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आदि पर्व · अध्याय 64

उपरिचर वसु तथा सत्यवती और व्यास का जन्म

वैशम्पायन चेदिराज उपरिचर वसु की कथा सुनाते हैं, जिन्हें इन्द्र तपस्या से लौटाकर स्फटिक का आकाशगामी विमान, कभी न मुरझाने वाली माला और बाँस की यष्टि देकर सम्मानित करते हैं; इसी से प्रतिवर्ष होने वाले इन्द्रोत्सव का आरम्भ होता है, और वसु के पाँच पुत्र अपने-अपने राज्य स्थापित करते हैं। रानी गिरिका के पास बाज़ के द्वारा भेजा गया वसु का वीर्य यमुना में गिर जाता है और शापग्रस्त अप्सरा अद्रिका मछली के रूप में उसे निगल लेती है, जिससे राजा मत्स्य और सत्यवती का जन्म होता है। नाव खेती सत्यवती से पराशर मिलते हैं, उसे पितरों की मानसी कन्या अच्छोदा के रूप में उसके पूर्वजन्म का वृत्तान्त बताते हैं और उससे वेदों का विभाग करने वाले व्यास उत्पन्न होते हैं। अध्याय के अन्त में भीष्म, विदुर और कर्ण से लेकर कृष्ण, द्रोण, द्रौपदी, पाण्डवों और धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों तक, महाभारत के प्रमुख पात्रों के जन्म का संक्षिप्त वर्णन है।

अध्याय 63अध्याय-सूचीअध्याय 65

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.64.1)

राजोपरिचरो नाम धर्मनित्यो महीपतिः । बभूव मृगयाशीलः शश्वत्स्वाध्यायवाञ्छुचिः ॥

rājoparicaro nāma dharmanityo mahīpatiḥ | babhūva mṛgayāśīlaḥ śaśvatsvādhyāyavāñchuciḥ

उपरिचर नाम के एक राजा थे, जो सदा धर्म में स्थित रहने वाले पृथ्वीपति थे। वे शिकार के प्रेमी, पवित्र आचरण वाले और निरन्तर वेदाध्ययन में लगे रहने वाले थे।

श्लोक 2 (1.64.2)

स चेदिविषयं रम्यं वसुः पौरवनन्दनः । इन्द्रोपदेशाज्जग्राह रमणीयं महीपतिः ॥

sa cediviṣayaṃ ramyaṃ vasuḥ pauravanandanaḥ | indropadeśājjagrāha ramaṇīyaṃ mahīpatiḥ

पौरव वंश को आनन्द देने वाले उन राजा वसु ने इन्द्र के कहने पर रमणीय और मनोहर चेदि देश को अपने अधिकार में लिया।

श्लोक 3 (1.64.3)

तमाश्रमे न्यस्तशस्त्रं निवसन्तं तपोनिधिम् । देवाः शक्रपुरोगा वै राजानमुपतस्थिरे ॥

tamāśrame nyastaśastraṃ nivasantaṃ taponidhim | devāḥ śakrapurogā vai rājānamupatasthire

एक बार जब वे शस्त्र त्यागकर आश्रम में रह रहे थे और तप के भण्डार बन गए थे, तब इन्द्र को आगे करके देवता उस राजा के पास आए।

श्लोक 4 (1.64.4)

इन्द्रत्वमर्हो राजायं तपसेत्यनुचिन्त्य वै । तं सान्त्वेन नृपं साक्षात्तपसः संन्यवर्तयन् ॥

indratvamarho rājāyaṃ tapasetyanucintya vai | taṃ sāntvena nṛpaṃ sākṣāttapasaḥ saṃnyavartayan

"यह राजा अपनी तपस्या से इन्द्र-पद का अधिकारी हो जाएगा" — ऐसा सोचकर वे स्वयं उसके सामने आए और मधुर वचनों से उसे तपस्या से लौटा दिया।

देवा ऊचुः

श्लोक 5 (1.64.5)

न संकीर्येत धर्मोऽयं पृथिव्यां पृथिवीपते । त्वया हि धर्मो विधृतः कृत्स्नं धारयते जगत् ॥

na saṃkīryeta dharmo'yaṃ pṛthivyāṃ pṛthivīpate | tvayā hi dharmo vidhṛtaḥ kṛtsnaṃ dhārayate jagat

हे पृथ्वीपते, पृथ्वी पर धर्म में अव्यवस्था न आने पाए। आपके द्वारा धारण किया हुआ धर्म ही सम्पूर्ण जगत को धारण करता है।

इन्द्र उवाच

श्लोक 6 (1.64.6)

देवानहं पालयिता पालय त्वं हि मानुषान् । लोके धर्मं पालय त्वं नित्ययुक्तः समाहितः । धर्मयुक्तस्ततो लोकान्पुण्यान्प्राप्स्यसि शाश्वतान् ॥

devānahaṃ pālayitā pālaya tvaṃ hi mānuṣān | loke dharmaṃ pālaya tvaṃ nityayuktaḥ samāhitaḥ | dharmayuktastato lokānpuṇyānprāpsyasi śāśvatān

मैं देवताओं का पालन करने वाला हूँ, तुम मनुष्यों का पालन करो। सदा तत्पर और एकाग्र रहकर लोक में धर्म की रक्षा करो। धर्म में स्थित रहकर तुम पुण्य से मिलने वाले सनातन लोकों को प्राप्त करोगे।

श्लोक 7 (1.64.7)

दिविष्ठस्य भुविष्ठस्त्वं सखाभूतो मम प्रियः । ऊधः पृथिव्या यो देशस्तमावस नराधिप ॥

diviṣṭhasya bhuviṣṭhastvaṃ sakhābhūto mama priyaḥ | ūdhaḥ pṛthivyā yo deśastamāvasa narādhipa

मैं स्वर्ग में रहता हूँ और तुम पृथ्वी पर; तुम मेरे प्रिय मित्र बनो। हे नरेश, जो देश पृथ्वी का थन है, उसी में निवास करो।

श्लोक 8 (1.64.8)

पशव्यश्चैव पुण्यश्च प्रभूतधनधान्यवान् । स्वारक्ष्यश्चैव सौम्यश्च भोग्यैर्भूमिगुणैर्युतः ॥

paśavyaścaiva puṇyaśca prabhūtadhanadhānyavān | svārakṣyaścaiva saumyaśca bhogyairbhūmiguṇairyutaḥ

वह देश पशुओं के लिए हितकर, पवित्र और धन-धान्य से भरपूर है; उसकी रक्षा सरल है, वह सौम्य है और भोगने योग्य भूमि के सभी गुणों से युक्त है।

श्लोक 9 (1.64.9)

अर्थवानेष देशो हि धनरत्नादिभिर्युतः । वसुपूर्णा च वसुधा वस चेदिषु चेदिप ॥

arthavāneṣa deśo hi dhanaratnādibhiryutaḥ | vasupūrṇā ca vasudhā vasa cediṣu cedipa

यह देश समृद्ध है, धन और रत्न आदि से सम्पन्न है, और यहाँ की धरती वसु (धन) से भरी है। हे चेदिपति, तुम चेदि देश में निवास करो।

श्लोक 10 (1.64.10)

धर्मशीला जनपदाः सुसंतोषाश्च साधवः । न च मिथ्या प्रलापोऽत्र स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ॥

dharmaśīlā janapadāḥ susaṃtoṣāśca sādhavaḥ | na ca mithyā pralāpo'tra svaireṣvapi kuto'nyathā

वहाँ के जनपद-निवासी धर्मशील, अत्यन्त सन्तोषी और सज्जन हैं। वहाँ हँसी-विनोद में भी कोई झूठ नहीं बोलता, फिर गम्भीर बातों में तो कहना ही क्या।

श्लोक 11 (1.64.11)

न च पित्रा विभज्यन्ते पुत्रा गुरुहिते रताः । युञ्जते धुरि नो गाश्च कृशान्संधुक्षयन्ति च ॥

na ca pitrā vibhajyante putrā guruhite ratāḥ | yuñjate dhuri no gāśca kṛśānsaṃdhukṣayanti ca

वहाँ पुत्र पिता से अलग होकर बँटवारा नहीं करते और गुरुजनों के हित में लगे रहते हैं। लोग दुबले बैलों को जुए में नहीं जोतते, बल्कि उन्हें खिला-पिलाकर पुष्ट करते हैं।

श्लोक 12 (1.64.12)

सर्वे वर्णाः स्वधर्मस्थाः सदा चेदिषु मानद । न तेऽस्त्यविदितं किंचित्त्रिषु लोकेषु यद्भवेत् ॥

sarve varṇāḥ svadharmasthāḥ sadā cediṣu mānada | na te'styaviditaṃ kiṃcittriṣu lokeṣu yadbhavet

हे मान देने वाले, चेदि देश में सभी वर्ण सदा अपने-अपने धर्म में स्थित रहते हैं। तीनों लोकों में जो कुछ भी होता है, उसमें से कुछ भी तुमसे छिपा नहीं है।

श्लोक 13 (1.64.13)

दैवोपभोग्यं दिव्यं त्वामाकाशे स्फाटिकं महत् । आकाशगं त्वां मद्दत्तं विमानमुपपत्स्यते ॥

daivopabhogyaṃ divyaṃ tvāmākāśe sphāṭikaṃ mahat | ākāśagaṃ tvāṃ maddattaṃ vimānamupapatsyate

मेरे द्वारा दिया हुआ, देवताओं के उपभोग योग्य, स्फटिक का बना एक विशाल दिव्य विमान तुम्हें प्राप्त होगा, जो तुम्हें आकाश में ले चलेगा।

श्लोक 14 (1.64.14)

त्वमेकः सर्वमर्त्येषु विमानवरमास्थितः । चरिष्यस्युपरिस्थो हि देवो विग्रहवानिव ॥

tvamekaḥ sarvamartyeṣu vimānavaramāsthitaḥ | cariṣyasyuparistho hi devo vigrahavāniva

समस्त मनुष्यों में केवल तुम ही उस श्रेष्ठ विमान पर बैठकर ऊपर-ऊपर विचरोगे, मानो कोई देवता देह धारण करके घूम रहा हो।

श्लोक 15 (1.64.15)

ददामि ते वैजयन्तीं मालामम्लानपङ्कजाम् । धारयिष्यति सङ्ग्रामे या त्वां शस्त्रैरविक्षतम् ॥

dadāmi te vaijayantīṃ mālāmamlānapaṅkajām | dhārayiṣyati saṅgrāme yā tvāṃ śastrairavikṣatam

मैं तुम्हें कभी न मुरझाने वाले कमलों की वैजयन्ती माला देता हूँ। युद्ध में यह माला तुम्हें शस्त्रों से अक्षत रखेगी।

श्लोक 16 (1.64.16)

लक्षणं चैतदेवेह भविता ते नराधिप । इन्द्रमालेति विख्यातं धन्यमप्रतिमं महत् ॥

lakṣaṇaṃ caitadeveha bhavitā te narādhipa | indramāleti vikhyātaṃ dhanyamapratimaṃ mahat

हे नरेश, यही यहाँ तुम्हारा चिह्न होगा — "इन्द्रमाला" नाम से प्रसिद्ध, धन्य, अनुपम और महान।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 17 (1.64.17)

यष्टिं च वैणवीं तस्मै ददौ वृत्रनिषूदनः । इष्टप्रदानमुद्दिश्य शिष्टानां प्रतिपालिनीम् ॥

yaṣṭiṃ ca vaiṇavīṃ tasmai dadau vṛtraniṣūdanaḥ | iṣṭapradānamuddiśya śiṣṭānāṃ pratipālinīm

फिर वृत्रासुर का वध करने वाले इन्द्र ने उसे बाँस की एक यष्टि दी, जो इच्छित फल देने वाली और सज्जनों की रक्षा करने वाली थी।

श्लोक 18 (1.64.18)

एवं संसान्त्व्य नृपतिं तपसः संन्यवर्तयत् । प्रययौ दैवतैः सार्धं कृत्वा कार्यं दिवौकसाम् ॥

evaṃ saṃsāntvya nṛpatiṃ tapasaḥ saṃnyavartayat | prayayau daivataiḥ sārdhaṃ kṛtvā kāryaṃ divaukasām

