आदि पर्व · अध्याय 79
ययाति का पूरु को यौवन लौटाना और उसका राज्याभिषेक
पूरु का यौवन पाकर ययाति हजार वर्ष तक धर्म की मर्यादा में रहते हुए विषयों का भोग करते हैं, फिर पूरु से कहते हैं कि भोग से कामना कभी शान्त नहीं होती और उसे उसका यौवन लौटा देते हैं। जब ब्राह्मण और प्रजाजन ज्येष्ठ पुत्र यदु को छोड़ने पर आपत्ति करते हैं, तो ययाति बताते हैं कि आज्ञाकारी पुत्र ही सच्चा उत्तराधिकारी है और शुक्राचार्य के वरदान का उल्लेख करते हैं; प्रजा सहमत होती है और पूरु का राज्याभिषेक होता है। ययाति अपने अन्य पुत्रों को सीमान्त प्रदेशों में बसाकर पत्नियों सहित वन चले जाते हैं, और अध्याय उनके पाँचों पुत्रों से उत्पन्न जातियों के वर्णन के साथ समाप्त होता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.79.1)
पौरवेणाथ वयसा ययातिर्नहुषात्मजः । रूपयौवनसंपन्नः कुमारः समपद्यत । प्रीतियुक्तो नृपश्रेष्ठश्चचार विषयान्प्रियान् ॥
pauraveṇātha vayasā yayātirnahuṣātmajaḥ | rūpayauvanasaṃpannaḥ kumāraḥ samapadyata | prītiyukto nṛpaśreṣṭhaścacāra viṣayānpriyān
तब नहुषपुत्र ययाति पूरु का यौवन पाकर रूप और यौवन से सम्पन्न कुमार बन गए। प्रसन्नचित्त होकर वह श्रेष्ठ राजा अपने प्रिय विषयों का उपभोग करने लगे।
श्लोक 2 (1.79.2)
यथाकामं यथोत्साहं यथाकालं यथासुखम् । धर्माविरुद्धं राजेन्द्रो यथा भवति सोऽन्वभूत् ॥
yathākāmaṃ yathotsāhaṃ yathākālaṃ yathāsukham | dharmāviruddhaṃ rājendro yathā bhavati so'nvabhūt
उस राजाधिराज ने अपनी इच्छा, उत्साह, समय और सुख के अनुसार उनका उपभोग इस प्रकार किया कि धर्म का कहीं विरोध न हो।
श्लोक 3 (1.79.3)
देवानतर्पयद्यज्ञैः श्राद्धैस्तद्वत्पितॄनपि । दीनाननुग्रहैरिष्टैः कामैश्च द्विजसत्तमान् ॥
devānatarpayadyajñaiḥ śrāddhaistadvatpitṝnapi | dīnānanugrahairiṣṭaiḥ kāmaiśca dvijasattamān
उन्होंने यज्ञों से देवताओं को और उसी प्रकार श्राद्धों से पितरों को तृप्त किया; दीनों को उनके मनचाहे अनुग्रहों से और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को उनकी कामनाएँ पूरी करके संतुष्ट किया।
श्लोक 4 (1.79.4)
अतिथीनन्नपानैश्च विशश्च परिपालनैः । आनृशंस्येन शूद्रांश्च दस्यून्सन्निग्रहेण च ॥
atithīnannapānaiśca viśaśca paripālanaiḥ | ānṛśaṃsyena śūdrāṃśca dasyūnsannigraheṇa ca
अतिथियों को उन्होंने अन्न-पान से, वैश्यों को संरक्षण देकर और शूद्रों को दयालुता से संतुष्ट किया, तथा दस्युओं को कठोर दमन से वश में रखा।
श्लोक 5 (1.79.5)
