आदि पर्व · अध्याय 93
शकुन्तला का जन्म
शकुन्तला अपने जन्म के विषय में कण्व का वृत्तान्त आगे सुनाती है। इन्द्र की भेजी मेनका विश्वामित्र के पास आती है; वायु उसका वस्त्र उड़ा देता है, मुनि उस पर मोहित हो जाते हैं, एक दिन की तरह बीते हज़ार वर्षों में अपना तप गँवा देते हैं, और हिमालय पर मालिनी के तट पर शकुन्तला का जन्म होता है। मेनका शिशु को छोड़कर इन्द्र के पास लौट जाती है; पक्षी उस बालिका की रक्षा करते हैं, फिर कण्व उसे पाकर अपनी पुत्री बना लेते हैं और शकुन्त पक्षियों के नाम पर उसका नाम रखते हैं। अन्त में शकुन्तला दुष्यन्त से कहती है कि वह कण्व को ही अपना पिता मानती है।
कण्व उवाच
श्लोक 1 (1.93.1)
एवमुक्तस्तया शक्रः संदिदेश सदागतिम् । प्रातिष्ठत तदा काले मेनका वायुना सह ॥
evamuktastayā śakraḥ saṃdideśa sadāgatim | prātiṣṭhata tadā kāle menakā vāyunā saha
मेनका के ऐसा कहने पर इन्द्र ने सदा गतिशील वायु को आदेश दिया, और उचित समय पर मेनका वायु के साथ चल पड़ी।
श्लोक 2 (1.93.2)
अथापश्यद्वरारोहा तपसा दग्धकिल्बिषम् । विश्वामित्रं तप्यमानं मेनका भीरुराश्रमे ॥
athāpaśyadvarārohā tapasā dagdhakilbiṣam | viśvāmitraṃ tapyamānaṃ menakā bhīrurāśrame
तब उस सुन्दरी, भीरु मेनका ने आश्रम में विश्वामित्र को तप करते देखा, जिनके पाप तप से भस्म हो चुके थे।
श्लोक 3 (1.93.3)
अभिवाद्य ततः सा तं प्राक्रीडदृषिसन्निधौ । अपोवाह च वासोऽस्या मारुतः शशिसंनिभम् ॥
abhivādya tataḥ sā taṃ prākrīḍadṛṣisannidhau | apovāha ca vāso'syā mārutaḥ śaśisaṃnibham
उन्हें प्रणाम करके वह ऋषि के निकट क्रीड़ा करने लगी; और वायु उसका चन्द्रमा-सा उजला वस्त्र उड़ा ले गया।
श्लोक 4 (1.93.4)
सागच्छत्त्वरिता भूमिं वासस्तदभिलिप्सती । कुत्सयन्तीव सव्रीडं मारुतं वरवर्णिनी ॥
sāgacchattvaritā bhūmiṃ vāsastadabhilipsatī | kutsayantīva savrīḍaṃ mārutaṃ varavarṇinī
वह सुन्दरी अपना वस्त्र पकड़ने की चाह में शीघ्रता से भूमि की ओर लपकी, मानो लज्जा के साथ वायु को झिड़क रही हो।
श्लोक 5 (1.93.5)
पश्यतस्तस्य राजर्षेरप्यग्निसमतेजसः । विश्वामित्रस्ततस्तां तु विषमस्थामनिन्दिताम् ॥
paśyatastasya rājarṣerapyagnisamatejasaḥ | viśvāmitrastatastāṃ tu viṣamasthāmaninditām
अग्नि के समान तेजस्वी वे राजर्षि देखते रह गए; विश्वामित्र ने उस अनिन्द्य सुन्दरी को उस असहज दशा में देखा:
श्लोक 6 (1.93.6)
गृद्धां वाससि संभ्रान्तां मेनकां मुनिसत्तमः । अनिर्देश्यवयोरूपामपश्यद्विवृतां तदा ॥
gṛddhāṃ vāsasi saṃbhrāntāṃ menakāṃ munisattamaḥ | anirdeśyavayorūpāmapaśyadvivṛtāṃ tadā
मुनिश्रेष्ठ ने वस्त्र के लिए आतुर और घबराई हुई मेनका को अनावृत देखा, जिसका रूप और यौवन वर्णन से परे था।
श्लोक 7 (1.93.7)
तस्या रूपगुणान्दृष्ट्वा स तु विप्रर्षभस्तदा । चकार भावं संसर्गे तया कामवशं गतः ॥
