आदि पर्व · अध्याय 65
भार से पीड़ित पृथ्वी की ब्रह्मा से प्रार्थना
जनमेजय पूछते हैं कि उनके वंश के देवतुल्य वीर पृथ्वी पर क्यों जन्मे, और वैशम्पायन उन्हें बताते हैं। परशुराम द्वारा पृथ्वी को क्षत्रियहीन कर देने के बाद ब्राह्मणों के द्वारा क्षत्रिय-वंश फिर से चला, और धर्म का ऐसा युग आया जिसमें पृथ्वी दीर्घायु प्रजा से भर गई। फिर पराजित असुर राजाओं और पशुओं के रूप में पृथ्वी पर जन्म लेकर सब प्राणियों को सताने लगे, यहाँ तक कि भार न सह पाने वाली पृथ्वी ब्रह्मा की शरण में गई। ब्रह्मा देवताओं, गन्धर्वों और अप्सराओं को अपने अंशों से पृथ्वी पर जन्म लेने का आदेश देते हैं, और इन्द्र नारायण से भी अवतार लेने की प्रार्थना करते हैं; हरि स्वीकार करते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (1.65.1)
य एते कीर्तिता ब्रह्मन्ये चान्ये नानुकीर्तिताः । सम्यक्ताञ्श्रोतुमिच्छामिराज्ञश्चान्यान्सहस्रशः ॥
ya ete kīrtitā brahmanye cānye nānukīrtitāḥ | samyaktāñśrotumicchāmirājñaścānyānsahasraśaḥ
हे ब्रह्मन्, जिन राजाओं का आपने वर्णन किया है और जिनका नहीं किया, उनके विषय में तथा अन्य सहस्रों राजाओं के विषय में मैं भली-भाँति सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 2 (1.65.2)
यदर्थमिह संभूता देवकल्पा महारथाः । भुवि तन्मे महाभाग सम्यगाख्यातुमर्हसि ॥
yadarthamiha saṃbhūtā devakalpā mahārathāḥ | bhuvi tanme mahābhāga samyagākhyātumarhasi
हे महाभाग, ये देवतुल्य महारथी जिस प्रयोजन से इस पृथ्वी पर उत्पन्न हुए, वह मुझे भली-भाँति बताइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (1.65.3)
रहस्यं खल्विदं राजन्देवानामिति नः श्रुतम् । तत्तु ते कथयिष्यामि नमस्कृत्वा स्वयंभुवे ॥
rahasyaṃ khalvidaṃ rājandevānāmiti naḥ śrutam | tattu te kathayiṣyāmi namaskṛtvā svayaṃbhuve
राजन्, हमने सुना है कि यह देवताओं का रहस्य है। फिर भी स्वयम्भू ब्रह्मा को नमस्कार करके मैं इसे तुम्हें सुनाऊँगा।
श्लोक 4 (1.65.4)
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां पुरा । जामदग्न्यस्तपस्तेपे महेन्द्रे पर्वतोत्तमे ॥
triḥsaptakṛtvaḥ pṛthivīṃ kṛtvā niḥkṣatriyāṃ purā | jāmadagnyastapastepe mahendre parvatottame
प्राचीन काल में जमदग्नि के पुत्र (परशुराम) ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित करके पर्वतश्रेष्ठ महेन्द्र पर तपस्या की।
श्लोक 5 (1.65.5)
तदा निःक्षत्रिये लोके भार्गवेण कृते सति । ब्राह्मणान्क्षत्रिया राजन्सुतार्थिन्योऽभिचक्रमुः ॥
tadā niḥkṣatriye loke bhārgaveṇa kṛte sati | brāhmaṇānkṣatriyā rājansutārthinyo'bhicakramuḥ
