आदि पर्व · अध्याय 81
ययाति का इन्द्र को पूरु को दिया उपदेश सुनाना
स्वर्ग में देवताओं से सम्मानित ययाति इन्द्र के पास जाते हैं, और इन्द्र पूछते हैं कि राज्य सौंपते समय उन्होंने पूरु से क्या कहा था। ययाति अपना उपदेश सुनाते हैं — पुत्रों में भूमि का बँटवारा, क्रोध और शठता का त्याग, गुरुजनों का सम्मान, तथा कलियुग और कृतयुग के लक्षण। इन्द्र के कहने पर वे आगे क्षमा की महिमा बताते हैं, मर्मभेदी वचनों से सावधान करते हैं, और अन्त में दया, दान और मधुर वाणी की शक्ति का वर्णन करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.81.1)
स्वर्गतः स तु राजेन्द्रो निवसन्देववेश्मनि । पूजितस्त्रिदशैः साध्यैर्मरुद्भिर्वसुभिस्तथा ॥
svargataḥ sa tu rājendro nivasandevaveśmani | pūjitastridaśaiḥ sādhyairmarudbhirvasubhistathā
स्वर्ग में पहुँचकर वे राजाधिराज देवताओं के भवन में रहने लगे; देवता, साध्यगण, मरुद्गण और वसुगण उनका सम्मान करते थे।
श्लोक 2 (1.81.2)
देवलोकं ब्रह्मलोकं संचरन्पुण्यकृद्वशी । अवसत्पृथिवीपालो दीर्घकालमिति श्रुतिः ॥
devalokaṃ brahmalokaṃ saṃcaranpuṇyakṛdvaśī | avasatpṛthivīpālo dīrghakālamiti śrutiḥ
पुण्यकर्मा और जितेन्द्रिय वे पृथ्वीपालक देवलोक और ब्रह्मलोक में विचरते हुए दीर्घकाल तक वहाँ रहे — ऐसा सुना जाता है।
श्लोक 3 (1.81.3)
स कदाचिन्नृपश्रेष्ठो ययातिः शक्रमागमत् । कथान्ते तत्र शक्रेण स पृष्टः पृथिवीपतिः ॥
sa kadācinnṛpaśreṣṭho yayātiḥ śakramāgamat | kathānte tatra śakreṇa sa pṛṣṭaḥ pṛthivīpatiḥ
एक बार नृपश्रेष्ठ ययाति इन्द्र के पास आए। वहाँ बातचीत के अन्त में इन्द्र ने उन पृथ्वीपति से पूछा।
शक्र उवाच
श्लोक 4 (1.81.4)
यदा स पूरुस्तव रूपेण राज- । ञ्जरां गृहीत्वा प्रचचार भूमौ । तदा च राज्यं संप्रदायैव तस्मै । त्वया किमुक्तः कथयेह सत्यम् ॥
yadā sa pūrustava rūpeṇa rāja- | ñjarāṃ gṛhītvā pracacāra bhūmau | tadā ca rājyaṃ saṃpradāyaiva tasmai | tvayā kimuktaḥ kathayeha satyam
हे राजन्! जब पूरु तुम्हारे रूप में तुम्हारा बुढ़ापा लेकर पृथ्वी पर विचरता था, और तुमने उसे राज्य सौंप दिया, तब तुमने उससे क्या कहा था? मुझे सच-सच बताओ।
ययातिरुवाच
श्लोक 5 (1.81.5)
गङ्गायमुनयोर्मध्ये कृत्स्नोऽयं विषयस्तव । मध्ये पृथिव्यास्त्वं राजा भ्रातरोऽन्त्याधिपास्तव ॥
gaṅgāyamunayormadhye kṛtsno'yaṃ viṣayastava | madhye pṛthivyāstvaṃ rājā bhrātaro'ntyādhipāstava
[मैंने उससे कहा था —] "गंगा और यमुना के बीच का यह सारा प्रदेश तुम्हारा है। पृथ्वी के मध्य भाग के तुम राजा हो, और तुम्हारे भाई सीमान्त प्रदेशों के अधिपति हैं।
श्लोक 6 (1.81.6)
न च कुर्यान्नरो दैन्यं शाठ्यं क्रोधं तथैव च । जैह्म्यं च मत्सरं वैरं सर्वत्रेदं न कारयेत् ॥
na ca kuryānnaro dainyaṃ śāṭhyaṃ krodhaṃ tathaiva ca | jaihmyaṃ ca matsaraṃ vairaṃ sarvatredaṃ na kārayet
मनुष्य को दीनता, शठता और क्रोध नहीं करना चाहिए; कुटिलता, ईर्ष्या और वैर भी कहीं नहीं करना चाहिए।
श्लोक 7 (1.81.7)
मातरं पितरं ज्येष्ठं विद्वांसं च तपोधनम् । क्षमावन्तं च राजेन्द्र नावमन्येत बुद्धिमान् ॥
mātaraṃ pitaraṃ jyeṣṭhaṃ vidvāṃsaṃ ca tapodhanam | kṣamāvantaṃ ca rājendra nāvamanyeta buddhimān
