अनुशासन पर्व · अध्याय 99
नक्षत्रों के अनुसार दान: नारद और देवकी
युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्म द्वारका में हुआ नारद और देवकी का संवाद सुनाते हैं। नारद कृत्तिका से भरणी तक प्रत्येक नक्षत्र में दिए जाने वाले दान (खीर, गाय, सोना, बैल, रथ, सुगन्ध, कम्बल आदि) और उनसे इस लोक तथा परलोक में मिलने वाले फल क्रम से बताते हैं। देवकी ने यही उपदेश अपनी पुत्रवधुओं को सुनाया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.99.1)
श्रुतं मे भवतो वाक्यमन्नदानस्य यो विधिः । नक्षत्रयोगस्येदानीं दानकल्पं ब्रवीहि मे ॥
śrutaṃ me bhavato vākyamannadānasya yo vidhiḥ | nakṣatrayogasyedānīṃ dānakalpaṃ bravīhi me
मैंने अन्नदान के विधान पर आपके वचन सुन लिए। अब नक्षत्रों के योग के अनुसार दान के नियम मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.99.2)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । देवक्याश्चैव संवादं देवर्षेर्नारदस्य च ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | devakyāścaiva saṃvādaṃ devarṣernāradasya ca
इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं: देवकी और देवर्षि नारद का संवाद।
श्लोक 3 (13.99.3)
द्वारकामनुसम्प्राप्तं नारदं देवदर्शनम् । पप्रच्छेदं वचः प्रश्नं देवकी धर्मदर्शिनी ॥
dvārakāmanusamprāptaṃ nāradaṃ devadarśanam | papracchedaṃ vacaḥ praśnaṃ devakī dharmadarśinī
जब देवों के दर्शन करने वाले नारद द्वारका आए, तब धर्म को जानने वाली देवकी ने उनसे यह प्रश्न पूछा।
श्लोक 4 (13.99.4)
तस्याः सम्पृच्छमानाया देवर्षिर्नारदस्ततः । आचष्ट विधिवत्सर्वं तच्छृणुष्व विशाम्पते ॥
tasyāḥ sampṛcchamānāyā devarṣirnāradastataḥ | ācaṣṭa vidhivatsarvaṃ tacchṛṇuṣva viśāmpate
जब वह पूछ रही थी, तब देवर्षि नारद ने सब कुछ विधिपूर्वक समझाया। हे प्रजापालक! उसे सुनो।
नारद उवाच
श्लोक 5 (13.99.5)
कृत्तिकासु महाभागे पायसेन ससर्पिषा । सन्तर्प्य ब्राह्मणान्साधूँल्लोकानाप्नोत्यनुत्तमान् ॥
kṛttikāsu mahābhāge pāyasena sasarpiṣā | santarpya brāhmaṇānsādhūm̐llokānāpnotyanuttamān
हे महाभागे! कृत्तिका नक्षत्र में जो मनुष्य खीर और घी से सज्जन ब्राह्मणों को तृप्त करता है, वह उत्तम लोकों को प्राप्त करता है।
श्लोक 6 (13.99.6)
रोहिण्यां प्रसृतैर्मार्गैर्मांसैरन्नेन सर्पिषा । पयोऽन्नपानं दातव्यमनृणार्थं द्विजातये ॥
rohiṇyāṃ prasṛtairmārgairmāṃsairannena sarpiṣā | payo'nnapānaṃ dātavyamanṛṇārthaṃ dvijātaye
रोहिणी नक्षत्र में ऋण से मुक्त होने के लिए ब्राह्मण को मुट्ठी भर मृगमांस, अन्न और घी तथा दूध, अन्न और पेय देना चाहिए।
श्लोक 7 (13.99.7)
दोग्ध्रीं दत्त्वा सवत्सां तु नक्षत्रे सोमदैवते । गच्छन्ति मानुषाल्लोकात्स्वर्गलोकमनुत्तमम् ॥
