आदि पर्व · अध्याय 96
कण्व द्वारा शकुन्तला की विदाई
बालक सर्वदमन का पराक्रम देखकर कण्व निश्चय करते हैं कि अब उसके युवराज बनने का समय है। वे शकुन्तला को पतिव्रता के धर्म का और बालक को उसके राजा पिता का उपदेश देते हैं। बालक आश्रम में ही रहना चाहता है और शकुन्तला रोकर जाने से मना करती है, पर कण्व दोनों को समझा लेते हैं और अपने तपस्वी शिष्यों को उन्हें गंगा-यमुना संगम पर बसे प्रतिष्ठान नगर तक पहुँचाने का आदेश देते हैं। मुनि दोपहर को उस भव्य नगर में पहुँचते हैं, शुभ शकुन देखते हैं और नागरिकों की प्रशंसा के बीच वर्धमान द्वार से प्रवेश करते हैं; पर कुछ नगरवासियों द्वारा उन दुबले तपस्वियों का उपहास करने पर, नगर में प्रवेश न करने के कण्व के आदेश को याद करके वे लौट जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (1.96.1)
तं कुमारमृषिर्दृष्ट्वा कर्म चास्यातिमानुषम् । समयो यौवराज्याय इत्यनुध्याय स द्विजः ॥
taṃ kumāramṛṣirdṛṣṭvā karma cāsyātimānuṣam | samayo yauvarājyāya ityanudhyāya sa dvijaḥ
उस बालक और उसके अलौकिक कर्मों को देखकर उन ब्रह्मर्षि ने विचार किया — "अब इसके युवराज बनने का समय आ गया है।"
श्लोक 2 (1.96.2)
शकुन्तलां समाहूय कण्वो वचनमब्रवीत् । शृणु भद्रे मम सुते मम वाक्यं शुचिस्मिते ॥
śakuntalāṃ samāhūya kaṇvo vacanamabravīt | śṛṇu bhadre mama sute mama vākyaṃ śucismite
शकुन्तला को पास बुलाकर कण्व ने कहा — "भद्रे, मेरी पुत्री! पवित्र मुस्कान वाली, मेरी बात सुनो।
कण्व उवाच
श्लोक 3 (1.96.3)
पतिव्रतानां नारीणां विशिष्टमिति चोच्यते । पतिशुश्रूषणं पूर्वं मनोवाक्कायचेष्टितैः ॥
pativratānāṃ nārīṇāṃ viśiṣṭamiti cocyate | patiśuśrūṣaṇaṃ pūrvaṃ manovākkāyaceṣṭitaiḥ
कहा जाता है कि पतिव्रता स्त्रियों का सबसे श्रेष्ठ धर्म है — सबसे पहले मन, वाणी, शरीर और कर्म से पति की सेवा।
श्लोक 4 (1.96.4)
अनुज्ञाता मया पूर्वं पूजयैतद्व्रतं तव । एतेनैव च वृत्तेन पुण्याँल्लोकानवाप्य च ॥
anujñātā mayā pūrvaṃ pūjayaitadvrataṃ tava | etenaiva ca vṛttena puṇyām̐llokānavāpya ca
पहले मैंने तुम्हें अनुमति दी थी; अब अपने इस व्रत का आदर करो। इसी आचरण से तुम पुण्य-लोकों को प्राप्त करोगी,
श्लोक 5 (1.96.5)
तस्यान्ते मानुषे लोके विशिष्टां लप्स्यसे श्रियम् । तस्माद्भद्रेऽद्य यातव्यं समीपं पौरवस्य ह ॥
tasyānte mānuṣe loke viśiṣṭāṃ lapsyase śriyam | tasmādbhadre'dya yātavyaṃ samīpaṃ pauravasya ha
और उसके अन्त में मनुष्य-लोक में विशिष्ट ऐश्वर्य पाओगी। इसलिए भद्रे, आज ही तुम्हें पौरव राजा के पास जाना चाहिए।
श्लोक 6 (1.96.6)
स्वयं नायाति मत्वा ते गतं कालं शुचिस्मिते । गत्वाऽऽराधय राजानं दुष्यन्तं हितकाम्यया ॥
svayaṃ nāyāti matvā te gataṃ kālaṃ śucismite | gatvā''rādhaya rājānaṃ duṣyantaṃ hitakāmyayā
पवित्र मुस्कान वाली! वह तुम्हारा समय बीता जानकर भी स्वयं नहीं आ रहा है। इसलिए अपने हित की कामना से जाकर राजा दुष्यन्त को प्रसन्न करो।
श्लोक 7 (1.96.7)
दौष्यन्तिं यौवराज्यस्थं दृष्ट्वा प्रीतिमवाप्स्यसि । देवतानां गुरूणां च क्षत्रियाणां च भामिनि ॥
dauṣyantiṃ yauvarājyasthaṃ dṛṣṭvā prītimavāpsyasi | devatānāṃ gurūṇāṃ ca kṣatriyāṇāṃ ca bhāmini
दुष्यन्त के पुत्र को युवराज-पद पर स्थित देखकर तुम्हें प्रसन्नता होगी। भामिनि! देवताओं, गुरुजनों और क्षत्रियों से,
श्लोक 8 (1.96.8)
भर्तॄणां च विशेषेण हितं संगमनं भवेत् । तस्मात्पुत्रि कुमारेण गन्तव्यं मत्प्रियेप्सया ॥
bhartṝṇāṃ ca viśeṣeṇa hitaṃ saṃgamanaṃ bhavet | tasmātputri kumāreṇa gantavyaṃ matpriyepsayā
और विशेष रूप से पति से मिलना हितकारी होता है। इसलिए पुत्री, मुझे प्रसन्न करने की इच्छा से तुम्हें इस बालक के साथ जाना चाहिए।
श्लोक 9 (1.96.9)
प्रतिवाक्यं न दद्यास्त्वं शपिता मम पादयोः ॥
prativākyaṃ na dadyāstvaṃ śapitā mama pādayoḥ