इस प्रकार राजा को सान्त्वना देकर और तपस्या से लौटाकर, देवताओं का कार्य पूरा करके इन्द्र देवताओं के साथ चले गए।

श्लोक 19 (1.64.19)

ततस्तु राजा चेदीनामिन्द्राभरणभूषितः । इन्द्रदत्तं विमानं तदास्थाय प्रययौ पुरीम् ॥

tatastu rājā cedīnāmindrābharaṇabhūṣitaḥ | indradattaṃ vimānaṃ tadāsthāya prayayau purīm

तब इन्द्र के दिए आभूषणों से सुशोभित चेदिराज इन्द्र के दिए विमान पर बैठकर अपनी नगरी को गए।

श्लोक 20 (1.64.20)

तस्याः शक्रस्य पूजार्थं भूमौ भूमिपतिस्तदा । प्रवेशं कारयामास सर्वोत्सववरं तदा ॥

tasyāḥ śakrasya pūjārthaṃ bhūmau bhūmipatistadā | praveśaṃ kārayāmāsa sarvotsavavaraṃ tadā

तब उस भूपति ने इन्द्र की पूजा के लिए उस यष्टि को भूमि में स्थापित करवाया; यही सब उत्सवों में श्रेष्ठ उत्सव बना।

श्लोक 21 (1.64.21)

मार्गशीर्षे महाराज पूर्वपक्षे महामखम् । ततःप्रभृति चाद्यापि यष्टेः क्षितिपसत्तमैः ॥

mārgaśīrṣe mahārāja pūrvapakṣe mahāmakham | tataḥprabhṛti cādyāpi yaṣṭeḥ kṣitipasattamaiḥ

हे महाराज, मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में उन्होंने वह महान उत्सव किया; तभी से आज तक श्रेष्ठ राजा यष्टि का उत्सव मनाते आए हैं।

श्लोक 22 (1.64.22)

प्रवेशः क्रियते राजन्यथा तेन प्रवर्तितः । अपरेद्युस्ततस्तस्याः क्रियतेऽत्युच्छ्रयो नृपैः ॥

praveśaḥ kriyate rājanyathā tena pravartitaḥ | aparedyustatastasyāḥ kriyate'tyucchrayo nṛpaiḥ

हे राजन्, जैसे वसु ने इसे आरम्भ किया था, उसी प्रकार यष्टि को लाकर स्थापित किया जाता है; फिर अगले दिन राजा लोग उसे ऊँचा खड़ा करते हैं,

श्लोक 23 (1.64.23)

अलङ्कृतायाः पिटकैर्गन्धमाल्यैश्च भूषणैः । माल्यदामपरिक्षिप्तां द्वात्रिंशत्किष्कुसंमिताम् ॥

alaṅkṛtāyāḥ piṭakairgandhamālyaiśca bhūṣaṇaiḥ | mālyadāmaparikṣiptāṃ dvātriṃśatkiṣkusaṃmitām

वह यष्टि पिटारियों, सुगन्धित द्रव्यों, मालाओं और आभूषणों से अलंकृत, फूलों की लड़ियों से लिपटी और बत्तीस किष्कु ऊँची होती है।

श्लोक 24 (1.64.24)

उद्धृत्य पिटके चापि द्वादशारत्निकोच्छ्रये । महारजनवासांसि परिक्षिप्य ध्वजोत्तमम् ॥

uddhṛtya piṭake cāpi dvādaśāratnikocchraye | mahārajanavāsāṃsi parikṣipya dhvajottamam

उसे बारह हाथ ऊँचे आधार पर खड़ा करके और उस श्रेष्ठ ध्वज को केसरिया वस्त्रों से लपेटकर,

श्लोक 25 (1.64.25)

वासोभिरन्नपानैश्च पूजितैर्ब्राह्मणर्षभैः । पुण्याहं वाचयित्वाथ ध्वज उच्छ्रीयते तदा ॥

vāsobhirannapānaiśca pūjitairbrāhmaṇarṣabhaiḥ | puṇyāhaṃ vācayitvātha dhvaja ucchrīyate tadā

तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणों का वस्त्र, अन्न और पेय से सत्कार करके, पुण्याहवाचन कराकर फिर ध्वज ऊँचा उठाया जाता है।

श्लोक 26 (1.64.26)

शङ्खभेरीमृदङ्गैश्च संनादः क्रियते तदा । भगवान्पूज्यते चात्र यष्टिरूपेण वासवः ॥

śaṅkhabherīmṛdaṅgaiśca saṃnādaḥ kriyate tadā | bhagavānpūjyate cātra yaṣṭirūpeṇa vāsavaḥ

उस समय शंख, भेरी और मृदंगों से गम्भीर नाद किया जाता है। यहाँ भगवान इन्द्र यष्टि के रूप में पूजे जाते हैं,

श्लोक 27 (1.64.27)

स्वयमेव गृहीतेन वसोः प्रीत्या महात्मनः । माणिभद्रादयो यक्षाः पूज्यन्ते दैवतैः सह ॥

svayameva gṛhītena vasoḥ prītyā mahātmanaḥ | māṇibhadrādayo yakṣāḥ pūjyante daivataiḥ saha

जिसे उन्होंने महात्मा वसु के प्रति प्रेम के कारण स्वयं ग्रहण किया था। माणिभद्र आदि यक्ष भी देवताओं के साथ पूजे जाते हैं।

श्लोक 28 (1.64.28)

नानाविधानि दानानि दत्त्वार्थिभ्यः सुहृज्जनैः । अलङ्कृत्वा माल्यदामैर्वस्त्रैर्नानाविधैस्तथा ॥

nānāvidhāni dānāni dattvārthibhyaḥ suhṛjjanaiḥ | alaṅkṛtvā mālyadāmairvastrairnānāvidhaistathā

मित्र और स्वजन याचकों को अनेक प्रकार के दान देकर, फूलों की मालाओं और भाँति-भाँति के वस्त्रों से अपने को सजाते हैं।

श्लोक 29 (1.64.29)

दृतिभिः सजलैः सर्वैः क्रीडित्वा नृपशासनात् । सभाजयित्वा राजानं कृत्वा नर्माश्रयाः कथाः ॥

dṛtibhiḥ sajalaiḥ sarvaiḥ krīḍitvā nṛpaśāsanāt | sabhājayitvā rājānaṃ kṛtvā narmāśrayāḥ kathāḥ

राजा की आज्ञा से सब लोग जल से भरी मशकों से क्रीड़ा करते हैं, राजा का सम्मान करते हैं और हँसी-विनोद की कथाएँ कहते हैं।

श्लोक 30 (1.64.30)

रमन्ते नागराः सर्वे तथा जानपदैः सह । सूताश्च मागधाश्चैव रमन्ते नटनर्तकाः ॥

ramante nāgarāḥ sarve tathā jānapadaiḥ saha | sūtāśca māgadhāścaiva ramante naṭanartakāḥ

सभी नगरवासी ग्रामवासियों के साथ आनन्द मनाते हैं; सूत, मागध, नट और नर्तक भी आनन्द में मग्न रहते हैं।

श्लोक 31 (1.64.31)

प्रीत्या तु नृपशार्दूल सर्वे चक्रुर्महोत्सवम् । सान्तःपुरः सहामात्यः सर्वाभरणभूषितः ॥

prītyā tu nṛpaśārdūla sarve cakrurmahotsavam | sāntaḥpuraḥ sahāmātyaḥ sarvābharaṇabhūṣitaḥ

हे नृपश्रेष्ठ, सबने प्रेमपूर्वक महान उत्सव मनाया। अन्तःपुर की स्त्रियों और मन्त्रियों के साथ, सब आभूषणों से सजे हुए,

श्लोक 32 (1.64.32)

महारजनवासांसि वसित्वा चेदिराट् तदा । जातिहिङ्गुलकेनाक्तः सदारो मुमुदे तदा ॥

mahārajanavāsāṃsi vasitvā cedirāṭ tadā | jātihiṅgulakenāktaḥ sadāro mumude tadā

केसरिया वस्त्र पहनकर और उत्तम हिंगुल का लेप लगाकर चेदिराज अपनी रानियों के साथ आनन्दित हुए।

श्लोक 33 (1.64.33)

एवं जानपदाः सर्वे चक्रुरिन्द्रमहं तदा । यथा चेदिपतिः प्रीतश्चकारेन्द्रमहं वसुः ॥

evaṃ jānapadāḥ sarve cakrurindramahaṃ tadā | yathā cedipatiḥ prītaścakārendramahaṃ vasuḥ

इस प्रकार सब जनपदवासियों ने तब इन्द्र का उत्सव मनाया, जैसे चेदिपति वसु ने प्रसन्न होकर इन्द्रोत्सव मनाया था।

श्लोक 34 (1.64.34)

एतां पूजां महेन्द्रस्तु दृष्ट्वा वसुकृतां शुभाम् । हरिभिर्वाजिभिर्युक्तमन्तरिक्षगतं रथम् ॥

etāṃ pūjāṃ mahendrastu dṛṣṭvā vasukṛtāṃ śubhām | haribhirvājibhiryuktamantarikṣagataṃ ratham

वसु द्वारा की गई इस शुभ पूजा को देखकर महेन्द्र हरे घोड़ों से जुते, आकाश में चलने वाले रथ पर

श्लोक 35 (1.64.35)

आस्थाय सह शच्या च वृतो ह्यप्सरसां गणैः । वसुना राजमुख्येन समागम्याब्रवीद्वचः ॥

āsthāya saha śacyā ca vṛto hyapsarasāṃ gaṇaiḥ | vasunā rājamukhyena samāgamyābravīdvacaḥ

शची के साथ बैठकर और अप्सराओं के समूहों से घिरे हुए, राजाओं में प्रमुख वसु से मिले और यह वचन बोले।

इन्द्र उवाच

श्लोक 36 (1.64.36)

ये पूजयिष्यन्ति नरा राजानश्च महं मम । कारयिष्यन्ति च मुदा यथा चेदिपतिर्नृपः ॥

ye pūjayiṣyanti narā rājānaśca mahaṃ mama | kārayiṣyanti ca mudā yathā cedipatirnṛpaḥ

जो मनुष्य और राजा मेरी पूजा करेंगे और चेदिपति राजा की भाँति प्रसन्नतापूर्वक मेरा उत्सव मनाएँगे,

श्लोक 37 (1.64.37)

तेषां श्रीर्विजयश्चैव सराष्ट्राणां भविष्यति । तथा स्फीतो जनपदो मुदितश्च भविष्यति ॥

teṣāṃ śrīrvijayaścaiva sarāṣṭrāṇāṃ bhaviṣyati | tathā sphīto janapado muditaśca bhaviṣyati

उन्हें और उनके राष्ट्रों को श्री और विजय प्राप्त होगी, तथा उनका जनपद समृद्ध और प्रसन्न रहेगा।

श्लोक 38 (1.64.38)

निरीतिकानि सस्यानि भवन्ति बहुधा नृप । राक्षसाश्च पिशाचाश्च न लुम्पन्ते कथंचन ॥

nirītikāni sasyāni bhavanti bahudhā nṛpa | rākṣasāśca piśācāśca na lumpante kathaṃcana

हे राजन्, उनकी फसलें उपद्रवों से रहित होकर भरपूर उपजेंगी, और राक्षस तथा पिशाच उन्हें कभी नष्ट नहीं करेंगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 39 (1.64.39)

एवं महात्मना तेन महेन्द्रेण नराधिप । वसुः प्रीत्या मघवता महाराजोऽभिसत्कृतः । एवं कृत्वा महेन्द्रस्तु जगाम स्वं निवेशनम् ॥

evaṃ mahātmanā tena mahendreṇa narādhipa | vasuḥ prītyā maghavatā mahārājo'bhisatkṛtaḥ | evaṃ kṛtvā mahendrastu jagāma svaṃ niveśanam

हे नरेश, इस प्रकार महात्मा इन्द्र ने प्रेमपूर्वक महाराज वसु का सत्कार किया; और ऐसा करके महेन्द्र अपने धाम को लौट गए।

श्लोक 40 (1.64.40)

