आदि पर्व · अध्याय 74
शर्मिष्ठा का देवयानी की दासी बनना
कच के वध और अपनी पुत्री पर हुए आघात से क्रुद्ध शुक्राचार्य वृषपर्वा से कहते हैं कि अधर्म समय पाकर अवश्य फल देता है, और उसका राज्य छोड़ देने की धमकी देते हैं। असुरराज उनसे रुकने की विनती करता है, और शुक्र अपने रुकने को देवयानी की प्रसन्नता पर निर्भर बताते हैं। देवयानी माँग करती है कि शर्मिष्ठा एक हज़ार कन्याओं के साथ उसकी दासी बने और जहाँ उसका विवाह हो वहाँ उसके साथ जाए। अपने कुटुम्ब के हित के लिए शर्मिष्ठा यह स्वीकार कर लेती है, और सन्तुष्ट देवयानी पिता के साथ नगर लौट आती है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.74.1)
ततः काव्यो भृगुश्रेष्ठः समन्युरुपगम्य ह । वृषपर्वाणमासीनमित्युवाचाविचारयन् ॥
tataḥ kāvyo bhṛguśreṣṭhaḥ samanyurupagamya ha | vṛṣaparvāṇamāsīnamityuvācāvicārayan
तब भृगुश्रेष्ठ काव्य क्रोध से भरे हुए, बैठे हुए वृषपर्वा के पास गए और बिना कुछ विचारे इस प्रकार बोले —
शुक्र उवाच
श्लोक 2 (1.74.2)
नाधर्मश्चरितो राजन्सद्यः फलति गौरिव । शनैरावर्त्यमानो हि कर्तुर्मूलानि कृन्तति ॥
nādharmaścarito rājansadyaḥ phalati gauriva | śanairāvartyamāno hi karturmūlāni kṛntati
"हे राजन्, किया हुआ अधर्म भूमि की भाँति तुरन्त फल नहीं देता; पर धीरे-धीरे घूमकर वह करने वाले की जड़ें काट डालता है।
श्लोक 3 (1.74.3)
पुत्रेषु वा नप्तृषु वा न चेदात्मनि पश्यति । फलत्येव ध्रुवं पापं गुरुभुक्तमिवोदरे ॥
putreṣu vā naptṛṣu vā na cedātmani paśyati | phalatyeva dhruvaṃ pāpaṃ gurubhuktamivodare
"यदि मनुष्य उसे अपने ऊपर नहीं देखता, तो पुत्रों या पौत्रों पर देखता है; पाप अवश्य फल देता है, जैसे पेट में भारी भोजन।
श्लोक 4 (1.74.4)
अधीयानं हितं राजन्क्षमावन्तं जितेन्द्रियम् । यदघातयथा विप्रं कचमाङ्गिरसं तदा । अपापशीलं धर्मज्ञं शुश्रूषुं मद्गृहे रतम् ॥
adhīyānaṃ hitaṃ rājankṣamāvantaṃ jitendriyam | yadaghātayathā vipraṃ kacamāṅgirasaṃ tadā | apāpaśīlaṃ dharmajñaṃ śuśrūṣuṃ madgṛhe ratam
"क्योंकि हे राजन्, तुमने अंगिरा-वंशी ब्राह्मण कच को मरवाया — जो विद्यार्थी था, क्षमाशील और जितेन्द्रिय था, निष्पाप स्वभाव का, धर्मज्ञ, सेवापरायण और मेरे घर में प्रसन्न रहने वाला था।
श्लोक 5 (1.74.5)
शर्मिष्ठया देवयानी क्रूरमुक्ता बहु प्रभो । विप्रकृत्य च संरम्भात्कूपे क्षिप्ता मनस्विनी ॥
śarmiṣṭhayā devayānī krūramuktā bahu prabho | viprakṛtya ca saṃrambhātkūpe kṣiptā manasvinī
"हे प्रभो, शर्मिष्ठा ने देवयानी से बहुत-से कठोर वचन कहे, और क्रोध में उस मनस्विनी का अपमान करके उसे कुएँ में फेंक दिया।
श्लोक 6 (1.74.6)
सा न कल्पेत वासाय तयाहं रहितः कथम् । वसेयमिह तस्मात्ते त्यजामि विषयं नृप ॥
sā na kalpeta vāsāya tayāhaṃ rahitaḥ katham | vaseyamiha tasmātte tyajāmi viṣayaṃ nṛpa
"वह यहाँ रहने को तैयार नहीं है; और उसके बिना मैं यहाँ कैसे रहूँ? इसलिए, हे राजन्, मैं तुम्हारा राज्य छोड़ रहा हूँ।