धर्मेण च प्रजाः सर्वा यथावदनुरञ्जयन् । ययातिः पालयामास साक्षादिन्द्र इवापरः ॥
dharmeṇa ca prajāḥ sarvā yathāvadanurañjayan | yayātiḥ pālayāmāsa sākṣādindra ivāparaḥ
धर्मपूर्वक सारी प्रजा को यथोचित रूप से प्रसन्न रखते हुए ययाति ने साक्षात् दूसरे इन्द्र की भाँति उसका पालन किया।
श्लोक 6 (1.79.6)
स राजा सिंहविक्रान्तो युवा विषयगोचरः । अविरोधेन धर्मस्य चचार सुखमुत्तमम् ॥
sa rājā siṃhavikrānto yuvā viṣayagocaraḥ | avirodhena dharmasya cacāra sukhamuttamam
सिंह के समान पराक्रमी वह युवा राजा, जिसके वश में सभी विषय-भोग थे, धर्म का विरोध किए बिना उत्तम सुख भोगता रहा।
श्लोक 7 (1.79.7)
स संप्राप्य शुभान्कामांस्तृप्तः खिन्नश्च पार्थिवः । कालं वर्षसहस्रान्तं सस्मार मनुजाधिपः ॥
sa saṃprāpya śubhānkāmāṃstṛptaḥ khinnaśca pārthivaḥ | kālaṃ varṣasahasrāntaṃ sasmāra manujādhipaḥ
शुभ भोगों को पाकर राजा तृप्त भी हो गए और खिन्न भी; तब उस नरपति को हजार वर्षों की अवधि का स्मरण हुआ।
श्लोक 8 (1.79.8)
परिसंख्याय कालज्ञः कलाः काष्ठाश्च वीर्यवान् । यौवनं प्राप्य राजर्षिः सहस्रपरिवत्सरान् ॥
parisaṃkhyāya kālajñaḥ kalāḥ kāṣṭhāśca vīryavān | yauvanaṃ prāpya rājarṣiḥ sahasraparivatsarān
काल का ज्ञान रखने वाले उस पराक्रमी राजर्षि ने कलाओं और काष्ठाओं में समय की गणना की। हजार वर्षों के लिए यौवन पाकर
श्लोक 9 (1.79.9)
विश्वाच्या सहितो रेमे व्यभ्राजन्नन्दने वने । अलकायां स कालं तु मेरुशृङ्गे तथोत्तरे ॥
viśvācyā sahito reme vyabhrājannandane vane | alakāyāṃ sa kālaṃ tu meruśṛṅge tathottare
उन्होंने विश्वाची के साथ नन्दन वन में, अलकापुरी में और मेरु के उत्तरी शिखर पर शोभायमान होकर विहार किया था।
श्लोक 10 (1.79.10)
यदा स पश्यते कालं धर्मात्मा तं महीपतिः । पूर्णं मत्वा ततः कालं पूरुं पुत्रमुवाच ह ॥
yadā sa paśyate kālaṃ dharmātmā taṃ mahīpatiḥ | pūrṇaṃ matvā tataḥ kālaṃ pūruṃ putramuvāca ha
जब उस धर्मात्मा राजा ने देखा कि वह अवधि आ गई है और उसे पूर्ण हुआ जाना, तब उन्होंने अपने पुत्र पूरु से कहा —
ययातिरुवाच
श्लोक 11 (1.79.11)
यथाकामं यथोत्साहं यथाकालमरिन्दम । सेविता विषयाः पुत्र यौवनेन मया तव ॥
yathākāmaṃ yathotsāhaṃ yathākālamarindama | sevitā viṣayāḥ putra yauvanena mayā tava
"हे शत्रुदमन पुत्र! तुम्हारे यौवन से मैंने अपनी इच्छा, उत्साह और समय के अनुसार विषयों का सेवन कर लिया है।
श्लोक 12 (1.79.12)
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥
na jātu kāmaḥ kāmānāmupabhogena śāmyati | haviṣā kṛṣṇavartmeva bhūya evābhivardhate
कामनाओं के उपभोग से काम कभी शान्त नहीं होता; घी की आहुति पाकर अग्नि की भाँति वह और भी बढ़ता ही जाता है।
श्लोक 13 (1.79.13)
यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः । एकस्यापि न पर्याप्तं तस्मात्तृष्णां परित्यजेत् ॥
yatpṛthivyāṃ vrīhiyavaṃ hiraṇyaṃ paśavaḥ striyaḥ | ekasyāpi na paryāptaṃ tasmāttṛṣṇāṃ parityajet
पृथ्वी पर जितने भी धान और जौ, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब एक व्यक्ति के लिए भी पर्याप्त नहीं हैं; इसलिए तृष्णा का त्याग कर देना चाहिए।
श्लोक 14 (1.79.14)
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः । योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तांतृष्णां त्यजतः सुखम् ॥
yā dustyajā durmatibhiryā na jīryati jīryataḥ | yo'sau prāṇāntiko rogastāṃtṛṣṇāṃ tyajataḥ sukham
जिस तृष्णा को दुर्बुद्धि लोग कठिनाई से छोड़ पाते हैं, जो मनुष्य के बूढ़े होने पर भी बूढ़ी नहीं होती और जो प्राणों के अन्त तक रहने वाला रोग है, उसे त्यागने वाले को ही सुख मिलता है।
श्लोक 15 (1.79.15)
पूर्णं वर्षसहस्रं मे विषयासक्तचेतसः । तथाप्यनुदिनं तृष्णा ममैतेष्वभिजायते ॥
pūrṇaṃ varṣasahasraṃ me viṣayāsaktacetasaḥ | tathāpyanudinaṃ tṛṣṇā mamaiteṣvabhijāyate
पूरे हजार वर्ष तक मेरा मन विषयों में आसक्त रहा, फिर भी इनके प्रति मेरी तृष्णा प्रतिदिन जागती रहती है।
श्लोक 16 (1.79.16)
तस्मादेनामहं त्यक्त्वा ब्रह्मण्याधाय मानसम् । निर्द्वन्द्वो निर्ममो भूत्वा चरिष्यामि मृगैः सह ॥
tasmādenāmahaṃ tyaktvā brahmaṇyādhāya mānasam | nirdvandvo nirmamo bhūtvā cariṣyāmi mṛgaiḥ saha
इसलिए मैं इसे त्यागकर, मन को ब्रह्म में लगाकर, द्वन्द्वों और ममता से रहित होकर मृगों के साथ विचरण करूँगा।
श्लोक 17 (1.79.17)
पूरो प्रीतोऽस्मि भद्रं ते गृहाणेदं स्वयौवनम् । राज्यं चेदं गृहाण त्वं यावदिच्छसि यौवनम् । तावद्दीर्घायुषा भुङ्क्ष्व त्वं हि मे प्रियकृत्सुतः ॥
pūro prīto'smi bhadraṃ te gṛhāṇedaṃ svayauvanam | rājyaṃ cedaṃ gṛhāṇa tvaṃ yāvadicchasi yauvanam | tāvaddīrghāyuṣā bhuṅkṣva tvaṃ hi me priyakṛtsutaḥ
पूरु! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो। यह अपना यौवन वापस ले लो, और यह राज्य भी ग्रहण करो। जब तक तुम चाहो, यौवन के साथ दीर्घायु होकर इसका भोग करो, क्योंकि तुम ही मेरा प्रिय करने वाले पुत्र हो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (1.79.18)