dogdhrīṃ dattvā savatsāṃ tu nakṣatre somadaivate | gacchanti mānuṣāllokātsvargalokamanuttamam
सोम देवता वाले नक्षत्र में बछड़े सहित दूध देने वाली गाय का दान करके लोग मनुष्य-लोक से सर्वोत्तम स्वर्गलोक को जाते हैं।
श्लोक 8 (13.99.8)
आर्द्रायां कृसरं दत्त्वा तिलमिश्रमुपोषितः । नरस्तरति दुर्गाणि क्षुरधारांश्च पर्वतान् ॥
ārdrāyāṃ kṛsaraṃ dattvā tilamiśramupoṣitaḥ | narastarati durgāṇi kṣuradhārāṃśca parvatān
आर्द्रा नक्षत्र में उपवास करके तिल मिली खिचड़ी (कृसर) का दान करने वाला मनुष्य कठिन स्थानों को और उस्तरे की धार जैसी चोटियों वाले पर्वतों को भी पार कर जाता है।
श्लोक 9 (13.99.9)
पूपान्पुनर्वसौ दत्त्वा तथैवान्नानि शोभने । यशस्वी रूपसम्पन्नो बह्वन्नो जायते कुले ॥
pūpānpunarvasau dattvā tathaivānnāni śobhane | yaśasvī rūpasampanno bahvanno jāyate kule
पुनर्वसु नक्षत्र में पूए और अन्य भोजन देकर वह उस शुभ नक्षत्र में अन्न-सम्पन्न कुल में यशस्वी और रूपवान् होकर जन्म लेता है।
श्लोक 10 (13.99.10)
पुष्येण कनकं दत्त्वा कृतं वाऽकृतमेव च । अनालोकेषु लोकेषु सोमवत्स विराजते ॥
puṣyeṇa kanakaṃ dattvā kṛtaṃ vā'kṛtameva ca | anālokeṣu lokeṣu somavatsa virājate
पुष्य नक्षत्र में सोना देकर, चाहे वह गढ़ा हुआ हो या बिना गढ़ा, वह उन लोकों में चन्द्रमा के समान चमकता है जहाँ कोई दूसरा प्रकाश नहीं है।
श्लोक 11 (13.99.11)
आश्लेषायां तु यो रूप्यमृषभं वा प्रयच्छति । स सर्पभयनिर्मुक्तः सम्भवानधितिष्ठति ॥
āśleṣāyāṃ tu yo rūpyamṛṣabhaṃ vā prayacchati | sa sarpabhayanirmuktaḥ sambhavānadhitiṣṭhati
जो आश्लेषा नक्षत्र में चाँदी या बैल का दान करता है, वह सर्पों के भय से मुक्त हो जाता है और आने वाली सब विपत्तियों से ऊपर उठ जाता है।
श्लोक 12 (13.99.12)
मघासु तिलपूर्णानि वर्धमानानि मानवः । प्रदाय पुत्रपशुमानिह प्रेत्य च मोदते ॥
maghāsu tilapūrṇāni vardhamānāni mānavaḥ | pradāya putrapaśumāniha pretya ca modate
मघा नक्षत्र में जो मनुष्य तिल से भरे ऊपर तक भरे हुए पात्र दान करता है, वह पुत्र और पशु पाता है तथा यहाँ और मरकर भी आनन्द भोगता है।
श्लोक 13 (13.99.13)
फल्गुनीपूर्वसमये ब्राह्मणानामुपोषितः । भक्ष्यान्फाणितसंयुक्तान्दत्त्वा सौभाग्यमृच्छति ॥
phalgunīpūrvasamaye brāhmaṇānāmupoṣitaḥ | bhakṣyānphāṇitasaṃyuktāndattvā saubhāgyamṛcchati
पूर्वाफाल्गुनी के समय उपवास करके जो ब्राह्मणों को राब मिले मिष्टान्न देता है, उसे सौभाग्य मिलता है।
श्लोक 14 (13.99.14)
घृतक्षीरसमायुक्तं विधिवत्षष्टिकौदनम् । उत्तराविषये दत्त्वा स्वर्गलोके महीयते ॥
ghṛtakṣīrasamāyuktaṃ vidhivatṣaṣṭikaudanam | uttarāviṣaye dattvā svargaloke mahīyate
उत्तराफाल्गुनी में घी और दूध मिला हुआ साठी चावल का भात विधिपूर्वक देकर वह स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 15 (13.99.15)
