अनुशासन पर्व · अध्याय 101
उपानह्, तिल, भूमि, गौ और अन्न के दान का फल
युधिष्ठिर भीष्म से पहले उपानह् (जूते) के दान का फल पूछते हैं, फिर तिल, भूमि, गौ और अन्न के दान का। भीष्म तिल को पितरों का आदि भोजन बताते हैं, देवताओं द्वारा ब्रह्मा से यज्ञभूमि माँगने और यज्ञ के छठे अंश के रूप में भूमिदान करने की कथा कहते हैं, तथा भूमिदान, गोदान (रन्तिदेव और चर्मण्वती नदी की कथा सहित) और अन्नदान के फल गिनाते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.101.1)
दह्यमानाय विप्राय यः प्रयच्छत्युपानहौ । यत्फलं तस्य भवति तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
dahyamānāya viprāya yaḥ prayacchatyupānahau | yatphalaṃ tasya bhavati tanme brūhi pitāmaha
पितामह, जो मनुष्य धूप से तपते हुए ब्राह्मण को जूतों का जोड़ा दान करता है, उसे क्या फल मिलता है? वह मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.101.2)
उपानहौ प्रयच्छेद्यो ब्राह्मणेभ्यः समाहितः । मर्दते कण्टकान्सर्वान्विषमान्निस्तरत्यपि ॥
upānahau prayacchedyo brāhmaṇebhyaḥ samāhitaḥ | mardate kaṇṭakānsarvānviṣamānnistaratyapi
जो मनुष्य एकाग्र मन से ब्राह्मणों को जूते दान करता है, वह सब काँटों को कुचल देता है और ऊबड़-खाबड़ मार्गों को भी पार कर जाता है।
श्लोक 3 (13.101.3)
स शत्रूणामुपरि च सन्तिष्ठति युधिष्ठिर । यानं चाश्वतरीयुक्तं तस्य शुभ्रं विशाम्पते ॥
sa śatrūṇāmupari ca santiṣṭhati yudhiṣṭhira | yānaṃ cāśvatarīyuktaṃ tasya śubhraṃ viśāmpate
युधिष्ठिर, वह अपने शत्रुओं के ऊपर स्थित रहता है; और हे प्रजापालक, खच्चरियों से जुता हुआ उजला रथ उसके पास आ उपस्थित होता है।
श्लोक 4 (13.101.4)
उपतिष्ठति कौन्तेय रौप्यकाञ्चनभूषितम् । शकटं दम्यसंयुक्तं दत्तं भवति चैव हि ॥
upatiṣṭhati kaunteya raupyakāñcanabhūṣitam | śakaṭaṃ damyasaṃyuktaṃ dattaṃ bhavati caiva hi
हे कुन्तीपुत्र, चाँदी और सोने से सजा हुआ, तरुण बैलों से जुता शकट भी उसके पास आता है, और वह उसके द्वारा दिया हुआ ही माना जाता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 5 (13.101.5)
यत्फलं तिलदाने च भूमिदाने च कीर्तितम् । गोदाने चान्नदाने च भूयस्तद्ब्रूहि कौरव ॥
yatphalaṃ tiladāne ca bhūmidāne ca kīrtitam | godāne cānnadāne ca bhūyastadbrūhi kaurava
हे कुरुवंशी, तिल, भूमि, गौ और अन्न के दान का जो फल बताया गया है, वह मुझे और विस्तार से बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 6 (13.101.6)
शृणुष्व मम कौन्तेय तिलदानस्य यत्फलम् । निशम्य च यथान्यायं प्रयच्छ कुरुसत्तम ॥
śṛṇuṣva mama kaunteya tiladānasya yatphalam | niśamya ca yathānyāyaṃ prayaccha kurusattama
हे कुन्तीपुत्र, तिल के दान का फल मुझसे सुनो; और उसे सुनकर, हे कुरुश्रेष्ठ, विधि के अनुसार दान करो।
श्लोक 7 (13.101.7)
पितॄणां प्रथमं भोज्यं तिलाः सृष्टाः स्वयंभुवा । तिलदानेन वै तस्मात्पितृपक्षः प्रमोदते ॥
pitṝṇāṃ prathamaṃ bhojyaṃ tilāḥ sṛṣṭāḥ svayaṃbhuvā | tiladānena vai tasmātpitṛpakṣaḥ pramodate