प्रतिपेदे जरां राजा ययातिर्नाहुषस्तदा । यौवनं प्रतिपेदे च पूरुः स्वं पुनरात्मवान् ॥
pratipede jarāṃ rājā yayātirnāhuṣastadā | yauvanaṃ pratipede ca pūruḥ svaṃ punarātmavān
तब नहुषपुत्र राजा ययाति ने बुढ़ापा फिर से ग्रहण कर लिया, और संयमी पूरु ने अपना यौवन फिर से प्राप्त किया।
श्लोक 19 (1.79.19)
अभिषेक्तुकामं नृपतिं पूरुं पुत्रं कनीयसम् । ब्राह्मणप्रमुखा वर्णा इदं वचनमब्रुवन् ॥
abhiṣektukāmaṃ nṛpatiṃ pūruṃ putraṃ kanīyasam | brāhmaṇapramukhā varṇā idaṃ vacanamabruvan
जब राजा अपने सबसे छोटे पुत्र पूरु का अभिषेक करना चाहने लगे, तब ब्राह्मणों को आगे रखकर सभी वर्णों के लोगों ने यह बात कही —
श्लोक 20 (1.79.20)
कथं शुक्रस्य नप्तारं देवयान्याः सुतं प्रभो । ज्येष्ठं यदुमतिक्रम्य राज्यं पूरोः प्रयच्छसि ॥
kathaṃ śukrasya naptāraṃ devayānyāḥ sutaṃ prabho | jyeṣṭhaṃ yadumatikramya rājyaṃ pūroḥ prayacchasi
"प्रभो! शुक्राचार्य के नाती और देवयानी के पुत्र, ज्येष्ठ यदु को लाँघकर आप पूरु को राज्य कैसे दे रहे हैं?
श्लोक 21 (1.79.21)
यदुर्ज्येष्ठस्तव सुतो जातस्तमनु तुर्वसुः । शर्मिष्ठायाः सुतो द्रुह्युस्ततोऽनुः पूरुरेव च ॥
yadurjyeṣṭhastava suto jātastamanu turvasuḥ | śarmiṣṭhāyāḥ suto druhyustato'nuḥ pūrureva ca
यदु आपके ज्येष्ठ पुत्र हैं, उनके बाद तुर्वसु उत्पन्न हुए; फिर शर्मिष्ठा के पुत्र हैं — द्रुह्यु, उसके बाद अनु और फिर पूरु।
श्लोक 22 (1.79.22)
कथं ज्येष्ठानतिक्रम्य कनीयान्राज्यमर्हति । एतत्संबोधयामस्त्वां धर्मं त्वं प्रतिपालय ॥
kathaṃ jyeṣṭhānatikramya kanīyānrājyamarhati | etatsaṃbodhayāmastvāṃ dharmaṃ tvaṃ pratipālaya
बड़े भाइयों को लाँघकर सबसे छोटा राज्य का अधिकारी कैसे हो सकता है? हम आपको यही स्मरण दिलाते हैं — आप धर्म का पालन कीजिए।"
ययातिरुवाच
श्लोक 23 (1.79.23)
ब्राह्मणप्रमुखा वर्णाः सर्वे शृण्वन्तु मे वचः । ज्येष्ठं प्रति यथा राज्यं न देयं मे कथंचन ॥
brāhmaṇapramukhā varṇāḥ sarve śṛṇvantu me vacaḥ | jyeṣṭhaṃ prati yathā rājyaṃ na deyaṃ me kathaṃcana
ब्राह्मण आदि सभी वर्णों के लोग मेरी बात सुनें कि मेरे ज्येष्ठ पुत्र को राज्य किसी भी प्रकार क्यों नहीं दिया जाना चाहिए।
श्लोक 24 (1.79.24)
मम ज्येष्ठेन यदुना नियोगो नानुपालितः । प्रतिकूलः पितुर्यश्च न स पुत्रः सतां मतः ॥
mama jyeṣṭhena yadunā niyogo nānupālitaḥ | pratikūlaḥ pituryaśca na sa putraḥ satāṃ mataḥ
