अनुशासन पर्व · अध्याय 98
अन्नदान की महिमा
युधिष्ठिर पूछते हैं कि राजा को गुणवान् ब्राह्मणों को कौन-से दान देने चाहिए। भीष्म नारद का उपदेश सुनाते हैं: अन्नदान सब दानों में श्रेष्ठ है, क्योंकि प्राण, संसार और यज्ञ सब अन्न पर ही टिके हैं; अन्न देने वाले को इस लोक और परलोक में पुण्य मिलता है। अन्त में भीष्म युधिष्ठिर को अन्नदान की प्रेरणा देते हैं और अन्नदाताओं के स्वर्गीय भवनों का वर्णन करते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.98.1)
कानि दानानि लोकेऽस्मिन्दातुकामो महीपतिः । गुणाधिकेभ्यो विप्रेभ्यो दद्याद्भरतसत्तम ॥
kāni dānāni loke'smindātukāmo mahīpatiḥ | guṇādhikebhyo viprebhyo dadyādbharatasattama
हे भरतश्रेष्ठ! इस लोक में दान देने की इच्छा रखने वाला राजा गुणों में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को कौन-कौन से दान दे?
श्लोक 2 (13.98.2)
केन तुष्यन्ति ते सद्यः किं तुष्टाः प्रदिशन्ति च । शंस मे तन्महाबाहो फलं पुण्यकृतं महत् ॥
kena tuṣyanti te sadyaḥ kiṃ tuṣṭāḥ pradiśanti ca | śaṃsa me tanmahābāho phalaṃ puṇyakṛtaṃ mahat
वे किस वस्तु से तुरंत प्रसन्न होते हैं, और प्रसन्न होकर क्या प्रदान करते हैं? हे महाबाहो! मुझे यह बताइए, और पुण्य कर्म का जो महान् फल है, वह भी कहिए।
श्लोक 3 (13.98.3)
दत्तं किं फलवद्राजन्निह लोके परत्र च । भवतः श्रोतुमिच्छामि तन्मे विस्तरतो वद ॥
dattaṃ kiṃ phalavadrājanniha loke paratra ca | bhavataḥ śrotumicchāmi tanme vistarato vada
हे राजन्! कौन-सा दान इस लोक और परलोक दोनों में फल देने वाला है? मैं आपसे यह सुनना चाहता हूँ; मुझे विस्तार से बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 4 (13.98.4)
इममर्थं पुरा पृष्टो नारदो देवदर्शनः । यदुक्तवानसौ वाक्यं तन्मे निगदतः शृणु ॥
imamarthaṃ purā pṛṣṭo nārado devadarśanaḥ | yaduktavānasau vākyaṃ tanme nigadataḥ śṛṇu
प्राचीन काल में देवताओं के दर्शन करने वाले नारद से यही प्रश्न पूछा गया था। उन्होंने जो उत्तर दिया, वह मैं कहता हूँ; मुझसे सुनो।
नारद उवाच
श्लोक 5 (13.98.5)
अन्नमेव प्रशंसन्ति देवा ऋषिगणास्तथा । लोकतन्त्रं हि यज्ञाश्च सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ॥
annameva praśaṃsanti devā ṛṣigaṇāstathā | lokatantraṃ hi yajñāśca sarvamanne pratiṣṭhitam
देवता और ऋषिगण अन्न की ही प्रशंसा करते हैं। संसार का व्यवहार और यज्ञ भी, सब कुछ अन्न पर ही टिका है।
श्लोक 6 (13.98.6)
अन्नेन सदृशं दानं न भूतं न भविष्यति । तस्मादन्नं विशेषेण दातुमिच्छन्ति मानवाः ॥
annena sadṛśaṃ dānaṃ na bhūtaṃ na bhaviṣyati | tasmādannaṃ viśeṣeṇa dātumicchanti mānavāḥ
अन्न के समान दान न कभी हुआ है, न कभी होगा। इसीलिए मनुष्य विशेष रूप से अन्न देना चाहते हैं।
श्लोक 7 (13.98.7)
