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आदि पर्व · अध्याय 70

कच को संजीवनी विद्या की प्राप्ति

जनमेजय पूछते हैं कि ययाति ने शुक्र की पुत्री को कैसे पाया। वैशम्पायन देवासुर-संग्राम से कथा आरम्भ करते हैं: असुरों के पुरोहित शुक्र अपनी संजीवनी विद्या से मरे हुए असुरों को जीवित कर देते हैं, पर बृहस्पति ऐसा नहीं कर पाते; इसलिए देवता बृहस्पति के पुत्र कच को शुक्र का शिष्य बनने और उनकी पुत्री देवयानी का स्नेह पाने भेजते हैं। दानव कच को तीन बार मारते हैं; दो बार देवयानी के आग्रह पर शुक्र उन्हें जीवित कर देते हैं, और तीसरी बार दानव उनकी भस्म मदिरा में मिलाकर शुक्र को ही पिला देते हैं। गुरु के उदर में विद्या सीखकर कच बाहर निकलते हैं और शुक्र को जीवित करते हैं; तब शुक्र ब्राह्मणों के लिए मदिरापान का निषेध करते हैं। हजार वर्ष सेवा करने के बाद कच देवलोक लौटने की तैयारी करते हैं।

अध्याय 69अध्याय-सूचीअध्याय 71

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (1.70.1)

ययातिः पूर्वजोऽस्माकं दशमो यः प्रजापतेः । कथं स शुक्रतनयां लेभे परमदुर्लभाम् ॥

yayātiḥ pūrvajo'smākaṃ daśamo yaḥ prajāpateḥ | kathaṃ sa śukratanayāṃ lebhe paramadurlabhām

हमारे पूर्वज ययाति प्रजापति से दसवीं पीढ़ी में थे। उन्होंने शुक्र की पुत्री को, जिसे पाना अत्यन्त दुर्लभ था, कैसे प्राप्त किया?

श्लोक 2 (1.70.2)

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन । आनुपूर्व्या च मे शंस राज्ञो वंशकरान्पृथक् ॥

etadicchāmyahaṃ śrotuṃ vistareṇa tapodhana | ānupūrvyā ca me śaṃsa rājño vaṃśakarānpṛthak

हे तपोधन, मैं यह विस्तार से सुनना चाहता हूँ; और मुझे क्रम से उन राजाओं का भी अलग-अलग वर्णन कीजिए जिन्होंने वंश को आगे बढ़ाया।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (1.70.3)

ययातिरासीन्नृपतिर्देवराजसमद्युतिः । तं शुक्रवृषपर्वाणौ वव्राते वै यथा पुरा ॥

yayātirāsīnnṛpatirdevarājasamadyutiḥ | taṃ śukravṛṣaparvāṇau vavrāte vai yathā purā

ययाति देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी राजा थे। पूर्वकाल में शुक्र और वृषपर्वा दोनों ने उन्हें अपना जामाता चुना था।

श्लोक 4 (1.70.4)

तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि पृच्छते जनमेजय । देवयान्याश्च संयोगं ययातेर्नाहुषस्य च ॥

tatte'haṃ saṃpravakṣyāmi pṛcchate janamejaya | devayānyāśca saṃyogaṃ yayāternāhuṣasya ca

हे जनमेजय, तुम पूछ रहे हो, इसलिए मैं तुम्हें देवयानी और नहुषपुत्र ययाति के संयोग का वृत्तान्त सुनाऊँगा।

श्लोक 5 (1.70.5)

सुराणामसुराणां च समजायत वै मिथः । ऐश्वर्यं प्रति संघर्षस्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥

surāṇāmasurāṇāṃ ca samajāyata vai mithaḥ | aiśvaryaṃ prati saṃgharṣastrailokye sacarācare

देवताओं और असुरों में चराचर सहित तीनों लोकों के ऐश्वर्य के लिए परस्पर संघर्ष छिड़ गया।

श्लोक 6 (1.70.6)

जिगीषया ततो देवा वव्रिरेऽङ्गिरसं मुनिम् । पौरोहित्येन याज्यार्थे काव्यं तूशनसं परे ॥

jigīṣayā tato devā vavrire'ṅgirasaṃ munim | paurohityena yājyārthe kāvyaṃ tūśanasaṃ pare

तब विजय की इच्छा से देवताओं ने यज्ञ कराने के लिए अंगिरा के वंशज मुनि (बृहस्पति) को पुरोहित चुना, और दूसरों ने कवि-पुत्र उशना को।

श्लोक 7 (1.70.7)

ब्राह्मणौ तावुभौ नित्यमन्योन्यस्पर्धिनौ भृशम् । तत्र देवा निजघ्नुर्यान्दानवान्युधि संगतान् ॥

brāhmaṇau tāvubhau nityamanyonyaspardhinau bhṛśam | tatra devā nijaghnuryāndānavānyudhi saṃgatān

वे दोनों ब्राह्मण सदा एक-दूसरे से तीव्र स्पर्धा रखते थे। युद्ध में भिड़े जिन दानवों को देवता मार डालते,

श्लोक 8 (1.70.8)

तान्पुनर्जीवयामास काव्यो विद्याबलाश्रयात् । ततस्ते पुनरुत्थाय योधयांचक्रिरे सुरान् ॥

tānpunarjīvayāmāsa kāvyo vidyābalāśrayāt | tataste punarutthāya yodhayāṃcakrire surān

उन्हें काव्य अपनी विद्या के बल से फिर जीवित कर देते; और वे फिर उठकर देवताओं से युद्ध करने लगते।

श्लोक 9 (1.70.9)

असुरास्तु निजघ्नुर्यान्सुरान्समरमूर्धनि । न तान्सञ्जीवयामास बृहस्पतिरुदारधीः ॥

asurāstu nijaghnuryānsurānsamaramūrdhani | na tānsañjīvayāmāsa bṛhaspatirudāradhīḥ

किन्तु युद्ध के मोर्चे पर असुर जिन देवताओं को मार डालते, उन्हें उदारबुद्धि बृहस्पति जीवित नहीं कर पाते थे।

श्लोक 10 (1.70.10)

न हि वेद स तां विद्यां यां काव्यो वेत्ति वीर्यवान् । सञ्जीविनीं ततो देवा विषादमगमन्परम् ॥

na hi veda sa tāṃ vidyāṃ yāṃ kāvyo vetti vīryavān | sañjīvinīṃ tato devā viṣādamagamanparam

