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आदि पर्व · अध्याय 67

देवताओं, ऋषियों और प्राणियों की वंश-परम्परा

वैशम्पायन प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन करते हैं — ग्यारह रुद्र, ब्रह्मा के छह मानस पुत्र महर्षि और उनकी संतानें, दक्ष और उनकी पचास कन्याएँ जिन्हें वे धर्म, सोम और कश्यप को देते हैं, तथा आठ वसु और उनके पुत्र। फिर वे विश्वकर्मा, धर्म के तीन पुत्रों, तैंतीस देवताओं, जमदग्नि और राम तक भृगु के वंश, लक्ष्मी, तथा अधर्म और उसकी पत्नी निर्ऋति का वर्णन करते हैं। अध्याय ताम्रा, क्रोधवशा, सुरभि और इरा की कन्याओं के साथ समाप्त होता है, जिनसे पक्षी, पशु, गायें, घोड़े और वनस्पतियाँ उत्पन्न हुईं, और इसे सुनने वालों को पाप से मुक्ति का फल बताया गया है।

अध्याय 66अध्याय-सूचीअध्याय 68

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.67.1)

ब्रह्मणो मानसाः पुत्रा विदिताः षण्महर्षयः । एकादश सुताः स्थाणोः ख्याताः परमतेजसः ॥

brahmaṇo mānasāḥ putrā viditāḥ ṣaṇmaharṣayaḥ | ekādaśa sutāḥ sthāṇoḥ khyātāḥ paramatejasaḥ

ब्रह्मा के छह मानस पुत्र महर्षि के रूप में प्रसिद्ध हैं। स्थाणु के ग्यारह पुत्र हुए, जो विख्यात और परम तेजस्वी थे।

श्लोक 2 (1.67.2)

मृगव्याधश्च सर्पश्च निर्ऋतिश्च महायशाः । अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी च परन्तपः ॥

mṛgavyādhaśca sarpaśca nirṛtiśca mahāyaśāḥ | ajaikapādahirbudhnyaḥ pinākī ca parantapaḥ

वे थे — मृगव्याध, सर्प, महायशस्वी निर्ऋति, अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य और शत्रुओं को संतप्त करने वाले पिनाकी;

श्लोक 3 (1.67.3)

दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च महाद्युतिः । स्थाणुर्भगश्च भगवान् रुद्रा एकादश स्मृताः ॥

dahano'theśvaraścaiva kapālī ca mahādyutiḥ | sthāṇurbhagaśca bhagavān rudrā ekādaśa smṛtāḥ

दहन, ईश्वर, महातेजस्वी कपाली, स्थाणु और भगवान भग। ये ग्यारह रुद्र कहे गए हैं।

श्लोक 4 (1.67.4)

मरीचिरङ्गिरा अत्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । षडेते ब्रह्मणः पुत्रा वीर्यवन्तो महर्षयः ॥

marīciraṅgirā atriḥ pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ | ṣaḍete brahmaṇaḥ putrā vīryavanto maharṣayaḥ

मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु — ये छह पराक्रमी महर्षि ब्रह्मा के पुत्र हैं।

श्लोक 5 (1.67.5)

त्रयस्त्वङ्गिरसः पुत्रा लोके सर्वत्र विश्रुताः । बृहस्पतिरुतथ्यश्च संवर्तश्च धृतव्रताः ॥

trayastvaṅgirasaḥ putrā loke sarvatra viśrutāḥ | bṛhaspatirutathyaśca saṃvartaśca dhṛtavratāḥ

अंगिरा के तीन पुत्र थे, जो संसार में सर्वत्र विख्यात और दृढ़व्रती थे — बृहस्पति, उतथ्य और संवर्त।

श्लोक 6 (1.67.6)

अत्रेस्तु बहवः पुत्राः श्रूयन्ते मनुजाधिप । सर्वे वेदविदः सिद्धाः शान्तात्मानो महर्षयः ॥

atrestu bahavaḥ putrāḥ śrūyante manujādhipa | sarve vedavidaḥ siddhāḥ śāntātmāno maharṣayaḥ

हे नरेश, अत्रि के अनेक पुत्र सुने जाते हैं; वे सब वेदों के ज्ञाता, सिद्ध और शान्तचित्त महर्षि थे।

श्लोक 7 (1.67.7)

राक्षसाश्च पुलस्त्यस्य वानराः किन्नरास्तथा । यक्षाश्च मनुजव्याघ्र पुत्रास्तस्य च धीमतः ॥

rākṣasāśca pulastyasya vānarāḥ kinnarāstathā | yakṣāśca manujavyāghra putrāstasya ca dhīmataḥ

हे पुरुषसिंह, राक्षस, वानर, किन्नर और यक्ष — ये बुद्धिमान पुलस्त्य की संतान हैं।

श्लोक 8 (1.67.8)

पुलहस्य सुता राजञ्शरभाश्च प्रकीर्तिताः । सिंहाः किपुरुषा व्याघ्रा ऋक्षा ईहामृगास्तथा ॥

pulahasya sutā rājañśarabhāśca prakīrtitāḥ | siṃhāḥ kipuruṣā vyāghrā ṛkṣā īhāmṛgāstathā

हे राजन्, पुलह की संतान शरभ, सिंह, किम्पुरुष, व्याघ्र, रीछ और भेड़िये बताए गए हैं।

श्लोक 9 (1.67.9)

क्रतोः क्रतुसमाः पुत्राः पतङ्गसहचारिणः । विश्रुतास्त्रिषु लोकेषु सत्यव्रतपरायणाः ॥

kratoḥ kratusamāḥ putrāḥ pataṅgasahacāriṇaḥ | viśrutāstriṣu lokeṣu satyavrataparāyaṇāḥ