अन्नमूर्जस्करं लोके प्राणाश्चान्ने प्रतिष्ठिताः । अन्नेन धार्यते सर्वं विश्वं जगदिदं प्रभो ॥
annamūrjaskaraṃ loke prāṇāścānne pratiṣṭhitāḥ | annena dhāryate sarvaṃ viśvaṃ jagadidaṃ prabho
अन्न संसार में बल देने वाला है और प्राण अन्न में ही प्रतिष्ठित हैं। हे प्रभो! अन्न से ही यह सारा विश्व धारण किया जाता है।
श्लोक 8 (13.98.8)
अन्नाद्गृहस्था लोकेऽस्मिन्भिक्षवस्तापसास्तथा । अन्नाद्भवन्ति वै प्राणाः प्रत्यक्षं नात्र संशयः ॥
annādgṛhasthā loke'sminbhikṣavastāpasāstathā | annādbhavanti vai prāṇāḥ pratyakṣaṃ nātra saṃśayaḥ
इस लोक में गृहस्थ, भिक्षु और तपस्वी, सब अन्न से ही जीते हैं। अन्न से ही प्राण उत्पन्न होते हैं; यह प्रत्यक्ष है, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 9 (13.98.9)
कुटुम्बिने सीदते च ब्राह्मणाय महात्मने । दातव्यं भिक्षवे चान्नमात्मनो भूतिमिच्छता ॥
kuṭumbine sīdate ca brāhmaṇāya mahātmane | dātavyaṃ bhikṣave cānnamātmano bhūtimicchatā
जो अपना कल्याण चाहता हो, वह परिवार का भार उठाने वाले और कष्ट में पड़े हुए महात्मा ब्राह्मण को तथा भिक्षु को अन्न दे।
श्लोक 10 (13.98.10)
ब्राह्मणायाभिरूपाय यो दद्यादन्नमर्थिने । निदधाति निधिं श्रेष्ठं पारलौकिकमात्मनः ॥
brāhmaṇāyābhirūpāya yo dadyādannamarthine | nidadhāti nidhiṃ śreṣṭhaṃ pāralaukikamātmanaḥ
जो योग्य ब्राह्मण के माँगने पर उसे अन्न देता है, वह अपने लिए परलोक की सर्वश्रेष्ठ निधि जमा करता है।
श्लोक 11 (13.98.11)
श्रान्तमध्वनि वर्तन्तं वृद्धमर्हमुपस्थितम् । अर्चयेद्भूतिमन्विच्छन्गृहस्थो गृहमागतम् ॥
śrāntamadhvani vartantaṃ vṛddhamarhamupasthitam | arcayedbhūtimanvicchangṛhastho gṛhamāgatam
अपना कल्याण चाहने वाला गृहस्थ अपने घर आए हुए अतिथि का आदर करे, चाहे वह मार्ग से थका हुआ हो, वृद्ध हो या सम्मान के योग्य हो।
श्लोक 12 (13.98.12)
क्रोधमुत्पतितं हित्वा सुशीलो वीतमत्सरः । अन्नदः प्राप्नुते राजन्दिवि चेह च यत्सुखम् ॥
krodhamutpatitaṃ hitvā suśīlo vītamatsaraḥ | annadaḥ prāpnute rājandivi ceha ca yatsukham
जो उठे हुए क्रोध को छोड़कर, सुशील और द्वेषरहित होकर अन्न देता है, हे राजन्! वह स्वर्ग में और इस लोक में जो भी सुख है, उसे पाता है।
श्लोक 13 (13.98.13)
नावमन्येदभिगतं न प्रणुद्यात्कदाचन । अपि श्वपाके शुनि वा नान्नदानं प्रणश्यति ॥
nāvamanyedabhigataṃ na praṇudyātkadācana | api śvapāke śuni vā nānnadānaṃ praṇaśyati
आए हुए अतिथि का कभी अपमान न करे और न उसे कभी लौटाए। चाण्डाल या कुत्ते को भी दिया हुआ अन्नदान नष्ट नहीं होता।
श्लोक 14 (13.98.14)
यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते । आर्तायादृष्टपूर्वाय स महद्धर्ममाप्नुयात् ॥
yo dadyādaparikliṣṭamannamadhvani vartate | ārtāyādṛṣṭapūrvāya sa mahaddharmamāpnuyāt