तुम मुझे कोई प्रत्युत्तर न देना — तुम्हें मेरे चरणों की शपथ है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (1.96.10)
एवमुक्त्वा सुतां तत्र पौत्रं कण्वोऽभ्यभाषत । परिष्वज्य च बाहुभ्यां मूर्ध्न्युपाघ्राय पौरवम् ॥
evamuktvā sutāṃ tatra pautraṃ kaṇvo'bhyabhāṣata | pariṣvajya ca bāhubhyāṃ mūrdhnyupāghrāya pauravam
वहाँ अपनी पुत्री से ऐसा कहकर कण्व ने पौरव बालक को दोनों भुजाओं में भरकर, उसका मस्तक सूँघकर, अपने उस नाती से कहा —
कण्व उवाच
श्लोक 11 (1.96.11)
सोमवंशोद्भवो राजा दुष्यन्त इति विश्रुतः । तस्याग्रमहिषी चैषा तव माता शुचिव्रता ॥
somavaṃśodbhavo rājā duṣyanta iti viśrutaḥ | tasyāgramahiṣī caiṣā tava mātā śucivratā
"चन्द्रवंश में उत्पन्न दुष्यन्त नाम से विख्यात एक राजा हैं। पवित्र व्रत वाली यह तुम्हारी माता उनकी पटरानी है।
श्लोक 12 (1.96.12)
गन्तुकामा भर्तृपार्श्वं त्वया सह सुमध्यमा । गत्वाऽभिवाद्य राजानं यौवराज्यमवाप्स्यसि ॥
gantukāmā bhartṛpārśvaṃ tvayā saha sumadhyamā | gatvā'bhivādya rājānaṃ yauvarājyamavāpsyasi
यह सुन्दरी तुम्हारे साथ अपने पति के पास जाना चाहती है। जाकर राजा को प्रणाम करो, तुम्हें युवराज-पद प्राप्त होगा।
श्लोक 13 (1.96.13)
स पिता तव राजेन्द्रस्तस्य त्वं वशगो भव । पितृपैतामहं राज्यमातिष्ठस्व स्वभावतः ॥
sa pitā tava rājendrastasya tvaṃ vaśago bhava | pitṛpaitāmahaṃ rājyamātiṣṭhasva svabhāvataḥ
वे राजराजेश्वर तुम्हारे पिता हैं; तुम उनकी आज्ञा में रहना। अपने स्वाभाविक अधिकार से बाप-दादों के राज्य को ग्रहण करना।
श्लोक 14 (1.96.14)
तस्मिन्काले स्वराज्यस्थो मामनुस्मर पौरव ॥
tasminkāle svarājyastho māmanusmara paurava
पौरव! उस समय जब तुम अपने राज्य पर प्रतिष्ठित हो जाओ, तब मुझे याद करना।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 15 (1.96.15)
अभिवाद्य मुनेः पादौ पौरवो वाक्यमब्रवीत् । त्वं पिता मम विप्रर्षे त्वं माता त्वं गतिश्च मे ॥
abhivādya muneḥ pādau pauravo vākyamabravīt | tvaṃ pitā mama viprarṣe tvaṃ mātā tvaṃ gatiśca me
मुनि के चरणों में प्रणाम करके पौरव ने कहा — "विप्रर्षे! आप ही मेरे पिता हैं, आप ही माता और आप ही मेरा आश्रय हैं।
सर्वदमन उवाच
श्लोक 16 (1.96.16)
न चान्यं पितरं मन्ये त्वामृते तु महातपः । तव शुश्रूषणं पुण्यमिह लोके परत्र च ॥
na cānyaṃ pitaraṃ manye tvāmṛte tu mahātapaḥ | tava śuśrūṣaṇaṃ puṇyamiha loke paratra ca
महातपस्वी! आपके सिवा मैं किसी और को पिता नहीं मानता। आपकी सेवा इस लोक में और परलोक में भी पुण्य देने वाली है।
श्लोक 17 (1.96.17)
शकुन्तला भर्तृकामा स्वयं यातु यथेष्टतः । अहं शुश्रूषणपरः पादमूले वसामि वः ॥
śakuntalā bhartṛkāmā svayaṃ yātu yatheṣṭataḥ | ahaṃ śuśrūṣaṇaparaḥ pādamūle vasāmi vaḥ
पति की इच्छा रखने वाली शकुन्तला अपनी इच्छा से स्वयं चली जाएँ। मैं तो आपकी सेवा में लगा हुआ आपके चरणों में ही रहूँगा।
श्लोक 18 (1.96.18)
क्रीडां व्यालमृगैः सार्धं करिष्ये न पुरा यथा । त्वच्छासनपरो नित्यं स्वाध्यायं च करोम्यहम् ॥
krīḍāṃ vyālamṛgaiḥ sārdhaṃ kariṣye na purā yathā | tvacchāsanaparo nityaṃ svādhyāyaṃ ca karomyaham
अब मैं पहले की तरह हिंसक पशुओं के साथ खेल नहीं करूँगा। सदा आपकी आज्ञा में रहकर वेदों का स्वाध्याय करूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (1.96.19)
एवमुक्त्वा तु संश्लिष्य पादौ कण्वस्य तिष्ठतः । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्ररुरोद शकुन्तला ॥
evamuktvā tu saṃśliṣya pādau kaṇvasya tiṣṭhataḥ | tasya tadvacanaṃ śrutvā praruroda śakuntalā
ऐसा कहकर वह खड़े हुए कण्व के चरणों से लिपट गया। उसकी यह बात सुनकर शकुन्तला रो पड़ी,
श्लोक 20 (1.96.20)
स्नेहात्पितुश्च पुत्रस्य हर्षशोकसमन्विता । निशाम्य रुदतीमार्तां दौष्यन्तिर्वाक्यमब्रवीत् ॥