तब, जब भृगुवंशी परशुराम ने संसार को क्षत्रियहीन कर दिया था, हे राजन्, क्षत्रिय स्त्रियाँ पुत्र की कामना से ब्राह्मणों के पास गईं।
श्लोक 6 (1.65.6)
ताभिः सह समापेतुर्ब्राह्मणाः संशितव्रताः । ऋतावृतौ नरव्याघ्र न कामान्नानृतौ तथा ॥
tābhiḥ saha samāpeturbrāhmaṇāḥ saṃśitavratāḥ | ṛtāvṛtau naravyāghra na kāmānnānṛtau tathā
हे नरश्रेष्ठ, कठोर व्रत का पालन करने वाले ब्राह्मण उनसे केवल ऋतुकाल में ही मिले — न काम-वश, न ऋतुकाल के बाहर।
श्लोक 7 (1.65.7)
तेभ्यश्च लेभिरे गर्भं क्षत्रियास्ताः सहस्रशः । ततः सुषुविरे राजन्क्षत्रियान्वीर्यवत्तरान् ॥
tebhyaśca lebhire garbhaṃ kṣatriyāstāḥ sahasraśaḥ | tataḥ suṣuvire rājankṣatriyānvīryavattarān
उनसे उन सहस्रों क्षत्रिय स्त्रियों ने गर्भ धारण किया, और फिर, हे राजन्, उन्होंने पहले से अधिक पराक्रमी क्षत्रियों को जन्म दिया —
श्लोक 8 (1.65.8)
कुमारांश्च कुमारीश्च पुनः क्षत्राभिवृद्धये । एवं तद्ब्राह्मणैः क्षत्रं क्षत्रियासु तपस्विभिः ॥
kumārāṃśca kumārīśca punaḥ kṣatrābhivṛddhaye | evaṃ tadbrāhmaṇaiḥ kṣatraṃ kṣatriyāsu tapasvibhiḥ
पुत्रों और पुत्रियों को, ताकि क्षत्रिय-कुल फिर से बढ़े। इस प्रकार तपस्वी ब्राह्मणों द्वारा क्षत्रिय स्त्रियों में उत्पन्न क्षत्रिय-वर्ग
श्लोक 9 (1.65.9)
जातं वृद्धं च धर्मेण सुदीर्घेणायुषान्वितम् । चत्वारोऽपि ततो वर्णा बभूवुर्ब्राह्मणोत्तराः ॥
jātaṃ vṛddhaṃ ca dharmeṇa sudīrgheṇāyuṣānvitam | catvāro'pi tato varṇā babhūvurbrāhmaṇottarāḥ
धर्मपूर्वक जन्मा और बढ़ा, और अत्यन्त दीर्घ आयु से सम्पन्न हुआ। तब चारों वर्ण ब्राह्मणों को अग्रणी मानने लगे।
श्लोक 10 (1.65.10)
अभ्यगच्छन्नृतौ नारीं न कामान्नानृतौ तथा । तथैवान्यानि भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ॥
abhyagacchannṛtau nārīṃ na kāmānnānṛtau tathā | tathaivānyāni bhūtāni tiryagyonigatānyapi
पुरुष ऋतुकाल में ही स्त्री के पास जाते थे — न काम-वश, न ऋतुकाल के बाहर। इसी प्रकार अन्य प्राणी भी, पशु-पक्षियों की योनि में जन्मे जीव भी,
श्लोक 11 (1.65.11)
ऋतौ दारांश्च गच्छन्ति तत्तथा भरतर्षभ । ततोऽवर्धन्त धर्मेण सहस्रशतजीविनः ॥
ṛtau dārāṃśca gacchanti tattathā bharatarṣabha | tato'vardhanta dharmeṇa sahasraśatajīvinaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, ऋतुकाल में ही अपनी संगिनियों के पास जाते थे। इस प्रकार धर्म के बल से लोग फले-फूले और एक लाख वर्ष तक जीने लगे।
श्लोक 12 (1.65.12)
ताः प्रजाः पृथिवीपाल धर्मव्रतपरायणाः । आधिभिर्व्याधिभिश्चैव विमुक्ताः सर्वशो नराः ॥