जो मार्ग में चलते हुए किसी दुखी और अपरिचित व्यक्ति को बिना कष्ट पहुँचाए अन्न देता है, उसे महान् धर्म का फल मिलता है।
श्लोक 15 (13.98.15)
पितॄन्देवानृपीन्विप्रानतिथींश्च जनाधिप । यो नरः प्रीणयत्यन्नैस्तस्य पुण्यफलं महत् ॥
pitṝndevānṛpīnviprānatithīṃśca janādhipa | yo naraḥ prīṇayatyannaistasya puṇyaphalaṃ mahat
हे नरेश! जो मनुष्य पितरों, देवताओं, ऋषियों, ब्राह्मणों और अतिथियों को अन्न से तृप्त करता है, उसे महान् पुण्यफल मिलता है।
श्लोक 16 (13.98.16)
कृत्वाऽतिपातकं कर्म यो दद्यादन्नमर्थिने । ब्राह्मणाय विशेषेण न स पापेन मुह्यते ॥
kṛtvā'tipātakaṃ karma yo dadyādannamarthine | brāhmaṇāya viśeṣeṇa na sa pāpena muhyate
जिसने बहुत बड़ा पाप कर्म किया हो, वह भी यदि याचक को, और विशेषकर ब्राह्मण को, अन्न देता है तो वह पाप से अभिभूत नहीं होता।
श्लोक 17 (13.98.17)
ब्राह्मणेष्वक्षयं दानमन्नं शूद्रे महाफलम् । अन्नदानं हि शूद्रे च ब्राह्मणे च विशिष्यते ॥
brāhmaṇeṣvakṣayaṃ dānamannaṃ śūdre mahāphalam | annadānaṃ hi śūdre ca brāhmaṇe ca viśiṣyate
ब्राह्मणों को दिया हुआ दान अक्षय होता है; शूद्र को दिया हुआ अन्न महान् फल देता है। अन्नदान शूद्र को हो या ब्राह्मण को, दोनों में श्रेष्ठ है।
श्लोक 18 (13.98.18)
न पृच्छेद्गोत्रचरणं स्वाध्यायं देशमेव च । भिक्षितो ब्राह्मणेनान्नं दद्यादेवाविचारतः ॥
na pṛcchedgotracaraṇaṃ svādhyāyaṃ deśameva ca | bhikṣito brāhmaṇenānnaṃ dadyādevāvicārataḥ
उससे गोत्र, शाखा, अध्ययन या देश के विषय में न पूछे। जब ब्राह्मण अन्न माँगे तो बिना विचार किए उसे दे दे।
श्लोक 19 (13.98.19)
अन्नदस्यान्नदा वृक्षाः सर्वकामफलप्रदाः । भवन्ति चेह चामुत्र नृपते नात्र संशयः ॥
annadasyānnadā vṛkṣāḥ sarvakāmaphalapradāḥ | bhavanti ceha cāmutra nṛpate nātra saṃśayaḥ
अन्न देने वाले के लिए यहाँ और परलोक में अन्न देने वाले तथा सब मनोरथों के फल देने वाले वृक्ष हो जाते हैं; हे राजन्! इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 20 (13.98.20)
आशंसन्ते हि पितरः सुवृष्टिमिव कर्षकाः । अस्माकमपि पुत्रो वा पौत्रो वाऽन्नं प्रदास्यति ॥
āśaṃsante hi pitaraḥ suvṛṣṭimiva karṣakāḥ | asmākamapi putro vā pautro vā'nnaṃ pradāsyati
जैसे किसान अच्छी वर्षा की आशा करते हैं, वैसे ही पितर आशा करते हैं कि हमारा कोई पुत्र या पौत्र हमें अन्न देगा।
श्लोक 21 (13.98.21)
ब्राह्मणो हि महद्भूतं स्वयं देहीति याचते । अकामो वा सकामो वा दत्त्वा पुण्यमवाप्नुयात् ॥
brāhmaṇo hi mahadbhūtaṃ svayaṃ dehīti yācate | akāmo vā sakāmo vā dattvā puṇyamavāpnuyāt
ब्राह्मण महान् प्राणी है। जब वह स्वयं कहकर माँगता है कि 'दो', तब देने वाला चाहे इच्छा से दे, चाहे बिना इच्छा के, पुण्य पाता है।
श्लोक 22 (13.98.22)