क्रतु के पुत्र क्रतु के ही समान हैं; वे सूर्य के सहचर हैं, तीनों लोकों में विख्यात और सत्य तथा व्रत में निष्ठ।

श्लोक 10 (1.67.10)

दक्षस्त्वजायताङ्गुष्ठाद्दक्षिणाद्भगवानृषिः । ब्रह्मणः पृथिवीपाल शान्तात्मा सुमहातपाः ॥

dakṣastvajāyatāṅguṣṭhāddakṣiṇādbhagavānṛṣiḥ | brahmaṇaḥ pṛthivīpāla śāntātmā sumahātapāḥ

हे पृथ्वीपाल, ब्रह्मा के दाहिने अँगूठे से भगवान ऋषि दक्ष उत्पन्न हुए, जो शान्तचित्त और महान तपस्वी थे।

श्लोक 11 (1.67.11)

वामादजायताङ्गुष्ठाद्भार्या तस्य महात्मनः । तस्यां पञ्चाशतं कन्याः स एवाजनयन्मुनिः ॥

vāmādajāyatāṅguṣṭhādbhāryā tasya mahātmanaḥ | tasyāṃ pañcāśataṃ kanyāḥ sa evājanayanmuniḥ

बाएँ अँगूठे से उन महात्मा की पत्नी उत्पन्न हुई, और उसी से उन मुनि ने पचास कन्याएँ उत्पन्न कीं।

श्लोक 12 (1.67.12)

ताः सर्वास्त्वनवद्याङ्ग्यः कन्याः कमललोचनाः । पुत्रिकाः स्थापयामास नष्टपुत्रः प्रजापतिः ॥

tāḥ sarvāstvanavadyāṅgyaḥ kanyāḥ kamalalocanāḥ | putrikāḥ sthāpayāmāsa naṣṭaputraḥ prajāpatiḥ

वे सब कन्याएँ निर्दोष अंगों वाली और कमलनयनी थीं। पुत्रों को खो चुके प्रजापति ने उन्हें पुत्रिका के रूप में, पुत्रों के स्थान पर, स्थापित किया।

श्लोक 13 (1.67.13)

ददौ स दश धर्माय सप्तविंशतिमिन्दवे । दिव्येन विधिना राजन्कश्यपाय त्रयोदश ॥

dadau sa daśa dharmāya saptaviṃśatimindave | divyena vidhinā rājankaśyapāya trayodaśa

हे राजन्, उन्होंने दिव्य विधि से दस कन्याएँ धर्म को, सत्ताईस चन्द्रमा को और तेरह कश्यप को दीं।

श्लोक 14 (1.67.14)

नामतो धर्मपत्न्यस्ताः कीर्त्यमाना निबोध मे । कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृतिर्मेधा पुष्टिः श्रद्धा क्रिया तथा ॥

nāmato dharmapatnyastāḥ kīrtyamānā nibodha me | kīrtirlakṣmīrdhṛtirmedhā puṣṭiḥ śraddhā kriyā tathā

धर्म की पत्नियों के नाम मुझसे सुनो, जिन्हें मैं गिनाता हूँ — कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, मेधा, पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया,

श्लोक 15 (1.67.15)

बुद्धिर्लज्जा मतिश्चैव पत्न्यो धर्मस्य ता दश । द्वाराण्येतानि धर्मस्य विहितानि स्वयंभुवा ॥

buddhirlajjā matiścaiva patnyo dharmasya tā daśa | dvārāṇyetāni dharmasya vihitāni svayaṃbhuvā

बुद्धि, लज्जा और मति — ये दस धर्म की पत्नियाँ हैं। स्वयम्भू ने इन्हें धर्म के द्वार के रूप में विहित किया।

श्लोक 16 (1.67.16)

सप्तविंशतिः सोमस्य पत्न्यो लोकस्य विश्रुताः । कालस्य नयने युक्ताः सोमपत्न्यः शुचिव्रताः ॥

saptaviṃśatiḥ somasya patnyo lokasya viśrutāḥ | kālasya nayane yuktāḥ somapatnyaḥ śucivratāḥ

सोम की सत्ताईस पत्नियाँ लोक में प्रसिद्ध हैं। पवित्र व्रत वाली ये सोम-पत्नियाँ काल की गणना में नियुक्त हैं;

श्लोक 17 (1.67.17)

सर्वा नक्षत्रयोगिन्यो लोकयात्राविधानतः । पैतामहो मुनिर्देवस्तस्य पुत्रः प्रजापतिः । तस्याष्टौ वसवः पुत्रास्तेषां वक्ष्यामि विस्तरम् ॥

sarvā nakṣatrayoginyo lokayātrāvidhānataḥ | paitāmaho munirdevastasya putraḥ prajāpatiḥ | tasyāṣṭau vasavaḥ putrāsteṣāṃ vakṣyāmi vistaram

वे सब नक्षत्रों से युक्त होकर लोक-यात्रा का विधान करती हैं। पितामह से उत्पन्न दिव्य मुनि के पुत्र प्रजापति हुए; उनके आठ पुत्र वसु हैं। उनका मैं विस्तार से वर्णन करूँगा।

श्लोक 18 (1.67.18)

धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः । प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥

dharo dhruvaśca somaśca ahaścaivānilo'nalaḥ | pratyūṣaśca prabhāsaśca vasavo'ṣṭau prakīrtitāḥ

धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास — ये आठ वसु कहे गए हैं।

श्लोक 19 (1.67.19)