tasyā rūpaguṇāndṛṣṭvā sa tu viprarṣabhastadā | cakāra bhāvaṃ saṃsarge tayā kāmavaśaṃ gataḥ
उसके रूप और गुणों को देखकर वे श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि काम के वश में हो गए और उन्होंने उसके साथ संग की इच्छा की।
श्लोक 8 (1.93.8)
न्यमन्त्रयत चाप्येनां सा चाप्यैच्छदनिन्दिता । तौ तत्र सुचिरं कालमुभौ व्यवहरतां तदा ॥
nyamantrayata cāpyenāṃ sā cāpyaicchadaninditā | tau tatra suciraṃ kālamubhau vyavaharatāṃ tadā
उन्होंने उसे आमन्त्रित किया और उस अनिन्द्य सुन्दरी ने भी यही चाहा। तब वे दोनों बहुत समय तक वहाँ साथ रहे,
श्लोक 9 (1.93.9)
रममाणौ यथाकामं यथैकदिवसं तथा । एवं वर्षसहस्राणामतीतं नान्वचिन्तयत् ॥
ramamāṇau yathākāmaṃ yathaikadivasaṃ tathā | evaṃ varṣasahasrāṇāmatītaṃ nānvacintayat
इच्छानुसार आनन्द करते हुए, मानो एक ही दिन बीता हो। इस प्रकार हज़ार वर्ष बीत गए और उन्हें इसका ध्यान भी नहीं रहा।
श्लोक 10 (1.93.10)
कामक्रोधावजितवान्मुनिर्नित्यं समाहितः । चिरार्जितस्य तपसः क्षयं स कृतवान्मुनिः ॥
kāmakrodhāvajitavānmunirnityaṃ samāhitaḥ | cirārjitasya tapasaḥ kṣayaṃ sa kṛtavānmuniḥ
वे मुनि सदा एकाग्र रहते हुए भी काम और क्रोध को नहीं जीत पाए थे; इसलिए उन्होंने दीर्घकाल से संचित अपने तप को नष्ट कर दिया।
श्लोक 11 (1.93.11)
तपसः संक्षयादेव मुनिर्मोहं समाविशत् । मोहाभिभूतः क्रोधात्मा ग्रसन्मूलफलान्मुनिः ॥
tapasaḥ saṃkṣayādeva munirmohaṃ samāviśat | mohābhibhūtaḥ krodhātmā grasanmūlaphalānmuniḥ
तप के उसी क्षय से मुनि मोह में पड़ गए। मोह से अभिभूत, क्रोधी स्वभाव वाले वे मुनि कन्द-मूल-फल खाते हुए
श्लोक 12 (1.93.12)
पादैर्जलरवं कृत्वा अन्तर्द्वीपे कुटीं गतः । मेनका गन्तुकामा तु शुश्राव जलनिस्वनम् ॥
pādairjalaravaṃ kṛtvā antardvīpe kuṭīṃ gataḥ | menakā gantukāmā tu śuśrāva jalanisvanam
पैरों से जल में छपछप करते हुए द्वीप के भीतर अपनी कुटिया में गए। जाने की इच्छा रखने वाली मेनका ने जल की वह ध्वनि सुनी।
मेनकोवाच
श्लोक 13 (1.93.13)
तपसा दीप्तवीर्योऽसावाकाशादेति याति च । अद्य संज्ञां विजानामि ययाऽद्य तपसः क्षयः ॥
tapasā dīptavīryo'sāvākāśādeti yāti ca | adya saṃjñāṃ vijānāmi yayā'dya tapasaḥ kṣayaḥ
"तप से प्रज्वलित शक्ति वाले ये पहले आकाश-मार्ग से आते-जाते थे। आज मैं वह लक्षण पहचान रही हूँ, जिससे पता चलता है कि इनका तप क्षीण हो गया है।
कण्व उवाच
श्लोक 14 (1.93.14)
गन्तुं न युक्तमित्युक्त्वा ऋतुस्नाताथ मेनका । कामरागाभिभूतस्य मुनेः पार्श्वं जगाम ह ॥
gantuṃ na yuktamityuktvā ṛtusnātātha menakā | kāmarāgābhibhūtasya muneḥ pārśvaṃ jagāma ha
अब मेरा जाना उचित नहीं," ऐसा कहकर ऋतुस्नान की हुई मेनका काम और राग से अभिभूत मुनि के पास चली गई।
