अनुशासन पर्व · अध्याय 97
भूमिदान की महिमा और बृहस्पति का इन्द्र को उपदेश
युधिष्ठिर पूछते हैं कि सर्वश्रेष्ठ दान कौन-सा है। भीष्म उत्तर देते हैं कि वह भूमिदान है: वह पापी को भी पवित्र करता है, दाता को इस लोक में समृद्धि और परलोक में स्वर्ग देता है, और अश्वमेध से भी बढ़कर है। वे पृथ्वी के गीत सुनाते हैं, फिर वह पुराना संवाद कहते हैं जिसमें बृहस्पति इन्द्र को भूमिदान के पुण्य और दी हुई भूमि लौटा लेने के पाप का वर्णन करते हैं। श्राद्ध में इस स्तुति का पाठ करने से अर्पण अक्षय होता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.97.1)
इदं देयमिदं देयमितीयं श्रुतिचोदनात् । बहुदेयाश्च राजानः किंस्विद्देयमनुत्तमम् ॥
idaṃ deyamidaṃ deyamitīyaṃ śruticodanāt | bahudeyāśca rājānaḥ kiṃsviddeyamanuttamam
श्रुति के विधान के अनुसार "यह देना चाहिए, वह देना चाहिए" — और राजाओं के पास देने को बहुत कुछ होता है; तो सर्वोत्तम दान कौन-सा है?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.97.2)
अति दानानि सर्वाणि पृथिवीदानमुच्यते । अचला ह्यक्षया भूमिर्दोग्ध्री कामानिहोत्तमान् ॥
ati dānāni sarvāṇi pṛthivīdānamucyate | acalā hyakṣayā bhūmirdogdhrī kāmānihottamān
सभी दानों में पृथ्वी का दान सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है। भूमि अचल और अक्षय है, और इस लोक में सर्वोत्तम इच्छाओं को दुहने वाली गाय के समान है।
श्लोक 3 (13.97.3)
दोग्ध्री वासांसि रत्नानि पशून्व्रीहियवांस्तथा । भूमिदः सर्वभूतेषु शाश्वतीरेधते समाः ॥
dogdhrī vāsāṃsi ratnāni paśūnvrīhiyavāṃstathā | bhūmidaḥ sarvabhūteṣu śāśvatīredhate samāḥ
वह वस्त्र, रत्न, पशु, धान और जौ देती है। भूमि का दाता सब प्राणियों के बीच अनन्त वर्षों तक समृद्ध रहता है।
श्लोक 4 (13.97.4)
यावद्भूमेरायुरिह तावद्भूमिद एधते । न भूमिदानादस्तीह परं किञ्चिद्युधिष्ठिर ॥
yāvadbhūmerāyuriha tāvadbhūmida edhate | na bhūmidānādastīha paraṃ kiñcidyudhiṣṭhira
जब तक पृथ्वी की आयु है, तब तक भूमिदाता फलता-फूलता है। हे युधिष्ठिर, भूमिदान से बढ़कर यहाँ कुछ भी नहीं है।
श्लोक 5 (13.97.5)
अप्यल्पं प्रददुः सर्वे पृथिव्या इति नः श्रुतम् । भूमिमेव ददुः सर्वे भूमिं ते भुञ्जते जनाः ॥
apyalpaṃ pradaduḥ sarve pṛthivyā iti naḥ śrutam | bhūmimeva daduḥ sarve bhūmiṃ te bhuñjate janāḥ
हमने सुना है कि जिन सबने पृथ्वी का थोड़ा-सा भी भाग दिया, उन्होंने पृथ्वी ही दी, और वे लोग पृथ्वी का भोग करते हैं।
श्लोक 6 (13.97.6)
स्वकर्मैवोपजीवन्ति नरा इह परत्र च । भूमिः पतिं महादेवी दातारं कुरुते प्रियम् ॥
svakarmaivopajīvanti narā iha paratra ca | bhūmiḥ patiṃ mahādevī dātāraṃ kurute priyam
मनुष्य इस लोक और परलोक में अपने ही कर्मों पर जीते हैं। महादेवी भूमि दाता को अपना पति और प्रिय बना लेती है।
श्लोक 7 (13.97.7)
य एतां दक्षिणां दद्यादक्षयां राजसत्तम । पुनर्नरत्वं सम्प्राप्य भवेत्स पृथिवीपतिः ॥
ya etāṃ dakṣiṇāṃ dadyādakṣayāṃ rājasattama | punarnaratvaṃ samprāpya bhavetsa pṛthivīpatiḥ
हे राजाओं में श्रेष्ठ, जो यह अक्षय दक्षिणा देता है, वह फिर मनुष्य-जन्म पाकर पुनः पृथ्वी का स्वामी होता है।
श्लोक 8 (13.97.8)
यथा दानं तथा भोग इति धर्मेषु निश्चयः । सङ्ग्रामे वा तनुं जह्याद्दद्याच्च पृथिवीमिमाम् ॥
yathā dānaṃ tathā bhoga iti dharmeṣu niścayaḥ | saṅgrāme vā tanuṃ jahyāddadyācca pṛthivīmimām
"जैसा दान, वैसा भोग" — धर्मशास्त्रों में यही निश्चय है। मनुष्य या तो युद्ध में शरीर त्याग दे, या यह पृथ्वी दान कर दे।
श्लोक 9 (13.97.9)
इत्येतत्क्षत्रबन्धूनां वदन्ति परमाशिषः । पुनाति दत्ता पृथिवी दातारमिति शुश्रुम ॥
ityetatkṣatrabandhūnāṃ vadanti paramāśiṣaḥ | punāti dattā pṛthivī dātāramiti śuśruma
क्षत्रियों के लिए यही सबसे बड़ा आशीर्वाद कहा जाता है; और हमने सुना है कि दी हुई पृथ्वी दाता को पवित्र करती है।
श्लोक 10 (13.97.10)
अपि पापसमाचारं ब्रह्मघ्नमपि चानृतम् । सैव पापं प्लावयति सैव पापात्प्रमोचयेत् ॥
api pāpasamācāraṃ brahmaghnamapi cānṛtam | saiva pāpaṃ plāvayati saiva pāpātpramocayet
पापाचारी, ब्रह्महत्यारा या झूठा भी हो, तो वही पृथ्वी उसके पाप को धो देती है और वही उसे पाप से मुक्त करती है।
श्लोक 11 (13.97.11)
अपि पापकृतां राज्ञां प्रतिगृह्णन्ति साधवः । पृथिवीं नान्यदिच्छन्ति पावनं जगती यतः ॥
