आदि पर्व · अध्याय 63
ब्रह्मा से जनमेजय तक पूरु का वंश
गद्य में दी गई वंशावली में वैशम्पायन जनमेजय के पूर्वजों का क्रम ब्रह्मा से दक्ष, कश्यप, विवस्वान्, मनु और ययाति होते हुए पूरु तक बताते हैं, और फिर एक-एक राजा का, उसकी पत्नी और उससे जन्मे पुत्र के नाम सहित — दुष्यन्त और भरत, हस्ती, कुरु, प्रतीप और शान्तनु तक। वे संक्षेप में सत्यवती और व्यास, धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर के जन्म, पाण्डु के शाप, पाण्डवों के जन्म और उनकी पत्नियों तथा तेरह पुत्रों का वर्णन करते हैं। वंशावली अभिमन्यु, परीक्षित, स्वयं जनमेजय और उनके पौत्र अश्वमेधदत्त पर पूरी होती है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.63.1)
पूरोर्वंशमहं धन्यं राज्ञाममिततेजसाम् । प्रवक्ष्यामि पितॄणां ते तेषां नामानि मे शृणु ॥
pūrorvaṃśamahaṃ dhanyaṃ rājñāmamitatejasām | pravakṣyāmi pitṝṇāṃ te teṣāṃ nāmāni me śṛṇu
मैं तुम्हारे पितरों — अपार तेजस्वी राजाओं — के, पूरु के यशस्वी वंश का वर्णन करूँगा। उनके नाम मुझसे सुनो।
श्लोक 2 (1.63.2)
अव्यक्तप्रभवो ब्रह्मा शाश्वतो नित्य अव्ययः । तस्मान्मरीचिः संजज्ञे दक्षश्चैव प्रजापतिः ॥
avyaktaprabhavo brahmā śāśvato nitya avyayaḥ | tasmānmarīciḥ saṃjajñe dakṣaścaiva prajāpatiḥ
अव्यक्त से उत्पन्न ब्रह्मा शाश्वत, नित्य और अविनाशी हैं। उनसे मरीचि और प्रजापति दक्ष उत्पन्न हुए।
श्लोक 3 (1.63.3)
अङ्गुष्ठाद्दक्षमसृजच्चक्षुर्भ्यां च मरीचिनम् । मरीचेः कश्यपः पुत्रो दक्षस्य दुहिताऽऽदितिः ॥
aṅguṣṭhāddakṣamasṛjaccakṣurbhyāṃ ca marīcinam | marīceḥ kaśyapaḥ putro dakṣasya duhitā''ditiḥ
उन्होंने अँगूठे से दक्ष को और नेत्रों से मरीचि को रचा। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए और दक्ष की पुत्री अदिति।
श्लोक 4 (1.63.4)
अदित्यां कश्यपाद्विवस्वान् । विवस्वतो मनुर्मनोरिला ॥
adityāṃ kaśyapādvivasvān | vivasvato manurmanorilā
कश्यप से अदिति के गर्भ से विवस्वान् हुए; विवस्वान् से मनु और मनु से इला।
श्लोक 5 (1.63.5)
इलायाः पुरूरवाः । पुरूरवस आयुः । आयुषो नहुषः । नहुषस्य ययातिः ॥
ilāyāḥ purūravāḥ | purūravasa āyuḥ | āyuṣo nahuṣaḥ | nahuṣasya yayātiḥ
इला से पुरूरवा, पुरूरवा से आयु, आयु से नहुष और नहुष से ययाति हुए।
श्लोक 6 (1.63.6)
ययातेर्द्वे भार्ये बभूवतुः । उशनसो दुहिता देवयानी वृषपर्वणश्च दुहिता शर्मिष्ठा नाम ॥
yayāterdve bhārye babhūvatuḥ | uśanaso duhitā devayānī vṛṣaparvaṇaśca duhitā śarmiṣṭhā nāma
ययाति की दो पत्नियाँ थीं — उशना (शुक्राचार्य) की पुत्री देवयानी और वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा।
श्लोक 7 (1.63.7)
तत्रानुवंशो भवति । यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत । द्रुह्युं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥
tatrānuvaṃśo bhavati | yaduṃ ca turvasuṃ caiva devayānī vyajāyata | druhyuṃ cānuṃ ca pūruṃ ca śarmiṣṭhā vārṣaparvaṇī
इस विषय में वंश-श्लोक है — "देवयानी ने यदु और तुर्वसु को जन्म दिया, और वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा ने द्रुह्यु, अनु और पूरु को।"
श्लोक 8 (1.63.8)
तत्र यदोर्यादवाः । पूरोः पौरवाः । पूरोर्भार्या कौसल्या बभूव । तस्यामस्य जज्ञे जनमेजयः ॥
tatra yadoryādavāḥ | pūroḥ pauravāḥ | pūrorbhāryā kausalyā babhūva | tasyāmasya jajñe janamejayaḥ
यदु से यादव हुए और पूरु से पौरव। पूरु की पत्नी कौसल्या थी; उससे उनके पुत्र जनमेजय का जन्म हुआ।
श्लोक 9 (1.63.9)
स त्रीन्हयमेधानाजहार । विश्वजिता चेष्ट्वा वनं प्रविवेश ॥
sa trīnhayamedhānājahāra | viśvajitā ceṣṭvā vanaṃ praviveśa
उन्होंने तीन अश्वमेध यज्ञ किए और विश्वजित् यज्ञ करके वन में प्रवेश किया।
श्लोक 10 (1.63.10)
जनमेजयस्तु सुनन्दां नामोपयेमे मागधीं । तस्यामस्य जज्ञे प्राचीन्वान् ॥
janamejayastu sunandāṃ nāmopayeme māgadhīṃ | tasyāmasya jajñe prācīnvān
जनमेजय ने मगध की राजकुमारी सुनन्दा से विवाह किया। उससे उनके पुत्र प्राचीन्वान् का जन्म हुआ,
श्लोक 11 (1.63.11)