धूम्रायास्तु धरः पुत्रो ब्रह्मविद्यो ध्रुवस्तथा । चन्द्रमास्तु मनस्विन्याः श्वासायाः श्वसनस्तथा ॥

dhūmrāyāstu dharaḥ putro brahmavidyo dhruvastathā | candramāstu manasvinyāḥ śvāsāyāḥ śvasanastathā

धूम्रा के पुत्र धर और ब्रह्मज्ञानी ध्रुव थे। मनस्विनी के पुत्र चन्द्रमा थे और श्वासा के पुत्र श्वसन (वायु)।

श्लोक 20 (1.67.20)

रतायाश्चाप्यहः पुत्रः शाण्डिल्याश्च हुताशनः । प्रत्यूषश्च प्रभासश्च प्रभातायाः सुतौ स्मृतौ ॥

ratāyāścāpyahaḥ putraḥ śāṇḍilyāśca hutāśanaḥ | pratyūṣaśca prabhāsaśca prabhātāyāḥ sutau smṛtau

अह रता के पुत्र थे और हुताशन (अग्नि) शाण्डिली के; प्रत्यूष और प्रभास प्रभाता के दो पुत्र माने गए हैं।

श्लोक 21 (1.67.21)

धरस्य पुत्रो द्रविणो हुतहव्यवहस्तथा । आपस्य पुत्रो वैतण्ड्यः श्रमः शान्तोमुनिस्तथा । ध्रुवस्य पुत्रो भगवान्कालो लोकप्रकालनः ॥

dharasya putro draviṇo hutahavyavahastathā | āpasya putro vaitaṇḍyaḥ śramaḥ śāntomunistathā | dhruvasya putro bhagavānkālo lokaprakālanaḥ

धर के पुत्र द्रविण और हुतहव्यवह थे। आप के पुत्र वैतण्ड्य, श्रम, शान्त और मुनि थे। ध्रुव के पुत्र भगवान काल थे, जो लोकों को चलाते हैं।

श्लोक 22 (1.67.22)

सोमस्य तु सुतो वर्चा वर्चस्वी येन जायते । मनोहरायाः शिशिरः प्राणोऽथ रमणस्तथा ॥

somasya tu suto varcā varcasvī yena jāyate | manoharāyāḥ śiśiraḥ prāṇo'tha ramaṇastathā

सोम के पुत्र वर्चा थे, जिनसे मनुष्य तेजस्वी होता है। मनोहरा से शिशिर, प्राण और रमण उत्पन्न हुए।

श्लोक 23 (1.67.23)

अह्नः सुतस्तथा ज्योतिः शमः शान्तस्तथा मुनिः । अग्नेः पुत्रः कुमारस्तु श्रीमाञ्छरवणालयः ॥

ahnaḥ sutastathā jyotiḥ śamaḥ śāntastathā muniḥ | agneḥ putraḥ kumārastu śrīmāñcharavaṇālayaḥ

अह के पुत्र ज्योति, शम, शान्त और मुनि थे। अग्नि के पुत्र श्रीमान कुमार थे, जिनका जन्म सरकण्डों के वन में हुआ।

श्लोक 24 (1.67.24)

तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठजः । कृत्तिकाभ्युपपत्तेश्च कार्तिकेय इति स्मृतः ॥

tasya śākho viśākhaśca naigameyaśca pṛṣṭhajaḥ | kṛttikābhyupapatteśca kārtikeya iti smṛtaḥ

उनके पश्चात् शाख, विशाख और नैगमेय उत्पन्न हुए। कृत्तिकाओं द्वारा अपनाए जाने के कारण वे कार्तिकेय कहलाए।

श्लोक 25 (1.67.25)

अनिलस्य शिवा भार्या तस्याः पुत्रो मनोजवः । अविज्ञातगतिश्चैव द्वौ पुत्रावनिलस्य तु ॥

anilasya śivā bhāryā tasyāḥ putro manojavaḥ | avijñātagatiścaiva dvau putrāvanilasya tu

अनिल की पत्नी शिवा थीं। उनसे मनोजव और अविज्ञातगति हुए; ये दो अनिल के पुत्र थे।

श्लोक 26 (1.67.26)

प्रत्यूषस्य विदुः पुत्रमृषिं नाम्नाऽथ देवलम् । द्वौ पुत्रौ देवलस्यापि क्षमावन्तौ मनीषिणौ । बृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्मवादिनी ॥

pratyūṣasya viduḥ putramṛṣiṃ nāmnā'tha devalam | dvau putrau devalasyāpi kṣamāvantau manīṣiṇau | bṛhaspatestu bhaginī varastrī brahmavādinī

प्रत्यूष के पुत्र देवल नामक ऋषि बताए जाते हैं; देवल के भी दो पुत्र थे, जो क्षमाशील और मनीषी थे। बृहस्पति की बहन, ब्रह्मवादिनी श्रेष्ठ नारी,

श्लोक 27 (1.67.27)

योगसिद्धा जगत्कृत्स्नमसक्ता विचचार ह । प्रभासस्य तु भार्या सा वसूनामष्टमस्य ह ॥

yogasiddhā jagatkṛtsnamasaktā vicacāra ha | prabhāsasya tu bhāryā sā vasūnāmaṣṭamasya ha

योग में सिद्ध होकर अनासक्त भाव से सारे जगत में विचरती रहीं। वे वसुओं में आठवें प्रभास की पत्नी थीं।

श्लोक 28 (1.67.28)

विश्वकर्मा महाभागो जज्ञे शिल्पप्रजापतिः । कर्ता शिल्पसहस्राणां त्रिदशानां च वर्धकिः ॥

viśvakarmā mahābhāgo jajñe śilpaprajāpatiḥ | kartā śilpasahasrāṇāṃ tridaśānāṃ ca vardhakiḥ