tāḥ prajāḥ pṛthivīpāla dharmavrataparāyaṇāḥ | ādhibhirvyādhibhiścaiva vimuktāḥ sarvaśo narāḥ
हे पृथ्वीपाल, वह प्रजा धर्म और व्रतों में तत्पर रहती थी, और सभी मनुष्य मानसिक चिन्ताओं तथा रोगों से सर्वथा मुक्त थे।
श्लोक 13 (1.65.13)
अथेमां सागरोपान्तां गां गजेन्द्रगताखिलाम् । अध्यतिष्ठत्पुनः क्षत्रं सशैलवनपत्तनाम् ॥
athemāṃ sāgaropāntāṃ gāṃ gajendragatākhilām | adhyatiṣṭhatpunaḥ kṣatraṃ saśailavanapattanām
तब क्षत्रिय-वर्ग ने फिर से समुद्र से घिरी, सर्वत्र गजराजों से भरी, पर्वतों, वनों और नगरों सहित इस समस्त पृथ्वी पर अधिकार कर लिया।
श्लोक 14 (1.65.14)
प्रशासति पुनः क्षत्रे धर्मेणेमां वसुन्धराम् । ब्राह्मणाद्यास्ततो वर्णा लेभिरे मुदमुत्तमाम् ॥
praśāsati punaḥ kṣatre dharmeṇemāṃ vasundharām | brāhmaṇādyāstato varṇā lebhire mudamuttamām
जब क्षत्रिय फिर से धर्मपूर्वक इस पृथ्वी का शासन करने लगे, तब ब्राह्मण आदि सभी वर्णों ने परम आनन्द पाया।
श्लोक 15 (1.65.15)
कामक्रोधोद्भवान्दोषान्निरस्य च नराधिपाः । धर्मेण दण्डं दण्ड्येषु प्रणयन्तोऽन्वपालयन् ॥
kāmakrodhodbhavāndoṣānnirasya ca narādhipāḥ | dharmeṇa daṇḍaṃ daṇḍyeṣu praṇayanto'nvapālayan
राजाओं ने काम और क्रोध से उत्पन्न दोषों को त्यागकर, दण्ड के योग्य लोगों को धर्मानुसार दण्ड देते हुए प्रजा का पालन किया।
श्लोक 16 (1.65.16)
तथा धर्मपरे क्षत्रे सहस्राक्षः शतक्रतुः । स्वादु देशे च काले च ववर्षाप्याययन्प्रजाः ॥
tathā dharmapare kṣatre sahasrākṣaḥ śatakratuḥ | svādu deśe ca kāle ca vavarṣāpyāyayanprajāḥ
क्षत्रियों के इस प्रकार धर्मपरायण होने पर सहस्र नेत्रों वाले, सौ यज्ञ करने वाले इन्द्र उचित स्थान और उचित समय पर मधुर वर्षा करके प्रजा का पोषण करते थे।
श्लोक 17 (1.65.17)
न बाल एव म्रियते तदा कश्चिज्जनाधिप । न च स्त्रियं प्रजानाति कश्चिदप्राप्तयौवनाम् ॥
na bāla eva mriyate tadā kaścijjanādhipa | na ca striyaṃ prajānāti kaścidaprāptayauvanām
हे जनाधिप, उस समय कोई भी बाल्यावस्था में नहीं मरता था, और कोई पुरुष युवावस्था को न पहुँची स्त्री से समागम नहीं करता था।
श्लोक 18 (1.65.18)
एवमायुष्मतीभिस्तु प्रजाभिर्भरतर्षभ । इयं सागरपर्यन्ता समापूर्यत मेदिनी ॥
evamāyuṣmatībhistu prajābhirbharatarṣabha | iyaṃ sāgaraparyantā samāpūryata medinī
हे भरतश्रेष्ठ, इस प्रकार समुद्र तक फैली यह पृथ्वी दीर्घायु प्रजा से भर गई।
श्लोक 19 (1.65.19)
ईजिरे च महायज्ञैः क्षत्रिया बहुदक्षिणैः । साङ्गोपनिषदान्वेदान्विप्राश्चाधीयते तदा ॥