snehātpituśca putrasya harṣaśokasamanvitā | niśāmya rudatīmārtāṃ dauṣyantirvākyamabravīt
पिता और पुत्र के प्रति स्नेह के कारण वह हर्ष और शोक दोनों से भर उठी। उसे दुःखी होकर रोती देख दुष्यन्त के पुत्र ने कहा —
सर्वदमन उवाच
श्लोक 21 (1.96.21)
श्रुत्वा भगवतो वाक्यं किं रोदिषि शकुन्तले । गन्तव्यं काल्य उत्थाय भर्तृप्रीतिस्तवास्ति चेत् ॥
śrutvā bhagavato vākyaṃ kiṃ rodiṣi śakuntale | gantavyaṃ kālya utthāya bhartṛprītistavāsti cet
"शकुन्तले! भगवान् की बात सुनकर तुम रो क्यों रही हो? यदि तुम्हें पति से प्रेम है तो प्रातःकाल उठकर चल देना चाहिए।"
शकुन्तलोवाच
श्लोक 22 (1.96.22)
एकस्तु कुरुते पापं फलं भुङ्क्ते महाजनः । मया निवारितो नित्यं न करोषि वचो मम ॥
ekastu kurute pāpaṃ phalaṃ bhuṅkte mahājanaḥ | mayā nivārito nityaṃ na karoṣi vaco mama
"पाप एक करता है और उसका फल बहुत से लोग भोगते हैं। मैंने तुम्हें सदा रोका, पर तुमने मेरी बात कभी नहीं मानी।
श्लोक 23 (1.96.23)
निःसृतान्कुञ्जरान्नित्यं बाहुभ्यां संप्रमथ्य वै । वनं च लोडयन्नित्यं सिंहव्याघ्रगणैर्वृतम् ॥
niḥsṛtānkuñjarānnityaṃ bāhubhyāṃ saṃpramathya vai | vanaṃ ca loḍayannityaṃ siṃhavyāghragaṇairvṛtam
तुम रोज़ बाहर निकले हाथियों को अपनी भुजाओं से पकड़कर मसल डालते थे और सिंहों तथा बाघों से भरे वन को मथते रहते थे।
श्लोक 24 (1.96.24)
एवंविधानि चान्यानि कृत्वा वै पुरुनन्दन । रुषितो भगवांस्तात तस्मादावां विवासितौ ॥
evaṃvidhāni cānyāni kṛtvā vai purunandana | ruṣito bhagavāṃstāta tasmādāvāṃ vivāsitau
पुरुवंश को आनन्द देने वाले वत्स! ऐसे ही और भी काम करने के कारण भगवान् रुष्ट हो गए हैं, इसीलिए हम दोनों को यहाँ से निकाला जा रहा है।
श्लोक 25 (1.96.25)
नाहं गच्छामि दुष्यन्तं नास्मि पुत्र हितैषिणी । पादमूले वसिष्यामि महर्षेर्भावितात्मनः ॥
nāhaṃ gacchāmi duṣyantaṃ nāsmi putra hitaiṣiṇī | pādamūle vasiṣyāmi maharṣerbhāvitātmanaḥ
मैं दुष्यन्त के पास नहीं जाऊँगी; बेटा, मुझे अपने हित की चाह नहीं है। मैं उन शुद्धात्मा महर्षि के चरणों में ही रहूँगी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (1.96.26)
एवमुक्त्वा तु रुदती पपात मुनिपादयोः । एवं विलपतीं कण्वश्चानुनीय च हेतुभिः । पुनः प्रोवाच भगवानानृशंस्याद्धितं वचः ॥
evamuktvā tu rudatī papāta munipādayoḥ | evaṃ vilapatīṃ kaṇvaścānunīya ca hetubhiḥ | punaḥ provāca bhagavānānṛśaṃsyāddhitaṃ vacaḥ
ऐसा कहकर वह रोती हुई मुनि के चरणों में गिर पड़ी। इस प्रकार विलाप करती हुई उसे भगवान् कण्व ने युक्तियों से समझाया और करुणावश फिर उससे हितकर वचन कहे —
कण्व उवाच
श्लोक 27 (1.96.27)
शकुन्तले शृणुष्वेदं हितं पथ्यं च भामिनि । पतिव्रताभावगुणान्हित्वा साध्यं न किंचन ॥
śakuntale śṛṇuṣvedaṃ hitaṃ pathyaṃ ca bhāmini | pativratābhāvaguṇānhitvā sādhyaṃ na kiṃcana
"शकुन्तले, भामिनि! यह हितकारी और कल्याणकारी बात सुनो — पतिव्रता के गुणों को छोड़कर कुछ भी सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 28 (1.96.28)
पतिव्रतानां देवा वै तुष्टाः सर्ववरप्रदाः । प्रसादं च करिष्यन्ति आपदो मोक्षयन्ति च ॥
pativratānāṃ devā vai tuṣṭāḥ sarvavarapradāḥ | prasādaṃ ca kariṣyanti āpado mokṣayanti ca
देवता पतिव्रता स्त्रियों पर प्रसन्न रहते हैं और उन्हें सब वर देते हैं; वे उन पर कृपा करते हैं और उन्हें विपत्तियों से छुड़ाते हैं।
श्लोक 29 (1.96.29)
पतिप्रसादात्पुण्यं च प्राप्नुवन्ति न चाशुभम् । तस्माद्गत्वा तु राजानमाराधय शुचिस्मिते ॥
patiprasādātpuṇyaṃ ca prāpnuvanti na cāśubham | tasmādgatvā tu rājānamārādhaya śucismite
पति की प्रसन्नता से उन्हें पुण्य मिलता है, अशुभ नहीं। इसलिए हे पवित्र मुस्कान वाली, राजा के पास जाकर उन्हें प्रसन्न करो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 30 (1.96.30)