यः प्राचीं दिशं जिगाय । यावत्सूर्योदयात् तत्तस्य प्राचीनत्वम् ॥
yaḥ prācīṃ diśaṃ jigāya | yāvatsūryodayāt tattasya prācīnatvam
जिसने पूर्व दिशा को सूर्य के उदय-स्थान तक जीत लिया; इसी से उसका नाम प्राचीन्वान् पड़ा।
श्लोक 12 (1.63.12)
प्राचीन्वांस्तु खल्वाश्मकीमुपयेमे यादवीम् । तस्यामस्य जज्ञे शय्यातिः ॥
prācīnvāṃstu khalvāśmakīmupayeme yādavīm | tasyāmasya jajñe śayyātiḥ
प्राचीन्वान् ने यदुवंश की कन्या अश्मकी से विवाह किया। उससे उनके पुत्र शय्याति का जन्म हुआ।
श्लोक 13 (1.63.13)
शय्यातिस्तु त्रिशङ्कोर्दुहितरं वराङ्गीं नामोपयेमे तस्यामस्य जज्ञेऽहंयातिः ॥
śayyātistu triśaṅkorduhitaraṃ varāṅgīṃ nāmopayeme tasyāmasya jajñe'haṃyātiḥ
शय्याति ने त्रिशंकु की पुत्री वरांगी से विवाह किया; उससे उनके पुत्र अहंयाति का जन्म हुआ।
श्लोक 14 (1.63.14)
अहंयातिस्तु खलु कृतवीर्यदुहितरं भानुमतीं नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे सार्वभौमः ॥
ahaṃyātistu khalu kṛtavīryaduhitaraṃ bhānumatīṃ nāmopayeme | tasyāmasya jajñe sārvabhaumaḥ
अहंयाति ने कृतवीर्य की पुत्री भानुमती से विवाह किया; उससे उनके पुत्र सार्वभौम का जन्म हुआ।
श्लोक 15 (1.63.15)
सार्वभौमस्तु खलु जित्वाऽऽजहार कैकयीं सुन्दरां नाम तामुपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे जयत्सेनः ॥
sārvabhaumastu khalu jitvā''jahāra kaikayīṃ sundarāṃ nāma tāmupayeme | tasyāmasya jajñe jayatsenaḥ
सार्वभौम ने युद्ध में जीतकर केकय की राजकुमारी सुन्दरा का हरण किया और उससे विवाह किया; उससे उनके पुत्र जयत्सेन का जन्म हुआ।
श्लोक 16 (1.63.16)
जयत्सेनस्तु खलु वैदर्भीमुपयेमे सुश्रवां नाम । तस्यामस्य जज्ञेऽपराचीनः ॥
jayatsenastu khalu vaidarbhīmupayeme suśravāṃ nāma | tasyāmasya jajñe'parācīnaḥ
जयत्सेन ने विदर्भ की राजकुमारी सुश्रवा से विवाह किया; उससे उनके पुत्र अपराचीन का जन्म हुआ।
श्लोक 17 (1.63.17)
अपराचीनस्तु खलु वैदर्भीमपरामुपयेमे मर्यादां नाम । तस्यामस्य जज्ञेऽरिहः ॥
aparācīnastu khalu vaidarbhīmaparāmupayeme maryādāṃ nāma | tasyāmasya jajñe'rihaḥ
अपराचीन ने विदर्भ की ही एक अन्य राजकुमारी मर्यादा से विवाह किया; उससे उनके पुत्र अरिह का जन्म हुआ।
श्लोक 18 (1.63.18)
अरिहः खल्वाङ्गीमुपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे महाभौमः ॥
arihaḥ khalvāṅgīmupayeme | tasyāmasya jajñe mahābhaumaḥ
अरिह ने अंग देश की राजकुमारी से विवाह किया; उससे उनके पुत्र महाभौम का जन्म हुआ।
श्लोक 19 (1.63.19)
महाभौमस्तु खलु प्रसेनजिद्दुहितरमुपयेमे सुयज्ञां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अयुतानायी ॥
mahābhaumastu khalu prasenajidduhitaramupayeme suyajñāṃ nāma | tasyāmasya jajñe ayutānāyī
महाभौम ने प्रसेनजित् की पुत्री सुयज्ञा से विवाह किया; उससे उनके पुत्र अयुतानायी का जन्म हुआ,
श्लोक 20 (1.63.20)
यः पुरुषमेधे पुरुषाणामयुतमानयत्तत्तस्यायुतानायित्वम् ॥
yaḥ puruṣamedhe puruṣāṇāmayutamānayattattasyāyutānāyitvam
जिसने पुरुषमेध यज्ञ में दस हज़ार (अयुत) पुरुषों को लाया था; इसी से उसका नाम अयुतानायी पड़ा।
श्लोक 21 (1.63.21)
अयुतानायी तु खलु पृथुश्रवसो दुहितरमुपयेमे भासां नाम । तस्यामस्य जज्ञेऽक्रोधनः ॥
ayutānāyī tu khalu pṛthuśravaso duhitaramupayeme bhāsāṃ nāma | tasyāmasya jajñe'krodhanaḥ
अयुतानायी ने पृथुश्रवा की पुत्री भासा से विवाह किया; उससे उनके पुत्र अक्रोधन का जन्म हुआ।
श्लोक 22 (1.63.22)
अक्रोधनस्तु खलु कालिङ्गीं कण्डूं नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे देवातिथिः ॥
akrodhanastu khalu kāliṅgīṃ kaṇḍūṃ nāmopayeme | tasyāmasya jajñe devātithiḥ
अक्रोधन ने कलिंग की राजकुमारी कण्डू से विवाह किया; उससे उनके पुत्र देवातिथि का जन्म हुआ।
श्लोक 23 (1.63.23)
देवातिथिस्तु खलु वैदर्भीमुपयेमे मर्यादां नाम तस्यामस्य जज्ञे ऋचः ॥
devātithistu khalu vaidarbhīmupayeme maryādāṃ nāma tasyāmasya jajñe ṛcaḥ
देवातिथि ने विदर्भ की राजकुमारी मर्यादा से विवाह किया; उससे उनके पुत्र ऋच का जन्म हुआ।
