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आदि पर्व · अध्याय 77

शुक्राचार्य का ययाति को जरा का शाप

ययाति देवयानी से विमुख होकर शर्मिष्ठा में अनुरक्त हो जाते हैं; शर्मिष्ठा से उन्हें तीन पुत्र — द्रुह्यु, अनु और पूरु — होते हैं, जबकि देवयानी से यदु और तुर्वसु। शर्मिष्ठा देवयानी से कहती है कि उसकी सन्तान किसी आए हुए ऋषि से है। वन में उन बालकों से मिलकर देवयानी जान लेती है कि उनके पिता ययाति हैं, शर्मिष्ठा को फटकारती है और क्रोध में अपने पिता शुक्राचार्य के पास चली जाती है। शुक्राचार्य मर्यादा तोड़ने के कारण ययाति को बुढ़ापे का शाप देते हैं, पर यह छूट देते हैं कि वे इसे किसी ऐसे पुत्र को दे सकते हैं जो अपना यौवन दे, और वही पुत्र राजा होगा।

अध्याय 76अध्याय-सूचीअध्याय 78

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.77.1)

तस्मिन्नक्षत्रसंयोगे शुक्ले पुण्यर्क्षगेन्दुना । स राजा मुमुदे सम्राट् तया शर्मिष्ठया सह ॥

tasminnakṣatrasaṃyoge śukle puṇyarkṣagendunā | sa rājā mumude samrāṭ tayā śarmiṣṭhayā saha

उस नक्षत्र-योग में, शुक्ल पक्ष में, जब चन्द्रमा पुण्य नक्षत्र में स्थित था, वह सम्राट् राजा शर्मिष्ठा के साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा।

ययातिरुवाच

श्लोक 2 (1.77.2)

प्रजानां श्रीरिवाभ्याशे शर्मिष्ठा ह्यभवद्वधूः । पन्नगीवोग्ररूपा वै देवयानी ममाप्यभूत् ॥

prajānāṃ śrīrivābhyāśe śarmiṣṭhā hyabhavadvadhūḥ | pannagīvograrūpā vai devayānī mamāpyabhūt

"शर्मिष्ठा मेरे लिए प्रजा की समीप रहने वाली लक्ष्मी के समान वधू बन गई है, पर देवयानी मेरे लिए उग्र रूप वाली नागिन-सी हो गई है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (1.77.3)

पर्जन्य इव सस्यानां देवानाममृतं यथा । तद्वन्ममापि संभूता शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी । इत्येवं मनसा ज्ञात्वा देवयानीमवर्जयत् ॥

parjanya iva sasyānāṃ devānāmamṛtaṃ yathā | tadvanmamāpi saṃbhūtā śarmiṣṭhā vārṣaparvaṇī | ityevaṃ manasā jñātvā devayānīmavarjayat

"जैसे फसलों के लिए मेघ और देवताओं के लिए अमृत, वैसे ही वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा मेरे लिए हो गई है।" मन में ऐसा निश्चय करके वह देवयानी से दूर रहने लगा।

श्लोक 4 (1.77.4)

श्रुत्वा कुमारं जातं तु देवयानी शुचिस्मिता । चिन्तयामास दुःखार्ता शर्मिष्ठां प्रति भारत ॥

śrutvā kumāraṃ jātaṃ tu devayānī śucismitā | cintayāmāsa duḥkhārtā śarmiṣṭhāṃ prati bhārata

हे भारत! पुत्र के जन्म का समाचार सुनकर पवित्र मुस्कान वाली देवयानी दुःख से व्याकुल होकर शर्मिष्ठा के विषय में चिन्ता करने लगी।

श्लोक 5 (1.77.5)

अभिगम्य च शर्मिष्ठां देवयान्यब्रवीदिदम् । किमिदं वृजिनं सुभ्रु कृतं वै कामलुब्धया ॥

abhigamya ca śarmiṣṭhāṃ devayānyabravīdidam | kimidaṃ vṛjinaṃ subhru kṛtaṃ vai kāmalubdhayā

शर्मिष्ठा के पास जाकर देवयानी ने यह कहा — "सुन्दर भौंहों वाली! काम के लोभ में तुमने यह कैसा पाप कर डाला?"