शकुन्तलां तथोक्त्वा वै शाकुन्तलमथाब्रवीत् । दौहित्रो मम पौत्रस्त्वमिलिलस्य महात्मनः ॥
śakuntalāṃ tathoktvā vai śākuntalamathābravīt | dauhitro mama pautrastvamililasya mahātmanaḥ
शकुन्तला से ऐसा कहकर उन्होंने फिर शकुन्तला के पुत्र से कहा — "तुम मेरे दौहित्र हो और महात्मा इलिल के पौत्र हो।
कण्व उवाच
श्लोक 31 (1.96.31)
शृणुष्व वचनं सत्यं प्रब्रवीमि तवानघ । मनसा भर्तृकामा वै वाग्भिरुक्त्वा पृथग्विधम् ॥
śṛṇuṣva vacanaṃ satyaṃ prabravīmi tavānagha | manasā bhartṛkāmā vai vāgbhiruktvā pṛthagvidham
निष्पाप वत्स! मैं तुमसे सच कहता हूँ, सुनो। मन से तो वह पति को चाहती है, पर वाणी से कुछ और ही कहती है;
श्लोक 32 (1.96.32)
गन्तुं नेच्छति कल्याणी तस्मात्तात वहस्व वै । शक्तस्त्वं प्रतिगन्तुं च मुनिभिः सह पौरव ॥
gantuṃ necchati kalyāṇī tasmāttāta vahasva vai | śaktastvaṃ pratigantuṃ ca munibhiḥ saha paurava
इसलिए वह कल्याणी जाना नहीं चाहती; अतः वत्स, तुम उसे ले जाओ। पौरव! तुम मुनियों के साथ वहाँ जाने में समर्थ हो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 33 (1.96.33)
इत्युक्त्वा सर्वदमनं कण्वः शिष्यानथाब्रवीत् । शकुन्तलामिमां शीघ्रं सपुत्रामाश्रमादितः ॥
ityuktvā sarvadamanaṃ kaṇvaḥ śiṣyānathābravīt | śakuntalāmimāṃ śīghraṃ saputrāmāśramāditaḥ
सर्वदमन से ऐसा कहकर कण्व ने फिर अपने शिष्यों से कहा — "शुभ लक्षणों से सम्मानित इस शकुन्तला को पुत्र सहित शीघ्र इस आश्रम से
कण्व उवाच
श्लोक 34 (1.96.34)
भर्तुः प्रापयताभ्याशं सर्वलक्षणपूजिताम् । नारीणां चिरवासो हि बान्धवेषु न रोचते ॥
bhartuḥ prāpayatābhyāśaṃ sarvalakṣaṇapūjitām | nārīṇāṃ ciravāso hi bāndhaveṣu na rocate
उसके पति के पास पहुँचा दो। स्त्रियों का अधिक समय तक अपने बन्धु-बान्धवों के बीच रहना उचित नहीं माना जाता;
श्लोक 35 (1.96.35)
कीर्तिचारित्रधर्मघ्नस्तस्मान्नयत मा चिरम् ॥
kīrticāritradharmaghnastasmānnayata mā ciram
वह उसकी कीर्ति, चरित्र और धर्म का नाश करता है। इसलिए उसे बिना देर किए ले जाओ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 36 (1.96.36)
धर्माभिपूजितं पुत्रं काश्यपेन निशाम्य तु । काश्यपात्प्राप्य चानुज्ञां मुमुदे च शकुन्तला ॥
dharmābhipūjitaṃ putraṃ kāśyapena niśāmya tu | kāśyapātprāpya cānujñāṃ mumude ca śakuntalā
काश्यप (कण्व) द्वारा अपने पुत्र का धर्मानुसार सम्मान होते देखकर और काश्यप से अनुमति पाकर शकुन्तला प्रसन्न हुई।
श्लोक 37 (1.96.37)
कण्वस्य वचनं श्रुत्वा प्रतिगच्छेति चासकृत् । तथेत्युक्त्वा तु कण्वं च मातरं पौरवोऽब्रवीत् । किं चिरायसि मातस्त्वं गमिष्यामो नृपालयम् ॥
kaṇvasya vacanaṃ śrutvā pratigaccheti cāsakṛt | tathetyuktvā tu kaṇvaṃ ca mātaraṃ pauravo'bravīt | kiṃ cirāyasi mātastvaṃ gamiṣyāmo nṛpālayam
कण्व का बार-बार "लौट जाओ" कहना सुनकर पौरव ने कण्व से "ऐसा ही हो" कहा और फिर माता से बोला — "माँ, तुम देर क्यों कर रही हो? हम राजमहल चलेंगे।"
श्लोक 38 (1.96.38)
एवमुक्त्वा तु तां देवीं दुष्यन्तस्य महात्मनः । अभिवाद्य मुनेः पादौ गन्तुमैच्छत्स पौरवः ॥
evamuktvā tu tāṃ devīṃ duṣyantasya mahātmanaḥ | abhivādya muneḥ pādau gantumaicchatsa pauravaḥ
महात्मा दुष्यन्त की उस रानी से ऐसा कहकर पौरव ने मुनि के चरणों में प्रणाम किया और जाने को तैयार हुआ।
श्लोक 39 (1.96.39)
शकुन्तला च पितरमभिवाद्य कृताञ्जलिः । प्रदक्षिणीकृत्य तदा पितरं वाक्यमब्रवीत् ॥
śakuntalā ca pitaramabhivādya kṛtāñjaliḥ | pradakṣiṇīkṛtya tadā pitaraṃ vākyamabravīt
शकुन्तला ने भी हाथ जोड़कर पिता को प्रणाम किया, उनकी प्रदक्षिणा की और फिर पिता से कहा —
शकुन्तलोवाच
श्लोक 40 (1.96.40)
अज्ञानान्मे पिता चेति दुरुक्तं वापि चानृतम् । अकार्यं वाप्यनिष्टं वा क्षन्तुमर्हति तद्भवान् ॥
ajñānānme pitā ceti duruktaṃ vāpi cānṛtam | akāryaṃ vāpyaniṣṭaṃ vā kṣantumarhati tadbhavān
