Skip to main content

आदि पर्व · अध्याय 78

ययाति का पुत्रों से यौवन माँगना

बूढ़े हो चुके ययाति अपनी राजधानी लौटकर एक-एक करके अपने पुत्रों से कहते हैं कि वे एक हज़ार वर्ष के लिए उनका बुढ़ापा लेकर अपना यौवन उन्हें दे दें। यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु इनकार कर देते हैं, और ययाति प्रत्येक को शाप देते हैं: यदु की सन्तान राज्य की भागी नहीं होगी, तुर्वसु म्लेच्छों का राजा होगा, द्रुह्यु के वंशज घोड़ों और रथों से रहित देश में राज्यहीन "भोज" कहलाएँगे, और अनु की सन्तानें युवावस्था में ही मर जाएँगी। सबसे छोटा पुत्र पूरु प्रसन्नता से स्वीकार करता है; ययाति उसे आशीर्वाद देकर शुक्राचार्य का स्मरण करते हैं और अपना बुढ़ापा पूरु को दे देते हैं।

अध्याय 77अध्याय-सूचीअध्याय 79

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (1.78.1)

जरां प्राप्य ययातिस्तु स्वपुरं प्राप्य चैव हि । पुत्रं ज्येष्ठं वरिष्ठं च यदुमित्यब्रवीद्वचः ॥

jarāṃ prāpya yayātistu svapuraṃ prāpya caiva hi | putraṃ jyeṣṭhaṃ variṣṭhaṃ ca yadumityabravīdvacaḥ

बुढ़ापा प्राप्त करके ययाति अपनी राजधानी लौटे और अपने ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ पुत्र यदु से यह वचन बोले —

ययातिरुवाच

श्लोक 2 (1.78.2)

जरा वली च मां तात पलितानि च पर्यगुः । काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने ॥

jarā valī ca māṃ tāta palitāni ca paryaguḥ | kāvyasyośanasaḥ śāpānna ca tṛpto'smi yauvane

तात! उशना काव्य के शाप से बुढ़ापे, झुर्रियों और पके बालों ने मुझे घेर लिया है, पर मैं अभी यौवन से तृप्त नहीं हुआ हूँ।

श्लोक 3 (1.78.3)

त्वं यदो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह । यौवनेन त्वदीयेन चरेयं विषयानहम् ॥

tvaṃ yado pratipadyasva pāpmānaṃ jarayā saha | yauvanena tvadīyena careyaṃ viṣayānaham

यदु! बुढ़ापे के साथ मेरा यह कष्ट तुम ग्रहण कर लो, ताकि तुम्हारी जवानी से मैं विषयों का भोग कर सकूँ।

श्लोक 4 (1.78.4)

पूर्णे वर्षसहस्रे तु पुनस्ते यौवनं त्वहम् । दत्त्वा स्वं प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह ॥

pūrṇe varṣasahasre tu punaste yauvanaṃ tvaham | dattvā svaṃ pratipatsyāmi pāpmānaṃ jarayā saha

पूरे एक हज़ार वर्ष बीत जाने पर मैं तुम्हारा यौवन तुम्हें लौटाकर बुढ़ापे सहित अपना कष्ट फिर से ले लूँगा।

यदुरुवाच

श्लोक 5 (1.78.5)

जरायां बहवो दोषाः पानभोजनकारिताः । तस्माज्जरां न ते राजन्ग्रहीष्य इति मे मतिः ॥

jarāyāṃ bahavo doṣāḥ pānabhojanakāritāḥ | tasmājjarāṃ na te rājangrahīṣya iti me matiḥ

बुढ़ापे में खाने-पीने से जुड़े अनेक दोष होते हैं। इसलिए हे राजन्, मैं आपका बुढ़ापा नहीं लूँगा — यही मेरा विचार है।

श्लोक 6 (1.78.6)

सितश्मश्रुर्निरानन्दो जरया शिथिलीकृतः । वलीसङ्गतगात्रस्तु दुर्दर्शो दुर्बलः कृशः ॥

sitaśmaśrurnirānando jarayā śithilīkṛtaḥ | valīsaṅgatagātrastu durdarśo durbalaḥ kṛśaḥ

सफ़ेद दाढ़ी वाला, आनन्दहीन, बुढ़ापे से शिथिल, झुर्रियों से भरे अंगों वाला, देखने में अप्रिय, दुर्बल और कृश,

श्लोक 7 (1.78.7)

अशक्तः कार्यकरणे परिभूतः स यौवतैः । सहोपजीविभिश्चैव तां जरां नाभिकामये ॥

aśaktaḥ kāryakaraṇe paribhūtaḥ sa yauvataiḥ | sahopajīvibhiścaiva tāṃ jarāṃ nābhikāmaye