ījire ca mahāyajñaiḥ kṣatriyā bahudakṣiṇaiḥ | sāṅgopaniṣadānvedānviprāścādhīyate tadā
क्षत्रिय प्रचुर दक्षिणा वाले बड़े-बड़े यज्ञ करते थे, और ब्राह्मण उस समय अंगों और उपनिषदों सहित वेदों का अध्ययन करते थे।
श्लोक 20 (1.65.20)
न च विक्रीणते ब्रह्म ब्राह्मणाश्च तदा नृप । न च शूद्रसमभ्याशे वेदानुच्चारयन्त्युत ॥
na ca vikrīṇate brahma brāhmaṇāśca tadā nṛpa | na ca śūdrasamabhyāśe vedānuccārayantyuta
हे राजन्, उस समय ब्राह्मण वेद का विक्रय नहीं करते थे, और न ही शूद्रों के निकट वेदों का उच्चारण करते थे।
श्लोक 21 (1.65.21)
कारयन्तः कृषिं गोभिस्तथा वैश्याः क्षिताविह । युञ्जते धुरि नो गाश्च कृशाङ्गांश्चाप्यजीवयन् ॥
kārayantaḥ kṛṣiṃ gobhistathā vaiśyāḥ kṣitāviha | yuñjate dhuri no gāśca kṛśāṅgāṃścāpyajīvayan
पृथ्वी पर वैश्य बैलों से खेती करवाते थे, पर गायों को जुए में नहीं जोतते थे, और दुर्बल पशुओं का भी पालन-पोषण करते थे।
श्लोक 22 (1.65.22)
फेनपांश्च तथा वत्सान्न दुहन्ति स्म मानवाः । न कूटमानैर्वणिजः पण्यं विक्रीणते तदा ॥
phenapāṃśca tathā vatsānna duhanti sma mānavāḥ | na kūṭamānairvaṇijaḥ paṇyaṃ vikrīṇate tadā
लोग उन गायों को नहीं दुहते थे जिनके बछड़े अभी दूध पी रहे हों, और व्यापारी खोटे माप-तौल से माल नहीं बेचते थे।
श्लोक 23 (1.65.23)
कर्माणि च नरव्याघ्र धर्मोपेतानि मानवाः । धर्ममेवानुपश्यन्तश्चक्रुर्धर्मपरायणाः ॥
karmāṇi ca naravyāghra dharmopetāni mānavāḥ | dharmamevānupaśyantaścakrurdharmaparāyaṇāḥ
हे नरश्रेष्ठ, धर्मपरायण लोग केवल धर्म पर दृष्टि रखते हुए धर्मसम्मत कर्म ही करते थे।
श्लोक 24 (1.65.24)
स्वकर्मनिरताश्चासन्सर्वे वर्णा नराधिप । एवं तदा नरव्याघ्र धर्मो न ह्रसते क्वचित् ॥
svakarmaniratāścāsansarve varṇā narādhipa | evaṃ tadā naravyāghra dharmo na hrasate kvacit
हे नराधिप, सभी वर्ण अपने-अपने कर्मों में लगे रहते थे; इस प्रकार, हे नरव्याघ्र, उस समय कहीं भी धर्म का ह्रास नहीं होता था।
श्लोक 25 (1.65.25)
काले गावः प्रसूयन्ते नार्यश्च भरतर्षभ । भवन्त्यृतुषु वृक्षाणां पुष्पाणि च फलानि च ॥
kāle gāvaḥ prasūyante nāryaśca bharatarṣabha | bhavantyṛtuṣu vṛkṣāṇāṃ puṣpāṇi ca phalāni ca
हे भरतश्रेष्ठ, गौएँ और स्त्रियाँ उचित समय पर सन्तान को जन्म देती थीं, और वृक्षों पर ऋतु के अनुसार फूल और फल आते थे।
श्लोक 26 (1.65.26)
एवं कृतयुगे सम्यग्वर्तमाने तदा नृप । आपूर्यत मही कृत्स्ना प्राणिभिर्बहुभिर्भृशम् ॥
evaṃ kṛtayuge samyagvartamāne tadā nṛpa | āpūryata mahī kṛtsnā prāṇibhirbahubhirbhṛśam
हे राजन्, इस प्रकार जब सत्ययुग भली-भाँति चल रहा था, तब सारी पृथ्वी असंख्य प्राणियों से भरपूर हो गई।