हे राजेन्द्र! बुद्धिमान् मनुष्य को माता, पिता, बड़े भाई, विद्वान्, तपस्वी और क्षमाशील व्यक्ति का कभी अपमान नहीं करना चाहिए।
श्लोक 8 (1.81.8)
शक्तस्तु क्षमते नित्यमशक्तः क्रुध्यते नरः । दुर्जनः सुजनं द्वेष्टि दुर्बलो बलवत्तरम् ॥
śaktastu kṣamate nityamaśaktaḥ krudhyate naraḥ | durjanaḥ sujanaṃ dveṣṭi durbalo balavattaram
समर्थ व्यक्ति सदा क्षमा करता है; असमर्थ मनुष्य ही क्रोध करता है। दुर्जन सज्जन से द्वेष करता है और दुर्बल अपने से बलवान् से;
श्लोक 9 (1.81.9)
रूपवन्तमरूपी च धनवन्तं च निर्धनः । अकर्मी कर्मिणं द्वेष्टि धार्मिकं च न धार्मिकः ॥
rūpavantamarūpī ca dhanavantaṃ ca nirdhanaḥ | akarmī karmiṇaṃ dveṣṭi dhārmikaṃ ca na dhārmikaḥ
कुरूप रूपवान् से, निर्धन धनवान् से, अकर्मण्य कर्मशील से और अधर्मी धर्मात्मा से द्वेष करता है;
श्लोक 10 (1.81.10)
निर्गुणो गुणवन्तं च पुत्रैतत्कलिलक्षणम् । विपरीतं च राजेन्द्र एतेषु कृतलक्षणम् ॥
nirguṇo guṇavantaṃ ca putraitatkalilakṣaṇam | viparītaṃ ca rājendra eteṣu kṛtalakṣaṇam
और गुणहीन गुणवान् से द्वेष करता है। पुत्र! यह कलियुग का लक्षण है; और हे राजेन्द्र! इनके विपरीत आचरण कृतयुग का लक्षण है।
श्लोक 11 (1.81.11)
ब्राह्मणो वाथ वा राजा वैश्यो वा शूद्र एव वा । प्रशस्तेषु प्रसक्ताश्चेत्प्रशस्यन्ते यशस्विनः ॥
brāhmaṇo vātha vā rājā vaiśyo vā śūdra eva vā | praśasteṣu prasaktāścetpraśasyante yaśasvinaḥ
ब्राह्मण हो या राजा, वैश्य हो या शूद्र — जो प्रशंसनीय कर्मों में लगे रहते हैं, उनकी प्रशंसा होती है और वे यशस्वी होते हैं।
श्लोक 12 (1.81.12)
तस्मात्प्रशस्ते राजेन्द्र नरः सक्तमना भवेत् । अलोकज्ञा ह्यप्रशस्ता भ्रातरस्ते ह्यबुद्धयः ॥
tasmātpraśaste rājendra naraḥ saktamanā bhavet | alokajñā hyapraśastā bhrātaraste hyabuddhayaḥ
इसलिए हे राजेन्द्र! मनुष्य को प्रशंसनीय कर्मों में मन लगाना चाहिए। तुम्हारे भाई लोक-व्यवहार नहीं जानते, वे प्रशंसा के योग्य नहीं और बुद्धिहीन हैं।
श्लोक 13 (1.81.13)
अन्त्याधिपतयः सर्वे ह्यभवन्गुरुशासनात् ॥
antyādhipatayaḥ sarve hyabhavanguruśāsanāt
पिता की आज्ञा से ही वे सब सीमान्त प्रदेशों के स्वामी बने हैं।"
इन्द्र उवाच
श्लोक 14 (1.81.14)
त्वं हि धर्मविदो राजन्कत्थसे धर्ममुत्तमम् । कथयस्व पुनर्मेऽद्य लोकवृत्तान्तमुत्तमम् ॥
tvaṃ hi dharmavido rājankatthase dharmamuttamam | kathayasva punarme'dya lokavṛttāntamuttamam
हे राजन्! तुम धर्म के ज्ञाता होकर उत्तम धर्म का बखान करते हो। आज मुझे फिर से लोक-व्यवहार का उत्तम वृत्तान्त सुनाओ।
ययातिरुवाच
श्लोक 15 (1.81.15)
अक्रोधनः क्रोधनेभ्यो विशिष्ट- । स्तथा तितिक्षुरतितिक्षोर्विशिष्टः । अमानुषेभ्यो मानुषाश्च प्रधाना । विद्वांस्तथैवाविदुषः प्रधानः ॥
akrodhanaḥ krodhanebhyo viśiṣṭa- | stathā titikṣuratitikṣorviśiṣṭaḥ | amānuṣebhyo mānuṣāśca pradhānā | vidvāṃstathaivāviduṣaḥ pradhānaḥ
क्रोध न करने वाला क्रोधियों से श्रेष्ठ है, और सहनशील असहनशील से श्रेष्ठ है; मनुष्येतर प्राणियों से मनुष्य श्रेष्ठ हैं, और विद्वान् अविद्वान् से श्रेष्ठ है।
श्लोक 16 (1.81.16)
आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन्मन्युरेव तितिक्षतः । आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति ॥