"आपको केवल अपना पिता समझकर यदि मैंने अनजाने में कोई कठोर या असत्य बात कही हो, अथवा कोई अनुचित या अप्रिय काम किया हो, तो आप उसे क्षमा करें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 41 (1.96.41)
एवमुक्तो नतशिरा मुनिर्नोवाच किंचन । मनुष्यभावात्कण्वोऽपि मुनिरश्रूण्यवर्तयत् ॥
evamukto nataśirā munirnovāca kiṃcana | manuṣyabhāvātkaṇvo'pi muniraśrūṇyavartayat
ऐसा कहे जाने पर मुनि ने सिर झुका लिया और कुछ नहीं बोले। मुनि होते हुए भी मानवीय भाव के कारण कण्व की आँखों से आँसू बहने लगे।
श्लोक 42 (1.96.42)
अब्भक्षान्वायुभक्षांश्च शीर्णपर्णाशनान्मुनीन् । फलमूलाशिनो दान्तान्कृशान्धमनिसंततान् ॥
abbhakṣānvāyubhakṣāṃśca śīrṇaparṇāśanānmunīn | phalamūlāśino dāntānkṛśāndhamanisaṃtatān
तब मुनि कण्व ने उन मुनियों को बुलाया जो जल पीकर, वायु पीकर या गिरे हुए पत्ते खाकर रहते थे, जो फल-मूल खाते थे, संयमी थे, दुबले थे और जिनकी नसें उभर आई थीं;
श्लोक 43 (1.96.43)
व्रतिनो जटिलान्मुण्डान्वल्कलाजिनसंवृतान् । समाहूय मुनिः कण्वः कारुण्यादिदमब्रवीत् ॥
vratino jaṭilānmuṇḍānvalkalājinasaṃvṛtān | samāhūya muniḥ kaṇvaḥ kāruṇyādidamabravīt
जो व्रतधारी थे, कोई जटाधारी और कोई मुण्डित, वल्कल और मृगचर्म पहने हुए थे — उन्हें बुलाकर करुणावश उन्होंने यह कहा —
कण्व उवाच
श्लोक 44 (1.96.44)
मया तु लालिता नित्यं मम पुत्री यशस्विनी । वने जाता विवृद्धा च न च जानाति किंचन ॥
mayā tu lālitā nityaṃ mama putrī yaśasvinī | vane jātā vivṛddhā ca na ca jānāti kiṃcana
"अपनी इस यशस्विनी पुत्री को मैंने सदा लाड़-प्यार से पाला है। यह वन में जन्मी और यहीं पली-बढ़ी है, संसार की कोई बात नहीं जानती।
श्लोक 45 (1.96.45)
आश्रमात्तु पथा सर्वैर्नीयतां क्षत्रियालयम् । द्वितीययोजने विप्राः प्रतिष्ठानं प्रतिष्ठितम् ॥
āśramāttu pathā sarvairnīyatāṃ kṣatriyālayam | dvitīyayojane viprāḥ pratiṣṭhānaṃ pratiṣṭhitam
आप सब इसे आश्रम से मार्ग द्वारा क्षत्रिय के निवास तक ले जाइए। विप्रो! दो योजन की दूरी पर प्रतिष्ठान नगर बसा है।
श्लोक 46 (1.96.46)
प्रतिष्ठाने पुरे राजा शाकुन्तलपितामहः । अध्युवास चिरं कालमुर्वश्या सहितः पुरा ॥
pratiṣṭhāne pure rājā śākuntalapitāmahaḥ | adhyuvāsa ciraṃ kālamurvaśyā sahitaḥ purā
प्रतिष्ठान नगर में प्राचीन काल में शकुन्तला-पुत्र के पूर्वज राजा ने उर्वशी के साथ बहुत समय तक निवास किया था।
श्लोक 47 (1.96.47)
अनूपजाङ्गलयुतं धनधान्यसमाकुलम् । प्रतिष्ठितं पुरवरं गङ्गायामुनसङ्गमे ॥
anūpajāṅgalayutaṃ dhanadhānyasamākulam | pratiṣṭhitaṃ puravaraṃ gaṅgāyāmunasaṅgame
जलप्रधान और सूखे दोनों प्रकार के प्रदेशों से युक्त, धन-धान्य से भरा वह श्रेष्ठ नगर गंगा और यमुना के संगम पर बसा है।
श्लोक 48 (1.96.48)
तत्र सङ्गममासाद्य स्नात्वा हुतहुताशनाः । शाकमूलफलाहारा निवर्तध्वं तपोधनाः । अन्यथा तु भवेद्विप्रा अध्वनो गमने श्रमः ॥
tatra saṅgamamāsādya snātvā hutahutāśanāḥ | śākamūlaphalāhārā nivartadhvaṃ tapodhanāḥ | anyathā tu bhavedviprā adhvano gamane śramaḥ
वहाँ संगम पर पहुँचकर स्नान कीजिए, अग्नि में आहुति दीजिए और साग, मूल तथा फल खाकर लौट आइए, तपोधनो! अन्यथा, विप्रो, मार्ग चलने में आपको थकान होगी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 49 (1.96.49)
तथेत्युक्त्वा च ते सर्वे प्रातिष्ठन्त महौजसः । शकुन्तलां पुरस्कृत्य दुष्यन्तस्य पुरं प्रति ॥
tathetyuktvā ca te sarve prātiṣṭhanta mahaujasaḥ | śakuntalāṃ puraskṛtya duṣyantasya puraṃ prati
"ऐसा ही हो" कहकर वे सभी महातेजस्वी मुनि शकुन्तला को आगे करके दुष्यन्त के नगर की ओर चल पड़े।
श्लोक 50 (1.96.50)
गृहीत्वा चामरप्रख्यं पुत्रं कमललोचनम् । आजग्मुश्च पुरं रम्यं दुष्यन्ताध्युषितं वनात् ॥
gṛhītvā cāmaraprakhyaṃ putraṃ kamalalocanam | ājagmuśca puraṃ ramyaṃ duṣyantādhyuṣitaṃ vanāt