क्योंकि जो संजीवनी विद्या पराक्रमी काव्य जानते थे, उसे बृहस्पति नहीं जानते थे। इससे देवता अत्यन्त विषाद में पड़ गए।

श्लोक 11 (1.70.11)

ते तु देवा भयोद्विग्नाः काव्यादुशनसस्तदा । ऊचुः कचमुपागम्य ज्येष्ठं पुत्रं बृहस्पतेः ॥

te tu devā bhayodvignāḥ kāvyāduśanasastadā | ūcuḥ kacamupāgamya jyeṣṭhaṃ putraṃ bṛhaspateḥ

तब काव्य उशना के भय से व्याकुल देवता बृहस्पति के ज्येष्ठ पुत्र कच के पास जाकर बोले:

देवा ऊचुः

श्लोक 12 (1.70.12)

भजमानान्भजस्वास्मान्कुरु नः साह्यमुत्तमम् । या सा विद्या निवसति ब्राह्मणेऽमिततेजसि ॥

bhajamānānbhajasvāsmānkuru naḥ sāhyamuttamam | yā sā vidyā nivasati brāhmaṇe'mitatejasi

हम तुम्हारे प्रति अनुरक्त हैं; तुम भी हमें अपनाओ और हमारी उत्तम सहायता करो। जो विद्या उस अमित तेजस्वी ब्राह्मण

श्लोक 13 (1.70.13)

शुक्रे तामाहर क्षिप्रं भागभाङ्नो भविष्यसि । वृषपर्वसमीपे हि शक्यो द्रष्टुं त्वया द्विजः ॥

śukre tāmāhara kṣipraṃ bhāgabhāṅno bhaviṣyasi | vṛṣaparvasamīpe hi śakyo draṣṭuṃ tvayā dvijaḥ

शुक्र में निवास करती है, उसे शीघ्र ले आओ; तुम हमारे भाग के भागी बनोगे। वह ब्राह्मण तुम्हें वृषपर्वा के पास मिल सकते हैं।

श्लोक 14 (1.70.14)

रक्षते दानवांस्तत्र न स रक्षत्यदानवान् । तमाराधयितुं शक्तो भवान्पूर्ववयाः कविम् ॥

rakṣate dānavāṃstatra na sa rakṣatyadānavān | tamārādhayituṃ śakto bhavānpūrvavayāḥ kavim

वहाँ वे दानवों की रक्षा करते हैं, जो दानव नहीं हैं उनकी नहीं। तुम युवा हो और उन कवि को प्रसन्न करने में समर्थ हो,

श्लोक 15 (1.70.15)

देवयानीं च दयितां सुतां तस्य महात्मनः । त्वमाराधयितुं शक्तो नान्यः कश्चन विद्यते ॥

devayānīṃ ca dayitāṃ sutāṃ tasya mahātmanaḥ | tvamārādhayituṃ śakto nānyaḥ kaścana vidyate

और उन महात्मा की प्रिय पुत्री देवयानी को भी। तुम ही उसे प्रसन्न कर सकते हो, दूसरा कोई नहीं —

श्लोक 16 (1.70.16)

शीलदाक्षिण्यमाधुर्यैराचारेण दमेन च । देवयान्यां हि तुष्टायां विद्यां तां प्राप्स्यसि ध्रुवम् ॥

śīladākṣiṇyamādhuryairācāreṇa damena ca | devayānyāṃ hi tuṣṭāyāṃ vidyāṃ tāṃ prāpsyasi dhruvam

अपने शील, उदारता, माधुर्य, आचरण और संयम से। देवयानी के प्रसन्न होने पर तुम निश्चय ही वह विद्या पा लोगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 17 (1.70.17)

तथेत्युक्त्वा ततः प्रायाद्बृहस्पतिसुतः कचः । तदाऽभिपूजितो देवैः समीपे वृषपर्वणः ॥

tathetyuktvā tataḥ prāyādbṛhaspatisutaḥ kacaḥ | tadā'bhipūjito devaiḥ samīpe vṛṣaparvaṇaḥ

"ऐसा ही हो" कहकर बृहस्पतिपुत्र कच, देवताओं से सम्मानित होकर, वृषपर्वा के पास चल पड़े।

श्लोक 18 (1.70.18)

स गत्वा त्वरितो राजन्देवैः संप्रेषितः कचः । असुरेन्द्रपुरे शुक्रं दृष्ट्वा वाक्यमुवाच ह ॥

sa gatvā tvarito rājandevaiḥ saṃpreṣitaḥ kacaḥ | asurendrapure śukraṃ dṛṣṭvā vākyamuvāca ha

हे राजन्, देवताओं के भेजे हुए कच शीघ्रता से गए और असुरराज के नगर में शुक्र को देखकर यह वचन बोले:

कच उवाच

श्लोक 19 (1.70.19)

ऋषेरङ्गिरसः पौत्रं पुत्रं साक्षाद्बृहस्पतेः । नाम्ना कच इति ख्यातं शिष्यं गृह्णातु मां भवान् ॥

ṛṣeraṅgirasaḥ pautraṃ putraṃ sākṣādbṛhaspateḥ | nāmnā kaca iti khyātaṃ śiṣyaṃ gṛhṇātu māṃ bhavān

मैं ऋषि अंगिरा का पौत्र और साक्षात् बृहस्पति का पुत्र हूँ, कच नाम से प्रसिद्ध। आप मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार करें।

श्लोक 20 (1.70.20)

ब्रह्मचर्यं चरिष्यामि त्वय्यहं परमं गुरौ । अनुमन्यस्व मां ब्रह्मन्सहस्रं परिवत्सरान् ॥

brahmacaryaṃ cariṣyāmi tvayyahaṃ paramaṃ gurau | anumanyasva māṃ brahmansahasraṃ parivatsarān

आपको गुरु मानकर मैं एक हजार वर्षों तक परम ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा। हे ब्रह्मन्, मुझे अनुमति दीजिए।

शुक्र उवाच

श्लोक 21 (1.70.21)

कच सुस्वागतं तेऽस्तु प्रतिगृह्णामि ते वचः । अर्चयिष्येऽहमर्च्यं त्वामर्चितोऽस्तु बृहस्पतिः ॥

kaca susvāgataṃ te'stu pratigṛhṇāmi te vacaḥ | arcayiṣye'hamarcyaṃ tvāmarcito'stu bṛhaspatiḥ