api pāpakṛtāṃ rājñāṃ pratigṛhṇanti sādhavaḥ | pṛthivīṃ nānyadicchanti pāvanaṃ jagatī yataḥ
सज्जन पाप करने वाले राजाओं से भी ग्रहण कर लेते हैं; वे पृथ्वी के सिवा और कुछ नहीं चाहते, क्योंकि पृथ्वी ही पवित्र करने वाली है।
श्लोक 12 (13.97.12)
नामास्याः प्रियदत्तेति गुह्यं देव्याः सनातनम् । दानं वाऽप्यथवाऽदानं नामास्याः प्रथमप्रियम् ॥
nāmāsyāḥ priyadatteti guhyaṃ devyāḥ sanātanam | dānaṃ vā'pyathavā'dānaṃ nāmāsyāḥ prathamapriyam
उस देवी का नाम "प्रियदत्ता" है — यह उसका सनातन गुप्त रहस्य है। चाहे दान हो या अदान, यही नाम उसे सबसे पहले और सबसे प्रिय है।
श्लोक 13 (13.97.13)
य एतां विदुषे दद्यात्पृथिवीं पृथिवीपतिः । पृथिव्यामेतदिष्टं स राजा राज्यमितो व्रजेत् ॥
ya etāṃ viduṣe dadyātpṛthivīṃ pṛthivīpatiḥ | pṛthivyāmetadiṣṭaṃ sa rājā rājyamito vrajet
जो राजा विद्वान् को यह पृथ्वी दान करता है — पृथ्वी को यही इष्ट है — वह राजा यहाँ से आगे राज्य को प्राप्त होता है।
श्लोक 14 (13.97.14)
पुनश्चासौ जनिं प्राप्य राजवत्स्यान्न संशयः । तस्मात्प्राप्यैव पृथिवीं दद्याद्विप्राय पार्थिवः ॥
punaścāsau janiṃ prāpya rājavatsyānna saṃśayaḥ | tasmātprāpyaiva pṛthivīṃ dadyādviprāya pārthivaḥ
और फिर जन्म लेकर वह निश्चय ही राजा होगा, इसमें संदेह नहीं। इसलिए पृथ्वी प्राप्त करके राजा उसे ब्राह्मण को दे।
श्लोक 15 (13.97.15)
नाभूमिपतिना भूमिरधिष्ठेया कथञ्चन । न च वस्त्रेण वा गूहेदन्तर्धानेन वा चरेत् ॥
nābhūmipatinā bhūmiradhiṣṭheyā kathañcana | na ca vastreṇa vā gūhedantardhānena vā caret
जो भूमि का स्वामी नहीं है, उसे भूमि किसी भी प्रकार अपने अधिकार में नहीं रखनी चाहिए; न उसे कपड़े से ढककर छिपाए, न छल से आचरण करे।
श्लोक 16 (13.97.16)
ये चान्ये भूमिमिच्छेयुः कुर्युरेवं न संशयः । यः साधोर्भूमिमादत्ते न भूमिं विन्दते तु सः ॥
ye cānye bhūmimiccheyuḥ kuryurevaṃ na saṃśayaḥ | yaḥ sādhorbhūmimādatte na bhūmiṃ vindate tu saḥ
और जो दूसरे भी भूमि चाहते हैं, वे भी ऐसा ही करें, इसमें संदेह नहीं। जो सज्जन से भूमि छीनता है, वह स्वयं भूमि नहीं पाता।
श्लोक 17 (13.97.17)
भूमिं दत्त्वा तु साधुभ्यो विन्दते भूमिमुत्तमाम् । प्रेत्य चेह च धर्मात्मा सम्प्राप्नोति महद्यशः ॥
bhūmiṃ dattvā tu sādhubhyo vindate bhūmimuttamām | pretya ceha ca dharmātmā samprāpnoti mahadyaśaḥ
पर जो सज्जनों को भूमि देता है, वह उत्तम भूमि पाता है। वह धर्मात्मा परलोक में और यहाँ भी महान् यश प्राप्त करता है।
श्लोक 18 (13.97.18)
एकाहारकरीं दत्त्वा षष्ठिसाहस्रमूर्ध्वगः । तावत्या हरणे पृथ्व्या नरकं द्विगुणोत्तरम् ॥
ekāhārakarīṃ dattvā ṣaṣṭhisāhasramūrdhvagaḥ | tāvatyā haraṇe pṛthvyā narakaṃ dviguṇottaram
जो एक दिन का आहार देने योग्य भूमि दान करता है, वह साठ हज़ार वर्ष ऊपर के लोकों में रहता है; और वैसी भूमि छीनने पर दुगुने से भी अधिक समय का नरक मिलता है।
श्लोक 19 (13.97.19)
यस्य विप्रास्तु शंसन्ति साधोर्भूमिं सदैव हि । न तस्य शत्रवो राजन्प्रशंसन्ति वसुन्धराम् ॥
yasya viprāstu śaṃsanti sādhorbhūmiṃ sadaiva hi | na tasya śatravo rājanpraśaṃsanti vasundharām
जिस सज्जन की दी हुई भूमि की चर्चा ब्राह्मण सदा करते हैं, हे राजन्, उसके शत्रु उसकी पृथ्वी पर आनन्द नहीं मनाते।
श्लोक 20 (13.97.20)
यत्किञ्चित्पुरुषः पापं कुरुते वृत्तिकर्शितः । अपि गोचर्ममात्रेण भूमिदानेन पूयते ॥
yatkiñcitpuruṣaḥ pāpaṃ kurute vṛttikarśitaḥ | api gocarmamātreṇa bhūmidānena pūyate
जीविका के अभाव से पीड़ित मनुष्य जो कुछ पाप करता है, वह गोचर्म-मात्र भूमि के दान से भी शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 21 (13.97.21)
येऽपि सङ्कीर्णकर्माणो राजानो रौद्रकर्मिणः । तेभ्यः पवित्रमाख्येयं भूमिदानमनुत्तमम् ॥
ye'pi saṅkīrṇakarmāṇo rājāno raudrakarmiṇaḥ | tebhyaḥ pavitramākhyeyaṃ bhūmidānamanuttamam
मिले-जुले कर्म करने वाले और कठोर कर्मों वाले राजाओं के लिए भी भूमिदान को सर्वोत्तम पवित्र करने वाला साधन बताना चाहिए।
श्लोक 22 (13.97.22)
अल्पान्तरमिदं शश्वत्पुराणा मेनिरे जनाः । यो यजेताश्वमेधेन दद्याद्वा साधवे महीम् ॥
alpāntaramidaṃ śaśvatpurāṇā menire janāḥ | yo yajetāśvamedhena dadyādvā sādhave mahīm
प्राचीन लोग सदा यही मानते आए हैं कि अश्वमेध यज्ञ करने वाले में और सज्जन को पृथ्वी देने वाले में थोड़ा ही अन्तर है।