शर्मिष्ठोवाच

श्लोक 6 (1.77.6)

ऋषिरभ्यागतः कश्चिद्धर्मात्मा वेदपारगः । स मया वरदः कामं याचितो धर्मसंहितम् ॥

ṛṣirabhyāgataḥ kaściddharmātmā vedapāragaḥ | sa mayā varadaḥ kāmaṃ yācito dharmasaṃhitam

कोई धर्मात्मा, वेदों में पारंगत ऋषि यहाँ आए थे। वे वर देने वाले थे, इसलिए मैंने उनसे अपनी धर्मसम्मत कामना की याचना की।

श्लोक 7 (1.77.7)

अपत्यार्थे स तु मया वृतो वै चारुहासिनि । नाहमन्यायतः काममाचरामि शुचिस्मिते । तस्मादृषेर्ममापत्यमिति सत्यं ब्रवीमि ते ॥

apatyārthe sa tu mayā vṛto vai cāruhāsini | nāhamanyāyataḥ kāmamācarāmi śucismite | tasmādṛṣermamāpatyamiti satyaṃ bravīmi te

हे सुन्दर हास वाली! सन्तान के लिए ही मैंने उनका वरण किया था। हे शुचिस्मिते! मैं अन्याय से काम का आचरण नहीं करती। इसलिए मेरी यह सन्तान उसी ऋषि से है — यह मैं तुमसे सच कहती हूँ।

देवयान्युवाच

श्लोक 8 (1.77.8)

शोभनं भीरु यद्येवमथ स ज्ञायते द्विजः । गोत्रनामाभिजनतो वेत्तुमिच्छामि तं द्विजम् ॥

śobhanaṃ bhīru yadyevamatha sa jñāyate dvijaḥ | gotranāmābhijanato vettumicchāmi taṃ dvijam

हे भीरु! यदि ऐसा है तो अच्छी बात है। पर क्या वह ब्राह्मण पहचाना हुआ है? मैं उसके गोत्र, नाम और कुल से उसे जानना चाहती हूँ।

शर्मिष्ठोवाच

श्लोक 9 (1.77.9)

तपसा तेजसा चैव दीप्यमानं यथा रविम् । तं दृष्ट्वा मम संप्रष्टुं शक्तिर्नासीच्छुचिस्मिते ॥

tapasā tejasā caiva dīpyamānaṃ yathā ravim | taṃ dṛṣṭvā mama saṃpraṣṭuṃ śaktirnāsīcchucismite

वे तप और तेज से सूर्य के समान दमक रहे थे। हे शुचिस्मिते! उन्हें देखकर उनसे कुछ पूछने की शक्ति मुझमें नहीं रही।

देवयान्युवाच

श्लोक 10 (1.77.10)

यद्येतदेवं शर्मिष्ठे न मन्युर्विद्यते मम । अपत्यं यदि ते लब्धं ज्येष्ठाच्छ्रेष्ठाच्च वै द्विजात् ॥

yadyetadevaṃ śarmiṣṭhe na manyurvidyate mama | apatyaṃ yadi te labdhaṃ jyeṣṭhācchreṣṭhācca vai dvijāt

शर्मिष्ठा! यदि ऐसा ही है, और यदि तुम्हें किसी ज्येष्ठ और श्रेष्ठ ब्राह्मण से सन्तान मिली है, तो मुझे कोई क्रोध नहीं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 11 (1.77.11)

अन्योन्यमेवमुक्त्वा तु संप्रहस्य च ते मिथः । जगाम भार्गवी वेश्म तथ्यमित्यवजग्मुषी ॥

anyonyamevamuktvā tu saṃprahasya ca te mithaḥ | jagāma bhārgavī veśma tathyamityavajagmuṣī

इस प्रकार आपस में बात करके और साथ हँसकर भृगुवंश की वह कन्या इसे सत्य मानकर अपने भवन को लौट गई।

श्लोक 12 (1.77.12)

ययातिर्देवयान्यां तु पुत्रावजनयन्नृपः । यदुं च तुर्वसुं चैव शक्रविष्णू इवापरौ ॥

yayātirdevayānyāṃ tu putrāvajanayannṛpaḥ | yaduṃ ca turvasuṃ caiva śakraviṣṇū ivāparau

राजा ययाति ने देवयानी से दो पुत्र उत्पन्न किए — यदु और तुर्वसु, जो मानो दूसरे इन्द्र और विष्णु थे।

श्लोक 13 (1.77.13)

तस्मिन्काले तु राजर्षिर्ययातिः पृथिवीपतिः । माध्वीकरससंयुक्तां मदिरां मदवर्धनीम् ॥

tasminkāle tu rājarṣiryayātiḥ pṛthivīpatiḥ | mādhvīkarasasaṃyuktāṃ madirāṃ madavardhanīm

उसी समय पृथ्वीपति राजर्षि ययाति ने माध्वीक-रस से मिली, मद बढ़ाने वाली मदिरा

श्लोक 14 (1.77.14)

पाययामास शुक्रस्य तनयां रक्तपिङ्गलाम् । पीत्वा पीत्वा च मदिरां देवयानी मुमोह सा ॥

pāyayāmāsa śukrasya tanayāṃ raktapiṅgalām | pītvā pītvā ca madirāṃ devayānī mumoha sā

शुक्राचार्य की लाल-पिंगल वर्ण वाली पुत्री को पिला दी। बार-बार मदिरा पीकर देवयानी बेसुध हो गई।

श्लोक 15 (1.77.15)