उनसे महाभाग विश्वकर्मा का जन्म हुआ, जो शिल्पों के प्रजापति, सहस्रों शिल्पों के कर्ता और देवताओं के निर्माता थे,

श्लोक 29 (1.67.29)

भूषणानां च सर्वेषां कर्ता शिल्पवतां वरः । यो दिव्यानि विमानानि त्रिदशानां चकार ह ॥

bhūṣaṇānāṃ ca sarveṣāṃ kartā śilpavatāṃ varaḥ | yo divyāni vimānāni tridaśānāṃ cakāra ha

सब आभूषणों के रचयिता और शिल्पियों में श्रेष्ठ, जिन्होंने देवताओं के दिव्य विमान बनाए।

श्लोक 30 (1.67.30)

मनुष्याश्चोपजीवन्ति यस्य शिल्पं महात्मनः । पूजयन्ति च यं नित्यं विश्वकर्माणमव्ययम् ॥

manuṣyāścopajīvanti yasya śilpaṃ mahātmanaḥ | pūjayanti ca yaṃ nityaṃ viśvakarmāṇamavyayam

मनुष्य उन महात्मा के शिल्प के सहारे जीविका चलाते हैं और उन अविनाशी विश्वकर्मा की सदा पूजा करते हैं।

श्लोक 31 (1.67.31)

स्तनं तु दक्षिणं भित्त्वा ब्रह्मणो नरविग्रहः । निःसृतो भगवान्धर्मः सर्वलोकसुखावहः ॥

stanaṃ tu dakṣiṇaṃ bhittvā brahmaṇo naravigrahaḥ | niḥsṛto bhagavāndharmaḥ sarvalokasukhāvahaḥ

ब्रह्मा के दाहिने स्तन को भेदकर मनुष्य-रूपधारी भगवान धर्म प्रकट हुए, जो सब लोकों को सुख देने वाले हैं।

श्लोक 32 (1.67.32)

त्रयस्तस्य वराः पुत्राः सर्वभूतमनोहराः । शमः कामश्च हर्षश्च तेजसा लोकधारिणः ॥

trayastasya varāḥ putrāḥ sarvabhūtamanoharāḥ | śamaḥ kāmaśca harṣaśca tejasā lokadhāriṇaḥ

उनके तीन श्रेष्ठ पुत्र थे, जो सब प्राणियों के मन को भाते हैं — शम, काम और हर्ष; वे अपने तेज से लोकों को धारण करते हैं।

श्लोक 33 (1.67.33)

कामस्य तु रतिर्भार्या शमस्य प्राप्तिरङ्गना । नन्दा तु भार्या हर्षस्य यासु लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥

kāmasya tu ratirbhāryā śamasya prāptiraṅganā | nandā tu bhāryā harṣasya yāsu lokāḥ pratiṣṭhitāḥ

काम की पत्नी रति थीं, शम की प्राप्ति और हर्ष की नन्दा। इन्हीं पर लोक टिके हैं।

श्लोक 34 (1.67.34)

मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपस्य सुरासुराः । जज्ञिरे नृपशार्दूल लोकानां प्रभवस्तु सः ॥

marīceḥ kaśyapaḥ putraḥ kaśyapasya surāsurāḥ | jajñire nṛpaśārdūla lokānāṃ prabhavastu saḥ

मरीचि के पुत्र कश्यप थे, और हे नृपश्रेष्ठ, कश्यप से देवता और असुर उत्पन्न हुए। वही लोकों के मूल हैं।

श्लोक 35 (1.67.35)

त्वाष्ट्री तु सवितुर्भार्या वडवारूपधारिणी । असूयत महाभागा सान्तरिक्षेऽश्विनावुभौ ॥

tvāṣṭrī tu saviturbhāryā vaḍavārūpadhāriṇī | asūyata mahābhāgā sāntarikṣe'śvināvubhau

सूर्यदेव सविता की महाभागा पत्नी त्वाष्ट्री ने घोड़ी का रूप धारण कर अन्तरिक्ष में दोनों अश्विनीकुमारों को जन्म दिया।

श्लोक 36 (1.67.36)

द्वादशैवादितेः पुत्राः शक्रमुख्या नराधिप । तेषामवरजो विष्णुर्यत्र लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥

dvādaśaivāditeḥ putrāḥ śakramukhyā narādhipa | teṣāmavarajo viṣṇuryatra lokāḥ pratiṣṭhitāḥ

हे नराधिप, अदिति के बारह पुत्र थे, जिनमें इन्द्र प्रमुख हैं। उनमें सबसे छोटे विष्णु हैं, जिन पर सब लोक टिके हैं।

श्लोक 37 (1.67.37)

त्रयस्त्रिंशत इत्येते देवास्तेषामहं तव । अन्वयं संप्रवक्ष्यामि पक्षैश्च कुलतो गणान् ॥

trayastriṃśata ityete devāsteṣāmahaṃ tava | anvayaṃ saṃpravakṣyāmi pakṣaiśca kulato gaṇān

ये तैंतीस देवता हैं। अब मैं तुम्हें उनका वंश, और पक्ष तथा कुल के अनुसार उनके गण बताऊँगा।

श्लोक 38 (1.67.38)

रुद्राणामपरः पक्षः साध्यानां मरुतां तथा । वसूनां भार्गवं विद्याद्विश्वेदेवांस्तथैव च ॥

rudrāṇāmaparaḥ pakṣaḥ sādhyānāṃ marutāṃ tathā | vasūnāṃ bhārgavaṃ vidyādviśvedevāṃstathaiva ca

