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अनुशासन पर्व · अध्याय 103

यम और ब्राह्मण शर्मी का संवाद

तिल, दीप, अन्न और वस्त्र के दान के विषय में पूछे जाने पर भीष्म ब्राह्मण शर्मी की कथा सुनाते हैं, जिसे यम के दूत भूल से उसके नामराशि के स्थान पर ले आए थे। यम उसे तिल, जल, दीप और वस्त्र के दान और उनके फलों का उपदेश देकर घर लौटाते हैं; भीष्म आगे दीपदान, रत्न और वस्त्र के दान तथा विवाह और पुत्रलाभ की प्रशंसा करते हैं।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.103.1)

तिलानां कीदृशं दानमथ दीपस्य चैव हि । अन्नानां वाससां चैव भूय एव ब्रवीहि मे ॥

tilānāṃ kīdṛśaṃ dānamatha dīpasya caiva hi | annānāṃ vāsasāṃ caiva bhūya eva bravīhi me

तिल का दान कैसा है, और दीप, अन्न तथा वस्त्रों का दान कैसा? मुझे और बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (13.103.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । ब्राह्मणस्य च संवादं यमस्य च युधिष्ठिर ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | brāhmaṇasya ca saṃvādaṃ yamasya ca yudhiṣṭhira

इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं, हे युधिष्ठिर, एक ब्राह्मण और यम का संवाद।

श्लोक 3 (13.103.3)

मध्यदेशे महान्ग्रामो ब्राह्मणानां बभूव ह । गङ्गायमुनयोर्मध्ये यामुनस्य गिरेरधः ॥

madhyadeśe mahāngrāmo brāhmaṇānāṃ babhūva ha | gaṅgāyamunayormadhye yāmunasya gireradhaḥ

मध्यदेश में गंगा और यमुना के बीच, यमुना के पर्वत के नीचे, ब्राह्मणों का एक बड़ा गाँव था।

श्लोक 4 (13.103.4)

पर्णशालेति विख्यातो रमणीयो नराधिप । विद्वांसस्तत्र भूयिष्ठा ब्राह्मणाश्चावसंस्तथा ॥

parṇaśāleti vikhyāto ramaṇīyo narādhipa | vidvāṃsastatra bhūyiṣṭhā brāhmaṇāścāvasaṃstathā

हे नरेश, वह रमणीय गाँव पर्णशाला नाम से प्रसिद्ध था; वहाँ उस समय अधिकतर विद्वान् ब्राह्मण रहते थे।

श्लोक 5 (13.103.5)

अथ प्राह यमः कञ्चित्पुरुषं कृष्णवाससम् । रक्ताक्षमूर्ध्वरोमाणं काकजङ्घाक्षिनासिकम् ॥

atha prāha yamaḥ kañcitpuruṣaṃ kṛṣṇavāsasam | raktākṣamūrdhvaromāṇaṃ kākajaṅghākṣināsikam

तब यम ने काले वस्त्र पहने हुए एक पुरुष से कहा, जिसकी आँखें लाल थीं, रोएँ खड़े थे, और जिसकी पिंडलियाँ, आँखें और नाक कौए जैसी थीं।

श्लोक 6 (13.103.6)

गच्छ त्वं ब्राह्मणग्रामं ततो गत्वा तमानय । अगस्त्यं गोत्रतश्चापि नामतश्चापि शर्मिणम् ॥

gaccha tvaṃ brāhmaṇagrāmaṃ tato gatvā tamānaya | agastyaṃ gotrataścāpi nāmataścāpi śarmiṇam

तुम ब्राह्मणों के गाँव जाओ और वहाँ जाकर उसे ले आओ, जो गोत्र से अगस्त्य और नाम से शर्मी है।

श्लोक 7 (13.103.7)

शमे निविष्टं विद्वांसमध्यापकमनावृतम् । मा चान्यमानयेथास्त्वं सगोत्रं तस्य पार्श्वतः ॥

śame niviṣṭaṃ vidvāṃsamadhyāpakamanāvṛtam | mā cānyamānayethāstvaṃ sagotraṃ tasya pārśvataḥ

