अनुशासन पर्व · अध्याय 102
जलदान की महिमा
अन्नदान की प्रशंसा सुनकर युधिष्ठिर जलदान के विषय में पूछते हैं। भीष्म बताते हैं कि अन्न, औषधियाँ और प्राण सब जल से उत्पन्न होते हैं; अन्नदान प्राणदान है और जलदान उससे भी बढ़कर है, तथा जल देने वाला कीर्ति, पापों से मुक्ति और अक्षय लोक पाता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.102.1)
श्रुतं दानफलं तात यत्त्वया परिकीर्तितम् । अन्नदानं विशेषेण प्रशस्तमिह भारत ॥
śrutaṃ dānaphalaṃ tāta yattvayā parikīrtitam | annadānaṃ viśeṣeṇa praśastamiha bhārata
तात, आपने दानों का जो फल बताया वह मैंने सुना; हे भारत, इनमें अन्नदान की विशेष प्रशंसा यहाँ की गई है।
श्लोक 2 (13.102.2)
पानीयदानमेवैतत्कथं चेह महाफलम् । इत्येतच्छ्रोतुमिच्छामि विस्तरेण पितामह ॥
pānīyadānamevaitatkathaṃ ceha mahāphalam | ityetacchrotumicchāmi vistareṇa pitāmaha
पितामह, जलदान भी किस प्रकार महान् फल देने वाला है? यह मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ।
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (13.102.3)
हन्त ते वर्तयिष्यामि यथावद्भरतर्षभ । गदतस्तन्ममाद्येह शृणु सत्यपराक्रम । पानीयदानात्प्रभृति सर्वं वक्ष्यामि तेऽनघ ॥
hanta te vartayiṣyāmi yathāvadbharatarṣabha | gadatastanmamādyeha śṛṇu satyaparākrama | pānīyadānātprabhṛti sarvaṃ vakṣyāmi te'nagha
हे भरतश्रेष्ठ, मैं तुम्हें यथावत् बताऊँगा। हे सत्यपराक्रमी, आज मैं जो कहता हूँ उसे सुनो; हे निष्पाप, जलदान से आरम्भ करके मैं तुम्हें सब कुछ बताऊँगा।
श्लोक 4 (13.102.4)
यदन्नं यच्च पानीयं सम्प्रदायाश्नुते फलम् । न ताभ्यां परमं दानं किञ्चिदस्तीति मे मनः ॥
yadannaṃ yacca pānīyaṃ sampradāyāśnute phalam | na tābhyāṃ paramaṃ dānaṃ kiñcidastīti me manaḥ
अन्न और जल का दान करके मनुष्य जो फल पाता है, उससे बढ़कर कोई दान नहीं है, ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 5 (13.102.5)
अन्नात्प्राणभृतस्तात प्रवर्तन्ते हि सर्वशः । तस्मादन्नं परं लोके सर्वदानेषु कथ्यते ॥
annātprāṇabhṛtastāta pravartante hi sarvaśaḥ | tasmādannaṃ paraṃ loke sarvadāneṣu kathyate
तात, अन्न से ही सब ओर प्राणधारी उत्पन्न होते हैं; इसलिए संसार में सब दानों में अन्न को सर्वोपरि कहा जाता है।
श्लोक 6 (13.102.6)
अन्नाद्बलं च तेजश्च प्राणिनां वर्धते सदा । अन्नदानमतस्तस्माच्छ्रेष्ठमाह प्रजापतिः ॥
annādbalaṃ ca tejaśca prāṇināṃ vardhate sadā | annadānamatastasmācchreṣṭhamāha prajāpatiḥ
अन्न से प्राणियों का बल और तेज सदा बढ़ता है; इसीलिए प्रजापति ने अन्नदान को श्रेष्ठ कहा है।
श्लोक 7 (13.102.7)
सावित्र्या ह्यपि कौन्तेय श्रूयते वचनं शुभम् । यच्चेदं नान्यथा चैतद्देव सत्रे महामखे ॥
sāvitryā hyapi kaunteya śrūyate vacanaṃ śubham | yaccedaṃ nānyathā caitaddeva satre mahāmakhe
हे कुन्तीपुत्र, सावित्री का भी मंगलमय वचन सुना जाता है, और वह इससे भिन्न नहीं है; देवताओं के उस सत्र में, उस महायज्ञ में।
श्लोक 8 (13.102.8)
अन्ने दत्ते नरेणेह प्राणा दत्ता भवन्त्युत । प्राणदानाद्धि परमं न दानमिह विद्यते ॥
anne datte nareṇeha prāṇā dattā bhavantyuta | prāṇadānāddhi paramaṃ na dānamiha vidyate
जब मनुष्य यहाँ अन्न देता है, तब प्राण ही दिए जाते हैं; और प्राणदान से बढ़कर यहाँ कोई दान नहीं है।
श्लोक 9 (13.102.9)
श्रुतं हि ते महाबाहो लोमशस्यापि तद्वचः । प्राणान्दत्त्वा कपोताय यत्प्राप्तं शिबिना पुरा ॥
śrutaṃ hi te mahābāho lomaśasyāpi tadvacaḥ | prāṇāndattvā kapotāya yatprāptaṃ śibinā purā
हे महाबाहो, तुमने लोमश का भी वह वचन सुना है कि प्राण देकर कपोत की रक्षा करने से शिबि ने पूर्वकाल में क्या पाया।