रुद्रों का एक अलग पक्ष है, वैसे ही साध्यों और मरुतों का। वसुओं को भार्गव पक्ष का जानो, और विश्वेदेवों को भी।

श्लोक 39 (1.67.39)

वैनतेयस्तु गरुडो बलवानरुणस्तथा । बृहस्पतिश्च भगवानादित्येष्वेव गण्यते ॥

vainateyastu garuḍo balavānaruṇastathā | bṛhaspatiśca bhagavānādityeṣveva gaṇyate

विनतापुत्र गरुड़, बलवान अरुण तथा भगवान बृहस्पति आदित्यों में ही गिने जाते हैं।

श्लोक 40 (1.67.40)

अश्विनौ गुह्यकान्विद्धि सर्वौषध्यस्तथा पशून् । एते देवगणा राजन्कीर्तितास्तेऽनुपूर्वशः ॥

aśvinau guhyakānviddhi sarvauṣadhyastathā paśūn | ete devagaṇā rājankīrtitāste'nupūrvaśaḥ

दोनों अश्विनीकुमारों, सब ओषधियों और पशुओं को गुह्यक जानो। हे राजन्, ये देवगण मैंने तुम्हें क्रम से बताए,

श्लोक 41 (1.67.41)

यान्कीर्तयित्वा मनुजः सर्वपापैः प्रमुच्यते । ब्रह्मणो हृदयं भित्त्वा निःसृतो भगवान्भृगुः ॥

yānkīrtayitvā manujaḥ sarvapāpaiḥ pramucyate | brahmaṇo hṛdayaṃ bhittvā niḥsṛto bhagavānbhṛguḥ

जिनका कीर्तन करके मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। ब्रह्मा के हृदय को भेदकर भगवान भृगु प्रकट हुए।

श्लोक 42 (1.67.42)

भृगोः पुत्रः कविर्विद्वाञ्छुक्रः कविसुतो ग्रहः । त्रैलोक्यप्राणयात्रार्थं वर्षावर्षे भयाभये । स्वयंभुवा नियुक्तः सन्भुवनं परिधावति ॥

bhṛgoḥ putraḥ kavirvidvāñchukraḥ kavisuto grahaḥ | trailokyaprāṇayātrārthaṃ varṣāvarṣe bhayābhaye | svayaṃbhuvā niyuktaḥ sanbhuvanaṃ paridhāvati

भृगु के पुत्र विद्वान कवि थे और कवि के पुत्र शुक्र ग्रह हैं, जो स्वयम्भू द्वारा नियुक्त होकर तीनों लोकों के जीवन-निर्वाह के लिए, वर्षा और अनावृष्टि तथा भय और अभय के निमित्त भुवन की परिक्रमा करते हैं।

श्लोक 43 (1.67.43)

योगाचार्यो महाबुद्धिर्दैत्यानामभवद्गुरुः । सुराणां चापि मेधावी ब्रह्मचारी यतव्रतः ॥

yogācāryo mahābuddhirdaityānāmabhavadguruḥ | surāṇāṃ cāpi medhāvī brahmacārī yatavrataḥ

योग के आचार्य और महाबुद्धिमान वे दैत्यों के गुरु बने, और देवताओं के भी; वे मेधावी, ब्रह्मचारी और व्रत में दृढ़ थे।

श्लोक 44 (1.67.44)

तस्मिन्नियुक्ते विधिना योगक्षेमाय भार्गवे । अन्यमुत्पादयामास पुत्रं भृगुरनिन्दितम् ॥

tasminniyukte vidhinā yogakṣemāya bhārgave | anyamutpādayāmāsa putraṃ bhṛguraninditam

जब वे भार्गव विधिपूर्वक लोकों के योगक्षेम के लिए नियुक्त हो गए, तब भृगु ने एक और निष्कलंक पुत्र उत्पन्न किया —

श्लोक 45 (1.67.45)

च्यवनं दीप्ततपसं धर्मात्मानं यशस्विनम् । यः स रोषाच्च्युतो गर्भान्मातुर्मोक्षाय भारत ॥

cyavanaṃ dīptatapasaṃ dharmātmānaṃ yaśasvinam | yaḥ sa roṣāccyuto garbhānmāturmokṣāya bhārata

च्यवन, जो तप से दीप्त, धर्मात्मा और यशस्वी थे; हे भारत, वे माता को छुड़ाने के लिए क्रोध में गर्भ से च्युत हो गए थे।

श्लोक 46 (1.67.46)

आरुषी तु मनोः कन्या तस्य पत्नी मनीषिणः । और्वस्तस्यां समभवदूरुं भित्त्वा महायशाः ॥

āruṣī tu manoḥ kanyā tasya patnī manīṣiṇaḥ | aurvastasyāṃ samabhavadūruṃ bhittvā mahāyaśāḥ

मनु की कन्या आरुषी उन मनीषी की पत्नी थीं। उनसे महायशस्वी और्व उत्पन्न हुए, जो उनकी जाँघ को भेदकर निकले,

श्लोक 47 (1.67.47)

महातेजा महावीर्यो बाल एव गुणैर्युतः । ऋचीकस्तस्य पुत्रस्तु जमदग्निस्ततोऽभवत् ॥

mahātejā mahāvīryo bāla eva guṇairyutaḥ | ṛcīkastasya putrastu jamadagnistato'bhavat

वे महातेजस्वी और महापराक्रमी थे, और बचपन में ही गुणों से सम्पन्न थे। उनके पुत्र ऋचीक हुए, और ऋचीक से जमदग्नि उत्पन्न हुए।

श्लोक 48 (1.67.48)