वह शान्ति में स्थित, विद्वान्, अध्यापक और निष्कपट है। उसके पास रहने वाले उसी के गोत्र के किसी दूसरे को मत ले आना।

श्लोक 8 (13.103.8)

स हि तादृग्गुणस्तेन तुल्योऽध्ययनजन्मना । अपत्येषु तथा वृत्ते समस्तेनैव धीमता । तमानय यथोद्दिष्टं पूजा कार्या हि तस्य मे ॥

sa hi tādṛgguṇastena tulyo'dhyayanajanmanā | apatyeṣu tathā vṛtte samastenaiva dhīmatā | tamānaya yathoddiṣṭaṃ pūjā kāryā hi tasya me

क्योंकि उसमें ऐसे ही गुण हैं; विद्या और जन्म में वह उस दूसरे के समान है, और वह बुद्धिमान् अपनी सन्तानों के प्रति भी सम व्यवहार रखता है। जैसा बताया, उसी को ले आओ, क्योंकि मुझे उसका सत्कार करना है।

श्लोक 9 (13.103.9)

स गत्वा प्रतिकूलं तच्चकार यमशासनम् । तमाक्रम्यानयामास प्रतिषिद्धो यमेन यः ॥

sa gatvā pratikūlaṃ taccakāra yamaśāsanam | tamākramyānayāmāsa pratiṣiddho yamena yaḥ

वह दूत गया, पर यम की आज्ञा के विरुद्ध कर बैठा: जिसे यम ने मना किया था, उसी को पकड़कर ले आया।

श्लोक 10 (13.103.10)

तस्मै यमः समुत्थाय पूजां कृत्वा च वीर्यवान् । प्रोवाच नीयतामेष सोऽन्य आनीयतामिति ॥

tasmai yamaḥ samutthāya pūjāṃ kṛtvā ca vīryavān | provāca nīyatāmeṣa so'nya ānīyatāmiti

पराक्रमी यम ने उठकर उसका सत्कार किया और कहा, "इसे वापस ले जाओ, और दूसरे को ले आओ।"

श्लोक 11 (13.103.11)

एवमुक्ते तु वचने धर्मराजेन स द्विजः । उवाच धर्मराजानं निर्विण्णोऽध्ययनेन वै । यो मे कालो भवेच्छेषस्तं वसेयमिहाच्युत ॥

evamukte tu vacane dharmarājena sa dvijaḥ | uvāca dharmarājānaṃ nirviṇṇo'dhyayanena vai | yo me kālo bhaveccheṣastaṃ vaseyamihācyuta

धर्मराज के ऐसा कहने पर वह ब्राह्मण, जो अध्ययन से ऊब चुका था, धर्मराज से बोला, "हे अच्युत, मेरा जो समय शेष हो, उसे मैं यहीं बिताऊँ।"

यम उवाच

श्लोक 12 (13.103.12)

नाहं कालस्य विहितं प्राप्नोमीह कथञ्चन । यो हि धर्मं चरति वै तं तु जानामि केवलम् ॥

nāhaṃ kālasya vihitaṃ prāpnomīha kathañcana | yo hi dharmaṃ carati vai taṃ tu jānāmi kevalam

मैं यहाँ किसी प्रकार भी काल का विहित भाग (तुम्हारी आयु का नियत समय) नहीं पाता; मैं तो केवल उसी को जानता हूँ जो धर्म का आचरण करता है।

श्लोक 13 (13.103.13)

गच्छ विप्र त्वमद्यैव आलयं स्वं महाद्युते । ब्रूहि सर्वं यथा स्वैरं करवाणि किमच्युत ॥

gaccha vipra tvamadyaiva ālayaṃ svaṃ mahādyute | brūhi sarvaṃ yathā svairaṃ karavāṇi kimacyuta

हे महातेजस्वी विप्र, तुम आज ही अपने घर जाओ; अथवा जैसी इच्छा हो सब कहो, हे अच्युत, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 14 (13.103.14)

शुद्धदानं च सुमहत्पुण्यं स्यात्तद्ब्रवीहि मे । सर्वस्य हि प्रमाणं त्वं त्रैलोक्यस्यापि सत्तम ॥