श्लोक 23 (13.97.23)
अपि चेत्सुकृतं कृत्वा शङ्केरन्नपि पण्डिताः । अशंक्यमेकमेवैतद्भूमिदानमनुत्तमम् ॥
api cetsukṛtaṃ kṛtvā śaṅkerannapi paṇḍitāḥ | aśaṃkyamekamevaitadbhūmidānamanuttamam
किसी पुण्य कर्म के विषय में विद्वान् भी शंका कर लें, पर भूमि का यह परम दान ऐसा है कि इसमें शंका की गुंजाइश ही नहीं।
श्लोक 24 (13.97.24)
सुवर्णं रजतं वस्त्रं मणिमुक्तावसूनि च । सर्वमेतन्महाप्राज्ञो ददाति वसुधां ददत् ॥
suvarṇaṃ rajataṃ vastraṃ maṇimuktāvasūni ca | sarvametanmahāprājño dadāti vasudhāṃ dadat
सोना, चाँदी, वस्त्र, मणि, मोती और धन — ये सब बुद्धिमान मनुष्य पृथ्वी का दान करते हुए दे देता है।
श्लोक 25 (13.97.25)
तपो यज्ञः श्रुतं शीलमलोभः सत्यसन्धता । गुरुदैवतपूजा च एता वर्तन्ति भूमिदम् ॥
tapo yajñaḥ śrutaṃ śīlamalobhaḥ satyasandhatā | gurudaivatapūjā ca etā vartanti bhūmidam
तप, यज्ञ, शास्त्र-ज्ञान, शील, निर्लोभता, सत्य पर दृढ़ता और गुरुओं तथा देवताओं की पूजा — ये सब भूमिदाता में बसते हैं।
श्लोक 26 (13.97.26)
भर्तुनिःश्रेयसे युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः । ब्रह्मलोकगताः सिद्धा नातिक्रामन्ति भूमिदम् ॥
bhartuniḥśreyase yuktāstyaktātmāno raṇe hatāḥ | brahmalokagatāḥ siddhā nātikrāmanti bhūmidam
जो अपने स्वामी के कल्याण में लगे रहकर प्राण त्यागकर रण में मारे गए और ब्रह्मलोक को गए सिद्ध हैं, वे भी भूमिदाता से आगे नहीं बढ़ते।
श्लोक 27 (13.97.27)
यथा जनित्री स्वं पुत्रं क्षीरेण भरते सदा । अनुगृह्णाति दातारं तथा सर्वरसैर्मही ॥
yathā janitrī svaṃ putraṃ kṣīreṇa bharate sadā | anugṛhṇāti dātāraṃ tathā sarvarasairmahī
जैसे माता सदा अपने पुत्र को दूध से पालती है, वैसे ही पृथ्वी अपने सब रसों से दाता पर कृपा करती है।
श्लोक 28 (13.97.28)
मृत्युर्वैकिंकरो दण्डस्तापो वह्नेः सुदारुणः । घोराश्च वारुणाः पाशा नोपसर्पन्ति भूमिदम् ॥
mṛtyurvaikiṃkaro daṇḍastāpo vahneḥ sudāruṇaḥ | ghorāśca vāruṇāḥ pāśā nopasarpanti bhūmidam
मृत्यु का सेवक, दण्ड, अग्नि का अत्यन्त भयानक ताप और वरुण के घोर पाश भूमिदाता के पास नहीं फटकते।
श्लोक 29 (13.97.29)
पितॄंश्च पितृलोकस्थान्देवलोके च देवताः । सन्तर्पयति शान्तात्मा यो ददाति वसुन्धराम् ॥
pitṝṃśca pitṛlokasthāndevaloke ca devatāḥ | santarpayati śāntātmā yo dadāti vasundharām
जो शान्त चित्त होकर पृथ्वी दान करता है, वह पितृलोक में स्थित पितरों को और देवलोक में देवताओं को तृप्त करता है।
श्लोक 30 (13.97.30)
कृशाय म्रियमाणाय वृत्तिग्लानाय सीदते । भूमिं वृत्तिकरीं दत्त्वा सत्री भवति मानवः ॥
kṛśāya mriyamāṇāya vṛttiglānāya sīdate | bhūmiṃ vṛttikarīṃ dattvā satrī bhavati mānavaḥ
जो दुर्बल, मरणासन्न, जीविका के अभाव से क्षीण और कष्ट में पड़े मनुष्य को जीविका देने वाली भूमि दान करता है, वह सत्र करने वाला यज्ञकर्ता बन जाता है।
श्लोक 31 (13.97.31)
यथा धावति गौर्वत्सं स्रवन्ती वत्सला पयः । एवमेव महाभाग भूमिर्भरति भूमिदम् ॥
yathā dhāvati gaurvatsaṃ sravantī vatsalā payaḥ | evameva mahābhāga bhūmirbharati bhūmidam
जैसे वत्सला गौ दूध बहाती हुई अपने बछड़े की ओर दौड़ती है, वैसे ही हे महाभाग, पृथ्वी भूमिदाता का पोषण करती है।
श्लोक 32 (13.97.32)
हलकृष्टां महीं दत्त्वा सबीजां सफलामपि । सोदकं वाऽपि शरणं तथा भवति कामदः ॥
halakṛṣṭāṃ mahīṃ dattvā sabījāṃ saphalāmapi | sodakaṃ vā'pi śaraṇaṃ tathā bhavati kāmadaḥ
जो हल से जोती हुई, बीज और फसल सहित भूमि दान करता है, और जल या घर के साथ भी देता है, वह कामनाओं को पूर्ण करने वाला हो जाता है।
श्लोक 33 (13.97.33)
ब्राह्मणं वृत्तसम्पन्नमाहिताग्निं शुचिव्रतम् । नरः प्रतिग्राह्य महीं न याति यमसादनम् ॥
brāhmaṇaṃ vṛttasampannamāhitāgniṃ śucivratam | naraḥ pratigrāhya mahīṃ na yāti yamasādanam
जो मनुष्य सदाचारी, अग्निहोत्री और शुद्ध व्रत वाले ब्राह्मण से भूमि का प्रतिग्रह कराता है, अर्थात् उसे भूमि दिलाता है, वह यमलोक नहीं जाता।
श्लोक 34 (13.97.34)
यथा चन्द्रमसो वृद्धिरहन्यहनि जायते । तथा भूमिकृतं दानं सस्येसस्ये विवर्धते ॥
yathā candramaso vṛddhirahanyahani jāyate | tathā bhūmikṛtaṃ dānaṃ sasyesasye vivardhate
जैसे चन्द्रमा की वृद्धि दिन-प्रतिदिन होती है, वैसे ही भूमि का दान प्रत्येक फसल के साथ बढ़ता है।