श्लोक 24 (1.63.24)
ऋचस्तु खलु वामदेव्यामङ्गराजकन्यायामृक्षं पुत्रमजीजनत् ॥
ṛcastu khalu vāmadevyāmaṅgarājakanyāyāmṛkṣaṃ putramajījanat
ऋच ने अंगराज की कन्या वामदेवी से ऋक्ष नामक पुत्र उत्पन्न किया।
श्लोक 25 (1.63.25)
ऋक्षस्तु खलु तक्षकदुहितरं ज्वलन्तीं नामोपयेमे । तस्यामन्त्यनारमुत्पादयामास ॥
ṛkṣastu khalu takṣakaduhitaraṃ jvalantīṃ nāmopayeme | tasyāmantyanāramutpādayāmāsa
ऋक्ष ने तक्षक की पुत्री ज्वलन्ती से विवाह किया और उससे अन्त्यनार को उत्पन्न किया।
श्लोक 26 (1.63.26)
अन्त्यनारस्तु खलु सरस्वत्यां द्वादशवार्षिकं सत्रमाजहार । तमुदवसाने सरस्वत्यभिगम्य भर्तारं वरयामास ॥
antyanārastu khalu sarasvatyāṃ dvādaśavārṣikaṃ satramājahāra | tamudavasāne sarasvatyabhigamya bhartāraṃ varayāmāsa
अन्त्यनार ने सरस्वती के तट पर बारह वर्ष का सत्र-यज्ञ किया। उसके पूर्ण होने पर सरस्वती ने उनके पास आकर उन्हें पति के रूप में वरण किया।
श्लोक 27 (1.63.27)
तस्यां पुत्रं जनयामास त्रस्नुं नाम । अत्रानुवंशो भवति ॥
tasyāṃ putraṃ janayāmāsa trasnuṃ nāma | atrānuvaṃśo bhavati
उससे उन्होंने त्रस्नु नामक पुत्र उत्पन्न किया। इस विषय में वंश-श्लोक है —
श्लोक 28 (1.63.28)
त्रस्नुं सरस्वती पुत्रमन्त्यनारादजीजनत् । इलिलं जनयामास कालिन्द्यां त्रस्नुरात्मजम् ॥
trasnuṃ sarasvatī putramantyanārādajījanat | ililaṃ janayāmāsa kālindyāṃ trasnurātmajam
"सरस्वती ने अन्त्यनार से त्रस्नु नामक पुत्र को जन्म दिया, और त्रस्नु ने कालिन्दी से इलिल नामक पुत्र उत्पन्न किया।"
श्लोक 29 (1.63.29)
इलिलस्तु रथन्तर्यां दुष्यन्तादीन्पञ्च पुत्रानजीजनत् ॥
ililastu rathantaryāṃ duṣyantādīnpañca putrānajījanat
इलिल ने रथन्तरी से दुष्यन्त आदि पाँच पुत्र उत्पन्न किए।
श्लोक 30 (1.63.30)
दुष्यन्तस्तु लाक्षीं नाम भागीरथीमुपयेमे तस्यामस्य जज्ञे जनमेजयः ॥
duṣyantastu lākṣīṃ nāma bhāgīrathīmupayeme tasyāmasya jajñe janamejayaḥ
दुष्यन्त ने भगीरथ के वंश की कन्या लाक्षी से विवाह किया; उससे उनके पुत्र जनमेजय का जन्म हुआ।
श्लोक 31 (1.63.31)
स एव दुष्यन्तो विश्वामित्रदुहितरं शकुन्तलां नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे भरतः ॥
sa eva duṣyanto viśvāmitraduhitaraṃ śakuntalāṃ nāmopayeme | tasyāmasya jajñe bharataḥ
उन्हीं दुष्यन्त ने विश्वामित्र की पुत्री शकुन्तला से विवाह किया; उससे उनके पुत्र भरत का जन्म हुआ।
श्लोक 32 (1.63.32)
तत्रेमौ श्लोकौ भवतः । माता भस्त्रा पितुः पुत्रो यस्माज्जातः स एव सः । भरस्व पुत्रं दौष्यन्तिं सत्यमाह शकुन्तला ॥
tatremau ślokau bhavataḥ | mātā bhastrā pituḥ putro yasmājjātaḥ sa eva saḥ | bharasva putraṃ dauṣyantiṃ satyamāha śakuntalā
इस विषय में दो श्लोक हैं — "माता तो केवल धौंकनी (पात्र) है; पुत्र पिता का होता है, जिससे वह जन्मा है वही पुत्र रूप में होता है। दुष्यन्त के इस पुत्र का भरण करो; शकुन्तला ने सत्य कहा है।
श्लोक 33 (1.63.33)
रेतोधाः पुत्र उन्नयति नरदेव यमक्षयात् । त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ॥
retodhāḥ putra unnayati naradeva yamakṣayāt | tvaṃ cāsya dhātā garbhasya satyamāha śakuntalā
हे नरदेव, पुत्र अपने जनक को यमलोक से ऊपर उठा लेता है। इस गर्भ के स्थापक तुम ही हो; शकुन्तला ने सत्य कहा है।"
श्लोक 34 (1.63.34)
ततोऽस्य भरतत्वम् । भरतस्तु खलु काशेयीं सार्वसेनीमुपयेमे सुनन्दां नाम । तस्यामस्य जज्ञे भुमन्युः ॥
tato'sya bharatatvam | bharatastu khalu kāśeyīṃ sārvasenīmupayeme sunandāṃ nāma | tasyāmasya jajñe bhumanyuḥ
इसी ('भरस्व' — भरण करो) से उनका नाम भरत पड़ा। भरत ने काशी के राजा सर्वसेन की पुत्री सुनन्दा से विवाह किया; उससे उनके पुत्र भुमन्यु का जन्म हुआ।
श्लोक 35 (1.63.35)
भुमन्युस्तु खलु दाशार्हीमुपयेमे सुवर्णां नाम । तस्यामस्य जज्ञे सुहोत्रः ॥
bhumanyustu khalu dāśārhīmupayeme suvarṇāṃ nāma | tasyāmasya jajñe suhotraḥ
भुमन्यु ने दशार्ह वंश की कन्या सुवर्णा से विवाह किया; उससे उनके पुत्र सुहोत्र का जन्म हुआ।
श्लोक 36 (1.63.36)