श्लोक 10 (13.102.10)
यां गतिं लभते दत्त्वा द्विजस्यान्नं विशाम्पते । ततो विशिष्टां गच्छन्ति प्राणदा इति नः श्रुतं ॥
yāṃ gatiṃ labhate dattvā dvijasyānnaṃ viśāmpate | tato viśiṣṭāṃ gacchanti prāṇadā iti naḥ śrutaṃ
हे प्रजापालक, ब्राह्मण को अन्न देकर मनुष्य जो गति पाता है, प्राण देने वाले उससे भी उत्तम गति पाते हैं, ऐसा हमने सुना है।
श्लोक 11 (13.102.11)
अन्नं चापि प्रभवति पानीयात्कुरुसत्तम । नीरजातेन हि विना न किञ्चित्सम्प्रवर्तते ॥
annaṃ cāpi prabhavati pānīyātkurusattama | nīrajātena hi vinā na kiñcitsampravartate
हे कुरुश्रेष्ठ, अन्न भी जल से उत्पन्न होता है; जल से उत्पन्न वस्तु के बिना कुछ भी नहीं उपजता।
श्लोक 12 (13.102.12)
नीरजातश्च भगवान्सोमो ग्रहगणेश्वरः । अमृतं च सुधा चैव सुधा चैवामृतं तथा ॥
nīrajātaśca bhagavānsomo grahagaṇeśvaraḥ | amṛtaṃ ca sudhā caiva sudhā caivāmṛtaṃ tathā
ग्रहगणों के स्वामी भगवान् सोम भी जल से उत्पन्न हैं; अमृत और सुधा, सुधा और अमृत भी वहीं से हैं।
श्लोक 13 (13.102.13)
अन्नौषध्यो महाराज वीरुधश्च जलोद्भवाः । यतः प्राणभृतां प्राणाः सम्भवन्ति विशाम्पते ॥
annauṣadhyo mahārāja vīrudhaśca jalodbhavāḥ | yataḥ prāṇabhṛtāṃ prāṇāḥ sambhavanti viśāmpate
हे महाराज, अन्न, औषधियाँ और लताएँ जल से उत्पन्न होती हैं; और हे प्रजापालक, उन्हीं से प्राणियों के प्राण उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 14 (13.102.14)
देवानाममृतं ह्यन्नं नागानां च सुधा तथा । पितॄणां च स्वधा प्रोक्ता पशूनां चापि वीरुधः ॥
devānāmamṛtaṃ hyannaṃ nāgānāṃ ca sudhā tathā | pitṝṇāṃ ca svadhā proktā paśūnāṃ cāpi vīrudhaḥ
देवताओं के लिए अन्न अमृत है, नागों के लिए सुधा, पितरों के लिए स्वधा कहा गया है, और पशुओं के लिए वीरुध् (घास-पात) है।
श्लोक 15 (13.102.15)
अन्नमेव मनुष्याणां प्राणानाहुर्मनीषिणः । तच्च सर्वं नरव्याघ्र पानीयात्सम्प्रवर्तते ॥
annameva manuṣyāṇāṃ prāṇānāhurmanīṣiṇaḥ | tacca sarvaṃ naravyāghra pānīyātsampravartate
मनीषी कहते हैं कि मनुष्यों के लिए अन्न ही प्राण है; और हे नरव्याघ्र, वह सब जल से ही प्रकट होता है।
श्लोक 16 (13.102.16)
तस्मात्पानीयदानाद्वै न परं विद्यते क्वचित् । तच्च दद्यान्नरो नित्यं यदीच्छेद्भूतिमात्मनः ॥
tasmātpānīyadānādvai na paraṃ vidyate kvacit | tacca dadyānnaro nityaṃ yadīcchedbhūtimātmanaḥ
इसलिए जलदान से बढ़कर कहीं कुछ नहीं है; जो मनुष्य अपना कल्याण चाहे, उसे सदा जल देना चाहिए।
श्लोक 17 (13.102.17)
धन्यं यशस्यमायुष्यं जलदानमिहोच्यते । शत्रूंश्चाप्यधि कौन्तेय सदा तिष्ठति तोयदः ॥
dhanyaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ jaladānamihocyate | śatrūṃścāpyadhi kaunteya sadā tiṣṭhati toyadaḥ
जलदान धन, यश और आयु देने वाला कहा जाता है; और हे कुन्तीपुत्र, जल देने वाला सदा अपने शत्रुओं से ऊपर रहता है।
श्लोक 18 (13.102.18)
सर्वकामानवाप्नोति कीर्तिं चैव हि शाश्वतीम् । प्रेत्य चानन्त्यमश्नाति पापेभ्यश्च प्रमुच्यते ॥
sarvakāmānavāpnoti kīrtiṃ caiva hi śāśvatīm | pretya cānantyamaśnāti pāpebhyaśca pramucyate
वह सब कामनाएँ पाता है और शाश्वत कीर्ति भी; मरकर अनन्तता प्राप्त करता है और पापों से छूट जाता है।
श्लोक 19 (13.102.19)
तोयदो मनुजव्याघ्र स्वर्गं गत्वा महाद्युते । अक्षयान्समवाप्नोति लोकानित्यब्रवीन्मनुः ॥
toyado manujavyāghra svargaṃ gatvā mahādyute | akṣayānsamavāpnoti lokānityabravīnmanuḥ
हे नरव्याघ्र, हे महातेजस्वी, जल देने वाला स्वर्ग जाकर अक्षय लोक पाता है, ऐसा मनु ने कहा है।