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आदि पर्व · अध्याय 69

ययाति का वंश और यौवन का विनिमय

जनमेजय आरम्भ से कुरुवंश का वृत्तान्त सुनना चाहते हैं। वैशम्पायन दक्ष और आदित्यों से लेकर विवस्वान् और मनु, इला और पुरूरवा, आयु और नहुष होते हुए ययाति तक, और देवयानी तथा शर्मिष्ठा से उत्पन्न उनके पाँच पुत्रों तक वंश का वर्णन करते हैं। बुढ़ापे से ग्रस्त ययाति अपने पुत्रों से उसे ले लेने को कहते हैं; केवल सबसे छोटे पुत्र पूरु मान जाते हैं। हजार वर्षों तक भोग भोगने के बाद ययाति गाते हैं कि भोग से कामना कभी शान्त नहीं होती, अपनी वृद्धावस्था वापस ले लेते हैं, पूरु का राज्याभिषेक करते हैं, और भृगुतुंग पर तप करके पत्नियों सहित स्वर्ग जाते हैं।

अध्याय 68अध्याय-सूचीअध्याय 70

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (1.69.1)

त्वत्तः श्रुतमिदं ब्रह्मन्देवदानवरक्षसाम् । अंशावतरणं सम्यग्गन्धर्वाप्सरसां तथा ॥

tvattaḥ śrutamidaṃ brahmandevadānavarakṣasām | aṃśāvataraṇaṃ samyaggandharvāpsarasāṃ tathā

हे ब्रह्मन्, देवताओं, दानवों और राक्षसों के, तथा गन्धर्वों और अप्सराओं के अंशावतार का वृत्तान्त मैंने आपसे भली-भाँति सुन लिया है।

श्लोक 2 (1.69.2)

इमं तु भूय इच्छामि कुरूणां वंशमादितः । कथ्यमानं त्वया विप्र विप्रर्षिगणसन्निधौ ॥

imaṃ tu bhūya icchāmi kurūṇāṃ vaṃśamāditaḥ | kathyamānaṃ tvayā vipra viprarṣigaṇasannidhau

किन्तु हे विप्र, अब मैं कुरुओं के वंश का वर्णन आरम्भ से फिर सुनना चाहता हूँ, जिसे आप इन ब्रह्मर्षियों की सभा के सामने कहें।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (1.69.3)

धर्मार्थकामसहितं राजर्षीणां प्रकीर्तितम् । पवित्रं कीर्त्यमानं मे निबोधेदं मनीषिणाम् ॥

dharmārthakāmasahitaṃ rājarṣīṇāṃ prakīrtitam | pavitraṃ kīrtyamānaṃ me nibodhedaṃ manīṣiṇām

राजर्षियों का यह वृत्तान्त, जिसका मनीषियों ने वर्णन किया है, मुझसे सुनो। यह धर्म, अर्थ और काम से युक्त है और इसका कीर्तन पवित्र करने वाला है।

श्लोक 4 (1.69.4)

प्रजापतेस्तु दक्षस्य मनोर्वैवस्वतस्य च । भरतस्य कुरोः पूरोराजमीढस्य चानघ ॥

prajāpatestu dakṣasya manorvaivasvatasya ca | bharatasya kuroḥ pūrorājamīḍhasya cānagha

हे निष्पाप, प्रजापति दक्ष, विवस्वान् के पुत्र मनु, भरत, कुरु, पूरु और अजमीढ के वंश में —

श्लोक 5 (1.69.5)

यादवानामिमं वंशं कौरवाणां च सर्वशः । तथैव भरतानां च पुण्यं स्वस्त्ययनं महत् ॥

yādavānāmimaṃ vaṃśaṃ kauravāṇāṃ ca sarvaśaḥ | tathaiva bharatānāṃ ca puṇyaṃ svastyayanaṃ mahat

यादवों का, सब शाखाओं सहित कौरवों का, और इसी प्रकार भरतवंशियों का यह वंश पवित्र और महान् कल्याणकारी है;

श्लोक 6 (1.69.6)

धन्यं यशस्यमायुष्यं कीर्तयिष्यामि तेऽनघ । तेजोभिरुदिताः सर्वे महर्षिसमतेजसः ॥

dhanyaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ kīrtayiṣyāmi te'nagha | tejobhiruditāḥ sarve maharṣisamatejasaḥ

यह धन, यश और आयु देने वाला है; हे निष्पाप, मैं इसे तुम्हें सुनाऊँगा। वे सब अपने तेज से उदित हुए थे और महर्षियों के समान तेजस्वी थे।