सुहोत्रस्तु खल्वैक्ष्वाकीमुपयेमे जयन्तीं नाम । तस्यामस्य जज्ञे हस्ती । य इदं पुरं निर्मापयामास ॥
suhotrastu khalvaikṣvākīmupayeme jayantīṃ nāma | tasyāmasya jajñe hastī | ya idaṃ puraṃ nirmāpayāmāsa
सुहोत्र ने इक्ष्वाकु वंश की कन्या जयन्ती से विवाह किया; उससे उनके पुत्र हस्ती का जन्म हुआ, जिन्होंने यह नगर बसाया।
श्लोक 37 (1.63.37)
तस्माद्धास्तिनपुरत्वम् । हस्ती खलु त्रैगर्तीमुपयेमे यशोदां नाम तस्यामस्य जज्ञे विकुञ्जनः ॥
tasmāddhāstinapuratvam | hastī khalu traigartīmupayeme yaśodāṃ nāma tasyāmasya jajñe vikuñjanaḥ
इसी से नगर का नाम हस्तिनापुर पड़ा। हस्ती ने त्रिगर्त की राजकुमारी यशोदा से विवाह किया; उससे उनके पुत्र विकुञ्जन का जन्म हुआ।
श्लोक 38 (1.63.38)
विकुञ्जनस्तु खलु दाशार्हीमुपयेमे सुन्दरां नाम । तस्यामस्य जज्ञेऽजमीढः ॥
vikuñjanastu khalu dāśārhīmupayeme sundarāṃ nāma | tasyāmasya jajñe'jamīḍhaḥ
विकुञ्जन ने दशार्ह वंश की कन्या सुन्दरा से विवाह किया; उससे उनके पुत्र अजमीढ का जन्म हुआ।
श्लोक 39 (1.63.39)
अजमीढस्य तु चतुर्विंशतिपुत्रशतं बभूव । कैकय्यां नागायां गान्धार्यां विमलायामृक्षायामिति ॥
ajamīḍhasya tu caturviṃśatiputraśataṃ babhūva | kaikayyāṃ nāgāyāṃ gāndhāryāṃ vimalāyāmṛkṣāyāmiti
अजमीढ के कैकयी, नागा, गान्धारी, विमला और ऋक्षा से एक सौ चौबीस पुत्र हुए।
श्लोक 40 (1.63.40)
पृथग्वंशकर्तारो नृपतयः । तत्र अजमीढादृक्षायां संवरणो जज्ञे स वंशकरः ॥
pṛthagvaṃśakartāro nṛpatayaḥ | tatra ajamīḍhādṛkṣāyāṃ saṃvaraṇo jajñe sa vaṃśakaraḥ
वे सब अलग-अलग वंशों के प्रवर्तक राजा हुए। उनमें अजमीढ से ऋक्षा के गर्भ से संवरण का जन्म हुआ; वही इस वंश के प्रवर्तक हुए।
श्लोक 41 (1.63.41)
संवरणस्तु वैवस्वतीं तपतीं नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे कुरुः ॥
saṃvaraṇastu vaivasvatīṃ tapatīṃ nāmopayeme | tasyāmasya jajñe kuruḥ
संवरण ने सूर्य (विवस्वान्) की पुत्री तपती से विवाह किया; उससे उनके पुत्र कुरु का जन्म हुआ।
श्लोक 42 (1.63.42)
कुरुस्तु खलु दाशार्हीमुपयेमे शुभाङ्गीं नाम । तस्यामस्य जज्ञे विदूरथः ॥
kurustu khalu dāśārhīmupayeme śubhāṅgīṃ nāma | tasyāmasya jajñe vidūrathaḥ
कुरु ने दशार्ह वंश की कन्या शुभांगी से विवाह किया; उससे उनके पुत्र विदूरथ का जन्म हुआ।
श्लोक 43 (1.63.43)
विदूरथस्तु खलु मागधीमुपयेमे संप्रियां नाम । तस्यामस्य जज्ञेऽनश्वान् ॥
vidūrathastu khalu māgadhīmupayeme saṃpriyāṃ nāma | tasyāmasya jajñe'naśvān
विदूरथ ने मगध की राजकुमारी सम्प्रिया से विवाह किया; उससे उनके पुत्र अनश्वा का जन्म हुआ।
श्लोक 44 (1.63.44)
अनश्वांस्तु खलु मागधीमुपयेमेऽमृतां नाम । तस्यामस्य जज्ञे परिक्षित् ॥
anaśvāṃstu khalu māgadhīmupayeme'mṛtāṃ nāma | tasyāmasya jajñe parikṣit
अनश्वा ने मगध की राजकुमारी अमृता से विवाह किया; उससे उनके पुत्र परीक्षित् का जन्म हुआ।
श्लोक 45 (1.63.45)
परिक्षित्खलु बाहुकामुपयेमे सुवेषां नाम । तस्यामस्य जज्ञे भीमसेनः ॥
parikṣitkhalu bāhukāmupayeme suveṣāṃ nāma | tasyāmasya jajñe bhīmasenaḥ
परीक्षित् ने बाहुक वंश की कन्या सुवेषा से विवाह किया; उससे उनके पुत्र भीमसेन का जन्म हुआ।
श्लोक 46 (1.63.46)
भीमसेनस्तु खलु कैकयीमुपयेमे सुकुमारीं नाम । तस्यामस्य जज्ञे परिश्रवाः ॥
bhīmasenastu khalu kaikayīmupayeme sukumārīṃ nāma | tasyāmasya jajñe pariśravāḥ
भीमसेन ने केकय की राजकुमारी सुकुमारी से विवाह किया; उससे उनके पुत्र परिश्रवा का जन्म हुआ,
श्लोक 47 (1.63.47)
यमाहुः प्रतीप इति । प्रतीपस्तु खलु शैब्यामुपयेमे सुनन्दीं नाम । तस्यां त्रीन्पुत्रानुत्पादयामास देवापिं शन्तनुं बाह्लीकं चेति ॥
yamāhuḥ pratīpa iti | pratīpastu khalu śaibyāmupayeme sunandīṃ nāma | tasyāṃ trīnputrānutpādayāmāsa devāpiṃ śantanuṃ bāhlīkaṃ ceti
जिन्हें प्रतीप कहते हैं। प्रतीप ने शिबि वंश की कन्या सुनन्दी से विवाह किया और उससे तीन पुत्र उत्पन्न किए — देवापि, शान्तनु और बाह्लीक।
श्लोक 48 (1.63.48)
देवापिस्तु खलु बाल एवारण्यं प्रविवेश । शन्तनुस्तु महीपालोऽभवत् ॥
