्दोष और समर्थ होते हुए भी दुरात्माओं द्वारा दिए गए क्लेशों को चुपचाप क्यों सहते रहे?
श्लोक 6 (1.62.6)
कथं नागायुतप्राणो बाहुशाली वृकोदरः । परिक्लिश्यन्नपि क्रोधं धृतवान्वै द्विजोत्तम ॥
kathaṃ nāgāyutaprāṇo bāhuśālī vṛkodaraḥ | parikliśyannapi krodhaṃ dhṛtavānvai dvijottama
हे द्विजश्रेष्ठ, दस हज़ार हाथियों के बल वाले महाबाहु वृकोदर (भीम) ने पीड़ित होते हुए भी अपना क्रोध कैसे रोके रखा?
श्लोक 7 (1.62.7)
कथं सा द्रौपदी कृष्णा क्लिश्यमाना दुरात्मभिः । शक्ता सती धार्तराष्ट्रान्नादहत्क्रोधचक्षुषा ॥
kathaṃ sā draupadī kṛṣṇā kliśyamānā durātmabhiḥ | śaktā satī dhārtarāṣṭrānnādahatkrodhacakṣuṣā
दुरात्माओं द्वारा सताई जाती हुई सती द्रौपदी (कृष्णा) ने समर्थ होते हुए भी अपनी क्रोध-भरी दृष्टि से धृतराष्ट्र के पुत्रों को भस्म क्यों नहीं कर दिया?
श्लोक 8 (1.62.8)
कथं व्यसनिनं द्यूते पार्थौ माद्रीसुतौ तदा । अन्वयुस्ते नरव्याघ्रा बाध्यमाना दुरात्मभिः ॥
kathaṃ vyasaninaṃ dyūte pārthau mādrīsutau tadā | anvayuste naravyāghrā bādhyamānā durātmabhiḥ
दोनों पार्थ (भीम और अर्जुन) और माद्री के दोनों पुत्र, वे नरव्याघ्र, दुरात्माओं द्वारा पीड़ित होते हुए भी तब जुए में फँसे अपने भाई का अनुसरण क्यों करते रहे?
श्लोक 9 (1.62.9)
कथं धर्मभृतां श्रेष्ठः सुतो धर्मस्य धर्मवित् । अनर्हः परमं क्लेशं सोढवान्स युधिष्ठिरः ॥
kathaṃ dharmabhṛtāṃ śreṣṭhaḥ suto dharmasya dharmavit | anarhaḥ paramaṃ kleśaṃ soḍhavānsa yudhiṣṭhiraḥ
धर्मधारियों में श्रेष्ठ, धर्म के पुत्र और धर्म के ज्ञाता युधिष्ठिर ने वह घोर क्लेश कैसे सहा, जिसके वे योग्य नहीं थे?
श्लोक 10 (1.62.10)
कथं च बहुलाः सेनाः पाण्डवः कृष्णसारथिः । अस्यन्नेकोऽनयत्सर्वाः पितृलोकं धनंजयः ॥
kathaṃ ca bahulāḥ senāḥ pāṇḍavaḥ kṛṣṇasārathiḥ | asyanneko'nayatsarvāḥ pitṛlokaṃ dhanaṃjayaḥ
और कृष्ण को सारथि बनाकर पाण्डुपुत्र धनंजय (अर्जुन) ने अकेले बाण चलाते हुए उन सारी विशाल सेनाओं को पितृलोक कैसे पहुँचा दिया?
