आदि पर्व · अध्याय 95
सर्वदमन का जन्म
शकुन्तला दिन-रात दुष्यन्त के भेजे जाने वाले लोगों की प्रतीक्षा करती है, पर तीन वर्ष बिना किसी समाचार के बीत जाते हैं। ऋषि-पत्नियों के समझाने पर वह पुत्र को जन्म देती है; देवता पुष्पवर्षा करते हैं और इन्द्र घोषणा करते हैं कि वह चक्रवर्ती होगा। कण्व के आश्रम में बालक अलौकिक बल के साथ बढ़ता है, हिंस्र पशुओं को बाँध देता है और दैत्यों का वध करता है, इसलिए आश्रमवासी उसका नाम सर्वदमन रखते हैं। उधर ऋषि के भय से दुष्यन्त किसी को नहीं भेजते, और शकुन्तला की दीन दशा देखकर कण्व चिन्तित हो उठते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.95.1)
प्रतिज्ञाय च दुष्यन्ते प्रतियाते दिने दिने । गर्भश्च ववृधे तस्यां राजपुत्र्यां महात्मनः ॥
pratijñāya ca duṣyante pratiyāte dine dine | garbhaśca vavṛdhe tasyāṃ rājaputryāṃ mahātmanaḥ
प्रतिज्ञा करके दुष्यन्त के चले जाने पर उस राजकुमारी के गर्भ में उस महात्मा का गर्भ दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा।
श्लोक 2 (1.95.2)
शकुन्तला चिन्तयन्ती राजानं कार्यगौरवात् । दिवारात्रमनिद्रैव स्नानभोजनवर्जिता ॥
śakuntalā cintayantī rājānaṃ kāryagauravāt | divārātramanidraiva snānabhojanavarjitā
बात की गम्भीरता के कारण शकुन्तला राजा का ही चिन्तन करती रहती; दिन-रात वह न सोती, न स्नान करती, न भोजन करती।
श्लोक 3 (1.95.3)
राजप्रेषणिका विप्राश्चतुरङ्गबलान्विताः । अद्य श्वो वा परश्वो वा समायान्तीति निश्चिता ॥
rājapreṣaṇikā viprāścaturaṅgabalānvitāḥ | adya śvo vā paraśvo vā samāyāntīti niścitā
उसे पक्का विश्वास था कि राजा के भेजे ब्राह्मण चतुरंगिणी सेना के साथ आज, कल या परसों आ ही जाएँगे।
श्लोक 4 (1.95.4)
दिनान्पक्षानृतून्मासानयनानि च सर्वशः । गण्यमानानि वर्षाणि व्यतीयुस्त्रीणि भारत ॥
dinānpakṣānṛtūnmāsānayanāni ca sarvaśaḥ | gaṇyamānāni varṣāṇi vyatīyustrīṇi bhārata
दिन, पक्ष, ऋतुएँ, महीने और अयन गिनते-गिनते, हे भारत, तीन वर्ष बीत गए।
श्लोक 5 (1.95.5)
त्रिषु वर्षेषु पूर्णेषु ऋषेर्वचनगौरवात् । ऋषिपत्न्यः सुबहुशो हेतुमद्वाक्यमब्रुवन् ॥
triṣu varṣeṣu pūrṇeṣu ṛṣervacanagauravāt | ṛṣipatnyaḥ subahuśo hetumadvākyamabruvan
तीन वर्ष पूरे होने पर ऋषि के वचन का आदर करते हुए ऋषि-पत्नियों ने उससे बार-बार युक्तिपूर्ण बातें कहीं।
ऋषिपत्न्य ऊचुः
श्लोक 6 (1.95.6)
शृणु भद्रे लोकवृत्तं श्रुत्वा यद्रोचते तव । तत्कुरुष्व हितं देवि नावमान्यं गुरोर्वचः ॥
śṛṇu bhadre lokavṛttaṃ śrutvā yadrocate tava | tatkuruṣva hitaṃ devi nāvamānyaṃ gurorvacaḥ
हे भद्रे, लोक का व्यवहार सुनो, और सुनकर, हे देवी, जो तुम्हें अच्छा लगे और हितकर हो वही करो। गुरु के वचन का अनादर नहीं करना चाहिए।