श्लोक 7 (1.69.7)

दश प्राचेतसः पुत्राः सन्तः पुण्यजनाः स्मृताः । मुखजेनाग्निना यैस्ते पूर्वं दग्धा महौजसः ॥

daśa prācetasaḥ putrāḥ santaḥ puṇyajanāḥ smṛtāḥ | mukhajenāgninā yaiste pūrvaṃ dagdhā mahaujasaḥ

प्रचेता के दस पुत्र पुण्यात्मा कहे गए हैं; उन्होंने ही पूर्वकाल में अपने मुख से उत्पन्न अग्नि से उन विशाल वृक्षों को जला डाला था।

श्लोक 8 (1.69.8)

तेभ्यः प्राचेतसो जज्ञे दक्षो दक्षादिमाः प्रजाः । संभूताः पुरुषव्याघ्र स हि लोकपितामहः ॥

tebhyaḥ prācetaso jajñe dakṣo dakṣādimāḥ prajāḥ | saṃbhūtāḥ puruṣavyāghra sa hi lokapitāmahaḥ

उनसे प्रचेताओं के पुत्र दक्ष उत्पन्न हुए, और हे पुरुषसिंह, दक्ष से ही ये सारी प्रजाएँ उत्पन्न हुईं; क्योंकि वे लोकों के पितामह हैं।

श्लोक 9 (1.69.9)

वीरिण्या सह सङ्गम्य दक्षः प्राचेतसो मुनिः । आत्मतुल्यानजनयत्सहस्रं संशितव्रतान् ॥

vīriṇyā saha saṅgamya dakṣaḥ prācetaso muniḥ | ātmatulyānajanayatsahasraṃ saṃśitavratān

प्रचेताओं के पुत्र मुनि दक्ष ने वीरिणी के साथ संयोग करके अपने ही समान, कठोर व्रत वाले एक हजार पुत्र उत्पन्न किए।

श्लोक 10 (1.69.10)

सहस्रसङ्ख्यानसंभूतान्दक्षपुत्रांश्च नारदः । मोक्षमध्यापयामास साङ्ख्यज्ञानमनुत्तमम् ॥

sahasrasaṅkhyānasaṃbhūtāndakṣaputrāṃśca nāradaḥ | mokṣamadhyāpayāmāsa sāṅkhyajñānamanuttamam

नारद ने दक्ष के उन हजार पुत्रों को मोक्ष का मार्ग, अर्थात् सांख्य का सर्वोत्तम ज्ञान सिखाया।

श्लोक 11 (1.69.11)

नाशार्थं योजयामास दिगन्तज्ञानकर्मसु । ततः पञ्चाशतं कन्याः पुत्रिका अभिसन्दधे । प्रजापतिः प्रजा दक्षः सिसृक्षुर्जनमेजय ॥

nāśārthaṃ yojayāmāsa digantajñānakarmasu | tataḥ pañcāśataṃ kanyāḥ putrikā abhisandadhe | prajāpatiḥ prajā dakṣaḥ sisṛkṣurjanamejaya

उनके विनाश के लिए नारद ने उन्हें दिशाओं का अन्त जानने के काम में लगा दिया। तब, हे जनमेजय, प्रजा की सृष्टि करने की इच्छा से प्रजापति दक्ष ने पचास कन्याओं को पुत्रिका के रूप में नियुक्त किया, ताकि उनके पुत्र दक्ष का ही वंश चलाएँ।

श्लोक 12 (1.69.12)

ददौ दश स धर्माय कश्यपाय त्रयोदश । कालस्य नयने युक्ताः सप्तविंशतिमिन्दवे ॥

dadau daśa sa dharmāya kaśyapāya trayodaśa | kālasya nayane yuktāḥ saptaviṃśatimindave

उन्होंने दस कन्याएँ धर्म को, तेरह कश्यप को, और काल-गणना में लगी हुई सत्ताईस चन्द्रमा को दीं।

श्लोक 13 (1.69.13)

त्रयोदशानां पत्नीनां या तु दाक्षायणी वरा । मारीचः कश्यपस्त्वस्यामादित्यान्समजीजनत् ॥

trayodaśānāṃ patnīnāṃ yā tu dākṣāyaṇī varā | mārīcaḥ kaśyapastvasyāmādityānsamajījanat

उन तेरह पत्नियों में जो श्रेष्ठ दक्षकन्या थीं, उनसे मरीचि के पुत्र कश्यप ने आदित्यों को उत्पन्न किया —