स्वयम्भू ने तिलों को पितरों के प्रथम भोजन के रूप में रचा था; इसलिए तिलदान से पितृगण प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 8 (13.101.8)
माघमासे तिलान्यस्तु ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति । सर्वसत्वसमाकीर्णं नरकं स न पश्यति ॥
māghamāse tilānyastu brāhmaṇebhyaḥ prayacchati | sarvasatvasamākīrṇaṃ narakaṃ sa na paśyati
जो माघ मास में ब्राह्मणों को तिल देता है, वह सब प्रकार के प्राणियों से भरे हुए नरक को नहीं देखता।
श्लोक 9 (13.101.9)
सर्वसत्रैश्च यजते यस्तिलैर्यजते पितॄन् । न चाकामेन दातव्यं तिलैः श्राद्धं कदाचन ॥
sarvasatraiśca yajate yastilairyajate pitṝn | na cākāmena dātavyaṃ tilaiḥ śrāddhaṃ kadācana
जो तिलों से पितरों का यजन करता है, वह मानो सब यज्ञों से यजन करता है। परन्तु जिसकी देने की इच्छा न हो, उसे तिलों से कभी दान या श्राद्ध नहीं करना चाहिए।
श्लोक 10 (13.101.10)
महर्षेः कश्यपस्यैते गात्रेभ्यः प्रसृतास्तिलाः । ततो दिव्यं गता भावं प्रदानेषु तिलाः प्रभो ॥
maharṣeḥ kaśyapasyaite gātrebhyaḥ prasṛtāstilāḥ | tato divyaṃ gatā bhāvaṃ pradāneṣu tilāḥ prabho
ये तिल महर्षि कश्यप के अंगों से उत्पन्न हुए हैं; इसी से, हे प्रभो, दानों में तिलों ने दिव्य भाव प्राप्त किया।
श्लोक 11 (13.101.11)
पौष्टिका रूपदाश्चैव तथा पापविनाशनाः । तस्मात्सर्वप्रदानेभ्यस्तिलदानं विशिष्यते ॥
pauṣṭikā rūpadāścaiva tathā pāpavināśanāḥ | tasmātsarvapradānebhyastiladānaṃ viśiṣyate
तिल पुष्टि देते हैं, रूप देते हैं और पापों का नाश करते हैं; इसलिए सब दानों में तिलदान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
श्लोक 12 (13.101.12)
आपस्तम्बश्च मेधावी शङ्खश्च लिखितस्तथा । महर्षिर्गौतमश्चापि तिलदानैर्दिवं गताः ॥
āpastambaśca medhāvī śaṅkhaśca likhitastathā | maharṣirgautamaścāpi tiladānairdivaṃ gatāḥ
मेधावी आपस्तम्ब, शंख और लिखित तथा महर्षि गौतम भी तिलदान से स्वर्ग को गए।
श्लोक 13 (13.101.13)
तिलहोमरता विप्राः सर्वे संयतमैथुनाः । समा गव्येन हविषा प्रवृत्तिषु च संस्थिताः ॥
tilahomaratā viprāḥ sarve saṃyatamaithunāḥ | samā gavyena haviṣā pravṛttiṣu ca saṃsthitāḥ
तिलहोम में रत सब ब्राह्मण, जो संयमपूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उसे गोघृत की आहुति के समान मानते हैं और अपने कर्मों में दृढ़ रहते हैं।
श्लोक 14 (13.101.14)
सर्वेषामिति दानानां तिलदानं विशिष्यते । अक्षयं सर्वदानानां तिलदानमिहोच्यते ॥
sarveṣāmiti dānānāṃ tiladānaṃ viśiṣyate | akṣayaṃ sarvadānānāṃ tiladānamihocyate
सब दानों में तिलदान श्रेष्ठ कहा गया है; सब दानों में इसे ही यहाँ अक्षय कहा जाता है।
श्लोक 15 (13.101.15)
उच्छिन्ने तु पुरा हव्ये कुशिकर्षिः परन्तपः । तिलैरग्नित्रयं हुत्वा प्राप्तवान्गतिमुत्तमाम् ॥
ucchinne tu purā havye kuśikarṣiḥ parantapaḥ | tilairagnitrayaṃ hutvā prāptavāngatimuttamām