उत्सवं कारयिष्यन्ति सदा शक्रस्य ये नराः । भूमिरत्नादिभिर्दानैस्तथा पूज्या भवन्ति ते । वरदानमहायज्ञैस्तथा शक्रोत्सवेन च ॥

utsavaṃ kārayiṣyanti sadā śakrasya ye narāḥ | bhūmiratnādibhirdānaistathā pūjyā bhavanti te | varadānamahāyajñaistathā śakrotsavena ca

जो मनुष्य सदा इन्द्र का उत्सव मनाते हैं, वे वैसे ही पूजनीय हो जाते हैं जैसे भूमि, रत्न आदि के दान से, वरदान से और महायज्ञों से लोग पूज्य होते हैं।

श्लोक 41 (1.64.41)

संपूजितो मघवता वसुश्चेदीश्वरो नृपः । पालयामास धर्मेण चेदिस्थः पृथिवीमिमाम् ॥

saṃpūjito maghavatā vasuścedīśvaro nṛpaḥ | pālayāmāsa dharmeṇa cedisthaḥ pṛthivīmimām

इन्द्र से सम्मानित चेदिपति राजा वसु ने चेदि में रहते हुए धर्मपूर्वक इस पृथ्वी का पालन किया।

श्लोक 42 (1.64.42)

इन्द्रप्रीत्या चेदिपतिश्चकारेन्द्रमहं वसुः । पुत्राश्चास्य महावीर्याः पञ्चासन्नमितौजसः ॥

indraprītyā cedipatiścakārendramahaṃ vasuḥ | putrāścāsya mahāvīryāḥ pañcāsannamitaujasaḥ

इन्द्र के प्रति प्रेम के कारण चेदिपति वसु ने इन्द्रोत्सव मनाया। उनके पाँच पुत्र थे, जो महापराक्रमी और अपार तेज वाले थे।

श्लोक 43 (1.64.43)

नानाराज्येषु च सुतान्स सम्राडभ्यषेचयत् । महारथो मागधानां विश्रुतो यो बृहद्रथः ॥

nānārājyeṣu ca sutānsa samrāḍabhyaṣecayat | mahāratho māgadhānāṃ viśruto yo bṛhadrathaḥ

उस सम्राट ने अपने पुत्रों का भिन्न-भिन्न राज्यों में अभिषेक किया — मगधों में प्रसिद्ध महारथी बृहद्रथ,

श्लोक 44 (1.64.44)

प्रत्यग्रहः कुशाम्बश्च यमाहुर्मणिवाहनम् । मत्सिल्लश्च यदुश्चैव राजन्यश्चापराजितः ॥

pratyagrahaḥ kuśāmbaśca yamāhurmaṇivāhanam | matsillaśca yaduścaiva rājanyaścāparājitaḥ

प्रत्यग्रह, कुशाम्ब जिन्हें मणिवाहन भी कहते हैं, मत्सिल्ल और अपराजित क्षत्रिय यदु।

श्लोक 45 (1.64.45)

एते तस्य सुता राजन्राजर्षेर्भूरितेजसः । न्यवेशयन्नामभिः स्वैस्ते देशांश्च पुराणि च ॥

ete tasya sutā rājanrājarṣerbhūritejasaḥ | nyaveśayannāmabhiḥ svaiste deśāṃśca purāṇi ca

हे राजन्, ये उस महातेजस्वी राजर्षि के पुत्र थे। इन्होंने अपने-अपने नामों से देश और नगर बसाए।

श्लोक 46 (1.64.46)

वासवाः पञ्च राजानः पृथग्वंशाश्च शाश्वताः । वसन्तमिन्द्रप्रासादे आकाशे स्फाटिके च तम् ॥

vāsavāḥ pañca rājānaḥ pṛthagvaṃśāśca śāśvatāḥ | vasantamindraprāsāde ākāśe sphāṭike ca tam

वसु के ये पाँचों पुत्र राजा हुए और इनके अलग-अलग स्थायी वंश चले। जब वे राजा आकाश में इन्द्र के दिए स्फटिक के प्रासाद में रहते थे,

श्लोक 47 (1.64.47)

उपतस्थुर्महात्मानं गन्धर्वाप्सरसो नृपम् । राजोपरिचरेत्येवं नाम तस्याथ विश्रुतम् ॥

upatasthurmahātmānaṃ gandharvāpsaraso nṛpam | rājoparicaretyevaṃ nāma tasyātha viśrutam

तब गन्धर्व और अप्सराएँ उस महात्मा राजा की सेवा में उपस्थित रहती थीं। इसी से उनका नाम "उपरिचर" (ऊपर विचरने वाला) प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 48 (1.64.48)

पुरोपवाहिनीं तस्य नदीं शुक्तिमतीं गिरिः । अरौत्सीच्चेतनायुक्तः कामात्कोलाहलः किल ॥

puropavāhinīṃ tasya nadīṃ śuktimatīṃ giriḥ | arautsīccetanāyuktaḥ kāmātkolāhalaḥ kila

कहते हैं, चेतनायुक्त कोलाहल पर्वत ने कामवश उनकी राजधानी के पास से बहने वाली शुक्तिमती नदी को रोक लिया था।

श्लोक 49 (1.64.49)

गिरिं कोलाहलं तं तु पदा वसुरताडयत् । निश्चक्राम ततस्तेन प्रहारविवरेण सा ॥

giriṃ kolāhalaṃ taṃ tu padā vasuratāḍayat | niścakrāma tatastena prahāravivareṇa sā

वसु ने उस कोलाहल पर्वत पर पैर से प्रहार किया, और उस प्रहार से बने छिद्र से वह नदी बाहर निकल आई।

श्लोक 50 (1.64.50)

तस्यां नद्यामजनयन्मिथुनं पर्वतः स्वयम् । तस्माद्विमोक्षणात्प्रीता नदी राज्ञे न्यवेदयत् ॥

tasyāṃ nadyāmajanayanmithunaṃ parvataḥ svayam | tasmādvimokṣaṇātprītā nadī rājñe nyavedayat

उस नदी में पर्वत ने स्वयं एक जोड़ा (बालक और कन्या) उत्पन्न किया था। मुक्त किए जाने से प्रसन्न होकर नदी ने वे दोनों राजा को सौंप दिए।

श्लोक 51 (1.64.51)

महिषी भविता कन्या पुमान्सेनापतिर्भवेत् । शुक्तिमत्या वचःश्रुत्वा दृष्ट्वा तौ राजसत्तमः ॥

mahiṣī bhavitā kanyā pumānsenāpatirbhavet | śuktimatyā vacaḥśrutvā dṛṣṭvā tau rājasattamaḥ

"यह कन्या आपकी पटरानी होगी और यह बालक आपका सेनापति होगा।" शुक्तिमती की यह बात सुनकर और उन दोनों को देखकर,

श्लोक 52 (1.64.52)

यः पुमानभवत्तत्र तं स राजर्षिसत्तमः । वसुर्वसुप्रदश्चक्रे सेनापतिमरिन्दमः ॥

yaḥ pumānabhavattatra taṃ sa rājarṣisattamaḥ | vasurvasupradaścakre senāpatimarindamaḥ

शत्रुदमन, धन देने वाले, राजर्षियों में श्रेष्ठ वसु ने उनमें से जो बालक था, उसे अपना सेनापति बनाया।

श्लोक 53 (1.64.53)

चकार पत्नीं कन्यां तु तथा तां गिरिकां नृपः । वसोः पत्नी तु गिरिका कामकालं न्यवेदयत् ॥

cakāra patnīṃ kanyāṃ tu tathā tāṃ girikāṃ nṛpaḥ | vasoḥ patnī tu girikā kāmakālaṃ nyavedayat

और कन्या गिरिका को राजा ने अपनी पत्नी बनाया। वसु की पत्नी गिरिका ने उन्हें अपने ऋतुकाल की सूचना दी।

श्लोक 54 (1.64.54)

ऋतुकालमनुप्राप्ता स्नाता पुंसवने शुचिः । तदहः पितरश्चैनमूचुर्जहि मृगानिति ॥

ṛtukālamanuprāptā snātā puṃsavane śuciḥ | tadahaḥ pitaraścainamūcurjahi mṛgāniti

वह ऋतुकाल को प्राप्त होकर स्नान कर चुकी थी और पुत्र की कामना के लिए पवित्र थी। उसी दिन पितरों ने उनसे कहा, "मृगों का वध करो,"

श्लोक 55 (1.64.55)

तं राजसत्तमं प्रीतास्तदा मतिमतां वरः । स पितॄणां नियोगेन तामतिक्रम्य पार्थिवः ॥

taṃ rājasattamaṃ prītāstadā matimatāṃ varaḥ | sa pitṝṇāṃ niyogena tāmatikramya pārthivaḥ

क्योंकि पितर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ उस राजसत्तम से प्रसन्न थे। पितरों की आज्ञा से राजा उसे छोड़कर

श्लोक 56 (1.64.56)

चकार मृगयां कामी गिरिकामेव संस्मरन् । अतीव रूपसंपन्नां साक्षाच्छ्रियमिवापराम् ॥

cakāra mṛgayāṃ kāmī girikāmeva saṃsmaran | atīva rūpasaṃpannāṃ sākṣācchriyamivāparām

कामातुर होकर, केवल गिरिका का स्मरण करते हुए शिकार को चले गए — वह गिरिका, जो अत्यन्त रूपवती थी, मानो साक्षात् दूसरी लक्ष्मी हो।

श्लोक 57 (1.64.57)

अशोकैश्चम्पकैश्चूतैरनेकैरतिमुक्तकैः । पुन्नागैः कर्णिकारैश्च बकुलैर्दिव्यपाटलैः ॥

aśokaiścampakaiścūtairanekairatimuktakaiḥ | punnāgaiḥ karṇikāraiśca bakulairdivyapāṭalaiḥ

अशोक, चम्पा और आम के वृक्षों से, अनेक अतिमुक्तक लताओं से, पुन्नाग, कर्णिकार, बकुल और दिव्य पाटल वृक्षों से,

श्लोक 58 (1.64.58)

पनसैर्नारिकेलैश्च चन्दनैश्चार्जुनैस्तथा । एतै रम्यैर्महावृक्षैः पुण्यैः स्वादुफलैर्युतम् ॥

panasairnārikelaiśca candanaiścārjunaistathā | etai ramyairmahāvṛkṣaiḥ puṇyaiḥ svāduphalairyutam

कटहल, नारियल, चन्दन और अर्जुन वृक्षों से — इन सुन्दर, पवित्र, मीठे फलों वाले विशाल वृक्षों से वह वन भरा हुआ था।

श्लोक 59 (1.64.59)

कोकिलाकुलसन्नादं मत्तभ्रमरनादितम् । वसन्तकाले तत्पश्यन्वनं चैत्ररथोपमम् ॥

kokilākulasannādaṃ mattabhramaranāditam | vasantakāle tatpaśyanvanaṃ caitrarathopamam

वसन्त ऋतु में कोयलों की कूक से गूँजते और मतवाले भौंरों के गुंजन से भरे, चैत्ररथ वन के समान उस वन को देखकर,

श्लोक 60 (1.64.60)

मन्मथाभिपरीतात्मा नापश्यद्गिरिकां तदा । अपश्यन्कामसंतप्तश्चरमाणो यदृच्छया ॥

manmathābhiparītātmā nāpaśyadgirikāṃ tadā | apaśyankāmasaṃtaptaścaramāṇo yadṛcchayā

कामदेव से व्याकुल चित्त वाले राजा को उस समय गिरिका दिखाई नहीं दी। उसे न देखकर, कामाग्नि से सन्तप्त होकर वे इधर-उधर घूमने लगे,

श्लोक 61 (1.64.61)

पुष्पसंछन्नशाखाग्रं पल्लवैरुपशोभितम् । अशोकस्तबकैश्छन्नं रमणीयमपश्यत ॥

puṣpasaṃchannaśākhāgraṃ pallavairupaśobhitam | aśokastabakaiśchannaṃ ramaṇīyamapaśyata

और उन्होंने एक मनोहर अशोक वृक्ष देखा, जिसकी शाखाओं के सिरे फूलों से ढके थे, जो नए पत्तों से सुशोभित और फूलों के गुच्छों से आच्छादित था।

श्लोक 62 (1.64.62)