devāpistu khalu bāla evāraṇyaṃ praviveśa | śantanustu mahīpālo'bhavat
देवापि बचपन में ही वन चले गए, और शान्तनु राजा बने।
श्लोक 49 (1.63.49)
तत्र श्लोको भवति । यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्णं स सुखमश्नुते । पुनर्युवा च भवति तस्मात्तं शन्तनुं विदुः ॥
tatra śloko bhavati | yaṃ yaṃ karābhyāṃ spṛśati jīrṇaṃ sa sukhamaśnute | punaryuvā ca bhavati tasmāttaṃ śantanuṃ viduḥ
इस विषय में श्लोक है — "वे जिस-जिस वृद्ध को अपने हाथों से छू देते, वह सुख पाता और फिर से युवा हो जाता; इसी से लोग उन्हें शान्तनु जानते थे।"
श्लोक 50 (1.63.50)
तदस्य शन्तनुत्वं । शन्तनुस्तु खलु गङ्गां भागीरथीमुपयेमे तस्यामस्य जज्ञे देवव्रतः । यमाहुर्भीष्म इति ॥
tadasya śantanutvaṃ | śantanustu khalu gaṅgāṃ bhāgīrathīmupayeme tasyāmasya jajñe devavrataḥ | yamāhurbhīṣma iti
इसी से उनका नाम शान्तनु पड़ा। शान्तनु ने भागीरथी गंगा से विवाह किया; उससे उनके पुत्र देवव्रत का जन्म हुआ, जिन्हें भीष्म कहते हैं।
श्लोक 51 (1.63.51)
भीष्मस्तु खलु पितुः प्रियचिकीर्षया सत्यवतीमानयामास मातरं । यामाहुः कालीति ॥
bhīṣmastu khalu pituḥ priyacikīrṣayā satyavatīmānayāmāsa mātaraṃ | yāmāhuḥ kālīti
भीष्म अपने पिता का प्रिय करने की इच्छा से सत्यवती को माता के रूप में ले आए, जिन्हें काली कहते हैं।
श्लोक 52 (1.63.52)
तस्यां पूर्वं पराशरात्कन्यागर्भो द्वैपायनः । तस्यामेव शन्तनोर्द्वौ पुत्रौ बभूवतुः चित्राङ्गदो विचित्रवीर्यश्च ॥
tasyāṃ pūrvaṃ parāśarātkanyāgarbho dvaipāyanaḥ | tasyāmeva śantanordvau putrau babhūvatuḥ citrāṅgado vicitravīryaśca
उससे पहले, कुमारी अवस्था में ही, उन्होंने पराशर से द्वैपायन को जन्म दिया था। उन्हीं से शान्तनु के दो पुत्र हुए — चित्रांगद और विचित्रवीर्य।
श्लोक 53 (1.63.53)
चित्राङ्गदस्तु प्राप्तराज्य एव गन्धर्वेण निहृतः । ततो विचित्रवीर्यो राजा बभूव ॥
citrāṅgadastu prāptarājya eva gandharveṇa nihṛtaḥ | tato vicitravīryo rājā babhūva
चित्रांगद राज्य पाते ही एक गन्धर्व द्वारा मारे गए। तब विचित्रवीर्य राजा हुए।
श्लोक 54 (1.63.54)
विचित्रवीर्यस्तु खलु काशिराजस्य सुते अम्बिकाम्बालिके उदवहत् । विचित्रवीर्योऽनुत्पन्नापत्य एव विदेहत्वं प्राप्तः ॥
vicitravīryastu khalu kāśirājasya sute ambikāmbālike udavahat | vicitravīryo'nutpannāpatya eva videhatvaṃ prāptaḥ
विचित्रवीर्य ने काशिराज की पुत्रियों अम्बिका और अम्बालिका से विवाह किया। विचित्रवीर्य बिना सन्तान उत्पन्न हुए ही देह त्याग गए।
श्लोक 55 (1.63.55)
ततः सत्यवती चिन्तयामास कथं नु खलु शन्तनोः पिण्डविच्छेदो न स्यादिति ॥
tataḥ satyavatī cintayāmāsa kathaṃ nu khalu śantanoḥ piṇḍavicchedo na syāditi
तब सत्यवती ने विचार किया — "किस प्रकार शान्तनु के पितरों का पिण्ड-दान लुप्त न हो?"
श्लोक 56 (1.63.56)
साथ द्वैपायनं चिन्तयामास सोऽग्रतः स्थितः किं करवाणीति । तं सत्यवत्युवाच भ्राता तेऽनपत्य एव स्वर्गतः तस्यार्थेऽपत्यमुत्पादयेति ॥
sātha dvaipāyanaṃ cintayāmāsa so'grataḥ sthitaḥ kiṃ karavāṇīti | taṃ satyavatyuvāca bhrātā te'napatya eva svargataḥ tasyārthe'patyamutpādayeti
उन्होंने द्वैपायन का स्मरण किया। वे उनके सामने आकर खड़े हो गए और बोले, "मैं क्या करूँ?" सत्यवती ने उनसे कहा, "तुम्हारा भाई निःसन्तान ही स्वर्ग चला गया है। उसके लिए सन्तान उत्पन्न करो।"
श्लोक 57 (1.63.57)
स परमित्युवाच स तत्र त्रीन्पुत्रानुत्पादयामास धृतराष्ट्रं पाण्डुं विदुरं चेति ॥
sa paramityuvāca sa tatra trīnputrānutpādayāmāsa dhṛtarāṣṭraṃ pāṇḍuṃ viduraṃ ceti
उन्होंने "बहुत अच्छा" कहा और वहाँ तीन पुत्र उत्पन्न किए — धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर।
श्लोक 58 (1.63.58)
धृतराष्ट्रात्पुत्रशतं बभूव गान्धार्यां वरदानाद्द्वैपायनस्य तेषां च । धार्तराष्ट्राणां चत्वारः प्रधानाः दुर्योधनो दुश्शासनो विकर्णश्चित्रसेनश्चेति ॥
dhṛtarāṣṭrātputraśataṃ babhūva gāndhāryāṃ varadānāddvaipāyanasya teṣāṃ ca | dhārtarāṣṭrāṇāṃ catvāraḥ pradhānāḥ duryodhano duśśāsano vikarṇaścitrasenaśceti