देवता के समान दिखने वाले उस कमलनयन पुत्र को साथ लेकर वे वन से दुष्यन्त के बसाए हुए उस सुन्दर नगर में आए।
श्लोक 51 (1.96.51)
शकुन्तलां समादाय मुनयो धर्मवत्सलाः । ते वनानि नदीः शैलान्गिरिप्रस्रवणानि च ॥
śakuntalāṃ samādāya munayo dharmavatsalāḥ | te vanāni nadīḥ śailāngiriprasravaṇāni ca
धर्मप्रेमी मुनि शकुन्तला को साथ लेकर वनों, नदियों, पर्वतों और पहाड़ी झरनों,
श्लोक 52 (1.96.52)
कन्दराणि नितम्बांश्च राष्ट्राणि नगराणि च । आश्रमाणि च पुण्यानि गत्वा चैव गतश्रमाः ॥
kandarāṇi nitambāṃśca rāṣṭrāṇi nagarāṇi ca | āśramāṇi ca puṇyāni gatvā caiva gataśramāḥ
कन्दराओं, ढलानों, राज्यों, नगरों और पवित्र आश्रमों से होते हुए, बिना थके,
श्लोक 53 (1.96.53)
शनैर्मध्याह्नवेलायां प्रतिष्ठानं समाययुः । तां पुरीं पुरुहूतेन ऐलस्यार्थे विनिर्मिताम् ॥
śanairmadhyāhnavelāyāṃ pratiṣṭhānaṃ samāyayuḥ | tāṃ purīṃ puruhūtena ailasyārthe vinirmitām
धीरे-धीरे दोपहर के समय प्रतिष्ठान पहुँचे — वह नगरी जिसे पुरुहूत इन्द्र ने ऐल (पुरूरवा) के लिए बनाया था,
श्लोक 54 (1.96.54)
परिघाट्टालकैर्मुख्यैरुपकल्पशतैरपि । शतघ्नीचक्रयन्त्रैश्च गुप्तामन्यैर्दुरासदाम् ॥
parighāṭṭālakairmukhyairupakalpaśatairapi | śataghnīcakrayantraiśca guptāmanyairdurāsadām
जो अर्गलाओं, ऊँची अटारियों, सैकड़ों उपकरणों, शतघ्नियों, चक्र-यन्त्रों तथा अन्य साधनों से सुरक्षित और शत्रुओं के लिए दुर्गम थी;
श्लोक 55 (1.96.55)
हर्म्यप्रासादसंबाधां नानापण्यविभूषिताम् । मण्टपैः ससभै रम्यैः प्रपाभिश्च समावृताम् ॥
harmyaprāsādasaṃbādhāṃ nānāpaṇyavibhūṣitām | maṇṭapaiḥ sasabhai ramyaiḥ prapābhiśca samāvṛtām
जो हवेलियों और महलों से भरी, तरह-तरह के सामान से सजी, सभाओं सहित सुन्दर मण्डपों और प्याऊओं से घिरी थी;
श्लोक 56 (1.96.56)
राजमार्गेण महता सुविभक्तेन शोभिताम् । कैलासशिखराकारैर्गोपुरैः समलङ्कृताम् ॥
rājamārgeṇa mahatā suvibhaktena śobhitām | kailāsaśikharākārairgopuraiḥ samalaṅkṛtām
जो विशाल और सुव्यवस्थित राजमार्ग से शोभित तथा कैलास-शिखरों जैसे गोपुरों से अलंकृत थी;
श्लोक 57 (1.96.57)
द्वारतोरणनिर्यूहैर्मङ्गलैरुपशोभिताम् । उद्यानाम्रवणोपेतां महतीं सालमेखलाम् ॥
dvāratoraṇaniryūhairmaṅgalairupaśobhitām | udyānāmravaṇopetāṃ mahatīṃ sālamekhalām
जो द्वारों, तोरणों, छज्जों और मंगल-चिह्नों से सुशोभित, उद्यानों और आम के बगीचों से युक्त, विशाल और परकोटे से घिरी थी;
श्लोक 58 (1.96.58)
सर्वपुष्करिणीभिश्च उद्यानैश्च समावृताम् । वर्णाश्रमैः स्वधर्मस्थैर्नित्योत्सवसमाहितैः ॥
sarvapuṣkariṇībhiśca udyānaiśca samāvṛtām | varṇāśramaiḥ svadharmasthairnityotsavasamāhitaiḥ
जो सब प्रकार के कमल-सरोवरों और उपवनों से घिरी थी; जहाँ अपने-अपने धर्म में स्थित, सदा उत्सवों में लगे वर्णों और आश्रमों के लोग रहते थे,
श्लोक 59 (1.96.59)
धनधान्यसमृद्धैश्च संतुष्टै रत्नपूजितैः । कृतयज्ञैश्च विद्वद्भिरग्निहोत्रपरैः सदा ॥
dhanadhānyasamṛddhaiśca saṃtuṣṭai ratnapūjitaiḥ | kṛtayajñaiśca vidvadbhiragnihotraparaiḥ sadā
जो धन-धान्य से समृद्ध, सन्तुष्ट और रत्नों से सम्मानित थे; जहाँ यज्ञ कर चुके और सदा अग्निहोत्र में लगे विद्वान रहते थे,
श्लोक 60 (1.96.60)
वर्जिताकार्यकरणैर्दानशीलैर्दयापरैः । अधर्मभीरुभिः सर्वैः स्वर्गलोकजिगीषुभिः ॥
varjitākāryakaraṇairdānaśīlairdayāparaiḥ | adharmabhīrubhiḥ sarvaiḥ svargalokajigīṣubhiḥ
और ऐसे लोग रहते थे जो बुरे कर्मों से दूर रहते, दानशील और दयालु थे, सब अधर्म से डरते और स्वर्गलोक को जीतने की इच्छा रखते थे।
श्लोक 61 (1.96.61)
एवंविधजनोपेतमिन्द्रलोकमिवापरम् । तस्मिन्नगरमध्ये तु राजवेश्म प्रतिष्ठितम् ॥
evaṃvidhajanopetamindralokamivāparam | tasminnagaramadhye tu rājaveśma pratiṣṭhitam