अधस्तात्तस्य छायायां सुखासीनो नराधिपः । मधुगन्धैश्च संयुक्तं पुष्पगन्धमनोहरम् ॥

adhastāttasya chāyāyāṃ sukhāsīno narādhipaḥ | madhugandhaiśca saṃyuktaṃ puṣpagandhamanoharam

उसके नीचे छाया में सुखपूर्वक बैठे राजा ने मधु की गन्ध से मिली हुई फूलों की मनोहर सुगन्ध को,

श्लोक 63 (1.64.63)

वायुना प्रेर्यमाणं तमाघ्राय मुदमन्वगात् । भार्यां चिन्तयमानस्य मन्मथाग्निरवर्धत । तस्य रेतः प्रचस्कन्द चरतो गहने वने ॥

vāyunā preryamāṇaṃ tamāghrāya mudamanvagāt | bhāryāṃ cintayamānasya manmathāgniravardhata | tasya retaḥ pracaskanda carato gahane vane

जो वायु के झोंकों से बहकर आ रही थी, सूँघा और आनन्दित हो गए। पत्नी का चिन्तन करते-करते उनकी कामाग्नि बढ़ गई, और उस घने वन में विचरते हुए उनका वीर्य स्खलित हो गया।

श्लोक 64 (1.64.64)

स्कन्नमात्रं च तद्रेतो वृक्षपत्रेण भूमिपः । प्रतिजग्राह मिथ्या मे न पतेद्रेत इत्युत ॥

skannamātraṃ ca tadreto vṛkṣapatreṇa bhūmipaḥ | pratijagrāha mithyā me na patedreta ityuta

वीर्य स्खलित होते ही राजा ने उसे वृक्ष के पत्ते पर ग्रहण कर लिया, यह सोचकर कि "मेरा वीर्य व्यर्थ न गिरे।"

श्लोक 65 (1.64.65)

अङ्गुलीयेन शुक्लस्य रक्षां च विदधे नृपः । अशोकस्तबकै रक्तैः पल्लवैश्चाप्यबन्धयत् ॥

aṅgulīyena śuklasya rakṣāṃ ca vidadhe nṛpaḥ | aśokastabakai raktaiḥ pallavaiścāpyabandhayat

राजा ने अपनी अँगूठी से उस वीर्य की रक्षा की, और उसे अशोक के लाल फूलों के गुच्छों तथा कोमल पत्तों से बाँध दिया।

श्लोक 66 (1.64.66)

इदं मिथ्या परिस्कन्नं रेतो मे न भवेदिति । ऋतुश्च तस्याः पत्न्या मे न मोघः स्यादिति प्रभुः ॥

idaṃ mithyā pariskannaṃ reto me na bhavediti | ṛtuśca tasyāḥ patnyā me na moghaḥ syāditi prabhuḥ

राजा ने सोचा — "मेरा यह स्खलित वीर्य व्यर्थ न जाए, और मेरी पत्नी का ऋतुकाल भी निष्फल न हो।"

श्लोक 67 (1.64.67)

संचिन्त्यैवं तदा राजा विचार्य च पुनःपुनः । अमोघत्वं च विज्ञाय रेतसो राजसत्तमः ॥

saṃcintyaivaṃ tadā rājā vicārya ca punaḥpunaḥ | amoghatvaṃ ca vijñāya retaso rājasattamaḥ

इस प्रकार बार-बार सोच-विचार करके और अपने वीर्य को अमोघ जानकर उस श्रेष्ठ राजा ने

श्लोक 68 (1.64.68)

शुक्रप्रस्थापने कालं महिष्याः प्रसमीक्ष्य वै । अभिमन्त्र्याथ तच्छुक्रमारात्तिष्ठन्तमाशुगम् ॥

śukraprasthāpane kālaṃ mahiṣyāḥ prasamīkṣya vai | abhimantryātha tacchukramārāttiṣṭhantamāśugam

रानी के पास वीर्य भेजने का उचित समय देखकर उसे मन्त्रों से अभिमन्त्रित किया। फिर पास ही बैठे एक तेज़ उड़ने वाले बाज़ के पास

श्लोक 69 (1.64.69)

सूक्ष्मधर्मार्थतत्त्वज्ञो गत्वा श्येनं ततोऽब्रवीत् । मत्प्रियार्थमिदं सौम्य शुक्रं मम गृहं नय ॥

sūkṣmadharmārthatattvajño gatvā śyenaṃ tato'bravīt | matpriyārthamidaṃ saumya śukraṃ mama gṛhaṃ naya

धर्म और अर्थ के सूक्ष्म तत्त्व को जानने वाले राजा ने जाकर उस बाज़ से कहा — "सौम्य, मेरा प्रिय करने के लिए यह वीर्य मेरे घर ले जाओ,

श्लोक 70 (1.64.70)

गिरिकायाः प्रयच्छाशु तस्या ह्यार्तवमद्य वै । गृहीत्वा तत्तदा श्येनस्तूर्णमुत्पत्य वेगवान् ॥

girikāyāḥ prayacchāśu tasyā hyārtavamadya vai | gṛhītvā tattadā śyenastūrṇamutpatya vegavān

और इसे शीघ्र गिरिका को दे दो, क्योंकि आज ही उसका ऋतुकाल है।" तब वेगवान बाज़ उसे लेकर तुरन्त उड़ा,

श्लोक 71 (1.64.71)

जवं परममास्थाय प्रदुद्राव विहंगमः । तमपश्यदथायान्तं श्येनं श्येनस्तथाऽपरः ॥

javaṃ paramamāsthāya pradudrāva vihaṃgamaḥ | tamapaśyadathāyāntaṃ śyenaṃ śyenastathā'paraḥ

और पूरे वेग से वह पक्षी उड़ चला। तभी एक दूसरे बाज़ ने उस बाज़ को आते देखा,

श्लोक 72 (1.64.72)

अभ्यद्रवच्च तं सद्यो दृष्ट्वैवामिषशङ्कया । तुण्डयुद्धमथाकाशे तावुभौ संप्रचक्रतुः ॥

abhyadravacca taṃ sadyo dṛṣṭvaivāmiṣaśaṅkayā | tuṇḍayuddhamathākāśe tāvubhau saṃpracakratuḥ

और उसे देखते ही मांस की आशंका से तुरन्त उस पर झपट पड़ा। फिर वे दोनों आकाश में चोंचों से लड़ने लगे।

श्लोक 73 (1.64.73)

युद्ध्यतोरपतद्रेतस्तच्चापि यमुनाम्भसि । तत्राद्रिकेति विख्याता ब्रह्मशापाद्वराप्सरा ॥

yuddhyatorapatadretastaccāpi yamunāmbhasi | tatrādriketi vikhyātā brahmaśāpādvarāpsarā

उनके लड़ते समय वह वीर्य यमुना के जल में गिर पड़ा। वहाँ अद्रिका नाम से प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ अप्सरा थी, जो ब्रह्मशाप से

श्लोक 74 (1.64.74)

मीनभावमनुप्राप्ता बभूव यमुनाचरी । श्येनपादपरिभ्रष्टं तद्वीर्यमथ वासवम् ॥

mīnabhāvamanuprāptā babhūva yamunācarī | śyenapādaparibhraṣṭaṃ tadvīryamatha vāsavam

मछली बनकर यमुना में विचरती थी। बाज़ के पंजों से छूटे हुए वसु के उस वीर्य को

श्लोक 75 (1.64.75)

जग्राह तरसोपेत्य साऽद्रिका मत्स्यरूपिणी । कदाचिदपि मत्सीं तां बबन्धुर्मत्स्यजीविनः ॥

jagrāha tarasopetya sā'drikā matsyarūpiṇī | kadācidapi matsīṃ tāṃ babandhurmatsyajīvinaḥ

मत्स्यरूपिणी अद्रिका ने तुरन्त पास आकर निगल लिया। फिर एक दिन मछुआरों ने उस मछली को पकड़ लिया।

श्लोक 76 (1.64.76)

मासे च दशमे प्राप्ते तदा भरतसत्तम । उज्जह्रुरुदरात्तस्याः स्त्रीं पुमांसं च मानुषौ ॥

māse ca daśame prāpte tadā bharatasattama | ujjahrurudarāttasyāḥ strīṃ pumāṃsaṃ ca mānuṣau

हे भरतश्रेष्ठ, दसवाँ महीना आने पर उन्होंने उसके पेट से दो मनुष्य निकाले — एक कन्या और एक बालक।

श्लोक 77 (1.64.77)

आश्चर्यभूतं तद्गत्वा राज्ञेऽथ प्रत्यवेदयन् । काये मत्स्या इमौ राजन्संभूतौ मानुषाविति ॥

āścaryabhūtaṃ tadgatvā rājñe'tha pratyavedayan | kāye matsyā imau rājansaṃbhūtau mānuṣāviti

उन्होंने जाकर इस आश्चर्यजनक घटना की सूचना राजा को दी — "हे राजन्, ये दोनों मनुष्य एक मछली के शरीर में उत्पन्न हुए हैं।"

श्लोक 78 (1.64.78)

तयोः पुमांसं जग्राह राजोपरिचरस्तदा । स मत्स्यो नाम राजासीद्धार्मिकः सत्यसङ्गरः ॥

tayoḥ pumāṃsaṃ jagrāha rājoparicarastadā | sa matsyo nāma rājāsīddhārmikaḥ satyasaṅgaraḥ

उन दोनों में से बालक को राजा उपरिचर ने ले लिया। वही आगे चलकर मत्स्य नाम का धर्मात्मा और सत्यप्रतिज्ञ राजा हुआ।

श्लोक 79 (1.64.79)

साऽप्सरा मुक्तशापा च क्षणेन समपद्यत । या पुरोक्ता भगवता तिर्यग्योनिगता शुभा ॥

sā'psarā muktaśāpā ca kṣaṇena samapadyata | yā puroktā bhagavatā tiryagyonigatā śubhā

वह अप्सरा क्षण भर में शाप से मुक्त हो गई। पशु-योनि में पड़ी उस सुन्दरी से भगवान ने पहले ही कहा था —

श्लोक 80 (1.64.80)

मानुषौ जनयित्वा त्वं शापमोक्षमवाप्स्यसि । ततः साजनयित्वा तौ विशस्ता मत्स्यघातिभिः ॥

mānuṣau janayitvā tvaṃ śāpamokṣamavāpsyasi | tataḥ sājanayitvā tau viśastā matsyaghātibhiḥ

"दो मनुष्यों को जन्म देकर तुम शाप से छूट जाओगी।" अतः उन दोनों को जन्म देकर, मछुआरों द्वारा मारी जाने पर,

श्लोक 81 (1.64.81)

संत्यज्य मत्स्यरूपं सा दिव्यं रूपमवाप्य च । सिद्धर्षिचारणपथं जगामाथ वराप्सराः ॥

saṃtyajya matsyarūpaṃ sā divyaṃ rūpamavāpya ca | siddharṣicāraṇapathaṃ jagāmātha varāpsarāḥ

वह श्रेष्ठ अप्सरा मछली का रूप त्यागकर और दिव्य रूप पाकर सिद्धों, ऋषियों और चारणों के मार्ग से चली गई।

श्लोक 82 (1.64.82)

सा कन्या दुहिता तस्या मत्स्या मत्स्यसगन्धिनी । राज्ञा दत्ता च दाशाय कन्येयं ते भवत्विति ॥

sā kanyā duhitā tasyā matsyā matsyasagandhinī | rājñā dattā ca dāśāya kanyeyaṃ te bhavatviti

उस मछली की जो कन्या थी, जिसके शरीर से मछली की गन्ध आती थी, उसे राजा ने एक मछुआरे को यह कहकर सौंप दिया — "यह कन्या तुम्हारी हो।"

श्लोक 83 (1.64.83)

रूपसत्त्वसमायुक्ता सर्वैः समुदिता गुणैः । सा तु सत्यवती नाम मत्स्यघात्यभिसंश्रयात् ॥

rūpasattvasamāyuktā sarvaiḥ samuditā guṇaiḥ | sā tu satyavatī nāma matsyaghātyabhisaṃśrayāt

वह रूप और सत्त्वगुण से युक्त तथा सभी गुणों से सम्पन्न थी। उसका नाम सत्यवती था; किन्तु मछुआरों के आश्रय में रहने के कारण