द्वैपायन के वरदान से धृतराष्ट्र के गान्धारी से सौ पुत्र हुए। धृतराष्ट्र के उन पुत्रों में चार प्रमुख थे — दुर्योधन, दुःशासन, विकर्ण और चित्रसेन।
श्लोक 59 (1.63.59)
पाण्डोस्तु कुन्ती माद्रीति स्त्रीरत्ने बभूवतुः । स मृगयां चरन्मैथुनगतमृषिं मृगचारिणं बाणेन जघान ॥
pāṇḍostu kuntī mādrīti strīratne babhūvatuḥ | sa mṛgayāṃ caranmaithunagatamṛṣiṃ mṛgacāriṇaṃ bāṇena jaghāna
पाण्डु की दो स्त्री-रत्न पत्नियाँ थीं — कुन्ती और माद्री। एक बार शिकार खेलते हुए उन्होंने मृग रूप में विचरते और मैथुन में लगे एक ऋषि को बाण से मार दिया।
श्लोक 60 (1.63.60)
स बाणविद्ध उवाच पाण्डुम् । अत्र श्लोको भवति ॥
sa bāṇaviddha uvāca pāṇḍum | atra śloko bhavati
बाण से बिंधे हुए ऋषि ने पाण्डु से कहा। इस विषय में श्लोक है —
श्लोक 61 (1.63.61)
योऽकृतार्थं हि मां क्रूर बाणेनाहन् मृगव्रतम् । त्वामप्येतादृशो भावः क्षिप्रमेवागमिष्यति ॥
yo'kṛtārthaṃ hi māṃ krūra bāṇenāhan mṛgavratam | tvāmapyetādṛśo bhāvaḥ kṣipramevāgamiṣyati
"हे क्रूर, मृग-व्रत का पालन करते हुए, मेरी कामना पूरी होने से पहले ही तुमने मुझे बाण से मार दिया; इसलिए ऐसी ही दशा शीघ्र तुम पर भी आएगी।"
श्लोक 62 (1.63.62)
इति मृगव्रतचारिणा ऋषिणा शप्तः । स विषण्णरूपः पाण्डुस्तं शापं परिहरन्नोपसर्पति भार्ये ॥
iti mṛgavratacāriṇā ṛṣiṇā śaptaḥ | sa viṣaṇṇarūpaḥ pāṇḍustaṃ śāpaṃ pariharannopasarpati bhārye
इस प्रकार मृग-व्रत का पालन करने वाले ऋषि ने पाण्डु को शाप दिया। उदास होकर, उस शाप से बचते हुए पाण्डु अपनी पत्नियों के पास नहीं जाते थे।
श्लोक 63 (1.63.63)
कदाचित्स आह । स्वचापल्यादिदं प्राप्तवानहम् । पुराणेषु पठ्यमानं शृणोमि नानपत्यस्य लोकाः सन्तीति ॥
kadācitsa āha | svacāpalyādidaṃ prāptavānaham | purāṇeṣu paṭhyamānaṃ śṛṇomi nānapatyasya lokāḥ santīti
एक दिन उन्होंने कहा — "अपनी ही चपलता से मैं इस दशा को पहुँचा हूँ। पुराणों में पढ़ा जाता हुआ मैं सुनता हूँ कि सन्तानहीन के लिए कोई लोक नहीं होते।"
श्लोक 64 (1.63.64)
सा त्वं मदर्थे पुत्रानुत्पादयेति कुन्तीमुवाच ॥
sā tvaṃ madarthe putrānutpādayeti kuntīmuvāca
"इसलिए तुम मेरे लिए पुत्र उत्पन्न करो," उन्होंने कुन्ती से कहा।
श्लोक 65 (1.63.65)
सा कुन्ती पुत्रानुत्पादयामास धर्माद्युधिष्ठिरं मारुताद्भीमसेनमिन्द्रादर्जुनमिति । स हृष्टरूपः पाण्डुरुवाच । इयं ते सपत्नी भवति माद्र्यनपत्या व्रीडिता साध्वी अस्यामपत्यमुत्पाद्यतामिति ॥
sā kuntī putrānutpādayāmāsa dharmādyudhiṣṭhiraṃ mārutādbhīmasenamindrādarjunamiti | sa hṛṣṭarūpaḥ pāṇḍuruvāca | iyaṃ te sapatnī bhavati mādryanapatyā vrīḍitā sādhvī asyāmapatyamutpādyatāmiti
कुन्ती ने पुत्र उत्पन्न किए — धर्म से युधिष्ठिर, वायु से भीमसेन और इन्द्र से अर्जुन। हर्षित होकर पाण्डु बोले, "यह तुम्हारी सौत माद्री सन्तानहीन और लज्जित है, साध्वी है। इसके भी सन्तान उत्पन्न की जाए।"
श्लोक 66 (1.63.66)
सा कुन्ती तस्यै माद्र्यै तथेति व्रतमादिदेश । ततस्तस्यां नकुलसहदेवौ यमावश्विभ्यां जज्ञाते ॥
sā kuntī tasyai mādryai tatheti vratamādideśa | tatastasyāṃ nakulasahadevau yamāvaśvibhyāṃ jajñāte
कुन्ती ने "ऐसा ही हो" कहकर माद्री को वह विधि (मन्त्र) बता दी। तब उससे अश्विनीकुमारों द्वारा जुड़वाँ नकुल और सहदेव उत्पन्न हुए।
श्लोक 67 (1.63.67)
माद्रीं तु खलु स्वलङ्कृतां दृष्ट्वा पाण्डुर्भावं चक्रे । स तां प्राप्यैव विदेहत्वं प्राप्तः ॥
mādrīṃ tu khalu svalaṅkṛtāṃ dṛṣṭvā pāṇḍurbhāvaṃ cakre | sa tāṃ prāpyaiva videhatvaṃ prāptaḥ
माद्री को सुन्दर आभूषणों से सजी देखकर पाण्डु के मन में काम-भाव जागा। उसे पाते ही उनका देहान्त हो गया।
श्लोक 68 (1.63.68)
ततस्तेन सह चितामन्वारुरोह माद्री । कुन्तीं चोवाच यमयोरार्ययाऽप्रमत्तया भवितव्यमिति ॥
tatastena saha citāmanvāruroha mādrī | kuntīṃ covāca yamayorāryayā'pramattayā bhavitavyamiti
तब माद्री उनके साथ चिता पर चढ़ गई, और कुन्ती से बोली — "आर्ये, आप सावधान रहकर जुड़वाँ पुत्रों की देखभाल करना।"
श्लोक 69 (1.63.69)