यद्यत्प्रदीयते दानमुत्तराविषये नरैः । महाफलमनन्तं तद्भवतीति विनिश्चयः ॥
yadyatpradīyate dānamuttarāviṣaye naraiḥ | mahāphalamanantaṃ tadbhavatīti viniścayaḥ
उत्तरा नक्षत्र में मनुष्य जो भी दान करते हैं, वह महान् फल देने वाला और अनन्त होता है; यह निश्चित है।
श्लोक 16 (13.99.16)
हस्ते हस्तिरथं दत्त्वा चतुर्युक्तमुपोषितः । प्राप्नोति परमाँल्लोकान्पुण्यकामसमन्वितान् ॥
haste hastirathaṃ dattvā caturyuktamupoṣitaḥ | prāpnoti paramām̐llokānpuṇyakāmasamanvitān
हस्त नक्षत्र में उपवास करके चार से जुता हुआ हस्ति-रथ दान करने वाला मनुष्य पुण्य की सब कामनाओं से भरे उत्तम लोकों को पाता है।
श्लोक 17 (13.99.17)
चित्रायां वृषभं दत्त्वा पुण्यगन्धांश्च भारत । चरन्त्यप्सरसां लोके रमन्ते नन्दने तथा ॥
citrāyāṃ vṛṣabhaṃ dattvā puṇyagandhāṃśca bhārata | carantyapsarasāṃ loke ramante nandane tathā
हे भारत! चित्रा नक्षत्र में बैल और पवित्र सुगन्धित द्रव्य देकर वह अप्सराओं के लोक में विचरता है और नन्दन वन में आनन्द करता है।
श्लोक 18 (13.99.18)
स्वात्यामथ धनं दत्त्वा यदिष्टतममात्मनः । प्राप्नोति लोकान्स शुभानिह चैव महद्यशः ॥
svātyāmatha dhanaṃ dattvā yadiṣṭatamamātmanaḥ | prāpnoti lokānsa śubhāniha caiva mahadyaśaḥ
स्वाति नक्षत्र में अपना जो धन सबसे प्रिय हो, उसे देकर वह शुभ लोकों को और यहाँ महान् यश को पाता है।
श्लोक 19 (13.99.19)
विशाखायामनड्वाहं धेनुं दत्त्वा च दुग्धदाम् । सप्रासङ्गं च शकटं सधान्यं वस्त्रसंयुतम् ॥
viśākhāyāmanaḍvāhaṃ dhenuṃ dattvā ca dugdhadām | saprāsaṅgaṃ ca śakaṭaṃ sadhānyaṃ vastrasaṃyutam
विशाखा नक्षत्र में हल या गाड़ी खींचने वाला बैल, दूध देने वाली गाय, ढके हुए अन्न-सहित शकट और वस्त्र देकर,
श्लोक 20 (13.99.20)
पितॄन्देवांश्च प्रीणाति प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते । न च दुर्गाण्यवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥
pitṝndevāṃśca prīṇāti pretya cānantyamaśnute | na ca durgāṇyavāpnoti svargalokaṃ ca gacchati
वह पितरों और देवताओं को प्रसन्न करता है, मरकर अनन्त फल भोगता है, कठिनाइयों में नहीं पड़ता और स्वर्गलोक जाता है।
श्लोक 21 (13.99.21)
दत्त्वा यथोक्तं विप्रेभ्यो वृत्तिमिष्टां स विन्दति । नरकादींश्च संक्लेशान्नाप्नोतीति विनिश्चयः ॥
dattvā yathoktaṃ viprebhyo vṛttimiṣṭāṃ sa vindati | narakādīṃśca saṃkleśānnāpnotīti viniścayaḥ
ब्राह्मणों को विधि के अनुसार दान देकर वह मनचाही आजीविका पाता है और नरक आदि कष्टों को नहीं भोगता; यह निश्चित है।
श्लोक 22 (13.99.22)
अनुराधासु प्रावरं वरान्नं समुपोषितः । दत्त्वा युगशतं चापि नरः स्वर्गे महीयते ॥
anurādhāsu prāvaraṃ varānnaṃ samupoṣitaḥ | dattvā yugaśataṃ cāpi naraḥ svarge mahīyate
