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आदि पर्व · अध्याय 72

शर्मिष्ठा ने देवयानी को कुएँ में गिराया

कच से विद्या पा लेने के बाद देवता इन्द्र से आक्रमण का आग्रह करते हैं; इन्द्र वायु बनकर जल-क्रीडा कर रही कन्याओं के वस्त्र मिला देते हैं, और असुरराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा देवयानी का वस्त्र पहन लेती है। विवाद में शर्मिष्ठा देवयानी को याचक और स्तुति करने वाले की पुत्री कहकर ताना देती है और उसे एक सूखे कुएँ में धकेल देती है। शिकार को निकले राजा ययाति दाहिना हाथ पकड़कर उसे बाहर निकालते हैं; देवयानी उनसे विवाह का प्रस्ताव करती है, पर वे उसके पिता के भय से मना कर देते हैं। धाय घूर्णिका से समाचार पाकर शुक्राचार्य वन में पुत्री को ढूँढ़ते हैं, उसकी व्यथा सुनते हैं और अपनी शक्ति का स्मरण कराते हुए उसे सान्त्वना देते हैं।

अध्याय 71अध्याय-सूचीअध्याय 73

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.72.1)

कृतविद्ये कचे प्राप्ते हृष्टरूपा दिवौकसः । कचादधीत्य तां विद्यां कृतार्था भरतर्षभ ॥

kṛtavidye kace prāpte hṛṣṭarūpā divaukasaḥ | kacādadhītya tāṃ vidyāṃ kṛtārthā bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, जब कच विद्या पूरी करके लौट आया, तब देवता हर्षित हुए; कच से वह विद्या सीखकर वे कृतार्थ हो गए।

श्लोक 2 (1.72.2)

सर्व एव समागम्य शतक्रतुमथाब्रुवन् । कालस्ते विक्रमस्याद्य जहि शत्रून्पुरन्दर ॥

sarva eva samāgamya śatakratumathābruvan | kālaste vikramasyādya jahi śatrūnpurandara

सबने मिलकर शतक्रतु इन्द्र से कहा — "अब तुम्हारे पराक्रम का समय है। हे पुरन्दर, अपने शत्रुओं का संहार करो।"

श्लोक 3 (1.72.3)

एवमुक्तस्तु सहितैस्त्रिदशैर्मघवांस्तदा । तथेत्युक्त्वा प्रचक्राम सोऽपश्यत वने स्त्रियः ॥

evamuktastu sahitaistridaśairmaghavāṃstadā | tathetyuktvā pracakrāma so'paśyata vane striyaḥ

एकत्र देवताओं के ऐसा कहने पर इन्द्र "ऐसा ही हो" कहकर चल पड़े, और उन्होंने एक वन में कुछ स्त्रियों को देखा।

श्लोक 4 (1.72.4)

क्रीडन्तीनां तु कन्यानां वने चैत्ररथोपमे । वायुभूतः स वस्त्राणि सर्वाण्येव व्यमिश्रयत् ॥

krīḍantīnāṃ tu kanyānāṃ vane caitrarathopame | vāyubhūtaḥ sa vastrāṇi sarvāṇyeva vyamiśrayat

वे कन्याएँ चैत्ररथ के समान एक वन में क्रीडा कर रही थीं; इन्द्र ने वायु बनकर उनके सारे वस्त्र आपस में मिला दिए।

श्लोक 5 (1.72.5)

ततो जलात्समुत्तीर्य कन्यास्ताः सहितास्तदा । वस्त्राणि जगृहुस्तानि यथाऽऽसन्नान्यनेकशः ॥

tato jalātsamuttīrya kanyāstāḥ sahitāstadā | vastrāṇi jagṛhustāni yathā''sannānyanekaśaḥ

तब वे सब कन्याएँ एक साथ जल से बाहर निकलीं और जो वस्त्र जिसके निकट पड़ा था, उसने वही उठा लिया।

श्लोक 6 (1.72.6)

तत्र वासो देवयान्याः शर्मिष्ठा जगृहे तदा । व्यतिमिश्रमजानन्ती दुहिता वृषपर्वणः ॥

tatra vāso devayānyāḥ śarmiṣṭhā jagṛhe tadā | vyatimiśramajānantī duhitā vṛṣaparvaṇaḥ