श्लोक 15 (1.93.15)
जनयामास स मुनिर्मेनकायां शकुन्तलाम् । प्रस्थे हिमवतो रम्ये मालिनीमभितो नदीम् ॥
janayāmāsa sa munirmenakāyāṃ śakuntalām | prasthe himavato ramye mālinīmabhito nadīm
मुनि ने हिमालय के एक रमणीय शिखर-प्रदेश पर, मालिनी नदी के तट पर, मेनका से शकुन्तला को उत्पन्न किया।
श्लोक 16 (1.93.16)
देवगर्भोपमां बालां सर्वाभरणभूषिताम् । शयानां शयने रम्ये मेनका वाक्यमब्रवीत् ॥
devagarbhopamāṃ bālāṃ sarvābharaṇabhūṣitām | śayānāṃ śayane ramye menakā vākyamabravīt
देवताओं की सन्तान के समान, सब आभूषणों से सजी और सुन्दर शय्या पर लेटी उस बालिका से मेनका ने यह कहा:
मेनकोवाच
श्लोक 17 (1.93.17)
महर्षेरुग्रतपसस्तेजस्त्वमसि भामिनि । तस्मात्स्वर्गं गमिष्यामि देवकार्यार्थमागता ॥
maharṣerugratapasastejastvamasi bhāmini | tasmātsvargaṃ gamiṣyāmi devakāryārthamāgatā
"हे सुन्दरी, तुम उग्र तपस्वी महर्षि का तेज हो। अब मैं स्वर्ग लौट जाऊँगी; मैं केवल देवताओं का कार्य करने आई थी।"
कण्व उवाच
श्लोक 18 (1.93.18)
जातमुत्सृज्य तं गर्भं मेनका मालिनीमनु । कृतकार्या ततस्तूर्णमगच्छच्छक्रसंसदम् ॥
jātamutsṛjya taṃ garbhaṃ menakā mālinīmanu | kṛtakāryā tatastūrṇamagacchacchakrasaṃsadam
नवजात शिशु को मालिनी के तट पर छोड़कर, अपना कार्य पूरा करके मेनका शीघ्र ही इन्द्र की सभा में चली गई।
श्लोक 19 (1.93.19)
तं वने विजने गर्भं सिंहव्याघ्रसमाकुले । दृष्ट्वा शयानं शकुनाः समन्तात्पर्यवारयन् । नेमां हिंस्युर्वने बालां क्रव्यादा मांसगृद्धिनः ॥
taṃ vane vijane garbhaṃ siṃhavyāghrasamākule | dṛṣṭvā śayānaṃ śakunāḥ samantātparyavārayan | nemāṃ hiṃsyurvane bālāṃ kravyādā māṃsagṛddhinaḥ
सिंहों और बाघों से भरे उस निर्जन वन में उस शिशु को लेटा देखकर पक्षियों ने उसे चारों ओर से घेर लिया, ताकि मांस के लोभी हिंसक पशु वन में उस बालिका को कोई हानि न पहुँचाएँ।
श्लोक 20 (1.93.20)
पर्यरक्षन्त तां तत्र शकुन्ता मेनकात्मजाम् । उपस्प्रष्टुं गतश्चाहमपश्यं शयितामिमाम् ॥
paryarakṣanta tāṃ tatra śakuntā menakātmajām | upaspraṣṭuṃ gataścāhamapaśyaṃ śayitāmimām
पक्षी वहाँ मेनका की उस पुत्री की रक्षा करते रहे। मैं स्नान-आचमन के लिए गया था, तभी मैंने उसे वहाँ लेटे देखा,
श्लोक 21 (1.93.21)
निर्जने विपिने रम्ये शकुन्तैः परिवारिताम् । मां दृष्ट्वैवाभ्यपद्यन्त पादयोः पतिता द्विजाः । अब्रुवञ्शकुनाः सर्वे कलं मधुरभाषिणः ॥
nirjane vipine ramye śakuntaiḥ parivāritām | māṃ dṛṣṭvaivābhyapadyanta pādayoḥ patitā dvijāḥ | abruvañśakunāḥ sarve kalaṃ madhurabhāṣiṇaḥ
उस रमणीय निर्जन वन में, पक्षियों से घिरी हुई। मुझे देखते ही पक्षी पास आकर मेरे चरणों में गिर पड़े और वे सब मधुर स्वर वाले पक्षी कोमल वाणी में बोले:
शकुना ऊचुः