काम-काज करने में असमर्थ, युवतियों और आश्रितों द्वारा समान रूप से तिरस्कृत — ऐसा बुढ़ापा मैं नहीं चाहता।

श्लोक 8 (1.78.8)

सन्ति ते बहवः पुत्रा मत्तः प्रियतरा नृप । जरां ग्रहीतुं धर्मज्ञ तस्मादन्यं वृणीष्व वै ॥

santi te bahavaḥ putrā mattaḥ priyatarā nṛpa | jarāṃ grahītuṃ dharmajña tasmādanyaṃ vṛṇīṣva vai

राजन्! आपके मुझसे भी अधिक प्रिय बहुत से पुत्र हैं। हे धर्मज्ञ, बुढ़ापा लेने के लिए किसी और को चुन लीजिए।

ययातिरुवाच

श्लोक 9 (1.78.9)

यत्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि । तस्मादराज्यभाक्तात प्रजा तव भविष्यति ॥

yattvaṃ me hṛdayājjāto vayaḥ svaṃ na prayacchasi | tasmādarājyabhāktāta prajā tava bhaviṣyati

तात! तुम मेरे हृदय से उत्पन्न होकर भी मुझे अपनी युवावस्था नहीं दे रहे, इसलिए तुम्हारी सन्तान राज्य की भागी नहीं होगी।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 10 (1.78.10)

प्रत्याख्यातस्तु राजा स तुर्वसुं प्रत्युवाच ह । तुर्वसो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह । यौवनेन चरेयं वै विषयांस्तव पुत्रक ॥

pratyākhyātastu rājā sa turvasuṃ pratyuvāca ha | turvaso pratipadyasva pāpmānaṃ jarayā saha | yauvanena careyaṃ vai viṣayāṃstava putraka

इस प्रकार इनकार पाकर राजा ने तुर्वसु से कहा — "तुर्वसु! बुढ़ापे सहित मेरा कष्ट तुम ग्रहण कर लो; बेटा, तुम्हारे यौवन से मैं विषयों का भोग करूँ।"

ययातिरुवाच

श्लोक 11 (1.78.11)

पूर्णे वर्षसहस्रे तु पुनर्दास्यामि यौवनम् । स्वं चैव प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह ॥

pūrṇe varṣasahasre tu punardāsyāmi yauvanam | svaṃ caiva pratipatsyāmi pāpmānaṃ jarayā saha

पूरे एक हज़ार वर्ष बीतने पर मैं तुम्हें तुम्हारा यौवन लौटा दूँगा और बुढ़ापे सहित अपना कष्ट फिर से ग्रहण कर लूँगा।

तुर्वसुरुवाच

श्लोक 12 (1.78.12)

न कामये जरां तात कामभोगप्रणाशिनीम् । बलरूपान्तकरणीं बुद्धिप्राणप्रणाशिनीम् ॥

na kāmaye jarāṃ tāta kāmabhogapraṇāśinīm | balarūpāntakaraṇīṃ buddhiprāṇapraṇāśinīm

पिताजी! मैं बुढ़ापा नहीं चाहता, जो काम और भोग का नाश करता है, बल और रूप का अन्त कर देता है तथा बुद्धि और प्राणशक्ति को नष्ट कर देता है।

ययातिरुवाच

श्लोक 13 (1.78.13)

यत्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि । तस्मात्प्रजा समुच्छेदं तुर्वसो तव यास्यति ॥

yattvaṃ me hṛdayājjāto vayaḥ svaṃ na prayacchasi | tasmātprajā samucchedaṃ turvaso tava yāsyati

तुर्वसु! तुम मेरे हृदय से उत्पन्न होकर भी अपनी युवावस्था नहीं दे रहे, इसलिए तुम्हारी सन्तान का उच्छेद हो जाएगा।

श्लोक 14 (1.78.14)

संकीर्णाचारधर्मेषु प्रतिलोमचरेषु च । पिशिताशिषु चान्त्येषु मूढ राजा भविष्यसि ॥

saṃkīrṇācāradharmeṣu pratilomacareṣu ca | piśitāśiṣu cāntyeṣu mūḍha rājā bhaviṣyasi

हे मूढ़! तुम उन लोगों के राजा बनोगे जिनके आचार और धर्म संकर हैं, जो प्रतिलोम क्रम से उत्पन्न हैं, जो कच्चा मांस खाते हैं और जो अन्त्यज हैं;

श्लोक 15 (1.78.15)