मेरे ज्येष्ठ पुत्र यदु ने मेरी आज्ञा का पालन नहीं किया। जो पुत्र पिता के प्रतिकूल चलता है, सज्जन उसे पुत्र नहीं मानते।
श्लोक 25 (1.79.25)
मातापित्रोर्वचनकृद्धितः पथ्यश्च यः सुतः । स पुत्रः पुत्रवद्यश्च वर्तते पितृमातृषु ॥
mātāpitrorvacanakṛddhitaḥ pathyaśca yaḥ sutaḥ | sa putraḥ putravadyaśca vartate pitṛmātṛṣu
जो पुत्र माता-पिता की बात मानता है, उनका हितैषी है और उनके लिए कल्याणकारी है, तथा माता-पिता के प्रति पुत्र जैसा आचरण करता है, वही सच्चा पुत्र है।
श्लोक 26 (1.79.26)
पुदिति नरकस्याख्या दुःखं च नरकं विदुः । पुतस्त्राणात्ततः पुत्त्रमिहेच्छन्ति परत्र च ॥
puditi narakasyākhyā duḥkhaṃ ca narakaṃ viduḥ | putastrāṇāttataḥ puttramihecchanti paratra ca
"पुत्" एक नरक का नाम है, और उस नरक को दुःख कहा गया है। "पुत्" से त्राण करने के कारण ही लोग इस लोक और परलोक के लिए पुत्र की कामना करते हैं।
श्लोक 27 (1.79.27)
आत्मनः सदृशः पुत्रः पितृदेवर्षिपूजने । यो बहूनां गुणकरः स पुत्रो ज्येष्ठ उच्यते ॥
ātmanaḥ sadṛśaḥ putraḥ pitṛdevarṣipūjane | yo bahūnāṃ guṇakaraḥ sa putro jyeṣṭha ucyate
जो पुत्र पितरों, देवताओं और ऋषियों की पूजा में अपने पिता के समान हो और बहुतों का हित करने वाला हो, वही ज्येष्ठ कहलाता है।
श्लोक 28 (1.79.28)
मूकोऽन्धो बधिरः श्वित्री स्वधर्मं नानुतिष्ठति । चोरः किल्बिषिकः पुत्रो ज्येष्ठो न ज्येष्ठ उच्यते ॥
mūko'ndho badhiraḥ śvitrī svadharmaṃ nānutiṣṭhati | coraḥ kilbiṣikaḥ putro jyeṣṭho na jyeṣṭha ucyate
जो पुत्र गूँगा, अन्धा, बहरा या श्वेतकुष्ठ से पीड़ित हो, जो अपने धर्म का पालन न करे, चोर या पापी हो, वह बड़ा होने पर भी ज्येष्ठ नहीं कहलाता।
श्लोक 29 (1.79.29)
ज्येष्ठांशहारी गुणकृदिह लोके परत्र च । श्रेयान्पुत्रो गुणोपेतः स पुत्रो नेतरो वृथा । वदन्ति धर्मं धर्मज्ञाः पितॄणां पुत्रकारणात् ॥
jyeṣṭhāṃśahārī guṇakṛdiha loke paratra ca | śreyānputro guṇopetaḥ sa putro netaro vṛthā | vadanti dharmaṃ dharmajñāḥ pitṝṇāṃ putrakāraṇāt
भलाई करने वाला पुत्र इस लोक और परलोक में ज्येष्ठ का भाग पाने का अधिकारी है। गुणों से युक्त पुत्र ही श्रेष्ठ है, वही सच्चा पुत्र है; दूसरा व्यर्थ है। पुत्र पितरों के लिए होता है, इसी कारण धर्मज्ञ लोग इसे धर्म बताते हैं।
श्लोक 30 (1.79.30)
वेदोक्तं संभवं मह्यमनेन हृदयोद्भवम् । तस्य जातमिदं कृत्स्नमात्मा पुत्र इति श्रुतिः ॥
vedoktaṃ saṃbhavaṃ mahyamanena hṛdayodbhavam | tasya jātamidaṃ kṛtsnamātmā putra iti śrutiḥ