कच, तुम्हारा भली-भाँति स्वागत है; मैं तुम्हारी बात स्वीकार करता हूँ। तुम आदर के योग्य हो, मैं तुम्हारा आदर करूँगा; इससे बृहस्पति का भी आदर होगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 22 (1.70.22)

कचस्तु तं तथेत्युक्त्वा प्रतिजग्राह तद्व्रतम् । आदिष्टं कविपुत्रेण शुक्रेणोशनसा स्वयम् ॥

kacastu taṃ tathetyuktvā pratijagrāha tadvratam | ādiṣṭaṃ kaviputreṇa śukreṇośanasā svayam

कच ने "ऐसा ही हो" कहकर वह व्रत ग्रहण किया, जिसका आदेश कविपुत्र शुक्र उशना ने स्वयं दिया था।

श्लोक 23 (1.70.23)

व्रतस्य प्राप्तकालं स यथोक्तं प्रत्यगृह्णत । आराधयन्नुपाध्यायं देवयानीं च भारत ॥

vratasya prāptakālaṃ sa yathoktaṃ pratyagṛhṇata | ārādhayannupādhyāyaṃ devayānīṃ ca bhārata

हे भारत, समय आने पर उन्होंने बताए अनुसार व्रत ग्रहण किया और अपने गुरु तथा देवयानी दोनों की सेवा करने लगे।

श्लोक 24 (1.70.24)

नित्यमाराधयिष्यंस्तां युवा यौवनगां मुनिः । गायन्नृत्यन्वादयंश्च देवयानीमतोषयत् ॥

nityamārādhayiṣyaṃstāṃ yuvā yauvanagāṃ muniḥ | gāyannṛtyanvādayaṃśca devayānīmatoṣayat

उसे सदा प्रसन्न रखने की इच्छा से युवा मुनि गाकर, नाचकर और वाद्य बजाकर युवावस्था को प्राप्त देवयानी को संतुष्ट करते थे।

श्लोक 25 (1.70.25)

स शीलयन्देवयानीं कन्यां संप्राप्तयौवनाम् । पुष्पैः फलैः प्रेषणैश्च तोषयामास भारत ॥

sa śīlayandevayānīṃ kanyāṃ saṃprāptayauvanām | puṣpaiḥ phalaiḥ preṣaṇaiśca toṣayāmāsa bhārata

हे भारत, युवावस्था को प्राप्त कन्या देवयानी की सेवा करते हुए वे फूलों, फलों और उसके काम करके उसे प्रसन्न रखते थे।

श्लोक 26 (1.70.26)

देवयान्यपि तं विप्रं नियमव्रतधारिणम् । गायन्ती च ललन्ती च रहः पर्यचरत्तथा ॥

devayānyapi taṃ vipraṃ niyamavratadhāriṇam | gāyantī ca lalantī ca rahaḥ paryacarattathā

देवयानी भी गाती और क्रीड़ा करती हुई, नियम और व्रत का पालन करने वाले उस ब्राह्मण की एकान्त में सेवा करती थी।

श्लोक 27 (1.70.27)

गायन्तं चैव शुक्लं च दातारं प्रियवादिनम् । नार्यो नरं कामयन्ते रूपिणं स्रग्विणं तथा ॥

gāyantaṃ caiva śuklaṃ ca dātāraṃ priyavādinam | nāryo naraṃ kāmayante rūpiṇaṃ sragviṇaṃ tathā

स्त्रियाँ उस पुरुष को चाहती हैं जो गाता हो, उज्ज्वल हो, उदार हो, मधुर बोलता हो, रूपवान हो और माला धारण करता हो।

श्लोक 28 (1.70.28)

पञ्चवर्षशतान्येवं कचस्य चरतो व्रतम् । तत्रातीयुरथो बुद्ध्वा दानवास्तं ततः कचम् ॥

pañcavarṣaśatānyevaṃ kacasya carato vratam | tatrātīyuratho buddhvā dānavāstaṃ tataḥ kacam

इस प्रकार व्रत का पालन करते हुए कच के पाँच सौ वर्ष बीत गए। तब दानवों को कच के बारे में पता चल गया।

श्लोक 29 (1.70.29)

गा रक्षन्तं वने दृष्ट्वा रहस्येकममर्षिताः । जघ्नुर्बृहस्पतेर्द्वेषाद्विद्यारक्षार्थमेव च ॥

gā rakṣantaṃ vane dṛṣṭvā rahasyekamamarṣitāḥ | jaghnurbṛhaspaterdveṣādvidyārakṣārthameva ca

उन्हें वन में एकान्त में अकेले गायें चराते देखकर क्रोधित दानवों ने बृहस्पति से द्वेष के कारण और विद्या की रक्षा के लिए उनका वध कर दिया।

श्लोक 30 (1.70.30)

हत्वा शालावृकेभ्यश्च प्रायच्छँल्लवशः कृतम् । ततो गावो निवृत्तास्ता अगोपाः स्वं निवेशनम् ॥

hatvā śālāvṛkebhyaśca prāyaccham̐llavaśaḥ kṛtam | tato gāvo nivṛttāstā agopāḥ svaṃ niveśanam

मारकर उन्होंने उनके छोटे-छोटे टुकड़े किए और गीदड़ों को दे दिए। तब गायें बिना चरवाहे के अपने घर लौट आईं।

श्लोक 31 (1.70.31)

सा दृष्ट्वा रहिता गाश्च कचेनाभ्यागता वनात् । उवाच वचनं काले देवयान्यथ भारत ॥

sā dṛṣṭvā rahitā gāśca kacenābhyāgatā vanāt | uvāca vacanaṃ kāle devayānyatha bhārata

हे भारत, गायों को कच के बिना वन से लौटी देखकर देवयानी ने उस समय (अपने पिता से) यह बात कही:

देवयान्युवाच

श्लोक 32 (1.70.32)

आहुतं चाग्निहोत्रं ते सूर्यश्चास्तं गतः प्रभो । अगोपाश्चागता गावः कचस्तात न दृश्यते ॥

āhutaṃ cāgnihotraṃ te sūryaścāstaṃ gataḥ prabho | agopāścāgatā gāvaḥ kacastāta na dṛśyate

प्रभो, आपका अग्निहोत्र हो चुका है और सूर्य भी अस्त हो गया है। गायें बिना रखवाले के लौट आई हैं, पर पिताजी, कच कहीं दिखाई नहीं देते।

श्लोक 33 (1.70.33)