श्लोक 27 (1.65.27)
एवं समुदिते लोके मानुषे भरतर्षभ । असुरा जज्ञिरे क्षेत्रे राज्ञां तु मनुजेश्वर ॥
evaṃ samudite loke mānuṣe bharatarṣabha | asurā jajñire kṣetre rājñāṃ tu manujeśvara
हे भरतश्रेष्ठ, जब मनुष्य-लोक इस प्रकार समृद्ध हो गया, तब हे मनुजेश्वर, असुर राजाओं के कुलों में जन्म लेने लगे।
श्लोक 28 (1.65.28)
आदित्यैर्हि तदा दैत्या बहुशो निर्जिता युधि । ऐश्वर्याद्भ्रंशिताः स्वर्गात्संबभूवुः क्षिताविह ॥
ādityairhi tadā daityā bahuśo nirjitā yudhi | aiśvaryādbhraṃśitāḥ svargātsaṃbabhūvuḥ kṣitāviha
क्योंकि आदित्यों द्वारा युद्ध में बार-बार पराजित होकर और स्वर्ग के ऐश्वर्य से भ्रष्ट होकर दैत्य यहाँ पृथ्वी पर उत्पन्न हुए।
श्लोक 29 (1.65.29)
इह देवत्वमिच्छन्तो मानुषेषु तपस्विनः । जज्ञिरे भुवि भूतेषु तेषु तेष्वसुरा विभो ॥
iha devatvamicchanto mānuṣeṣu tapasvinaḥ | jajñire bhuvi bhūteṣu teṣu teṣvasurā vibho
हे विभो, यहाँ मनुष्यों के बीच देवत्व की इच्छा रखने वाले वे तपस्वी असुर पृथ्वी पर भाँति-भाँति के प्राणियों में जन्मे —
श्लोक 30 (1.65.30)
गोष्वश्वेषु च राजेन्द्र खरोष्ट्रमहिषेषु च । क्रव्यात्सु चैव भूतेषु गजेषु च मृगेषु च ॥
goṣvaśveṣu ca rājendra kharoṣṭramahiṣeṣu ca | kravyātsu caiva bhūteṣu gajeṣu ca mṛgeṣu ca
हे राजेन्द्र, गायों और घोड़ों में, गधों, ऊँटों और भैंसों में, मांसभक्षी जीवों में, तथा हाथियों और मृगों में।
श्लोक 31 (1.65.31)
जातैरिह महीपाल जायमानैश्च तैर्मही । न शशाकात्मनात्मानमियं धारयितुं धरा ॥
jātairiha mahīpāla jāyamānaiśca tairmahī | na śaśākātmanātmānamiyaṃ dhārayituṃ dharā
हे महीपाल, यहाँ जन्म ले चुके और जन्म लेते हुए उन असुरों के कारण यह धरती अपना भार स्वयं सँभाल नहीं सकी।
श्लोक 32 (1.65.32)
अथ जाता महीपालाः केचिद्बहुमदान्विताः । दितेः पुत्रा दनोश्चैव तदा लोकादिह च्युताः ॥
atha jātā mahīpālāḥ kecidbahumadānvitāḥ | diteḥ putrā danoścaiva tadā lokādiha cyutāḥ
तब उस लोक से यहाँ गिरे हुए दिति और दनु के कुछ पुत्र अत्यन्त मद से भरे राजा बनकर जन्मे।
श्लोक 33 (1.65.33)
वीर्यवन्तोऽवलिप्तास्ते नानारूपधरा महीम् । इमां सागरपर्यन्तां परीयुररिमर्दनाः ॥
vīryavanto'valiptāste nānārūpadharā mahīm | imāṃ sāgaraparyantāṃ parīyurarimardanāḥ
पराक्रमी, घमण्डी और अनेक रूप धारण करने वाले उन शत्रुमर्दनों ने समुद्र तक फैली इस पृथ्वी को घेर लिया।
श्लोक 34 (1.65.34)
ब्राह्मणान्क्षत्रियान्वैश्याञ्शूद्रांश्चैवाप्यपीडयन् । अन्यानि चैव सत्त्वानि पीडयामासुरोजसा ॥
