अनुशासन पर्व · अध्याय 100
स्वर्ण, जल, घी, ईंधन, छत्र और शकट का दान
भीष्म और भी दानों तथा उनके फल बताते हैं: स्वर्ण, जिसकी प्रशंसा अत्रि और हरिश्चन्द्र ने की; जल, जिसे कुएँ और तालाब बनवाकर देना मनु ने सर्वश्रेष्ठ दान कहा; घी; ईंधन; धूप और वर्षा से बचाने वाला छत्र; और अन्त में शकट, जिसे शाण्डिल्य ऋषि ने सब दानों में श्रेष्ठ बताया।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.100.1)
सर्वान्कामान्प्रयच्छन्ति ये प्रयच्छन्ति काञ्चनम् । इत्येवं भगवानत्रिः पितामहसुतोऽब्रवीत् ॥
sarvānkāmānprayacchanti ye prayacchanti kāñcanam | ityevaṃ bhagavānatriḥ pitāmahasuto'bravīt
'जो सोना देते हैं, वे सब कामनाएँ देते हैं।' ऐसा पितामह (ब्रह्मा) के पुत्र भगवान् अत्रि ने कहा था।
श्लोक 2 (13.100.2)
पवित्रं शुच्यथायुष्यं पितृणामक्षयं च तत् । सुवर्णं मनुजेन्द्रेण हरिश्चन्द्रेण कीर्तितम् ॥
pavitraṃ śucyathāyuṣyaṃ pitṛṇāmakṣayaṃ ca tat | suvarṇaṃ manujendreṇa hariścandreṇa kīrtitam
वह सोना पवित्र, शुद्ध, आयु बढ़ाने वाला और पितरों के लिए अक्षय है; ऐसा नरेन्द्र हरिश्चन्द्र ने कहा है।
श्लोक 3 (13.100.3)
पानीयपरमं दानं दानानां मनुरब्रवीत् । तस्मात्कूपांश्च वापीश्च तटाकानि च खानयेत् ॥
pānīyaparamaṃ dānaṃ dānānāṃ manurabravīt | tasmātkūpāṃśca vāpīśca taṭākāni ca khānayet
मनु ने कहा कि जल का दान सब दानों में परम है। इसलिए कुएँ, बावलियाँ और तालाब खुदवाने चाहिए।
श्लोक 4 (13.100.4)
सर्वं विनाशयेत्पापं पुरुषस्येह कर्मणः । कूपः प्रवृत्तपानीयः सुप्रवृत्तश्च नित्यशः ॥
sarvaṃ vināśayetpāpaṃ puruṣasyeha karmaṇaḥ | kūpaḥ pravṛttapānīyaḥ supravṛttaśca nityaśaḥ
जिस कुएँ से निरन्तर जल निकलता रहे और जो सदा अच्छी तरह काम में आता रहे, वह यहाँ मनुष्य के कर्म से उत्पन्न सारे पाप को नष्ट कर देता है।
श्लोक 5 (13.100.5)
सर्वं तारयते वंशं यस्य खाते जलाशये । गावः पिबन्ति विप्राश्च साधवश्च नराः सदा ॥
sarvaṃ tārayate vaṃśaṃ yasya khāte jalāśaye | gāvaḥ pibanti viprāśca sādhavaśca narāḥ sadā
जिसने जलाशय खुदवाया हो और जिसमें गौएँ, ब्राह्मण और सज्जन मनुष्य सदा पानी पीते हों, वह अपने सारे वंश को तार देता है।
श्लोक 6 (13.100.6)
निदाघकाले पानीयं यस्य तिष्ठत्यवारितम् । स दुर्गं विषमं कृत्स्नं न कदाचिदवाप्नुते ॥
nidāghakāle pānīyaṃ yasya tiṣṭhatyavāritam | sa durgaṃ viṣamaṃ kṛtsnaṃ na kadācidavāpnute
जिसके यहाँ गर्मी के समय बिना रोक-टोक पानी उपलब्ध रहता है, वह कभी किसी कठिन और विषम संकट को नहीं पाता।
श्लोक 7 (13.100.7)
बृहस्पतेर्भगवतः पूष्णश्चैव भगस्य च । अश्विनोश्चैव वह्नेश्च प्रीतिर्भवति सर्पिषा ॥
bṛhaspaterbhagavataḥ pūṣṇaścaiva bhagasya ca | aśvinoścaiva vahneśca prītirbhavati sarpiṣā
भगवान् बृहस्पति, पूषा, भग, दोनों अश्विनीकुमार और अग्नि, इन सबकी प्रीति घी से होती है।
श्लोक 8 (13.100.8)
परमं भेषजं ह्येतद्यज्ञानामेतदुत्तमम् । रसानामुत्तमं चैतत्फलानां चैतदुत्तमम् ॥
paramaṃ bheṣajaṃ hyetadyajñānāmetaduttamam | rasānāmuttamaṃ caitatphalānāṃ caitaduttamam
यह घी सबसे उत्तम औषधि है, यज्ञ की वस्तुओं में सर्वोत्तम है, रसों में उत्तम है और फलों में भी उत्तम है।
श्लोक 9 (13.100.9)
फलकामो यशस्कामः पुष्टिकामश्च नित्यदा । घृतं दद्याद्द्विजातिभ्यः पुरुषः शुचिरात्मवान् ॥
phalakāmo yaśaskāmaḥ puṣṭikāmaśca nityadā | ghṛtaṃ dadyāddvijātibhyaḥ puruṣaḥ śucirātmavān
फल, यश और पुष्टि चाहने वाला मनुष्य पवित्र और संयमी होकर सदा द्विजों को घी दे।
श्लोक 10 (13.100.10)