गुरुदारप्रसक्तेषु तिर्यग्योनिगतेषु च । पशुधर्मेषु पापेषु म्लेच्छेषु त्वं भविष्यसि ॥

gurudāraprasakteṣu tiryagyonigateṣu ca | paśudharmeṣu pāpeṣu mleccheṣu tvaṃ bhaviṣyasi

गुरुपत्नी में आसक्त, पशु-योनि जैसी दशा को प्राप्त, पशुओं के-से धर्म वाले पापी म्लेच्छों के बीच तुम रहोगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (1.78.16)

एवं स तुर्वसुं शप्त्वा ययातिः सुतमात्मनः । शर्मिष्ठायाः सुतं द्रुह्युमिदं वचनमब्रवीत् ॥

evaṃ sa turvasuṃ śaptvā yayātiḥ sutamātmanaḥ | śarmiṣṭhāyāḥ sutaṃ druhyumidaṃ vacanamabravīt

इस प्रकार अपने पुत्र तुर्वसु को शाप देकर ययाति ने शर्मिष्ठा के पुत्र द्रुह्यु से यह वचन कहा —

ययातिरुवाच

श्लोक 17 (1.78.17)

द्रुह्यो त्वं प्रतिपद्यस्व वर्णरूपविनाशिनीम् । जरां वर्षसहस्रं मे यौवनं स्वं ददस्व च ॥

druhyo tvaṃ pratipadyasva varṇarūpavināśinīm | jarāṃ varṣasahasraṃ me yauvanaṃ svaṃ dadasva ca

द्रुह्यु! रंग-रूप को नष्ट करने वाला मेरा बुढ़ापा तुम एक हज़ार वर्ष के लिए ले लो और अपना यौवन मुझे दे दो।

श्लोक 18 (1.78.18)

पूर्णे वर्षसहस्रे तु पुनर्दास्यामि यौवनम् । स्वं चादास्यामि भूयोऽहं पाप्मानं जरया सह ॥

pūrṇe varṣasahasre tu punardāsyāmi yauvanam | svaṃ cādāsyāmi bhūyo'haṃ pāpmānaṃ jarayā saha

पूरे हज़ार वर्ष बीतने पर मैं तुम्हारा यौवन लौटा दूँगा और बुढ़ापे सहित अपना कष्ट फिर से ग्रहण कर लूँगा।

द्रुह्युरुवाच

श्लोक 19 (1.78.19)

न गजं न रथं नाश्वं जीर्णो भुङ्क्ते न च स्त्रियम् । वाग्भङ्गश्चास्य भवति तां जरां नाभिकामये ॥

na gajaṃ na rathaṃ nāśvaṃ jīrṇo bhuṅkte na ca striyam | vāgbhaṅgaścāsya bhavati tāṃ jarāṃ nābhikāmaye

बूढ़ा व्यक्ति न हाथी का, न रथ का, न घोड़े का और न स्त्री का ही सुख भोग पाता है; उसकी वाणी भी लड़खड़ा जाती है। ऐसा बुढ़ापा मैं नहीं चाहता।

ययातिरुवाच

श्लोक 20 (1.78.20)

यत्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि । तस्माद्द्रुह्यो प्रियः कामो न ते संपत्स्यते क्वचित् ॥

yattvaṃ me hṛdayājjāto vayaḥ svaṃ na prayacchasi | tasmāddruhyo priyaḥ kāmo na te saṃpatsyate kvacit

द्रुह्यु! तुम मेरे हृदय से उत्पन्न होकर भी अपनी युवावस्था नहीं दे रहे, इसलिए तुम्हारी प्रिय कामना कहीं भी पूरी नहीं होगी।

श्लोक 21 (1.78.21)

यत्राश्वरथमुख्यानामश्वानां स्याद्गतं न च । हस्तिनां पीठकानां च गर्दभानां तथैव च ॥

yatrāśvarathamukhyānāmaśvānāṃ syādgataṃ na ca | hastināṃ pīṭhakānāṃ ca gardabhānāṃ tathaiva ca

जहाँ श्रेष्ठ घोड़ों और रथों का, घोड़ों का, हाथियों का, पालकियों का और गधों का भी आना-जाना न हो सकेगा,

श्लोक 22 (1.78.22)

बस्तानां च गवां चैव शिबिकायास्तथैव च । उडुपप्लवसंतारो यत्र नित्यं भविष्यति । अराजा भोजशब्दं त्वं तत्रावाप्स्यसि सान्वयः ॥

bastānāṃ ca gavāṃ caiva śibikāyāstathaiva ca | uḍupaplavasaṃtāro yatra nityaṃ bhaviṣyati | arājā bhojaśabdaṃ tvaṃ tatrāvāpsyasi sānvayaḥ