वहाँ वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा ने, वस्त्रों के मिल जाने की बात न जानते हुए, देवयानी का वस्त्र ले लिया।

श्लोक 7 (1.72.7)

ततस्तयोर्मिथस्तत्र विरोधः समजायत । देवयान्याश्च राजेन्द्र शर्मिष्ठायाश्च तत्कृते ॥

tatastayormithastatra virodhaḥ samajāyata | devayānyāśca rājendra śarmiṣṭhāyāśca tatkṛte

हे राजेन्द्र, तब उस बात को लेकर देवयानी और शर्मिष्ठा — दोनों में वहीं परस्पर कलह छिड़ गया।

देवयान्युवाच

श्लोक 8 (1.72.8)

कस्माद्गृह्णासि मे वस्त्रं शिष्या भूत्वा ममासुरि । समुदाचारहीनाया न ते साधु भविष्यति ॥

kasmādgṛhṇāsi me vastraṃ śiṣyā bhūtvā mamāsuri | samudācārahīnāyā na te sādhu bhaviṣyati

"हे असुरकन्या, मेरी शिष्या होकर तुम मेरा वस्त्र क्यों ले रही हो? तुम शिष्टाचार से रहित हो — तुम्हारा भला न होगा।"

शर्मिष्ठोवाच

श्लोक 9 (1.72.9)

आसीनं च शयानं च पिता ते पितरं मम । स्तौतिबन्दीव चाभीक्ष्णं नीचैः स्थित्वा विनीतवत् ॥

āsīnaṃ ca śayānaṃ ca pitā te pitaraṃ mama | stautibandīva cābhīkṣṇaṃ nīcaiḥ sthitvā vinītavat

"मेरे पिता बैठे हों या लेटे हों, तुम्हारे पिता नीचे खड़े होकर विनीत भाव से किसी बन्दीजन की भाँति बार-बार उनकी स्तुति करते हैं।

श्लोक 10 (1.72.10)

याचतस्त्वं हि दुहिता स्तुवतः प्रतिगृह्णतः । सुताहं स्तूयमानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः ॥

yācatastvaṃ hi duhitā stuvataḥ pratigṛhṇataḥ | sutāhaṃ stūyamānasya dadato'pratigṛhṇataḥ

"तुम माँगने वाले, स्तुति करने वाले और दान लेने वाले की बेटी हो; मैं उसकी बेटी हूँ जिसकी स्तुति की जाती है, जो देता है और लेता नहीं।

श्लोक 11 (1.72.11)

आदुन्वस्व विदुन्वस्व द्रुह्य कुप्यस्व याचकि । अनायुधा सायुधाया रिक्ता क्षुभ्यसि भिक्षुकि ॥

ādunvasva vidunvasva druhya kupyasva yācaki | anāyudhā sāyudhāyā riktā kṣubhyasi bhikṣuki

"हे याचिका, जितना चाहो छटपटाओ, तड़पो, द्वेष करो, क्रोध करो! हे भिखारिन, तुम निहत्थी होकर एक सशस्त्र से, खाली हाथ होकर, क्षुब्ध हो रही हो।

श्लोक 12 (1.72.12)

लप्स्यसे प्रतियोद्धारं न हि त्वां गणयाम्यहम् । प्रतिकूलं वदसि चेदितःप्रभृति याचकि ॥

lapsyase pratiyoddhāraṃ na hi tvāṃ gaṇayāmyaham | pratikūlaṃ vadasi ceditaḥprabhṛti yācaki

"तुम्हें टक्कर देने वाला मिल जाएगा; मैं तुम्हें कुछ नहीं गिनती — हे याचिका, यदि अब से तुमने मेरे विरुद्ध कुछ कहा तो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 13 (1.72.13)

समुच्छ्रयं देवयानीं गतां सक्तां च वाससि । शर्मिष्ठा प्राक्षिपत्कूपे ततः स्वपुरमागमत् । हतेयमिति विज्ञाय शर्मिष्ठा पापनिश्चया ॥

samucchrayaṃ devayānīṃ gatāṃ saktāṃ ca vāsasi | śarmiṣṭhā prākṣipatkūpe tataḥ svapuramāgamat | hateyamiti vijñāya śarmiṣṭhā pāpaniścayā