ब्राह्मणः सर्वभूतानामतिथिः प्रसृताग्रभुक् । विप्रा यदधिगच्छन्ति भिक्षमाणा गृहं सदा ॥
brāhmaṇaḥ sarvabhūtānāmatithiḥ prasṛtāgrabhuk | viprā yadadhigacchanti bhikṣamāṇā gṛhaṃ sadā
ब्राह्मण सब प्राणियों का अतिथि है और परोसे हुए अन्न में सबसे पहले भोजन करने वाला है। जब भी भिक्षा माँगते हुए ब्राह्मण किसी घर में जाते हैं,
श्लोक 23 (13.98.23)
सत्कृताश्च निवर्तन्ते तदतीव प्रवर्धते । महाभागे कुले प्रेत्य जन्म चाप्नोति भारत ॥
satkṛtāśca nivartante tadatīva pravardhate | mahābhāge kule pretya janma cāpnoti bhārata
और सम्मानित होकर लौटते हैं, तब वह दान अत्यन्त बढ़ता है; और हे भारत! मरने के बाद दाता महान् सौभाग्यशाली कुल में जन्म पाता है।
श्लोक 24 (13.98.24)
दत्त्वा त्वन्नं नरो लोके तथा स्थानमनुत्तमम् । स्विष्टमृष्टान्नदायी तु स्वर्गे वसति सत्कृतः ॥
dattvā tvannaṃ naro loke tathā sthānamanuttamam | sviṣṭamṛṣṭānnadāyī tu svarge vasati satkṛtaḥ
जो मनुष्य इस लोक में अन्न देता है, वह सर्वोत्तम स्थान पाता है; जो स्वादिष्ट और भली-भाँति बना अन्न देता है, वह स्वर्ग में सम्मानित होकर रहता है।
श्लोक 25 (13.98.25)
अन्नं प्राणा नराणां हि सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् । अन्नदः पशुमान्पुत्री धनवान्भोगवानपि ॥
annaṃ prāṇā narāṇāṃ hi sarvamanne pratiṣṭhitam | annadaḥ paśumānputrī dhanavānbhogavānapi
अन्न मनुष्यों के प्राण हैं और सब कुछ अन्न पर ही टिका है। अन्न देने वाला पशुओं, पुत्रों, धन और भोगों से सम्पन्न होता है।
श्लोक 26 (13.98.26)
प्राणवांश्चापि भवति रूपवांश्च तथा नृप । अन्नदः प्राणदो लोके सर्वदः प्रोच्यते तु सः ॥
prāṇavāṃścāpi bhavati rūpavāṃśca tathā nṛpa | annadaḥ prāṇado loke sarvadaḥ procyate tu saḥ
हे राजन्! वह प्राणवान् और रूपवान् भी होता है। संसार में अन्न देने वाला प्राणदाता और सर्वदाता कहा जाता है।
श्लोक 27 (13.98.27)
अन्नं हि दत्त्वाऽतिथये ब्राह्मणाय यथाविधि । प्रदाता सुखमाप्नोति दैवतैश्चापि पूज्यते ॥
annaṃ hi dattvā'tithaye brāhmaṇāya yathāvidhi | pradātā sukhamāpnoti daivataiścāpi pūjyate
जो दाता विधिपूर्वक अतिथि ब्राह्मण को अन्न देता है, वह सुख पाता है और देवता भी उसका सम्मान करते हैं।
श्लोक 28 (13.98.28)
ब्राह्मणो हि महद्भूतं क्षेत्रभूतं युधिष्ठिर । उप्यते तत्र यद्बीजं तद्धि पुण्यफलं महत् ॥
brāhmaṇo hi mahadbhūtaṃ kṣetrabhūtaṃ yudhiṣṭhira | upyate tatra yadbījaṃ taddhi puṇyaphalaṃ mahat
हे युधिष्ठिर! ब्राह्मण महान् प्राणी है और स्वयं खेत के समान है। उसमें जो बीज बोया जाता है, वह महान् पुण्यफल देता है।
श्लोक 29 (13.98.29)
प्रत्यक्षं प्रीतिजननं भोक्तुर्दातुर्भवत्युत । सर्वाण्यन्यानि दानानि परोक्षफलवन्त्युत ॥
pratyakṣaṃ prītijananaṃ bhokturdāturbhavatyuta | sarvāṇyanyāni dānāni parokṣaphalavantyuta