ākruśyamāno nākrośenmanyureva titikṣataḥ | ākroṣṭāraṃ nirdahati sukṛtaṃ cāsya vindati
कोई गाली दे तो बदले में गाली नहीं देनी चाहिए। सहन करने वाले का क्रोध ही गाली देने वाले को जला डालता है, और उसका पुण्य सहने वाले को मिल जाता है।
श्लोक 17 (1.81.17)
नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी । न हीनतः परमभ्याददीत । ययाऽस्य वाचा पर उद्विजेत । न तां वदेद्रुशतीं पापलोक्याम् ॥
nāruntudaḥ syānna nṛśaṃsavādī | na hīnataḥ paramabhyādadīta | yayā'sya vācā para udvijeta | na tāṃ vadedruśatīṃ pāpalokyām
मनुष्य को न किसी के मर्म को चोट पहुँचानी चाहिए, न क्रूर वचन बोलने चाहिए, न नीच उपायों से दूसरे को दबाना चाहिए। जिस वाणी से दूसरा व्याकुल हो, ऐसी कठोर और पापियों के लोक में ले जाने वाली वाणी नहीं बोलनी चाहिए।
श्लोक 18 (1.81.18)
अरुन्तुदं पुरुषं तीक्ष्णवाचं । वाक्कण्टकैर्वितुदन्तं मनुष्यान् । विद्यादलक्ष्मीकतमं जनानां । मुखे निबद्धां निर्ऋतिं वहन्तम् ॥
aruntudaṃ puruṣaṃ tīkṣṇavācaṃ | vākkaṇṭakairvitudantaṃ manuṣyān | vidyādalakṣmīkatamaṃ janānāṃ | mukhe nibaddhāṃ nirṛtiṃ vahantam
जो पुरुष मर्म पर चोट करता है, तीखा बोलता है और वचन-रूपी काँटों से लोगों को बेधता है, उसे मनुष्यों में सबसे अभागा समझना चाहिए; वह मानो अपने मुख में विनाश की देवी निर्ऋति को बाँधे फिरता है।
श्लोक 19 (1.81.19)
सद्भिः पुरस्तादभिपूजितः स्या- । त्सद्भिस्तथा पृष्ठतो रक्षितः स्यात् । सदाऽसतामतिवादांस्तितिक्षे- । त्सतां वृत्तं चाददीतार्यवृत्तः ॥
sadbhiḥ purastādabhipūjitaḥ syā- | tsadbhistathā pṛṣṭhato rakṣitaḥ syāt | sadā'satāmativādāṃstitikṣe- | tsatāṃ vṛttaṃ cādadītāryavṛttaḥ
मनुष्य ऐसा आचरण करे कि सज्जन सामने उसका सम्मान करें और पीठ पीछे भी सज्जन उसकी रक्षा करें। दुष्टों के कटु वचनों को वह सदा सहे और श्रेष्ठ आचरण वाला होकर सज्जनों का व्यवहार अपनाए।
श्लोक 20 (1.81.20)
वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति । यैराहतः शोचति रात्र्यहानि । परस्य ये मर्मसु संपतन्ति । तान्पण्डितो नावसृजेत्परेषु ॥
vāksāyakā vadanānniṣpatanti | yairāhataḥ śocati rātryahāni | parasya ye marmasu saṃpatanti | tānpaṇḍito nāvasṛjetpareṣu
वाणी के बाण मुख से निकलते हैं, जिनसे आहत मनुष्य दिन-रात शोक करता है। जो दूसरों के मर्मस्थलों पर जा लगते हैं, ऐसे बाण बुद्धिमान् मनुष्य दूसरों पर न छोड़े।
श्लोक 21 (1.81.21)
नहीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु विद्यते । दया मैत्री च भूतेषु दानं च मधुरा च वाक् ॥
nahīdṛśaṃ saṃvananaṃ triṣu lokeṣu vidyate | dayā maitrī ca bhūteṣu dānaṃ ca madhurā ca vāk
तीनों लोकों में प्राणियों के प्रति दया और मैत्री, दान और मधुर वाणी के समान दूसरों को वश में करने वाला कोई साधन नहीं है।
श्लोक 22 (1.81.22)
तस्मात्सान्त्वं सदा वाच्यं न वाच्यं परुषं क्वचित् । पूज्यान्संपूजयेद्दद्यान्न च याचेत्कदाचन ॥
tasmātsāntvaṃ sadā vācyaṃ na vācyaṃ paruṣaṃ kvacit | pūjyānsaṃpūjayeddadyānna ca yācetkadācana
इसलिए सदा मधुर वचन बोलने चाहिए, कभी कठोर वचन नहीं। पूजनीय लोगों का भली-भाँति सम्मान करे, दान दे, पर स्वयं कभी याचना न करे।