देवयानी क्रोध से उत्तेजित होकर वस्त्र को पकड़े हुए थी; शर्मिष्ठा ने उसे एक कुएँ में फेंक दिया और अपने नगर लौट गई। "यह मर गई" — ऐसा समझकर पापपूर्ण निश्चय वाली शर्मिष्ठा

श्लोक 14 (1.72.14)

अनवेक्ष्य ययौ वेश्म क्रोधवेगपरायणा । प्रविश्य स्वगृहं स्वस्था धर्ममासुरमास्थिता । अथ तं देशमभ्यागाद्ययातिर्नहुषात्मजः ॥

anavekṣya yayau veśma krodhavegaparāyaṇā | praviśya svagṛhaṃ svasthā dharmamāsuramāsthitā | atha taṃ deśamabhyāgādyayātirnahuṣātmajaḥ

क्रोध के आवेग में डूबी, बिना पीछे देखे घर चली गई। अपने घर पहुँचकर वह आसुरी स्वभाव का आश्रय लिए निश्चिन्त बैठ गई। तभी नहुष-पुत्र ययाति उस स्थान पर आ पहुँचे,

श्लोक 15 (1.72.15)

श्रान्तयुग्यः श्रान्तहयो मृगलिप्सुः पिपासितः । स नाहुषः प्रेक्षमाण उदपानं गतोदकम् ॥

śrāntayugyaḥ śrāntahayo mṛgalipsuḥ pipāsitaḥ | sa nāhuṣaḥ prekṣamāṇa udapānaṃ gatodakam

जिनके रथ के पशु और घोड़े थक चुके थे, जो मृगों की खोज में थे और प्यासे थे। जलहीन कुएँ में झाँकते हुए उन नहुष-पुत्र ने

श्लोक 16 (1.72.16)

ददर्श राजा तां तत्र कन्यामग्निशिखामिव । तामपृच्छत्स दृष्ट्वैव कन्याममरवर्णिनीम् ॥

dadarśa rājā tāṃ tatra kanyāmagniśikhāmiva | tāmapṛcchatsa dṛṣṭvaiva kanyāmamaravarṇinīm

राजा ने वहाँ अग्नि-शिखा के समान उस कन्या को देखा। देखते ही उन्होंने उस देवताओं जैसी कान्ति वाली कन्या से पूछा,

श्लोक 17 (1.72.17)

सान्त्वयित्वा नृपश्रेष्ठः साम्ना परमवल्गुना । का त्वं ताम्रनखी श्यामा सुमृष्टमणिकुण्डला ॥

sāntvayitvā nṛpaśreṣṭhaḥ sāmnā paramavalgunā | kā tvaṃ tāmranakhī śyāmā sumṛṣṭamaṇikuṇḍalā

राजश्रेष्ठ ने अत्यन्त मधुर और शान्त वचनों से उसे सान्त्वना देते हुए पूछा — "ताँबे जैसे लाल नखों और चमकते मणि-कुण्डलों वाली हे सुन्दरी, तुम कौन हो?

ययातिरुवाच

श्लोक 18 (1.72.18)

दीर्घं ध्यायसि चात्यर्थं कस्माच्छ्वसिषि चातुरा । कथं च पतिताऽस्यस्मिन्कूपे वीरुत्तृणावृते ॥

dīrghaṃ dhyāyasi cātyarthaṃ kasmācchvasiṣi cāturā | kathaṃ ca patitā'syasminkūpe vīruttṛṇāvṛte

"तुम गहरी चिन्ता में डूबी हो और व्याकुल होकर लम्बी साँसें क्यों ले रही हो? और लताओं-तृणों से ढके इस कुएँ में तुम कैसे गिर पड़ीं?