ऐसे लोगों से भरी वह नगरी दूसरे इन्द्रलोक के समान थी। उस नगर के बीच में राजभवन बना था,
श्लोक 62 (1.96.62)
इन्द्रसद्मप्रतीकाशं संपूर्णं वित्तसंचयैः । तस्य मध्ये सभा दिव्या नानारत्नविभूषिता ॥
indrasadmapratīkāśaṃ saṃpūrṇaṃ vittasaṃcayaiḥ | tasya madhye sabhā divyā nānāratnavibhūṣitā
जो इन्द्र के भवन जैसा और धन के भण्डारों से भरा था। उसके बीच अनेक प्रकार के रत्नों से सजी एक दिव्य सभा थी।
श्लोक 63 (1.96.63)
तस्यां सभायां राजर्षिः सर्वालङ्कारभूषितः । ब्राह्मणैः क्षत्रियैश्चापि मन्त्रिभिश्चापि संवृतः ॥
tasyāṃ sabhāyāṃ rājarṣiḥ sarvālaṅkārabhūṣitaḥ | brāhmaṇaiḥ kṣatriyaiścāpi mantribhiścāpi saṃvṛtaḥ
उस सभा में सब आभूषणों से विभूषित वे राजर्षि ब्राह्मणों, क्षत्रियों और मन्त्रियों से घिरे बैठे थे,
श्लोक 64 (1.96.64)
संस्तूयमानो राजेन्द्रः सूतमागधबन्दिभिः । कार्यार्थिषु तदाऽभ्येत्य कृत्वा कार्यं गतेषु सः ॥
saṃstūyamāno rājendraḥ sūtamāgadhabandibhiḥ | kāryārthiṣu tadā'bhyetya kṛtvā kāryaṃ gateṣu saḥ
सूत, मागध और बन्दीजन उन राजेन्द्र की स्तुति कर रहे थे। जब काम लेकर आए लोग अपना काम पूरा करवाकर चले गए,
श्लोक 65 (1.96.65)
सुखासीनोऽभवद्राजा तस्मिन्काले महर्षयः । शकुन्तानां स्वनं श्रुत्वा निमित्तज्ञास्त्वलक्षयन् ॥
sukhāsīno'bhavadrājā tasminkāle maharṣayaḥ | śakuntānāṃ svanaṃ śrutvā nimittajñāstvalakṣayan
तब राजा आराम से बैठे थे। उसी समय पक्षियों का कलरव सुनकर शकुनों के जानकार महर्षियों ने उन्हें पहचाना और कहा —
ऋषय ऊचुः
श्लोक 66 (1.96.66)
शकुन्तले निमित्तानि शोभनानि भवन्ति नः । कार्यसिद्धिं वदन्त्येते ध्रुवं राज्ञी भविष्यसि । अस्मिंस्तु दिवसे पुत्रो युवराजो भविष्यति ॥
śakuntale nimittāni śobhanāni bhavanti naḥ | kāryasiddhiṃ vadantyete dhruvaṃ rājñī bhaviṣyasi | asmiṃstu divase putro yuvarājo bhaviṣyati
"शकुन्तले! हमें शुभ शकुन दिखाई दे रहे हैं। ये कार्य-सिद्धि की सूचना दे रहे हैं — निश्चय ही तुम रानी बनोगी, और आज ही तुम्हारा पुत्र युवराज होगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 67 (1.96.67)
वर्धमानपुरद्वारं तूर्यघोषनिनादितम् । शकुन्तलां पुरस्कृत्य विविशुस्ते महर्षयः ॥
vardhamānapuradvāraṃ tūryaghoṣanināditam | śakuntalāṃ puraskṛtya viviśuste maharṣayaḥ
शकुन्तला को आगे करके वे महर्षि तुरहियों की ध्वनि से गूँजते नगर के वर्धमान द्वार से भीतर गए।
श्लोक 68 (1.96.68)
प्रविशन्तं नृपसुतं प्रशशंसुश्च वीक्षकाः । वर्धमानपुरद्वारं प्रविशन्नेव पौरवः ॥
praviśantaṃ nṛpasutaṃ praśaśaṃsuśca vīkṣakāḥ | vardhamānapuradvāraṃ praviśanneva pauravaḥ
प्रवेश करते हुए राजकुमार की देखने वालों ने प्रशंसा की। वर्धमान नगर-द्वार से प्रवेश करते ही पौरव
श्लोक 69 (1.96.69)
इन्द्रलोकस्थमात्मानं मेने हर्षसमन्वितः ॥
indralokasthamātmānaṃ mene harṣasamanvitaḥ
हर्ष से भर गया और उसे लगा मानो वह इन्द्रलोक में आ पहुँचा हो।
श्लोक 70 (1.96.70)
ततो वै नागराः सर्वे समाहूय परस्परम् । द्रष्टुकामा नृपसुतं समपद्यन्त भारत ॥
tato vai nāgarāḥ sarve samāhūya parasparam | draṣṭukāmā nṛpasutaṃ samapadyanta bhārata
भारत! तब सब नागरिक एक-दूसरे को पुकारकर राजकुमार को देखने की इच्छा से इकट्ठे हो गए।
नागरा ऊचुः
श्लोक 71 (1.96.71)
देवतेव जनस्याग्रे भ्राजते श्रीरिवागता । जयन्तेनेव पौलोमी इन्द्रलोकादिहागता ॥
devateva janasyāgre bhrājate śrīrivāgatā | jayanteneva paulomī indralokādihāgatā
"यह लोगों के सामने देवी के समान चमक रही है, मानो स्वयं लक्ष्मी आ गई हों; मानो जयन्त के साथ पौलोमी (शची) इन्द्रलोक से यहाँ आई हों।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 72 (1.96.72)
इति ब्रुवन्तस्ते सर्वे महर्षीनिदमब्रुवन् । अभिवादयन्तः सहिता महर्षीन्देववर्चसः ॥
iti bruvantaste sarve maharṣīnidamabruvan | abhivādayantaḥ sahitā maharṣīndevavarcasaḥ
