आदि पर्व · अध्याय 88
पूरु से भरत तक का वंश
जनमेजय पूरु और उनके वंश को आगे बढ़ाने वाले राजाओं के विषय में, तथा भरत के जन्म के विषय में सुनना चाहते हैं। वैशम्पायन पौरव वंश का क्रम बताते हैं: पूरु के तीन पुत्र, प्रवीर के पुत्र मनस्यु और उनके पुत्र, अप्सरा मिश्रकेशी से रौद्राश्व के दस पुत्र, अनाधृष्टि और उनके पुत्र मतिनार, मतिनार के चार पुत्र, तंसु, ईलिन, और दुष्यन्त आदि ईलिन के पाँच पुत्र। दुष्यन्त ने लक्षणा से जनमेजय को और शकुन्तला से भरत को जन्म दिया, और भरत से ही भरतवंश का यश फैला।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (1.88.1)
पुत्रं ययातेः प्रब्रूहि पूरुं धर्मभृतां वरम् । आनुपूर्व्येण ये चान्ये पूरोर्वंशविवर्धनाः ॥
putraṃ yayāteḥ prabrūhi pūruṃ dharmabhṛtāṃ varam | ānupūrvyeṇa ye cānye pūrorvaṃśavivardhanāḥ
धर्म धारण करने वालों में श्रेष्ठ, ययाति के पुत्र पूरु के विषय में बताइए, और क्रम से उन अन्य राजाओं के विषय में भी, जिन्होंने पूरु के वंश को बढ़ाया।
श्लोक 2 (1.88.2)
विस्तरेण पुनर्ब्रूहि दौष्यन्तेर्जनमेजयात् । संबभूव यथा राजा भरतो द्विजसत्तम ॥
vistareṇa punarbrūhi dauṣyanterjanamejayāt | saṃbabhūva yathā rājā bharato dvijasattama
हे द्विजश्रेष्ठ, फिर से विस्तार से बताइए कि जनमेजय के बाद दुष्यन्त के पुत्र राजा भरत किस प्रकार उत्पन्न हुए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (1.88.3)
पूरुर्नृपतिशार्दूलो यथैवास्य पिता नृप । धर्मनित्यः स्थितो राज्ये शक्रतुल्यपराक्रमः ॥
pūrurnṛpatiśārdūlo yathaivāsya pitā nṛpa | dharmanityaḥ sthito rājye śakratulyaparākramaḥ
हे राजन्, राजाओं में सिंह के समान पूरु अपने पिता की ही भाँति सदा धर्म में स्थित रहकर राज्य करते थे; उनका पराक्रम इन्द्र के समान था।
श्लोक 4 (1.88.4)
प्रवीरेश्वररौद्राश्वास्त्रयः पुत्रा महारथाः । पूरोः पौष्ट्यामजायन्त प्रवीरो वंशकृत्ततः ॥
pravīreśvararaudrāśvāstrayaḥ putrā mahārathāḥ | pūroḥ pauṣṭyāmajāyanta pravīro vaṃśakṛttataḥ
पूरु के पौष्टी से तीन पुत्र हुए, प्रवीर, ईश्वर और रौद्राश्व, जो महारथी थे। उनमें प्रवीर ने वंश को आगे बढ़ाया।
श्लोक 5 (1.88.5)
मनस्युरभवत्तस्माच्छूरसेनीसुतः प्रभुः । पृथिव्याश्चतुरन्ताया गोप्ता राजीवलोचनः ॥
manasyurabhavattasmācchūrasenīsutaḥ prabhuḥ | pṛthivyāścaturantāyā goptā rājīvalocanaḥ