श्लोक 19 (1.72.19)

दुहिता चैव कस्य त्वं वद सत्यं सुमध्यमे । योऽसौ देवैर्हतान्दैत्यानुत्थापयति विद्यया ॥

duhitā caiva kasya tvaṃ vada satyaṃ sumadhyame | yo'sau devairhatāndaityānutthāpayati vidyayā

"और तुम किसकी पुत्री हो? हे सुमध्यमे, सच-सच बताओ।" देवयानी ने उत्तर दिया — "जो अपनी विद्या से देवताओं द्वारा मारे गए दैत्यों को फिर जीवित कर देते हैं —

देवयान्युवाच

श्लोक 20 (1.72.20)

तस्य शुक्रस्य कन्याहं स मां नूनं न बुध्यते । एष मे दक्षिणो राजन्पाणिस्ताम्रनखाङ्गुलिः ॥

tasya śukrasya kanyāhaṃ sa māṃ nūnaṃ na budhyate | eṣa me dakṣiṇo rājanpāṇistāmranakhāṅguliḥ

"मैं उन्हीं शुक्र की पुत्री हूँ; निश्चय ही उन्हें मेरी दशा का पता नहीं है। हे राजन्, यह रहा मेरा दाहिना हाथ, जिसकी उँगलियाँ और नख ताँबे जैसे लाल हैं।

श्लोक 21 (1.72.21)

समुद्धर गृहीत्वा मां कुलीनस्त्वं हि मे मतः । जानामि हि त्वां संशान्तं वीर्यवन्तं यशस्विनम् ॥

samuddhara gṛhītvā māṃ kulīnastvaṃ hi me mataḥ | jānāmi hi tvāṃ saṃśāntaṃ vīryavantaṃ yaśasvinam

"इसे पकड़कर मुझे बाहर निकालो, क्योंकि मैं तुम्हें कुलीन मानती हूँ। मैं जानती हूँ कि तुम शान्त, पराक्रमी और यशस्वी हो;

श्लोक 22 (1.72.22)

तस्मान्मां पतितामस्मात्कूपादुद्धर्तुमर्हसि । तामथो ब्राह्मणीं कन्यां विज्ञायनहुषात्मजः ॥

tasmānmāṃ patitāmasmātkūpāduddhartumarhasi | tāmatho brāhmaṇīṃ kanyāṃ vijñāyanahuṣātmajaḥ

"इसलिए इस कुएँ में गिरी हुई मुझको तुम्हें बाहर निकालना चाहिए।" तब नहुष-पुत्र ने उसे ब्राह्मण-कन्या जानकर

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (1.72.23)

गृहीत्वा दक्षिणे पाणावुज्जहार ततोऽवटात् । उद्धृत्य चैनां तरसा तस्मात्कूपान्नराधिपः ॥

gṛhītvā dakṣiṇe pāṇāvujjahāra tato'vaṭāt | uddhṛtya caināṃ tarasā tasmātkūpānnarādhipaḥ

उसका दाहिना हाथ पकड़कर उसे गड्ढे से ऊपर खींच लिया। उस कुएँ से उसे शीघ्रता से निकालकर राजा ने

श्लोक 24 (1.72.24)

गच्छ भद्रे यथाकामं न भयं विद्यते तव । इत्युच्यमाना नृपतिं देवयानीदमुत्तरम् ॥

gaccha bhadre yathākāmaṃ na bhayaṃ vidyate tava | ityucyamānā nṛpatiṃ devayānīdamuttaram

कहा — "हे भद्रे, जहाँ चाहो जाओ; तुम्हें कोई भय नहीं है।" यह सुनकर देवयानी ने राजा को यह उत्तर

श्लोक 25 (1.72.25)

उवाच मामुपादाय गच्छ शीघ्रं प्रियो हि मे । गृहीताहं त्वया पाणौ तस्माद्भर्ता भविष्यसि ॥

uvāca māmupādāya gaccha śīghraṃ priyo hi me | gṛhītāhaṃ tvayā pāṇau tasmādbhartā bhaviṣyasi

दिया — "मुझे साथ लेकर शीघ्र चलो, क्योंकि तुम मुझे प्रिय हो। तुमने मेरा हाथ पकड़ा है, इसलिए तुम ही मेरे पति होगे।"

श्लोक 26 (1.72.26)

इत्येवमुक्तो नृपतिराह क्षत्रकुलोद्भवः । त्वं भद्रे ब्राह्मणी तस्मान्मया नार्हसि सङ्गमम् ॥

ityevamukto nṛpatirāha kṣatrakulodbhavaḥ | tvaṃ bhadre brāhmaṇī tasmānmayā nārhasi saṅgamam

ऐसा कहे जाने पर क्षत्रिय-कुल में उत्पन्न राजा बोले — "हे भद्रे, तुम ब्राह्मणी हो, इसलिए मेरे साथ तुम्हारा सम्बन्ध उचित नहीं।