श्लोक 7 (1.74.7)
वधादनर्हतस्तस्य वधाच्च दुहितुर्मम । वृषपर्वन्निबोधेदं त्यक्ष्यामि त्वां सबान्धवम् । स्थातुं त्वद्विषये राजन्न शक्ष्यामि त्वया सह ॥
vadhādanarhatastasya vadhācca duhiturmama | vṛṣaparvannibodhedaṃ tyakṣyāmi tvāṃ sabāndhavam | sthātuṃ tvadviṣaye rājanna śakṣyāmi tvayā saha
"उस निर्दोष के वध के कारण और मेरी पुत्री को मारने के प्रयास के कारण — वृषपर्वा, यह समझ लो — मैं तुम्हें और तुम्हारे बन्धुओं को त्याग दूँगा। हे राजन्, मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे राज्य में नहीं रह सकूँगा।
श्लोक 8 (1.74.8)
मा शोच वृषपर्वंस्त्वं मा क्रुध्यस्व विशांपते । स्थातुं ते विषये राजन्न शक्ष्यामि तया विना । अस्या गतिर्गतिर्मह्यं प्रियमस्याः प्रियं मम ॥
mā śoca vṛṣaparvaṃstvaṃ mā krudhyasva viśāṃpate | sthātuṃ te viṣaye rājanna śakṣyāmi tayā vinā | asyā gatirgatirmahyaṃ priyamasyāḥ priyaṃ mama
"वृषपर्वा, शोक मत करो, हे प्रजापालक, क्रोध भी मत करो; हे राजन्, मैं उसके बिना तुम्हारे राज्य में नहीं रह सकूँगा। जो उसकी गति है वही मेरी गति है; जो उसे प्रिय है वही मुझे प्रिय है।"
वृषपर्वोवाच
श्लोक 9 (1.74.9)
यदि ब्रह्मन्घातयामि यदि वा क्रोशयाम्यहम् । शर्मिष्ठया देवयानीं तेन गच्छाम्यसद्गतिम् ॥
yadi brahmanghātayāmi yadi vā krośayāmyaham | śarmiṣṭhayā devayānīṃ tena gacchāmyasadgatim
"हे ब्रह्मन्, यदि मैंने शर्मिष्ठा के द्वारा देवयानी को मरवाया हो या उसका अपमान करवाया हो, तो मुझे दुर्गति प्राप्त हो।
शुक्र उवाच
श्लोक 10 (1.74.10)
अहो मामभिजानासि दैत्य मिथ्याप्रलापिनम् । यथेममात्मनो दोषं न नियच्छस्युपेक्षसे ॥
aho māmabhijānāsi daitya mithyāpralāpinam | yathemamātmano doṣaṃ na niyacchasyupekṣase
"अहो दैत्य, तुम मुझे झूठ बोलने वाला समझते हो, क्योंकि तुम अपने इस दोष को रोकते नहीं, उसकी उपेक्षा करते हो।"
वृषपर्वोवाच
श्लोक 11 (1.74.11)
नाधर्मं न मृषावादं त्वयि जानामि भार्गव । त्वयि धर्मश्च सत्यं च तत्प्रसीदतु नो भवान् ॥
nādharmaṃ na mṛṣāvādaṃ tvayi jānāmi bhārgava | tvayi dharmaśca satyaṃ ca tatprasīdatu no bhavān
"हे भार्गव, मैं आपमें न कोई अधर्म जानता हूँ, न असत्य; आपमें धर्म और सत्य हैं। इसलिए आप हम पर प्रसन्न हों।
श्लोक 12 (1.74.12)
यद्यस्मानपहाय त्वमितो गच्छसि भार्गव । समुद्रं संप्रवेक्ष्यामि पूर्वं मद्बान्धवैः सह ॥
yadyasmānapahāya tvamito gacchasi bhārgava | samudraṃ saṃpravekṣyāmi pūrvaṃ madbāndhavaiḥ saha
"हे भार्गव, यदि आप हमें छोड़कर यहाँ से चले जाएँगे, तो मैं पहले अपने बन्धुओं के साथ समुद्र में प्रवेश कर जाऊँगा,
श्लोक 13 (1.74.13)
पातालमथवा चाग्निं नान्यदस्ति परायणम् । यद्येव देवान्गच्छेस्त्वं मां च त्यक्त्वा ग्रहाधिप । सर्वत्यागं ततः कृत्वा प्रविशामि हुताशनम् ॥