ऐसा कहते हुए उन सबने मिलकर देवताओं के समान तेजस्वी महर्षियों को प्रणाम किया और उनसे यह कहा —
नागरा ऊचुः
श्लोक 73 (1.96.73)
अद्य नः सफलं जन्म कृतार्थाश्च ततो वयम् । एवं ये स्म प्रपश्यामो महर्षीन्सूर्यवर्चसः ॥
adya naḥ saphalaṃ janma kṛtārthāśca tato vayam | evaṃ ye sma prapaśyāmo maharṣīnsūryavarcasaḥ
"आज हमारा जन्म सफल हुआ और हम कृतार्थ हो गए, क्योंकि हम सूर्य के समान तेजस्वी महर्षियों के दर्शन कर रहे हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 74 (1.96.74)
इत्युक्त्वा सहिताः केचिदन्वगच्छन्त पौरवम् । हैमवत्याः सुतमिव कुमारं पुष्करेक्षणम् ॥
ityuktvā sahitāḥ kecidanvagacchanta pauravam | haimavatyāḥ sutamiva kumāraṃ puṣkarekṣaṇam
ऐसा कहकर उनमें से कुछ लोग मिलकर हैमवती (उमा) के पुत्र के समान उस कमलनयन बालक पौरव के पीछे-पीछे चल पड़े।
श्लोक 75 (1.96.75)
ये केचिदब्रुवन्मूढाः शाकुन्तलदिदृक्षवः । कृष्णाजिनेन संछन्नाननिच्छन्तो ह्यवेक्षितुम् ॥
ye kecidabruvanmūḍhāḥ śākuntaladidṛkṣavaḥ | kṛṣṇājinena saṃchannānanicchanto hyavekṣitum
परन्तु शकुन्तला के पुत्र को देखने के इच्छुक कुछ मूर्ख लोग, काले मृगचर्म ओढ़े उन मुनियों की ओर देखना भी न चाहते हुए, बोले —
नागरा ऊचुः
श्लोक 76 (1.96.76)
पिशाचा इव दृश्यन्ते नागराणां विरूपिणः । विना सन्ध्यां पिशाचास्ते प्रविशन्ति पुरोत्तमम् ॥
piśācā iva dṛśyante nāgarāṇāṃ virūpiṇaḥ | vinā sandhyāṃ piśācāste praviśanti purottamam
"ये कुरूप लोग नगरवासियों को पिशाचों जैसे दिखते हैं। ये पिशाच ही हैं, जो सन्ध्या हुए बिना ही इस उत्तम नगर में घुसे आ रहे हैं।
श्लोक 77 (1.96.77)
क्षुत्पिपासार्दितान्दीनान्वल्कलाजिनवाससः । त्वगस्थिभूतान्निर्मांसान्धमनीसन्ततानपि ॥
kṣutpipāsārditāndīnānvalkalājinavāsasaḥ | tvagasthibhūtānnirmāṃsāndhamanīsantatānapi
भूख-प्यास से पीड़ित, दीन, वल्कल और मृगचर्म पहने, हड्डी और चमड़ी मात्र, मांसहीन, उभरी नसों वाले,
श्लोक 78 (1.96.78)
पिङ्गलाक्षान्पिङ्गजटान्दीर्घदन्तान्निरूदरान् । विशीर्षकानूर्ध्वहस्तान्दृष्ट्वा हास्यन्ति नागराः ॥
piṅgalākṣānpiṅgajaṭāndīrghadantānnirūdarān | viśīrṣakānūrdhvahastāndṛṣṭvā hāsyanti nāgarāḥ
भूरी आँखों, भूरी जटाओं, लम्बे दाँतों और पिचके पेट वाले, नंगे सिर और ऊपर उठे हाथों वाले इन लोगों को देखकर नगरवासी हँसेंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 79 (1.96.79)
एवमुक्तवतां तेषां गिरं श्रुत्वा महर्षयः । अन्योन्यं ते समाहूय इदं वचनमब्रुवन् ॥
evamuktavatāṃ teṣāṃ giraṃ śrutvā maharṣayaḥ | anyonyaṃ te samāhūya idaṃ vacanamabruvan
ऐसा कहने वालों की बात सुनकर महर्षियों ने एक-दूसरे को बुलाकर यह कहा —
ऋषय ऊचुः
श्लोक 80 (1.96.80)
उक्तं भगवता वाक्यं न कृतं सत्यवादिना । पुरप्रवेशनं नात्र कर्तव्यमिति शासनम् ॥
uktaṃ bhagavatā vākyaṃ na kṛtaṃ satyavādinā | purapraveśanaṃ nātra kartavyamiti śāsanam
"सत्यवादी भगवान् ने जो कहा था, उसका हमने पालन नहीं किया। उनका आदेश था कि नगर में प्रवेश नहीं करना है।
श्लोक 81 (1.96.81)
किं कारणं प्रवेक्ष्यामो नगरं दुर्जनैर्वृतम् । त्यक्तसङ्गस्य च मुनेर्नगरे किं प्रयोजनम् ॥
kiṃ kāraṇaṃ pravekṣyāmo nagaraṃ durjanairvṛtam | tyaktasaṅgasya ca munernagare kiṃ prayojanam
दुष्ट लोगों से भरे नगर में हम किस कारण प्रवेश करें? जिस मुनि ने आसक्ति छोड़ दी है, उसे नगर से क्या प्रयोजन?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 82 (1.96.82)
गमिष्यामो वनं तस्माद्गङ्गायामुनसङ्गमम् । एवमुक्त्वा मुनिगणाः प्रतिजग्मुर्यथागतम् ॥
gamiṣyāmo vanaṃ tasmādgaṅgāyāmunasaṅgamam | evamuktvā munigaṇāḥ pratijagmuryathāgatam
"इसलिए हम वन को, गंगा-यमुना के संगम पर लौट चलेंगे।" ऐसा कहकर मुनियों के समूह जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।