ययातिरुवाच

श्लोक 27 (1.72.27)

सर्वलोकगुरुः काव्यस्त्वं तस्य दुहिता शुभे । तस्मादपि भयं मेऽद्य ततः कल्याणि नार्हसि ॥

sarvalokaguruḥ kāvyastvaṃ tasya duhitā śubhe | tasmādapi bhayaṃ me'dya tataḥ kalyāṇi nārhasi

"काव्य (शुक्र) सारे जगत के गुरु हैं और हे शुभे, तुम उनकी पुत्री हो। मुझे उनसे भी भय है; इसलिए, हे कल्याणी, तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए।"

देवयान्युवाच

श्लोक 28 (1.72.28)

यदि मद्वचनान्नाद्य मां नेच्छसि नराधिप । त्वामेव वरये पित्रा तस्माल्लप्स्यसि गच्छ हि ॥

yadi madvacanānnādya māṃ necchasi narādhipa | tvāmeva varaye pitrā tasmāllapsyasi gaccha hi

"हे नरेश, यदि आज मेरे कहने से तुम मुझे नहीं चाहते, तो मैं अपने पिता के द्वारा तुम्हारा ही वरण करती हूँ; इस प्रकार तुम मुझे पाओगे। अभी जाओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 29 (1.72.29)

आमन्त्रयित्वा सुश्रोणीं ययातिः स्वपुरं ययौ । गते तु नाहुषे तस्मिन्देवयान्यप्यनिन्दिता ॥

āmantrayitvā suśroṇīṃ yayātiḥ svapuraṃ yayau | gate tu nāhuṣe tasmindevayānyapyaninditā

उस सुन्दरी से विदा लेकर ययाति अपने नगर लौट गए। नहुष-पुत्र के चले जाने पर अनिन्द्य देवयानी

श्लोक 30 (1.72.30)

क्वचिद्गत्वा च रुदती वृक्षमाश्रित्य तिष्ठती । ततश्चिरायमाणायां दुहितर्यथ भार्गवः ॥

kvacidgatvā ca rudatī vṛkṣamāśritya tiṣṭhatī | tataścirāyamāṇāyāṃ duhitaryatha bhārgavaḥ

कहीं जाकर एक वृक्ष का सहारा लेकर रोती हुई खड़ी रही। उधर पुत्री के लौटने में देर होने पर भार्गव ने

श्लोक 31 (1.72.31)

संस्मृत्योवाच धात्रीं तां दुहितुः स्नेहविक्लवः । धात्रि त्वमानय क्षिप्रं देवयानीं सुमध्यमाम् ॥

saṃsmṛtyovāca dhātrīṃ tāṃ duhituḥ snehaviklavaḥ | dhātri tvamānaya kṣipraṃ devayānīṃ sumadhyamām

उसका स्मरण करके, पुत्री के स्नेह से व्याकुल होकर धाय से कहा — "धाय, सुन्दर कटि वाली देवयानी को शीघ्र ले आओ।"

श्लोक 32 (1.72.32)

इत्युक्तमात्रे सा धात्री त्वरिताऽऽनयितुं गता । यत्रयत्र सखीभिः सा गता पदममार्गत ॥

ityuktamātre sā dhātrī tvaritā''nayituṃ gatā | yatrayatra sakhībhiḥ sā gatā padamamārgata

इतना कहते ही धाय उसे लाने के लिए तुरन्त चल पड़ी, और जहाँ-जहाँ वह सखियों के साथ गई थी, वहाँ-वहाँ उसके पदचिह्न खोजती रही।

श्लोक 33 (1.72.33)

सा ददर्श तथा दीनां श्रमार्तां रुदतीं स्थिताम् । वृत्तान्तं किमिदं भद्रे शीघ्रं वद पिताह्वयत् ॥

sā dadarśa tathā dīnāṃ śramārtāṃ rudatīṃ sthitām | vṛttāntaṃ kimidaṃ bhadre śīghraṃ vada pitāhvayat

उसने उसे वहाँ दीन, थकान से पीड़ित, खड़ी रोती हुई देखा और कहा — "भद्रे, यह क्या हुआ? शीघ्र बताओ, तुम्हारे पिता ने तुम्हें बुलाया है।"