श्लोक 84 (1.64.84)

आसीत्सा मत्स्यगन्धैव कंचित्कालं शुचिस्मिता । शुश्रूषार्थं पितुर्नावं वाहयन्तीं जले च ताम् ॥

āsītsā matsyagandhaiva kaṃcitkālaṃ śucismitā | śuśrūṣārthaṃ piturnāvaṃ vāhayantīṃ jale ca tām

वह मधुर मुस्कान वाली कन्या कुछ समय तक मछली की गन्ध वाली ही रही। पिता की सेवा के लिए जल में नाव खेती हुई उस कन्या को

श्लोक 85 (1.64.85)

तीर्थयात्रां परिक्रामन्नपश्यद्वै पराशरः । अतीव रूपसंपन्नां सिद्धानामपि काङ्क्षिताम् ॥

tīrthayātrāṃ parikrāmannapaśyadvai parāśaraḥ | atīva rūpasaṃpannāṃ siddhānāmapi kāṅkṣitām

तीर्थयात्रा पर घूमते हुए पराशर मुनि ने देखा — वह अत्यन्त रूपवती थी और सिद्ध भी उसकी कामना करते थे।

श्लोक 86 (1.64.86)

दृष्ट्वैव स च तां धीमांश्चकमे चारुहासिनीम् । दिव्यां तां वासवीं कन्यां रम्भोरूं मुनिपुङ्गवः ॥

dṛṣṭvaiva sa ca tāṃ dhīmāṃścakame cāruhāsinīm | divyāṃ tāṃ vāsavīṃ kanyāṃ rambhorūṃ munipuṅgavaḥ

उसे देखते ही वे बुद्धिमान मुनिश्रेष्ठ उस मधुर मुस्कान वाली, कदली-स्तम्भ जैसी सुडौल जाँघों वाली दिव्य वसु-कन्या पर मोहित हो गए।

श्लोक 87 (1.64.87)

संभवं चिन्तयित्वा तां ज्ञात्वा प्रोवाच शक्तिजः । क्व कर्णधारो नौर्येन नीयते ब्रूहि भामिनि ॥

saṃbhavaṃ cintayitvā tāṃ jñātvā provāca śaktijaḥ | kva karṇadhāro nauryena nīyate brūhi bhāmini

उसकी उत्पत्ति पर विचार करके और उसे जानकर शक्ति के पुत्र ने कहा, "हे सुन्दरी, बताओ, वह कर्णधार कहाँ है जो इस नाव को ले जाता है?"

मत्स्यगन्धोवाच

श्लोक 88 (1.64.88)

अनपत्यस्य दाशस्य सुता तत्प्रियकाम्यया । सहस्रजनसंपन्ना नौर्मया वाह्यते द्विज ॥

anapatyasya dāśasya sutā tatpriyakāmyayā | sahasrajanasaṃpannā naurmayā vāhyate dvija

"हे ब्राह्मण, मैं एक ऐसे मल्लाह की बेटी हूँ जिसके कोई पुत्र नहीं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए मैं स्वयं यह नाव खेती हूँ, जिसमें हज़ार लोग समा जाते हैं।"

पराशर उवाच

श्लोक 89 (1.64.89)

शोभनं वासवि शुभे किं चिरायसि वाह्यताम् । कलशं भविता भद्रे सहस्रार्धेन संमितम् ॥

śobhanaṃ vāsavi śubhe kiṃ cirāyasi vāhyatām | kalaśaṃ bhavitā bhadre sahasrārdhena saṃmitam

"बहुत अच्छा, हे शुभ वासवी! देर क्यों करती हो? नाव चलाओ। हे भद्रे, इसका पूरा भार पाँच सौ के बराबर गिना जाएगा,

श्लोक 90 (1.64.90)

अहं शेषो भविष्यामि नीयतामचिरेण वै । मत्स्यगन्धा तथेत्युक्त्वा नावं वाहयती जले ॥

ahaṃ śeṣo bhaviṣyāmi nīyatāmacireṇa vai | matsyagandhā tathetyuktvā nāvaṃ vāhayatī jale

और शेष की पूर्ति मैं स्वयं करूँगा। अब बिना विलम्ब नाव ले चलो।" मत्स्यगन्धा "ऐसा ही हो" कहकर नाव को जल में खेने लगी।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 91 (1.64.91)

वीक्षमाणं मुनिं दृष्ट्वा प्रोवाचेदं वचस्तदा । मत्स्यगन्धेति मामाहुर्दाशराजसुतां जनाः ॥

vīkṣamāṇaṃ muniṃ dṛṣṭvā provācedaṃ vacastadā | matsyagandheti māmāhurdāśarājasutāṃ janāḥ

मुनि को अपनी ओर निहारते देखकर उसने तब यह कहा, "लोग मुझ मल्लाहों के राजा की बेटी को मत्स्यगन्धा कहते हैं।

श्लोक 92 (1.64.92)

जन्म शोकाभितप्तायाः कथं ज्ञास्यसि कथ्यताम् । दिव्यज्ञानेन दृष्टं हि दृष्टमात्रेण ते वपुः ॥

janma śokābhitaptāyāḥ kathaṃ jñāsyasi kathyatām | divyajñānena dṛṣṭaṃ hi dṛṣṭamātreṇa te vapuḥ

मैं अपने जन्म के शोक से सन्तप्त रहती हूँ; आप उसे कैसे जानेंगे? बताइए।" पराशर बोले, "दिव्य ज्ञान से मैंने उसे देख लिया, तुम्हारे शरीर पर दृष्टि पड़ते ही।"

पराशर उवाच

श्लोक 93 (1.64.93)

प्रणयग्रहणार्थाय वक्ष्ये वासवि तच्छृणु । बर्हिषद इति ख्याताः पितरः सोमपास्तुते ॥

praṇayagrahaṇārthāya vakṣye vāsavi tacchṛṇu | barhiṣada iti khyātāḥ pitaraḥ somapāstute

"हे वासवी, तुम्हारा प्रेम पाने के लिए मैं बताता हूँ, सुनो। बर्हिषद नाम से प्रसिद्ध जो पितर हैं, वे सोमपान करने वाले हैं।

श्लोक 94 (1.64.94)

तेषां त्वं मानसी कन्या अच्छोदा नाम विश्रुता । अच्छोदं नाम तद्दिव्यं सरो यस्मात्समुत्थितम् ॥

teṣāṃ tvaṃ mānasī kanyā acchodā nāma viśrutā | acchodaṃ nāma taddivyaṃ saro yasmātsamutthitam

तुम उनकी मानसी कन्या थीं, अच्छोदा नाम से विख्यात, उस दिव्य अच्छोद सरोवर के नाम पर जिससे तुम प्रकट हुई थीं।

श्लोक 95 (1.64.95)

त्वया न दृष्टपूर्वास्तु पितरस्ते कदाचन । संभूता मनसा तेषां पितॄन्स्वान्नाभिजानती ॥

tvayā na dṛṣṭapūrvāstu pitaraste kadācana | saṃbhūtā manasā teṣāṃ pitṝnsvānnābhijānatī

तुमने अपने पितरों को पहले कभी नहीं देखा था। उनके मन से उत्पन्न होकर भी तुम अपने पितरों को नहीं पहचानती थीं।

श्लोक 96 (1.64.96)

सा त्वन्यं पितरं वव्रे स्वानतिक्रम्य तान्पितॄन् । नाम्ना वसुरिति ख्यातं मनुपुत्रं दिवि स्थितम् ॥

sā tvanyaṃ pitaraṃ vavre svānatikramya tānpitṝn | nāmnā vasuriti khyātaṃ manuputraṃ divi sthitam

अपने उन पितरों को लाँघकर उसने किसी दूसरे को पिता चुना, वसु नाम से प्रसिद्ध मनु के पुत्र को, जो स्वर्ग में रहते थे,

श्लोक 97 (1.64.97)

अद्रिकाऽप्सरसा युक्तं विमाने दिवि विष्ठितम् । सा तेन व्यभिचारेण मनसा कामचारिणी ॥

adrikā'psarasā yuktaṃ vimāne divi viṣṭhitam | sā tena vyabhicāreṇa manasā kāmacāriṇī

और जो आकाश में विमान पर अप्सरा अद्रिका के साथ विराजमान थे। मन से स्वेच्छाचारिणी होकर किए गए उस मर्यादा-भंग के कारण,

श्लोक 98 (1.64.98)

पितरं प्रार्थयित्वाऽन्यं योगाद्भ्रष्टा पपात सा । अपश्यत्पतमाना सा विमानत्रयमन्तिकात् ॥

pitaraṃ prārthayitvā'nyaṃ yogādbhraṣṭā papāta sā | apaśyatpatamānā sā vimānatrayamantikāt

दूसरे को पिता के रूप में चाहने से वह योगबल से भ्रष्ट होकर गिर पड़ी। गिरते हुए उसने पास ही तीन विमान देखे,

श्लोक 99 (1.64.99)

त्रसरेणुप्रमाणांस्तांस्तत्रापश्यत्स्वकान्पितॄन् । सुसूक्ष्मानपरिव्यक्तानङ्गैरङ्गेष्विवाहितान् ॥

trasareṇupramāṇāṃstāṃstatrāpaśyatsvakānpitṝn | susūkṣmānaparivyaktānaṅgairaṅgeṣvivāhitān

और वहाँ उसने अपने पितरों को देखा, जो त्रसरेणु (धूप में चमकते कण) जितने छोटे, अत्यन्त सूक्ष्म और अस्पष्ट थे, मानो अंगों के भीतर अंग समाए हों।

श्लोक 100 (1.64.100)

तातेति तानुवाचार्ता पतन्ती सा ह्यधोमुखी । तैरुक्ता सा तु माभैषीस्तेन सा संस्थिता दिवि ॥

tāteti tānuvācārtā patantī sā hyadhomukhī | tairuktā sā tu mābhaiṣīstena sā saṃsthitā divi

नीचे मुख किए गिरती हुई उसने व्याकुल होकर उन्हें 'तात!' कहकर पुकारा। उन्होंने कहा, 'डरो मत', और इससे वह आकाश में ही ठहर गई।

श्लोक 101 (1.64.101)

ततः प्रसादयामास स्वान्पितॄन्दीनया गिरा । तामूचुः पितरः कन्यां भ्रष्टैश्वर्यां व्यतिक्रमात् ॥

tataḥ prasādayāmāsa svānpitṝndīnayā girā | tāmūcuḥ pitaraḥ kanyāṃ bhraṣṭaiśvaryāṃ vyatikramāt

तब उसने दीन वाणी से अपने पितरों को प्रसन्न करने का यत्न किया। मर्यादा-भंग से ऐश्वर्य खो चुकी उस कन्या से पितरों ने कहा,

श्लोक 102 (1.64.102)

भ्रष्टैश्वर्या स्वदोषेण पतसि त्वं शुचिस्मिते । यैरारभन्ते कर्माणि शरीरैरिह देवताः ॥

bhraṣṭaiśvaryā svadoṣeṇa patasi tvaṃ śucismite | yairārabhante karmāṇi śarīrairiha devatāḥ

'हे शुचिस्मिते, अपने ही दोष से ऐश्वर्य खोकर तुम गिर रही हो। देवता जिन शरीरों से यहाँ कर्म आरम्भ करते हैं,

श्लोक 103 (1.64.103)

तैरेव तत्कर्मफलं प्राप्नुवन्ति स्म देवताः । मनुष्यास्त्वन्यदेहेन शुभाशुभमिति स्थितिः ॥

taireva tatkarmaphalaṃ prāpnuvanti sma devatāḥ | manuṣyāstvanyadehena śubhāśubhamiti sthitiḥ

उन्हीं शरीरों से वे उन कर्मों का फल भी पाते हैं। किन्तु मनुष्य शुभ-अशुभ का फल दूसरे शरीर में पाते हैं; यही विधान है।

श्लोक 104 (1.64.104)

सद्यः फलन्ति कर्माणि देवत्वे प्रेत्य मानुषे । तस्मात्त्वं पतसे पुत्रि प्रेत्यत्वं प्राप्स्यसे फलम् ॥

sadyaḥ phalanti karmāṇi devatve pretya mānuṣe | tasmāttvaṃ patase putri pretyatvaṃ prāpsyase phalam