श्लोक 11 (1.62.11)
एतदाचक्ष्व मे सर्वं यथावृत्तं तपोधन । यद्यच्च कृतवन्तस्ते तत्रतत्र महारथाः ॥
etadācakṣva me sarvaṃ yathāvṛttaṃ tapodhana | yadyacca kṛtavantaste tatratatra mahārathāḥ
हे तपोधन, यह सब मुझे ठीक वैसा ही बताइए जैसा घटित हुआ, और यह भी कि उन महारथियों ने जहाँ-जहाँ जो-जो किया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 12 (1.62.12)
क्षणं कुरु महाराज विपुलोऽयमनुक्रमः । पुण्याख्यानस्य वक्तव्यः कृष्णद्वैपायनेरितः ॥
kṣaṇaṃ kuru mahārāja vipulo'yamanukramaḥ | puṇyākhyānasya vaktavyaḥ kṛṣṇadvaipāyaneritaḥ
हे महाराज, क्षणभर ठहरिए। कृष्णद्वैपायन द्वारा कही गई इस पवित्र कथा का क्रम बहुत विस्तृत है, जिसे मुझे कहना है।
श्लोक 13 (1.62.13)
महर्षेः सर्वलोकेषु पूजितस्य महात्मनः । प्रवक्ष्यामि मतं कृत्स्नं व्यासस्यामिततेजसः ॥
maharṣeḥ sarvalokeṣu pūjitasya mahātmanaḥ | pravakṣyāmi mataṃ kṛtsnaṃ vyāsasyāmitatejasaḥ
सब लोकों में पूजित, अपार तेजस्वी महात्मा महर्षि व्यास का सम्पूर्ण मत मैं कहूँगा।
श्लोक 14 (1.62.14)
इदं शतसहस्रं हि श्लोकानां पुण्यकर्मणाम् । सत्यवत्यात्मजेनेह व्याख्यातममितौजसा ॥
idaṃ śatasahasraṃ hi ślokānāṃ puṇyakarmaṇām | satyavatyātmajeneha vyākhyātamamitaujasā
पुण्यकर्मा पुरुषों का यह एक लाख श्लोकों वाला ग्रन्थ अपार ओजस्वी सत्यवतीनन्दन (व्यास) ने रचा है।
श्लोक 15 (1.62.15)
उपाख्यानैः सह ज्ञेयं श्राव्यं भारतमुत्तमम् । संक्षेपेण तु वक्ष्यामि सर्वमेतन्नराधिप ॥
upākhyānaiḥ saha jñeyaṃ śrāvyaṃ bhāratamuttamam | saṃkṣepeṇa tu vakṣyāmi sarvametannarādhipa
उपाख्यानों सहित इस उत्तम भारत को जानना और सुनना चाहिए। किन्तु हे नरेश, मैं यह सब तुम्हें संक्षेप में बताऊँगा।
श्लोक 16 (1.62.16)
अध्यायानां सहस्रे द्वे पर्वणां शतमेव च । श्लोकानां तु सहस्राणि नवतिश्च दशैव च । ततोऽष्टादशभिः पर्वैः संगृहीतं महर्षिणा ॥
adhyāyānāṃ sahasre dve parvaṇāṃ śatameva ca | ślokānāṃ tu sahasrāṇi navatiśca daśaiva ca | tato'ṣṭādaśabhiḥ parvaiḥ saṃgṛhītaṃ maharṣiṇā
इसमें दो हज़ार अध्याय और सौ उपपर्व हैं, और इसके श्लोक नब्बे हज़ार और दस हज़ार (अर्थात् एक लाख) हैं। फिर महर्षि ने इसे अठारह पर्वों में संगृहीत किया।
श्लोक 17 (1.62.17)
य इदं श्रावयेद्विद्वान्ये चेदं शृणुयुर्नराः । ते ब्रह्मणः स्थानमेत्य प्राप्नुयुर्देवतुल्यताम् ॥
ya idaṃ śrāvayedvidvānye cedaṃ śṛṇuyurnarāḥ | te brahmaṇaḥ sthānametya prāpnuyurdevatulyatām
जो विद्वान इसे सुनाता है और जो मनुष्य इसे सुनते हैं, वे ब्रह्मा के धाम में पहुँचकर देवताओं के समान हो जाते हैं।
श्लोक 18 (1.62.18)
इदं हि वेदैः समितं पवित्रमपि चोत्तमम् । श्राव्याणामुत्तमं चेदं पुराणमृषिसंस्तुतम् ॥
idaṃ hi vedaiḥ samitaṃ pavitramapi cottamam | śrāvyāṇāmuttamaṃ cedaṃ purāṇamṛṣisaṃstutam