पूर्वकाल में जब हव्य नष्ट हो गया था, तब शत्रुओं को तपाने वाले कुशिक ऋषि ने तिलों से तीनों अग्नियों में होम करके परमगति प्राप्त की।
श्लोक 16 (13.101.16)
इति प्रोक्तं कुरुश्रेष्ठ तिलदानमनुत्तमम् । विधानं येन विधिना तिलानामिह शस्यते ॥
iti proktaṃ kuruśreṣṭha tiladānamanuttamam | vidhānaṃ yena vidhinā tilānāmiha śasyate
हे कुरुश्रेष्ठ, इस प्रकार अनुपम तिलदान का वर्णन किया गया, और वह विधि भी जिससे यहाँ तिलों की प्रशंसा की जाती है।
श्लोक 17 (13.101.17)
अत ऊर्ध्वं निबोधेदं देवानां यष्टुमिच्छताम् । समागमे महाराज ब्रह्मणा वै स्वयंभुवा ॥
ata ūrdhvaṃ nibodhedaṃ devānāṃ yaṣṭumicchatām | samāgame mahārāja brahmaṇā vai svayaṃbhuvā
हे महाराज, अब आगे यह सुनो: यज्ञ करना चाहने वाले देवताओं की स्वयम्भू ब्रह्मा से जो भेंट हुई थी।
श्लोक 18 (13.101.18)
देवाः समेत्य ब्रह्माणं भूमिभागे यियक्षवः । शुभं देशमयाचन्त यजेम इति पार्थिव ॥
devāḥ sametya brahmāṇaṃ bhūmibhāge yiyakṣavaḥ | śubhaṃ deśamayācanta yajema iti pārthiva
हे राजन्, यज्ञ करने की इच्छा वाले देवताओं ने ब्रह्मा के पास एकत्र होकर पृथ्वी का एक उत्तम प्रदेश माँगा और कहा, "हम यज्ञ करें।"
देवा ऊचुः
श्लोक 19 (13.101.19)
भगवंस्त्वं प्रभुर्भूमेः सर्वस्य त्रिदिवस्य च । यजेम हि महाभाग यज्ञं भवदनुज्ञया ॥
bhagavaṃstvaṃ prabhurbhūmeḥ sarvasya tridivasya ca | yajema hi mahābhāga yajñaṃ bhavadanujñayā
भगवन्, आप सारी पृथ्वी और स्वर्ग के स्वामी हैं। हे महाभाग, हम आपकी अनुमति से यज्ञ करें।
श्लोक 20 (13.101.20)
नाननुज्ञातभूमिर्हि यज्ञस्य फलमश्नुते । त्वं हि सर्वस्य जगतः स्थावरस्य चरस्य च । प्रभुर्भवसि तस्मात्त्वं समनुज्ञातुमर्हसि ॥
nānanujñātabhūmirhi yajñasya phalamaśnute | tvaṃ hi sarvasya jagataḥ sthāvarasya carasya ca | prabhurbhavasi tasmāttvaṃ samanujñātumarhasi
जिसे भूमि की अनुमति नहीं मिली, वह यज्ञ का फल नहीं पाता। आप चर और अचर सारे जगत् के स्वामी हैं; इसलिए आपको हमें अनुमति देनी चाहिए।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 21 (13.101.21)
ददानि मेदिनीभागं भवद्भ्योऽहं सुरर्षभाः । यस्मिन्देशे करिष्यध्वं यज्ञान्काश्यपनन्दनाः ॥
dadāni medinībhāgaṃ bhavadbhyo'haṃ surarṣabhāḥ | yasmindeśe kariṣyadhvaṃ yajñānkāśyapanandanāḥ
हे देवश्रेष्ठो, कश्यप के पुत्रो, मैं तुम्हें पृथ्वी का एक भाग देता हूँ; जिस स्थान पर चाहो वहाँ अपने यज्ञ करो।
देवा ऊचुः
श्लोक 22 (13.101.22)
भगवन्कृतकामाः स्म यक्ष्महे स्वाप्तदक्षिणैः । इमं तु देशं मुनयः पर्युपासन्ति नित्यदा ॥
bhagavankṛtakāmāḥ sma yakṣmahe svāptadakṣiṇaiḥ | imaṃ tu deśaṃ munayaḥ paryupāsanti nityadā
भगवन्, हमारी कामना पूर्ण हुई; हम भलीभाँति अर्जित दक्षिणाओं के साथ यज्ञ करेंगे। इस प्रदेश में मुनिगण सदा आते-जाते रहते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 23 (13.101.23)
ततोऽगस्त्यश्च कण्वश्च भृगुरत्रिर्वृषाकपिः । असितो देवलश्चैव देवयज्ञमुपागमन् ॥