देवत्व में कर्म तुरन्त फल देते हैं, मनुष्य-जन्म में मृत्यु के बाद। इसीलिए, पुत्री, तुम गिर रही हो; तुम्हें फल मृत्यु के पश्चात मिलेगा।

श्लोक 105 (1.64.105)

पितृहीना तु कन्या त्वं वसोर्हि त्वं सुता मता । मत्स्ययोनौ समुत्पन्ना सुताराज्ञो भविष्यसि ॥

pitṛhīnā tu kanyā tvaṃ vasorhi tvaṃ sutā matā | matsyayonau samutpannā sutārājño bhaviṣyasi

पितरों से विहीन होकर भी तुम वसु की पुत्री मानी गई हो। मछली के गर्भ से उत्पन्न होकर तुम एक राजा की बेटी बनोगी।

श्लोक 106 (1.64.106)

अद्रिका मत्स्यरूपाऽभूद्गङ्गायमुनसङ्गमे । पराशरस्य दायादं त्वं पुत्रं जनयिष्यसि ॥

adrikā matsyarūpā'bhūdgaṅgāyamunasaṅgame | parāśarasya dāyādaṃ tvaṃ putraṃ janayiṣyasi

अद्रिका गंगा और यमुना के संगम पर मछली बनी। तुम पराशर के उत्तराधिकारी पुत्र को जन्म दोगी,

श्लोक 107 (1.64.107)

यो वेदमेकं ब्रह्मर्षिश्चतुर्धा विभजिष्यति । महाभिषक्सुतस्यैव शन्तनोः कीर्तिवर्धनम् ॥

yo vedamekaṃ brahmarṣiścaturdhā vibhajiṣyati | mahābhiṣaksutasyaiva śantanoḥ kīrtivardhanam

वह ब्रह्मर्षि जो एक वेद को चार भागों में विभक्त करेगा। और पूर्वजन्म में महाभिष रहे शन्तनु के लिए तुम उनकी कीर्ति बढ़ाने वाले पुत्रों को जन्म दोगी,

श्लोक 108 (1.64.108)

ज्येष्ठं चित्राङ्गदं वीरं चित्रवीरं च विश्रुतम् । एतान्सूत्वा सुपुत्रांस्त्वं पुनरेव गमिष्यसि ॥

jyeṣṭhaṃ citrāṅgadaṃ vīraṃ citravīraṃ ca viśrutam | etānsūtvā suputrāṃstvaṃ punareva gamiṣyasi

ज्येष्ठ वीर चित्रांगद और विख्यात चित्रवीर (विचित्रवीर्य)। इन उत्तम पुत्रों को जन्म देकर तुम फिर लौट आओगी।

श्लोक 109 (1.64.109)

व्यतिक्रमात्पितॄणां च प्राप्स्यसे जन्म कुत्सितम् । अस्यैव राज्ञस्त्वं कन्या ह्यद्रिकायां भविष्यसि ॥

vyatikramātpitṝṇāṃ ca prāpsyase janma kutsitam | asyaiva rājñastvaṃ kanyā hyadrikāyāṃ bhaviṣyasi

पितरों का उल्लंघन करने के कारण तुम्हें निन्दित जन्म मिलेगा। तुम इसी राजा की बेटी बनोगी, अद्रिका के गर्भ से।

श्लोक 110 (1.64.110)

अष्टाविंशे भवित्री त्वं द्वापरे मत्स्ययोनिजा । एवमुक्ता पुरा तैस्त्वं जाता सत्यवती शुभा ॥

aṣṭāviṃśe bhavitrī tvaṃ dvāpare matsyayonijā | evamuktā purā taistvaṃ jātā satyavatī śubhā

अट्ठाईसवें द्वापर युग में तुम मछली से जन्म लोगी।' इस प्रकार उन्होंने तुमसे बहुत पहले कहा था, और तुम शुभ सत्यवती के रूप में जन्मीं।

श्लोक 111 (1.64.111)

अद्रिकेत्यभिविख्याता ब्रह्मशापाद्वराप्सरा । मीनभावमनुप्राप्ता त्वां जनित्वा गता दिवम् ॥

adriketyabhivikhyātā brahmaśāpādvarāpsarā | mīnabhāvamanuprāptā tvāṃ janitvā gatā divam

अद्रिका नाम से विख्यात वह श्रेष्ठ अप्सरा ब्राह्मण के शाप से मछली बन गई थी; तुम्हें जन्म देकर वह स्वर्ग चली गई।

श्लोक 112 (1.64.112)

तस्यां जातासि सा कन्या राज्ञो वीर्येण चैवहि । तस्माद्वासवि भद्रं ते याचे वंशकरं सुतम् ॥

tasyāṃ jātāsi sā kanyā rājño vīryeṇa caivahi | tasmādvāsavi bhadraṃ te yāce vaṃśakaraṃ sutam

तुम वही कन्या हो जो राजा के वीर्य से उसके गर्भ में उत्पन्न हुई। इसलिए, हे वासवी, तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुमसे अपना वंश चलाने वाला पुत्र माँगता हूँ।

श्लोक 113 (1.64.113)

संगमं मम कल्याणि कुरुष्वेत्यभ्यभाषत ॥

saṃgamaṃ mama kalyāṇi kuruṣvetyabhyabhāṣata

हे कल्याणी, मुझसे संगम करो," उन्होंने कहा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 114 (1.64.114)

विस्मयाविष्टसर्वाङ्गी जातिस्मरणतां गता । साब्रवीत्पश्य भगवन्परपारे स्थितानृषीन् ॥

vismayāviṣṭasarvāṅgī jātismaraṇatāṃ gatā | sābravītpaśya bhagavanparapāre sthitānṛṣīn

विस्मय से उसका सारा शरीर भर उठा और उसे अपने पूर्वजन्म का स्मरण हो आया। वह बोली, "भगवन्, देखिए, उस पार ऋषि खड़े हैं।

श्लोक 115 (1.64.115)

आवयोर्दृष्टयोरेभिः कथं नु स्यात्समागमः । एवं तयोक्तो भगवान्नीहारमसृजत्प्रभुः ॥

āvayordṛṣṭayorebhiḥ kathaṃ nu syātsamāgamaḥ | evaṃ tayokto bhagavānnīhāramasṛjatprabhuḥ

जब वे हमें देख रहे हैं, तब हमारा समागम कैसे हो सकता है?" उसके ऐसा कहने पर समर्थ भगवान पराशर ने कुहासा रच दिया,

श्लोक 116 (1.64.116)

येन देशः स सर्वस्तु तमोभूत इवाभवत् । दृष्ट्वा सृष्टं तु नीहारं ततस्तं परमर्षिणा ॥

yena deśaḥ sa sarvastu tamobhūta ivābhavat | dṛṣṭvā sṛṣṭaṃ tu nīhāraṃ tatastaṃ paramarṣiṇā

जिससे वह सारा प्रदेश मानो अन्धकार में डूब गया। परमर्षि द्वारा रचे उस कुहासे को देखकर

श्लोक 117 (1.64.117)

विस्मिता साभवत्कन्या व्रीडिता च तपस्विनी । विद्धि मां भगवन्कन्यां सदा पितृवशानुगाम् ॥

vismitā sābhavatkanyā vrīḍitā ca tapasvinī | viddhi māṃ bhagavankanyāṃ sadā pitṛvaśānugām

वह बेचारी कन्या चकित भी हुई और लज्जित भी। (वह बोली,) "भगवन्, जानिए कि मैं कुमारी हूँ और सदा पिता के अधीन रहती हूँ।

सत्यवत्युवाच

श्लोक 118 (1.64.118)

त्वत्संयोगाच्च दुष्येत कन्याभावो ममाऽनघ । कन्यात्वे दूषिते वापि कथं शक्ष्ये द्विजोत्तम ॥

tvatsaṃyogācca duṣyeta kanyābhāvo mamā'nagha | kanyātve dūṣite vāpi kathaṃ śakṣye dvijottama

हे निष्पाप, आपके संयोग से मेरा कौमार्य दूषित हो जाएगा। और कौमार्य दूषित होने पर, हे द्विजश्रेष्ठ, मैं कैसे

श्लोक 119 (1.64.119)

गृहं गन्तुमृषे चाहं धीमन्न स्थातुमुत्सहे । एतत्संचिन्त्य भगवन्विधत्स्व यदनन्तरम् ॥

gṛhaṃ gantumṛṣe cāhaṃ dhīmanna sthātumutsahe | etatsaṃcintya bhagavanvidhatsva yadanantaram

घर जा सकूँगी, हे ऋषि? हे बुद्धिमान, मैं वहाँ रह भी न सकूँगी। भगवन्, यह सब सोचकर आगे जो उचित हो, वही कीजिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 120 (1.64.120)

एवमुक्तवतीं तां तु प्रीतिमानृषिसत्तमः । उवाच मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव त्वं भविष्यसि ॥

evamuktavatīṃ tāṃ tu prītimānṛṣisattamaḥ | uvāca matpriyaṃ kṛtvā kanyaiva tvaṃ bhaviṣyasi

उसके ऐसा कहने पर ऋषिश्रेष्ठ प्रसन्न होकर बोले, "मेरा प्रिय करके भी तुम कुमारी ही रहोगी।

श्लोक 121 (1.64.121)

वृणीष्व च वरं भीरु यं त्वमिच्छसि भामिनि । वृथा हि न प्रसादो मे भूतपूर्वः शुचिस्मिते ॥

vṛṇīṣva ca varaṃ bhīru yaṃ tvamicchasi bhāmini | vṛthā hi na prasādo me bhūtapūrvaḥ śucismite

हे भीरु, हे भामिनी, जो चाहो वह वर माँग लो। हे शुचिस्मिते, मेरी कृपा आज तक कभी व्यर्थ नहीं गई।"

श्लोक 122 (1.64.122)

एवमुक्ता वरं वव्रे गात्रसौगन्ध्यमुत्तमम् । सचास्यै भगवान्प्रादान्मनः काङ्क्षितं प्रभुः ॥

evamuktā varaṃ vavre gātrasaugandhyamuttamam | sacāsyai bhagavānprādānmanaḥ kāṅkṣitaṃ prabhuḥ

ऐसा कहे जाने पर उसने वर में शरीर की उत्तम सुगन्ध माँगी, और समर्थ भगवान ने उसे उसका मनचाहा वर दे दिया।

श्लोक 123 (1.64.123)

ततो लब्धवरा प्रीता स्त्रीभावगुणभूषिता । जगाम सह संसर्गमृषिणाऽद्भुतकर्मणा ॥

tato labdhavarā prītā strībhāvaguṇabhūṣitā | jagāma saha saṃsargamṛṣiṇā'dbhutakarmaṇā

वर पाकर प्रसन्न और स्त्रीत्व के गुणों से विभूषित होकर वह अद्भुत कर्म करने वाले ऋषि के साथ समागम को प्राप्त हुई।

श्लोक 124 (1.64.124)

तस्यास्तु योजनाद्गन्धमाजिघ्रन्त नरा भुवि ॥

tasyāstu yojanādgandhamājighranta narā bhuvi

पृथ्वी पर लोग एक योजन दूर से उसकी सुगन्ध पा लेते थे।

श्लोक 125 (1.64.125)

तस्या योजनगन्धेति ततो नामापरं स्मृतम् । इति सत्यवती हृष्टा लब्ध्वा वरमनुत्तमम् ॥

tasyā yojanagandheti tato nāmāparaṃ smṛtam | iti satyavatī hṛṣṭā labdhvā varamanuttamam

इसी से उसका एक और नाम योजनगन्धा पड़ा, अर्थात् जिसकी सुगन्ध एक योजन तक जाती है। इस प्रकार अनुपम वर पाकर हर्षित सत्यवती ने

श्लोक 126 (1.64.126)

पराशरेण संयुक्ता सद्यो गर्भं सुषाव सा । जज्ञे च यमुनाद्वीपे पाराशर्यः स वीर्यवान् ॥

parāśareṇa saṃyuktā sadyo garbhaṃ suṣāva sā | jajñe ca yamunādvīpe pārāśaryaḥ sa vīryavān