जमदग्नेस्तु चत्वार आसन्पुत्रा महात्मनः । रामस्तेषां जघन्योऽभूदजघन्यैर्गुणैर्युतः । सर्वशस्त्रेषु कुशलः क्षत्रियान्तकरो वशी ॥

jamadagnestu catvāra āsanputrā mahātmanaḥ | rāmasteṣāṃ jaghanyo'bhūdajaghanyairguṇairyutaḥ | sarvaśastreṣu kuśalaḥ kṣatriyāntakaro vaśī

महात्मा जमदग्नि के चार पुत्र थे। उनमें राम सबसे छोटे थे, पर गुणों में किसी से कम नहीं; वे सब शस्त्रों में कुशल, जितेन्द्रिय और क्षत्रियों का अन्त करने वाले थे।

श्लोक 49 (1.67.49)

और्वस्यासीत्पुत्रशतं जमदग्निपुरोगमम् । तेषां पुत्रसहस्राणि बभूवुर्भुवि विस्तरः ॥

aurvasyāsītputraśataṃ jamadagnipurogamam | teṣāṃ putrasahasrāṇi babhūvurbhuvi vistaraḥ

और्व के सौ पुत्र थे, जिनमें जमदग्नि प्रमुख थे; उनके हजारों पुत्र हुए, और इस प्रकार वह वंश पृथ्वी पर फैल गया।

श्लोक 50 (1.67.50)

द्वौ पुत्रौ ब्रह्मणस्त्वन्यौ ययोस्तिष्ठति लक्षणम् । लोके धाता विधाता च यौ स्थितौ मनुना सह ॥

dvau putrau brahmaṇastvanyau yayostiṣṭhati lakṣaṇam | loke dhātā vidhātā ca yau sthitau manunā saha

ब्रह्मा के दो अन्य पुत्र थे, जिनका चिह्न लोक में बना हुआ है — धाता और विधाता, जो मनु के साथ स्थित हैं।

श्लोक 51 (1.67.51)

तयोरेव स्वसा देवी लक्ष्मीः पद्मगृहा शुभा । तस्यास्तु मानसाः पुत्रास्तुरगा व्योमचारिणः ॥

tayoreva svasā devī lakṣmīḥ padmagṛhā śubhā | tasyāstu mānasāḥ putrāsturagā vyomacāriṇaḥ

उनकी बहन कल्याणमयी देवी लक्ष्मी हैं, जिनका निवास कमल है। उनके मानस पुत्र आकाश में विचरने वाले अश्व हैं।

श्लोक 52 (1.67.52)

वरुणस्य भार्या या ज्येष्ठा शुक्राद्देवी व्यजायत । तस्याः पुत्रं बलं विद्धि सुरां च सुरनन्दिनीम् ॥

varuṇasya bhāryā yā jyeṣṭhā śukrāddevī vyajāyata | tasyāḥ putraṃ balaṃ viddhi surāṃ ca suranandinīm

वरुण की जो ज्येष्ठ पत्नी थीं, वे देवी शुक्र से उत्पन्न हुई थीं। उनके पुत्र बल को और देवताओं को आनन्द देने वाली पुत्री सुरा को जानो।

श्लोक 53 (1.67.53)

प्रजानामन्नकामानामन्योन्यपरिभक्षणात् । अधर्मस्तत्र संजातः सर्वभूतविनाशकः ॥

prajānāmannakāmānāmanyonyaparibhakṣaṇāt | adharmastatra saṃjātaḥ sarvabhūtavināśakaḥ

जब अन्न की इच्छा से प्राणी एक-दूसरे को खाने लगे, तब वहाँ सब प्राणियों का विनाश करने वाला अधर्म उत्पन्न हुआ।

श्लोक 54 (1.67.54)

तस्यापि निर्ऋतिर्भार्या नैर्ऋता येन राक्षसाः । घोरास्तस्यास्त्रयः पुत्राः पापकर्मरताः सदा ॥

tasyāpi nirṛtirbhāryā nairṛtā yena rākṣasāḥ | ghorāstasyāstrayaḥ putrāḥ pāpakarmaratāḥ sadā

उसकी पत्नी निर्ऋति थी, जिसके कारण राक्षस नैर्ऋत कहलाते हैं। उसके तीन भयंकर पुत्र थे, जो सदा पापकर्मों में लगे रहते थे —

श्लोक 55 (1.67.55)

भयो महाभयश्चैव मृत्युर्भूतान्तकस्तथा । न तस्य भार्या पुत्रो वा कश्चिदस्त्यन्तको हि सः ॥

bhayo mahābhayaścaiva mṛtyurbhūtāntakastathā | na tasya bhāryā putro vā kaścidastyantako hi saḥ

भय, महाभय और प्राणियों का अन्त करने वाला मृत्यु। मृत्यु की न कोई पत्नी है न पुत्र, क्योंकि वह अन्तक है।

श्लोक 56 (1.67.56)

काकीं श्येनीं तथा भासीं धृतराष्ट्रीं तथा शुकीम् । ताम्रा तु सुषुवे देवी पञ्चैता लोकविश्रुताः ॥

kākīṃ śyenīṃ tathā bhāsīṃ dhṛtarāṣṭrīṃ tathā śukīm | tāmrā tu suṣuve devī pañcaitā lokaviśrutāḥ

देवी ताम्रा ने पाँच लोकविख्यात कन्याओं को जन्म दिया — काकी, श्येनी, भासी, धृतराष्ट्री और शुकी।

श्लोक 57 (1.67.57)

उलूकान्सुषुवे काकी श्येनी श्येनान्व्यजायत । भासी भासानजनयद्गृध्रांश्चैव जनाधिप ॥

ulūkānsuṣuve kākī śyenī śyenānvyajāyata | bhāsī bhāsānajanayadgṛdhrāṃścaiva janādhipa