tato'gastyaśca kaṇvaśca bhṛguratrirvṛṣākapiḥ | asito devalaścaiva devayajñamupāgaman
तब अगस्त्य, कण्व, भृगु, अत्रि, वृषाकपि, असित और देवल देवताओं के यज्ञ में आए।
श्लोक 24 (13.101.24)
ततो देवा महात्मान ईजिरे यज्ञमच्युतम् । तथा समापयामासुर्यथाकालं सुरर्षभाः ॥
tato devā mahātmāna ījire yajñamacyutam | tathā samāpayāmāsuryathākālaṃ surarṣabhāḥ
तब महात्मा देवताओं ने अटल यज्ञ किया और उन देवश्रेष्ठों ने उसे यथासमय पूर्ण किया।
श्लोक 25 (13.101.25)
त इष्टयज्ञास्त्रिदशा हिमवत्यचलोत्तमे । षष्ठमंशं क्रतोस्तस्य भूमिदानं प्रचक्रिरे ॥
ta iṣṭayajñāstridaśā himavatyacalottame | ṣaṣṭhamaṃśaṃ kratostasya bhūmidānaṃ pracakrire
पर्वतों में श्रेष्ठ हिमालय पर यज्ञ पूर्ण करके तीस देवताओं ने उस यज्ञ के छठे अंश के रूप में भूमिदान किया।
श्लोक 26 (13.101.26)
प्रादेशमात्रं भूमेस्तु यो दद्यादनुपस्कृतम् । न सीदति स कृच्छ्रेषु न च दुर्गाण्यवाप्नुते ॥
prādeśamātraṃ bhūmestu yo dadyādanupaskṛtam | na sīdati sa kṛcchreṣu na ca durgāṇyavāpnute
जो बिना सँवारी हुई भूमि का एक बित्ता भर भी दान करता है, वह संकटों में नहीं डूबता और विषम कठिनाइयों को नहीं पाता।
श्लोक 27 (13.101.27)
शीतवातातपसहां यागभूमिं सुसंस्कृताम् । प्रदाय सुरलोकस्थः पुण्यान्तेऽपि न चाल्यते ॥
śītavātātapasahāṃ yāgabhūmiṃ susaṃskṛtām | pradāya suralokasthaḥ puṇyānte'pi na cālyate
शीत, वायु और धूप को सहने वाली, भलीभाँति सँवारी हुई यज्ञभूमि दान करके वह देवलोक में रहता है और पुण्य के क्षीण होने पर भी वहाँ से च्युत नहीं होता।
श्लोक 28 (13.101.28)
मुदितो वसति प्राज्ञः शक्रेण सह पार्थिव । प्रतिश्रयप्रदानाच्च सोऽपि स्वर्गे महीयते ॥
mudito vasati prājñaḥ śakreṇa saha pārthiva | pratiśrayapradānācca so'pi svarge mahīyate
हे राजन्, वह बुद्धिमान् पुरुष इन्द्र के साथ आनन्दपूर्वक रहता है; और जो आश्रय का दान करता है, वह भी स्वर्ग में पूजित होता है।
श्लोक 29 (13.101.29)
अध्यापककुले जातः श्रोत्रियो नियतेन्द्रियः । गृहे यस्य वसेत्तुष्टः प्रधानं लोकमश्नुते ॥
adhyāpakakule jātaḥ śrotriyo niyatendriyaḥ | gṛhe yasya vasettuṣṭaḥ pradhānaṃ lokamaśnute
जिसके घर में अध्यापकों के कुल में उत्पन्न, जितेन्द्रिय श्रोत्रिय ब्राह्मण सन्तुष्ट होकर निवास करता है, वह श्रेष्ठ लोक पाता है।
श्लोक 30 (13.101.30)
तथा गवार्थे शरणं शीतवर्षसहं दृढम् । आसप्तमं तारयति कुलं भरतसत्तम ॥
tathā gavārthe śaraṇaṃ śītavarṣasahaṃ dṛḍham | āsaptamaṃ tārayati kulaṃ bharatasattama
इसी प्रकार जो गौओं के लिए शीत और वर्षा को सहने वाला दृढ़ आश्रय बनवाता है, वह हे भरतश्रेष्ठ, अपने कुल को सातवीं पीढ़ी तक तार देता है।
श्लोक 31 (13.101.31)
क्षेत्रभूमिं ददल्लोके शुभां श्रियमवाप्नुयात् । रत्नभूमिं प्रदद्यात्तु कुलवंशं प्रवर्धयेत् ॥
kṣetrabhūmiṃ dadalloke śubhāṃ śriyamavāpnuyāt | ratnabhūmiṃ pradadyāttu kulavaṃśaṃ pravardhayet
इस लोक में खेती की भूमि देने वाला शुभ लक्ष्मी पाता है; रत्नों वाली भूमि देने वाला अपने कुल और वंश को बढ़ाता है।
