आदि पर्व · अध्याय 80
ययाति की तपस्या और स्वर्गारोहण
पूरु का राज्याभिषेक करके ययाति वन में मुनि बनकर रहते हैं और स्वर्ग जाते हैं, किन्तु शीघ्र ही इन्द्र उन्हें नीचे गिरा देते हैं। जनमेजय पूछते हैं कि वे कैसे गिरे और वसुमान्, अष्टक, प्रतर्दन और शिबि के साथ उन्होंने फिर स्वर्ग कैसे पाया। वैशम्पायन ययाति की आगे की कथा आरम्भ करते हैं और उन हजार वर्षों की उत्तरोत्तर कठोर तपस्या का वर्णन करते हैं — शिलोञ्छ वृत्ति, केवल जल, केवल वायु और पञ्चाग्नि-तप — जिसके द्वारा वे स्वर्ग पहुँचे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.80.1)
एवं स नाहुषो राजा ययातिः पुत्रमीप्सितम् । राज्येऽभिषिच्य मुदितो वानप्रस्थोऽभवन्मुनिः ॥
evaṃ sa nāhuṣo rājā yayātiḥ putramīpsitam | rājye'bhiṣicya mudito vānaprastho'bhavanmuniḥ
इस प्रकार नहुषपुत्र राजा ययाति अपने मनचाहे पुत्र का राज्याभिषेक करके प्रसन्नतापूर्वक वानप्रस्थी मुनि बन गए।
श्लोक 2 (1.80.2)
उषित्वा च वने वासं ब्राह्मणैः संशितव्रतः । फलमूलाशनो दान्तस्ततः स्वर्गमितो गतः ॥
uṣitvā ca vane vāsaṃ brāhmaṇaiḥ saṃśitavrataḥ | phalamūlāśano dāntastataḥ svargamito gataḥ
कठोर व्रतों का पालन करते हुए वे ब्राह्मणों के साथ वन में रहे; फल-मूल खाकर इन्द्रियों को वश में रखा और फिर यहाँ से स्वर्ग चले गए।
श्लोक 3 (1.80.3)
स गतः स्वर्निवासं तं निवसन्मुदितः सुखी । कालेन नातिमहता पुनः शक्रेण पातितः ॥
sa gataḥ svarnivāsaṃ taṃ nivasanmuditaḥ sukhī | kālena nātimahatā punaḥ śakreṇa pātitaḥ
वे उस स्वर्गलोक में गए और वहाँ आनन्दपूर्वक सुख से रहने लगे; किन्तु थोड़े ही समय बाद इन्द्र ने उन्हें फिर नीचे गिरा दिया।
श्लोक 4 (1.80.4)
साधुभिः संगतिं लब्ध्वा पुनः स्वर्गमुपेयिवान् ॥
sādhubhiḥ saṃgatiṃ labdhvā punaḥ svargamupeyivān
सत्पुरुषों का संग पाकर वे फिर स्वर्ग पहुँच गए।
जनमेजय उवाच
श्लोक 5 (1.80.5)
स्वर्गतश्च पुनर्ब्रह्मन्निवसन्देववेश्मनि । कालेन नातिमहता कथं शक्रेण पातितः ॥
svargataśca punarbrahmannivasandevaveśmani | kālena nātimahatā kathaṃ śakreṇa pātitaḥ
हे ब्रह्मन्! स्वर्ग में पहुँचकर देवताओं के भवन में रहते हुए थोड़े ही समय में वे इन्द्र द्वारा कैसे गिरा दिए गए?
श्लोक 6 (1.80.6)
निपतन्प्रच्युतः स्वर्गादप्राप्तो मेदिनीतलम् । स्थित आसीदन्तरिक्षे स तदेति श्रुतं मया ॥
nipatanpracyutaḥ svargādaprāpto medinītalam | sthita āsīdantarikṣe sa tadeti śrutaṃ mayā
मैंने सुना है कि स्वर्ग से च्युत होकर गिरते हुए वे पृथ्वी तल तक नहीं पहुँचे, बल्कि आकाश में ही ठहर गए।
श्लोक 7 (1.80.7)
तत एव पुनश्चापि गतः स्वर्गमिति श्रुतम् । राज्ञा वसुमता सार्धमष्टकेन च वीर्यवान् ॥
tata eva punaścāpi gataḥ svargamiti śrutam | rājñā vasumatā sārdhamaṣṭakena ca vīryavān
और सुना जाता है कि वहीं से वह पराक्रमी राजा राजा वसुमान् और अष्टक के साथ फिर स्वर्ग चले गए,
श्लोक 8 (1.80.8)
प्रतर्दनेन शिविना समेत्य किल संसदि । कर्मणा केन स दिवं पुनः प्राप्तो महीपतिः ॥
pratardanena śivinā sametya kila saṃsadi | karmaṇā kena sa divaṃ punaḥ prāpto mahīpatiḥ
कहते हैं कि एक सभा में प्रतर्दन और शिबि से उनका मिलन हुआ था। किस कर्म के द्वारा वह राजा फिर से स्वर्ग पहुँचे?