यह वेदों के समान, पवित्र और उत्तम है। सुनने योग्य वस्तुओं में यह श्रेष्ठ है — ऋषियों द्वारा प्रशंसित पुरातन कथा।
श्लोक 19 (1.62.19)
अस्मिन्नर्थश्च कामश्च निखिलेनोपदेक्ष्यते । इतिहासे महापुण्ये बुद्धिश्च परिनैष्ठिकी ॥
asminnarthaśca kāmaśca nikhilenopadekṣyate | itihāse mahāpuṇye buddhiśca parinaiṣṭhikī
इस परम पवित्र इतिहास में अर्थ और काम का सम्पूर्ण उपदेश है, और परम लक्ष्य तक ले जाने वाली बुद्धि का भी।
श्लोक 20 (1.62.20)
अक्षुद्रान्दानशीलांश्च सत्यशीलाननास्तिकान् । कार्ष्णं वेदमिमं विद्वाञ्छ्रावयित्वाऽर्थमश्नुते ॥
akṣudrāndānaśīlāṃśca satyaśīlānanāstikān | kārṣṇaṃ vedamimaṃ vidvāñchrāvayitvā'rthamaśnute
जो विद्वान कृष्णद्वैपायन के इस वेद को उदार, दानशील, सत्यनिष्ठ और आस्तिक लोगों को सुनाता है, वह अभीष्ट फल पाता है।
श्लोक 21 (1.62.21)
भ्रूणहत्याकृतं चापि पापं जह्यादसंशयम् । इतिहासमिमं श्रुत्वा पुरुषोऽपि सुदारुणः ॥
bhrūṇahatyākṛtaṃ cāpi pāpaṃ jahyādasaṃśayam | itihāsamimaṃ śrutvā puruṣo'pi sudāruṇaḥ
इस इतिहास को सुनकर अत्यन्त क्रूर मनुष्य भी निःसन्देह भ्रूणहत्या तक के पाप को त्याग देता है;
श्लोक 22 (1.62.22)
मुच्यते सर्वपापेभ्यो राहुणा चन्द्रमा यथा । जयो नामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो विजिगीषुणा ॥
mucyate sarvapāpebhyo rāhuṇā candramā yathā | jayo nāmetihāso'yaṃ śrotavyo vijigīṣuṇā
वह सब पापों से वैसे ही छूट जाता है जैसे राहु से चन्द्रमा। यह इतिहास 'जय' नाम का है; विजय चाहने वाले को इसे सुनना चाहिए।
श्लोक 23 (1.62.23)
महीं विजयते राजा शत्रूंश्चापि पराजयेत् । इदं पुंसवनं श्रेष्ठमिदं स्वस्त्ययनं महत् ॥
mahīṃ vijayate rājā śatrūṃścāpi parājayet | idaṃ puṃsavanaṃ śreṣṭhamidaṃ svastyayanaṃ mahat
इससे राजा पृथ्वी को जीत लेता है और शत्रुओं को भी पराजित करता है। यह पुत्र-प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन और महान मंगलकारी है।
श्लोक 24 (1.62.24)
महिषीयुवराजाभ्यां श्रोतव्यं बहुशस्तथा । वीरं जनयते पुत्रं कन्यां वा राज्यभागिनीम् ॥
mahiṣīyuvarājābhyāṃ śrotavyaṃ bahuśastathā | vīraṃ janayate putraṃ kanyāṃ vā rājyabhāginīm
पटरानी और युवराज को इसे बार-बार सुनना चाहिए। इसे सुनने वाली रानी वीर पुत्र को, या राज्य की भागिनी बनने वाली कन्या को जन्म देती है।
श्लोक 25 (1.62.25)
धर्मशास्त्रमिदं पुण्यमर्थशास्त्रमिदं परम् । मोक्षशास्त्रमिदं प्रोक्तं व्यासेनामितबुद्धिना ॥
dharmaśāstramidaṃ puṇyamarthaśāstramidaṃ param | mokṣaśāstramidaṃ proktaṃ vyāsenāmitabuddhinā
यह पवित्र धर्मशास्त्र है, यह उत्तम अर्थशास्त्र है और यह मोक्षशास्त्र है — ऐसा अपार बुद्धि वाले व्यास ने कहा है।
श्लोक 26 (1.62.26)