śuddhadānaṃ ca sumahatpuṇyaṃ syāttadbravīhi me | sarvasya hi pramāṇaṃ tvaṃ trailokyasyāpi sattama

मुझे बताइए कि कौन-सा शुद्ध दान मुझे अत्यन्त महान् पुण्य देगा; क्योंकि हे सत्तम, आप सबके, तीनों लोकों के भी प्रमाण हैं।

यम उवाच

श्लोक 15 (13.103.15)

शृणु तत्त्वेन विप्रर्षे प्रदानविधिमुत्तमम् । तिलाः परमकं दानं पुण्यं चैवेह शाश्वतम् ॥

śṛṇu tattvena viprarṣe pradānavidhimuttamam | tilāḥ paramakaṃ dānaṃ puṇyaṃ caiveha śāśvatam

हे विप्रर्षि, दान की उत्तम विधि को यथार्थ रूप से सुनो। तिल परम दान है, और उसका पुण्य शाश्वत है।

श्लोक 16 (13.103.16)

तिलाश्च सम्प्रदातव्या यथाशक्ति द्विजर्षभ । नित्यदानात्सर्वकामांस्तिला निर्वर्तयन्त्युत ॥

tilāśca sampradātavyā yathāśakti dvijarṣabha | nityadānātsarvakāmāṃstilā nirvartayantyuta

हे द्विजश्रेष्ठ, तिल यथाशक्ति देने चाहिए; नित्य दान करने से तिल सब कामनाएँ पूरी करते हैं।

श्लोक 17 (13.103.17)

तिलाञ्श्राद्धे प्रशंसन्ति दानमेतद्ध्यनुत्तमम् । तान्प्रयच्छस्व विप्रेभ्यो विधिदृष्टेन कर्मणा ॥

tilāñśrāddhe praśaṃsanti dānametaddhyanuttamam | tānprayacchasva viprebhyo vidhidṛṣṭena karmaṇā

श्राद्ध में तिलों की प्रशंसा की जाती है; यह दान अनुपम है। शास्त्रविहित विधि से इसे ब्राह्मणों को दो।

श्लोक 18 (13.103.18)

वैशाख्यां पौर्णमास्यां तु तिलान्दद्याद्द्विजातिषु । तिला भक्षयितव्याश्च सदा त्वालम्भं च तैः ॥

vaiśākhyāṃ paurṇamāsyāṃ tu tilāndadyāddvijātiṣu | tilā bhakṣayitavyāśca sadā tvālambhaṃ ca taiḥ

वैशाख की पूर्णिमा को द्विजों को तिल देने चाहिए; और तिल सदा खाने चाहिए तथा उनसे शरीर का उबटन भी करना चाहिए।

श्लोक 19 (13.103.19)

कार्यं सततमिच्छद्भिः श्रेयः सर्वात्मना गृहे । तथाऽऽपः सर्वदा देयाः पेयाश्चैव न संशयः ॥

kāryaṃ satatamicchadbhiḥ śreyaḥ sarvātmanā gṛhe | tathā''paḥ sarvadā deyāḥ peyāścaiva na saṃśayaḥ

कल्याण चाहने वालों को घर पर सदा पूरे मन से यह करना चाहिए; इसी प्रकार जल सदा देना चाहिए और पीना भी चाहिए, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 20 (13.103.20)

पुष्करिण्यस्तटाकानि कूपांश्चैवात्र खानयेत् । एतत्सुदुर्लभतरमिह लोके द्विजोत्तम ॥

puṣkariṇyastaṭākāni kūpāṃścaivātra khānayet | etatsudurlabhataramiha loke dvijottama

यहाँ पोखर, तालाब और कुएँ खुदवाने चाहिए। हे द्विजोत्तम, इस लोक में यह अत्यन्त दुर्लभ है।

श्लोक 21 (13.103.21)

आपो नित्यं प्रदेयास्ते पुण्यं ह्येतदनुत्तमम् । प्रपाश्च कार्या दानार्थं नित्यं ते द्विजसत्तम । भुक्तेऽप्यथ प्रदेयं तु पानीयं वै विशेषतः ॥