श्लोक 32 (13.101.32)
न चोषरां न निर्दग्धां महीं दद्यात्कथञ्चन । न श्मशानपरीतां च न च पापनिषेविताम् ॥
na coṣarāṃ na nirdagdhāṃ mahīṃ dadyātkathañcana | na śmaśānaparītāṃ ca na ca pāpaniṣevitām
ऊसर भूमि, जली हुई भूमि, श्मशान से घिरी हुई भूमि या पापियों द्वारा सेवित भूमि कभी दान में नहीं देनी चाहिए।
श्लोक 33 (13.101.33)
पारक्ये भूमिदेशे तु पितॄणां निर्वपेत्तु यः । तद्भूमिं वाऽपि पितृभिः श्राद्धकर्म विहन्यते ॥
pārakye bhūmideśe tu pitṝṇāṃ nirvapettu yaḥ | tadbhūmiṃ vā'pi pitṛbhiḥ śrāddhakarma vihanyate
जो पराई भूमि पर पितरों के लिए पिण्ड अर्पित करता है, उसका श्राद्धकर्म नष्ट हो जाता है, उस भूमि के सम्बन्ध में भी और पितरों के सम्बन्ध में भी।
श्लोक 34 (13.101.34)
तस्मात्क्रीत्वा महीं दद्यात्स्वल्पामपि विचक्षणः । पिण्डः पितृभ्यो दत्तो वै तस्यां भवति शाश्वतः ॥
tasmātkrītvā mahīṃ dadyātsvalpāmapi vicakṣaṇaḥ | piṇḍaḥ pitṛbhyo datto vai tasyāṃ bhavati śāśvataḥ
इसलिए विवेकी पुरुष को चाहिए कि थोड़ी-सी ही सही, भूमि खरीदकर दान करे; उस पर पितरों को दिया गया पिण्ड शाश्वत हो जाता है।
श्लोक 35 (13.101.35)
अटवी पर्वताश्चैव नद्यस्तीर्थानि यानि च । सर्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न हि तत्र परिग्रहः ॥
aṭavī parvatāścaiva nadyastīrthāni yāni ca | sarvāṇyasvāmikānyāhurna hi tatra parigrahaḥ
वन, पर्वत, नदियाँ और तीर्थ, ये सब स्वामिहीन कहे गए हैं; इन पर किसी का अधिकार नहीं होता।
श्लोक 36 (13.101.36)
इत्येतद्भूमिदानस्य फलमुक्तं विशाम्पते । अतः परं तु गोदानं कीर्तयिष्यामि तेऽनघ ॥
ityetadbhūmidānasya phalamuktaṃ viśāmpate | ataḥ paraṃ tu godānaṃ kīrtayiṣyāmi te'nagha
हे प्रजापालक, इस प्रकार भूमिदान का फल बताया गया। हे निष्पाप, अब मैं तुम्हें गोदान का वर्णन करूँगा।
श्लोक 37 (13.101.37)
गावोऽधिकास्तपस्विभ्यो यस्मात्सर्वेभ्य एव च । तस्मान्महेश्वरो देवस्तपस्ताभिः सहास्थितः ॥
gāvo'dhikāstapasvibhyo yasmātsarvebhya eva ca | tasmānmaheśvaro devastapastābhiḥ sahāsthitaḥ
क्योंकि गौएँ तपस्वियों से और सबसे ऊपर हैं, इसीलिए महेश्वर देव ने उनके साथ रहकर तप किया।
श्लोक 38 (13.101.38)
ब्राह्मे लोके वसन्त्येताः सोमेन सह भारत । यां तां ब्रह्मर्षयः सिद्धाः प्रार्थयन्ति परां गतिम् ॥
brāhme loke vasantyetāḥ somena saha bhārata | yāṃ tāṃ brahmarṣayaḥ siddhāḥ prārthayanti parāṃ gatim
हे भारत, वे ब्रह्मलोक में सोम के साथ निवास करती हैं, उसी परम गति में जिसे ब्रह्मर्षि और सिद्ध चाहते हैं।
श्लोक 39 (13.101.39)
पयसा हविषा दध्ना शकृता चाथ चर्मणा । अस्थिभिश्चोपकुर्वन्ति शृङ्गैर्वालैश्च भारत ॥
payasā haviṣā dadhnā śakṛtā cātha carmaṇā | asthibhiścopakurvanti śṛṅgairvālaiśca bhārata
हे भारत, वे दूध, घी, दही, गोबर, चमड़े, हड्डियों, सींगों और बालों से मनुष्यों का उपकार करती हैं।
श्लोक 40 (13.101.40)