इसका आनन्द प्रत्यक्ष है और खाने वाले तथा देने वाले दोनों को होता है; अन्य सभी दानों का फल अप्रत्यक्ष होता है।
श्लोक 30 (13.98.30)
अन्नाद्धि प्रसवं यान्ति रतिरन्नाद्धि भारत । धर्मार्थावन्नतो विद्धि रोगनाशं तथाऽन्नतः ॥
annāddhi prasavaṃ yānti ratirannāddhi bhārata | dharmārthāvannato viddhi roganāśaṃ tathā'nnataḥ
हे भारत! अन्न से सन्तान होती है और अन्न से ही आनन्द मिलता है। धर्म और अर्थ को अन्न से ही उत्पन्न जानो, और रोगों का नाश भी अन्न से ही होता है।
श्लोक 31 (13.98.31)
अन्नं ह्यमृतमित्याह पुरा कल्पे प्रजापतिः । अन्नं भुवं दिवं खं च सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ॥
annaṃ hyamṛtamityāha purā kalpe prajāpatiḥ | annaṃ bhuvaṃ divaṃ khaṃ ca sarvamanne pratiṣṭhitam
पूर्वकाल में प्रजापति ने अन्न को अमृत कहा था। पृथ्वी, स्वर्ग और आकाश, सब कुछ अन्न पर ही टिका है।
श्लोक 32 (13.98.32)
अन्नप्रणाशे भिद्यन्ते शरीरे पञ्च धातवः । बलं बलवतोपीह प्रणश्यत्यन्नहानितः ॥
annapraṇāśe bhidyante śarīre pañca dhātavaḥ | balaṃ balavatopīha praṇaśyatyannahānitaḥ
अन्न के नष्ट होने पर शरीर के पाँचों धातु बिखर जाते हैं; अन्न की कमी से बलवान् का भी बल यहाँ नष्ट हो जाता है।
श्लोक 33 (13.98.33)
आवाहाश्च विवाहाश्च यज्ञाश्चान्नमृते तथा । निवर्तन्ते नरश्रेष्ठ ब्रह्म चात्र प्रलीयते ॥
āvāhāśca vivāhāśca yajñāścānnamṛte tathā | nivartante naraśreṣṭha brahma cātra pralīyate
हे नरश्रेष्ठ! अन्न के बिना आवाह, विवाह और यज्ञ बन्द हो जाते हैं, और यहाँ वेद भी लुप्त हो जाता है।
श्लोक 34 (13.98.34)
अन्नतः सर्वमेतद्धि यत्किञ्चित्स्थाणु जङ्गमम् । त्रिषु लोकेषु धर्मार्थमन्नं देयमतो बुधैः ॥
annataḥ sarvametaddhi yatkiñcitsthāṇu jaṅgamam | triṣu lokeṣu dharmārthamannaṃ deyamato budhaiḥ
जो कुछ भी स्थावर और जंगम है, वह सब अन्न से ही है। इसलिए बुद्धिमानों को तीनों लोकों में धर्म और अर्थ के लिए अन्न देना चाहिए।
श्लोक 35 (13.98.35)
अन्नदस्य मनुष्यस्य बलमोजो यशांसि च । कीर्तिश्च वर्धते शश्वत्त्रिषु लोकेषु पार्थिव ॥
annadasya manuṣyasya balamojo yaśāṃsi ca | kīrtiśca vardhate śaśvattriṣu lokeṣu pārthiva
हे राजन्! अन्न देने वाले मनुष्य का बल, ओज और यश बढ़ता है, और तीनों लोकों में उसकी कीर्ति सदा बढ़ती रहती है।
श्लोक 36 (13.98.36)
मेघेषूर्ध्वं सन्निधत्ते प्राणानां पवनः पतिः । तच्च मेघगतं वारि शक्रो वर्षति भारत ॥
megheṣūrdhvaṃ sannidhatte prāṇānāṃ pavanaḥ patiḥ | tacca meghagataṃ vāri śakro varṣati bhārata
प्राणों का स्वामी वायु जल को ऊपर बादलों में एकत्र करता है, और हे भारत! बादलों में स्थित उस जल को इन्द्र बरसाता है।
श्लोक 37 (13.98.37)
आदत्ते च रसान्भौमानादित्यः स्वगभस्तिभिः । वायुरादित्यतस्तांश्च रसान्देवः प्रवर्षति ॥