श्लोक 35 (13.97.35)
अत्र गाथा भूमिगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः । याः श्रुत्वा जामदग्न्येन दत्ता भूः काश्यपाय वै ॥
atra gāthā bhūmigītāḥ kīrtayanti purāvidaḥ | yāḥ śrutvā jāmadagnyena dattā bhūḥ kāśyapāya vai
इस विषय में पुराणवेत्ता भूमि के गीत सुनाते हैं, जिन्हें सुनकर जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने कश्यप को पृथ्वी दान दी थी।
भूमिरुवाच
श्लोक 36 (13.97.36)
मामेवादत्त मां दत्त मां दत्त्वा मामवाप्स्यथ । अस्मिँल्लोके परे चैव तद्दत्तं जायते पुनः ॥
māmevādatta māṃ datta māṃ dattvā māmavāpsyatha | asmim̐lloke pare caiva taddattaṃ jāyate punaḥ
"मुझे ही ग्रहण करो; मुझे दो! मुझे देकर तुम मुझे ही पाओगे। इस लोक में और परलोक में भी दिया हुआ फिर उत्पन्न होता है।"
भीष्म उवाच
श्लोक 37 (13.97.37)
य इमां व्याहृतिं वेद ब्राह्मणो वेदसम्मिताम् । श्राद्धस्य हूयमानस्य ब्रह्मभूयं स गच्छति ॥
ya imāṃ vyāhṛtiṃ veda brāhmaṇo vedasammitām | śrāddhasya hūyamānasya brahmabhūyaṃ sa gacchati
जो ब्राह्मण वेद के समान इस वाणी को जानता है, वह श्राद्ध के अवसर पर ब्रह्मभाव, अर्थात् महान् फल, प्राप्त करता है।
श्लोक 38 (13.97.38)
कृत्यानामभिशप्तानामरिष्टशमनं महत् । प्रायश्चित्तं महीं दत्त्वा पुनात्युभयतो दश ॥
kṛtyānāmabhiśaptānāmariṣṭaśamanaṃ mahat | prāyaścittaṃ mahīṃ dattvā punātyubhayato daśa
यह शाप और अभिचार से उत्पन्न अनिष्ट को शान्त करने वाला महान् प्रायश्चित्त है; भूमि दान करके मनुष्य दोनों ओर के दस-दस पुरुषों को पवित्र करता है।
श्लोक 39 (13.97.39)
पुनाति य इदं वेद वेदवादं तथैव च । प्रकृतिः सर्वभूतानां भूमिर्वै शाश्वती मता ॥
punāti ya idaṃ veda vedavādaṃ tathaiva ca | prakṛtiḥ sarvabhūtānāṃ bhūmirvai śāśvatī matā
जो इसे जानता है और इसके वेदवाद को भी जानता है, वह भी पवित्र करता है। पृथ्वी सब प्राणियों की शाश्वत प्रकृति, अर्थात् मूल कारण, मानी गई है।
श्लोक 40 (13.97.40)
अभिषिच्यैव नृपतिं श्रावयेदिममागमम् । यथा श्रुत्वा महीं दद्यान्नादद्यात्साधुतश्च तां ॥
abhiṣicyaiva nṛpatiṃ śrāvayedimamāgamam | yathā śrutvā mahīṃ dadyānnādadyātsādhutaśca tāṃ
राजा का अभिषेक करके उसे यह शास्त्र सुनाना चाहिए, जिससे सुनकर वह पृथ्वी दान करे और सज्जनों से उसे न छीने।
श्लोक 41 (13.97.41)
सोऽयं कृत्स्नो ब्राह्मणार्थो राजार्थश्चाप्यसंशयः । राजा हि धर्मकुशलः प्रथमं भूतिलक्षणम् ॥
so'yaṃ kṛtsno brāhmaṇārtho rājārthaścāpyasaṃśayaḥ | rājā hi dharmakuśalaḥ prathamaṃ bhūtilakṣaṇam
यह सब ब्राह्मणों के लिए है और निस्संदेह राजा के लिए भी; क्योंकि धर्म में कुशल राजा ही समृद्धि का पहला लक्षण है।
श्लोक 42 (13.97.42)
अथ येषामधर्मज्ञो राजा भवति नास्तिकः । न ते सुखं प्रबुध्यन्ति न सुखं प्रस्वपन्ति च ॥
atha yeṣāmadharmajño rājā bhavati nāstikaḥ | na te sukhaṃ prabudhyanti na sukhaṃ prasvapanti ca
जिनका राजा धर्म को न जानने वाला और नास्तिक होता है, वे न सुख से जागते हैं और न सुख से सोते हैं।
श्लोक 43 (13.97.43)
सदा भवन्ति चोद्विग्नास्तस्य दुश्चरितैर्नराः । योगक्षेमा हि बहवो राष्ट्रं नास्याविशन्ति तत् ॥
sadā bhavanti codvignāstasya duścaritairnarāḥ | yogakṣemā hi bahavo rāṣṭraṃ nāsyāviśanti tat
उसके बुरे आचरणों के कारण लोग सदा उद्विग्न रहते हैं, और प्राप्ति तथा रक्षा के अनेक कल्याण उसके राज्य में प्रवेश नहीं करते।
श्लोक 44 (13.97.44)
अथ येषां पुनः प्राज्ञो राजा भवति धार्मिकः । सुखं ते प्रतिबुध्यन्ते सुसुखं प्रस्वपन्ति च ॥
atha yeṣāṃ punaḥ prājño rājā bhavati dhārmikaḥ | sukhaṃ te pratibudhyante susukhaṃ prasvapanti ca
पर जिनका राजा बुद्धिमान और धार्मिक होता है, वे सुख से जागते हैं और बड़े सुख से सोते हैं।
श्लोक 45 (13.97.45)
तस्य राज्ञः शुभे राज्ये कर्मभिर्निर्वृता नराः । योगक्षेमेण वृष्ट्या च विवर्धन्ते स्वकर्मभिः ॥
tasya rājñaḥ śubhe rājye karmabhirnirvṛtā narāḥ | yogakṣemeṇa vṛṣṭyā ca vivardhante svakarmabhiḥ
ऐसे राजा के सुखी राज्य में लोग अपने कर्मों से सन्तुष्ट रहते हैं, और रक्षा, वर्षा तथा अपने कर्तव्यों से बढ़ते हैं।
श्लोक 46 (13.97.46)
स कुलीनः स पुरुषः स बन्धुः स च पुण्यकृत् । स दाता स च विक्रान्तो यो ददाति वसुन्धरां ॥
