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आदि पर्व · अध्याय 73

शुक्राचार्य का क्षमा-उपदेश और देवयानी का उत्तर

शुक्राचार्य देवयानी को क्षमा की महिमा समझाते हैं — जो दूसरों के कटु वचन सह लेता है और उठते हुए क्रोध को घोड़े की लगाम की तरह रोक लेता है, वह संसार को जीत लेता है, जबकि क्रोध दान, यज्ञ और तप को निष्फल कर देता है। देवयानी उत्तर देती है कि अपने कर्तव्य से गिरे शिष्य को क्षमा नहीं करना चाहिए, और जो आचरण तथा कुल की निन्दा करें उनके बीच नहीं रहना चाहिए। वह बताती है कि शर्मिष्ठा के कठोर वचन उसके हृदय को जला रहे हैं, और कहती है कि वाणी का घाव कभी नहीं भरता।

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शुक्र उवाच

श्लोक 1 (1.73.1)

यः परेषां नरो नित्यमतिवादांस्तितिक्षते । देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम् ॥

yaḥ pareṣāṃ naro nityamativādāṃstitikṣate | devayāni vijānīhi tena sarvamidaṃ jitam

"देवयानी, जान लो — जो मनुष्य दूसरों के कटु वचनों को सदा सह लेता है, उसने इस सारे जगत को जीत लिया।

श्लोक 2 (1.73.2)

यः समुत्पतितं क्रोधं निगृह्णाति हयं यथा । स यन्तेत्युच्यते सद्भिर्न यो रश्मिषु लम्बते ॥

yaḥ samutpatitaṃ krodhaṃ nigṛhṇāti hayaṃ yathā | sa yantetyucyate sadbhirna yo raśmiṣu lambate

"जो उठते हुए क्रोध को वैसे ही रोक लेता है जैसे सारथी घोड़े को, सज्जन उसी को सच्चा सारथी कहते हैं — उसे नहीं जो केवल लगाम पकड़े लटका रहता है।

श्लोक 3 (1.73.3)

यः समुत्पतितं क्रोधमक्रोधेन निरस्यति । देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम् ॥

yaḥ samutpatitaṃ krodhamakrodhena nirasyati | devayāni vijānīhi tena sarvamidaṃ jitam

"जो उठते हुए क्रोध को अक्रोध से दूर कर देता है — देवयानी, जान लो — उसने इस सारे जगत को जीत लिया।

श्लोक 4 (1.73.4)

यः समुत्पतितं क्रोधं क्षमयेह निरस्यति । यथोरगस्त्वचं जीर्णां स वै पुरुष उच्यते ॥

yaḥ samutpatitaṃ krodhaṃ kṣamayeha nirasyati | yathoragastvacaṃ jīrṇāṃ sa vai puruṣa ucyate

"जो उठते हुए क्रोध को क्षमा द्वारा वैसे ही उतार फेंकता है जैसे साँप अपनी पुरानी केंचुली, वही सच्चा पुरुष कहलाता है।

श्लोक 5 (1.73.5)

यः संधारयते मन्युं योऽतिवादांस्तितिक्षते । यश्च तप्तो न तपति दृढं सोऽर्थस्य भाजनम् ॥

yaḥ saṃdhārayate manyuṃ yo'tivādāṃstitikṣate | yaśca tapto na tapati dṛḍhaṃ so'rthasya bhājanam

"जो अपने रोष को रोके रखता है, जो कटु वचन सह लेता है, और जो सताए जाने पर भी दूसरों को नहीं सताता — वह निश्चय ही हर सफलता का पात्र है।

श्लोक 6 (1.73.6)

यो यजेदपरिश्रान्तो मासिमासि शतं समाः । न क्रुद्ध्येद्यश्च सर्वस्य तयोरक्रोधनोऽधिकः ॥

yo yajedapariśrānto māsimāsi śataṃ samāḥ | na kruddhyedyaśca sarvasya tayorakrodhano'dhikaḥ