रुदती गायमाना च नृत्यन्ती च मुहुर्मुहुः । बहु प्रलपती देवी राजानमिदमब्रवीत् ॥

rudatī gāyamānā ca nṛtyantī ca muhurmuhuḥ | bahu pralapatī devī rājānamidamabravīt

बार-बार रोती, गाती और नाचती हुई, बहुत प्रलाप करती हुई उस देवी ने राजा से यह कहा —

देवयान्युवाच

श्लोक 16 (1.77.16)

राजवद्रूपवेषौ ते किमर्थं त्वमिहागतः । केन कार्येण संप्राप्तो निर्जनं गहनं वनम् ॥

rājavadrūpaveṣau te kimarthaṃ tvamihāgataḥ | kena kāryeṇa saṃprāpto nirjanaṃ gahanaṃ vanam

तुम्हारा रूप और वेश राजा जैसा है; तुम यहाँ किसलिए आए हो? किस काम से इस निर्जन, घने वन में पहुँचे हो?

श्लोक 17 (1.77.17)

द्विजश्रेष्ठ नृपश्रेष्ठो ययातिश्चोग्रदर्शनः । तस्मादितः पलायस्व हितमिच्छसि चेद्द्विज ॥

dvijaśreṣṭha nṛpaśreṣṭho yayātiścogradarśanaḥ | tasmāditaḥ palāyasva hitamicchasi ceddvija

हे द्विजश्रेष्ठ! राजाओं में श्रेष्ठ ययाति बड़े उग्र दिखते हैं। इसलिए हे ब्राह्मण, यदि अपना भला चाहते हो तो यहाँ से भाग जाओ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (1.77.18)

इत्येवं प्रलपन्तीं तां देवयानीं तु नाहुषः । भर्त्सयामास वचनैरनर्हां पापवर्धनीम् ॥

ityevaṃ pralapantīṃ tāṃ devayānīṃ tu nāhuṣaḥ | bhartsayāmāsa vacanairanarhāṃ pāpavardhanīm

इस प्रकार प्रलाप करती हुई देवयानी को नहुषपुत्र ययाति ने अयोग्य और पाप बढ़ाने वाली मानकर कठोर वचनों से फटकारा।

श्लोक 19 (1.77.19)

ततो वर्षवरान्मूकान्व्यङ्गान्वृद्धांश्च पङ्गुकान् । रक्षणे देवयान्याः स पोषणे च शशास तान् ॥

tato varṣavarānmūkānvyaṅgānvṛddhāṃśca paṅgukān | rakṣaṇe devayānyāḥ sa poṣaṇe ca śaśāsa tān

फिर उसने नपुंसकों, गूँगों, विकलांगों, बूढ़ों और लँगड़ों को देवयानी की रक्षा और देखभाल के लिए नियुक्त कर दिया।

श्लोक 20 (1.77.20)

ततस्तु नाहुषो राजा शर्मिष्ठां प्राप्य बुद्धिमान् । रेमे च सुचिरं कालं तया शर्मिष्ठया सह ॥

tatastu nāhuṣo rājā śarmiṣṭhāṃ prāpya buddhimān | reme ca suciraṃ kālaṃ tayā śarmiṣṭhayā saha

तब बुद्धिमान नहुषपुत्र राजा शर्मिष्ठा को पाकर बहुत समय तक उसके साथ रमण करता रहा।

श्लोक 21 (1.77.21)

तस्मादेव तु राजर्षेः शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी । द्रुह्युं चानुं च पूरुं च त्रीन्कुमारानजीजनत् ॥

tasmādeva tu rājarṣeḥ śarmiṣṭhā vārṣaparvaṇī | druhyuṃ cānuṃ ca pūruṃ ca trīnkumārānajījanat

उसी राजर्षि से वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा ने तीन पुत्रों को जन्म दिया — द्रुह्यु, अनु और पूरु।

श्लोक 22 (1.77.22)

ततः काले तु कस्मिंश्चिद्देवयानी शुचिस्मिता । ययातिसहिता राजञ्जगाम रहितं वनम् ॥

tataḥ kāle tu kasmiṃściddevayānī śucismitā | yayātisahitā rājañjagāma rahitaṃ vanam

हे राजन्! फिर किसी समय पवित्र मुस्कान वाली देवयानी ययाति के साथ एक एकान्त वन में गई।

श्लोक 23 (1.77.23)

ददर्श च तदा तत्र कुमारान्देवरूपिणः । क्रीडमानान्सुविश्रब्धान्विस्मिता चेदमब्रवीत् ॥

dadarśa ca tadā tatra kumārāndevarūpiṇaḥ | krīḍamānānsuviśrabdhānvismitā cedamabravīt

वहाँ उसने देवताओं जैसे रूप वाले बालकों को निश्चिन्त होकर खेलते देखा, और विस्मित होकर यह कहा —

देवयान्युवाच

श्लोक 24 (1.77.24)