व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति । तं विना न च जीवेयमिति सत्यं ब्रवीमि ते ॥

vyaktaṃ hato mṛto vāpi kacastāta bhaviṣyati | taṃ vinā na ca jīveyamiti satyaṃ bravīmi te

पिताजी, निश्चय ही कच मारे गए हैं या मर गए हैं। उनके बिना मैं जीवित नहीं रह सकती — यह मैं आपसे सच कहती हूँ।

शुक्र उवाच

श्लोक 34 (1.70.34)

अयमेहीति संशब्द्य मृतं संजीवयाम्यहम् ॥

ayamehīti saṃśabdya mṛtaṃ saṃjīvayāmyaham

मैं 'यहाँ आओ' कहकर पुकारूँगा और उस मृत को फिर जीवित कर दूँगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 35 (1.70.35)

ततः संजीविनीं विद्यां प्रयुज्य कचमाह्वयत् ॥

tataḥ saṃjīvinīṃ vidyāṃ prayujya kacamāhvayat

तब उन्होंने संजीवनी विद्या का प्रयोग करके कच को पुकारा।

श्लोक 36 (1.70.36)

भित्त्वा भित्त्वा शरीराणि वृकाणां स विनिर्गतः । आहूतः प्रादुरभवत्कचो हृष्टोऽथ विद्यया ॥

bhittvā bhittvā śarīrāṇi vṛkāṇāṃ sa vinirgataḥ | āhūtaḥ prādurabhavatkaco hṛṣṭo'tha vidyayā

गीदड़ों के शरीरों को फाड़-फाड़कर, विद्या के बल से पुकारे गए कच प्रसन्न होकर प्रकट हो गए।

श्लोक 37 (1.70.37)

कस्माच्चिरायितोऽसीति पृष्टस्तामाह भार्गवीम् ॥

kasmāccirāyito'sīti pṛṣṭastāmāha bhārgavīm

"तुम्हें इतनी देर क्यों हुई?" — ऐसा पूछे जाने पर उन्होंने भृगुवंश की उस कन्या से कहा:

कच उवाच

श्लोक 38 (1.70.38)

समिधश्च कुशादीनि काष्ठभारं च भामिनि ॥

samidhaśca kuśādīni kāṣṭhabhāraṃ ca bhāmini

हे भामिनि, समिधाएँ, कुश आदि और लकड़ियों का गट्ठर

श्लोक 39 (1.70.39)

गृहीत्वा श्रमभारार्तो वटवृक्षं समाश्रितः । गावश्च सहिताः सर्वा वृक्षच्छायामुपाश्रिताः ॥

gṛhītvā śramabhārārto vaṭavṛkṣaṃ samāśritaḥ | gāvaśca sahitāḥ sarvā vṛkṣacchāyāmupāśritāḥ

लेकर, भार के श्रम से थका हुआ मैं एक वटवृक्ष के नीचे ठहर गया; और सब गायें भी साथ मिलकर वृक्ष की छाया में आ बैठीं।

श्लोक 40 (1.70.40)

असुरास्तत्र मां दृष्ट्वा कस्त्वमित्यभ्यचोदयन् । बृहस्पतिसुतश्चाहं कच इत्यभिविश्रुतः ॥

asurāstatra māṃ dṛṣṭvā kastvamityabhyacodayan | bṛhaspatisutaścāhaṃ kaca ityabhiviśrutaḥ

वहाँ असुरों ने मुझे देखकर पूछा, "तुम कौन हो?" मैंने कहा, "मैं बृहस्पति का पुत्र हूँ, कच नाम से प्रसिद्ध।"

श्लोक 41 (1.70.41)

इत्युक्तमात्रे मां हत्वा पेषीकृत्वा तु दानवाः । दत्त्वा शालावृकेभ्यस्तु सुखं जग्मुः स्वमालयं ॥

ityuktamātre māṃ hatvā peṣīkṛtvā tu dānavāḥ | dattvā śālāvṛkebhyastu sukhaṃ jagmuḥ svamālayaṃ

मेरे इतना कहते ही दानवों ने मुझे मार डाला, पीसकर लुगदी बना दिया, गीदड़ों को दे दिया और सुख से अपने घर चले गए।

श्लोक 42 (1.70.42)

आहूतो विद्यया भद्रे भार्गवेण महात्मना । त्वत्समीपमिहायातः कथंचित्प्राप्तजीवितः ॥

āhūto vidyayā bhadre bhārgaveṇa mahātmanā | tvatsamīpamihāyātaḥ kathaṃcitprāptajīvitaḥ

हे भद्रे, भृगुवंशी महात्मा ने अपनी विद्या से मुझे पुकारा, और किसी प्रकार फिर से जीवन पाकर मैं यहाँ तुम्हारे पास आया हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 43 (1.70.43)

हतोऽहमिति चाचख्यौ पृष्टो ब्राह्मणकन्यया । स पुनर्देवयान्योक्तः पुष्पाण्याहर मे द्विज ॥

hato'hamiti cācakhyau pṛṣṭo brāhmaṇakanyayā | sa punardevayānyoktaḥ puṣpāṇyāhara me dvija

ब्राह्मण-कन्या के पूछने पर उन्होंने बताया, "मुझे मार डाला गया था।" फिर एक बार देवयानी ने उनसे कहा, "हे द्विज, मेरे लिए फूल ले आओ।"

श्लोक 44 (1.70.44)

वनं ययौ कचो विप्रो ददृशुर्दानवाश्च तम् । पुनस्तं पेषयित्वा तु समुद्राम्भस्यमिश्रयन् ॥

vanaṃ yayau kaco vipro dadṛśurdānavāśca tam | punastaṃ peṣayitvā tu samudrāmbhasyamiśrayan

ब्राह्मण कच वन को गए, और दानवों ने उन्हें देख लिया। उन्होंने फिर उन्हें पीसकर समुद्र के जल में मिला दिया।

श्लोक 45 (1.70.45)

चिरं गतं पुनः कन्या पित्रे तं संन्यवेदयत् । विप्रेण पुनराहूतो विद्यया गुरुदेहजः । पुनरावृत्य तद्वृत्तं न्यवेदयत तद्यथा ॥

ciraṃ gataṃ punaḥ kanyā pitre taṃ saṃnyavedayat | vipreṇa punarāhūto vidyayā gurudehajaḥ | punarāvṛtya tadvṛttaṃ nyavedayata tadyathā