घृतं मासे आश्वयुजि विप्रेभ्यो यः प्रयच्छति । तस्मै प्रयच्छतो रूपं प्रीतौ देवाविहाश्विनौ ॥
ghṛtaṃ māse āśvayuji viprebhyo yaḥ prayacchati | tasmai prayacchato rūpaṃ prītau devāvihāśvinau
जो आश्विन मास में ब्राह्मणों को घी देता है, उस दाता को प्रसन्न होकर दोनों अश्विनीकुमार देवता यहाँ रूप प्रदान करते हैं।
श्लोक 11 (13.100.11)
पायसं सर्पिषा मिश्रं द्विजेभ्यो यः प्रयच्छति । गृहं तस्य न रक्षांसि धर्षयन्ति कदाचन ॥
pāyasaṃ sarpiṣā miśraṃ dvijebhyo yaḥ prayacchati | gṛhaṃ tasya na rakṣāṃsi dharṣayanti kadācana
जो ब्राह्मणों को घी मिली खीर देता है, उसके घर पर राक्षस कभी आक्रमण नहीं करते।
श्लोक 12 (13.100.12)
पिपासया न म्रियते सोपच्छन्दश्च जायते । न प्राप्नुयाच्च व्यसनं करकान्यः प्रयच्छति ॥
pipāsayā na mriyate sopacchandaśca jāyate | na prāpnuyācca vyasanaṃ karakānyaḥ prayacchati
जो करक (जल-पात्र) देता है, वह प्यास से नहीं मरता, साधन-सम्पन्न होकर जन्म लेता है और कभी संकट में नहीं पड़ता।
श्लोक 13 (13.100.13)
प्रयतो ब्राह्मणाग्रे यः श्रद्धया परया युतः । उपस्पर्शनषड्भागं लभते पुरुषः सदा ॥
prayato brāhmaṇāgre yaḥ śraddhayā parayā yutaḥ | upasparśanaṣaḍbhāgaṃ labhate puruṣaḥ sadā
जो संयमी पुरुष ब्राह्मण के सम्मुख परम श्रद्धा से युक्त होकर आचरण करता है, वह उपस्पर्शन का छठा भाग सदा प्राप्त करता है।
श्लोक 14 (13.100.14)
यः साधनार्थं काष्ठानि ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति । प्रतापनार्थं राजेन्द्र वृत्तवद्भ्यः सदा नरः ॥
yaḥ sādhanārthaṃ kāṣṭhāni brāhmaṇebhyaḥ prayacchati | pratāpanārthaṃ rājendra vṛttavadbhyaḥ sadā naraḥ
हे राजेन्द्र! जो मनुष्य सदाचारी ब्राह्मणों को कार्य-साधन और तापने के लिए सदा लकड़ी देता है,
श्लोक 15 (13.100.15)
सिद्ध्यन्त्यर्थाः सदा तस्य कार्याणि विविधानि च । उपर्युपरि शत्रूणां वपुषा दीप्यते च सः ॥
siddhyantyarthāḥ sadā tasya kāryāṇi vividhāni ca | uparyupari śatrūṇāṃ vapuṣā dīpyate ca saḥ
उसके प्रयोजन और अनेक कार्य सदा सिद्ध होते हैं और वह शरीर की कान्ति से शत्रुओं के ऊपर चमकता है।
श्लोक 16 (13.100.16)
भगवांश्चापि सम्प्रीतो वह्निर्भवति नित्यशः । न तं त्यजन्ति पशवः सङ्ग्रामे च जयत्यपि ॥
bhagavāṃścāpi samprīto vahnirbhavati nityaśaḥ | na taṃ tyajanti paśavaḥ saṅgrāme ca jayatyapi
भगवान् अग्नि उस पर सदा प्रसन्न रहते हैं, पशु उसे नहीं छोड़ते और वह युद्ध में भी विजय पाता है।
श्लोक 17 (13.100.17)
पुत्राञ्श्रियं च लभते यश्छत्रं सम्प्रयच्छति । न चक्षुर्व्याधिं लभते यज्ञभागमथाश्नुते ॥
putrāñśriyaṃ ca labhate yaśchatraṃ samprayacchati | na cakṣurvyādhiṃ labhate yajñabhāgamathāśnute
जो छत्र दान करता है, वह पुत्र और लक्ष्मी पाता है; उसे नेत्र का रोग नहीं होता और वह यज्ञ का भाग पाता है।
श्लोक 18 (13.100.18)
निदाघकाले वर्षे वा यश्छत्रं सम्प्रयच्छति । नास्य कश्चिन्मनोदाहः कदाचिदपि जायते । कृच्छ्रात्स विषमाच्चैव क्षिप्रं मोक्षमवाप्नुते ॥
nidāghakāle varṣe vā yaśchatraṃ samprayacchati | nāsya kaścinmanodāhaḥ kadācidapi jāyate | kṛcchrātsa viṣamāccaiva kṣipraṃ mokṣamavāpnute
जो गर्मी में या वर्षा में छत्र देता है, उसे कभी मन का कोई ताप नहीं होता, और वह कठिनाई तथा संकट से शीघ्र छुटकारा पा लेता है।
श्लोक 19 (13.100.19)
प्रदानं सर्वदानानां शकटस्य विशाम्पते । एवमाह महाभागः शाण्डिल्यो भगवानृषिः ॥
pradānaṃ sarvadānānāṃ śakaṭasya viśāmpate | evamāha mahābhāgaḥ śāṇḍilyo bhagavānṛṣiḥ
हे प्रजापालक! सब दानों में शकट का दान श्रेष्ठ है। ऐसा महाभाग भगवान् शाण्डिल्य ऋषि ने कहा है।