"जो सौ वर्षों तक बिना थके हर महीने यज्ञ करता है, और जो किसी पर कभी क्रोध नहीं करता — इन दोनों में क्रोध न करने वाला श्रेष्ठ है।

श्लोक 7 (1.73.7)

तस्मादक्रोधनः श्रेष्ठः कामक्रोधौ विगर्हितौ । क्रुद्धस्य निष्फलान्येव दानयज्ञतपांसि च ॥

tasmādakrodhanaḥ śreṣṭhaḥ kāmakrodhau vigarhitau | kruddhasya niṣphalānyeva dānayajñatapāṃsi ca

"इसलिए क्रोध न करने वाला श्रेष्ठ है; काम और क्रोध निन्दनीय हैं। क्रोधी मनुष्य के दान, यज्ञ और तप — सब निष्फल हो जाते हैं।

श्लोक 8 (1.73.8)

तस्मादक्रोधने यज्ञतपोदानफलं महत् । भवेदसंशयं भद्रे नेतरस्मिन्कदाचन ॥

tasmādakrodhane yajñatapodānaphalaṃ mahat | bhavedasaṃśayaṃ bhadre netarasminkadācana

"इसलिए, हे भद्रे, निःसन्देह क्रोधहीन व्यक्ति में ही यज्ञ, तप और दान का महान फल होता है, दूसरे में कभी नहीं।

श्लोक 9 (1.73.9)

न यतिर्न तपस्वी च न यज्वा न च धर्मभाक् । क्रोधस्य यो वशं गच्छेत्तस्य लोकद्वयं न च ॥

na yatirna tapasvī ca na yajvā na ca dharmabhāk | krodhasya yo vaśaṃ gacchettasya lokadvayaṃ na ca

"जो क्रोध के वश में हो जाता है, वह न यति रहता है, न तपस्वी, न यज्ञ करने वाला, न धर्म का भागी; उसके लिए न यह लोक रहता है न परलोक।

श्लोक 10 (1.73.10)

पुत्रो भृत्यः सुहृद्भ्राता भार्या धर्मश्च सत्यता । तस्यैतान्यपयास्यन्ति क्रोधशीलस्य निश्चितम् ॥

putro bhṛtyaḥ suhṛdbhrātā bhāryā dharmaśca satyatā | tasyaitānyapayāsyanti krodhaśīlasya niścitam

"पुत्र, सेवक, मित्र, भाई, पत्नी, धर्म और सत्य — ये सब क्रोधी स्वभाव वाले मनुष्य को निश्चय ही छोड़ जाते हैं।

श्लोक 11 (1.73.11)

यत्कुमाराः कुमार्यश्च वैरं कुर्युरचेतसः । न तत्प्राज्ञोऽनुकुर्वीत न विदुस्ते बलाबलम् ॥

yatkumārāḥ kumāryaśca vairaṃ kuryuracetasaḥ | na tatprājño'nukurvīta na viduste balābalam

"नासमझ लड़के-लड़कियाँ जो आपस में वैर करते हैं, बुद्धिमान को उसका अनुकरण नहीं करना चाहिए; वे बलाबल को नहीं जानते।"

देवयान्युवाच

श्लोक 12 (1.73.12)

वेदाहं तात बालाऽपि धर्माणां यदिहान्तरम् । अक्रोधे चातिवादे च वेद चापि बलाबलम् ॥

vedāhaṃ tāta bālā'pi dharmāṇāṃ yadihāntaram | akrodhe cātivāde ca veda cāpi balābalam

"पिताजी, बालिका होते हुए भी मैं धर्मों का अन्तर जानती हूँ; क्षमा और कटु वचन में बल और दुर्बलता कहाँ है, यह भी मैं जानती हूँ।

श्लोक 13 (1.73.13)

स्ववृत्तिमननुष्ठाय धर्ममुत्सृज्य तत्त्वतः । शिष्यस्याशिष्यवृत्तेस्तु न क्षन्तव्यं बुभूषता ॥

svavṛttimananuṣṭhāya dharmamutsṛjya tattvataḥ | śiṣyasyāśiṣyavṛttestu na kṣantavyaṃ bubhūṣatā