pātālamathavā cāgniṃ nānyadasti parāyaṇam | yadyeva devāngacchestvaṃ māṃ ca tyaktvā grahādhipa | sarvatyāgaṃ tataḥ kṛtvā praviśāmi hutāśanam
"या पाताल में, या अग्नि में; हमारे लिए और कोई आश्रय नहीं है। हे ग्रहों के स्वामी, यदि आप मुझे छोड़कर देवताओं के पास चले जाएँगे, तो मैं सब कुछ त्यागकर अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा।"
शुक्र उवाच
श्लोक 14 (1.74.14)
समुद्रं प्रविशध्वं वा दिशो वा द्रवतासुराः । दुहितुर्नाप्रियं सोढुं शक्तोऽहं दयिता हि मे ॥
samudraṃ praviśadhvaṃ vā diśo vā dravatāsurāḥ | duhiturnāpriyaṃ soḍhuṃ śakto'haṃ dayitā hi me
"असुरो, चाहे समुद्र में प्रवेश करो या दिशाओं में भाग जाओ; मैं अपनी पुत्री का अप्रिय सहन नहीं कर सकता, क्योंकि वह मुझे प्यारी है।
श्लोक 15 (1.74.15)
प्रसाद्यतां देवयानी जीवितं यत्र मे स्थितम् । योगक्षेमकरस्तेऽहमिन्द्रस्येव बृहस्पतिः ॥
prasādyatāṃ devayānī jīvitaṃ yatra me sthitam | yogakṣemakaraste'hamindrasyeva bṛhaspatiḥ
"देवयानी को प्रसन्न किया जाए, क्योंकि मेरे प्राण उसी में बसे हैं। तब मैं तुम्हारा योगक्षेम वैसे ही करूँगा जैसे बृहस्पति इन्द्र का करते हैं।"
वृषपर्वोवाच
श्लोक 16 (1.74.16)
यत्किंचिदसुरेन्द्राणां विद्यते वसु भार्गव । भुवि हस्तिगवाश्वं च तस्य त्वं मम चेश्वरः ॥
yatkiṃcidasurendrāṇāṃ vidyate vasu bhārgava | bhuvi hastigavāśvaṃ ca tasya tvaṃ mama ceśvaraḥ
"हे भार्गव, असुरराजों के पास पृथ्वी पर जो कुछ धन है — हाथी, गौएँ और घोड़े — उसके और मेरे भी आप स्वामी हैं।"
शुक्र उवाच
श्लोक 17 (1.74.17)
यत्किंचिदस्ति द्रविणं दैत्येन्द्राणां महासुर । तस्येश्वरोस्मि यद्येषा देवयानी प्रसाद्यताम् ॥
yatkiṃcidasti draviṇaṃ daityendrāṇāṃ mahāsura | tasyeśvarosmi yadyeṣā devayānī prasādyatām
"हे महासुर, यदि दैत्यराजों के पास जो कुछ धन है उसका मैं स्वामी हूँ, तो यह देवयानी प्रसन्न की जाए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (1.74.18)
एवमुक्तस्तथेत्याह वृषपर्वा महाकविम् । देवयान्यन्तिकं गत्वा तमर्थं प्राह भार्गवः ॥
evamuktastathetyāha vṛṣaparvā mahākavim | devayānyantikaṃ gatvā tamarthaṃ prāha bhārgavaḥ
ऐसा कहे जाने पर वृषपर्वा ने महाकवि शुक्र से कहा — "ऐसा ही हो।" भार्गव ने देवयानी के पास जाकर उसे यह बात बताई।
देवयान्युवाच
श्लोक 19 (1.74.19)
यदि त्वमीश्वरस्तात राज्ञो वित्तस्य भार्गव । नाभिजानामि तत्तेऽहं राजा तु वदतु स्वयम् ॥
yadi tvamīśvarastāta rājño vittasya bhārgava | nābhijānāmi tatte'haṃ rājā tu vadatu svayam
"पिताजी, यदि आप राजा के धन के स्वामी हैं, तो मैं आपके कहने से इसे नहीं मानती; राजा स्वयं कहें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (1.74.20)
शुक्रस्य वचनं श्रुत्वा वृषपर्वा सबान्धवः । देवयानि प्रसीदेति पपात भुवि पादयोः ॥
śukrasya vacanaṃ śrutvā vṛṣaparvā sabāndhavaḥ | devayāni prasīdeti papāta bhuvi pādayoḥ