न बकरों का, न गौओं का और न शिबिकाओं का; जहाँ सदा बेड़े और नाव से ही पार जाना होगा — वहाँ तुम अपने वंश सहित राज्यहीन होकर "भोज" नाम पाओगे।

श्लोक 23 (1.78.23)

अनो त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह । एकं वर्षसहस्रं तु चरेयं यौवनेन ते ॥

ano tvaṃ pratipadyasva pāpmānaṃ jarayā saha | ekaṃ varṣasahasraṃ tu careyaṃ yauvanena te

अनु! बुढ़ापे सहित मेरा कष्ट तुम ग्रहण कर लो, ताकि मैं एक हज़ार वर्ष तक तुम्हारे यौवन से विचर सकूँ।

अनुरुवाच

श्लोक 24 (1.78.24)

जीर्णः शिशुवदादत्तेऽकालेऽन्नमशुचिर्यथा । न जुहोति च कालेऽग्निं तां जरां नाभिकामये ॥

jīrṇaḥ śiśuvadādatte'kāle'nnamaśuciryathā | na juhoti ca kāle'gniṃ tāṃ jarāṃ nābhikāmaye

बूढ़ा व्यक्ति बच्चे की तरह असमय भोजन करता है और अपवित्र-सा रहता है; वह समय पर अग्निहोत्र नहीं करता। ऐसा बुढ़ापा मैं नहीं चाहता।

ययातिरुवाच

श्लोक 25 (1.78.25)

यत्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि । जरादोषस्त्वया प्रोक्तस्तस्मात्त्वं प्रतिलप्स्यसे ॥

yattvaṃ me hṛdayājjāto vayaḥ svaṃ na prayacchasi | jarādoṣastvayā proktastasmāttvaṃ pratilapsyase

तुम मेरे हृदय से उत्पन्न होकर भी अपनी युवावस्था नहीं दे रहे; तुमने बुढ़ापे के जो दोष बताए हैं, उन्हें तुम स्वयं पाओगे।

श्लोक 26 (1.78.26)

प्रजाश्च यौवनप्राप्ता विनशिष्यन्त्यनो तव । अग्निप्रस्कन्दनपरस्त्वं चाप्येवं भविष्यसि ॥

prajāśca yauvanaprāptā vinaśiṣyantyano tava | agnipraskandanaparastvaṃ cāpyevaṃ bhaviṣyasi

अनु! तुम्हारी सन्तानें युवावस्था में पहुँचते ही नष्ट हो जाएँगी, और तुम भी अग्नि का त्याग करने वाले हो जाओगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 27 (1.78.27)

प्रत्याख्यातश्चतुर्भिश्च शप्त्वा तान्यदुपूर्वकान् । पूरोः सकाशमगमन्मत्वा पूरुमलङ्घनम् ॥

pratyākhyātaścaturbhiśca śaptvā tānyadupūrvakān | pūroḥ sakāśamagamanmatvā pūrumalaṅghanam

चार पुत्रों से इनकार पाकर और यदु आदि उन चारों को शाप देकर ययाति पूरु के पास गए, यह मानकर कि पूरु उनकी आज्ञा नहीं टालेगा।

ययातिरुवाच

श्लोक 28 (1.78.28)

पूरो त्वं मे प्रियः पुत्रस्त्वं वरीयान्भविष्यसि । जरा वली च मां तात पलितानि च पर्यगुः ॥

pūro tvaṃ me priyaḥ putrastvaṃ varīyānbhaviṣyasi | jarā valī ca māṃ tāta palitāni ca paryaguḥ

पूरु! तुम मेरे प्रिय पुत्र हो; तुम सबसे श्रेष्ठ बनोगे। तात! बुढ़ापे, झुर्रियों और पके बालों ने मुझे घेर लिया है,

श्लोक 29 (1.78.29)

काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने । पूरो त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह । कंचित्कालं चरेयं वै विषयान्वयसा तव ॥

kāvyasyośanasaḥ śāpānna ca tṛpto'smi yauvane | pūro tvaṃ pratipadyasva pāpmānaṃ jarayā saha | kaṃcitkālaṃ careyaṃ vai viṣayānvayasā tava

उशना काव्य के शाप से; और मैं अभी यौवन से तृप्त नहीं हुआ हूँ। पूरु! बुढ़ापे सहित मेरा कष्ट तुम ले लो, ताकि कुछ समय मैं तुम्हारी युवावस्था से विषयों का भोग कर सकूँ।

श्लोक 30 (1.78.30)