श्लोक 34 (1.72.34)

एवमुक्ताह धात्रीं तां शर्मिष्ठावृजिनं कृतम् । उवाच शोकसंतप्ता घूर्णिकामागतां पुरः ॥

evamuktāha dhātrīṃ tāṃ śarmiṣṭhāvṛjinaṃ kṛtam | uvāca śokasaṃtaptā ghūrṇikāmāgatāṃ puraḥ

ऐसा पूछे जाने पर उसने धाय को शर्मिष्ठा के किए अपराध की बात बताई, और शोक से सन्तप्त होकर सामने आई घूर्णिका से कहा —

देवयान्युवाच

श्लोक 35 (1.72.35)

त्वरितं घूर्णिके गच्छ शीघ्रमाचक्ष्व मे पितुः ॥

tvaritaṃ ghūrṇike gaccha śīghramācakṣva me pituḥ

"घूर्णिके, तुरन्त जाओ और शीघ्र मेरे पिता से कहो —

श्लोक 36 (1.72.36)

नेदानीं संप्रवेक्ष्यामि नगरं वृषपर्वणः । सा तत्र त्वरितं गत्वा घूर्णिकाऽसुरमन्दिरम् ॥

nedānīṃ saṃpravekṣyāmi nagaraṃ vṛṣaparvaṇaḥ | sā tatra tvaritaṃ gatvā ghūrṇikā'suramandiram

"अब मैं वृषपर्वा के नगर में प्रवेश नहीं करूँगी।" तब घूर्णिका शीघ्रता से असुरराज के भवन में गई,

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 37 (1.72.37)

दृष्ट्वा काव्यमुवाचेदं संभ्रमाविष्टचेतना । आचचक्षे महाप्राज्ञं देवयानीं वने हताम् ॥

dṛṣṭvā kāvyamuvācedaṃ saṃbhramāviṣṭacetanā | ācacakṣe mahāprājñaṃ devayānīṃ vane hatām

और काव्य को देखकर घबराहट से भरे मन से बोली; उसने उन महाप्राज्ञ को बताया कि देवयानी को वन में मार डाला गया है —

श्लोक 38 (1.72.38)

शर्मिष्ठया महाभाग दुहित्रा वृषपर्वणः । श्रुत्वा दुहितरं काव्यस्तत्र शर्मिष्ठया हताम् ॥

śarmiṣṭhayā mahābhāga duhitrā vṛṣaparvaṇaḥ | śrutvā duhitaraṃ kāvyastatra śarmiṣṭhayā hatām

"हे महाभाग, वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा ने।" यह सुनकर कि वहाँ शर्मिष्ठा ने उनकी पुत्री को मार डाला है, काव्य

श्लोक 39 (1.72.39)

त्वरया निर्ययौ दुःखान्मार्गमाणः सुतां वने । दृष्ट्वा दुहितरं काव्यो देवयानीं ततो वने ॥

tvarayā niryayau duḥkhānmārgamāṇaḥ sutāṃ vane | dṛṣṭvā duhitaraṃ kāvyo devayānīṃ tato vane

दुःखी होकर शीघ्रता से निकले और वन में पुत्री को खोजने लगे। फिर वन में अपनी पुत्री देवयानी को देखकर काव्य ने

श्लोक 40 (1.72.40)

बाहुभ्यां संपरिष्वज्य दुःखितो वाक्यमब्रवीत् । आत्मदोषैर्नियच्छन्ति सर्वे दुःखसुखे जनाः ॥

bāhubhyāṃ saṃpariṣvajya duḥkhito vākyamabravīt | ātmadoṣairniyacchanti sarve duḥkhasukhe janāḥ

उसे दोनों भुजाओं में भरकर दुःखी स्वर में कहा — "सब लोग अपने ही दोषों से दुःख और सुख पाते हैं।

शुक्र उवाच

श्लोक 41 (1.72.41)

मन्ये दुश्चरितं तेऽस्ति यस्येयं निष्कृतिः कृता । निष्कृतिर्मेऽस्तु वा मास्तु शृणुष्वावहितो मम ॥

manye duścaritaṃ te'sti yasyeyaṃ niṣkṛtiḥ kṛtā | niṣkṛtirme'stu vā māstu śṛṇuṣvāvahito mama

