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आदि पर्व · अध्याय 85

ययाति द्वारा आश्रमों और सच्चे मुनि का वर्णन

अष्टक पूछते हैं कि गृहस्थ, भिक्षु, ब्रह्मचारी और वानप्रस्थ अपने-अपने लक्ष्य को कैसे पाते हैं। ययाति प्रत्येक आश्रम का उचित आचरण बताते हैं, समझाते हैं कि सच्चा मुनि कौन है, जिसके लिए गाँव और वन दोनों पीछे छूट जाते हैं, और उन दोषों को गिनाते हैं जिन्हें सबको त्यागना चाहिए। अन्त में वे प्रत्येक आश्रम के लिए भोजन की उचित मात्रा बताते हैं।

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अष्टक उवाच

श्लोक 1 (1.85.1)

चरन्गृहस्थः कथमेति धर्मान् । कथं भिक्षुः कथमाचार्यकर्मा । वानप्रस्थः सत्पथे सन्निविष्टो । बहून्यस्मिन्संप्रति वेदयन्ति ॥

carangṛhasthaḥ kathameti dharmān | kathaṃ bhikṣuḥ kathamācāryakarmā | vānaprasthaḥ satpathe sanniviṣṭo | bahūnyasminsaṃprati vedayanti

गृहस्थ जीवन बिताते हुए धर्मों को कैसे प्राप्त करता है? भिक्षु कैसे, गुरु की सेवा करने वाला ब्रह्मचारी कैसे, और सन्मार्ग पर स्थित वानप्रस्थ कैसे? आजकल इस विषय में बहुत-सी बातें बताई जाती हैं।

ययातिरुवाच

श्लोक 2 (1.85.2)

आहूताध्यायी गुरुकर्मस्वचोद्यः । पूर्वोत्थायी चरमं चोपशायी । मृदुर्दान्तो धृतिमानप्रमत्तः । स्वाध्यायशीलः सिध्यति ब्रह्मचारी ॥

āhūtādhyāyī gurukarmasvacodyaḥ | pūrvotthāyī caramaṃ copaśāyī | mṛdurdānto dhṛtimānapramattaḥ | svādhyāyaśīlaḥ sidhyati brahmacārī

जो बुलाए जाने पर अध्ययन करता है, गुरु के कामों में बिना कहे लगा रहता है, गुरु से पहले उठता है और उनके बाद सोता है, जो कोमल, संयमी, धैर्यवान, सावधान और स्वाध्याय में लगा रहता है, वह ब्रह्मचारी सिद्धि पाता है।

श्लोक 3 (1.85.3)

धर्मागतं प्राप्य धनं यजेत । दद्यात्सदैवातिथीन्भोजयेच्च । अनाददानश्च परैरदत्तं । सैषा गृहस्थोपनिषत्पुराणी ॥

dharmāgataṃ prāpya dhanaṃ yajeta | dadyātsadaivātithīnbhojayecca | anādadānaśca parairadattaṃ | saiṣā gṛhasthopaniṣatpurāṇī

धर्म से प्राप्त धन पाकर यज्ञ करे, सदा दान दे, अतिथियों को भोजन कराए और दूसरों द्वारा न दिया गया कुछ भी न ले। यही गृहस्थ का प्राचीन रहस्य-उपदेश है।

श्लोक 4 (1.85.4)

स्ववीर्यजीवी वृजिनान्निवृत्तो । दाता परेभ्यो न परोपतापी । तादृङ्मुनिः सिद्धिमुपैति मुख्यां । वसन्नरण्ये नियताहारचेष्टः ॥

svavīryajīvī vṛjinānnivṛtto | dātā parebhyo na paropatāpī | tādṛṅmuniḥ siddhimupaiti mukhyāṃ | vasannaraṇye niyatāhāraceṣṭaḥ

जो अपने ही पराक्रम से जीता है, पाप से दूर रहता है, दूसरों को देता है और किसी को कष्ट नहीं देता, वन में रहते हुए आहार और आचरण को संयम में रखने वाला ऐसा मुनि श्रेष्ठ सिद्धि पाता है।

श्लोक 5 (1.85.5)

अशिल्पजीवी गुणवांश्चैव नित्यं । जितेन्द्रियः सर्वतो विप्रयुक्तः । अनोकशायी लघुरल्पप्रसार- । श्चरन्देशानेकचरः स भिक्षुः ॥

aśilpajīvī guṇavāṃścaiva nityaṃ | jitendriyaḥ sarvato viprayuktaḥ | anokaśāyī laghuralpaprasāra- | ścarandeśānekacaraḥ sa bhikṣuḥ

जो किसी शिल्प से जीविका नहीं चलाता, सदा गुणवान है, इन्द्रियों को जीत चुका है, सबसे अलग है, घर में नहीं सोता, हल्का है, जिसके पास थोड़ा ही सामान है और जो अकेला देश-देश में घूमता है, वही भिक्षु है।

श्लोक 6 (1.85.6)