श्लोक 22 (1.93.22)
विश्वामित्रसुतां ब्रह्मन्न्यासभूतां भरस्व वै । कामक्रोधावजितवान्सखा ते कौशिकीं गतः ॥
viśvāmitrasutāṃ brahmannyāsabhūtāṃ bharasva vai | kāmakrodhāvajitavānsakhā te kauśikīṃ gataḥ
"हे ब्रह्मन्, विश्वामित्र की इस पुत्री का, जो आपके पास धरोहर के रूप में है, पालन-पोषण कीजिए। काम और क्रोध को न जीत पाने वाले आपके मित्र कौशिकी नदी की ओर चले गए हैं।"
कण्व उवाच
श्लोक 23 (1.93.23)
तस्मात्पोषय तत्पुत्रीं दयावानिति तेऽब्रुवन् । सर्वभूतरुतज्ञोऽहं दयावान्सर्वजन्तुषु ॥
tasmātpoṣaya tatputrīṃ dayāvāniti te'bruvan | sarvabhūtarutajño'haṃ dayāvānsarvajantuṣu
"इसलिए हे दयावान, उनकी पुत्री का पालन कीजिए," उन्होंने मुझसे कहा। मैं सभी प्राणियों की बोली समझता हूँ और सब जीवों पर दया रखता हूँ।
श्लोक 24 (1.93.24)
आनयित्वा ततश्चैनां दुहितृत्वे न्यवेशयम् ॥
ānayitvā tataścaināṃ duhitṛtve nyaveśayam
तब मैं उसे ले आया और अपनी पुत्री के रूप में अपना लिया।
श्लोक 25 (1.93.25)
शरीरकृत्प्राणदाता यस्य चान्नानि भुञ्जते । क्रमेणैते त्रयोऽप्युक्ताः पितरो धर्मशासने ॥
śarīrakṛtprāṇadātā yasya cānnāni bhuñjate | krameṇaite trayo'pyuktāḥ pitaro dharmaśāsane
शरीर देने वाला, प्राणों की रक्षा करने वाला और जिसका अन्न खाया जाता है, धर्मशास्त्र में ये तीनों क्रम से पिता कहे गए हैं।
श्लोक 26 (1.93.26)
निर्जने तु वने यस्माच्छकुन्तैः परिवारिता । शकुन्तलेति नामास्याः कृतं चापि ततो मया ॥
nirjane tu vane yasmācchakuntaiḥ parivāritā | śakuntaleti nāmāsyāḥ kṛtaṃ cāpi tato mayā
क्योंकि निर्जन वन में वह शकुन्तों (पक्षियों) से घिरी हुई थी, इसलिए मैंने उसका नाम शकुन्तला रखा।
श्लोक 27 (1.93.27)
एवं दुहितरं विद्धि मम विप्र शकुन्तलाम् । शकुन्तला च पितरं मन्यते मामनिन्दिता ॥
evaṃ duhitaraṃ viddhi mama vipra śakuntalām | śakuntalā ca pitaraṃ manyate māmaninditā
हे विप्र, इस प्रकार शकुन्तला को मेरी पुत्री समझो; और अनिन्द्य शकुन्तला भी मुझे ही अपना पिता मानती है।
शकुन्तलोवाच
श्लोक 28 (1.93.28)
एतदाचष्ट पृष्टः सन्मम जन्म महर्षये । सुतां कण्वस्य मामेवं विद्धि त्वं मनुजाधिप ॥
etadācaṣṭa pṛṣṭaḥ sanmama janma maharṣaye | sutāṃ kaṇvasya māmevaṃ viddhi tvaṃ manujādhipa
पूछे जाने पर उन्होंने महर्षि को मेरे जन्म की यही कथा बताई थी। हे नरेश, इस प्रकार मुझे कण्व की पुत्री जानिए।
श्लोक 29 (1.93.29)
कण्वं हि पितरं मन्ये पितरं स्वमजानती । इति ते कथितं राजन्यथावृत्तं श्रुतं मया ॥
kaṇvaṃ hi pitaraṃ manye pitaraṃ svamajānatī | iti te kathitaṃ rājanyathāvṛttaṃ śrutaṃ mayā
अपने जन्मदाता पिता को न जानने के कारण मैं कण्व को ही अपना पिता मानती हूँ। हे राजन्, जैसा मैंने सुना था, वैसा ही वृत्तान्त आपको सुना दिया।"