श्लोक 7 (1.95.7)
देवानां दैवतं विष्णुर्विप्राणामग्निर्ब्रह्म च । नारीणां दैवतं भर्ता लोकानां ब्राह्मणो गुरुः ॥
devānāṃ daivataṃ viṣṇurviprāṇāmagnirbrahma ca | nārīṇāṃ daivataṃ bhartā lokānāṃ brāhmaṇo guruḥ
देवताओं के देवता विष्णु हैं, ब्राह्मणों के देवता अग्नि और ब्रह्म हैं; स्त्रियों का देवता पति है और सब लोकों का गुरु ब्राह्मण है।
श्लोक 8 (1.95.8)
सूतिकाले प्रसूष्वेति भगवांस्ते पिताऽब्रवीत् । करिष्यामीति कर्तव्यं तदा ते सुकृतं भवेत् ॥
sūtikāle prasūṣveti bhagavāṃste pitā'bravīt | kariṣyāmīti kartavyaṃ tadā te sukṛtaṃ bhavet
तुम्हारे पूज्य पिता ने कहा था — "प्रसव का समय आने पर प्रसव करना।" "ऐसा ही करूँगी" कहकर तुम्हें वही करना चाहिए; तभी तुम्हें पुण्य मिलेगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 9 (1.95.9)
पत्नीनां वचनं श्रुत्वा साधु साध्वित्यचिन्तयत् । गर्भं सुषाव वामोरूः कुमारममितौजसम् ॥
patnīnāṃ vacanaṃ śrutvā sādhu sādhvityacintayat | garbhaṃ suṣāva vāmorūḥ kumāramamitaujasam
पत्नियों की बात सुनकर उसने सोचा — "ठीक है, ठीक है।" और उस सुन्दर जाँघों वाली ने अपार तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।
श्लोक 10 (1.95.10)
त्रिषु वर्षेषु पूर्णेषु प्राजायत शकुन्तला । रूपौदार्यगुणोपेतं दौष्यन्तिं जनमेजय ॥
triṣu varṣeṣu pūrṇeṣu prājāyata śakuntalā | rūpaudāryaguṇopetaṃ dauṣyantiṃ janamejaya
हे जनमेजय, तीन वर्ष पूरे होने पर शकुन्तला ने रूप, उदारता और गुणों से सम्पन्न दुष्यन्त-पुत्र को जन्म दिया।
श्लोक 11 (1.95.11)
जाते तस्मिन्नन्तरिक्षात्पुष्पवृष्टिः पपात ह । देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥
jāte tasminnantarikṣātpuṣpavṛṣṭiḥ papāta ha | devadundubhayo nedurnanṛtuścāpsarogaṇāḥ
उसके जन्म लेते ही आकाश से फूलों की वर्षा हुई; देवताओं की दुन्दुभियाँ बज उठीं और अप्सराओं के समूह नाचने लगे।
श्लोक 12 (1.95.12)
गायद्भिर्मधुरं तत्र देवैः शक्रोऽभ्युवाच ह । शकुन्तले तव सुतश्चक्रवर्ती भविष्यति ॥
gāyadbhirmadhuraṃ tatra devaiḥ śakro'bhyuvāca ha | śakuntale tava sutaścakravartī bhaviṣyati
वहाँ देवता मधुर गान कर रहे थे, तब इन्द्र ने कहा — "शकुन्तला, तुम्हारा पुत्र चक्रवर्ती सम्राट् होगा।
श्लोक 13 (1.95.13)
बलं तेजश्च रूपं च न समं भुवि केनचित् । आहर्ता वाजिमेधस्य शतसङ्ख्यस्य पौरवः ॥
balaṃ tejaśca rūpaṃ ca na samaṃ bhuvi kenacit | āhartā vājimedhasya śatasaṅkhyasya pauravaḥ
बल, तेज और रूप में पृथ्वी पर कोई उसकी बराबरी नहीं कर सकेगा। यह पौरव सौ अश्वमेध यज्ञ करेगा,
श्लोक 14 (1.95.14)