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ । यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न कुत्रचित् । इदं हि ब्राह्मणैर्लोके आख्यातं ब्राह्मणेष्विह ॥
dharme cārthe ca kāme ca mokṣe ca bharatarṣabha | yadihāsti tadanyatra yannehāsti na kutracit | idaṃ hi brāhmaṇairloke ākhyātaṃ brāhmaṇeṣviha
हे भरतश्रेष्ठ, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के विषय में जो यहाँ है वही अन्यत्र है; जो यहाँ नहीं है, वह कहीं नहीं है। संसार में ब्राह्मणों ने इसे ब्राह्मणों के बीच कहा है।
श्लोक 27 (1.62.27)
संप्रत्याचक्षते चेदं तथा श्रोष्यन्ति चापरे । पुत्राः शुश्रूषवः सन्ति प्रेष्याश्च प्रियकारिणः ॥
saṃpratyācakṣate cedaṃ tathā śroṣyanti cāpare | putrāḥ śuśrūṣavaḥ santi preṣyāśca priyakāriṇaḥ
आज भी लोग इसे सुनाते हैं और आगे भी दूसरे इसे सुनेंगे। इसे सुनने वालों के पुत्र सेवापरायण और सेवक प्रिय करने वाले होते हैं।
श्लोक 28 (1.62.28)
भरतानां महज्जन्म शृण्वतामनसूयताम् । नास्ति व्याधिभयं तेषां परलोकभयं कुतः ॥
bharatānāṃ mahajjanma śṛṇvatāmanasūyatām | nāsti vyādhibhayaṃ teṣāṃ paralokabhayaṃ kutaḥ
जो लोग बिना दोषदृष्टि के भरतवंशियों के महान जन्म का वृत्तान्त सुनते हैं, उन्हें रोग का भय नहीं रहता, फिर परलोक का भय कहाँ?
श्लोक 29 (1.62.29)
शरीरेण कृतं पापं वाचा च मनसैव च । सर्वं संत्यजति क्षिप्रं य इदं शृणुयान्नरः ॥
śarīreṇa kṛtaṃ pāpaṃ vācā ca manasaiva ca | sarvaṃ saṃtyajati kṣipraṃ ya idaṃ śṛṇuyānnaraḥ
शरीर, वाणी और मन से किया गया जो भी पाप हो, जो मनुष्य इसे सुनता है वह शीघ्र ही उस सबको त्याग देता है।
श्लोक 30 (1.62.30)
धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं स्वर्ग्यं तथैव च । कृष्णद्वैपायनेनेदं कृतं पुण्यचिकीर्षुणा ॥
dhanyaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ puṇyaṃ svargyaṃ tathaiva ca | kṛṣṇadvaipāyanenedaṃ kṛtaṃ puṇyacikīrṣuṇā
यह धन, यश, आयु, पुण्य और स्वर्ग देने वाला है। पुण्य करने की इच्छा से कृष्णद्वैपायन ने इसे रचा,
श्लोक 31 (1.62.31)
कीर्तिं प्रथयता लोके पाण्डवानां महात्मनाम् । अन्येषां क्षत्रियाणां च भूरिद्रविणतेजसाम् ॥
kīrtiṃ prathayatā loke pāṇḍavānāṃ mahātmanām | anyeṣāṃ kṣatriyāṇāṃ ca bhūridraviṇatejasām
जिससे संसार में महात्मा पाण्डवों की, और प्रचुर धन तथा तेज वाले अन्य क्षत्रियों की कीर्ति फैले —
श्लोक 32 (1.62.32)
सर्वविद्यावदातानां लोके प्रथितकर्मणाम् । य इदं मानवो लोके पुण्यार्थे ब्राह्मणाञ्छुचीन् ॥
sarvavidyāvadātānāṃ loke prathitakarmaṇām | ya idaṃ mānavo loke puṇyārthe brāhmaṇāñchucīn
जो सब विद्याओं से उज्ज्वल थे और जिनके कर्म संसार में प्रसिद्ध थे। इस लोक में जो मनुष्य पुण्य के लिए पवित्र ब्राह्मणों को
श्लोक 33 (1.62.33)