sa kulīnaḥ sa puruṣaḥ sa bandhuḥ sa ca puṇyakṛt | sa dātā sa ca vikrānto yo dadāti vasundharāṃ
वही कुलीन है, वही पुरुष है, वही बन्धु है, वही पुण्य करने वाला है, वही दाता है और वही पराक्रमी है, जो पृथ्वी दान करता है।
श्लोक 47 (13.97.47)
आदित्या इव दीप्यन्ते तेजसा भुवि मानवाः । ददन्ति वसुधां स्फीतां ये वेदविदुषि द्विजे ॥
ādityā iva dīpyante tejasā bhuvi mānavāḥ | dadanti vasudhāṃ sphītāṃ ye vedaviduṣi dvije
जो मनुष्य वेदज्ञ ब्राह्मण को विशाल पृथ्वी दान करते हैं, वे अपने तेज से पृथ्वी पर आदित्यों के समान चमकते हैं।
श्लोक 48 (13.97.48)
यथा सस्यानि रोहन्ति प्रकीर्णानि महीतले । तथा कामाः प्ररोहन्ति भूमिदानसमार्जिताः ॥
yathā sasyāni rohanti prakīrṇāni mahītale | tathā kāmāḥ prarohanti bhūmidānasamārjitāḥ
जैसे भूमि पर बिखेरे बीज उगते हैं, वैसे ही भूमिदान से अर्जित कामनाएँ फलती हैं।
श्लोक 49 (13.97.49)
आदित्यो वरुणो विष्णुर्ब्रह्मा सोमो हुताशनः । शूलिपाणिश्च भगवान्प्रतिनन्दन्ति भूमिदम् ॥
ādityo varuṇo viṣṇurbrahmā somo hutāśanaḥ | śūlipāṇiśca bhagavānpratinandanti bhūmidam
आदित्य, वरुण, विष्णु, ब्रह्मा, सोम, अग्नि और त्रिशूलधारी भगवान् भूमिदाता से प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 50 (13.97.50)
भूमौ जायन्ति पुरुषा भूमौ निष्ठां व्रजन्ति च । चतुर्विधो हि लोकोऽयं योऽयं भूमिगुणात्मकः ॥
bhūmau jāyanti puruṣā bhūmau niṣṭhāṃ vrajanti ca | caturvidho hi loko'yaṃ yo'yaṃ bhūmiguṇātmakaḥ
पुरुष भूमि पर जन्म लेते हैं और भूमि में ही अपना अन्त पाते हैं। चार प्रकार के प्राणियों वाला यह संसार भूमि के गुणों से ही बना है।
श्लोक 51 (13.97.51)
एषा माता पिता चैव जगतः पृथिवीपते । नानया सदृशं भूतं किञ्चिदस्ति जनाधिप ॥
eṣā mātā pitā caiva jagataḥ pṛthivīpate | nānayā sadṛśaṃ bhūtaṃ kiñcidasti janādhipa
हे पृथ्वीपति, वही जगत् की माता और पिता है। हे जनाधिप, उसके समान कोई प्राणी नहीं है।
श्लोक 52 (13.97.52)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । बृहस्पतेश्च संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | bṛhaspateśca saṃvādamindrasya ca yudhiṣṭhira
इस विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं — बृहस्पति और इन्द्र का संवाद, हे युधिष्ठिर।
श्लोक 53 (13.97.53)
इष्ट्वा क्रतुशतेनाथ महता दक्षिणावता । मघवा वाग्विदांश्रेष्ठं पप्रच्छेदं बृहस्पतिम् ॥
iṣṭvā kratuśatenātha mahatā dakṣiṇāvatā | maghavā vāgvidāṃśreṣṭhaṃ papracchedaṃ bṛhaspatim
बड़ी दक्षिणा वाले सौ महान् यज्ञ करके मघवा (इन्द्र) ने वक्ताओं में श्रेष्ठ बृहस्पति से यह पूछा।
इन्द्र उवाच
श्लोक 54 (13.97.54)
भगवन्केन दानेन स्वर्गतः सुखमेधते । यदक्षयमहार्यं च तद्ब्रूहि वदतांवर ॥
bhagavankena dānena svargataḥ sukhamedhate | yadakṣayamahāryaṃ ca tadbrūhi vadatāṃvara
"भगवन्, किस दान से मनुष्य स्वर्ग जाकर सुख से बढ़ता है? हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, मुझे बताइए कि कौन-सा दान अक्षय और अहरणीय है।"
भीष्म उवाच
श्लोक 55 (13.97.55)
इत्युक्तः स सुरेन्द्रेण ततो देवपुलोहितः । बृहस्पतिर्बृहत्तेजाः प्रत्युवाच शतक्रतुम् ॥
ityuktaḥ sa surendreṇa tato devapulohitaḥ | bṛhaspatirbṛhattejāḥ pratyuvāca śatakratum
देवराज के इस प्रकार कहने पर देवताओं के पुरोहित महातेजस्वी बृहस्पति ने शतक्रतु को उत्तर दिया।
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 56 (13.97.56)
सुवर्णदानं गोदानं भूमिदानं च वृत्रहन् । विद्यादानं च कन्यानां दानं पापहरं परम् । दददेतान्महाप्राज्ञः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
suvarṇadānaṃ godānaṃ bhūmidānaṃ ca vṛtrahan | vidyādānaṃ ca kanyānāṃ dānaṃ pāpaharaṃ param | dadadetānmahāprājñaḥ sarvapāpaiḥ pramucyate
हे वृत्रहन्, स्वर्ण का दान, गौ का दान और भूमि का दान, तथा विद्या का दान और कन्याओं का दान — ये पाप हरने वाले परम दान हैं। इन्हें देने वाला महाप्राज्ञ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 57 (13.97.57)
न भूमिदानाद्देवेन्द्र परं किञ्चिदिति प्रभो । विशिष्टमिति मन्येऽहं यथा प्राहुर्मनीषिणः ॥
na bhūmidānāddevendra paraṃ kiñciditi prabho | viśiṣṭamiti manye'haṃ yathā prāhurmanīṣiṇaḥ