अनेकैरपि साहस्रै राजसूयादिभिर्मखैः । स्वार्थं ब्राह्मणसात्कृत्वा दक्षिणाममितां ददत् ॥
anekairapi sāhasrai rājasūyādibhirmakhaiḥ | svārthaṃ brāhmaṇasātkṛtvā dakṣiṇāmamitāṃ dadat
और राजसूय आदि अनेक सहस्र यज्ञ भी करेगा; अपना धन ब्राह्मणों को अर्पित करके अपार दक्षिणा देगा।"
श्लोक 15 (1.95.15)
देवतानां वचः श्रुत्वा कण्वाश्रमनिवासिनः । सभाजयन्तः कण्वस्य सुतां सर्वे महर्षयः ॥
devatānāṃ vacaḥ śrutvā kaṇvāśramanivāsinaḥ | sabhājayantaḥ kaṇvasya sutāṃ sarve maharṣayaḥ
देवताओं के वचन सुनकर कण्व के आश्रम में रहने वाले सब महर्षियों ने कण्व की पुत्री का अभिनन्दन किया।
श्लोक 16 (1.95.16)
शकुन्तला च तच्छ्रुत्वा परं हर्षमवाप सा । द्विजानाहूय मुनिभिः सत्कृत्य च महायशाः ॥
śakuntalā ca tacchrutvā paraṃ harṣamavāpa sā | dvijānāhūya munibhiḥ satkṛtya ca mahāyaśāḥ
यह सुनकर शकुन्तला भी परम आनन्दित हुई, और उस यशस्विनी ने ब्राह्मणों को बुलाकर मुनियों के साथ उनका सत्कार किया।
श्लोक 17 (1.95.17)
जातकर्मादिसंस्कारं कण्वः पुण्यवतां वरः । तस्याथ कारयामास वर्धमानस्य चासकृत् ॥
jātakarmādisaṃskāraṃ kaṇvaḥ puṇyavatāṃ varaḥ | tasyātha kārayāmāsa vardhamānasya cāsakṛt
तब पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ कण्व ने उस बढ़ते हुए बालक के जातकर्म आदि संस्कार समय-समय पर कराए।
श्लोक 18 (1.95.18)
यथाविधि यथान्यायं क्रियाः सर्वास्त्वकारयत् । दन्तैः शुक्लैः शिखरिभिःसिंहसंहननोऽभवत् ॥
yathāvidhi yathānyāyaṃ kriyāḥ sarvāstvakārayat | dantaiḥ śuklaiḥ śikharibhiḥsiṃhasaṃhanano'bhavat
उन्होंने सारी क्रियाएँ विधि और नियम के अनुसार कराईं। उजले, नुकीले दाँतों वाला वह बालक सिंह के समान सुगठित शरीर वाला हुआ;
श्लोक 19 (1.95.19)
चक्राङ्कितकरः श्रीमान्स्वयं विष्णुरिवापरः । चतुष्किष्कुर्महातेजा महामूर्धा महाबलः ॥
cakrāṅkitakaraḥ śrīmānsvayaṃ viṣṇurivāparaḥ | catuṣkiṣkurmahātejā mahāmūrdhā mahābalaḥ
उसके हाथों में चक्र का चिह्न था; वह शोभायुक्त था, मानो स्वयं दूसरे विष्णु हों; चार हाथ ऊँचा, महातेजस्वी, बड़े मस्तक वाला और महाबली।
श्लोक 20 (1.95.20)
कुमारो देवगर्भाभः स तत्राशु व्यवर्धत । ऋषेर्भयात्तु दुष्यन्तः स्मरन्नैवाह्वयत्तदा ॥
kumāro devagarbhābhaḥ sa tatrāśu vyavardhata | ṛṣerbhayāttu duṣyantaḥ smarannaivāhvayattadā
देवपुत्र के समान कान्तिमान वह कुमार वहाँ शीघ्र बढ़ने लगा। किन्तु ऋषि के भय से दुष्यन्त ने याद रहते हुए भी तब उन्हें नहीं बुलवाया;
श्लोक 21 (1.95.21)
गते काले तु महति न सस्मार तपोधनाम् । षड्वर्षेषु ततो बालः कण्वाश्रमपदं प्रति ॥
gate kāle tu mahati na sasmāra tapodhanām | ṣaḍvarṣeṣu tato bālaḥ kaṇvāśramapadaṃ prati