brāhmaṇānkṣatriyānvaiśyāñśūdrāṃścaivāpyapīḍayan | anyāni caiva sattvāni pīḍayāmāsurojasā
उन्होंने ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों — सभी को सताया, और अपने बल से अन्य प्राणियों को भी पीड़ित किया।
श्लोक 35 (1.65.35)
त्रासयन्तोऽभिनिघ्नन्तः सर्वभूतगणांश्च ते । विचेरुः सर्वशो राजन्महीं शतसहस्रशः ॥
trāsayanto'bhinighnantaḥ sarvabhūtagaṇāṃśca te | viceruḥ sarvaśo rājanmahīṃ śatasahasraśaḥ
हे राजन्, सब प्राणियों के समूहों को डराते और मारते हुए वे लाखों की संख्या में पृथ्वी पर सब ओर विचरने लगे,
श्लोक 36 (1.65.36)
आश्रमस्थान्महर्षींश्च धर्षयन्तस्ततस्ततः । अब्रह्मण्या वीर्यमदा मत्ता मदबलेन च ॥
āśramasthānmaharṣīṃśca dharṣayantastatastataḥ | abrahmaṇyā vīryamadā mattā madabalena ca
और इधर-उधर आश्रमों में रहने वाले महर्षियों का अपमान करने लगे — ब्राह्मणद्रोही, पराक्रम के मद में चूर, अहंकार के बल से उन्मत्त।
श्लोक 37 (1.65.37)
एवं वीर्यबलोत्सिक्तैर्भूरियं तैर्महासुरैः । पीड्यमाना मही राजन्ब्रह्माणमुपचक्रमे ॥
evaṃ vīryabalotsiktairbhūriyaṃ tairmahāsuraiḥ | pīḍyamānā mahī rājanbrahmāṇamupacakrame
हे राजन्, बल और पराक्रम से उद्दण्ड उन महासुरों से इस प्रकार पीड़ित होकर पृथ्वी ब्रह्मा के पास पहुँची।
श्लोक 38 (1.65.38)
न ह्यमी भूतसत्त्वौघाः पन्नगाः सनगां महीम् । तदा धारयितुं शेकुराक्रान्तां दानवैर्बलात् ॥
na hyamī bhūtasattvaughāḥ pannagāḥ sanagāṃ mahīm | tadā dhārayituṃ śekurākrāntāṃ dānavairbalāt
क्योंकि दानवों द्वारा बलपूर्वक आक्रान्त पर्वतों सहित पृथ्वी को उस समय न प्राणियों के समूह थाम सके, न नाग।
श्लोक 39 (1.65.39)
ततो मही महीपाल भारार्ता भयपीडिता । जगाम शरणं देवं सर्वभूतपितामहम् ॥
tato mahī mahīpāla bhārārtā bhayapīḍitā | jagāma śaraṇaṃ devaṃ sarvabhūtapitāmaham
तब हे महीपाल, भार से व्याकुल और भय से पीड़ित पृथ्वी सब प्राणियों के पितामह भगवान् ब्रह्मा की शरण में गई।
श्लोक 40 (1.65.40)
सा संवृतं महाभागैर्देवद्विजमहर्षिभिः । ददर्श देवं ब्रह्माणं लोककर्तारमव्ययम् ॥
sā saṃvṛtaṃ mahābhāgairdevadvijamaharṣibhiḥ | dadarśa devaṃ brahmāṇaṃ lokakartāramavyayam
उसने लोकों के अविनाशी रचयिता भगवान् ब्रह्मा को देखा, जो महाभाग देवताओं, ब्राह्मणों और महर्षियों से घिरे हुए थे,
श्लोक 41 (1.65.41)
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च बन्दिकर्मसु निष्ठितैः । वन्द्यमानं मुदोपेतैर्ववन्दे चैनमेत्य सा ॥
gandharvairapsarobhiśca bandikarmasu niṣṭhitaiḥ | vandyamānaṃ mudopetairvavande cainametya sā