हे देवेन्द्र, भूमिदान से बढ़कर कुछ नहीं है। हे प्रभो, मैं उसे सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ, जैसा मनीषी कहते हैं।
श्लोक 58 (13.97.58)
ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा राष्ट्रघातेऽथ स्वामिनः । कुलस्त्रीणां परिभवे मृतास्ते भूमिपैः समाः ॥
brāhmaṇārthe gavārthe vā rāṣṭraghāte'tha svāminaḥ | kulastrīṇāṃ paribhave mṛtāste bhūmipaiḥ samāḥ
जो ब्राह्मण के लिए, गौओं के लिए, राज्य पर आघात होने पर, स्वामी के लिए, या कुलस्त्रियों का अपमान होने पर मारे जाते हैं, वे भूमि के स्वामी राजाओं के समान माने जाते हैं।
श्लोक 59 (13.97.59)
ये शूरा निहता युद्धे स्वर्याता रणगृद्धिनः । सर्वे ते विबुधश्रेष्ठ नातिक्रामन्ति भूमिदम् ॥
ye śūrā nihatā yuddhe svaryātā raṇagṛddhinaḥ | sarve te vibudhaśreṣṭha nātikrāmanti bhūmidam
जो शूर युद्ध में मारे गए और युद्ध के अभिलाषी होकर स्वर्ग गए, हे देवश्रेष्ठ, वे सब भी भूमिदाता से आगे नहीं बढ़ते।
श्लोक 60 (13.97.60)
भर्तुर्निःश्रेयसे युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः । ब्राह्मलोकगता युक्ता नातिक्रामन्ति भूमिदम् ॥
bharturniḥśreyase yuktāstyaktātmāno raṇe hatāḥ | brāhmalokagatā yuktā nātikrāmanti bhūmidam
जो अपने स्वामी के कल्याण में लगे रहकर प्राण त्यागकर रण में मारे गए और ब्रह्मलोक को गए हैं, वे भी भूमिदाता से आगे नहीं बढ़ते।
श्लोक 61 (13.97.61)
पञ्च पूर्वा हि पुरुषाः षडन्ये वसुधां गताः । एकादश ददद्भूमिं परित्रातीह मानवः ॥
pañca pūrvā hi puruṣāḥ ṣaḍanye vasudhāṃ gatāḥ | ekādaśa dadadbhūmiṃ paritrātīha mānavaḥ
पाँच पूर्वज और छह दूसरे पुरुष पृथ्वी को प्राप्त हो चुके हैं; भूमि दान करने वाला मनुष्य यहाँ इन ग्यारहों का उद्धार करता है।
श्लोक 62 (13.97.62)
रत्नोपकीर्णां वसुधां यो ददाति पुरंदर । स मुक्तः सर्वकलुषैः स्वर्गलोके महीयते ॥
ratnopakīrṇāṃ vasudhāṃ yo dadāti puraṃdara | sa muktaḥ sarvakaluṣaiḥ svargaloke mahīyate
हे पुरन्दर, जो रत्नों से भरी पृथ्वी दान करता है, वह सब कलुषों से मुक्त होकर स्वर्गलोक में पूजित होता है।
श्लोक 63 (13.97.63)
महीं स्फीतां ददद्राजन्सर्वकामगुणान्विताम् । राजाधिराजो भवति तद्धि दानमनुत्तमम् ॥
mahīṃ sphītāṃ dadadrājansarvakāmaguṇānvitām | rājādhirājo bhavati taddhi dānamanuttamam
हे राजन्, जो राजा समस्त इच्छित गुणों से युक्त विशाल पृथ्वी दान करता है, वह राजाधिराज होता है; क्योंकि वह दान सर्वोत्तम है।
श्लोक 64 (13.97.64)
सर्वकामसमायुक्तां काश्यपीं यः प्रयच्छति । सर्वभूतानि मन्यन्ते मां ददातीति वासव ॥
sarvakāmasamāyuktāṃ kāśyapīṃ yaḥ prayacchati | sarvabhūtāni manyante māṃ dadātīti vāsava
हे वासव, जो सब कामनाओं से युक्त पृथ्वी को देता है, उसके विषय में सब प्राणी मानते हैं कि "यह मुझे ही दे रहा है।"
श्लोक 65 (13.97.65)
सर्वकामदुघां धेनुं सर्वकामगुणान्विताम् । ददाति यः सहस्राक्ष स्वर्गं याति स मानवः ॥
sarvakāmadughāṃ dhenuṃ sarvakāmaguṇānvitām | dadāti yaḥ sahasrākṣa svargaṃ yāti sa mānavaḥ
हे सहस्राक्ष, जो मनुष्य सब कामनाओं को दुहने वाली और सब इच्छित गुणों से युक्त धेनु देता है, वह स्वर्ग जाता है।
श्लोक 66 (13.97.66)
मधुसर्पिःप्रवाहिण्यः पयोदधिवहास्तथा । सरितस्तर्पयन्तीह सुरेन्द्र वसुधाप्रदम् ॥
madhusarpiḥpravāhiṇyaḥ payodadhivahāstathā | saritastarpayantīha surendra vasudhāpradam
हे सुरेन्द्र, मधु और घी बहाने वाली तथा दूध-दही वहन करने वाली नदियाँ यहाँ भूमिदाता को तृप्त करती हैं।
श्लोक 67 (13.97.67)
भूमिप्रदानान्नृपतिर्मुच्यते सर्वकिल्बिषात् । न हि भूमिप्रदानेन दानमन्यद्विशिष्यते ॥
bhūmipradānānnṛpatirmucyate sarvakilbiṣāt | na hi bhūmipradānena dānamanyadviśiṣyate
भूमि के दान से राजा सब पापों से मुक्त हो जाता है; भूमिदान से बढ़कर कोई दूसरा दान नहीं है।
श्लोक 68 (13.97.68)
ददाति यः समुद्रान्तां पृथिवीं शस्त्रनिर्जिताम् । तं जनाः कथयन्तीह यावद्धरति गौरियम् ॥
dadāti yaḥ samudrāntāṃ pṛthivīṃ śastranirjitām | taṃ janāḥ kathayantīha yāvaddharati gauriyam
जो समुद्र तक फैली, शस्त्र से जीती हुई पृथ्वी दान करता है, उसकी चर्चा लोग तब तक करते हैं जब तक यह पृथ्वी टिकी रहती है।
श्लोक 69 (13.97.69)
पुण्यामृद्धिरसां भूमिं यो ददाति पुरंदर । न तस्य लोकाः क्षीयन्ते भूमिदानगुणान्विताः ॥
puṇyāmṛddhirasāṃ bhūmiṃ yo dadāti puraṃdara | na tasya lokāḥ kṣīyante bhūmidānaguṇānvitāḥ