शुक्र के वचन सुनकर वृषपर्वा अपने बन्धुओं सहित "देवयानी, प्रसन्न हो जाओ" कहते हुए उसके चरणों में भूमि पर गिर पड़ा।
वृषपर्वोवाच
श्लोक 21 (1.74.21)
स्तुत्यो वन्द्यश्च सततं मया तातश्च ते शुभे । यं काममभिकामाऽसि देवयानि शुचिस्मिते । तत्तेऽहं संप्रदास्यामि यदि वापि हि दुर्लभम् ॥
stutyo vandyaśca satataṃ mayā tātaśca te śubhe | yaṃ kāmamabhikāmā'si devayāni śucismite | tatte'haṃ saṃpradāsyāmi yadi vāpi hi durlabham
"हे शुभे, तुम्हारे पिता सदा मेरे स्तुत्य और वन्दनीय हैं। हे पवित्र मुस्कान वाली देवयानी, तुम जो भी कामना करो, वह चाहे दुर्लभ ही क्यों न हो, मैं तुम्हें दूँगा।"
देवयान्युवाच
श्लोक 22 (1.74.22)
दासीं कन्यासहस्रेण शर्मिष्ठामभिकामये । अनु मां तत्र गच्छेत्सा यत्र दद्याच्च मे पिता ॥
dāsīṃ kanyāsahasreṇa śarmiṣṭhāmabhikāmaye | anu māṃ tatra gacchetsā yatra dadyācca me pitā
"मैं चाहती हूँ कि शर्मिष्ठा एक हज़ार कन्याओं के साथ मेरी दासी बने; और जहाँ मेरे पिता मेरा विवाह करें, वहाँ वह मेरे पीछे-पीछे जाए।"
वृषपर्वोवाच
श्लोक 23 (1.74.23)
उत्तिष्ठ त्वं गच्छ धात्रि शर्मिष्ठां शीघ्रमानय । यं च कामयते कामं देवयानी करोतु तम् ॥
uttiṣṭha tvaṃ gaccha dhātri śarmiṣṭhāṃ śīghramānaya | yaṃ ca kāmayate kāmaṃ devayānī karotu tam
"धाय, उठो, जाओ और शर्मिष्ठा को शीघ्र ले आओ; देवयानी जो चाहती है, वह वही करे।
श्लोक 24 (1.74.24)
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामार्थे च कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥
tyajedekaṃ kulasyārthe grāmārthe ca kulaṃ tyajet | grāmaṃ janapadasyārthe ātmārthe pṛthivīṃ tyajet
"कुल के लिए एक व्यक्ति को त्याग दे, गाँव के लिए कुल को त्याग दे, जनपद के लिए गाँव को त्याग दे, और आत्मा के लिए पृथ्वी को भी त्याग दे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (1.74.25)
ततो धात्री तत्र गत्वा शर्मिष्ठां वाक्यमब्रवीत् । उत्तिष्ठ भद्रे शर्मिष्ठे ज्ञातीनां सुखमावह ॥
tato dhātrī tatra gatvā śarmiṣṭhāṃ vākyamabravīt | uttiṣṭha bhadre śarmiṣṭhe jñātīnāṃ sukhamāvaha
तब धाय ने वहाँ जाकर शर्मिष्ठा से कहा — "हे भद्रे शर्मिष्ठे, उठो और अपने कुटुम्बियों को सुख दो।
धात्र्युवाच
श्लोक 26 (1.74.26)
त्यजति ब्राह्मणः शिष्यान्देवयान्या प्रचोदितः । सायं कामयते कामं स कार्योऽद्य त्वयाऽनघे ॥
tyajati brāhmaṇaḥ śiṣyāndevayānyā pracoditaḥ | sāyaṃ kāmayate kāmaṃ sa kāryo'dya tvayā'naghe
"देवयानी की प्रेरणा से ब्राह्मण अपने शिष्यों को त्याग रहे हैं। हे निष्पाप, वह जो चाहती है, वह आज तुम्हें करना होगा।"
शर्मिष्ठोवाच
श्लोक 27 (1.74.27)
यं सा कामयते कामं करवाण्यहमद्य तम् । यद्येवमाह्वयेच्छुक्रो देवयानीकृते हि माम् । मद्दोषान्मागमच्छुक्रो देवयानी च मत्कृते ॥
yaṃ sā kāmayate kāmaṃ karavāṇyahamadya tam | yadyevamāhvayecchukro devayānīkṛte hi mām | maddoṣānmāgamacchukro devayānī ca matkṛte