"मुझे लगता है तुमसे कोई दुष्कर्म हुआ है, जिसका यह प्रायश्चित्त हुआ है।" देवयानी बोली — "प्रायश्चित्त हो या न हो, ध्यान से मेरी बात सुनिए।

देवयान्युवाच

श्लोक 42 (1.72.42)

शर्मिष्ठया यदुक्ताऽस्मि दुहित्रा वृषपर्वणः । सत्यं किलैतत्सा प्राह दैत्यानामसि गायनः ॥

śarmiṣṭhayā yaduktā'smi duhitrā vṛṣaparvaṇaḥ | satyaṃ kilaitatsā prāha daityānāmasi gāyanaḥ

"वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा ने मुझसे जो कहा, वह सुनिए। उसने मानो सच बताते हुए कहा कि आप दैत्यों के स्तुति-गायक हैं।

श्लोक 43 (1.72.43)

एवं हि मे कथयति शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी । वचनं तीक्ष्णपरुषं क्रोधरक्तेक्षणा भृशम् ॥

evaṃ hi me kathayati śarmiṣṭhā vārṣaparvaṇī | vacanaṃ tīkṣṇaparuṣaṃ krodharaktekṣaṇā bhṛśam

"वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा ने क्रोध से लाल आँखें करके मुझसे इस प्रकार तीखे और कठोर वचन कहे —

श्लोक 44 (1.72.44)

स्तुवतो दुहिता नित्यं याचतः प्रतिगृह्णतः । अहं तु स्तूयमानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः ॥

stuvato duhitā nityaṃ yācataḥ pratigṛhṇataḥ | ahaṃ tu stūyamānasya dadato'pratigṛhṇataḥ

"'तुम सदा स्तुति करने वाले, माँगने वाले और दान लेने वाले की बेटी हो; पर मैं उसकी बेटी हूँ जिसकी स्तुति होती है, जो देता है और लेता नहीं।'

श्लोक 45 (1.72.45)

इदं मामाह शर्मिष्ठा दुहिता वृषपर्वणः । क्रोधसंरक्तनयना दर्पपूर्णा पुनः पुनः ॥

idaṃ māmāha śarmiṣṭhā duhitā vṛṣaparvaṇaḥ | krodhasaṃraktanayanā darpapūrṇā punaḥ punaḥ

"वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा ने क्रोध से लाल आँखें करके, घमण्ड से भरकर, बार-बार मुझसे यही कहा।

श्लोक 46 (1.72.46)

यद्यहं स्तुवतस्तात दुहिता प्रतिगृह्णतः । प्रसादयिष्ये शर्मिष्ठामित्युक्ता तु सखी मया ॥

yadyahaṃ stuvatastāta duhitā pratigṛhṇataḥ | prasādayiṣye śarmiṣṭhāmityuktā tu sakhī mayā

"पिताजी, मैंने अपनी सखी से कहा — 'यदि मैं सचमुच स्तुति करने वाले और दान लेने वाले की बेटी हूँ, तो मैं शर्मिष्ठा को प्रसन्न करूँगी।'

श्लोक 47 (1.72.47)

उक्ताप्येवं भृशं मां सा निगृह्य विजने वने । कूपे प्रक्षेपयामास प्रक्षिप्य गृहमागमत् ॥

uktāpyevaṃ bhṛśaṃ māṃ sā nigṛhya vijane vane | kūpe prakṣepayāmāsa prakṣipya gṛhamāgamat

"मेरे ऐसा कहने पर भी उसने निर्जन वन में मुझे जोर से पकड़कर कुएँ में फेंक दिया, और फेंककर घर चली गई।"

शुक्र उवाच

श्लोक 48 (1.72.48)

स्तुवतो दुहिता न त्वं याचतः प्रतिगृह्णतः । अस्तोतुः स्तूयमानस्य दुहिता देवयान्यसि ॥

stuvato duhitā na tvaṃ yācataḥ pratigṛhṇataḥ | astotuḥ stūyamānasya duhitā devayānyasi

"तुम स्तुति करने वाले, माँगने वाले और दान लेने वाले की बेटी नहीं हो। देवयानी, तुम उसकी बेटी हो जिसकी स्तुति होती है और जो किसी की स्तुति नहीं करता।