वेद में हृदय से उत्पन्न होने वाले जिस जन्म की बात कही गई है, वह मेरे लिए इसी में चरितार्थ हुई है। यह सब उसी का फल है; श्रुति कहती है कि पुत्र अपना ही आत्मा है।
श्लोक 31 (1.79.31)
यदुनाऽहमवज्ञातस्तथा तुर्वसुनापि च । द्रुह्युना चानुना चैव मय्यवज्ञा कृता भृशम् ॥
yadunā'hamavajñātastathā turvasunāpi ca | druhyunā cānunā caiva mayyavajñā kṛtā bhṛśam
यदु ने मेरी अवहेलना की, और तुर्वसु ने भी; द्रुह्यु और अनु ने भी मेरा बड़ा अनादर किया।
श्लोक 32 (1.79.32)
पूरुणा तु कृतं वाक्यं मानितं च विशेषतः । कनीयान्मम दायादो धृता येन जरा मम ॥
pūruṇā tu kṛtaṃ vākyaṃ mānitaṃ ca viśeṣataḥ | kanīyānmama dāyādo dhṛtā yena jarā mama
पर पूरु ने मेरी बात मानी और उसका विशेष आदर किया। मेरा सबसे छोटा पुत्र, जिसने मेरा बुढ़ापा धारण किया, वही मेरा उत्तराधिकारी है।
श्लोक 33 (1.79.33)
मम कामः स च कृतः पूरुणा मित्ररूपिणा । शुक्रेण च वरो दत्तः काव्येनोशनसा स्वयम् ॥
mama kāmaḥ sa ca kṛtaḥ pūruṇā mitrarūpiṇā | śukreṇa ca varo dattaḥ kāvyenośanasā svayam
मित्र के समान आचरण करने वाले पूरु ने मेरी कामना पूरी की; और स्वयं कवि-पुत्र शुक्र उशना ने मुझे वर दिया था —
श्लोक 34 (1.79.34)
पुत्रो यस्त्वाऽनुवर्तेत स राजा पृथिवीपतिः । यो वानुवर्ती पुत्राणां स पुत्रो दायभाग्भवेत् ॥
putro yastvā'nuvarteta sa rājā pṛthivīpatiḥ | yo vānuvartī putrāṇāṃ sa putro dāyabhāgbhavet
"जो पुत्र तुम्हारा अनुसरण करेगा, वही राजा और पृथ्वीपति होगा।" और पुत्रों में जो पिता का अनुवर्ती हो, वही दायभाग का अधिकारी होता है।
श्लोक 35 (1.79.35)
भवतोऽनुनयाम्येवं पूरू राज्येऽभिषिच्यताम् ॥
bhavato'nunayāmyevaṃ pūrū rājye'bhiṣicyatām
इसलिए मैं आप लोगों से अनुनय करता हूँ — पूरु का राज्याभिषेक हो।
प्रकृतय ऊचुः
श्लोक 36 (1.79.36)
यः पुत्रो गुणसंपन्नो मातापित्रोर्हितः सदा । सर्वमर्हति कल्याणं कनीयानपि सत्तमः । वेदधर्मार्थशास्त्रेषु मुनिभिः कथितं पुरा ॥
yaḥ putro guṇasaṃpanno mātāpitrorhitaḥ sadā | sarvamarhati kalyāṇaṃ kanīyānapi sattamaḥ | vedadharmārthaśāstreṣu munibhiḥ kathitaṃ purā
जो पुत्र गुणों से सम्पन्न हो और सदा माता-पिता का हित करे, वह छोटा होने पर भी श्रेष्ठ है और हर प्रकार के कल्याण का अधिकारी है। प्राचीन काल में मुनियों ने वेदों तथा धर्म और अर्थ के शास्त्रों में यही कहा है।
श्लोक 37 (1.79.37)
अर्हः पूरुरिदं राज्यं यः सुतः प्रियकृत्तव । वरदानेन शुक्रस्य न शक्यं वक्तुमुत्तरम् ॥