कस्यैते दारका राजन्देवपुत्रोपमाः शुभाः । वर्चसा रूपतश्चैव सदृशा मे मतास्तव ॥

kasyaite dārakā rājandevaputropamāḥ śubhāḥ | varcasā rūpataścaiva sadṛśā me matāstava

हे राजन्! देवपुत्रों के समान ये सुन्दर बालक किसके हैं? तेज और रूप में ये मुझे तुम्हारे ही समान लगते हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 25 (1.77.25)

एवं पृष्ट्वा तु राजानं कुमारान्पर्यपृच्छत ॥

evaṃ pṛṣṭvā tu rājānaṃ kumārānparyapṛcchata

राजा से ऐसा पूछकर उसने बालकों से पूछा।

श्लोक 26 (1.77.26)

तस्मिन्काले तु तच्छ्रुत्वा धात्री तेषां वचोऽब्रवीत् । किं न ब्रूत कुमारा वः पितरं वै द्विजर्षभम् ॥

tasminkāle tu tacchrutvā dhātrī teṣāṃ vaco'bravīt | kiṃ na brūta kumārā vaḥ pitaraṃ vai dvijarṣabham

उसी समय यह सुनकर उनकी धाय ने उनसे कहा — "बच्चो! तुम अपने पिता, उन श्रेष्ठ ब्राह्मण के विषय में क्यों नहीं बताते?"

कुमारा ऊचुः

श्लोक 27 (1.77.27)

ऋषिश्च ब्राह्मणश्चैव द्विजातिश्चैव नः पिता । शर्मिष्ठा नानृतं ब्रूते देवयानि क्षमस्व नः ॥

ṛṣiśca brāhmaṇaścaiva dvijātiścaiva naḥ pitā | śarmiṣṭhā nānṛtaṃ brūte devayāni kṣamasva naḥ

हमारे पिता ऋषि हैं, ब्राह्मण हैं, द्विज हैं। शर्मिष्ठा झूठ नहीं बोलतीं। देवयानी, हमें क्षमा करो।

देवयान्युवाच

श्लोक 28 (1.77.28)

किंनामधेयगोत्रो वः पुत्रका ब्राह्मणः पिता । प्रब्रूत तत्त्वतः क्षिप्रं कश्चासौ क्व च वर्तते ॥

kiṃnāmadheyagotro vaḥ putrakā brāhmaṇaḥ pitā | prabrūta tattvataḥ kṣipraṃ kaścāsau kva ca vartate

बच्चो! तुम्हारे ब्राह्मण पिता का नाम और गोत्र क्या है? शीघ्र ठीक-ठीक बताओ — वे कौन हैं और कहाँ रहते हैं?

श्लोक 29 (1.77.29)

प्रब्रूत मे यथा तथ्यं श्रोतुमिच्छामि तं ह्यहम् । एवमुक्ताः कुमारास्ते देवयान्या सुमध्यया ॥

prabrūta me yathā tathyaṃ śrotumicchāmi taṃ hyaham | evamuktāḥ kumārāste devayānyā sumadhyayā

"मुझे सच-सच बताओ; मैं उनके विषय में सुनना चाहती हूँ।" सुन्दर कटि वाली देवयानी के ऐसा कहने पर उन बालकों ने

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 30 (1.77.30)

तेऽदर्शयन्प्रदेशिन्या तमेव नृपसत्तमम् । शर्मिष्ठां मातरं चैव तथाऽऽचख्युश्च दारकाः ॥

te'darśayanpradeśinyā tameva nṛpasattamam | śarmiṣṭhāṃ mātaraṃ caiva tathā''cakhyuśca dārakāḥ

तर्जनी उँगली से उसी श्रेष्ठ राजा की ओर संकेत किया, और यह भी बताया कि शर्मिष्ठा उनकी माता है।

श्लोक 31 (1.77.31)

इत्युक्त्वा सहितास्ते तु राजानमुपचक्रमुः । नाभ्यनन्दत तान्राजा देवयान्यास्तदान्तिके ॥

ityuktvā sahitāste tu rājānamupacakramuḥ | nābhyanandata tānrājā devayānyāstadāntike

यह कहकर वे सब बालक एक साथ राजा के पास गए, पर देवयानी के निकट होने के कारण राजा ने उनका स्वागत नहीं किया।

श्लोक 32 (1.77.32)

रुदन्तस्तेऽथ शर्मिष्ठामभ्ययुर्बालकास्ततः । अविब्रुवन्ती किंचिच्च राजानं चारुलोचना ॥

rudantaste'tha śarmiṣṭhāmabhyayurbālakāstataḥ | avibruvantī kiṃcicca rājānaṃ cārulocanā

तब वे बालक रोते हुए शर्मिष्ठा के पास चले गए। राजा से कुछ भी न कहती हुई वह सुन्दर नेत्रों वाली