श्रावयेत महापुण्यं तस्य धर्मः सनातनः । कुरूणां प्रथितं वंशं कीर्तयन्सततं शुचिः ॥
śrāvayeta mahāpuṇyaṃ tasya dharmaḥ sanātanaḥ | kurūṇāṃ prathitaṃ vaṃśaṃ kīrtayansatataṃ śuciḥ
यह परम पुण्यमय ग्रन्थ सुनवाता है, उसे सनातन धर्म प्राप्त होता है। जो पवित्र होकर कुरुओं के प्रसिद्ध वंश का निरन्तर कीर्तन करता है,
श्लोक 34 (1.62.34)
वंशमाप्नोति विपुलं लोके पूज्यतमो भवेत् । योऽधीते भारतं पुण्यं ब्राह्मणो नियतव्रतः ॥
vaṃśamāpnoti vipulaṃ loke pūjyatamo bhavet | yo'dhīte bhārataṃ puṇyaṃ brāhmaṇo niyatavrataḥ
वह विशाल वंश पाता है और संसार में अत्यन्त पूज्य होता है। नियमित व्रत वाला जो ब्राह्मण पवित्र भारत का
श्लोक 35 (1.62.35)
चतुरो वार्षिकान्मासान्सर्वपापैः प्रमुच्यते । विज्ञेयः स च वेदानां पारगो भारतं पठन् ॥
caturo vārṣikānmāsānsarvapāpaiḥ pramucyate | vijñeyaḥ sa ca vedānāṃ pārago bhārataṃ paṭhan
वर्षा ऋतु के चार महीनों तक अध्ययन करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। भारत का पाठ करने वाले को वेदों का पारंगत जानना चाहिए।
श्लोक 36 (1.62.36)
देवा राजर्षयो ह्यत्र पुण्या ब्रह्मर्षयस्तथा । कीर्त्यन्ते धूतपाप्मानः कीर्त्यते केशवस्तथा ॥
devā rājarṣayo hyatra puṇyā brahmarṣayastathā | kīrtyante dhūtapāpmānaḥ kīrtyate keśavastathā
इसमें देवताओं, राजर्षियों और पापरहित पवित्र ब्रह्मर्षियों का कीर्तन है, और केशव का भी कीर्तन है।
श्लोक 37 (1.62.37)
भगवांश्चापि देवेशो यत्र देवी च कीर्त्यते । अनेकजननो यत्र कार्तिकेयस्य संभवः ॥
bhagavāṃścāpi deveśo yatra devī ca kīrtyate | anekajanano yatra kārtikeyasya saṃbhavaḥ
इसमें भगवान देवेश्वर (शिव) का और देवी का भी कीर्तन है, और अनेक माताओं वाले कार्तिकेय के जन्म की कथा है।
श्लोक 38 (1.62.38)
ब्राह्मणानां गवां चैव माहात्म्यं यत्र कीर्त्यते । सर्वश्रुतिसमूहोऽयं श्रोतव्यो धर्मबुद्धिभिः ॥
brāhmaṇānāṃ gavāṃ caiva māhātmyaṃ yatra kīrtyate | sarvaśrutisamūho'yaṃ śrotavyo dharmabuddhibhiḥ
इसमें ब्राह्मणों और गौओं की महिमा कही गई है। यह समस्त श्रुतियों का संग्रह है; धर्म में बुद्धि रखने वालों को इसे सुनना चाहिए।
श्लोक 39 (1.62.39)
य इदं श्रावयेद्विद्वान्ब्राह्मणानिह पर्वसु । धूतपाप्मा जितस्वर्गो ब्रह्म गच्छति शाश्वतम् ॥
ya idaṃ śrāvayedvidvānbrāhmaṇāniha parvasu | dhūtapāpmā jitasvargo brahma gacchati śāśvatam
जो विद्वान पर्व के दिनों में ब्राह्मणों को इसे सुनाता है, वह पापरहित होकर स्वर्ग को जीत लेता है और शाश्वत ब्रह्म को प्राप्त होता है।
श्लोक 40 (1.62.40)
श्रावयेद्ब्राह्मणाञ्श्राद्धे यश्चेमं पादमन्ततः । अक्षय्यं तस्य तच्छ्राद्धमुपावर्तेत्पितॄनिह ॥
śrāvayedbrāhmaṇāñśrāddhe yaścemaṃ pādamantataḥ | akṣayyaṃ tasya tacchrāddhamupāvartetpitṝniha