श्लोक 14 (1.69.14)

इन्द्रादीन्वीर्यसंपन्नान्विवस्वन्तमथापि च । विवस्वतः सुतो जज्ञे यमो वैवस्वतः प्रभुः ॥

indrādīnvīryasaṃpannānvivasvantamathāpi ca | vivasvataḥ suto jajñe yamo vaivasvataḥ prabhuḥ

पराक्रमी इन्द्र आदि को और विवस्वान् को भी। विवस्वान् के पुत्र प्रभु यम हुए, जो वैवस्वत कहलाते हैं।

श्लोक 15 (1.69.15)

मार्ताण्डस्य यमी चापि सुता राजन्नजायत । मार्तण्डस्य मनुर्धीमानजायत सुतः प्रभुः ॥

mārtāṇḍasya yamī cāpi sutā rājannajāyata | mārtaṇḍasya manurdhīmānajāyata sutaḥ prabhuḥ

हे राजन्, मार्तण्ड (सूर्य) के यहाँ यमी नाम की पुत्री भी उत्पन्न हुई; और मार्तण्ड के पुत्र बुद्धिमान प्रभु मनु हुए।

श्लोक 16 (1.69.16)

धर्मात्मा स मनुर्धीमान्यत्र वंशः प्रतिष्ठितः । मनोर्वंशो मानवानां ततोऽयं प्रथितोऽभवत् ॥

dharmātmā sa manurdhīmānyatra vaṃśaḥ pratiṣṭhitaḥ | manorvaṃśo mānavānāṃ tato'yaṃ prathito'bhavat

वे मनु धर्मात्मा और बुद्धिमान थे, और उन्हीं में वंश प्रतिष्ठित हुआ। मनु से मानवों का वंश चला, जो तब से प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 17 (1.69.17)

ब्रह्मक्षत्रादयस्तस्मान्मनोर्जातास्तु मानवाः । ततोऽभवन्महाराज ब्रह्म क्षत्रेण सङ्गतम् ॥

brahmakṣatrādayastasmānmanorjātāstu mānavāḥ | tato'bhavanmahārāja brahma kṣatreṇa saṅgatam

ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सब मानव उन्हीं मनु से उत्पन्न हुए। हे महाराज, तब ब्राह्मणत्व क्षत्रियत्व के साथ जुड़ गया।

श्लोक 18 (1.69.18)

ब्राह्मणा मानवास्तेषां साङ्गं वेदमधारयन् । वेनं धृष्णुं नरिष्यन्तं नाभागेक्ष्वाकुमेव च ॥

brāhmaṇā mānavāsteṣāṃ sāṅgaṃ vedamadhārayan | venaṃ dhṛṣṇuṃ nariṣyantaṃ nābhāgekṣvākumeva ca

उनमें से ब्राह्मण मानवों ने अंगों सहित वेद को धारण किया। वेन, धृष्णु, नरिष्यन्त, नाभाग और इक्ष्वाकु,

श्लोक 19 (1.69.19)

कारूषमथ शर्यातिं तथा चैवाष्टमीमिलाम् । पृषध्रं नवमं प्राहुः क्षत्रधर्मपरायणम् ॥

kārūṣamatha śaryātiṃ tathā caivāṣṭamīmilām | pṛṣadhraṃ navamaṃ prāhuḥ kṣatradharmaparāyaṇam

कारूष, शर्याति, और आठवीं इला; और क्षत्रिय-धर्म में तत्पर पृषध्र को नौवाँ बताते हैं;

श्लोक 20 (1.69.20)

नाभागारिष्टदशमान्मनोः पुत्रान्प्रचक्षते । पञ्चाशत्तु मनोः पुत्रास्तथैवान्येऽभवन्क्षितौ ॥

nābhāgāriṣṭadaśamānmanoḥ putrānpracakṣate | pañcāśattu manoḥ putrāstathaivānye'bhavankṣitau

और नाभागारिष्ट को दसवाँ — इन्हें मनु के पुत्र कहा जाता है। पृथ्वी पर मनु के पचास अन्य पुत्र भी हुए,

श्लोक 21 (1.69.21)

अन्योन्यभेदात्ते सर्वे विनेशुरिति नः श्रुतम् । पुरूरवास्ततो विद्वानिलायां समपद्यत ॥

anyonyabhedātte sarve vineśuriti naḥ śrutam | purūravāstato vidvānilāyāṃ samapadyata

किन्तु वे सब आपस की फूट से नष्ट हो गए, ऐसा हमने सुना है। तत्पश्चात् इला से विद्वान् पुरूरवा उत्पन्न हुए।