श्लोक 33 (1.77.33)

नातिदूराच्च राजानं सा चातिष्ठदवाङ्मुखी । श्रुत्वा तेषां तु बालानां सव्रीड इव पार्थिवः ॥

nātidūrācca rājānaṃ sā cātiṣṭhadavāṅmukhī | śrutvā teṣāṃ tu bālānāṃ savrīḍa iva pārthivaḥ

राजा से थोड़ी ही दूर मुँह नीचा किए खड़ी रही। उन बालकों की बात सुनकर राजा लज्जित-सा हो गया;

श्लोक 34 (1.77.34)

प्रतिवक्तुमशक्तोऽभूत्तूष्णींभूतोऽभवन्नृपः । दृष्ट्वा तु तेषां बालानां प्रणयं पार्थिवं प्रति ॥

prativaktumaśakto'bhūttūṣṇīṃbhūto'bhavannṛpaḥ | dṛṣṭvā tu teṣāṃ bālānāṃ praṇayaṃ pārthivaṃ prati

वह कुछ उत्तर न दे सका और चुप हो गया। राजा के प्रति बालकों का स्नेह देखकर

श्लोक 35 (1.77.35)

बुद्ध्वा तु तत्त्वतो देवी शर्मिष्ठामिदमब्रवीत् । अभ्यागच्छति मां कश्चिदृषिरित्येवमब्रवीः ॥

buddhvā tu tattvato devī śarmiṣṭhāmidamabravīt | abhyāgacchati māṃ kaścidṛṣirityevamabravīḥ

और वास्तविकता समझकर देवी देवयानी ने शर्मिष्ठा से यह कहा — "तुमने कहा था कि कोई ऋषि मेरे पास आते हैं।"

देवयान्युवाच

श्लोक 36 (1.77.36)

ययातिमेवं राजानं त्वं गोपायसि भामिनि । पूर्वमेव मया प्रोक्तं त्वया तु वृजिनं कृतम् ॥

yayātimevaṃ rājānaṃ tvaṃ gopāyasi bhāmini | pūrvameva mayā proktaṃ tvayā tu vṛjinaṃ kṛtam

तो हे भामिनी! तुम राजा ययाति को ही छिपाती रही हो। मैंने पहले ही तुमसे कह दिया था, फिर भी तुमने यह पाप किया।

श्लोक 37 (1.77.37)

मदधीना सती कस्मादकार्षीर्विप्रियं मम । तमेवाऽऽसुरधर्मं त्वमास्थिता न बिभेषि मे ॥

madadhīnā satī kasmādakārṣīrvipriyaṃ mama | tamevā''suradharmaṃ tvamāsthitā na bibheṣi me

मेरे अधीन रहकर भी तुमने मेरा अप्रिय क्यों किया? तुमने वही असुरों वाला आचरण अपना लिया है, और तुम्हें मुझसे डर भी नहीं लगता।

शर्मिष्ठोवाच

श्लोक 38 (1.77.38)

यदुक्तमृषिरित्येव तत्सत्यं चारुहासिनि । न्यायतो धर्मतश्चैव चरन्ती न बिभेमि ते ॥

yaduktamṛṣirityeva tatsatyaṃ cāruhāsini | nyāyato dharmataścaiva carantī na bibhemi te

हे सुन्दर हास वाली! मैंने जो "ऋषि" कहा था, वह सत्य है। मैं न्याय और धर्म के अनुसार आचरण करती हूँ, इसलिए तुमसे नहीं डरती।

श्लोक 39 (1.77.39)

यदा त्वया वृतो भर्ता वृत एव तदा मया । सखीभर्ता हि धर्मेण भर्ता भवति शोभने ॥

yadā tvayā vṛto bhartā vṛta eva tadā mayā | sakhībhartā hi dharmeṇa bhartā bhavati śobhane

जब तुमने उन्हें पति रूप में चुना, उसी समय मैंने भी उन्हें चुन लिया था। हे शोभने! धर्म के अनुसार सखी का पति अपना भी पति होता है।

श्लोक 40 (1.77.40)

पूज्यासि मम मान्या च ज्येष्ठा च ब्राह्मणी ह्यसि । त्वत्तोऽपि मे पूज्यतमो राजर्षिः किं न वेत्थ तत् ॥

pūjyāsi mama mānyā ca jyeṣṭhā ca brāhmaṇī hyasi | tvatto'pi me pūjyatamo rājarṣiḥ kiṃ na vettha tat

तुम मेरे लिए पूज्य और माननीय हो, क्योंकि तुम ज्येष्ठ हो और ब्राह्मणी हो। पर तुमसे भी अधिक पूजनीय मेरे लिए ये राजर्षि हैं — क्या तुम यह नहीं जानतीं?