ādatte ca rasānbhaumānādityaḥ svagabhastibhiḥ | vāyurādityatastāṃśca rasāndevaḥ pravarṣati
सूर्य अपनी किरणों से पृथ्वी के रसों को खींच लेता है; वायु सूर्य से उन रसों को लेता है और देवता उन्हें बरसा देता है।
श्लोक 38 (13.98.38)
तद्यदा मेघतो वारि पतितं भवति क्षितौ । तदा वसुमती देवी स्निग्धा भवति भारत ॥
tadyadā meghato vāri patitaṃ bhavati kṣitau | tadā vasumatī devī snigdhā bhavati bhārata
हे भारत! जब बादल से जल पृथ्वी पर गिरता है, तब देवी पृथ्वी स्निग्ध और रसवती हो जाती है।
श्लोक 39 (13.98.39)
ततः सस्यानि रोहन्ति येन वर्तयते जगत् । मांसमेदोस्थिशुक्राणां प्रादुर्भावस्ततः पुनः ॥
tataḥ sasyāni rohanti yena vartayate jagat | māṃsamedosthiśukrāṇāṃ prādurbhāvastataḥ punaḥ
तब अन्न की फसलें उगती हैं, जिनसे जगत् का पालन होता है; और उन्हीं से फिर मांस, मेदा, अस्थि और शुक्र उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 40 (13.98.40)
सम्भवन्ति ततः शुक्रात्प्राणिनः पृथिवीपते । अग्नीषोमौ हि तच्छुक्रं सृजतः पुष्यतश्च ह ॥
sambhavanti tataḥ śukrātprāṇinaḥ pṛthivīpate | agnīṣomau hi tacchukraṃ sṛjataḥ puṣyataśca ha
हे पृथ्वीपते! उस शुक्र से प्राणी उत्पन्न होते हैं; क्योंकि अग्नि और सोम उस शुक्र को रचते और पुष्ट करते हैं।
श्लोक 41 (13.98.41)
एवमन्नाद्धि सूर्यश्च पवनः शक्रमेव च । एक एव स्मृतो राशिस्ततो भूतानि जज्ञिरे ॥
evamannāddhi sūryaśca pavanaḥ śakrameva ca | eka eva smṛto rāśistato bhūtāni jajñire
इस प्रकार अन्न, सूर्य, वायु और इन्द्र को एक ही राशि माना गया है, और उसी से प्राणी उत्पन्न हुए।
श्लोक 42 (13.98.42)
प्राणान्ददाति भूतानां तेजश्च भरतर्षभ । गृहमभ्यागतायाथ यो दद्यादन्नमर्थिने ॥
prāṇāndadāti bhūtānāṃ tejaśca bharatarṣabha | gṛhamabhyāgatāyātha yo dadyādannamarthine
हे भरतश्रेष्ठ! जो अपने घर आए हुए याचक को अन्न देता है, वह प्राणियों को प्राण और तेज देता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 43 (13.98.43)
नारदेनैवमुक्तोऽहमन्नदानं सदा नृप । अनसूयुस्त्वमप्यन्नं तस्माद्देहि गतज्वरः ॥
nāradenaivamukto'hamannadānaṃ sadā nṛpa | anasūyustvamapyannaṃ tasmāddehi gatajvaraḥ
हे राजन्! नारद ने मुझसे ऐसा कहा था, इसलिए मैं सदा अन्नदान करता रहा हूँ। तुम भी द्वेषरहित और चिन्तारहित होकर अन्न दो।
श्लोक 44 (13.98.44)
दत्त्वाऽन्नं विधिवद्राजन्विप्रेभ्यस्त्वमपि प्रभो । यथावदनुरूपेभ्यस्ततः स्वर्गमवाप्स्यसि ॥
dattvā'nnaṃ vidhivadrājanviprebhyastvamapi prabho | yathāvadanurūpebhyastataḥ svargamavāpsyasi
हे प्रभो! तुम भी योग्य ब्राह्मणों को विधिपूर्वक अन्न देकर उसके बाद स्वर्ग प्राप्त करोगे।
श्लोक 45 (13.98.45)
अन्नदानां हि ये लोकास्तांस्त्वं शृणु जनाधिप । भवनानि प्रकाशन्ते दिवि तेषां महात्मनाम् ॥