नासां शीतातपौ स्यातां सदैताः कर्म कुर्वते । न वर्षविषयं वाऽपि दुःखमासां भवत्युत ॥
nāsāṃ śītātapau syātāṃ sadaitāḥ karma kurvate | na varṣaviṣayaṃ vā'pi duḥkhamāsāṃ bhavatyuta
उन्हें शीत और घाम नहीं सताते, क्योंकि वे सदा काम में लगी रहती हैं; वर्षा के कारण भी उन्हें कष्ट नहीं होता।
श्लोक 41 (13.101.41)
ब्राह्मणैः सहिता यान्ति तस्मात्पारमकं पदम् । एकं गोब्राह्मणं तस्मात्प्रवदन्ति मनीषिणः ॥
brāhmaṇaiḥ sahitā yānti tasmātpāramakaṃ padam | ekaṃ gobrāhmaṇaṃ tasmātpravadanti manīṣiṇaḥ
वे ब्राह्मणों के साथ परमपद को जाती हैं; इसीलिए मनीषी गौ और ब्राह्मण को एक कहते हैं।
श्लोक 42 (13.101.42)
रन्तिदेवस्य यज्ञे ताः पशुत्वेनोपकल्पिताः । अतश्चर्मण्वती राजन्गोचर्मभ्यः प्रवर्तिता । पशुत्वाच्च विनिर्मुक्ताः प्रदानायोपकल्पिताः ॥
rantidevasya yajñe tāḥ paśutvenopakalpitāḥ | ataścarmaṇvatī rājangocarmabhyaḥ pravartitā | paśutvācca vinirmuktāḥ pradānāyopakalpitāḥ
रन्तिदेव के यज्ञ में वे पशु के रूप में नियत की गई थीं। हे राजन्, इसी से गौओं के चर्मों से चर्मण्वती नदी प्रवाहित हुई। पशुभाव से मुक्त होकर वे दान के लिए नियत की गईं।
श्लोक 43 (13.101.43)
ता इमा विप्रमुख्येभ्यो यो ददाति महीपते । निस्तरेदापदं कृच्छ्रां विषमस्थोऽपि पार्थिव ॥
tā imā vipramukhyebhyo yo dadāti mahīpate | nistaredāpadaṃ kṛcchrāṃ viṣamastho'pi pārthiva
हे पृथ्वीपते, जो इन गौओं को श्रेष्ठ ब्राह्मणों को देता है, वह विपत्ति में पड़ा हुआ भी संकट और कठिनाई को पार कर जाता है।
श्लोक 44 (13.101.44)
गवां सहस्रदः प्रेत्य नरकं न प्रपद्यते । सर्वत्र विजयं चापि लभते मनुजाधिप ॥
gavāṃ sahasradaḥ pretya narakaṃ na prapadyate | sarvatra vijayaṃ cāpi labhate manujādhipa
हे मनुजाधिप, हजार गौओं का दान करने वाला मरकर नरक में नहीं जाता और सर्वत्र विजय पाता है।
श्लोक 45 (13.101.45)
अमृतं वै गवां क्षीरमित्याह त्रिदशाधिपः । तस्माद्ददाति यो धेनुममृतं स प्रयच्छति ॥
amṛtaṃ vai gavāṃ kṣīramityāha tridaśādhipaḥ | tasmāddadāti yo dhenumamṛtaṃ sa prayacchati
देवराज ने कहा है कि गौओं का दूध अमृत है; इसलिए जो दुधारू गौ देता है, वह अमृत देता है।
श्लोक 46 (13.101.46)
अग्नीनामव्ययं ह्येतद्धौम्यं वेदविदो विदुः । तस्माद्ददाति यो धेनुं स हौम्यं सम्प्रयच्छति ॥
agnīnāmavyayaṃ hyetaddhaumyaṃ vedavido viduḥ | tasmāddadāti yo dhenuṃ sa haumyaṃ samprayacchati
वेदवेत्ता इसे अग्नियों का अक्षय हव्य जानते हैं; इसलिए जो गौ देता है, वह हवन के योग्य हव्य देता है।
श्लोक 47 (13.101.47)
स्वर्गो वै मूर्तिमानेष वृषभं यो गवां पतिम् । विप्रे गुणयुते दद्यात्स वै स्वर्गे महीयते ॥
svargo vai mūrtimāneṣa vṛṣabhaṃ yo gavāṃ patim | vipre guṇayute dadyātsa vai svarge mahīyate
गौओं का स्वामी वृषभ साक्षात् मूर्तिमान् स्वर्ग है; जो उसे गुणवान् ब्राह्मण को देता है, वह स्वर्ग में सम्मान पाता है।
श्लोक 48 (13.101.48)
प्राणा वै प्राणिनामेते प्रोच्यन्ते भरतर्षभ । तस्माद्ददाति यो धेनुं प्राणानेष प्रयच्छति ॥