"जो उन्नति चाहता है, उसे ऐसे शिष्य को क्षमा नहीं करना चाहिए जो अपने कर्तव्य का पालन न करके, धर्म को सचमुच त्यागकर, शिष्य के अयोग्य आचरण करता है।

श्लोक 14 (1.73.14)

प्रेष्यः शिष्यः स्ववृत्तिं हि विसृज्य विफलं गतः । तस्मात्संकीर्णवृत्तेषु वासो मम न रोचते ॥

preṣyaḥ śiṣyaḥ svavṛttiṃ hi visṛjya viphalaṃ gataḥ | tasmātsaṃkīrṇavṛtteṣu vāso mama na rocate

"जो सेवक या शिष्य अपने कर्तव्य को छोड़ देता है, वह व्यर्थ ही भटक जाता है। इसलिए जिनका आचरण भ्रष्ट है, उनके बीच रहना मुझे अच्छा नहीं लगता।

श्लोक 15 (1.73.15)

पुमांसो ये हि निन्दन्ति वृत्तेनाभिजनेन च । न तेषु निवसेत्प्राज्ञः श्रेयोऽर्थी पापबुद्धिषु ॥

pumāṃso ye hi nindanti vṛttenābhijanena ca | na teṣu nivasetprājñaḥ śreyo'rthī pāpabuddhiṣu

"अपना कल्याण चाहने वाले बुद्धिमान को उन पापबुद्धि लोगों के बीच नहीं रहना चाहिए जो किसी के आचरण और कुल की निन्दा करते हैं।

श्लोक 16 (1.73.16)

ये त्वेनमभिजानन्ति वृत्तेनाभिजनेन वा । तेषु साधुषु वस्तव्यं स वासः श्रेष्ठ उच्यते ॥

ye tvenamabhijānanti vṛttenābhijanena vā | teṣu sādhuṣu vastavyaṃ sa vāsaḥ śreṣṭha ucyate

"पर जो सज्जन किसी के आचरण और कुल का आदर करते हैं, उन्हीं के बीच रहना चाहिए; वही निवास श्रेष्ठ कहा जाता है।

श्लोक 17 (1.73.17)

सुयन्त्रितपरा नित्यं विहीनाश्च धनैर्वराः । दुर्वृत्ताः पापकर्माणश्चण्डाला धनिनोपि च ॥

suyantritaparā nityaṃ vihīnāśca dhanairvarāḥ | durvṛttāḥ pāpakarmāṇaścaṇḍālā dhaninopi ca

"जो सदा संयम में तत्पर रहते हैं, वे धनहीन होकर भी श्रेष्ठ हैं; दुराचारी और पापकर्मी धनवान होकर भी चाण्डाल हैं।

श्लोक 18 (1.73.18)

नैव जात्या हि चण्डालाः स्वकर्मविहितैर्विना । धनाभिजनविद्यासु सक्ताश्चण्डालधर्मिणः ॥

naiva jātyā hi caṇḍālāḥ svakarmavihitairvinā | dhanābhijanavidyāsu saktāścaṇḍāladharmiṇaḥ

"केवल जन्म से कोई चाण्डाल नहीं होता, अपने कर्मों के बिना; जो धन, कुल और विद्या के अभिमान में आसक्त हैं, वे चाण्डाल-स्वभाव वाले हैं।

श्लोक 19 (1.73.19)

अकारणाश्च द्वेष्यन्ति परिवादं वदन्ति ते । साधोस्तत्र न वासोस्ति पापिभिः पापतां व्रजेत् ॥

akāraṇāśca dveṣyanti parivādaṃ vadanti te | sādhostatra na vāsosti pāpibhiḥ pāpatāṃ vrajet

"वे बिना कारण द्वेष करते हैं और निन्दा करते हैं। सज्जन को वहाँ नहीं रहना चाहिए; पापियों के संग वह भी पापी हो जाएगा।

श्लोक 20 (1.73.20)