annadānāṃ hi ye lokāstāṃstvaṃ śṛṇu janādhipa | bhavanāni prakāśante divi teṣāṃ mahātmanām
हे नरेश्वर! अन्न देने वालों के जो लोक हैं, उन्हें सुनो। स्वर्ग में उन महात्माओं के भवन प्रकाशित होते हैं।
श्लोक 46 (13.98.46)
नानासंस्थानि रूपाणि नानास्तम्भान्वितानि च । चन्द्रमण्डलशुभ्राणि किंकिणीजालवन्ति च ॥
nānāsaṃsthāni rūpāṇi nānāstambhānvitāni ca | candramaṇḍalaśubhrāṇi kiṃkiṇījālavanti ca
वे अनेक आकारों और रूपों के हैं, उनमें अनेक खम्भे लगे हैं, वे चन्द्रमण्डल के समान उज्ज्वल हैं और घुँघरुओं के जालों से सजे हैं,
श्लोक 47 (13.98.47)
तरुणादित्यवर्णानि स्थावराणि चराणि च । अनेकशतभौमानि सान्तर्जलचराणि च ॥
taruṇādityavarṇāni sthāvarāṇi carāṇi ca | anekaśatabhaumāni sāntarjalacarāṇi ca
वे नए उगे सूर्य के समान कान्तिमान् हैं, कुछ स्थिर और कुछ चलने वाले हैं, उनमें सैकड़ों मंज़िलें हैं और भीतर जल तथा जलचर भी हैं;
श्लोक 48 (13.98.48)
वैदूर्यार्कप्रकाशानि रौप्यरुक्ममयानि च । सर्वकामफलाश्चापि वृक्षा भवनसंस्थिताः ॥
vaidūryārkaprakāśāni raupyarukmamayāni ca | sarvakāmaphalāścāpi vṛkṣā bhavanasaṃsthitāḥ
वे वैदूर्य मणि और सूर्य के समान चमकते हैं, चाँदी और सोने के बने हैं, और उन भवनों के पास सब कामनाओं के फल देने वाले वृक्ष खड़े हैं;
श्लोक 49 (13.98.49)
वाप्यो वीथ्यः सभाः कूपा दीर्घिकाश्चैव सर्वशः । घोषवन्ति च यानानि युक्तान्यथ सहस्रशः ॥
vāpyo vīthyaḥ sabhāḥ kūpā dīrghikāścaiva sarvaśaḥ | ghoṣavanti ca yānāni yuktānyatha sahasraśaḥ
वहाँ सब ओर बावलियाँ, वीथियाँ, सभाएँ, कुएँ और लम्बे सरोवर हैं, और हज़ारों जुते हुए, घर्घर ध्वनि करने वाले यान हैं;
श्लोक 50 (13.98.50)
भक्ष्यभोज्यमयाः शैला वासांस्याभरणानि च । क्षीरं स्रवन्ति सरितस्तथा चैवान्नपर्वताः ॥
bhakṣyabhojyamayāḥ śailā vāsāṃsyābharaṇāni ca | kṣīraṃ sravanti saritastathā caivānnaparvatāḥ
वहाँ भक्ष्य और भोज्य पदार्थों के बने पर्वत हैं, वस्त्र और आभूषण हैं, दूध बहाने वाली नदियाँ हैं और अन्न के पहाड़ हैं;
श्लोक 51 (13.98.51)
प्रासादाः पाण्डुराभ्राभाः शय्याश्च कनकोज्ज्वलाः । तान्यन्नदाः प्रपद्यन्ते तस्मादन्नप्रदो भव ॥
prāsādāḥ pāṇḍurābhrābhāḥ śayyāśca kanakojjvalāḥ | tānyannadāḥ prapadyante tasmādannaprado bhava
श्वेत बादलों जैसे प्रासाद हैं और सोने से चमकती शय्याएँ हैं। इन सबको अन्नदाता प्राप्त करते हैं; इसलिए तुम भी अन्न देने वाले बनो।
श्लोक 52 (13.98.52)
एते लोकाः पुण्यकृता अन्नदानां महात्मनाम् । तस्मादन्नं प्रयत्नेन दातव्यं मानवैर्भुवि ॥
ete lokāḥ puṇyakṛtā annadānāṃ mahātmanām | tasmādannaṃ prayatnena dātavyaṃ mānavairbhuvi
ये अन्न देने वाले पुण्यात्मा महात्माओं के लोक हैं। इसलिए पृथ्वी पर मनुष्यों को प्रयत्नपूर्वक अन्न देना चाहिए।