पराशर से संयुक्त होकर तत्काल ही गर्भ को जन्म दिया; और यमुना के एक द्वीप पर पराशर का वह पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुआ।

श्लोक 127 (1.64.127)

स मातरमनुज्ञाप्य तपस्येव मनो दधे । स्मृतोऽहं दर्शयिष्यामि कृत्येष्विति च सोऽब्रवीत् ॥

sa mātaramanujñāpya tapasyeva mano dadhe | smṛto'haṃ darśayiṣyāmi kṛtyeṣviti ca so'bravīt

माता से अनुमति लेकर उसने तप में ही मन लगाया और कहा, "स्मरण किए जाने पर मैं आवश्यक कार्यों के समय अवश्य दर्शन दूँगा।"

श्लोक 128 (1.64.128)

एवं द्वैपायनो जज्ञे सत्यवत्यां पराशरात् । न्यस्तोद्वीपे यद्बालस्तस्माद्द्वैपायनःस्मृतः ॥

evaṃ dvaipāyano jajñe satyavatyāṃ parāśarāt | nyastodvīpe yadbālastasmāddvaipāyanaḥsmṛtaḥ

इस प्रकार सत्यवती के गर्भ से पराशर के द्वारा द्वैपायन का जन्म हुआ। क्योंकि बालक को द्वीप पर छोड़ा गया था, इसलिए वे द्वैपायन कहलाए।

श्लोक 129 (1.64.129)

पादापसारिणं धर्मं स तु विद्वान्युगे युगे । आयुः शक्तिं च मर्त्यानां युगावस्थामवेक्ष्यच ॥

pādāpasāriṇaṃ dharmaṃ sa tu vidvānyuge yuge | āyuḥ śaktiṃ ca martyānāṃ yugāvasthāmavekṣyaca

यह जानकर कि प्रत्येक युग में धर्म का एक-एक चरण घटता जाता है, और मनुष्यों की आयु, शक्ति तथा युग की दशा को देखकर,

श्लोक 130 (1.64.130)

ब्रह्मणो ब्राह्मणानां च तथानुग्रहकाङ्क्षया । विव्यास वेदान्यस्माच्च तस्माद्व्यास इति स्मृतः ॥

brahmaṇo brāhmaṇānāṃ ca tathānugrahakāṅkṣayā | vivyāsa vedānyasmācca tasmādvyāsa iti smṛtaḥ

ब्रह्म और ब्राह्मणों पर अनुग्रह करने की इच्छा से उन्होंने वेदों का विभाजन किया; इसी कारण वे व्यास कहलाए।

श्लोक 131 (1.64.131)

वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् । सुमन्तुं जैमिनिं पैलं शुकं चैव स्वमात्मजम् ॥

vedānadhyāpayāmāsa mahābhāratapañcamān | sumantuṃ jaiminiṃ pailaṃ śukaṃ caiva svamātmajam

उन्होंने वेदों को, और पाँचवें वेद के रूप में महाभारत को, सुमन्तु, जैमिनि, पैल और अपने पुत्र शुक को पढ़ाया;

श्लोक 132 (1.64.132)

प्रभुर्वरिष्ठो वरदो वैशंपायनमेव च । संहितास्तैः पृथक्त्वेन भारतस्य प्रकाशिताः ॥

prabhurvariṣṭho varado vaiśaṃpāyanameva ca | saṃhitāstaiḥ pṛthaktvena bhāratasya prakāśitāḥ

और उन समर्थ, सर्वश्रेष्ठ, वरदायक प्रभु ने वैशम्पायन को भी पढ़ाया। इन शिष्यों ने भारत की संहिताओं को अलग-अलग प्रकाशित किया।

श्लोक 133 (1.64.133)

तथा भीष्मः शान्तनवो गङ्गायाममितद्युतिः । वसुवीर्यात्समभवन्महावीर्यो महायशाः ॥

tathā bhīṣmaḥ śāntanavo gaṅgāyāmamitadyutiḥ | vasuvīryātsamabhavanmahāvīryo mahāyaśāḥ

इसी प्रकार अपार तेजस्वी, महापराक्रमी और महायशस्वी शान्तनुनन्दन भीष्म वसुओं के अंश से गंगा के गर्भ से उत्पन्न हुए।

श्लोक 134 (1.64.134)

वेदार्थविच्च भगवानृषिर्विप्रो महायशाः । शूले प्रोतः पुराणर्षिरचोरश्चोरशङ्कया ॥

vedārthavicca bhagavānṛṣirvipro mahāyaśāḥ | śūle protaḥ purāṇarṣiracoraścoraśaṅkayā

वेदों का अर्थ जानने वाले एक महायशस्वी ब्राह्मण ऋषि थे, एक प्राचीन मुनि, जिन्हें चोर न होते हुए भी चोरी के सन्देह में शूली पर चढ़ा दिया गया था।

श्लोक 135 (1.64.135)

अणीमाण्डव्य इत्येवं विख्यातः स महायशाः । स धर्ममाहूय पुरा महर्षिरिदमुक्तवान् ॥

aṇīmāṇḍavya ityevaṃ vikhyātaḥ sa mahāyaśāḥ | sa dharmamāhūya purā maharṣiridamuktavān

वे महायशस्वी अणीमाण्डव्य नाम से विख्यात थे। पूर्वकाल में उन महर्षि ने धर्म को बुलाकर यह कहा,

श्लोक 136 (1.64.136)

इषीकया मया बाल्याद्विद्धा ह्येका शकुन्तिका । तत्किल्बिषं स्मरे धर्म नान्यत्पापमहं स्मरे ॥

iṣīkayā mayā bālyādviddhā hyekā śakuntikā | tatkilbiṣaṃ smare dharma nānyatpāpamahaṃ smare

"बचपन में मैंने एक सींक से एक छोटी-सी चिड़िया को बींध दिया था। हे धर्म, मुझे वही एक पाप याद है; और कोई पाप मुझे स्मरण नहीं।

श्लोक 137 (1.64.137)

तन्मे सहस्रममितं कस्मान्नेहाजयत्तपः । गरीयान्ब्राह्मणवधः सर्वभूतवधाद्यतः ॥

tanme sahasramamitaṃ kasmānnehājayattapaḥ | garīyānbrāhmaṇavadhaḥ sarvabhūtavadhādyataḥ

मेरी हज़ार गुनी, अपरिमित तपस्या ने उसे यहाँ क्यों नहीं जीत लिया? क्योंकि ब्राह्मण का वध समस्त प्राणियों के वध से भी भारी है,

श्लोक 138 (1.64.138)

तस्मात्त्वं किल्बिषादस्माच्छूद्रयोनौ जनिष्यसि । तेन शापेन धर्मोऽपि शूद्रयोनावजायत ॥

tasmāttvaṃ kilbiṣādasmācchūdrayonau janiṣyasi | tena śāpena dharmo'pi śūdrayonāvajāyata

इसलिए इस पाप के कारण तुम शूद्र-योनि में जन्म लोगे।" उस शाप से धर्म भी शूद्र-योनि में उत्पन्न हुए,

श्लोक 139 (1.64.139)

विद्वान्विदुररूपेण धार्मिकः किल्बिषात्ततः । संजयो मुनिकल्पस्तु जज्ञे सूतो गवल्गणात् ॥

vidvānvidurarūpeṇa dhārmikaḥ kilbiṣāttataḥ | saṃjayo munikalpastu jajñe sūto gavalgaṇāt

उसी पाप के कारण विद्वान और धर्मात्मा विदुर के रूप में। और मुनि के समान संजय सूत गवल्गण से उत्पन्न हुए।

श्लोक 140 (1.64.140)

सूर्याच्च कुन्तिकन्यायां जज्ञे कर्णो महाबलः । सहजं कवचं बिभ्रत्कुण्डलोद्योतिताननः ॥

sūryācca kuntikanyāyāṃ jajñe karṇo mahābalaḥ | sahajaṃ kavacaṃ bibhratkuṇḍalodyotitānanaḥ

सूर्य से कुमारी कुन्ती के गर्भ से महाबली कर्ण का जन्म हुआ, जो जन्म से ही कवच धारण किए था और जिसका मुख कुण्डलों से दमकता था।

श्लोक 141 (1.64.141)

अनुग्रहार्थं लोकानां विष्णुर्लोकनमस्कृतः । वसुदेवात्तु देवक्यां प्रादुर्भूतो महायशाः ॥

anugrahārthaṃ lokānāṃ viṣṇurlokanamaskṛtaḥ | vasudevāttu devakyāṃ prādurbhūto mahāyaśāḥ

लोकों पर अनुग्रह करने के लिए लोकवन्दित, महायशस्वी विष्णु वसुदेव से देवकी के गर्भ में प्रकट हुए।

श्लोक 142 (1.64.142)

अनादिनिधनो देवः स कर्ता जगतः प्रभुः । अव्यक्तमक्षरं ब्रह्म प्रधानं त्रिगुणात्मकम् ॥

anādinidhano devaḥ sa kartā jagataḥ prabhuḥ | avyaktamakṣaraṃ brahma pradhānaṃ triguṇātmakam

वे आदि और अन्त से रहित देव हैं, जगत के कर्ता और स्वामी: अव्यक्त, अक्षर ब्रह्म, त्रिगुणात्मक प्रधान,

श्लोक 143 (1.64.143)

आत्मानमव्ययं चैव प्रकृतिं प्रभवं प्रभुम् । पुरुषं विश्वकर्माणं सत्वयोगं ध्रुवाक्षरम् ॥

ātmānamavyayaṃ caiva prakṛtiṃ prabhavaṃ prabhum | puruṣaṃ viśvakarmāṇaṃ satvayogaṃ dhruvākṣaram

अविनाशी आत्मा, प्रकृति, सबका उद्गम और प्रभु, पुरुष, विश्वकर्मा, सत्त्व से युक्त, ध्रुव और अक्षर,

श्लोक 144 (1.64.144)

अनन्तमचलं देवं हंसं नारायणं प्रभुम् । धातारमजमव्यक्तं यमाहुः परमव्ययम् ॥

anantamacalaṃ devaṃ haṃsaṃ nārāyaṇaṃ prabhum | dhātāramajamavyaktaṃ yamāhuḥ paramavyayam

अनन्त, अचल देव, हंस, प्रभु नारायण, धाता, अजन्मा और अव्यक्त, जिन्हें परम और अविनाशी कहा जाता है,

श्लोक 145 (1.64.145)

कैवल्यं निर्गुणं विश्वमनादिमजमव्ययम् । पुरुषः स विभुः कर्ता सर्वभूतपितामहः ॥

kaivalyaṃ nirguṇaṃ viśvamanādimajamavyayam | puruṣaḥ sa vibhuḥ kartā sarvabhūtapitāmahaḥ

कैवल्य, निर्गुण, विश्वरूप, अनादि, अजन्मा और अविनाशी। वे सर्वव्यापी पुरुष, कर्ता और समस्त प्राणियों के पितामह

श्लोक 146 (1.64.146)

धर्मसंस्थापनार्थाय प्रजज्ञेऽन्धकवृष्णिषु । अस्त्रज्ञौ तु महावीर्यौ सर्वशास्त्रविशारदौ ॥

dharmasaṃsthāpanārthāya prajajñe'ndhakavṛṣṇiṣu | astrajñau tu mahāvīryau sarvaśāstraviśāradau

धर्म की स्थापना के लिए अन्धकों और वृष्णियों में जन्मे। अस्त्रों के ज्ञाता, महापराक्रमी और सब शास्त्रों में निपुण दो वीर,

श्लोक 147 (1.64.147)

सात्यकिः कृतवर्मा च नारायणमनुव्रतौ । सत्यकाद्धृदिकाच्चैव जज्ञातेऽस्त्रविशारदौ ॥

sātyakiḥ kṛtavarmā ca nārāyaṇamanuvratau | satyakāddhṛdikāccaiva jajñāte'straviśāradau

नारायण के अनुगामी सात्यकि और कृतवर्मा, अस्त्रविद्या में पारंगत ये दोनों, सत्यक और हृदिक से उत्पन्न हुए।

श्लोक 148 (1.64.148)