श्लोक 41 (1.77.41)

त्वत्पित्रा मम गुरुणा सह दत्ते उभे शुभे । ततो भर्ता च पूज्यश्च पोष्यां पोषयतीह माम् ॥

tvatpitrā mama guruṇā saha datte ubhe śubhe | tato bhartā ca pūjyaśca poṣyāṃ poṣayatīha mām

हे शुभे! तुम्हारे पिता, मेरे गुरु ने हम दोनों को एक साथ ही उन्हें सौंपा था। इसलिए वे मेरे पति हैं, पूज्य हैं, और मुझे भरण-पोषण योग्य मानकर पालते हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 42 (1.77.42)

श्रुत्वा तस्यास्ततो वाक्यं देवयान्यब्रवीदिदम् । रमस्वेह यथाकामं देव्या शर्मिष्ठया सह ॥

śrutvā tasyāstato vākyaṃ devayānyabravīdidam | ramasveha yathākāmaṃ devyā śarmiṣṭhayā saha

उसकी बात सुनकर देवयानी ने यह कहा — "अब तुम यहाँ अपनी रानी शर्मिष्ठा के साथ मनचाहा रमण करो।

श्लोक 43 (1.77.43)

राजन्नाद्येह वत्स्यामि विप्रियं मे कृतं त्वया । इति जज्वाल कोपेन देवयानी ततो भृशम् ॥

rājannādyeha vatsyāmi vipriyaṃ me kṛtaṃ tvayā | iti jajvāla kopena devayānī tato bhṛśam

राजन्! आज मैं यहाँ नहीं रहूँगी; तुमने मेरा अप्रिय किया है।" यह कहकर देवयानी क्रोध से अत्यन्त प्रज्वलित हो उठी,

श्लोक 44 (1.77.44)

निर्दहन्तीव सव्रीडां शर्मिष्ठां समुदीक्ष्य च । अपविध्य च सर्वाणि भूषणान्यसितेक्षणा ॥

nirdahantīva savrīḍāṃ śarmiṣṭhāṃ samudīkṣya ca | apavidhya ca sarvāṇi bhūṣaṇānyasitekṣaṇā

और लज्जित शर्मिष्ठा को ऐसे देखती हुई मानो उसे जला डालेगी, उस कजरारे नेत्रों वाली ने अपने सारे आभूषण उतार फेंके।

श्लोक 45 (1.77.45)

सहसोत्पतितां श्यामां दृष्ट्वा तां साश्रुलोचनाम् । तूर्णं सकाशं काव्यस्य प्रस्थितां व्यथितस्तदा ॥

sahasotpatitāṃ śyāmāṃ dṛṣṭvā tāṃ sāśrulocanām | tūrṇaṃ sakāśaṃ kāvyasya prasthitāṃ vyathitastadā

उस श्यामा को अचानक उठकर, आँखों में आँसू भरे, तेज़ी से काव्य (शुक्राचार्य) के पास जाते देख राजा व्यथित हो उठा।

श्लोक 46 (1.77.46)

अनुवव्राज संभ्रान्तः पृष्ठतः सान्त्वयन्नृपः । न्यवर्तत नचैव स्म क्रोधसंरक्तलोचना ॥

anuvavrāja saṃbhrāntaḥ pṛṣṭhataḥ sāntvayannṛpaḥ | nyavartata nacaiva sma krodhasaṃraktalocanā

घबराकर राजा उसे मनाते हुए उसके पीछे-पीछे चला, पर क्रोध से लाल नेत्रों वाली वह लौटी नहीं।

श्लोक 47 (1.77.47)

अविब्रुवन्ती किंचित्सा राजानं साश्रुलोचना । अचिरादेव संप्राप्ता काव्यस्योशनसोऽन्तिकम् ॥

avibruvantī kiṃcitsā rājānaṃ sāśrulocanā | acirādeva saṃprāptā kāvyasyośanaso'ntikam

राजा से कुछ भी न बोलती हुई, आँसू भरे नेत्रों वाली वह शीघ्र ही उशना काव्य के पास पहुँच गई।

श्लोक 48 (1.77.48)

सा तु दृष्ट्वैव पितरमभिवाद्याग्रतः स्थिता । अनन्तरं ययातिस्तु पूजयामास भार्गवम् ॥

sā tu dṛṣṭvaiva pitaramabhivādyāgrataḥ sthitā | anantaraṃ yayātistu pūjayāmāsa bhārgavam

पिता को देखते ही वह प्रणाम करके उनके सामने खड़ी हो गई; उसके तुरन्त बाद ययाति ने भी भृगुवंशी शुक्राचार्य का पूजन किया।

देवयान्युवाच

श्लोक 49 (1.77.49)

अधर्मेण जितो धर्मः प्रवृत्तमधरोत्तरम् । शर्मिष्ठयाऽतिवृत्ताऽस्मि दुहित्रा वृषपर्वणः ॥

adharmeṇa jito dharmaḥ pravṛttamadharottaram | śarmiṣṭhayā'tivṛttā'smi duhitrā vṛṣaparvaṇaḥ