रात्र्या यया वाऽभिजिताश्च लोका । भवन्ति कामाभिजिताः सुखाश्च । तामेव रात्रिं प्रयतेत विद्वा- । नरण्यसंस्थो भवितुं यतात्मा ॥

rātryā yayā vā'bhijitāśca lokā | bhavanti kāmābhijitāḥ sukhāśca | tāmeva rātriṃ prayateta vidvā- | naraṇyasaṃstho bhavituṃ yatātmā

जिस रात्रि के द्वारा लोक जीते जाते हैं, कामनाएँ वश में होती हैं और सुख मिलता है, उसी रात्रि में संयमी विद्वान को वन में निवास करने का प्रयत्न करना चाहिए।

श्लोक 7 (1.85.7)

दशैव पूर्वान्दश चापरांश्च । ज्ञातीनथात्मानमथैकविंशम् । अरण्यवासी सुकृते दधाति । विमुच्यारण्ये स्वशरीरधातून् ॥

daśaiva pūrvāndaśa cāparāṃśca | jñātīnathātmānamathaikaviṃśam | araṇyavāsī sukṛte dadhāti | vimucyāraṇye svaśarīradhātūn

अपने से पहले की दस पीढ़ियों, बाद की दस पीढ़ियों और इक्कीसवें स्वयं को, वनवासी इन सबको पुण्य में स्थापित कर देता है, जब वह वन में अपने शरीर के धातुओं को त्यागता है।

अष्टक उवाच

श्लोक 8 (1.85.8)

कतिस्विदेव मुनयः कति मौनानि चाप्युत । भवन्तीति तदाचक्ष्व श्रोतुमिच्छामहे वयम् ॥

katisvideva munayaḥ kati maunāni cāpyuta | bhavantīti tadācakṣva śrotumicchāmahe vayam

मुनि कितने प्रकार के होते हैं और मौन कितने प्रकार के? यह बताइए; हम सुनना चाहते हैं।

ययातिरुवाच

श्लोक 9 (1.85.9)

अरण्ये वसतो यस्य ग्रामो भवति पृष्ठतः । ग्रामे वा वसतोऽरण्यं स मुनिः स्याज्जनाधिप ॥

araṇye vasato yasya grāmo bhavati pṛṣṭhataḥ | grāme vā vasato'raṇyaṃ sa muniḥ syājjanādhipa

हे जनाधिप, वन में रहते हुए जिसके लिए गाँव पीछे छूट जाता है, या गाँव में रहते हुए जिसके लिए वन पीछे छूट जाता है, वही मुनि है।

अष्टक उवाच

श्लोक 10 (1.85.10)

कथंस्विद्वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः । ग्रामे वा वसतोऽरण्यं कथं भवति पृष्ठतः ॥

kathaṃsvidvasato'raṇye grāmo bhavati pṛṣṭhataḥ | grāme vā vasato'raṇyaṃ kathaṃ bhavati pṛṣṭhataḥ

वन में रहने वाले के लिए गाँव पीछे कैसे छूटता है, और गाँव में रहने वाले के लिए वन पीछे कैसे छूटता है?

ययातिरुवाच

श्लोक 11 (1.85.11)

न ग्राम्यमुपयुञ्जीत य आरण्यो मुनिर्भवेत् । तथास्य वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः ॥

na grāmyamupayuñjīta ya āraṇyo munirbhavet | tathāsya vasato'raṇye grāmo bhavati pṛṣṭhataḥ

जो मुनि वन में रहता है, वह गाँव की वस्तुओं का उपयोग न करे। इस प्रकार वन में रहते हुए गाँव उसके पीछे छूट जाता है।

श्लोक 12 (1.85.12)

अनग्निरनिकेतश्चाप्यगोत्रचरणो मुनिः । कौपीनाच्छादनं यावत्तावदिच्छेच्च चीवरम् ॥

anagniraniketaścāpyagotracaraṇo muniḥ | kaupīnācchādanaṃ yāvattāvadicchecca cīvaram

मुनि न अग्नि रखता है, न घर, न गोत्र और न चरण (वेदशाखा) का आश्रय लेता है; वह वस्त्र केवल उतना ही चाहे जितना लँगोटी और तन ढकने के लिए आवश्यक हो।

श्लोक 13 (1.85.13)

यावत्प्राणाभिसन्धानं तावदिच्छेच्च भोजनम् । तथाऽस्य वसतो ग्रामेऽरण्यं भवति पृष्ठतः ॥

yāvatprāṇābhisandhānaṃ tāvadicchecca bhojanam | tathā'sya vasato grāme'raṇyaṃ bhavati pṛṣṭhataḥ

और भोजन भी केवल उतना ही चाहे जितने से प्राण टिके रहें। इस प्रकार गाँव में रहते हुए भी वन उसके पीछे छूट जाता है।

श्लोक 14 (1.85.14)

यस्तु कामान्परित्यज्य त्यक्तकर्मा जितेन्द्रियः । आतिष्ठेच्च मुनिर्मौनं स लोके सिद्धिमाप्नुयात् ॥

yastu kāmānparityajya tyaktakarmā jitendriyaḥ | ātiṣṭhecca munirmaunaṃ sa loke siddhimāpnuyāt