prāṇā vai prāṇināmete procyante bharatarṣabha | tasmāddadāti yo dhenuṃ prāṇāneṣa prayacchati
हे भरतश्रेष्ठ, गौएँ प्राणियों के प्राण कही जाती हैं; इसलिए जो गौ देता है, वह प्राण देता है।
श्लोक 49 (13.101.49)
गावः शरण्या भूतानामिति वेदविदो विदुः । तस्माद्ददाति यो धेनुं शरणं सम्प्रयच्छति ॥
gāvaḥ śaraṇyā bhūtānāmiti vedavido viduḥ | tasmāddadāti yo dhenuṃ śaraṇaṃ samprayacchati
वेदवेत्ता कहते हैं कि गौएँ प्राणियों की शरण हैं; इसलिए जो गौ देता है, वह शरण देता है।
श्लोक 50 (13.101.50)
न वधार्थं प्रदातव्या न कीनाशे न नास्तिके । गोजीविने न दातव्या तथा गौर्भरतर्षभ । गोरसानां न विक्रेतू रसं च यजनस्य च ॥
na vadhārthaṃ pradātavyā na kīnāśe na nāstike | gojīvine na dātavyā tathā gaurbharatarṣabha | gorasānāṃ na vikretū rasaṃ ca yajanasya ca
वध के लिए गौ नहीं देनी चाहिए, न कंजूस को, न नास्तिक को; हे भरतश्रेष्ठ, गौ से जीविका चलाने वाले को भी नहीं देनी चाहिए; न गोरस बेचने वाले को, न यज्ञ का रस बेचने वाले को।
श्लोक 51 (13.101.51)
ददत्स तादृशानां वै नरो गां पापकर्मणाम् । अक्षयं नरकं यातीत्येवमाहुर्महर्षयः ॥
dadatsa tādṛśānāṃ vai naro gāṃ pāpakarmaṇām | akṣayaṃ narakaṃ yātītyevamāhurmaharṣayaḥ
ऐसे पापकर्मियों को गौ देने वाला मनुष्य अनन्त नरक में जाता है, ऐसा महर्षि कहते हैं।
श्लोक 52 (13.101.52)
न कृशां नापवत्सां वा वन्ध्यां रोगान्वितां तथा । न व्यङ्गां न परिश्रान्तां दद्याद्गां ब्राह्मणाय वै ॥
na kṛśāṃ nāpavatsāṃ vā vandhyāṃ rogānvitāṃ tathā | na vyaṅgāṃ na pariśrāntāṃ dadyādgāṃ brāhmaṇāya vai
दुबली, बछड़े से रहित, बाँझ, रोगिणी, अंगहीन या थकी हुई गौ ब्राह्मण को नहीं देनी चाहिए।
श्लोक 53 (13.101.53)
दशगोसहस्रदः सम्यक् शक्रेण सह मोदते । अक्षयाँल्लभते लोकान्नरः शतसहस्रशः ॥
daśagosahasradaḥ samyak śakreṇa saha modate | akṣayām̐llabhate lokānnaraḥ śatasahasraśaḥ
जो विधिपूर्वक दस हजार गौएँ देता है, वह इन्द्र के साथ आनन्द करता है; वह लाखों अक्षय लोक पाता है।
श्लोक 54 (13.101.54)
इत्येतद्गोप्रदानं च तिलदानं च कीर्तितम् । तथा भूमिप्रदानं च शृणुष्वान्ने च भारत ॥
ityetadgopradānaṃ ca tiladānaṃ ca kīrtitam | tathā bhūmipradānaṃ ca śṛṇuṣvānne ca bhārata
इस प्रकार गोदान और तिलदान कहे गए, और भूमिदान भी। हे भारत, अब अन्न के दान के विषय में सुनो।
श्लोक 55 (13.101.55)
अन्नदानं प्रधानं हि कौन्तेय परिचक्षते । अन्नस्य हि प्रदानेन रन्तिदेवो दिवं गतः ॥
annadānaṃ pradhānaṃ hi kaunteya paricakṣate | annasya hi pradānena rantidevo divaṃ gataḥ
हे कुन्तीपुत्र, अन्नदान को सबसे प्रधान कहा जाता है; अन्न के दान से ही रन्तिदेव स्वर्ग गए।
श्लोक 56 (13.101.56)
श्रान्ताय क्षुधितायान्नं यः प्रयच्छति भूमिप । स्वायंभुवं महत्स्थानं स गच्छति नराधिप ॥
śrāntāya kṣudhitāyānnaṃ yaḥ prayacchati bhūmipa | svāyaṃbhuvaṃ mahatsthānaṃ sa gacchati narādhipa