श्लोक 22 (1.69.22)

सा वै तस्याभवन्माता पिता चैवेति नः श्रुतम् । त्रयोदश समुद्रस्य द्वीपानश्नन्पुरूरवाः ॥

sā vai tasyābhavanmātā pitā caiveti naḥ śrutam | trayodaśa samudrasya dvīpānaśnanpurūravāḥ

इला ही उनकी माता भी थीं और पिता भी, ऐसा हमने सुना है। पुरूरवा समुद्र के तेरह द्वीपों का उपभोग करते थे,

श्लोक 23 (1.69.23)

अमानुषैर्वृतः सत्त्वैर्मानुषः सन्महायशाः । विप्रैः स विग्रहं चक्रे वीर्योन्मत्तः पुरूरवाः ॥

amānuṣairvṛtaḥ sattvairmānuṣaḥ sanmahāyaśāḥ | vipraiḥ sa vigrahaṃ cakre vīryonmattaḥ purūravāḥ

और मनुष्य होते हुए भी वे महायशस्वी अमानुषी प्राणियों से घिरे रहते थे। अपने बल से उन्मत्त होकर पुरूरवा ने ब्राह्मणों से विरोध ठान लिया,

श्लोक 24 (1.69.24)

जहार च स विप्राणां रत्नान्युत्क्रोशतामपि । सनत्कुमारस्तं राजन्ब्रह्मलोकादुपेत्य ह ॥

jahāra ca sa viprāṇāṃ ratnānyutkrośatāmapi | sanatkumārastaṃ rājanbrahmalokādupetya ha

और ब्राह्मणों के चिल्लाते रहने पर भी उनके रत्न छीन लिए। हे राजन्, तब सनत्कुमार ब्रह्मलोक से उनके पास आए

श्लोक 25 (1.69.25)

अनुदर्शं ततश्चक्रे प्रत्यगृह्णान्न चाप्यसौ । ततो महर्षिभिः क्रुद्धैः सद्यः शप्तो व्यनश्यत ॥

anudarśaṃ tataścakre pratyagṛhṇānna cāpyasau | tato maharṣibhiḥ kruddhaiḥ sadyaḥ śapto vyanaśyata

और उन्हें समझाया, पर उन्होंने वह सीख नहीं मानी। तब क्रुद्ध महर्षियों के शाप से वे तत्काल नष्ट हो गए —

श्लोक 26 (1.69.26)

लोभान्वितो बलमदान्नष्टसंज्ञो नराधिपः । स हि गन्धर्वलोकस्थानुर्वश्या सहितो विराट् ॥

lobhānvito balamadānnaṣṭasaṃjño narādhipaḥ | sa hi gandharvalokasthānurvaśyā sahito virāṭ

लोभ से भरे और बल के मद से विवेक खो बैठे वे नरेश। इन्हीं सम्राट् ने उर्वशी के साथ

श्लोक 27 (1.69.27)

आनिनाय क्रियार्थेऽग्नीन्यथावद्विहितांस्त्रिधा । षट् सुता जज्ञिरे चैलादायुर्धीमानमावसुः ॥

ānināya kriyārthe'gnīnyathāvadvihitāṃstridhā | ṣaṭ sutā jajñire cailādāyurdhīmānamāvasuḥ

गन्धर्वलोक से यज्ञ-कर्म के लिए विधिपूर्वक तीन भागों में स्थापित अग्नियाँ लाई थीं। इला के पुत्र (ऐल) के छह पुत्र हुए — आयु, बुद्धिमान अमावसु,

श्लोक 28 (1.69.28)

दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुताः । नहुषं वृद्धशर्माणं रजिं गयमनेनसम् ॥

dṛḍhāyuśca vanāyuśca śatāyuścorvaśīsutāḥ | nahuṣaṃ vṛddhaśarmāṇaṃ rajiṃ gayamanenasam

दृढायु, वनायु और शतायु — ये उर्वशी के पुत्र थे। नहुष, वृद्धशर्मा, रजि, गय और अनेना —

श्लोक 29 (1.69.29)

स्वर्भानवीसुतानेतानायोः पुत्रान्प्रचक्षते । आयुषो नहुषः पुत्रो धीमान्सत्यपराक्रमः ॥

svarbhānavīsutānetānāyoḥ putrānpracakṣate | āyuṣo nahuṣaḥ putro dhīmānsatyaparākramaḥ