पूर्णे वर्षसहस्रे तु पुनर्दास्यामि यौवनम् । स्वं चैव प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह ॥

pūrṇe varṣasahasre tu punardāsyāmi yauvanam | svaṃ caiva pratipatsyāmi pāpmānaṃ jarayā saha

पूरे एक हज़ार वर्ष बीतने पर मैं तुम्हें तुम्हारा यौवन लौटा दूँगा और बुढ़ापे सहित अपना कष्ट फिर से ग्रहण कर लूँगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 31 (1.78.31)

एवमुक्तः प्रत्युवाच पूरुः पितरमञ्जसा । यदात्थ मां महाराज तत्करिष्यामि ते वचः ॥

evamuktaḥ pratyuvāca pūruḥ pitaramañjasā | yadāttha māṃ mahārāja tatkariṣyāmi te vacaḥ

ऐसा कहे जाने पर पूरु ने तुरन्त अपने पिता को उत्तर दिया — "महाराज! आप मुझसे जो कहते हैं, आपके उस वचन का मैं पालन करूँगा।"

पूरुरुवाच

श्लोक 32 (1.78.32)

गुरोर्वै वचनं पुण्यं स्वर्ग्यमायुष्करं नृणाम् । गुरुप्रसादात्त्रैलोक्यमन्वशासच्छतक्रतुः ॥

gurorvai vacanaṃ puṇyaṃ svargyamāyuṣkaraṃ nṛṇām | guruprasādāttrailokyamanvaśāsacchatakratuḥ

गुरुजन का वचन पवित्र, स्वर्ग देने वाला और मनुष्यों की आयु बढ़ाने वाला होता है। गुरु की कृपा से ही शतक्रतु इन्द्र ने तीनों लोकों पर शासन किया।

श्लोक 33 (1.78.33)

गुरोरनुमतं प्राप्य सर्वान्कामानवाप्नुयात् । यावदिच्छसि तावच्च धारयिष्यामि ते जराम् ॥

guroranumataṃ prāpya sarvānkāmānavāpnuyāt | yāvadicchasi tāvacca dhārayiṣyāmi te jarām

गुरु की अनुमति पाकर मनुष्य सब कामनाएँ प्राप्त कर लेता है। आप जब तक चाहें, तब तक मैं आपका बुढ़ापा धारण करूँगा।

श्लोक 34 (1.78.34)

प्रतिपत्स्यामि ते राजन्पाप्मानं जरया सह । गृहाण यौवनं मत्तश्चर कामान्यथेप्सितान् ॥

pratipatsyāmi te rājanpāpmānaṃ jarayā saha | gṛhāṇa yauvanaṃ mattaścara kāmānyathepsitān

राजन्! मैं बुढ़ापे सहित आपका कष्ट ग्रहण करूँगा। मुझसे यौवन ले लीजिए और मनचाहे भोग भोगिए।

श्लोक 35 (1.78.35)

जरयाहं प्रतिच्छन्नो वयोरूपधरस्तव । यौवनं भवते दत्त्वा चरिष्यामि यथात्थ माम् ॥

jarayāhaṃ praticchanno vayorūpadharastava | yauvanaṃ bhavate dattvā cariṣyāmi yathāttha mām

बुढ़ापे से ढका हुआ मैं आपकी अवस्था और रूप धारण करूँगा; आपको अपना यौवन देकर मैं वैसे ही रहूँगा जैसा आपने मुझसे कहा है।

ययातिरुवाच

श्लोक 36 (1.78.36)

पूरो प्रीतोऽस्मि ते वत्स प्रीतश्चेदं ददामि ते । सर्वकामसमृद्धा ते प्रजा राज्ये भविष्यति ॥

pūro prīto'smi te vatsa prītaścedaṃ dadāmi te | sarvakāmasamṛddhā te prajā rājye bhaviṣyati

वत्स पूरु! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, और प्रसन्न होकर तुम्हें यह वर देता हूँ — तुम्हारे राज्य में तुम्हारी प्रजा सब कामनाओं से सम्पन्न होगी।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 37 (1.78.37)

एवमुक्त्वा ययातिस्तु स्मृत्वा काव्यं महातपाः । संक्रामयामास जरां तदा पूरौ महात्मनि ॥

evamuktvā yayātistu smṛtvā kāvyaṃ mahātapāḥ | saṃkrāmayāmāsa jarāṃ tadā pūrau mahātmani

ऐसा कहकर महातपस्वी ययाति ने काव्य (शुक्राचार्य) का स्मरण किया और अपना बुढ़ापा महात्मा पूरु में संक्रमित कर दिया।

अध्याय 77अध्याय-सूचीअध्याय 79