सुकृते दुष्कृते वापि यत्र सज्जति यो नरः । ध्रुवं रतिर्भवेत्तस्य तस्माद्द्वेषं न रोचयेत् ॥

sukṛte duṣkṛte vāpi yatra sajjati yo naraḥ | dhruvaṃ ratirbhavettasya tasmāddveṣaṃ na rocayet

"मनुष्य जिस किसी में — पुण्य में या पाप में — लगता है, उसी में उसकी रुचि निश्चित हो जाती है; इसलिए द्वेष में रुचि नहीं रखनी चाहिए।

श्लोक 21 (1.73.21)

वाग्दुरुक्तं महाघोरं दुहितुर्वृषपर्वणः । मम मथ्नाति हृदयमग्निकाम इवारणिम् ॥

vāgduruktaṃ mahāghoraṃ duhiturvṛṣaparvaṇaḥ | mama mathnāti hṛdayamagnikāma ivāraṇim

"वृषपर्वा की पुत्री के कहे हुए अत्यन्त भयंकर कटु वचन मेरे हृदय को वैसे ही मथ रहे हैं जैसे अग्नि चाहने वाला अरणि को मथता है।

श्लोक 22 (1.73.22)

न ह्यतो दुष्करतरं मन्ये लोकेष्वपि त्रिषु । यः सपत्नश्रियं दीप्तां हीनश्रीः पर्युपासते ॥

na hyato duṣkarataraṃ manye lokeṣvapi triṣu | yaḥ sapatnaśriyaṃ dīptāṃ hīnaśrīḥ paryupāsate

"मैं तीनों लोकों में इससे अधिक कठिन कुछ नहीं मानती कि जिसकी श्री नष्ट हो गई हो, उसे अपने प्रतिद्वन्द्वी की चमकती समृद्धि की सेवा करनी पड़े।

श्लोक 23 (1.73.23)

मरणं शोभनं तस्य इति विद्वज्जना विदुः । अवमानमवाप्नोति शनैर्नीचसमागमात् ॥

maraṇaṃ śobhanaṃ tasya iti vidvajjanā viduḥ | avamānamavāpnoti śanairnīcasamāgamāt

"विद्वान जानते हैं कि ऐसे व्यक्ति के लिए मृत्यु ही श्रेष्ठ है। नीचों की संगति से मनुष्य धीरे-धीरे अपमान ही पाता है।

श्लोक 24 (1.73.24)

अतिवादा वक्त्रतो निःसरन्ति । यैराहतः शोचति रात्र्यहानि । परस्य वै मर्मसु ते पतन्ति । तस्माद्धीरो नैव मुच्येत्परेषु ॥

ativādā vaktrato niḥsaranti | yairāhataḥ śocati rātryahāni | parasya vai marmasu te patanti | tasmāddhīro naiva mucyetpareṣu

"कटु वचन मुख से निकलते हैं; उनसे आहत होकर मनुष्य दिन-रात शोक करता है। वे दूसरे के मर्मस्थलों पर ही गिरते हैं; इसलिए धीर पुरुष को उन्हें दूसरों पर कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

श्लोक 25 (1.73.25)

निरोहेदायुधैश्छिन्नं संरोहेद्दग्धमग्निना । वाक्क्षतं च न संरोहेदाशरीरं शरीरिणाम् ॥

nirohedāyudhaiśchinnaṃ saṃroheddagdhamagninā | vākkṣataṃ ca na saṃrohedāśarīraṃ śarīriṇām

"शस्त्रों से कटा हुआ घाव भर सकता है, अग्नि से जला हुआ भी भर सकता है; पर वाणी का घाव देहधारियों के शरीर रहते कभी नहीं भरता।

श्लोक 26 (1.73.26)

संरोहति शरैर्विद्धं वनं परशुना हतम् । वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहेत वाक्क्षतम् ॥

saṃrohati śarairviddhaṃ vanaṃ paraśunā hatam | vācā duruktaṃ bībhatsaṃ na saṃroheta vākkṣatam

"बाणों से बिंधा घाव भर जाता है, कुल्हाड़ी से कटा वन फिर उग आता है; पर कटु वाणी से बना वीभत्स घाव कभी नहीं भरता।"

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