स्वर्भानवी से उत्पन्न इन पुत्रों को आयु के पुत्र कहा जाता है। आयु के पुत्र नहुष बुद्धिमान और सच्चे पराक्रमी थे;

श्लोक 30 (1.69.30)

राज्यं शशास सुमहद्धर्मेण पृथिवीपते । पितॄन्देवानृषीन्विप्रान्गन्धर्वोरगराक्षसान् ॥

rājyaṃ śaśāsa sumahaddharmeṇa pṛthivīpate | pitṝndevānṛṣīnviprāngandharvoragarākṣasān

हे पृथ्वीपति, उन्होंने धर्मपूर्वक विशाल राज्य का शासन किया। पितरों, देवताओं, ऋषियों, ब्राह्मणों, गन्धर्वों, नागों और राक्षसों का,

श्लोक 31 (1.69.31)

नहुषः पालयामास ब्रह्मक्षत्रमथो विशः । स हत्वा दस्युसंघातानृषीन्करमदापयत् ॥

nahuṣaḥ pālayāmāsa brahmakṣatramatho viśaḥ | sa hatvā dasyusaṃghātānṛṣīnkaramadāpayat

तथा ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों का नहुष पालन करते थे। उन्होंने दस्युओं के झुण्डों को मारकर ऋषियों से कर वसूल किया,

श्लोक 32 (1.69.32)

पशुवच्चैव तान्पृष्ठे वाहयामास वीर्यवान् । कारयामास चेन्द्रत्वमभिभूय दिवौकसः ॥

paśuvaccaiva tānpṛṣṭhe vāhayāmāsa vīryavān | kārayāmāsa cendratvamabhibhūya divaukasaḥ

और उन पराक्रमी ने उन्हें पशुओं की भाँति अपनी पीठ पर ढोने को विवश किया। उन्होंने स्वर्गवासियों को परास्त करके इन्द्र का पद ग्रहण किया

श्लोक 33 (1.69.33)

तेजसा तपसा चैव विक्रमेणौजसा तथा । विश्लिष्टो नहुषः शप्तः सद्यो ह्यजगरोऽभवत् । यतिं ययातिं संयातिमायातिमयतिं ध्रुवम् ॥

tejasā tapasā caiva vikrameṇaujasā tathā | viśliṣṭo nahuṣaḥ śaptaḥ sadyo hyajagaro'bhavat | yatiṃ yayātiṃ saṃyātimāyātimayatiṃ dhruvam

अपने तेज, तप, पराक्रम और ओज के बल पर। फिर पद से गिरकर नहुष शापग्रस्त हुए और तत्काल अजगर बन गए। यति, ययाति, संयाति, आयाति, अयति और ध्रुव —

श्लोक 34 (1.69.34)

नहुषो जनयामास षट् सुतान्प्रियवादिनः । यतिस्तु योगमास्थाय ब्रह्मीभूतोऽभवन्मुनिः ॥

nahuṣo janayāmāsa ṣaṭ sutānpriyavādinaḥ | yatistu yogamāsthāya brahmībhūto'bhavanmuniḥ

इन छह मधुरभाषी पुत्रों को नहुष ने उत्पन्न किया। यति ने योग का आश्रय लिया और ब्रह्मभाव को प्राप्त मुनि हो गए।

श्लोक 35 (1.69.35)

ययातिर्नाहुषः सम्राडासीत्सत्यपराक्रमः । स पालयामास महीमीजे च बहुभिर्मखैः ॥

yayātirnāhuṣaḥ samrāḍāsītsatyaparākramaḥ | sa pālayāmāsa mahīmīje ca bahubhirmakhaiḥ

नहुषपुत्र ययाति सच्चे पराक्रमी सम्राट् हुए। उन्होंने पृथ्वी का पालन किया और अनेक यज्ञ किए।

श्लोक 36 (1.69.36)

अतिभक्त्या पितॄनर्चन्देवांश्च प्रयतः सदा । अन्वगृह्णात्प्रजाः सर्वा ययातिरपराजितः ॥

atibhaktyā pitṝnarcandevāṃśca prayataḥ sadā | anvagṛhṇātprajāḥ sarvā yayātiraparājitaḥ

सदा संयम से रहते हुए, अत्यन्त भक्ति से पितरों और देवताओं की पूजा करते हुए अपराजित ययाति ने सारी प्रजा पर अनुग्रह किया।

श्लोक 37 (1.69.37)