हे जनाधिप, काकी ने उल्लुओं को और श्येनी ने बाजों को जन्म दिया, तथा भासी ने भास पक्षियों और गिद्धों को।

श्लोक 58 (1.67.58)

धृतराष्ट्री तु हंसांश्च कलहंसांश्च सर्वशः । चक्रवाकांश्च भद्रा तु जनयामास सैव तु ॥

dhṛtarāṣṭrī tu haṃsāṃśca kalahaṃsāṃśca sarvaśaḥ | cakravākāṃśca bhadrā tu janayāmāsa saiva tu

धृतराष्ट्री ने सब प्रकार के हंसों और कलहंसों को जन्म दिया, और उसी भद्रा ने चक्रवाकों को भी उत्पन्न किया।

श्लोक 59 (1.67.59)

शुकी च जनयामास शुकानेव यशस्विनी । कल्याणगुणसंपन्ना सर्वलक्षणपूजिता ॥

śukī ca janayāmāsa śukāneva yaśasvinī | kalyāṇaguṇasaṃpannā sarvalakṣaṇapūjitā

और कल्याणकारी गुणों से सम्पन्न, सब शुभ लक्षणों से पूजित यशस्विनी शुकी ने तोतों को जन्म दिया।

श्लोक 60 (1.67.60)

नव क्रोधवशा नारीः प्रजज्ञे क्रोधसंभवाः । मृगी च मृगमन्दा च हरी भद्रमना अपि ॥

nava krodhavaśā nārīḥ prajajñe krodhasaṃbhavāḥ | mṛgī ca mṛgamandā ca harī bhadramanā api

क्रोधवशा ने क्रोध से उत्पन्न नौ कन्याओं को जन्म दिया — मृगी, मृगमन्दा, हरी, भद्रमना,

श्लोक 61 (1.67.61)

मातङ्गी त्वथ शार्दूली श्वेता सुरभिरेव च । सर्वलक्षणसंपन्ना सुरसा चैव भामिनी ॥

mātaṅgī tvatha śārdūlī śvetā surabhireva ca | sarvalakṣaṇasaṃpannā surasā caiva bhāminī

मातंगी, शार्दूली, श्वेता, सुरभि, और सब शुभ लक्षणों से सम्पन्न सुन्दरी सुरसा।

श्लोक 62 (1.67.62)

अपत्यं तु मृगाः सर्वे मृग्या नरवरोत्तम । ऋक्षाश्च मृगमन्दायाः सृमराश्च परंतप ॥

apatyaṃ tu mṛgāḥ sarve mṛgyā naravarottama | ṛkṣāśca mṛgamandāyāḥ sṛmarāśca paraṃtapa

हे नरश्रेष्ठ, सब मृग मृगी की संतान हैं; और हे परन्तप, रीछ तथा सृमर मृग मृगमन्दा की संतान हैं।

श्लोक 63 (1.67.63)

ततस्त्वैरावतं नागं जज्ञे भद्रमनाः सुतम् । ऐरावतः सुतस्तस्या देवनागो महागजः ॥

tatastvairāvataṃ nāgaṃ jajñe bhadramanāḥ sutam | airāvataḥ sutastasyā devanāgo mahāgajaḥ

भद्रमना ने ऐरावत नाग को पुत्र रूप में जन्म दिया। देवताओं का महान गज ऐरावत उसी का पुत्र है।

श्लोक 64 (1.67.64)

हर्याश्च हरयोऽपत्यं वानराश्च तरस्विनः । गोलाङ्गूलांश्च भद्रं ते हर्याः पुत्रान्प्रचक्षते ॥

haryāśca harayo'patyaṃ vānarāśca tarasvinaḥ | golāṅgūlāṃśca bhadraṃ te haryāḥ putrānpracakṣate

घोड़े हरी की संतान हैं, और वेगवान वानर भी; तुम्हारा कल्याण हो, गोलांगूलों को भी हरी के ही पुत्र कहा जाता है।

श्लोक 65 (1.67.65)

प्रजज्ञे त्वथ शार्दूली सिंहान्व्याघ्राननेकशः । द्वीपिनश्च महासत्त्वान्सर्वानेव न संशयः ॥

prajajñe tvatha śārdūlī siṃhānvyāghrānanekaśaḥ | dvīpinaśca mahāsattvānsarvāneva na saṃśayaḥ

फिर शार्दूली ने अनेक सिंहों और व्याघ्रों को, तथा महाबली चीतों को — इन सबको निःसंदेह — जन्म दिया।

श्लोक 66 (1.67.66)

मातङ्ग्यपि च मातङ्गानपत्यानि नराधिप । दिशां गजं तु श्वेताख्यं श्वेताऽजनयदाशुगम् ॥

mātaṅgyapi ca mātaṅgānapatyāni narādhipa | diśāṃ gajaṃ tu śvetākhyaṃ śvetā'janayadāśugam

हे नराधिप, मातंगी ने हाथियों को संतान रूप में जन्म दिया, और श्वेता ने श्वेत नामक वेगवान दिग्गज को।

श्लोक 67 (1.67.67)

तथा दुहितरौ राजन्सुरभिर्वै व्यजायत । रोहिणी चैव भद्रं ते गन्धर्वी तु यशस्विनी ॥

tathā duhitarau rājansurabhirvai vyajāyata | rohiṇī caiva bhadraṃ te gandharvī tu yaśasvinī

हे राजन्, तुम्हारा कल्याण हो, सुरभि ने दो कन्याओं को जन्म दिया — रोहिणी और यशस्विनी गन्धर्वी,