ततः पञ्चपाण्डवान्सह कुन्त्या हास्तिनपुरं नयन्ति स्म तपस्विनः ॥
tataḥ pañcapāṇḍavānsaha kuntyā hāstinapuraṃ nayanti sma tapasvinaḥ
तब तपस्वी पाँचों पाण्डवों को कुन्ती के साथ हस्तिनापुर ले गए।
श्लोक 70 (1.63.70)
तत्र भीष्माय धृतराष्ट्रविदुरयोः पाण्डोः स्वर्गगमनं याथातथ्यं निवेदयन्तिस्म तपस्विनः ॥
tatra bhīṣmāya dhṛtarāṣṭravidurayoḥ pāṇḍoḥ svargagamanaṃ yāthātathyaṃ nivedayantisma tapasvinaḥ
वहाँ तपस्वियों ने भीष्म, धृतराष्ट्र और विदुर को पाण्डु के स्वर्गवास का यथार्थ वृत्तान्त बताया।
श्लोक 71 (1.63.71)
पाण्डवान्सह कुन्त्या जतुगृहे दाहयितुकामो धृतराष्ट्रात्मजोऽभूत् ॥
pāṇḍavānsaha kuntyā jatugṛhe dāhayitukāmo dhṛtarāṣṭrātmajo'bhūt
धृतराष्ट्र का पुत्र पाण्डवों को कुन्ती सहित लाक्षागृह में जला देना चाहता था।
श्लोक 72 (1.63.72)
तांश्च विदुरो मोक्षयामास । ततो भीमो हिडिम्बं हत्वा पुत्रमुत्पादयामास हिडिम्बायां घटोत्कचं नाम ॥
tāṃśca viduro mokṣayāmāsa | tato bhīmo hiḍimbaṃ hatvā putramutpādayāmāsa hiḍimbāyāṃ ghaṭotkacaṃ nāma
किन्तु विदुर ने उन्हें बचा लिया। फिर भीम ने राक्षस हिडिम्ब को मारकर हिडिम्बा से घटोत्कच नामक पुत्र उत्पन्न किया।
श्लोक 73 (1.63.73)
ततश्चैकचक्रां जग्मुः कुशलिनः । ततः पाञ्चालविषयं गत्वा स्वयंवरे द्रौपदीं लब्ध्वाऽर्धराज्यं प्राप्येन्द्रप्रस्थनिवासिनस्तस्यां पुत्रानुत्पादयामासुर्द्रौपद्याम् ॥
tataścaikacakrāṃ jagmuḥ kuśalinaḥ | tataḥ pāñcālaviṣayaṃ gatvā svayaṃvare draupadīṃ labdhvā'rdharājyaṃ prāpyendraprasthanivāsinastasyāṃ putrānutpādayāmāsurdraupadyām
फिर वे सकुशल एकचक्रा गए। उसके बाद पांचाल देश जाकर उन्होंने स्वयंवर में द्रौपदी को प्राप्त किया, आधा राज्य पाया, और इन्द्रप्रस्थ में रहते हुए उस द्रौपदी से पुत्र उत्पन्न किए —
श्लोक 74 (1.63.74)
प्रतिविन्ध्यं युधिष्ठिरः । सुतसोमं वृकोदरः । श्रुतकीर्तिमर्जुनः । शतानीकं नकुलः । श्रुतसेनं सहदेव इति ॥
prativindhyaṃ yudhiṣṭhiraḥ | sutasomaṃ vṛkodaraḥ | śrutakīrtimarjunaḥ | śatānīkaṃ nakulaḥ | śrutasenaṃ sahadeva iti
युधिष्ठिर ने प्रतिविन्ध्य को, वृकोदर (भीम) ने सुतसोम को, अर्जुन ने श्रुतकीर्ति को, नकुल ने शतानीक को और सहदेव ने श्रुतसेन को उत्पन्न किया।
श्लोक 75 (1.63.75)
शैव्यस्य कन्यां देवकीं नामोपयेमे युधिष्ठिरः । तस्यां पुत्रं जनयामास यौधेयं नाम ॥
śaivyasya kanyāṃ devakīṃ nāmopayeme yudhiṣṭhiraḥ | tasyāṃ putraṃ janayāmāsa yaudheyaṃ nāma
युधिष्ठिर ने शैब्य की पुत्री देवकी से विवाह किया; उससे उन्होंने यौधेय नामक पुत्र उत्पन्न किया।
श्लोक 76 (1.63.76)
भीमसेनस्तु वाराणस्यां काशिराजकन्यां जलन्धरां नामोपयेमे स्वयंवरस्थां । तस्यामस्य जज्ञे शर्वत्रातः ॥
bhīmasenastu vārāṇasyāṃ kāśirājakanyāṃ jalandharāṃ nāmopayeme svayaṃvarasthāṃ | tasyāmasya jajñe śarvatrātaḥ
भीमसेन ने वाराणसी में स्वयंवर में उपस्थित काशिराज की कन्या जलन्धरा से विवाह किया; उससे उनके पुत्र शर्वत्रात का जन्म हुआ।
श्लोक 77 (1.63.77)
अर्जुनस्तु खलु द्वारवतीं गत्वा भगवतो वासुदेवस्य भगिनीं सुभद्रां नामोदवहद्भार्यां । तस्यामभिमन्युं नाम पुत्रं जनयामास ॥
arjunastu khalu dvāravatīṃ gatvā bhagavato vāsudevasya bhaginīṃ subhadrāṃ nāmodavahadbhāryāṃ | tasyāmabhimanyuṃ nāma putraṃ janayāmāsa
अर्जुन ने द्वारका जाकर भगवान वासुदेव की बहन सुभद्रा को पत्नी बनाया; उससे उन्होंने अभिमन्यु नामक पुत्र उत्पन्न किया।
श्लोक 78 (1.63.78)
नकुलस्तु खलु चैद्यां रेणुमतीं नामोदवहत् । तस्यां पुत्रं जनयामास निरमित्रं नाम ॥
nakulastu khalu caidyāṃ reṇumatīṃ nāmodavahat | tasyāṃ putraṃ janayāmāsa niramitraṃ nāma
नकुल ने चेदि की राजकुमारी रेणुमती से विवाह किया; उससे उन्होंने निरमित्र नामक पुत्र उत्पन्न किया।
श्लोक 79 (1.63.79)
सहदेवस्तु खलु माद्रीमेव स्वयंवरे विजयां नामोदवहद्भार्याम् । तस्यां पुत्रं जनयामास सुहोत्रं नाम ॥
sahadevastu khalu mādrīmeva svayaṃvare vijayāṃ nāmodavahadbhāryām | tasyāṃ putraṃ janayāmāsa suhotraṃ nāma