तस्य पुत्रा महेष्वासाः सर्वैः समुदिता गुणैः । देवयान्यां महाराज शर्मिष्ठायां च जज्ञिरे ॥

tasya putrā maheṣvāsāḥ sarvaiḥ samuditā guṇaiḥ | devayānyāṃ mahārāja śarmiṣṭhāyāṃ ca jajñire

हे महाराज, उनके सब गुणों से सम्पन्न, महान् धनुर्धर पुत्र देवयानी और शर्मिष्ठा से उत्पन्न हुए।

श्लोक 38 (1.69.38)

देवयान्यामजायेतां यदुस्तुर्वसुरेव च । द्रुह्युश्चानुश्च पूरुश्च शर्मिष्ठायां च जज्ञिरे ॥

devayānyāmajāyetāṃ yadusturvasureva ca | druhyuścānuśca pūruśca śarmiṣṭhāyāṃ ca jajñire

देवयानी से यदु और तुर्वसु उत्पन्न हुए; और द्रुह्यु, अनु तथा पूरु शर्मिष्ठा से उत्पन्न हुए।

श्लोक 39 (1.69.39)

स शाश्वतीः समा राजन्प्रजा धर्मेण पालयन् । जरामार्च्छन्महाघोरां नाहुषो रूपनाशिनीम् ॥

sa śāśvatīḥ samā rājanprajā dharmeṇa pālayan | jarāmārcchanmahāghorāṃ nāhuṣo rūpanāśinīm

हे राजन्, अनगिनत वर्षों तक धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करने के बाद नहुषपुत्र को रूप नष्ट करने वाली अत्यन्त भयंकर वृद्धावस्था ने आ घेरा।

श्लोक 40 (1.69.40)

जराऽभिभूतः पुत्रान्स राजा वचनमब्रवीत् । यदुं पूरुं तुर्वसुं च द्रुह्युं चानुं च भारत ॥

jarā'bhibhūtaḥ putrānsa rājā vacanamabravīt | yaduṃ pūruṃ turvasuṃ ca druhyuṃ cānuṃ ca bhārata

हे भारत, वृद्धावस्था से ग्रस्त होकर राजा ने अपने पुत्रों — यदु, पूरु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु — से यह बात कही:

ययातिरुवाच

श्लोक 41 (1.69.41)

यौवनेन चरन्कामान्युवा युवतिभिः सह । विहर्तुमहमिच्छामि साह्यं कुरुत पुत्रकाः ॥

yauvanena carankāmānyuvā yuvatibhiḥ saha | vihartumahamicchāmi sāhyaṃ kuruta putrakāḥ

मैं यौवन पाकर युवक की भाँति युवतियों के साथ भोगों का आनन्द लेना और विहार करना चाहता हूँ। पुत्रो, इसमें मेरी सहायता करो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 42 (1.69.42)

तं पुत्रो दैवयानेयः पूर्वजो वाक्यमब्रवीत् । किं कार्यं भवतः कार्यमस्माकं यौवनेन ते ॥

taṃ putro daivayāneyaḥ pūrvajo vākyamabravīt | kiṃ kāryaṃ bhavataḥ kāryamasmākaṃ yauvanena te

देवयानी से उत्पन्न उनके ज्येष्ठ पुत्र ने उनसे कहा — "आपको क्या कार्य करवाना है? हमारे यौवन से आपको क्या प्रयोजन?"

श्लोक 43 (1.69.43)

ययातिरब्रवीत्तं वै जरा मे प्रतिगृह्यताम् । यौवनेन त्वदीयेन चरेयं विषयानहम् ॥

yayātirabravīttaṃ vai jarā me pratigṛhyatām | yauvanena tvadīyena careyaṃ viṣayānaham

ययाति ने उससे कहा — "मेरी वृद्धावस्था ले लो, और तुम्हारे यौवन से मैं विषयों का भोग करूँ।"

ययातिरुवाच

श्लोक 44 (1.69.44)

यजतो दीर्घसत्रैर्मे शापाच्चोशनसो मुनेः । कामार्थः परिहीणोऽयं तप्येयं तेन पुत्रकाः ॥

yajato dīrghasatrairme śāpāccośanaso muneḥ | kāmārthaḥ parihīṇo'yaṃ tapyeyaṃ tena putrakāḥ

लम्बे यज्ञों में लगे रहने के कारण और मुनि उशना के शाप से मेरा काम-सुख छिन गया है; पुत्रो, इसी से मैं संतप्त हूँ।

श्लोक 45 (1.69.45)