और बहुत समय बीत जाने पर उसे उस तपस्विनी का स्मरण भी न रहा। तब छह वर्ष की आयु में वह बालक कण्व के आश्रम के आस-पास
श्लोक 22 (1.95.22)
व्याघ्रान्सिंहान्वराहांश्च वृकांश्च महिषांस्तथा । ऋक्षांश्चाभ्यहनद्व्यालान्पद्भ्यामाश्रमपीडकान् ॥
vyāghrānsiṃhānvarāhāṃśca vṛkāṃśca mahiṣāṃstathā | ṛkṣāṃścābhyahanadvyālānpadbhyāmāśramapīḍakān
बाघों, सिंहों, सूअरों, भेड़ियों और भैंसों को, तथा आश्रम को सताने वाले भालुओं और दूसरे हिंस्र पशुओं को पैरों से मार गिराता;
श्लोक 23 (1.95.23)
बलाद्भुजाभ्यां संगृह्य बलवान्संनियम्य च । बद्ध्वा वृक्षेषु दौष्यन्तिराश्रमस्य समन्ततः ॥
balādbhujābhyāṃ saṃgṛhya balavānsaṃniyamya ca | baddhvā vṛkṣeṣu dauṣyantirāśramasya samantataḥ
वह बलवान् दुष्यन्त-पुत्र उन्हें अपनी भुजाओं से बलपूर्वक पकड़कर, वश में करके, आश्रम के चारों ओर पेड़ों से बाँध देता।
श्लोक 24 (1.95.24)
आरुरोह द्रुमांश्चैव क्रीडन्स्म परिधावति । वनं च लोडयामास सिंहव्याघ्रगणैर्वृतम् ॥
āruroha drumāṃścaiva krīḍansma paridhāvati | vanaṃ ca loḍayāmāsa siṃhavyāghragaṇairvṛtam
वह पेड़ों पर चढ़ जाता और खेलता हुआ इधर-उधर दौड़ता; उसने सिंहों और बाघों से भरे वन को मथ डाला।
श्लोक 25 (1.95.25)
ततश्च राक्षसान्सर्वान्पिशाचांश्च रिपून्रणे । मुष्टियुद्धेन तान्हत्वा ऋषीनाराधयत्तदा ॥
tataśca rākṣasānsarvānpiśācāṃśca ripūnraṇe | muṣṭiyuddhena tānhatvā ṛṣīnārādhayattadā
फिर उसने सब राक्षसों और पिशाच शत्रुओं को युद्ध में घूँसों से मार डाला और इस प्रकार ऋषियों को प्रसन्न किया।
श्लोक 26 (1.95.26)
कश्चिद्दितिसुतस्तं तु हन्तुकामो महाबलः । वध्यमानांस्तु दैतेयानमर्षी तं समभ्ययात् ॥
kaścidditisutastaṃ tu hantukāmo mahābalaḥ | vadhyamānāṃstu daiteyānamarṣī taṃ samabhyayāt
दैत्यों का वध होते देख क्रोध से भरा दिति का एक महाबली पुत्र उसे मार डालने की इच्छा से उस पर झपटा।
श्लोक 27 (1.95.27)
तमागतं प्रहस्यैव बाहुभ्यां परिगृह्य च । दृढं चाबध्य बाहुभ्यां पीडयामास तं तदा ॥
tamāgataṃ prahasyaiva bāhubhyāṃ parigṛhya ca | dṛḍhaṃ cābadhya bāhubhyāṃ pīḍayāmāsa taṃ tadā
उसे आते देख बालक ने हँसते हुए उसे भुजाओं में पकड़ लिया और कसकर जकड़कर दबाने लगा।
श्लोक 28 (1.95.28)
मर्दितो न शशाकास्मान्मोचितुं बलवत्तया । प्राक्रोशद्भैरवं तत्र द्वारेभ्यो निःसृतं त्वसृक् ॥
mardito na śaśākāsmānmocituṃ balavattayā | prākrośadbhairavaṃ tatra dvārebhyo niḥsṛtaṃ tvasṛk
कुचला जाता हुआ वह दैत्य बालक के बल के कारण उससे छूट न सका। उसने वहाँ भयानक चीत्कार किया और उसके शरीर के छिद्रों से रक्त बहने लगा।
श्लोक 29 (1.95.29)