भरद्वाजस्य च स्कन्नं द्रोण्यां शुक्रमवर्धत । महर्षेरुग्रतपसस्तस्माद्द्रोणो व्यजायत ॥

bharadvājasya ca skannaṃ droṇyāṃ śukramavardhata | maharṣerugratapasastasmāddroṇo vyajāyata

भरद्वाज का स्खलित वीर्य द्रोणी (काठ के पात्र) में बढ़ा; उन उग्र तपस्वी महर्षि से इस प्रकार द्रोण उत्पन्न हुए।

श्लोक 149 (1.64.149)

गौतमान्मिथुनं जज्ञे शरस्तम्बाच्छरद्वतः । अश्वत्थाम्नश्च जननी कृपश्चैव महाबलः ॥

gautamānmithunaṃ jajñe śarastambāccharadvataḥ | aśvatthāmnaśca jananī kṛpaścaiva mahābalaḥ

गौतमवंशी शरद्वान से सरकण्डों के झुरमुट से जुड़वाँ सन्तान उत्पन्न हुई: अश्वत्थामा की माता और महाबली कृप।

श्लोक 150 (1.64.150)

अश्वत्थामा ततो जज्ञे द्रोणादेव महाबलः । तथैव धृष्टद्युम्नोऽपि साक्षादग्निसमद्युतिः ॥

aśvatthāmā tato jajñe droṇādeva mahābalaḥ | tathaiva dhṛṣṭadyumno'pi sākṣādagnisamadyutiḥ

फिर द्रोण से महाबली अश्वत्थामा उत्पन्न हुआ। इसी प्रकार साक्षात् अग्नि के समान तेजस्वी धृष्टद्युम्न

श्लोक 151 (1.64.151)

वैताने कर्मणि तते पावकात्समजायत । वीरो द्रोणविनाशाय धनुरादाय वीर्यवान् ॥

vaitāne karmaṇi tate pāvakātsamajāyata | vīro droṇavināśāya dhanurādāya vīryavān

यज्ञ-कर्म के चलते अग्नि से उत्पन्न हुआ, धनुष लिए हुए एक पराक्रमी वीर, जो द्रोण के विनाश के लिए जन्मा था।

श्लोक 152 (1.64.152)

तथैव वेद्यां कृष्णापि जज्ञे तेजस्विनी शुभा । विभ्राजमाना वपुषा बिभ्रती रूपमुत्तमम् ॥

tathaiva vedyāṃ kṛṣṇāpi jajñe tejasvinī śubhā | vibhrājamānā vapuṣā bibhratī rūpamuttamam

इसी प्रकार यज्ञवेदी से तेजस्विनी और शुभ कृष्णा (द्रौपदी) उत्पन्न हुई, जिसका शरीर दमक रहा था और जो परम सौन्दर्य धारण किए थी।

श्लोक 153 (1.64.153)

प्रह्रादशिष्यो नग्नजित्सुबलश्चाभवत्ततः । तस्य प्रजा धर्महन्त्री जज्ञे देवप्रकोपनात् ॥

prahrādaśiṣyo nagnajitsubalaścābhavattataḥ | tasya prajā dharmahantrī jajñe devaprakopanāt

फिर प्रह्लाद के शिष्य नग्नजित् और सुबल हुए। उनकी सन्तान धर्म का नाश करने वाली थी, जो देवताओं के कोप से उत्पन्न हुई।

श्लोक 154 (1.64.154)

गान्धारराजपुत्रोऽभूच्छकुनिः सौबलस्तथा । दुर्योधनस्य जननी जज्ञातेऽर्थविशारदौ ॥

gāndhārarājaputro'bhūcchakuniḥ saubalastathā | duryodhanasya jananī jajñāte'rthaviśāradau

गान्धारराज के पुत्र शकुनि सुबल के पुत्र थे; वे और दुर्योधन की माता, दोनों अर्थ-विषयों में निपुण, उत्पन्न हुए।

श्लोक 155 (1.64.155)

कृष्णद्वैपायनाज्जज्ञे धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य पाण्डुश्चैव महाबलः ॥

kṛṣṇadvaipāyanājjajñe dhṛtarāṣṭro janeśvaraḥ | kṣetre vicitravīryasya pāṇḍuścaiva mahābalaḥ

कृष्णद्वैपायन से विचित्रवीर्य के क्षेत्र में राजा धृतराष्ट्र और महाबली पाण्डु भी उत्पन्न हुए।

श्लोक 156 (1.64.156)

धर्मार्थकुशलो धीमान्मेधावी धूतकल्मषः । विदुरः शूद्रयोनौ तु जज्ञे द्वैपायनादपि ॥

dharmārthakuśalo dhīmānmedhāvī dhūtakalmaṣaḥ | viduraḥ śūdrayonau tu jajñe dvaipāyanādapi

और द्वैपायन से ही शूद्र-योनि में विदुर उत्पन्न हुए, जो धर्म और अर्थ में कुशल, बुद्धिमान, मेधावी और निष्पाप थे।

श्लोक 157 (1.64.157)

पाण्डोस्तु जज्ञिरे पञ्च पुत्रा देवसमाः पृथक् । द्वयोः स्त्रियोर्गुणज्येष्ठस्तेषामासीद्युधिष्ठिरः ॥

pāṇḍostu jajñire pañca putrā devasamāḥ pṛthak | dvayoḥ striyorguṇajyeṣṭhasteṣāmāsīdyudhiṣṭhiraḥ

पाण्डु के दो पत्नियों से देवताओं के समान पाँच पुत्र हुए; उनमें गुणों में सबसे बड़े युधिष्ठिर थे।

श्लोक 158 (1.64.158)

धर्माद्युधिष्ठिरो जज्ञे मारुताच्च वृकोदरः । इन्द्राद्धनंजयः श्रीमान्सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥

dharmādyudhiṣṭhiro jajñe mārutācca vṛkodaraḥ | indrāddhanaṃjayaḥ śrīmānsarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ

धर्म से युधिष्ठिर, वायु से वृकोदर, और इन्द्र से समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ श्रीमान् धनंजय उत्पन्न हुए।

श्लोक 159 (1.64.159)

जज्ञाते रूपसंपन्नावश्विभ्यां च यमावपि । नकुलः सहदेवश्च गुरुशुश्रूषणे रतौ ॥

jajñāte rūpasaṃpannāvaśvibhyāṃ ca yamāvapi | nakulaḥ sahadevaśca guruśuśrūṣaṇe ratau

दोनों अश्विनीकुमारों से रूपवान जुड़वाँ भाई नकुल और सहदेव उत्पन्न हुए, जो गुरुजनों की सेवा में लगे रहते थे।

श्लोक 160 (1.64.160)

तथा पुत्रशतं जज्ञे धृतराष्ट्रस्य धीमतः । दुर्योधनप्रभृतयो युयुत्सुः करणस्तथा ॥

tathā putraśataṃ jajñe dhṛtarāṣṭrasya dhīmataḥ | duryodhanaprabhṛtayo yuyutsuḥ karaṇastathā

इसी प्रकार बुद्धिमान धृतराष्ट्र के सौ पुत्र हुए, दुर्योधन आदि; और वैश्य माता से उत्पन्न युयुत्सु भी।

श्लोक 161 (1.64.161)

ततो दुःशासनश्चैव दुःसहश्चापि भारत । दुर्मर्षणो विकर्णश्च चित्रसेनो विविंशतिः ॥

tato duḥśāsanaścaiva duḥsahaścāpi bhārata | durmarṣaṇo vikarṇaśca citraseno viviṃśatiḥ

फिर, हे भारत, दुःशासन और दुःसह; दुर्मर्षण, विकर्ण, चित्रसेन, विविंशति,

श्लोक 162 (1.64.162)

जयः सत्यव्रतश्चैव पुरुमित्रश्च भारत । वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च एकादश महारथाः ॥

jayaḥ satyavrataścaiva purumitraśca bhārata | vaiśyāputro yuyutsuśca ekādaśa mahārathāḥ

जय, सत्यव्रत और पुरुमित्र, हे भारत, तथा वैश्या के पुत्र युयुत्सु: ये ग्यारह महारथी थे।

श्लोक 163 (1.64.163)

अभिमन्युः सुभद्रायामर्जुनादभ्यजायत । स्वस्रीयो वासुदेवस्य पौत्रः पाण्डोर्महात्मनः ॥

abhimanyuḥ subhadrāyāmarjunādabhyajāyata | svasrīyo vāsudevasya pautraḥ pāṇḍormahātmanaḥ

अर्जुन से सुभद्रा के गर्भ से अभिमन्यु उत्पन्न हुआ, जो वासुदेव का भानजा और महात्मा पाण्डु का पौत्र था।

श्लोक 164 (1.64.164)

पाण्डवेभ्यो हि पाञ्चाल्यां द्रौपद्यां पञ्च जज्ञिरे । कुमारा रूपसंपन्नाः सर्वशास्त्रविशारदाः ॥

pāṇḍavebhyo hi pāñcālyāṃ draupadyāṃ pañca jajñire | kumārā rūpasaṃpannāḥ sarvaśāstraviśāradāḥ

पाण्डवों से पांचाल-राजकुमारी द्रौपदी के गर्भ से पाँच कुमार उत्पन्न हुए, जो रूपवान और सब शास्त्रों में निपुण थे:

श्लोक 165 (1.64.165)

प्रतिविन्ध्यो युधिष्ठिरात्सुतसोमो वृकोदरात् । अर्जुनाच्छ्रुतकीर्तिस्तु शतानीकस्तु नाकुलिः ॥

prativindhyo yudhiṣṭhirātsutasomo vṛkodarāt | arjunācchrutakīrtistu śatānīkastu nākuliḥ

युधिष्ठिर से प्रतिविन्ध्य, वृकोदर से सुतसोम, अर्जुन से श्रुतकीर्ति, और नकुल का पुत्र शतानीक;

श्लोक 166 (1.64.166)

तथैव सहदेवाच्च श्रुतसेनः प्रतापवान् । हिडिम्बायां च भीमेन वने जज्ञे घटोत्कचः ॥

tathaiva sahadevācca śrutasenaḥ pratāpavān | hiḍimbāyāṃ ca bhīmena vane jajñe ghaṭotkacaḥ

इसी प्रकार सहदेव से प्रतापी श्रुतसेन। और भीम से हिडिम्बा के गर्भ से वन में घटोत्कच उत्पन्न हुआ।

श्लोक 167 (1.64.167)

शिखण्डी द्रुपदाज्जज्ञे कन्या पुत्रत्वमागता । यां यक्षः पुरुषं चक्रे स्थूणः प्रियचिकीर्षया ॥

śikhaṇḍī drupadājjajñe kanyā putratvamāgatā | yāṃ yakṣaḥ puruṣaṃ cakre sthūṇaḥ priyacikīrṣayā

द्रुपद से शिखण्डी उत्पन्न हुई, एक कन्या जिसे पुत्रत्व प्राप्त हुआ; स्थूण नामक यक्ष ने उसका प्रिय करने की इच्छा से उसे पुरुष बना दिया।

श्लोक 168 (1.64.168)

कुरूणां विग्रहे तस्मिन्समागच्छन्बहून्यथ । राज्ञां शतसहस्राणि योत्स्यमानानि संयुगे ॥

kurūṇāṃ vigrahe tasminsamāgacchanbahūnyatha | rājñāṃ śatasahasrāṇi yotsyamānāni saṃyuge

कुरुओं के उस युद्ध में बहुत-से, लाखों राजा, संग्राम में लड़ने के लिए आ जुटे।

श्लोक 169 (1.64.169)

तेषामपरिमेयानां नामधेयानि सर्वशः । न शक्यानि समाख्यातुं वर्षाणामयुतैरपि । एते तु कीर्तिता मुख्या यैराख्यानमिदं ततम् ॥

teṣāmaparimeyānāṃ nāmadheyāni sarvaśaḥ | na śakyāni samākhyātuṃ varṣāṇāmayutairapi | ete tu kīrtitā mukhyā yairākhyānamidaṃ tatam

उन अनगिनत राजाओं के सारे नाम दस हज़ार वर्षों में भी नहीं गिनाए जा सकते। यहाँ जिनका वर्णन हुआ, वे प्रमुख हैं, जिनसे यह आख्यान विस्तार पाता है।

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