मामकेन शरीरेण राज्यमेकः प्रशास्तु वः । अहं तन्वाऽभिनवया युवा काममवाप्नुयाम् ॥

māmakena śarīreṇa rājyamekaḥ praśāstu vaḥ | ahaṃ tanvā'bhinavayā yuvā kāmamavāpnuyām

तुममें से कोई एक मेरे शरीर से राज्य का शासन करे, और मैं नए शरीर से युवा होकर अपनी कामनाएँ पूरी करूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 46 (1.69.46)

ते न तस्य प्रत्यगृह्णन्यदुप्रभृतयो जराम् । तमब्रवीत्ततः पूरुः कनीयान्सत्यविक्रमः ॥

te na tasya pratyagṛhṇanyaduprabhṛtayo jarām | tamabravīttataḥ pūruḥ kanīyānsatyavikramaḥ

यदु आदि ने उनकी वृद्धावस्था स्वीकार नहीं की। तब सबसे छोटे, सच्चे पराक्रमी पूरु ने उनसे कहा:

पूरुरुवाच

श्लोक 47 (1.69.47)

राजंश्चराभिनवया तन्वा यौवनगोचरः । अहं जरां समादाय राज्ये स्थास्यामि तेऽऽज्ञया ॥

rājaṃścarābhinavayā tanvā yauvanagocaraḥ | ahaṃ jarāṃ samādāya rājye sthāsyāmi te''jñayā

हे राजन्, आप नए शरीर से यौवन का आनन्द लेते हुए विचरें। मैं आपकी वृद्धावस्था लेकर आपकी आज्ञा से राज्य में रहूँगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 48 (1.69.48)

एवमुक्तः स राजर्षिस्तपोवीर्यसमाश्रयात् । संचारयामास जरां तदा पुत्रे महात्मनि ॥

evamuktaḥ sa rājarṣistapovīryasamāśrayāt | saṃcārayāmāsa jarāṃ tadā putre mahātmani

ऐसा कहे जाने पर उन राजर्षि ने अपने तप के बल का आश्रय लेकर अपनी वृद्धावस्था अपने महात्मा पुत्र में संचारित कर दी।

श्लोक 49 (1.69.49)

पौरवेणाथ वयसा राजा यौवनमास्थितः । यायातेनापि वयसा राज्यं पूरुरकारयत् ॥

pauraveṇātha vayasā rājā yauvanamāsthitaḥ | yāyātenāpi vayasā rājyaṃ pūrurakārayat

पूरु की अवस्था पाकर राजा युवावस्था में आ गए, और ययाति की अवस्था लेकर पूरु ने राज्य चलाया।

श्लोक 50 (1.69.50)

ततो वर्षसहस्राणि ययातिरपराजितः । स्थितः स नृपशार्दूलः शार्दूलसमविक्रमः ॥

tato varṣasahasrāṇi yayātiraparājitaḥ | sthitaḥ sa nṛpaśārdūlaḥ śārdūlasamavikramaḥ

तब हजारों वर्षों तक अपराजित ययाति उसी अवस्था में रहे — राजाओं में सिंह के समान, बाघ जैसे पराक्रमी।

श्लोक 51 (1.69.51)

ययातिरपि पत्नीभ्यां दीर्घकालं विहृत्य च । विश्वाच्या सहितो रेमे पुनश्चैत्ररथे वने ॥

yayātirapi patnībhyāṃ dīrghakālaṃ vihṛtya ca | viśvācyā sahito reme punaścaitrarathe vane

ययाति ने अपनी दोनों पत्नियों के साथ दीर्घकाल तक विहार किया, और फिर चैत्ररथ वन में विश्वाची के साथ रमण किया।

श्लोक 52 (1.69.52)

नाध्यगच्छत्तदा तृप्तिं कामानां स महायशाः । अवेत्य मनसा राजन्निमां गाथां तदा जगौ ॥

nādhyagacchattadā tṛptiṃ kāmānāṃ sa mahāyaśāḥ | avetya manasā rājannimāṃ gāthāṃ tadā jagau

फिर भी उन महायशस्वी राजा को भोगों से तृप्ति नहीं मिली। हे राजन्, मन में यह समझकर उन्होंने तब यह गाथा गाई:

ययातिरुवाच

श्लोक 53 (1.69.53)

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥

na jātu kāmaḥ kāmānāmupabhogena śāmyati | haviṣā kṛṣṇavartmeva bhūya evābhivardhate

कामनाओं के उपभोग से काम कभी शान्त नहीं होता; हवि डालने से अग्नि की भाँति वह और भी बढ़ता जाता है।

श्लोक 54 (1.69.54)

यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः । नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् ॥

yatpṛthivyāṃ vrīhiyavaṃ hiraṇyaṃ paśavaḥ striyaḥ | nālamekasya tatsarvamiti matvā śamaṃ vrajet

पृथ्वी पर जितना धान और जौ, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब मिलकर भी एक व्यक्ति के लिए पर्याप्त नहीं हैं — यह मानकर मनुष्य को शान्ति का मार्ग अपनाना चाहिए।

श्लोक 55 (1.69.55)

यदा न कुरुते पापं सर्वभूतेषु कर्हिचित् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म संपद्यते तदा ॥

yadā na kurute pāpaṃ sarvabhūteṣu karhicit | karmaṇā manasā vācā brahma saṃpadyate tadā

जब मनुष्य कर्म, मन और वाणी से कभी किसी भी प्राणी के प्रति पाप नहीं करता, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।

श्लोक 56 (1.69.56)

न बिभेति यदा चायं यदा चास्मान्न बिभ्यति । यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म संपद्यते तदा ॥

na bibheti yadā cāyaṃ yadā cāsmānna bibhyati | yadā necchati na dveṣṭi brahma saṃpadyate tadā

जब वह किसी से नहीं डरता और उससे कोई नहीं डरता, जब वह न इच्छा करता है न द्वेष, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 57 (1.69.57)

इत्यवेक्ष्य महाप्राज्ञः कामानां फल्गुतां नृप । समाधाय मनो बुद्ध्या प्रत्यगृह्णाज्जरां सुतात् ॥

ityavekṣya mahāprājñaḥ kāmānāṃ phalgutāṃ nṛpa | samādhāya mano buddhyā pratyagṛhṇājjarāṃ sutāt

हे राजन्, इस प्रकार भोगों की निस्सारता देखकर उन परम बुद्धिमान राजा ने बुद्धि से मन को स्थिर किया और पुत्र से अपनी वृद्धावस्था वापस ले ली।

श्लोक 58 (1.69.58)

ततो वर्षसहस्रान्ते ययातिरपराजितः । दत्त्वा च यौवनं राजा पूरुं राज्येऽभिषिच्य च । अतृप्त एव कामानां पूरुं पुत्रमुवाच ह ॥

tato varṣasahasrānte yayātiraparājitaḥ | dattvā ca yauvanaṃ rājā pūruṃ rājye'bhiṣicya ca | atṛpta eva kāmānāṃ pūruṃ putramuvāca ha

तब एक हजार वर्ष पूरे होने पर अपराजित राजा ययाति ने यौवन लौटा दिया, पूरु का राज्याभिषेक किया, और भोगों से अतृप्त रहते हुए ही अपने पुत्र पूरु से कहा:

ययातिरुवाच

श्लोक 59 (1.69.59)

त्वया दायादवानस्मि त्वं मे वंशकरः सुतः । पौरवो वंश इति ते ख्यातिं लोके गमिष्यति ॥

tvayā dāyādavānasmi tvaṃ me vaṃśakaraḥ sutaḥ | pauravo vaṃśa iti te khyātiṃ loke gamiṣyati

तुम्हारे कारण मैं उत्तराधिकारी वाला हुआ हूँ; तुम ही मेरा वंश चलाने वाले पुत्र हो। यह वंश संसार में तुम्हारे नाम से 'पौरव वंश' के रूप में प्रसिद्ध होगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 60 (1.69.60)

ततः स नृपशार्दूल पूरुं राज्येऽभिषिच्य च । ततः सुचरितं कृत्वा भृगुतुङ्गे महातपाः ॥

tataḥ sa nṛpaśārdūla pūruṃ rājye'bhiṣicya ca | tataḥ sucaritaṃ kṛtvā bhṛgutuṅge mahātapāḥ

हे नृपश्रेष्ठ, तब पूरु का राज्याभिषेक करके उन महातपस्वी ने भृगुतुंग पर्वत पर उत्तम आचरण करते हुए तप किया,

श्लोक 61 (1.69.61)

कालेन महता पश्चात्कालधर्ममुपेयिवान् । कारयित्वा त्वनशनं सदारः स्वर्गमाप्तवान् ॥

kālena mahatā paścātkāladharmamupeyivān | kārayitvā tvanaśanaṃ sadāraḥ svargamāptavān

और बहुत समय के बाद काल-धर्म को प्राप्त हुए, अर्थात् उनका देहान्त हुआ। अनशन व्रत पूरा करके वे अपनी पत्नियों सहित स्वर्ग गए।

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