और जिनकी स्तुति में लगे गन्धर्व और अप्सराएँ प्रसन्न होकर उनकी वन्दना कर रहे थे; पृथ्वी ने उनके पास जाकर उन्हें प्रणाम किया।
श्लोक 42 (1.65.42)
अथ विज्ञापयामास भूमिस्तं शरणार्थिनी । सन्निधौ लोकपालानां सर्वेषामेव भारत ॥
atha vijñāpayāmāsa bhūmistaṃ śaraṇārthinī | sannidhau lokapālānāṃ sarveṣāmeva bhārata
हे भारत, तब शरण चाहने वाली पृथ्वी ने सभी लोकपालों की उपस्थिति में उनसे निवेदन किया।
श्लोक 43 (1.65.43)
तत्प्रधानात्मनस्तस्य भूमेः कृत्यं स्वयंभुवः । पूर्वमेवाभवद्राजन्विदितं परमेष्ठिनः ॥
tatpradhānātmanastasya bhūmeḥ kṛtyaṃ svayaṃbhuvaḥ | pūrvamevābhavadrājanviditaṃ parameṣṭhinaḥ
परन्तु हे राजन्, पृथ्वी का प्रयोजन उन स्वयम्भू परमेष्ठी को, जो स्वयं जगत् के मूल कारण हैं, पहले से ही विदित था।
श्लोक 44 (1.65.44)
स्रष्टा हि जगतः कस्मान्न संबुध्येत भारत । ससुरासुरलोकानामशेषेण मनोगतम् ॥
sraṣṭā hi jagataḥ kasmānna saṃbudhyeta bhārata | sasurāsuralokānāmaśeṣeṇa manogatam
हे भारत, जगत् के स्रष्टा देवों और असुरों सहित सब लोकों के मन की बात पूरी तरह क्यों न जानें?
श्लोक 45 (1.65.45)
तामुवाच महाराज भूमिं भूमिपतिः प्रभुः । प्रभवः सर्वभूतानामीशः शंभुः प्रजापतिः ॥
tāmuvāca mahārāja bhūmiṃ bhūmipatiḥ prabhuḥ | prabhavaḥ sarvabhūtānāmīśaḥ śaṃbhuḥ prajāpatiḥ
हे महाराज, तब सब प्राणियों के उद्गम, पृथ्वी के स्वामी, सर्वसमर्थ, ईश्वर, कल्याणकारी प्रजापति ने पृथ्वी से कहा।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 46 (1.65.46)
यदर्थमभिसंप्राप्ता मत्सकाशं वसुन्धरे । तदर्थं सन्नियोक्ष्यामि सर्वानेव दिवौकसः ॥
yadarthamabhisaṃprāptā matsakāśaṃ vasundhare | tadarthaṃ sanniyokṣyāmi sarvāneva divaukasaḥ
"हे वसुन्धरे, जिस प्रयोजन से तुम मेरे पास आई हो, उसी के लिए मैं सभी स्वर्गवासी देवताओं को नियुक्त करूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 47 (1.65.47)
उत्तिष्ठ गच्छ वसुधे स्वस्थानमिति साऽगमत् । इत्युक्त्वा स महीं देवो ब्रह्मा राजन्विसृज्य च । आदिदेश तदा सर्वान्विबुधान्भूतकृत्स्वयम् ॥
uttiṣṭha gaccha vasudhe svasthānamiti sā'gamat | ityuktvā sa mahīṃ devo brahmā rājanvisṛjya ca | ādideśa tadā sarvānvibudhānbhūtakṛtsvayam
"उठो, वसुधे, अपने स्थान को जाओ" — यह सुनकर वह चली गई। हे राजन्, इस प्रकार कहकर और पृथ्वी को विदा करके प्राणियों के रचयिता भगवान् ब्रह्मा ने स्वयं तब सब देवताओं को आदेश दिया।
श्लोक 48 (1.65.48)
अस्या भूमेर्निरसितुं भारं भागैः पृथक्पृथक् । अस्यामेव प्रसूयध्वं तिरोधायेति चाब्रवीत् ॥