āpo nityaṃ pradeyāste puṇyaṃ hyetadanuttamam | prapāśca kāryā dānārthaṃ nityaṃ te dvijasattama | bhukte'pyatha pradeyaṃ tu pānīyaṃ vai viśeṣataḥ

तुम्हें नित्य जल देना चाहिए; यह पुण्य अनुपम है। हे द्विजश्रेष्ठ, तुम्हें दान के लिए सदा प्याऊ भी बनवाने चाहिए; और भोजन कर चुके व्यक्ति को भी विशेष रूप से जल देना चाहिए।

श्लोक 22 (13.103.22)

पानीयाभ्यर्थिनं दृष्ट्वा प्रीत्या दत्त्वा त्वरान्वितः । वस्त्रे तन्तुप्रमाणेन दीपे निमिषवत्सरम् ॥

pānīyābhyarthinaṃ dṛṣṭvā prītyā dattvā tvarānvitaḥ | vastre tantupramāṇena dīpe nimiṣavatsaram

जल माँगने वाले को देखकर प्रसन्नता से तुरन्त जल देना। वस्त्र में उसके तन्तुओं के बराबर फल होता है; दीप में पलक झपकने की संख्या के बराबर वर्ष।

श्लोक 23 (13.103.23)

गवां रोमप्रमाणेन स्वर्गभोगमुपाश्नुते । जलबिन्दुप्रमाणेन तदेतान्युपवर्तय ॥

gavāṃ romapramāṇena svargabhogamupāśnute | jalabindupramāṇena tadetānyupavartaya

गौ के दान में उसके शरीर के रोमों के बराबर वर्ष स्वर्ग का भोग मिलता है; जल में बूँदों के बराबर। इसलिए इनका आचरण करो।

भीष्म उवाच

श्लोक 24 (13.103.24)

इत्युक्ते स तदा तेन यमदूतेन वै गृहान् । नीतश्च कारयामास सर्वं तद्यमशासनम् ॥

ityukte sa tadā tena yamadūtena vai gṛhān | nītaśca kārayāmāsa sarvaṃ tadyamaśāsanam

ऐसा कहे जाने पर उस ब्राह्मण को यम का दूत उसके घर ले गया, और उसने यम की सब आज्ञाओं का पालन किया।

श्लोक 25 (13.103.25)

नीत्वा तं यमदूतोऽपि गृहीत्वा शर्मिणं तदा । ययौ स धर्मराजाय न्यवेदयत चापि तम् ॥

nītvā taṃ yamadūto'pi gṛhītvā śarmiṇaṃ tadā | yayau sa dharmarājāya nyavedayata cāpi tam

उसे घर पहुँचाकर यम का दूत फिर शर्मी को लेकर धर्मराज के पास गया और उसे प्रस्तुत किया।

श्लोक 26 (13.103.26)

तं धर्मराजो धर्मज्ञं पूजयित्वा प्रतापवान् । कृत्वा च संविदं तेन विससर्ज यथागतम् ॥

taṃ dharmarājo dharmajñaṃ pūjayitvā pratāpavān | kṛtvā ca saṃvidaṃ tena visasarja yathāgatam

प्रतापी धर्मराज ने उस धर्मज्ञ का सत्कार किया, उससे सन्धि की, और उसे जैसे आया था वैसे ही विदा कर दिया।

श्लोक 27 (13.103.27)

तस्यापि च यमः सर्वमुपदेशं चकार ह । प्रेत्यैत्य च ततः सर्वं चकारोक्तं यमेन तत् ॥

tasyāpi ca yamaḥ sarvamupadeśaṃ cakāra ha | pretyaitya ca tataḥ sarvaṃ cakāroktaṃ yamena tat

यम ने उसे भी पूरा उपदेश दिया; और लौटकर उसने यम के कहे अनुसार सब किया।

श्लोक 28 (13.103.28)

तथा प्रशंसते दीपान्यमः पितृहितेप्सया । तस्माद्दीपप्रदो नित्यं सन्तारयति वै पितॄन् ॥

tathā praśaṃsate dīpānyamaḥ pitṛhitepsayā | tasmāddīpaprado nityaṃ santārayati vai pitṝn