अधर्म ने धर्म को जीत लिया है; सब कुछ उलट-पुलट हो गया है। वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा ने मेरा अतिक्रमण किया है।

श्लोक 50 (1.77.50)

त्रयोऽस्यां जनिताः पुत्रा राज्ञाऽनेन ययातिना । दुर्भगाया मम द्वौ तु पुत्रौ तात ब्रवीमि ते ॥

trayo'syāṃ janitāḥ putrā rājñā'nena yayātinā | durbhagāyā mama dvau tu putrau tāta bravīmi te

पिताजी! मैं आपसे कहती हूँ — इस राजा ययाति ने उससे तीन पुत्र उत्पन्न किए हैं, और मुझ अभागिन के केवल दो पुत्र हैं।

श्लोक 51 (1.77.51)

धर्मज्ञ इति विख्यात एष राजा भृगूद्वह । अतिक्रान्तश्च मर्यादां काव्यैतत्कथयामि ते ॥

dharmajña iti vikhyāta eṣa rājā bhṛgūdvaha | atikrāntaśca maryādāṃ kāvyaitatkathayāmi te

हे भृगुश्रेष्ठ! यह राजा धर्मज्ञ के रूप में प्रसिद्ध है, फिर भी इसने मर्यादा का उल्लंघन किया है। हे काव्य, मैं आपसे यही कहती हूँ।

शुक्र उवाच

श्लोक 52 (1.77.52)

धर्मज्ञः सन्महाराज योऽधर्ममकृथाः प्रियम् । तस्माज्जरा त्वामचिराद्धर्षयिष्यति दुर्जया ॥

dharmajñaḥ sanmahārāja yo'dharmamakṛthāḥ priyam | tasmājjarā tvāmacirāddharṣayiṣyati durjayā

महाराज! धर्म जानते हुए भी तुमने अपनी रुचि से अधर्म किया है, इसलिए दुर्जय बुढ़ापा शीघ्र ही तुम्हें आ दबोचेगा।

ययातिरुवाच

श्लोक 53 (1.77.53)

ऋतुं वै याचमानाया भगवन्नान्यचेतसा । दुहितुर्दानवेन्द्रस्य धर्म्यमेतत्कृतं मया ॥

ṛtuṃ vai yācamānāyā bhagavannānyacetasā | duhiturdānavendrasya dharmyametatkṛtaṃ mayā

भगवन्! दानवराज की पुत्री ने मुझसे ऋतुकाल की याचना की थी; मैंने किसी अन्य भावना से नहीं, धर्म के अनुसार ही यह किया।

श्लोक 54 (1.77.54)

ऋतुं वै याचमानाया न ददाति पुमानृतुम् । भ्रूणहेत्युच्यते ब्रह्मन् स इह ब्रह्मवादिभिः ॥

ṛtuṃ vai yācamānāyā na dadāti pumānṛtum | bhrūṇahetyucyate brahman sa iha brahmavādibhiḥ

हे ब्रह्मन्! जो पुरुष ऋतुकाल की याचना करने वाली स्त्री को ऋतुदान नहीं देता, उसे वेदवेत्ता भ्रूणहत्यारा कहते हैं।

श्लोक 55 (1.77.55)

अभिकामां स्त्रियं यश्च गम्यां रहसि याचितः । नोपैति स च धर्मेषु भ्रूणहेत्युच्यते बुधैः ॥

abhikāmāṃ striyaṃ yaśca gamyāṃ rahasi yācitaḥ | nopaiti sa ca dharmeṣu bhrūṇahetyucyate budhaiḥ

और जो पुरुष एकान्त में किसी कामना करने वाली, समागम-योग्य स्त्री के याचना करने पर भी उसके पास नहीं जाता, उसे विद्वान धर्म की दृष्टि से भ्रूणहत्यारा कहते हैं।

श्लोक 56 (1.77.56)

यद्यद्वृणोति मां कश्चित्तत्तद्देयमिति व्रतम् । त्वया च सापि दत्ता मे नान्यं नाथमिहेच्छति ॥

yadyadvṛṇoti māṃ kaścittattaddeyamiti vratam | tvayā ca sāpi dattā me nānyaṃ nāthamihecchati

मेरा व्रत है कि कोई भी मुझसे जो-जो माँगे, वह-वह देना ही चाहिए। आपने भी उसे मुझे सौंपा था; वह यहाँ किसी अन्य स्वामी को नहीं चाहती।

श्लोक 57 (1.77.57)

इत्येतानि समीक्ष्याहं कारणानि भृगूद्वह । अधर्मभयसंविग्नः शर्मिष्ठामुपजग्मिवान् । मत्वैतन्मे धर्म इति कृतं ब्रह्मन्क्षमस्व माम् ॥

ityetāni samīkṣyāhaṃ kāraṇāni bhṛgūdvaha | adharmabhayasaṃvignaḥ śarmiṣṭhāmupajagmivān | matvaitanme dharma iti kṛtaṃ brahmankṣamasva mām