अनुराधा नक्षत्र में उपवास करके जो चादर और उत्तम अन्न, अथवा सौ जोड़े भी दान करता है, वह स्वर्ग में सम्मान पाता है।
श्लोक 23 (13.99.23)
कालशाकं तु विप्रेभ्यो दत्त्वा मर्त्यः समूलकम् । ज्येष्ठायामृद्धिमिष्टां वै गतिमिष्टां स गच्छति ॥
kālaśākaṃ tu viprebhyo dattvā martyaḥ samūlakam | jyeṣṭhāyāmṛddhimiṣṭāṃ vai gatimiṣṭāṃ sa gacchati
जो मनुष्य ज्येष्ठा नक्षत्र में ब्राह्मणों को जड़ सहित कालशाक देता है, वह मनचाही समृद्धि और मनचाही गति पाता है।
श्लोक 24 (13.99.24)
मूले मूलफलं दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यः समाहितः । पितॄन्प्रीणयते चापि गतिमिष्टां च गच्छति ॥
mūle mūlaphalaṃ dattvā brāhmaṇebhyaḥ samāhitaḥ | pitṝnprīṇayate cāpi gatimiṣṭāṃ ca gacchati
मूल नक्षत्र में एकाग्र मन से ब्राह्मणों को कन्द-मूल और फल देकर वह पितरों को प्रसन्न करता है और मनचाही गति को जाता है।
श्लोक 25 (13.99.25)
अथ पूर्वास्वषाढासु दधिपात्राण्युपोषितः । कुलवृत्तोपसम्पन्ने ब्राह्मणे वेदपारगे ॥
atha pūrvāsvaṣāḍhāsu dadhipātrāṇyupoṣitaḥ | kulavṛttopasampanne brāhmaṇe vedapārage
फिर पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में उपवास करके कुलीन और सदाचारी, वेदपारंगत ब्राह्मण को दही के पात्र दान करता है,
श्लोक 26 (13.99.26)
प्रदाय जायते प्रेत्य कुले सुबहुगोधने । उदमन्थं ससर्पिष्कं प्रभूतमधुफाणितम् ॥
pradāya jāyate pretya kule subahugodhane | udamanthaṃ sasarpiṣkaṃ prabhūtamadhuphāṇitam
और मरकर बहुत गौओं वाले कुल में जन्म लेता है। जल में घोले हुए सत्तू का पेय (उदमन्थ), घी, बहुत-सा मधु और राब देकर,
श्लोक 27 (13.99.27)
दत्त्वोत्तरास्वषाढासु सर्वकामानवाप्नुयात् । दुग्धं त्वभिजिते योगे दत्त्वा मधुघृतप्लुतम् । धर्मनित्यो मनीषिभ्यः स्वर्गलोके महीयते ॥
dattvottarāsvaṣāḍhāsu sarvakāmānavāpnuyāt | dugdhaṃ tvabhijite yoge dattvā madhughṛtaplutam | dharmanityo manīṣibhyaḥ svargaloke mahīyate
उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में वह सब कामनाएँ पा लेता है। और जो सदा धर्म में लगा रहने वाला मनुष्य अभिजित् के योग में मधु और घी से भीगा दूध विद्वानों को देता है, वह स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 28 (13.99.28)
श्रवणे कम्बलं दत्त्वा वस्त्रान्तरितमेव वा । श्वेतेन याति यानेन स्वर्गलोकानसंवृतान् ॥
śravaṇe kambalaṃ dattvā vastrāntaritameva vā | śvetena yāti yānena svargalokānasaṃvṛtān
श्रवण नक्षत्र में कम्बल, अथवा वस्त्र में लपेटा हुआ कम्बल, देकर वह श्वेत यान से अबाध स्वर्गलोकों में जाता है।
श्लोक 29 (13.99.29)
गोप्रयुक्तं धनिष्ठासु यानं दत्त्वा समाहितः । वस्त्रराशिधनं सद्यः प्रेत्य राज्यं प्रपद्यते ॥
goprayuktaṃ dhaniṣṭhāsu yānaṃ dattvā samāhitaḥ | vastrarāśidhanaṃ sadyaḥ pretya rājyaṃ prapadyate