जो श्राद्ध के अन्त में ब्राह्मणों को इसका एक चरण भी सुनाता है, उसका वह श्राद्ध अक्षय हो जाता है और पितरों तक पहुँचता है।
श्लोक 41 (1.62.41)
अह्ना यदेनः क्रियते इन्द्रियैर्मनसाऽपि वा । ज्ञानादज्ञानतो वापि प्रकरोति नरश्च यत् ॥
ahnā yadenaḥ kriyate indriyairmanasā'pi vā | jñānādajñānato vāpi prakaroti naraśca yat
दिन में मनुष्य इन्द्रियों से या मन से, जानकर या अनजाने, जो भी पाप करता है,
श्लोक 42 (1.62.42)
तन्महाभारताख्यानं श्रुत्वैव प्रविलीयते । भरतानां महज्जन्म महाभारतमुच्यते ॥
tanmahābhāratākhyānaṃ śrutvaiva pravilīyate | bharatānāṃ mahajjanma mahābhāratamucyate
वह महाभारत की कथा सुनते ही नष्ट हो जाता है। भरतवंशियों का महान जन्म-वृत्तान्त ही महाभारत कहलाता है।
श्लोक 43 (1.62.43)
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते । भरतानां महज्जन्म महाभारतमुच्यते ॥
niruktamasya yo veda sarvapāpaiḥ pramucyate | bharatānāṃ mahajjanma mahābhāratamucyate
जो इसके नाम की यह व्याख्या जानता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। भरतवंशियों का महान जन्म-वृत्तान्त ही महाभारत कहलाता है।
श्लोक 44 (1.62.44)
महतो ह्येनसो मर्त्यान्मोचयेदनुकीर्तितः । त्रिभिर्वर्षैर्महाभागः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥
mahato hyenaso martyānmocayedanukīrtitaḥ | tribhirvarṣairmahābhāgaḥ kṛṣṇadvaipāyano'bravīt
इसका कीर्तन मनुष्यों को महान पाप से छुड़ा देता है। महाभाग कृष्णद्वैपायन ने तीन वर्षों में इसे कहा;
श्लोक 45 (1.62.45)
नित्योत्थितः शुचिः शक्तो महाभारतमादितः । तपोनियममास्थाय कृतमेतन्महर्षिणा ॥
nityotthitaḥ śuciḥ śakto mahābhāratamāditaḥ | taponiyamamāsthāya kṛtametanmaharṣiṇā
प्रतिदिन प्रातः उठकर, पवित्र और समर्थ रहते हुए, तप और नियम का पालन करते हुए महर्षि ने आरम्भ से यह महाभारत रचा।
श्लोक 46 (1.62.46)
तस्मान्नियमसंयुक्तैः श्रोतव्यं ब्राह्मणैरिदम् । कृष्णप्रोक्तामिमां पुण्यां भारतीमुत्तमां कथाम् ॥
tasmānniyamasaṃyuktaiḥ śrotavyaṃ brāhmaṇairidam | kṛṣṇaproktāmimāṃ puṇyāṃ bhāratīmuttamāṃ kathām
इसलिए ब्राह्मणों को नियमपूर्वक इसे सुनना चाहिए — कृष्णद्वैपायन द्वारा कही गई भरतवंश की यह पवित्र और उत्तम कथा।
श्लोक 47 (1.62.47)
श्रावयिष्यन्ति ये विप्रा ये च श्रोष्यन्ति मानवाः । सर्वथा वर्तमाना वै न ते शोच्याः कृताकृतैः ॥
śrāvayiṣyanti ye viprā ye ca śroṣyanti mānavāḥ | sarvathā vartamānā vai na te śocyāḥ kṛtākṛtaiḥ
जो ब्राह्मण इसे सुनाएँगे और जो मनुष्य इसे सुनेंगे, वे चाहे जैसे भी रहते हों, अपने किए-अनकिए के लिए शोक के पात्र नहीं होते।
श्लोक 48 (1.62.48)
नरेण धर्मकामेन सर्वः श्रोतव्य इत्यपि । निखिलेनेतिहासोऽयं ततः सिद्धिमवाप्नुयात् ॥