हे भृगुश्रेष्ठ! इन्हीं कारणों पर विचार करके और अधर्म के भय से व्याकुल होकर मैं शर्मिष्ठा के पास गया। इसे अपना धर्म मानकर ही मैंने ऐसा किया; हे ब्रह्मन्, मुझे क्षमा करें।

शुक्र उवाच

श्लोक 58 (1.77.58)

नन्वहं प्रत्यवेक्ष्यस्ते मदधीनोऽसि पार्थिव । मिथ्याचारस्य धर्मेषु चौर्यं भवति नाहुष ॥

nanvahaṃ pratyavekṣyaste madadhīno'si pārthiva | mithyācārasya dharmeṣu cauryaṃ bhavati nāhuṣa

राजन्! तुम मेरे अधीन हो, अतः तुम्हें मेरी ओर देखना चाहिए था। हे नहुषपुत्र! धर्म के विषय में मिथ्या आचरण करने वाले का ऐसा कर्म चोरी ही है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 59 (1.77.59)

क्रुद्धेनोशनसा शप्तो ययातिर्नाहुषस्तदा । पूर्वं वयः परित्यज्य जरां सद्योऽन्वपद्यत ॥

kruddhenośanasā śapto yayātirnāhuṣastadā | pūrvaṃ vayaḥ parityajya jarāṃ sadyo'nvapadyata

क्रुद्ध उशना के शाप से नहुषपुत्र ययाति ने उसी समय अपनी पहली अवस्था खो दी और तत्काल बुढ़ापे को प्राप्त हो गया।

ययातिरुवाच

श्लोक 60 (1.77.60)

अतृप्तो यौवनस्याहं देवयान्यां भृगूद्वह । प्रसादं कुरु मे ब्रह्मञ्जरेयं न विशेच्च माम् ॥

atṛpto yauvanasyāhaṃ devayānyāṃ bhṛgūdvaha | prasādaṃ kuru me brahmañjareyaṃ na viśecca mām

हे भृगुश्रेष्ठ! देवयानी के साथ मैं अभी यौवन से तृप्त नहीं हुआ हूँ। हे ब्रह्मन्, मुझ पर कृपा कीजिए, यह बुढ़ापा मुझमें प्रवेश न करे।

शुक्र उवाच

श्लोक 61 (1.77.61)

नाहं मृषा ब्रवीम्येतज्जरां प्राप्तोऽसि भूमिप । जरां त्वेतां त्वमन्यस्मिन्संक्रामय यदीच्छसि ॥

nāhaṃ mṛṣā bravīmyetajjarāṃ prāpto'si bhūmipa | jarāṃ tvetāṃ tvamanyasminsaṃkrāmaya yadīcchasi

हे भूपाल! मैं झूठ नहीं बोलता; तुम्हें बुढ़ापा आ चुका है। पर यदि चाहो तो इस बुढ़ापे को किसी दूसरे में संक्रमित कर दो।

ययातिरुवाच

श्लोक 62 (1.77.62)

राज्यभाक्स भवेद्ब्रह्मन्पुण्यभाक्कीर्तिभाक्तथा । यो मे दद्याद्वयः पुत्रस्तद्भवाननुमन्यताम् ॥

rājyabhāksa bhavedbrahmanpuṇyabhākkīrtibhāktathā | yo me dadyādvayaḥ putrastadbhavānanumanyatām

हे ब्रह्मन्! जो पुत्र मुझे अपनी युवावस्था दे, वही राज्य, पुण्य और कीर्ति का भागी हो। आप इसकी अनुमति दें।

शुक्र उवाच

श्लोक 63 (1.77.63)

संक्रामयिष्यसि जरां यथेष्टं नहुषात्मज । मामनुध्याय भावेन न च पापमवाप्स्यसि ॥

saṃkrāmayiṣyasi jarāṃ yatheṣṭaṃ nahuṣātmaja | māmanudhyāya bhāvena na ca pāpamavāpsyasi

हे नहुषनन्दन! तुम अपनी इच्छा के अनुसार बुढ़ापे को दूसरे में संक्रमित कर सकोगे। भक्तिभाव से मेरा ध्यान करना, तो तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा।

श्लोक 64 (1.77.64)

वयो दास्यति ते पुत्रो यः स राजा भविष्यति । आयुष्मान्कीर्तिमांश्चैव बह्वपत्यस्तथैव च ॥

vayo dāsyati te putro yaḥ sa rājā bhaviṣyati | āyuṣmānkīrtimāṃścaiva bahvapatyastathaiva ca

जो पुत्र तुम्हें अपनी युवावस्था देगा, वही राजा होगा — दीर्घायु, यशस्वी और बहुत सन्तानों वाला।

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