बहुत देर हो जाने पर कन्या ने फिर पिता को बताया। ब्राह्मण ने विद्या से गुरुपुत्र कच को फिर पुकारा, और उन्होंने लौटकर जो कुछ हुआ था, ज्यों का त्यों बता दिया।

श्लोक 46 (1.70.46)

ततस्तृतीयं हत्वा तं दग्ध्वा कृत्वा च चूर्णशः । प्रायच्छन्ब्राह्मणायैव सुरायामसुरास्तथा ॥

tatastṛtīyaṃ hatvā taṃ dagdhvā kṛtvā ca cūrṇaśaḥ | prāyacchanbrāhmaṇāyaiva surāyāmasurāstathā

तब तीसरी बार असुरों ने उन्हें मारकर जला दिया, चूर्ण बना दिया और उसे मदिरा में मिलाकर स्वयं उसी ब्राह्मण (शुक्र) को दे दिया।

श्लोक 47 (1.70.47)

अपिबत्सुरया सार्धं कचभस्म भृगूद्वहः । सा सायन्तनवेलायामगोपा गाः समागताः ॥

apibatsurayā sārdhaṃ kacabhasma bhṛgūdvahaḥ | sā sāyantanavelāyāmagopā gāḥ samāgatāḥ

भृगुश्रेष्ठ ने मदिरा के साथ कच की भस्म पी ली। सायंकाल उसने गायों को बिना रखवाले के लौटी हुई देखा।

श्लोक 48 (1.70.48)

देवयानी शङ्कमाना दृष्ट्वा पितरमब्रवीत् । पुष्पाहारः प्रेषणकृत्कचस्तात न दृश्यते ॥

devayānī śaṅkamānā dṛṣṭvā pitaramabravīt | puṣpāhāraḥ preṣaṇakṛtkacastāta na dṛśyate

यह देखकर देवयानी आशंकित हो गई और पिता से बोली — "पिताजी, मेरे लिए फूल लाने वाले और मेरे काम करने वाले कच दिखाई नहीं दे रहे।"

देवयान्युवाच

श्लोक 49 (1.70.49)

व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति । तं विना न च जीवेयं कचं सत्यं ब्रवीमि ते ॥

vyaktaṃ hato mṛto vāpi kacastāta bhaviṣyati | taṃ vinā na ca jīveyaṃ kacaṃ satyaṃ bravīmi te

पिताजी, निश्चय ही कच मारे गए हैं या मर गए हैं। उनके बिना मैं जीवित नहीं रह सकती — कच के विषय में मैं आपसे सच कहती हूँ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 50 (1.70.50)

श्रुत्वा पुत्रीवचः काव्यो मन्त्रेणाहूतवान्कचम् । ज्ञात्वा बहिष्ठमज्ञात्वा स्वकुक्षिस्थं कचं नृप ॥

śrutvā putrīvacaḥ kāvyo mantreṇāhūtavānkacam | jñātvā bahiṣṭhamajñātvā svakukṣisthaṃ kacaṃ nṛpa

हे राजन्, पुत्री की बात सुनकर काव्य ने मन्त्र से कच को पुकारा; वे उन्हें बाहर समझ रहे थे और नहीं जानते थे कि कच उनके अपने ही पेट में हैं।

शुक्र उवाच

श्लोक 51 (1.70.51)

बृहस्पतेः सुतः पुत्रि कचः प्रेतगतिं गतः । विद्यया जीवितोऽप्येवं हन्यते करवाम किम् ॥

bṛhaspateḥ sutaḥ putri kacaḥ pretagatiṃ gataḥ | vidyayā jīvito'pyevaṃ hanyate karavāma kim

बेटी, बृहस्पति का पुत्र कच प्रेतगति को प्राप्त हो गया है। विद्या से जीवित किए जाने पर भी वह इसी प्रकार मार दिया जाता है। हम क्या करें?

श्लोक 52 (1.70.52)

मैवं शुचो मा रुद देवयानि । न त्वादृशी मर्त्यमनुप्रशोचते । यस्यास्तव ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च । सेन्द्रा देवा वसवोऽथाश्विनौ च ॥

maivaṃ śuco mā ruda devayāni | na tvādṛśī martyamanupraśocate | yasyāstava brahma ca brāhmaṇāśca | sendrā devā vasavo'thāśvinau ca

देवयानी, ऐसा शोक मत करो, मत रोओ। तुम जैसी किसी मरणशील के लिए शोक नहीं करती — तुम, जिसके आगे वेद और ब्राह्मण, इन्द्र सहित देवता, वसु और दोनों अश्विनीकुमार,

श्लोक 53 (1.70.53)

सुरद्विषश्चैव जगच्च सर्व- । मुपस्थाने सन्नमन्ति प्रभावात् । अशक्योऽसौ जीवयितुं द्विजातिः । संजीवितो वध्यते चैव भूयः ॥

suradviṣaścaiva jagacca sarva- | mupasthāne sannamanti prabhāvāt | aśakyo'sau jīvayituṃ dvijātiḥ | saṃjīvito vadhyate caiva bhūyaḥ

देवताओं के शत्रु और सारा जगत् मेरे प्रभाव से उपस्थित होकर नतमस्तक होते हैं। उस द्विज को जीवित रख पाना सम्भव नहीं; जीवित किए जाने पर वह फिर मार दिया जाता है।

देवयान्युवाच

श्लोक 54 (1.70.54)

यस्याङ्गिरा वृद्धतमः पितामहो । बृहस्पतिश्चापि पिता तपोनिधिः । ऋषेः पुत्रं तमथो वापि पौत्रं । कथं न शोचेयमहं न रुद्याम् ॥

yasyāṅgirā vṛddhatamaḥ pitāmaho | bṛhaspatiścāpi pitā taponidhiḥ | ṛṣeḥ putraṃ tamatho vāpi pautraṃ | kathaṃ na śoceyamahaṃ na rudyām

जिसके पितामह परम वृद्ध अंगिरा हैं और पिता तप के भण्डार बृहस्पति हैं — ऋषि के उस पुत्र और ऋषि के उस पौत्र के लिए मैं कैसे शोक न करूँ, कैसे न रोऊँ?