asyā bhūmernirasituṃ bhāraṃ bhāgaiḥ pṛthakpṛthak | asyāmeva prasūyadhvaṃ tirodhāyeti cābravīt
उन्होंने कहा — "इस पृथ्वी का भार उतारने के लिए तुम सब अपने-अपने अंशों से अलग-अलग, अपने देवत्व को छिपाकर, इसी पर जन्म लो।"
श्लोक 49 (1.65.49)
तथैव च समानीय गन्धर्वाप्सरसां गणान् । उवाच भगवान्सर्वानिदं वचनमर्थवत् ॥
tathaiva ca samānīya gandharvāpsarasāṃ gaṇān | uvāca bhagavānsarvānidaṃ vacanamarthavat
इसी प्रकार गन्धर्वों और अप्सराओं के समूहों को बुलाकर भगवान् ब्रह्मा ने उन सबसे ये सार्थक वचन कहे —
श्लोक 50 (1.65.50)
स्वैः स्वैरंशैः प्रसूयध्वं यथेष्टं मानुषेषु च । अथ शक्रादयः सर्वे श्रुत्वा सुरगुरोर्वचः । तथ्यमर्थ्यं च पथ्यं च तस्य ते जगृहुस्तदा ॥
svaiḥ svairaṃśaiḥ prasūyadhvaṃ yatheṣṭaṃ mānuṣeṣu ca | atha śakrādayaḥ sarve śrutvā suragurorvacaḥ | tathyamarthyaṃ ca pathyaṃ ca tasya te jagṛhustadā
"अपने-अपने अंशों से इच्छानुसार मनुष्यों में जन्म लो।" तब इन्द्र आदि सभी देवताओं ने देवगुरु ब्रह्मा के वचन सुनकर उन्हें सत्य, सार्थक और हितकर मानकर स्वीकार किया।
श्लोक 51 (1.65.51)
अथ ते सर्वशोंऽशैः स्वैर्गन्तुं भूमिं कृतक्षणाः । नारायणममित्रघ्नं वैकुण्ठमुपचक्रमुः ॥
atha te sarvaśoṃ'śaiḥ svairgantuṃ bhūmiṃ kṛtakṣaṇāḥ | nārāyaṇamamitraghnaṃ vaikuṇṭhamupacakramuḥ
तब अपने-अपने अंशों से पृथ्वी पर जाने का निश्चय करके वे सब शत्रुनाशक वैकुण्ठ नारायण के पास गए —
श्लोक 52 (1.65.52)
यः स चक्रगदापाणिः पीतवासाः शितिप्रभः । पद्मनाभः सुरारिघ्नः पृथुचार्वञ्चितेक्षणः ॥
yaḥ sa cakragadāpāṇiḥ pītavāsāḥ śitiprabhaḥ | padmanābhaḥ surārighnaḥ pṛthucārvañcitekṣaṇaḥ
जो हाथों में चक्र और गदा धारण करते हैं, पीताम्बरधारी हैं, श्याम कान्ति वाले हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवशत्रुओं का संहार करते हैं, और जिनके नेत्र विशाल, सुन्दर और बाँके हैं;
श्लोक 53 (1.65.53)
प्रजापतिपतिर्देवः सुरनाथो महाबलः । श्रीवत्साङ्को हृषीकेशः सर्वदैवतपूजितः ॥
prajāpatipatirdevaḥ suranātho mahābalaḥ | śrīvatsāṅko hṛṣīkeśaḥ sarvadaivatapūjitaḥ
जो प्रजापतियों के भी स्वामी, देवताओं के नाथ, महाबली, श्रीवत्स-चिह्न से अंकित, हृषीकेश और सब देवताओं द्वारा पूजित हैं।
श्लोक 54 (1.65.54)
तं भुवः शोधनायेन्द्र उवाच पुरुषोत्तमम् । अंशेनावतरेत्येवं तथेत्याह च तं हरिः ॥
taṃ bhuvaḥ śodhanāyendra uvāca puruṣottamam | aṃśenāvataretyevaṃ tathetyāha ca taṃ hariḥ
पृथ्वी के शोधन के लिए इन्द्र ने उन पुरुषोत्तम से कहा — "आप अपने अंश से अवतार लीजिए।" और हरि ने उनसे कहा — "ऐसा ही हो।"