तेन शब्देन वित्रस्ता मृगाः सिंहादयो गणाः । सुस्रुवुश्च शकृन्मूत्रमाश्रमस्थाश्च सुस्रुवुः ॥
tena śabdena vitrastā mṛgāḥ siṃhādayo gaṇāḥ | susruvuśca śakṛnmūtramāśramasthāśca susruvuḥ
उस शब्द से भयभीत सिंह आदि पशुओं के झुंडों का मल-मूत्र निकल गया, और आश्रम में रहने वाले प्राणियों का भी।
श्लोक 30 (1.95.30)
निरसुं जानुभिः कृत्वा विससर्ज च सोऽपतत् । तद्दृष्ट्वा विस्मयं जग्मुः कुमारस्य विचेष्टितम् ॥
nirasuṃ jānubhiḥ kṛtvā visasarja ca so'patat | taddṛṣṭvā vismayaṃ jagmuḥ kumārasya viceṣṭitam
घुटनों से दबाकर उसने उसके प्राण निकाल दिए और उसे छोड़ दिया; वह गिर पड़ा। बालक का यह पराक्रम देखकर सब विस्मित हो गए।
श्लोक 31 (1.95.31)
नित्यकालं वध्यमाना दैतेया राक्षसैः सह । कुमारस्य भयादेव नैव जग्मुस्तदाश्रमम् ॥
nityakālaṃ vadhyamānā daiteyā rākṣasaiḥ saha | kumārasya bhayādeva naiva jagmustadāśramam
बार-बार मारे जाने से दैत्य और राक्षस उस बालक के भय से फिर उस आश्रम में नहीं आए।
श्लोक 32 (1.95.32)
ततोऽस्य नाम चक्रुस्ते कण्वाश्रमनिवासिनः । कण्वेन सहिताः सर्वे दृष्ट्वा कर्मातिमानुषम् ॥
tato'sya nāma cakruste kaṇvāśramanivāsinaḥ | kaṇvena sahitāḥ sarve dṛṣṭvā karmātimānuṣam
तब कण्व सहित आश्रम के सभी निवासियों ने उसके अलौकिक कर्म देखकर उसका नाम रखा —
श्लोक 33 (1.95.33)
अस्त्वयं सर्वदमनः सर्वं हि दमयत्यसौ । स सर्वदमनो नाम कुमारः समपद्यत ॥
astvayaṃ sarvadamanaḥ sarvaṃ hi damayatyasau | sa sarvadamano nāma kumāraḥ samapadyata
"इसका नाम सर्वदमन हो, क्योंकि यह सबका दमन करता है।" इस प्रकार वह कुमार सर्वदमन नाम से प्रसिद्ध हुआ,
श्लोक 34 (1.95.34)
विक्रमेणौजसा चैव बलेन च समन्वितः । अप्रेषयति दुष्यन्ते महिष्यास्तनयस्य च ॥
vikrameṇaujasā caiva balena ca samanvitaḥ | apreṣayati duṣyante mahiṣyāstanayasya ca
जो पराक्रम, ओज और बल से युक्त था। जब दुष्यन्त ने अपनी रानी और पुत्र के लिए किसी को नहीं भेजा,
श्लोक 35 (1.95.35)
पाण्डुभावपरीताङ्गीं चिन्तया समभिप्लुताम् । लम्बालकां कृशां दीनां तथा मलिनवाससम् ॥
pāṇḍubhāvaparītāṅgīṃ cintayā samabhiplutām | lambālakāṃ kṛśāṃ dīnāṃ tathā malinavāsasam
तब पीले पड़े अंगों वाली, चिन्ता में डूबी, लटकते बालों वाली, दुबली, दुखी और मैले वस्त्र पहने
श्लोक 36 (1.95.36)
शकुन्तलां च संप्रेक्ष्य प्रदध्यौ स मुनिस्तदा । शास्त्राणि सर्ववेदाश्च द्वादशाब्दस्य चाभवन् ॥
śakuntalāṃ ca saṃprekṣya pradadhyau sa munistadā | śāstrāṇi sarvavedāśca dvādaśābdasya cābhavan
शकुन्तला को ऐसी दशा में देखकर वे मुनि गहरे सोच में पड़ गए। और बारह वर्ष का होते-होते उस बालक को सब शास्त्र और सब वेद प्राप्त हो गए।