nareṇa dharmakāmena sarvaḥ śrotavya ityapi | nikhilenetihāso'yaṃ tataḥ siddhimavāpnuyāt
धर्म चाहने वाले मनुष्य को यह इतिहास पूरा का पूरा सुनना चाहिए; उससे वह सिद्धि प्राप्त करता है।
श्लोक 49 (1.62.49)
न तां स्वर्गगतिं प्राप्य तुष्टिं प्राप्नोति मानवः । यां श्रुत्वैवं महापुण्यमितिहासमुपाश्नुते ॥
na tāṃ svargagatiṃ prāpya tuṣṭiṃ prāpnoti mānavaḥ | yāṃ śrutvaivaṃ mahāpuṇyamitihāsamupāśnute
स्वर्ग पहुँचकर भी मनुष्य को वह सन्तोष नहीं मिलता, जो इस परम पवित्र इतिहास को सुनकर मिलता है।
श्लोक 50 (1.62.50)
शृण्वञ्श्राद्धः पुण्यशीलः श्रावयंश्चेदमद्भुतम् । नरः फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ॥
śṛṇvañśrāddhaḥ puṇyaśīlaḥ śrāvayaṃścedamadbhutam | naraḥ phalamavāpnoti rājasūyāśvamedhayoḥ
श्रद्धालु और पुण्यशील मनुष्य इस अद्भुत ग्रन्थ को सुनकर या सुनाकर राजसूय और अश्वमेध यज्ञों का फल पाता है।
श्लोक 51 (1.62.51)
यथा समुद्रो भगवान्यथा मेरुर्महागिरिः । उभौ ख्यातौ रत्ननिधी तथा भारतमुच्यते ॥
yathā samudro bhagavānyathā merurmahāgiriḥ | ubhau khyātau ratnanidhī tathā bhāratamucyate
जैसे भगवान समुद्र और महापर्वत मेरु दोनों रत्नों के भण्डार के रूप में प्रसिद्ध हैं, वैसे ही भारत कहा जाता है।
श्लोक 52 (1.62.52)
इदं हि वेदैः समितं पवित्रमपि चोत्तमम् । श्राव्यं श्रुतिसुखं चैव पावनं शीलवर्धनम् ॥
idaṃ hi vedaiḥ samitaṃ pavitramapi cottamam | śrāvyaṃ śrutisukhaṃ caiva pāvanaṃ śīlavardhanam
यह वेदों के समान, पवित्र और उत्तम है; सुनने योग्य, कानों को सुख देने वाला, पावन और शील को बढ़ाने वाला है।
श्लोक 53 (1.62.53)
य इदं भारतं राजन्वाचकाय प्रयच्छति । तेन सर्वा मही दत्ता भवेत्सागरमेखला ॥
ya idaṃ bhārataṃ rājanvācakāya prayacchati | tena sarvā mahī dattā bhavetsāgaramekhalā
हे राजन्, जो यह भारत किसी वाचक को देता है, उसने मानो समुद्र से घिरी सारी पृथ्वी दान कर दी।
श्लोक 54 (1.62.54)
पारिक्षित कथां दिव्यां पुण्याय विजयाय च । कथ्यमानां मया कृत्स्नां शृणु हर्षकरीमिमाम् ॥
pārikṣita kathāṃ divyāṃ puṇyāya vijayāya ca | kathyamānāṃ mayā kṛtsnāṃ śṛṇu harṣakarīmimām
हे परीक्षित-पुत्र, पुण्य और विजय के लिए मेरे द्वारा पूरी कही जाने वाली इस दिव्य और आनन्ददायक कथा को सुनो।
श्लोक 55 (1.62.55)
त्रिभिर्वर्षैः सदोत्थायी कृष्णद्वैपायनो मुनिः । महाभारतमाख्यानं कृतवानिदमद्भुतम् ॥
tribhirvarṣaiḥ sadotthāyī kṛṣṇadvaipāyano muniḥ | mahābhāratamākhyānaṃ kṛtavānidamadbhutam
मुनि कृष्णद्वैपायन ने तीन वर्षों तक सदा प्रातः उठकर इस अद्भुत महाभारत-आख्यान की रचना की।
श्लोक 56 (1.62.56)
शृणु कीर्तयतस्तन्म इतिहासं पुरातनम् ॥
śṛṇu kīrtayatastanma itihāsaṃ purātanam
अब मुझसे वह प्राचीन इतिहास सुनो, जिसका मैं वर्णन करता हूँ।