उनसे शूरसेनी के पुत्र मनस्यु उत्पन्न हुए, जो समर्थ, कमलनयन और चारों ओर समुद्र तक फैली पृथ्वी के रक्षक थे।
श्लोक 6 (1.88.6)
शक्तः संहननो वाग्मी सौवीरीतनयास्त्रयः । मनस्योरभवन्पुत्राः शूराः सर्वे महारथाः ॥
śaktaḥ saṃhanano vāgmī sauvīrītanayāstrayaḥ | manasyorabhavanputrāḥ śūrāḥ sarve mahārathāḥ
मनस्यु के सौवीरी से तीन पुत्र हुए, शक्त, संहनन और वाग्मी; वे सभी शूरवीर और महारथी थे।
श्लोक 7 (1.88.7)
अन्वग्भानुप्रभृतयो मिश्रकेश्यां मनस्विनः । रौद्राश्वस्य महेष्वासा दशाप्सरसि सूनवः ॥
anvagbhānuprabhṛtayo miśrakeśyāṃ manasvinaḥ | raudrāśvasya maheṣvāsā daśāpsarasi sūnavaḥ
रौद्राश्व के अप्सरा मिश्रकेशी से दस पुत्र हुए, जो मनस्वी और महान धनुर्धर थे; उनमें अन्वग्भानु प्रमुख थे।
श्लोक 8 (1.88.8)
यज्वानो जज्ञिरे शूराः प्रजावन्तो बहुश्रुताः । सर्वे सर्वास्त्रविद्वासः सर्वे धर्मपरायणाः ॥
yajvāno jajñire śūrāḥ prajāvanto bahuśrutāḥ | sarve sarvāstravidvāsaḥ sarve dharmaparāyaṇāḥ
वे यज्ञ करने वाले, शूरवीर, सन्तानवान और बहुश्रुत थे; सभी समस्त अस्त्रों के ज्ञाता थे और सभी धर्मपरायण थे।
श्लोक 9 (1.88.9)
ऋचेयुरथ कक्षेयुः कृकणेयुश्च वीर्यवान् । स्थण्डिलेयुर्वनेयुश्च जलेयुश्च महायशाः ॥
ṛceyuratha kakṣeyuḥ kṛkaṇeyuśca vīryavān | sthaṇḍileyurvaneyuśca jaleyuśca mahāyaśāḥ
वे थे: ऋचेयु, कक्षेयु, पराक्रमी कृकणेयु, स्थण्डिलेयु, वनेयु और महायशस्वी जलेयु;
श्लोक 10 (1.88.10)
तेजेयुर्बलवान्धीमान्सत्येयुश्चन्द्रविक्रमः । धर्मेयुः सन्नतेयुश्च दशमो देवविक्रमः ॥
tejeyurbalavāndhīmānsatyeyuścandravikramaḥ | dharmeyuḥ sannateyuśca daśamo devavikramaḥ
बलवान और बुद्धिमान तेजेयु, चन्द्रमा के समान पराक्रमी सत्येयु, धर्मेयु, और दसवें, देवताओं के समान पराक्रमी सन्नतेयु।
श्लोक 11 (1.88.11)
अनाधृष्टिरभूत्तेषां विद्वान्भुवि तथैकराट् । ऋचेयुरथ विक्रान्तो देवानामिव वासवः ॥
anādhṛṣṭirabhūtteṣāṃ vidvānbhuvi tathaikarāṭ | ṛceyuratha vikrānto devānāmiva vāsavaḥ
उनमें विद्वान अनाधृष्टि पृथ्वी के एकछत्र सम्राट हुए; यही ऋचेयु थे, जो देवताओं में इन्द्र के समान पराक्रमी थे।
श्लोक 12 (1.88.12)
अनाधृष्टिसुतस्त्वासीद्राजसूयाश्वमेधकृत् । मतिनार इति ख्यातो राजा परमधार्मिकः ॥
anādhṛṣṭisutastvāsīdrājasūyāśvamedhakṛt | matināra iti khyāto rājā paramadhārmikaḥ