हे पुरन्दर, जो पवित्र और रस-समृद्ध भूमि दान करता है, भूमिदान के गुण से प्राप्त उसके लोक कभी क्षीण नहीं होते।
श्लोक 70 (13.97.70)
सर्वदा पार्थिवेनेह सततं भूतिमिच्छता । भूर्देया विधिवच्छक्र पात्रे सुखमभीप्सुना ॥
sarvadā pārthiveneha satataṃ bhūtimicchatā | bhūrdeyā vidhivacchakra pātre sukhamabhīpsunā
हे शक्र, जो राजा सदा ऐश्वर्य चाहता है और सुख की इच्छा रखता है, उसे विधिपूर्वक सुपात्र को भूमि देनी चाहिए।
श्लोक 71 (13.97.71)
अपि कृत्वा नरः पापं भूमिं दत्त्वा द्विजातये । समुत्सृजति तत्पापं जीर्णां त्वचमिवोरगः ॥
api kṛtvā naraḥ pāpaṃ bhūmiṃ dattvā dvijātaye | samutsṛjati tatpāpaṃ jīrṇāṃ tvacamivoragaḥ
पाप करके भी जो मनुष्य द्विज को भूमि देता है, वह उस पाप को वैसे ही उतार फेंकता है जैसे साँप पुरानी केंचुली।
श्लोक 72 (13.97.72)
सागरान्सरितः शैलान्काननानि च सर्वशः । सर्वमेतन्नरः शक्र ददाति वसुधां ददत् ॥
sāgarānsaritaḥ śailānkānanāni ca sarvaśaḥ | sarvametannaraḥ śakra dadāti vasudhāṃ dadat
हे शक्र, समुद्र, नदियाँ, पर्वत और सब ओर के वन — ये सब मनुष्य पृथ्वी का दान करते हुए दे देता है।
श्लोक 73 (13.97.73)
तटाकान्युदपानानि स्रोतांसि च सरांसि च । स्नेहान्सर्वरसांश्चैव ददाति वसुधां ददत् ॥
taṭākānyudapānāni srotāṃsi ca sarāṃsi ca | snehānsarvarasāṃścaiva dadāti vasudhāṃ dadat
तालाब, कुएँ, झरने और सरोवर, स्नेह-द्रव्य और सब प्रकार के रस — ये सब वह पृथ्वी का दान करते हुए दे देता है।
श्लोक 74 (13.97.74)
ओषधीर्वीर्यसम्पन्नानगान्पुष्पफलान्वितान् । काननोपलशैलांश्च ददाति वसुधां ददत् ॥
oṣadhīrvīryasampannānagānpuṣpaphalānvitān | kānanopalaśailāṃśca dadāti vasudhāṃ dadat
शक्तिशाली औषधियाँ, फूल-फल से लदे वृक्ष, वन, शिलाएँ और पर्वत — ये सब वह पृथ्वी का दान करते हुए दे देता है।
श्लोक 75 (13.97.75)
अग्निष्टोमप्रभृतिभिरिष्ट्वा च स्वाप्तदक्षिणैः । न तत्फलमवाप्नोति भूमिदानाद्यदश्नुते ॥
agniṣṭomaprabhṛtibhiriṣṭvā ca svāptadakṣiṇaiḥ | na tatphalamavāpnoti bhūmidānādyadaśnute
अग्निष्टोम आदि यज्ञ पूरी दक्षिणा के साथ करके भी मनुष्य वह फल नहीं पाता जो भूमिदान से प्राप्त होता है।
श्लोक 76 (13.97.76)
दाता दशानुगृह्णाति दश हन्ति तथा क्षिपन् । पूर्वदत्तां हरन्भूमिं नरकायोपगच्छति ॥
dātā daśānugṛhṇāti daśa hanti tathā kṣipan | pūrvadattāṃ haranbhūmiṃ narakāyopagacchati
दाता दस को अनुगृहीत करता है, और उसे फेंक देने वाला उसी प्रकार दस का नाश करता है। पहले दी हुई भूमि को वापस लेने वाला नरक में जाता है।
श्लोक 77 (13.97.77)
न ददाति प्रतिश्रुत्य दत्त्वाऽपि च हरेत्तु यः । स बद्धो वारुणैः पाशैस्तप्यते मृत्युशासनात् ॥
na dadāti pratiśrutya dattvā'pi ca harettu yaḥ | sa baddho vāruṇaiḥ pāśaistapyate mṛtyuśāsanāt
जो वचन देकर नहीं देता, या देकर फिर छीन लेता है, वह वरुण के पाशों में बँधा हुआ मृत्यु के शासन से तड़पता है।
श्लोक 78 (13.97.78)
आहिताग्निं सदायज्ञं कृशवृत्तिं प्रियातिथिम् । ये भरन्ति द्विजश्रेष्ठं नोपसर्पन्ति ते यमम् ॥
āhitāgniṃ sadāyajñaṃ kṛśavṛttiṃ priyātithim | ye bharanti dvijaśreṣṭhaṃ nopasarpanti te yamam
जो अग्निहोत्री, सदा यज्ञ करने वाले, अल्प जीविका वाले और अतिथिप्रिय श्रेष्ठ ब्राह्मण का भरण-पोषण करते हैं, वे यम के पास नहीं जाते।
श्लोक 79 (13.97.79)
ब्राह्मणेष्वनृणीभूतः पार्थिवः स्यात्पुरंदर । इतरेषां तु वर्णानां तारयेत्कृशदुर्बलान् ॥
brāhmaṇeṣvanṛṇībhūtaḥ pārthivaḥ syātpuraṃdara | itareṣāṃ tu varṇānāṃ tārayetkṛśadurbalān
हे पुरन्दर, राजा को ब्राह्मणों के प्रति ऋणमुक्त रहना चाहिए; और दूसरे वर्णों के दुर्बल और कृश लोगों का उद्धार करना चाहिए।
श्लोक 80 (13.97.80)
नाच्छिन्द्यात्स्पर्शितां भूमिं परेण त्रिदशाधिप । ब्राह्मणस्य सुरश्रेष्ठ कृशवृत्तेः कदाचन ॥
nācchindyātsparśitāṃ bhūmiṃ pareṇa tridaśādhipa | brāhmaṇasya suraśreṣṭha kṛśavṛtteḥ kadācana
हे त्रिदशाधिप, हे देवश्रेष्ठ, दूसरे द्वारा किसी अल्प जीविका वाले ब्राह्मण को दी हुई भूमि को कभी नहीं छीनना चाहिए।
श्लोक 81 (13.97.81)
यथाश्रु पतितं तेषां दीनानामथ सीदताम् । ब्राह्मणानां हृते क्षेत्रे हन्यात्त्रिपुरुषं कुलम् ॥
yathāśru patitaṃ teṣāṃ dīnānāmatha sīdatām | brāhmaṇānāṃ hṛte kṣetre hanyāttripuruṣaṃ kulam