श्लोक 9 (1.80.9)
सर्वमेतदशेषेण श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । कथ्यमानं त्वया विप्र विप्रर्षिगणसंनिधौ ॥
sarvametadaśeṣeṇa śrotumicchāmi tattvataḥ | kathyamānaṃ tvayā vipra viprarṣigaṇasaṃnidhau
हे विप्र! ब्रह्मर्षियों के इस समुदाय के सामने आपके मुख से कहा गया यह सारा वृत्तान्त मैं पूर्ण रूप से और यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 10 (1.80.10)
देवराजसमो ह्यासीद्ययातिः पृथिवीपतिः । वर्धनः कुरुवंशस्य विभावसुसमद्युतिः ॥
devarājasamo hyāsīdyayātiḥ pṛthivīpatiḥ | vardhanaḥ kuruvaṃśasya vibhāvasusamadyutiḥ
पृथ्वीपति ययाति देवराज इन्द्र के समान थे; वे कुरुवंश की वृद्धि करने वाले और अग्नि के समान तेजस्वी थे।
श्लोक 11 (1.80.11)
तस्य विस्तीर्णयशसः सत्यकीर्तेर्महात्मनः । चरितं श्रोतुमिच्छामि दिवि चेह च सर्वशः ॥
tasya vistīrṇayaśasaḥ satyakīrtermahātmanaḥ | caritaṃ śrotumicchāmi divi ceha ca sarvaśaḥ
जिनका यश दूर-दूर तक फैला था और जिनकी कीर्ति सच्ची थी, उन महात्मा का स्वर्ग और पृथ्वी दोनों का पूरा चरित्र मैं सुनना चाहता हूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 12 (1.80.12)
हन्त ते कथयिष्यामि ययातेरुत्तरां कथाम् । दिवि चेह च पुण्यार्थां सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥
hanta te kathayiṣyāmi yayāteruttarāṃ kathām | divi ceha ca puṇyārthāṃ sarvapāpapraṇāśinīm
अच्छा, मैं तुम्हें ययाति की आगे की कथा सुनाता हूँ, जो स्वर्ग और पृथ्वी दोनों की है, पुण्य देने वाली और सब पापों का नाश करने वाली है।
श्लोक 13 (1.80.13)
ययातिर्नाहुषो राजा पूरुं पुत्रं कनीयसम् । राज्येऽभिषिच्य मुदितः प्रावव्राज वनं तदा ॥
yayātirnāhuṣo rājā pūruṃ putraṃ kanīyasam | rājye'bhiṣicya muditaḥ prāvavrāja vanaṃ tadā
नहुषपुत्र राजा ययाति अपने सबसे छोटे पुत्र पूरु का प्रसन्नतापूर्वक राज्याभिषेक करके तब वन को चले गए।
श्लोक 14 (1.80.14)
अन्तेषु स विनिक्षिप्य पुत्रान्यदुपुरोगमान् । फलमूलाशनो राजा वने संन्यवसच्चिरम् ॥
anteṣu sa vinikṣipya putrānyadupurogamān | phalamūlāśano rājā vane saṃnyavasacciram
यदु आदि पुत्रों को सीमान्त प्रदेशों में स्थापित करके वह राजा फल-मूल खाते हुए दीर्घकाल तक वन में रहे।
श्लोक 15 (1.80.15)
संशितात्मा जितक्रोधस्तर्पयन्पितृदेवताः । अग्नींश्च विधिवज्जुह्वन्वानप्रस्थविधानतः ॥
saṃśitātmā jitakrodhastarpayanpitṛdevatāḥ | agnīṃśca vidhivajjuhvanvānaprasthavidhānataḥ
दृढ़चित्त और क्रोध को जीत लेने वाले उन राजा ने पितरों और देवताओं को तृप्त किया, और वानप्रस्थ की विधि के अनुसार अग्नियों में यथाविधि आहुतियाँ दीं।
श्लोक 16 (1.80.16)
अतिथीन्पूजयामास वन्येन हविषा विभुः । शिलोञ्छवृत्तिमास्थाय शेषान्नकृतभोजनः ॥
atithīnpūjayāmāsa vanyena haviṣā vibhuḥ | śiloñchavṛttimāsthāya śeṣānnakṛtabhojanaḥ
उन प्रभु ने वन में उपजे हविष्य से अतिथियों का सत्कार किया; शिलोञ्छ वृत्ति अपनाकर वे बचा हुआ अन्न ही खाते थे।
श्लोक 17 (1.80.17)
पूर्णं वर्षसहस्रं च एवंवृत्तिरभून्नृपः । अब्भक्षः शरदस्त्रिंशदासीन्नियतवाङ्मनाः ॥
pūrṇaṃ varṣasahasraṃ ca evaṃvṛttirabhūnnṛpaḥ | abbhakṣaḥ śaradastriṃśadāsīnniyatavāṅmanāḥ
पूरे एक हजार वर्ष तक राजा इसी प्रकार रहे। तीस वर्षों तक वे केवल जल पर रहे और वाणी तथा मन को वश में रखा।
श्लोक 18 (1.80.18)
ततश्च वायुभक्षोऽभूत्संवत्सरमतन्द्रितः । तथा पञ्चाग्निमध्ये च तपस्तेपे स वत्सरम् ॥
tataśca vāyubhakṣo'bhūtsaṃvatsaramatandritaḥ | tathā pañcāgnimadhye ca tapastepe sa vatsaram
फिर एक वर्ष तक वे बिना शिथिल हुए केवल वायु पर रहे, और एक वर्ष तक पञ्चाग्नि के बीच तप किया।
श्लोक 19 (1.80.19)
एकपादः स्थितश्चासीत्षण्मासाननिलाशनः । पुण्यकीर्तिस्ततः स्वर्गे जगामावृत्य रोदसी ॥
ekapādaḥ sthitaścāsītṣaṇmāsānanilāśanaḥ | puṇyakīrtistataḥ svarge jagāmāvṛtya rodasī
छह महीने तक वे वायु का आहार करते हुए एक पैर पर खड़े रहे। तब वे पुण्यकीर्ति राजा पृथ्वी और आकाश को अपने यश से व्याप्त करते हुए स्वर्ग चले गए।