श्लोक 55 (1.70.55)

स ब्रह्मचारी च तपोधनश्च । सदोत्थितः कर्मसु चैव दक्षः । कचस्य मार्गं प्रतिपत्स्ये न भोक्ष्ये । प्रियो हि मे तात कचोऽभिरूपः ॥

sa brahmacārī ca tapodhanaśca | sadotthitaḥ karmasu caiva dakṣaḥ | kacasya mārgaṃ pratipatsye na bhokṣye | priyo hi me tāta kaco'bhirūpaḥ

वह ब्रह्मचारी और तपस्वी था, सदा तत्पर और कार्यों में कुशल। मैं कच के ही मार्ग पर जाऊँगी और भोजन नहीं करूँगी; क्योंकि पिताजी, सुन्दर कच मुझे प्रिय है।

शुक्र उवाच

श्लोक 56 (1.70.56)

असंशयं मामसुरा द्विषन्ति । ये मे शिष्यं नागसं सूदयन्ति । अब्राह्मणं कर्तुमिच्छन्ति रौद्रा- । स्ते मां यथा प्रस्तुतं दानवैर्हि । अप्यस्य पापस्य भवेदिहान्तः । कं ब्रह्महत्या न दहेदपीन्द्रम् ॥

asaṃśayaṃ māmasurā dviṣanti | ye me śiṣyaṃ nāgasaṃ sūdayanti | abrāhmaṇaṃ kartumicchanti raudrā- | ste māṃ yathā prastutaṃ dānavairhi | apyasya pāpasya bhavedihāntaḥ | kaṃ brahmahatyā na dahedapīndram

निःसन्देह असुर मुझसे द्वेष करते हैं, जो मेरे निरपराध शिष्य को मार डालते हैं। ये क्रूर मुझे ब्राह्मणत्व से गिराना चाहते हैं, जैसा कि दानवों ने आरम्भ कर ही दिया है। इस पाप का यहीं अन्त हो; ब्रह्महत्या किसे नहीं जला देगी — इन्द्र को भी?

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 57 (1.70.57)

संचोदितो देवयान्या महर्षिः पुनराह्वयत् । संरम्भेणैव काव्यो हि बृहस्पतिसुतं कचम् ॥

saṃcodito devayānyā maharṣiḥ punarāhvayat | saṃrambheṇaiva kāvyo hi bṛhaspatisutaṃ kacam

देवयानी से प्रेरित होकर महर्षि काव्य ने आवेश में आकर बृहस्पतिपुत्र कच को फिर पुकारा।

श्लोक 58 (1.70.58)

कचोऽपि राजन्स महानुभावो । विद्याबलाल्लब्धमतिर्महात्मा । गुरोर्हि भीतो विद्यया चोपहूतः । शनैर्वाक्यं जठरे व्याजहार ॥

kaco'pi rājansa mahānubhāvo | vidyābalāllabdhamatirmahātmā | gurorhi bhīto vidyayā copahūtaḥ | śanairvākyaṃ jaṭhare vyājahāra

हे राजन्, वे महानुभाव महात्मा कच भी, जिन्हें विद्या के बल से बोध प्राप्त हुआ था, विद्या द्वारा बुलाए जाने पर गुरु से डरते हुए उनके उदर के भीतर से धीरे से बोले:

कच उवाच

श्लोक 59 (1.70.59)

प्रसीद भगवन्मह्यं कचोऽहमभिवादये । यथा बहुमतः पुत्रस्तथा मन्यतु मां भवान् ॥

prasīda bhagavanmahyaṃ kaco'hamabhivādaye | yathā bahumataḥ putrastathā manyatu māṃ bhavān

भगवन्, मुझ पर प्रसन्न हों; मैं कच आपको प्रणाम करता हूँ। आप मुझे वैसे ही मानें जैसे अपने अत्यन्त प्रिय पुत्र को मानते हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 60 (1.70.60)

तमब्रवीत्केन पथोपनीत- । स्त्वं चोदरे तिष्ठसि ब्रूहि विप्र । अस्मिन्मुहूर्ते ह्यसुरान्विनाश्य । गच्छामि देवानहमद्य विप्र ॥

tamabravītkena pathopanīta- | stvaṃ codare tiṣṭhasi brūhi vipra | asminmuhūrte hyasurānvināśya | gacchāmi devānahamadya vipra

शुक्र ने उनसे कहा — "हे विप्र, बताओ, किस मार्ग से लाए जाकर तुम मेरे उदर में स्थित हो? हे विप्र, इसी मुहूर्त में असुरों का नाश करके मैं आज ही देवताओं के पास चला जाऊँगा।"

कच उवाच

श्लोक 61 (1.70.61)

तव प्रसादान्न जहाति मां स्मृतिः । स्मरामि सर्वं यच्च यथा च वृत्तम् । नत्वेवं स्यात्तपसः संक्षयो मे । ततः क्लेशं घोरमिमं सहामि ॥

tava prasādānna jahāti māṃ smṛtiḥ | smarāmi sarvaṃ yacca yathā ca vṛttam | natvevaṃ syāttapasaḥ saṃkṣayo me | tataḥ kleśaṃ ghoramimaṃ sahāmi

आपकी कृपा से मेरी स्मृति ने मुझे नहीं छोड़ा है; जो कुछ और जैसे हुआ, वह सब मुझे स्मरण है। मेरे तप का इस प्रकार क्षय न हो, इसीलिए मैं यह घोर कष्ट सह रहा हूँ।

श्लोक 62 (1.70.62)

असुरैः सुरायां भवतोऽस्मि दत्तो । हत्वा दग्ध्वा चूर्णयित्वा च काव्य । ब्राह्मीं मायां चासुरीं विप्र मायां । त्वयि स्थिते कथमेवातिवर्तेत् ॥

asuraiḥ surāyāṃ bhavato'smi datto | hatvā dagdhvā cūrṇayitvā ca kāvya | brāhmīṃ māyāṃ cāsurīṃ vipra māyāṃ | tvayi sthite kathamevātivartet

हे काव्य, असुरों ने मुझे मारकर, जलाकर और चूर्ण बनाकर मदिरा में आपको दे दिया। हे विप्र, आपके रहते ब्राह्मी माया और आसुरी माया का अतिक्रमण कोई कैसे कर सकता है?