धनिष्ठा नक्षत्र में एकाग्र मन से बैलों से जुता हुआ यान देकर वह मरने के बाद शीघ्र ही वस्त्रों की राशि और धन से सम्पन्न राज्य पाता है।
श्लोक 30 (13.99.30)
गन्धाञ्शतभिषग्योगे दत्त्वा सागरुचन्दनान् । प्राप्नोत्यप्सरसां सङ्घान्प्रेत्य गन्धांश्च शाश्वतान् ॥
gandhāñśatabhiṣagyoge dattvā sāgarucandanān | prāpnotyapsarasāṃ saṅghānpretya gandhāṃśca śāśvatān
शतभिषा के योग में अगरु और चन्दन के साथ सुगन्धित द्रव्य देकर वह मरने के बाद अप्सराओं के समूहों को और शाश्वत सुगन्धों को पाता है।
श्लोक 31 (13.99.31)
पूर्वप्रोष्ठपदायोगे राजमाषान्प्रदाय तु । सर्वभक्षफलोपेतः स वै प्रेत्य सुखी भवेत् ॥
pūrvaproṣṭhapadāyoge rājamāṣānpradāya tu | sarvabhakṣaphalopetaḥ sa vai pretya sukhī bhavet
पूर्वाभाद्रपदा के योग में राजमाष (लोबिया) देकर वह सब प्रकार के भोज्य और फलों से युक्त होकर मरने के बाद सुखी होता है।
श्लोक 32 (13.99.32)
औरभ्रमुत्तरायोगे यस्तु मांसं प्रयच्छति । स पितॄन्प्रीणयति वै प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ॥
aurabhramuttarāyoge yastu māṃsaṃ prayacchati | sa pitṝnprīṇayati vai pretya cānantyamaśnute
जो उत्तरा के योग में मेढ़े का मांस देता है, वह पितरों को तृप्त करता है और मरने के बाद अनन्त फल पाता है।
श्लोक 33 (13.99.33)
कांस्योपदोहनां धेनुं रेवत्यां यः प्रयच्छति । सा प्रेत्य कामानादाय दातारमुपतिष्ठति ॥
kāṃsyopadohanāṃ dhenuṃ revatyāṃ yaḥ prayacchati | sā pretya kāmānādāya dātāramupatiṣṭhati
जो रेवती नक्षत्र में काँसे की दोहनी सहित गाय देता है, वह गाय मरने के बाद उसकी सब कामनाएँ लेकर दाता के पास आती है।
श्लोक 34 (13.99.34)
रथमश्वसमायुक्तं दत्त्वाऽश्विन्यां नरोत्तमः । हस्त्यश्वरथसम्पन्ने वर्चस्वी जायते कुले ॥
rathamaśvasamāyuktaṃ dattvā'śvinyāṃ narottamaḥ | hastyaśvarathasampanne varcasvī jāyate kule
अश्विनी नक्षत्र में जो श्रेष्ठ पुरुष घोड़ों से जुता रथ दान करता है, वह हाथी, घोड़े और रथों से सम्पन्न तेजस्वी कुल में जन्म लेता है।
श्लोक 35 (13.99.35)
भरणीषु द्विजातिभ्यस्तिलधेनुं प्रदाय वै । गाः सुप्रभूताः प्राप्नोति नरः प्रेत्य यशस्तथा ॥
bharaṇīṣu dvijātibhyastiladhenuṃ pradāya vai | gāḥ suprabhūtāḥ prāpnoti naraḥ pretya yaśastathā
भरणी नक्षत्र में जो ब्राह्मणों को तिल की धेनु देता है, वह बहुत-सी गौएँ पाता है और मरने के बाद यश भी।
भीष्म उवाच
श्लोक 36 (13.99.36)
इत्येष लक्षणोद्देशः प्रोक्तो नक्षत्रयोगतः । देवक्या नारदेनेह सा स्नुषाभ्योऽब्रवीदिदम् ॥
ityeṣa lakṣaṇoddeśaḥ prokto nakṣatrayogataḥ | devakyā nāradeneha sā snuṣābhyo'bravīdidam
इस प्रकार नक्षत्रों के योग के अनुसार दानों का यह संक्षिप्त निर्देश नारद ने देवकी को बताया, और उसने इसे अपनी पुत्रवधुओं से कहा।