अनाधृष्टि के पुत्र मतिनार नाम से प्रसिद्ध परम धर्मात्मा राजा हुए, जिन्होंने राजसूय और अश्वमेध यज्ञ किए।
श्लोक 13 (1.88.13)
मतिनारसुता राजंश्चत्वारोऽमितविक्रमाः । तंसुर्महानतिरथो द्रुह्युश्चाप्रतिमद्युतिः ॥
matinārasutā rājaṃścatvāro'mitavikramāḥ | taṃsurmahānatiratho druhyuścāpratimadyutiḥ
हे राजन्, मतिनार के चार पुत्र हुए, जो अपार पराक्रमी थे: तंसु, महान्, अतिरथ और अनुपम तेज वाले द्रुह्यु।
श्लोक 14 (1.88.14)
तेषां तंसुर्महावीर्यः पौरवं वंशमुद्वहन् । आजहार यशो दीप्तं जिगाय च वसुंधराम् ॥
teṣāṃ taṃsurmahāvīryaḥ pauravaṃ vaṃśamudvahan | ājahāra yaśo dīptaṃ jigāya ca vasuṃdharām
उनमें महाबली तंसु ने पौरव वंश को आगे बढ़ाते हुए उज्ज्वल यश प्राप्त किया और पृथ्वी को जीता।
श्लोक 15 (1.88.15)
ईलिनं तु सुतं तंसुर्जनयामास वीर्यवान् । सोऽपि कृत्स्नामिमां भूमिं विजिग्ये जयतां वरः ॥
īlinaṃ tu sutaṃ taṃsurjanayāmāsa vīryavān | so'pi kṛtsnāmimāṃ bhūmiṃ vijigye jayatāṃ varaḥ
पराक्रमी तंसु ने ईलिन नामक पुत्र को जन्म दिया; विजेताओं में श्रेष्ठ उसने भी इस सारी पृथ्वी को जीत लिया।
श्लोक 16 (1.88.16)
रथन्तर्यां सुतान्पञ्च पञ्चभूतोपमांस्ततः । ईलिनो जनयामास दुष्यन्तप्रभृतीन्नृपान् ॥
rathantaryāṃ sutānpañca pañcabhūtopamāṃstataḥ | īlino janayāmāsa duṣyantaprabhṛtīnnṛpān
फिर ईलिन ने रथन्तरी से पाँच पुत्रों को जन्म दिया, जो पंचमहाभूतों के समान थे; वे दुष्यन्त आदि राजा थे:
श्लोक 17 (1.88.17)
दुष्यन्तं शूरभीमौ च प्रवसुं वसुमेव च । तेषां श्रेष्ठोऽभवद्राजा दुष्यन्तो दुर्जयो युधि ॥
duṣyantaṃ śūrabhīmau ca pravasuṃ vasumeva ca | teṣāṃ śreṣṭho'bhavadrājā duṣyanto durjayo yudhi
दुष्यन्त, शूर, भीम, प्रवसु और वसु। उनमें श्रेष्ठ राजा दुष्यन्त थे, जिन्हें युद्ध में जीतना कठिन था।
श्लोक 18 (1.88.18)
दुष्यन्ताल्लक्षणायां तु जज्ञे वै जनमेजयः । शकुन्तलायां भरतो दौष्यन्तिरभवत्सुतः ॥
duṣyantāllakṣaṇāyāṃ tu jajñe vai janamejayaḥ | śakuntalāyāṃ bharato dauṣyantirabhavatsutaḥ
दुष्यन्त से लक्षणा के गर्भ से जनमेजय उत्पन्न हुए, और शकुन्तला के गर्भ से दुष्यन्त-पुत्र भरत का जन्म हुआ।
श्लोक 19 (1.88.19)
तस्माद्भरतवंशस्य विप्रतस्थे महद्यशः ॥
tasmādbharatavaṃśasya vipratasthe mahadyaśaḥ
उन्हीं से भरतवंश का महान यश दूर-दूर तक फैला।