शुक्र उवाच

श्लोक 63 (1.70.63)

किं ते प्रियं करवाण्यद्य वत्से । वधेन मे जीवितं स्यात्कचस्य । नान्यत्र कुक्षेर्मम भेदनेन । दृश्येत्कचो मद्गतो देवयानि ॥

kiṃ te priyaṃ karavāṇyadya vatse | vadhena me jīvitaṃ syātkacasya | nānyatra kukṣermama bhedanena | dṛśyetkaco madgato devayāni

बेटी, आज मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? मेरी मृत्यु से ही कच का जीवन सम्भव है। देवयानी, मेरे पेट को फाड़े बिना मेरे भीतर स्थित कच दिखाई नहीं दे सकता।

देवयान्युवाच

श्लोक 64 (1.70.64)

द्वौ मां शोकावग्निकल्पौ दहेतां । कचस्य नाशस्तव चैवोपघातः । कचस्य नाशे मम शर्म नास्ति । तवोपघाते जीवितुं नास्मि शक्ता ॥

dvau māṃ śokāvagnikalpau dahetāṃ | kacasya nāśastava caivopaghātaḥ | kacasya nāśe mama śarma nāsti | tavopaghāte jīvituṃ nāsmi śaktā

अग्नि के समान दो शोक मुझे जला डालेंगे — कच का नाश और आपका विनाश। कच के नष्ट होने पर मुझे शान्ति नहीं, और आपके नष्ट होने पर मैं जीवित नहीं रह सकती।

शुक्र उवाच

श्लोक 65 (1.70.65)

संसिद्धरूपोऽसि बृहस्पतेः सुत । यत्त्वां भक्तं भजते देवयानी । विद्यामिमां प्राप्नुहि जीवनीं त्वं । न चेदिन्द्रः कचरूपी त्वमद्य ॥

saṃsiddharūpo'si bṛhaspateḥ suta | yattvāṃ bhaktaṃ bhajate devayānī | vidyāmimāṃ prāpnuhi jīvanīṃ tvaṃ | na cedindraḥ kacarūpī tvamadya

हे बृहस्पतिपुत्र, तुम सिद्ध हो गए हो, क्योंकि देवयानी अपने भक्त, तुमसे प्रेम करती है। यह संजीवनी विद्या ग्रहण करो — यदि तुम कच के रूप में इन्द्र नहीं हो।

श्लोक 66 (1.70.66)

न निवर्तेत्पुनर्जीवन्कश्चिदन्यो ममोदरात् । ब्राह्मणं वर्जयित्वैकं तस्माद्विद्यामवाप्नुहि ॥

na nivartetpunarjīvankaścidanyo mamodarāt | brāhmaṇaṃ varjayitvaikaṃ tasmādvidyāmavāpnuhi

ब्राह्मण के सिवा कोई दूसरा मेरे उदर से जीवित नहीं लौट सकता। इसलिए यह विद्या प्राप्त करो।

श्लोक 67 (1.70.67)

पुत्रो भूत्वा भावय भावितो मा- । मस्मद्देहादुपनिष्क्रम्य तात । समीक्षेथा धर्मवतीमवेक्षां । गुरोः सकाशात्प्राप्य विद्यां सविद्यः ॥

putro bhūtvā bhāvaya bhāvito mā- | masmaddehādupaniṣkramya tāta | samīkṣethā dharmavatīmavekṣāṃ | guroḥ sakāśātprāpya vidyāṃ savidyaḥ

वत्स, मेरे पुत्र बनकर, मेरे द्वारा जीवित किए गए तुम मेरे शरीर से बाहर निकलकर मुझे जीवित करना। गुरु से विद्या पाकर और विद्यावान् होकर मेरे प्रति धर्मयुक्त दृष्टि रखना।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 68 (1.70.68)

गुरोः सकाशात्समवाप्य विद्यां । भित्त्वा कुक्षिं निर्विचक्राम विप्रः । कचोऽभिरूपस्तत्क्षणाद्ब्राह्मणस्य । शुक्लात्यये पौर्णमास्यामिवेन्दुः ॥

guroḥ sakāśātsamavāpya vidyāṃ | bhittvā kukṣiṃ nirvicakrāma vipraḥ | kaco'bhirūpastatkṣaṇādbrāhmaṇasya | śuklātyaye paurṇamāsyāmivenduḥ

गुरु से विद्या प्राप्त करके ब्राह्मण कच उसी क्षण उनका उदर फाड़कर बाहर निकल आए — सुन्दर, जैसे शुक्लपक्ष के अन्त में पूर्णिमा की रात चन्द्रमा।

श्लोक 69 (1.70.69)

दृष्ट्वा च तं पतितं ब्रह्मराशि- । मुत्थापयामास मृतं कचोऽपि । विद्यां सिद्धां तामवाप्याभिवाद्य । ततः कचस्तं गुरुमित्युवाच ॥

dṛṣṭvā ca taṃ patitaṃ brahmarāśi- | mutthāpayāmāsa mṛtaṃ kaco'pi | vidyāṃ siddhāṃ tāmavāpyābhivādya | tataḥ kacastaṃ gurumityuvāca

और उस ब्रह्मतेज की राशि को मृत पड़ा देखकर कच ने उन्हें भी जीवित करके उठा दिया। वह सिद्ध विद्या पाकर उन्होंने गुरु को प्रणाम किया और तब उनसे यह कहा:

कच उवाच

श्लोक 70 (1.70.70)

यः श्रोत्रयोरमृतं सन्निषिञ्चे- । द्विद्यामविद्यस्य यथा त्वमार्यः । तं मन्येऽहं पितरं मातरं च । तस्मै न द्रुह्येत्कृतमस्य जानन् ॥

yaḥ śrotrayoramṛtaṃ sanniṣiñce- | dvidyāmavidyasya yathā tvamāryaḥ | taṃ manye'haṃ pitaraṃ mātaraṃ ca | tasmai na druhyetkṛtamasya jānan

हे आर्य, जो अज्ञानी के कानों में विद्या रूपी अमृत सींचता है, जैसा आपने किया है, उसे मैं पिता और माता मानता हूँ; उसके उपकार को जानते हुए उससे कभी द्रोह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 71 (1.70.71)

ऋतस्य दातारमनुत्तमस्य । निधिं निधीनामपि लब्धविद्याः । ये नाद्रियन्ते गुरुमर्चनीयं । पापाँल्लोकांस्ते व्रजन्त्यप्रतिष्ठाः ॥

ṛtasya dātāramanuttamasya | nidhiṃ nidhīnāmapi labdhavidyāḥ | ye nādriyante gurumarcanīyaṃ | pāpām̐llokāṃste vrajantyapratiṣṭhāḥ

जो विद्या पाकर भी उस पूजनीय गुरु का आदर नहीं करते, जो परम सत्य का दाता और निधियों की भी निधि है, वे निराश्रित होकर पापियों के लोकों में जाते हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 72 (1.70.72)