हे भूपाल, जो थके और भूखे को अन्न देता है, वह हे नरेश, स्वायम्भुव के महान् धाम को जाता है।
श्लोक 57 (13.101.57)
न हिरण्यैर्न वासोभिर्नान्यदानेन भारत । प्राप्नुवन्ति नराः श्रेयो यथा ह्यन्नप्रदाः प्रभो ॥
na hiraṇyairna vāsobhirnānyadānena bhārata | prāpnuvanti narāḥ śreyo yathā hyannapradāḥ prabho
हे प्रभो, मनुष्य सोने, वस्त्रों या किसी और दान से वैसा कल्याण नहीं पाते जैसा अन्न देने वाले पाते हैं।
श्लोक 58 (13.101.58)
अन्नं वै प्रथमं द्रव्यमन्नं श्रीश्च परा मता । अन्नात्प्राणः प्रभवति तेजो वीर्यं बलं तथा ॥
annaṃ vai prathamaṃ dravyamannaṃ śrīśca parā matā | annātprāṇaḥ prabhavati tejo vīryaṃ balaṃ tathā
अन्न सब धनों में प्रथम है और अन्न ही परम श्री माना गया है; अन्न से प्राण, तेज, वीर्य और बल उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 59 (13.101.59)
सद्यो ददाति यश्चान्नं सदैकाग्रमना नरः । न स दुर्गाण्यवाप्नोतीत्येवमाह पराशरः ॥
sadyo dadāti yaścānnaṃ sadaikāgramanā naraḥ | na sa durgāṇyavāpnotītyevamāha parāśaraḥ
जो मनुष्य सदा एकाग्र मन से तुरन्त अन्न देता है, वह कठिनाइयों में नहीं पड़ता, ऐसा पराशर ने कहा है।
श्लोक 60 (13.101.60)
अर्चयित्वा यथान्यायं देवेभ्योऽन्नं निवेदयेत् । यदन्ना हि नरा राजंस्तदन्नास्तस्य देवतः ॥
arcayitvā yathānyāyaṃ devebhyo'nnaṃ nivedayet | yadannā hi narā rājaṃstadannāstasya devataḥ
विधिपूर्वक देवताओं की पूजा करके उन्हें अन्न निवेदित करना चाहिए; क्योंकि हे राजन्, मनुष्य जो अन्न खाते हैं, उनके देवता भी वही अन्न खाते हैं।
श्लोक 61 (13.101.61)
कौमुद्यां शुक्लपक्षे तु योऽन्नदानं करोत्युत । स सन्तरति दुर्गाणि प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ॥
kaumudyāṃ śuklapakṣe tu yo'nnadānaṃ karotyuta | sa santarati durgāṇi pretya cānantyamaśnute
जो शुक्ल पक्ष की कौमुदी (पूर्णिमा) को अन्नदान करता है, वह संकटों को पार करता है और मरकर अनन्तता पाता है।
श्लोक 62 (13.101.62)
अभुक्त्वाऽतिथये चान्नं प्रयच्छेद्यः समाहितः । स वै ब्रह्मविदां लोकान्प्राप्नुयाद्भरतर्षभ ॥
abhuktvā'tithaye cānnaṃ prayacchedyaḥ samāhitaḥ | sa vai brahmavidāṃ lokānprāpnuyādbharatarṣabha
जो एकाग्र मन से स्वयं भोजन करने से पहले अतिथि को अन्न देता है, वह हे भरतश्रेष्ठ, ब्रह्मवेत्ताओं के लोकों को पाता है।
श्लोक 63 (13.101.63)
सुकृच्छ्रामापदं प्राप्तश्चान्नदः पुरुषस्तरेत् । पापं तरति चैवेह दुष्कृतं चापकर्षति ॥
sukṛcchrāmāpadaṃ prāptaścānnadaḥ puruṣastaret | pāpaṃ tarati caiveha duṣkṛtaṃ cāpakarṣati
अन्न देने वाला पुरुष घोर विपत्ति में पड़कर भी उसे पार कर लेता है; वह यहीं पाप से तर जाता है और अपने दुष्कर्मों को दूर कर देता है।
श्लोक 64 (13.101.64)
इत्येतदन्नदानस्य तिलदानस्य चैव ह । भूमिदानस्य च फलं गोदानस्य च कीर्तितम् ॥
ityetadannadānasya tiladānasya caiva ha | bhūmidānasya ca phalaṃ godānasya ca kīrtitam
इस प्रकार अन्नदान, तिलदान, भूमिदान और गोदान के फल कहे गए।