श्लोक 49 (1.72.49)

वृषपर्वैव तद्वेद शक्रो राजा च नाहुषः । अचिन्त्यं ब्रह्म निर्द्वन्द्वमैश्वरं हि बलं मम ॥

vṛṣaparvaiva tadveda śakro rājā ca nāhuṣaḥ | acintyaṃ brahma nirdvandvamaiśvaraṃ hi balaṃ mama

"यह बात स्वयं वृषपर्वा जानते हैं, इन्द्र जानते हैं और नहुष-पुत्र राजा ययाति भी जानते हैं। मेरा ऐश्वर्य-बल अचिन्त्य, द्वन्द्वातीत ब्रह्म है।

श्लोक 50 (1.72.50)

जानामि जीविनीं विद्यां लोकेस्मिञ्शाश्वतीं ध्रुवम् । मृतः संजीवते जन्तुर्यया कमललोचने ॥

jānāmi jīvinīṃ vidyāṃ lokesmiñśāśvatīṃ dhruvam | mṛtaḥ saṃjīvate janturyayā kamalalocane

"हे कमलनयनी, मैं इस लोक की वह शाश्वत और अचूक जीवनदायिनी विद्या जानता हूँ, जिससे मरा हुआ प्राणी फिर जी उठता है।

श्लोक 51 (1.72.51)

कत्थनं स्वगुणानां च कृत्वा तप्यति सज्जनः । ततो वक्तुमशक्तोऽस्मित्वं मे जानासि यद्बलम् ॥

katthanaṃ svaguṇānāṃ ca kṛtvā tapyati sajjanaḥ | tato vaktumaśakto'smitvaṃ me jānāsi yadbalam

"अपने गुणों का बखान करके सज्जन पछताता है; इसलिए मैं उन्हें कह नहीं सकता। मेरा बल क्या है, यह तुम जानती हो।

श्लोक 52 (1.72.52)

तस्मादुत्तिष्ठ गच्छामः स्वगृहं कुलनन्दिनि । क्षमां कृत्वा विशालाक्षि क्षमासारा हि साधवः ॥

tasmāduttiṣṭha gacchāmaḥ svagṛhaṃ kulanandini | kṣamāṃ kṛtvā viśālākṣi kṣamāsārā hi sādhavaḥ

"इसलिए उठो, हे कुलनन्दिनी, हम अपने घर चलें। हे विशालाक्षी, क्षमा कर दो, क्योंकि क्षमा ही सज्जनों का सार है।"

श्लोक 53 (1.72.53)

यच्च किंचित्सर्वगतं भूमौ वा यदि वा दिवि । तस्याहमीश्वरो नित्यं तुष्टेनोक्तः स्वयंभुवा ॥

yacca kiṃcitsarvagataṃ bhūmau vā yadi vā divi | tasyāhamīśvaro nityaṃ tuṣṭenoktaḥ svayaṃbhuvā

"पृथ्वी पर या स्वर्ग में जो कुछ भी सर्वत्र है, उन सबका मैं सदा स्वामी हूँ — ऐसा स्वयम्भू ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर मुझसे कहा है।

श्लोक 54 (1.72.54)

अहं जलं विमुञ्चामि प्रजानां हितकाम्यया । पुष्णाम्यौषधयः सर्वा इति सत्यं ब्रवीमि ते ॥

ahaṃ jalaṃ vimuñcāmi prajānāṃ hitakāmyayā | puṣṇāmyauṣadhayaḥ sarvā iti satyaṃ bravīmi te

"प्रजाओं के हित की कामना से मैं ही जल बरसाता हूँ और सारी ओषधियों का पोषण करता हूँ। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 55 (1.72.55)

एवं विषादमापन्नां मन्युना संप्रपीडिताम् । वचनैर्मधुरैः श्लक्ष्णैः सान्त्वयामास तां पिता ॥

evaṃ viṣādamāpannāṃ manyunā saṃprapīḍitām | vacanairmadhuraiḥ ślakṣṇaiḥ sāntvayāmāsa tāṃ pitā

इस प्रकार विषाद में डूबी और क्रोध से पीड़ित अपनी पुत्री को पिता ने मधुर और कोमल वचनों से सान्त्वना दी।

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