सुरापानाद्वञ्चनां प्राप्य विद्वा- । न्संज्ञानाशं चैव महातिघोरम् । दृष्ट्वा कचं चापि तथाभिरूपं । पीतं तदा सुरया मोहितेन ॥

surāpānādvañcanāṃ prāpya vidvā- | nsaṃjñānāśaṃ caiva mahātighoram | dṛṣṭvā kacaṃ cāpi tathābhirūpaṃ | pītaṃ tadā surayā mohitena

विद्वान् शुक्र ने देखा कि मदिरापान के कारण उनके साथ छल हुआ और उनकी चेतना का अत्यन्त भयंकर लोप हुआ, और यह भी कि नशे में मोहित होकर उन्होंने उस सुन्दर कच को मदिरा के साथ पी लिया था।

श्लोक 73 (1.70.73)

समन्युरुत्थाय महानुभाव- । स्तदोशना विप्रहितं चिकीर्षुः । सुरापानं प्रति संजातमन्युः । काव्यः स्वयं वाक्यमिदं जगाद ॥

samanyurutthāya mahānubhāva- | stadośanā viprahitaṃ cikīrṣuḥ | surāpānaṃ prati saṃjātamanyuḥ | kāvyaḥ svayaṃ vākyamidaṃ jagāda

तब वे महानुभाव उशना ब्राह्मणों का हित करने की इच्छा से क्रोध में भरकर उठे; मदिरापान के प्रति रोष से भरे काव्य ने स्वयं ये वचन कहे:

शुक्र उवाच

श्लोक 74 (1.70.74)

यो ब्राह्मणोऽद्यप्रभृतीह कश्चि- । न्मोहात्सुरां पास्यति मन्दबुद्धिः । अपेतधर्मा ब्रह्महा चैव स स्या- । दस्मिंल्लोके गर्हितः स्यात्परे च ॥

yo brāhmaṇo'dyaprabhṛtīha kaści- | nmohātsurāṃ pāsyati mandabuddhiḥ | apetadharmā brahmahā caiva sa syā- | dasmiṃlloke garhitaḥ syātpare ca

आज से जो कोई मन्दबुद्धि ब्राह्मण मोहवश मदिरा पिएगा, वह धर्म से भ्रष्ट और ब्रह्महत्यारा माना जाएगा; वह इस लोक में भी निन्दित होगा और परलोक में भी।

श्लोक 75 (1.70.75)

मया चैतां विप्रधर्मोक्तिसीमां । मर्यादां वै स्थापितां सर्वलोके । सन्तो विप्राः शुश्रुवांसो गुरूणां । देवा लोकाश्चोपशृण्वन्तु सर्वे ॥

mayā caitāṃ vipradharmoktisīmāṃ | maryādāṃ vai sthāpitāṃ sarvaloke | santo viprāḥ śuśruvāṃso gurūṇāṃ | devā lokāścopaśṛṇvantu sarve

ब्राह्मण-धर्म की यह सीमा-रूप मर्यादा मैंने सम्पूर्ण लोक में स्थापित कर दी है। गुरुओं की सेवा करने वाले सज्जन ब्राह्मण, देवता और सब लोक इसे सुन लें।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 76 (1.70.76)

इतीदमुक्त्वा स महानुभाव- । स्तपोनिधीनां निधिरप्रमेयः । तान्दानवान्दैवविमूढबुद्धी- । निदं समाहूय वचोऽभ्युवाच ॥

itīdamuktvā sa mahānubhāva- | staponidhīnāṃ nidhiraprameyaḥ | tāndānavāndaivavimūḍhabuddhī- | nidaṃ samāhūya vaco'bhyuvāca

यह कहकर तपोनिधियों में भी निधि, अप्रमेय, महानुभाव शुक्र ने दैव से मोहित बुद्धि वाले उन दानवों को बुलाया और उनसे यह वचन कहा:

शुक्र उवाच

श्लोक 77 (1.70.77)

आचक्षे वो दानवा बालिशाः स्थ । सिद्धः कचो वत्स्यति मत्सकाशे । सञ्जीविनीं प्राप्य विद्यां महात्मा । तुल्यप्रभावो ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः ॥

ācakṣe vo dānavā bāliśāḥ stha | siddhaḥ kaco vatsyati matsakāśe | sañjīvinīṃ prāpya vidyāṃ mahātmā | tulyaprabhāvo brāhmaṇo brahmabhūtaḥ

दानवो, मैं तुमसे कहता हूँ, तुम मूर्ख हो। कच सिद्ध हो गया है और मेरे पास रहेगा। संजीवनी विद्या पाकर वह महात्मा ब्राह्मण मेरे समान प्रभावशाली और ब्रह्मस्वरूप हो गया है।

श्लोक 78 (1.70.78)

योऽकार्षीद्दुष्करं कर्म देवानां कारणात्कचः । न तत्कीर्तिर्जरां गच्छेद्याज्ञीयश्च भविष्यति ॥

yo'kārṣīdduṣkaraṃ karma devānāṃ kāraṇātkacaḥ | na tatkīrtirjarāṃ gacchedyājñīyaśca bhaviṣyati

जिस कच ने देवताओं के लिए यह दुष्कर कार्य किया, उसकी कीर्ति कभी पुरानी नहीं होगी, और वह यज्ञ में भाग पाने का अधिकारी होगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 79 (1.70.79)

एतावदुक्त्वा वचनं विरराम स भार्गवः । दानवा विस्मयाविष्टाः प्रययुः स्वं निवेशनम् ॥

etāvaduktvā vacanaṃ virarāma sa bhārgavaḥ | dānavā vismayāviṣṭāḥ prayayuḥ svaṃ niveśanam

इतना कहकर भृगुवंशी शुक्र चुप हो गए। दानव आश्चर्य में डूबे अपने-अपने घर चले गए।

श्लोक 80 (1.70.80)

गुरोरुष्य सकाशे तु दश वर्षशतानि सः । अनुज्ञातः कचो गन्तुमियेष त्रिदशालयम् ॥

guroruṣya sakāśe tu daśa varṣaśatāni saḥ | anujñātaḥ kaco gantumiyeṣa tridaśālayam

गुरु के पास एक हजार वर्ष रहने के बाद, उनकी अनुमति पाकर कच ने देवलोक जाने का निश्चय किया।

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