इस प्रकार यम पितरों के हित की इच्छा से दीपों की प्रशंसा करते हैं; इसलिए दीप देने वाला सदा अपने पितरों को तार देता है।

श्लोक 29 (13.103.29)

दातव्याः सततं दीपास्तस्माद्भरतसत्तम । देवतानां पितॄणां च चक्षुष्यं चात्मनां विभो ॥

dātavyāḥ satataṃ dīpāstasmādbharatasattama | devatānāṃ pitṝṇāṃ ca cakṣuṣyaṃ cātmanāṃ vibho

इसलिए हे भरतश्रेष्ठ, दीप सदा देने चाहिए; हे विभो, वे देवताओं, पितरों और अपनी आँखों के लिए हितकर हैं।

श्लोक 30 (13.103.30)

रत्नदानं च सुमहत्पुण्यमुक्तं जनाधिप । यस्तान्विक्रीय यजते ब्राह्मणो ह्यभयंकरम् ॥

ratnadānaṃ ca sumahatpuṇyamuktaṃ janādhipa | yastānvikrīya yajate brāhmaṇo hyabhayaṃkaram

हे जनाधिप, रत्नों का दान भी अत्यन्त पुण्यदायी कहा गया है। जो ब्राह्मण उन्हें बेचकर यज्ञ करता है, वह अभय करने वाला होता है।

श्लोक 31 (13.103.31)

यद्वै ददाति विप्रेभ्यो ब्राह्मणः प्रतिगृह्य वै । उभयोः स्यात्तदक्षय्यं दातुरादातुरेव च ॥

yadvai dadāti viprebhyo brāhmaṇaḥ pratigṛhya vai | ubhayoḥ syāttadakṣayyaṃ dāturādātureva ca

जो कुछ ब्राह्मण प्रतिग्रह में पाकर ब्राह्मणों को दे देता है, उसका पुण्य देने वाले और लेने वाले, दोनों के लिए अक्षय होता है।

श्लोक 32 (13.103.32)

यो ददाति स्थितः स्थित्यां तादृशाय प्रतिग्रहम् । उभयोरक्षयं धर्मं तं मनुः प्राह धर्मवित् ॥

yo dadāti sthitaḥ sthityāṃ tādṛśāya pratigraham | ubhayorakṣayaṃ dharmaṃ taṃ manuḥ prāha dharmavit

जो अपनी मर्यादा में स्थित रहकर योग्य पात्र को दान देता है, उससे दोनों को अक्षय धर्म मिलता है, ऐसा धर्मज्ञ मनु ने कहा है।

श्लोक 33 (13.103.33)

वाससां सम्प्रदानेन स्वदारनिरतो नरः । सुवस्त्रश्च सुवेषश्च भवतीत्यनुशुश्रुम ॥

vāsasāṃ sampradānena svadāranirato naraḥ | suvastraśca suveṣaśca bhavatītyanuśuśruma

वस्त्र दान करने से अपनी ही पत्नी में अनुरक्त पुरुष सुन्दर वस्त्र और सुन्दर वेश वाला होता है, ऐसा हमने सुना है।

श्लोक 34 (13.103.34)

गावः सुवर्णं च तथा तिलाश्चैवानुवर्णिताः । बहुशः पुरुषव्याघ्र वेदप्रामाण्यदर्शनात् ॥

gāvaḥ suvarṇaṃ ca tathā tilāścaivānuvarṇitāḥ | bahuśaḥ puruṣavyāghra vedaprāmāṇyadarśanāt

हे पुरुषव्याघ्र, गौओं, सोने और तिलों का वर्णन बहुत बार किया गया है, क्योंकि उनमें वेद का प्रमाण दिखाई देता है।

श्लोक 35 (13.103.35)

विवाहांश्चैव कुर्वीत पुत्रानुत्पादयेत च । पुत्रलाभो हि कौरव्य सर्वलाभाद्विशिष्यते ॥

vivāhāṃścaiva kurvīta putrānutpādayeta ca | putralābho hi kauravya sarvalābhādviśiṣyate

मनुष्य को विवाह करना चाहिए और पुत्र उत्पन्न करने चाहिए; क्योंकि हे कौरव्य, पुत्रलाभ सब लाभों से बढ़कर है।

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