"वह जो चाहती है, वह मैं आज ही करूँगी। यदि शुक्र देवयानी के लिए इस प्रकार मुझे बुला रहे हैं, तो मेरे दोष से शुक्र न जाएँ, और न मेरे कारण देवयानी जाए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 28 (1.74.28)
ततः कन्यासहस्रेण वृता शिबिकया तदा । पितुर्नियोगात्त्वरिता निश्चक्राम पुरोत्तमात् ॥
tataḥ kanyāsahasreṇa vṛtā śibikayā tadā | piturniyogāttvaritā niścakrāma purottamāt
तब एक हज़ार कन्याओं से घिरी, पालकी में बैठी वह पिता की आज्ञा से शीघ्र ही उस श्रेष्ठ नगर से बाहर निकली।
शर्मिष्ठोवाच
श्लोक 29 (1.74.29)
अहं दासीसहस्रेण दासी ते परिचारिका । अनु त्वां तत्र यास्यामि यत्र दास्यति ते पिता ॥
ahaṃ dāsīsahasreṇa dāsī te paricārikā | anu tvāṃ tatra yāsyāmi yatra dāsyati te pitā
"एक हज़ार दासियों के साथ मैं तुम्हारी दासी और सेविका हूँ; तुम्हारे पिता जहाँ तुम्हें देंगे, वहाँ मैं तुम्हारे पीछे चलूँगी।"
देवयान्युवाच
श्लोक 30 (1.74.30)
स्तुवतो दुहिताऽहं ते याचतः प्रतिगृह्णतः । स्तूयमानस्य दुहिता कथं दासी भविष्यसि ॥
stuvato duhitā'haṃ te yācataḥ pratigṛhṇataḥ | stūyamānasya duhitā kathaṃ dāsī bhaviṣyasi
"मैं तो स्तुति करने वाले, माँगने वाले और दान लेने वाले की बेटी हूँ; तुम, जिसके पिता की स्तुति होती है, दासी कैसे बनोगी?"
शर्मिष्ठोवाच
श्लोक 31 (1.74.31)
येनकेनचिदार्तानां ज्ञातीनां सुखमावहेत् । अतस्त्वामनुयास्यामि तत्र दास्यति ते पिता ॥
yenakenacidārtānāṃ jñātīnāṃ sukhamāvahet | atastvāmanuyāsyāmi tatra dāsyati te pitā
"संकट में पड़े कुटुम्बियों को जिस किसी उपाय से भी सुख पहुँचाना चाहिए; इसलिए तुम्हारे पिता तुम्हें जहाँ देंगे, वहाँ मैं तुम्हारे पीछे चलूँगी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 32 (1.74.32)
प्रतिश्रुते दासभावे दुहित्रा वृषपर्वणः । देवयानी नृपश्रेष्ठ पितरं वाक्यमब्रवीत् ॥
pratiśrute dāsabhāve duhitrā vṛṣaparvaṇaḥ | devayānī nṛpaśreṣṭha pitaraṃ vākyamabravīt
हे नृपश्रेष्ठ, जब वृषपर्वा की पुत्री ने दासी बनना स्वीकार कर लिया, तब देवयानी ने अपने पिता से कहा —
देवयान्युवाच
श्लोक 33 (1.74.33)
प्रविशामि पुरं तात तुष्टाऽस्मि द्विजसत्तम । अमोघं तव विज्ञानमस्ति विद्याबलं च ते ॥
praviśāmi puraṃ tāta tuṣṭā'smi dvijasattama | amoghaṃ tava vijñānamasti vidyābalaṃ ca te
"पिताजी, अब मैं नगर में प्रवेश करूँगी; हे द्विजश्रेष्ठ, मैं सन्तुष्ट हूँ। आपका ज्ञान अमोघ है और आपकी विद्या का बल भी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 34 (1.74.34)
एवमुक्तो दुहित्रा स द्विजश्रेष्ठो महायशाः । प्रविवेश पुरं हृष्टः पूजितः सर्वदानवैः ॥
evamukto duhitrā sa dvijaśreṣṭho mahāyaśāḥ | praviveśa puraṃ hṛṣṭaḥ pūjitaḥ sarvadānavaiḥ
पुत्री के ऐसा कहने पर वे महायशस्वी द्विजश्रेष्ठ प्रसन्न होकर नगर में प्रविष्ट हुए, और सब दानवों ने उनका सम्मान किया।