सहदेव ने स्वयंवर में मद्र देश की राजकुमारी विजया से विवाह किया; उससे उन्होंने सुहोत्र नामक पुत्र उत्पन्न किया।
श्लोक 80 (1.63.80)
भीमसेनश्च पूर्वमेव हिडिम्बायां राक्षस्यां पुत्रमुत्पादयामास घटोत्कचं नाम । अर्जुनस्तु नागकन्यायामुलूप्यामिरावन्तं नाम पुत्रं जनयामास ॥
bhīmasenaśca pūrvameva hiḍimbāyāṃ rākṣasyāṃ putramutpādayāmāsa ghaṭotkacaṃ nāma | arjunastu nāgakanyāyāmulūpyāmirāvantaṃ nāma putraṃ janayāmāsa
भीमसेन ने पहले ही राक्षसी हिडिम्बा से घटोत्कच नामक पुत्र उत्पन्न किया था। अर्जुन ने नागकन्या उलूपी से इरावान् नामक पुत्र उत्पन्न किया।
श्लोक 81 (1.63.81)
ततो मणलूरपतिकन्यायां चित्राङ्गदायामर्जुनः पुत्रमुत्पादयामास बभ्रुवाहनं नाम । एते त्रयोदश पुत्राः पाण्डवानाम् ॥
tato maṇalūrapatikanyāyāṃ citrāṅgadāyāmarjunaḥ putramutpādayāmāsa babhruvāhanaṃ nāma | ete trayodaśa putrāḥ pāṇḍavānām
फिर अर्जुन ने मणलूर के राजा की कन्या चित्रांगदा से बभ्रुवाहन नामक पुत्र उत्पन्न किया। ये पाण्डवों के तेरह पुत्र हैं।
श्लोक 82 (1.63.82)
विराटस्य दुहितरमुत्तरां नामाभिमन्युरुपयेमे । तस्यामस्य परासुर्गर्भोऽजायत ॥
virāṭasya duhitaramuttarāṃ nāmābhimanyurupayeme | tasyāmasya parāsurgarbho'jāyata
अभिमन्यु ने विराट की पुत्री उत्तरा से विवाह किया। उससे उनका एक निष्प्राण शिशु जन्मा।
श्लोक 83 (1.63.83)
तमुत्सङ्गे प्रतिजग्राह पृथा नियोगात्पुरुषोत्तमस्य । षाण्मासिकं गर्भमहं जीवयामि पादस्पर्शादिति वासुदेव उवाच ॥
tamutsaṅge pratijagrāha pṛthā niyogātpuruṣottamasya | ṣāṇmāsikaṃ garbhamahaṃ jīvayāmi pādasparśāditi vāsudeva uvāca
पुरुषोत्तम (श्रीकृष्ण) की आज्ञा से पृथा (कुन्ती) ने उसे गोद में ले लिया। वासुदेव ने कहा — "छह महीने के इस गर्भ को मैं अपने चरण के स्पर्श से जीवित करूँगा।"
श्लोक 84 (1.63.84)
अहं जीवयामि कुमारमनन्तवीर्यं जात एवायमजायत । अभिमन्योः सत्येन चेयं पृथिवी धारयत्विति वासुदेवस्य पादस्पर्शात्सजीवोऽजायत । नाम तस्याकरोत्सुभद्रा ॥
ahaṃ jīvayāmi kumāramanantavīryaṃ jāta evāyamajāyata | abhimanyoḥ satyena ceyaṃ pṛthivī dhārayatviti vāsudevasya pādasparśātsajīvo'jāyata | nāma tasyākarotsubhadrā
"मैं अनन्त पराक्रम वाले इस कुमार को जीवित करता हूँ; जन्मा है तो यह सचमुच जन्म ले। अभिमन्यु के सत्य से यह पृथ्वी इसे धारण करे।" वासुदेव के चरण-स्पर्श से वह शिशु जीवित हो उठा। सुभद्रा ने उसका नामकरण किया।
श्लोक 85 (1.63.85)
परिक्षीणे कुले जात उत्तरायां परंतपः । परिक्षिदभवत्तस्मात्सौभद्रात्तु यशस्विनः ॥
parikṣīṇe kule jāta uttarāyāṃ paraṃtapaḥ | parikṣidabhavattasmātsaubhadrāttu yaśasvinaḥ
क्षीण हो चुके कुल में सुभद्रा के यशस्वी पुत्र (अभिमन्यु) से उत्तरा के गर्भ से वह शत्रुओं को तपाने वाला उत्पन्न हुआ, इसलिए परीक्षित् कहलाया।
श्लोक 86 (1.63.86)
परीक्षित्तु खलु भद्रवतीं नामोपयेमे । तस्यां तत्र भवाञ्जनमेजयः ॥
parīkṣittu khalu bhadravatīṃ nāmopayeme | tasyāṃ tatra bhavāñjanamejayaḥ
परीक्षित् ने भद्रवती से विवाह किया; उन्हीं से आप, श्रीमान् जनमेजय, उत्पन्न हुए।
श्लोक 87 (1.63.87)
जनमेजयात्तु भवतः खलु वपुष्टमायां पुत्रौ द्वौ शतानीकः शङ्कुकर्णश्च ॥
janamejayāttu bhavataḥ khalu vapuṣṭamāyāṃ putrau dvau śatānīkaḥ śaṅkukarṇaśca
और आप जनमेजय से वपुष्टमा के गर्भ से दो पुत्र हुए — शतानीक और शंकुकर्ण।
श्लोक 88 (1.63.88)
शतानीकस्तु खलु वैदेहीमुपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे पुत्रोऽश्वमेधदत्तः ॥
śatānīkastu khalu vaidehīmupayeme | tasyāmasya jajñe putro'śvamedhadattaḥ
शतानीक ने विदेह की राजकुमारी से विवाह किया; उससे उनके पुत्र अश्वमेधदत्त का जन्म हुआ।
श्लोक 89 (1.63.89)
इत्येष पूरोर्वंशस्तु पाण्डवानां च कीर्तितः । पूरोर्वंशमिमं श्रुत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
ityeṣa pūrorvaṃśastu pāṇḍavānāṃ ca kīrtitaḥ | pūrorvaṃśamimaṃ śrutvā sarvapāpaiḥ pramucyate
इस प्रकार पूरु के और पाण्डवों के वंश का वर्णन किया गया। पूरु के इस वंश को सुनकर मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।