जो मुनि कामनाओं को त्यागकर, कर्मों को छोड़कर, इन्द्रियों को जीतकर मौन धारण करता है, वह लोक में सिद्धि पाता है।

श्लोक 15 (1.85.15)

धौतदन्तं कृत्तनखं सदा स्नातमलङ्कृतम् । असितं सितकर्माणं कस्तमर्हति नार्चितुम् ॥

dhautadantaṃ kṛttanakhaṃ sadā snātamalaṅkṛtam | asitaṃ sitakarmāṇaṃ kastamarhati nārcitum

जिसके दाँत साफ़ हैं, नख कटे हुए हैं, जो सदा स्नान किए और अलंकृत रहता है, जो शरीर से श्याम पर कर्मों से उज्ज्वल है, ऐसे व्यक्ति का आदर कौन नहीं करेगा?

श्लोक 16 (1.85.16)

तपसा कर्शितः क्षामः क्षीणमांसास्थिशोणितः । स च लोकमिमं जित्वा लोकं विजयते परम् ॥

tapasā karśitaḥ kṣāmaḥ kṣīṇamāṃsāsthiśoṇitaḥ | sa ca lokamimaṃ jitvā lokaṃ vijayate param

तप से कृश, दुबला, जिसके मांस, अस्थि और रक्त क्षीण हो गए हैं, वह भी इस लोक को जीतकर परलोक को जीत लेता है।

श्लोक 17 (1.85.17)

यदा भवति निर्द्वन्द्वो मुनिर्मौनं समास्थितः । अथ लोकमिमं जित्वा लोकं विजयते परम् ॥

yadā bhavati nirdvandvo munirmaunaṃ samāsthitaḥ | atha lokamimaṃ jitvā lokaṃ vijayate param

जब मौन धारण करने वाला मुनि द्वन्द्वों से मुक्त हो जाता है, तब वह इस लोक को जीतकर परलोक को जीत लेता है।

श्लोक 18 (1.85.18)

आस्येन तु यदाऽहारं गोवन्मृगयते मुनिः । अथास्य लोकः सर्वोऽयं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥

āsyena tu yadā'hāraṃ govanmṛgayate muniḥ | athāsya lokaḥ sarvo'yaṃ so'mṛtatvāya kalpate

जब मुनि गाय की भाँति केवल मुँह से अपना भोजन खोजता है, तब यह सारा लोक उसका हो जाता है और वह अमरत्व के योग्य बन जाता है।

श्लोक 19 (1.85.19)

सामान्यधर्मः सर्वेषां क्रोधो लोभो द्रुहाऽक्षमा । विहाय मत्सरं शाठ्यं दर्पं दम्भं च पैशुनम् । क्रोधं लोभं ममत्वं च यस्य नास्ति स धर्मवित् ॥

sāmānyadharmaḥ sarveṣāṃ krodho lobho druhā'kṣamā | vihāya matsaraṃ śāṭhyaṃ darpaṃ dambhaṃ ca paiśunam | krodhaṃ lobhaṃ mamatvaṃ ca yasya nāsti sa dharmavit

सबका सामान्य धर्म यह है: क्रोध, लोभ, द्रोह और असहनशीलता, तथा ईर्ष्या, शठता, दर्प, दम्भ और चुगली को त्याग देना चाहिए। जिसमें क्रोध, लोभ और ममता नहीं है, वही धर्म का ज्ञाता है।

अष्टक उवाच

श्लोक 20 (1.85.20)

नित्याशनो ब्रह्मचारी गृहस्थो वनगो मुनिः । नाधर्ममशनात्प्राप्येत्कथं ब्रूहीह पृच्छते ॥

nityāśano brahmacārī gṛhastho vanago muniḥ | nādharmamaśanātprāpyetkathaṃ brūhīha pṛcchate

ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और मुनि, सभी नित्य भोजन करते हैं। तो भोजन करने से अधर्म कैसे न लगे? मैं पूछ रहा हूँ, यह मुझे बताइए।

ययातिरुवाच

श्लोक 21 (1.85.21)

अष्टौ ग्रासा मुनेः प्रोक्ताः षोडशारण्यवासिनः । द्वात्रिंशत्तु गृहस्थस्य अमितं ब्रह्मचारिणः ॥

aṣṭau grāsā muneḥ proktāḥ ṣoḍaśāraṇyavāsinaḥ | dvātriṃśattu gṛhasthasya amitaṃ brahmacāriṇaḥ

मुनि के लिए आठ ग्रास बताए गए हैं, वानप्रस्थ के लिए सोलह, गृहस्थ के लिए बत्तीस, और ब्रह्मचारी के लिए कोई सीमा नहीं।

श्लोक 22 (1.85.22)

इत्येवं कारणैर्ज्ञेयमष्टकैतच्छुभाशुभम् ॥

ityevaṃ kāraṇairjñeyamaṣṭakaitacchubhāśubham

हे अष्टक, इस प्रकार इन कारणों से शुभ और अशुभ को जानना चाहिए।

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