arhaḥ pūruridaṃ rājyaṃ yaḥ sutaḥ priyakṛttava | varadānena śukrasya na śakyaṃ vaktumuttaram
पूरु, जो आपका प्रिय करने वाला पुत्र है, इस राज्य के योग्य है। शुक्राचार्य के वरदान के बाद इसके विरुद्ध कुछ कहा ही नहीं जा सकता।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 38 (1.79.38)
पौरजानपदैस्तुष्टैरित्युक्तो नाहुषस्तदा । अभ्यषिञ्चत्ततः पूरुं राज्ये स्वे सुतमात्मनः ॥
paurajānapadaistuṣṭairityukto nāhuṣastadā | abhyaṣiñcattataḥ pūruṃ rājye sve sutamātmanaḥ
नगर और जनपद के संतुष्ट लोगों के ऐसा कहने पर नहुषपुत्र ययाति ने तब अपने पुत्र पूरु का अपने राज्य पर अभिषेक कर दिया।
श्लोक 39 (1.79.39)
यदुं च तुर्वसुं चोभौ द्रुह्युं चैव सहानुजम् । अन्तेषु स विनिक्षिप्य नाहुषः स्वात्मजान्सुतान् ॥
yaduṃ ca turvasuṃ cobhau druhyuṃ caiva sahānujam | anteṣu sa vinikṣipya nāhuṣaḥ svātmajānsutān
नहुषपुत्र ने अपने पुत्रों को सीमान्त प्रदेशों में स्थापित कर दिया — यदु और तुर्वसु दोनों को, तथा छोटे भाई अनु सहित द्रुह्यु को।
श्लोक 40 (1.79.40)
दत्त्वा च पूरवे राज्यं वनवासाय दीक्षितः । पुरात्स निर्ययौ राजा ब्राह्मणैस्तापसैः सह ॥
dattvā ca pūrave rājyaṃ vanavāsāya dīkṣitaḥ | purātsa niryayau rājā brāhmaṇaistāpasaiḥ saha
पूरु को राज्य देकर राजा ने वनवास की दीक्षा ली और ब्राह्मणों तथा तपस्वियों के साथ नगर से निकल पड़े।
श्लोक 41 (1.79.41)
देवयान्या च सहितः शर्मिष्ठया च भारत । अकरोत्स वने राजा सभार्यस्तप उत्तमम् ॥
devayānyā ca sahitaḥ śarmiṣṭhayā ca bhārata | akarotsa vane rājā sabhāryastapa uttamam
हे भारत! देवयानी और शर्मिष्ठा के साथ, अपनी पत्नियों सहित उस राजा ने वन में उत्तम तपस्या की।
श्लोक 42 (1.79.42)
यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः स्मृताः । द्रुह्योः सुतास्तु वै भोजा अनोस्तु म्लेच्छजातयः ॥
yadostu yādavā jātāsturvasoryavanāḥ smṛtāḥ | druhyoḥ sutāstu vai bhojā anostu mlecchajātayaḥ
यदु से यादव उत्पन्न हुए; तुर्वसु से यवन बताए गए हैं; द्रुह्यु के पुत्र भोज हुए; और अनु से म्लेच्छ जातियाँ उत्पन्न हुईं।
श्लोक 43 (1.79.43)
पूरोस्तु पौरवो वंशो यत्र जातोऽसि पार्थिव । इदं वर्षसहस्राणि राज्यं कारयितुं वशी ॥
pūrostu pauravo vaṃśo yatra jāto'si pārthiva | idaṃ varṣasahasrāṇi rājyaṃ kārayituṃ vaśī
पूरु से पौरव वंश चला, हे राजन्, जिसमें आप इस राज्य पर हजारों वर्षों तक संयमपूर्वक शासन करने के लिए उत्पन्न हुए हैं।