श्लोक 68 (1.67.68)

विमलामपि भद्रं ते अनलामपि भारत । रोहिण्यां जज्ञिरे गावो गन्धर्व्यां वाजिनः सुताः ॥

vimalāmapi bhadraṃ te analāmapi bhārata | rohiṇyāṃ jajñire gāvo gandharvyāṃ vājinaḥ sutāḥ

और हे भारत, विमला तथा अनला को भी। रोहिणी से गायें उत्पन्न हुईं और गन्धर्वी से घोड़े।

श्लोक 69 (1.67.69)

इरायाः कन्यका जातास्तिस्रः कमललोचनाः । वनस्पतीनां वृक्षाणां वीरुधां चैव मातरः ॥

irāyāḥ kanyakā jātāstisraḥ kamalalocanāḥ | vanaspatīnāṃ vṛkṣāṇāṃ vīrudhāṃ caiva mātaraḥ

इरा की तीन कमलनयनी कन्याएँ हुईं, जो वनस्पतियों, वृक्षों और लताओं की जननी हैं।

श्लोक 70 (1.67.70)

लतारुहे च द्वे प्रोक्ते वीरुधां चैव ताः स्मृताः । गृह्णन्ति ये विना पुष्पं फलानि तरवः पृथक् ॥

latāruhe ca dve prokte vīrudhāṃ caiva tāḥ smṛtāḥ | gṛhṇanti ye vinā puṣpaṃ phalāni taravaḥ pṛthak

उनमें दो लता और रुहा कही गई हैं, और वे भी लताओं की जननी मानी गई हैं। जो वृक्ष बिना फूल के अलग से फल धारण करते हैं,

श्लोक 71 (1.67.71)

लतासुतास्ते विज्ञेयास्तानेवाहुर्वनस्पतीन् । पुष्पैः फलग्रहान्वृक्षान्रुहायाः प्रसवं विदुः ॥

latāsutāste vijñeyāstānevāhurvanaspatīn | puṣpaiḥ phalagrahānvṛkṣānruhāyāḥ prasavaṃ viduḥ

वे लता के पुत्र जानने चाहिए; उन्हीं को वनस्पति कहा जाता है। फूलों के बाद फल धारण करने वाले वृक्षों को रुहा की संतान जानते हैं।

श्लोक 72 (1.67.72)

लतागुल्मानि वृक्षाश्च त्वक्सारतृणजन्तवः । वीरुधो याः प्रजास्तस्यास्तत्र वंशः समाप्यते ॥

latāgulmāni vṛkṣāśca tvaksāratṛṇajantavaḥ | vīrudho yāḥ prajāstasyāstatra vaṃśaḥ samāpyate

लताएँ, झाड़ियाँ और वृक्ष, बाँस और घास — ये जो वनस्पतियाँ उसकी संतान हैं, उन्हीं पर यह वंश समाप्त होता है।

श्लोक 73 (1.67.73)

सप्तपिण्डफलान्वृक्षाननलापि व्यजायत ॥

saptapiṇḍaphalānvṛkṣānanalāpi vyajāyata

अनला ने भी गूदेदार फल देने वाले सात प्रकार के वृक्षों को जन्म दिया।

श्लोक 74 (1.67.74)

अनलायाः शुकी पुत्री कंकस्तु सुरसासुतः । अरुणस्य भार्या श्येनी तु वीर्यवन्तौ महाबलौ ॥

analāyāḥ śukī putrī kaṃkastu surasāsutaḥ | aruṇasya bhāryā śyenī tu vīryavantau mahābalau

शुकी अनला की पुत्री थी और कंक सुरसा का पुत्र था। अरुण की पत्नी श्येनी ने दो पराक्रमी और महाबली पुत्रों को जन्म दिया —

श्लोक 75 (1.67.75)

संपातिं जनयामास वीर्यवन्तं जटायुषम् । सुरसाऽजनयन्नागान्कद्रूः पुत्रांस्तु पन्नगान् ॥

saṃpātiṃ janayāmāsa vīryavantaṃ jaṭāyuṣam | surasā'janayannāgānkadrūḥ putrāṃstu pannagān

सम्पाति और वीर जटायु। सुरसा ने नागों को और कद्रू ने सर्पों को पुत्र रूप में जन्म दिया।

श्लोक 76 (1.67.76)

द्वौ पुत्रौ विनतायास्तु विख्यातौ गरुडारुणौ । इत्येष सर्वभूतानां महतां मनुजाधिप । प्रभवः कीर्तितः सम्यङ्मया मतिमतां वर ॥

dvau putrau vinatāyāstu vikhyātau garuḍāruṇau | ityeṣa sarvabhūtānāṃ mahatāṃ manujādhipa | prabhavaḥ kīrtitaḥ samyaṅmayā matimatāṃ vara

विनता के दो विख्यात पुत्र थे, गरुड़ और अरुण। हे मनुजाधिप, हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, इस प्रकार मैंने सब महान प्राणियों की उत्पत्ति का भली-भाँति वर्णन किया,

श्लोक 77 (1.67.77)

यं श्रुत्वा पुरुषः सम्यङ्मुक्तो भवति पाप्मनः । सर्वज्ञतां च लभते रतिमग्र्यां च विन्दति ॥

yaṃ śrutvā puruṣaḥ samyaṅmukto bhavati pāpmanaḥ | sarvajñatāṃ ca labhate ratimagryāṃ ca vindati

जिसे सुनकर मनुष्य पाप से पूर्णतः मुक्त हो जाता है, सर्वज्ञता प्राप्त करता है और परम आनन्द पाता है।

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