दीन और कष्ट में डूबे ब्राह्मणों का खेत छीन लिए जाने पर उनके जो आँसू गिरते हैं, वे तीन पीढ़ियों तक कुल का नाश कर देते हैं।
श्लोक 82 (13.97.82)
भूमिपालं च्युतं राष्ट्राद्यस्तु संस्थापयेत्पुनः । तस्य वासः सहस्राक्ष नाकपृष्ठे महीयते ॥
bhūmipālaṃ cyutaṃ rāṣṭrādyastu saṃsthāpayetpunaḥ | tasya vāsaḥ sahasrākṣa nākapṛṣṭhe mahīyate
हे सहस्राक्ष, जो राज्य से निकाले हुए राजा को फिर स्थापित करता है, उसका निवास स्वर्ग के शिखर पर सम्मानित होता है।
श्लोक 83 (13.97.83)
सुनिर्मितां सुविक्रीतां सुभृतां स्थापयेन्नृप । इक्षुभिः सन्ततां भूमिं यवगोधूमसालिनीम् ॥
sunirmitāṃ suvikrītāṃ subhṛtāṃ sthāpayennṛpa | ikṣubhiḥ santatāṃ bhūmiṃ yavagodhūmasālinīm
हे राजन्, राजा सुगठित, भलीभाँति खरीदी हुई और भलीभाँति पोषित भूमि दे, जो ईख से भरी हो और जौ-गेहूँ से समृद्ध हो,
श्लोक 84 (13.97.84)
गोश्ववाहनपूर्णां वा यो ददाति वसुन्धराम् । विमुक्तः सर्वपापेभ्यः स्वर्गलोके महीयते ॥
gośvavāhanapūrṇāṃ vā yo dadāti vasundharām | vimuktaḥ sarvapāpebhyaḥ svargaloke mahīyate
अथवा गौओं, घोड़ों और वाहनों से भरी हुई, जो ऐसी पृथ्वी देता है, वह सब पापों से मुक्त होकर स्वर्गलोक में पूजित होता है।
श्लोक 85 (13.97.85)
निधिगर्भां ददद्भूमिं सर्वरत्नपरिच्छदाम् । अक्षयाँल्लभते लोकान्भूमिसत्रं हि तस्य तत् ॥
nidhigarbhāṃ dadadbhūmiṃ sarvaratnaparicchadām | akṣayām̐llabhate lokānbhūmisatraṃ hi tasya tat
जो निधि से भरी और सब रत्नों से सज्जित भूमि देता है, वह अक्षय लोक पाता है; क्योंकि वह उसका भूमि-रूप यज्ञ-सत्र है।
श्लोक 86 (13.97.86)
विधूय कलुषं सर्वं विरजाः सम्मतः सताम् । लोके महीयते सद्भिर्यो ददाति वसुन्धराम् ॥
vidhūya kaluṣaṃ sarvaṃ virajāḥ sammataḥ satām | loke mahīyate sadbhiryo dadāti vasundharām
जो पृथ्वी दान करता है, वह सब कलुष झाड़कर, रजोगुण से रहित और सज्जनों का माना हुआ होकर संसार में सज्जनों द्वारा पूजित होता है।
श्लोक 87 (13.97.87)
यथाऽप्सु पतितः शक्र तैलबिन्दुर्विसर्पति । तथा भूमिकृतं दानं सस्येसस्ये विवर्धते ॥
yathā'psu patitaḥ śakra tailabindurvisarpati | tathā bhūmikṛtaṃ dānaṃ sasyesasye vivardhate
हे शक्र, जैसे जल में गिरी तेल की बूँद फैलती है, वैसे ही भूमि का दान प्रत्येक फसल के साथ बढ़ता है।
श्लोक 88 (13.97.88)
ये रणाग्रे महीपालाः शूराः समितिशोभनाः । वध्यन्तेऽभिमुखाः शक्र ब्रह्मलोकं व्रजन्ति ते ॥
ye raṇāgre mahīpālāḥ śūrāḥ samitiśobhanāḥ | vadhyante'bhimukhāḥ śakra brahmalokaṃ vrajanti te
हे शक्र, जो राजा युद्ध के अग्रभाग में शूर और रणशोभी होकर शत्रु की ओर मुख किए मारे जाते हैं, वे ब्रह्मलोक जाते हैं।
श्लोक 89 (13.97.89)
नृत्तगीतपरा नार्यो दिव्यमाल्यविभूषिताः । उपतिष्ठन्ति देवेन्द्र यथा भूमिप्रदं दिवि ॥
nṛttagītaparā nāryo divyamālyavibhūṣitāḥ | upatiṣṭhanti devendra yathā bhūmipradaṃ divi
हे देवेन्द्र, नृत्य और गीत में निपुण, दिव्य मालाओं से सजी स्त्रियाँ स्वर्ग में भूमिदाता की सेवा में उपस्थित रहती हैं।
श्लोक 90 (13.97.90)
मोदते च सुखं स्वर्गे देवगन्धर्वपूजितः । यो ददाति महीं सम्यग्विधिनेह द्विजातये ॥
modate ca sukhaṃ svarge devagandharvapūjitaḥ | yo dadāti mahīṃ samyagvidhineha dvijātaye
जो विधिपूर्वक द्विज को भलीभाँति भूमि देता है, वह स्वर्ग में देवताओं और गन्धर्वों से पूजित होकर सुख से आनन्द करता है।
श्लोक 91 (13.97.91)
शतमप्सरसश्चैव दिव्यमाल्यविभूषिताः । उपतिष्ठन्ति देवेन्द्र ब्रह्मलोके धराप्रदम् ॥
śatamapsarasaścaiva divyamālyavibhūṣitāḥ | upatiṣṭhanti devendra brahmaloke dharāpradam
हे देवेन्द्र, दिव्य मालाओं से सजी सौ अप्सराएँ ब्रह्मलोक में भूमिदाता की सेवा में उपस्थित रहती हैं।
श्लोक 92 (13.97.92)
उपतिष्ठन्ति पुण्यानि सदा भूमिप्रदं नरम् । शङ्खं भद्रासनं छत्रं वराश्वा वरवाहनम् ॥
upatiṣṭhanti puṇyāni sadā bhūmipradaṃ naram | śaṅkhaṃ bhadrāsanaṃ chatraṃ varāśvā varavāhanam
भूमि देने वाले मनुष्य के पास पुण्य सदा उपस्थित रहते हैं — शंख, उत्तम आसन, छत्र, श्रेष्ठ घोड़े और श्रेष्ठ वाहन।
श्लोक 93 (13.97.93)
भूमिप्रदानात्पुष्पाणि हिरण्यनिचयास्तथा । आज्ञा सदाऽप्रतिहता जयशब्दा वसूनि च ॥
bhūmipradānātpuṣpāṇi hiraṇyanicayāstathā | ājñā sadā'pratihatā jayaśabdā vasūni ca
भूमिदान से फूल, सोने के ढेर, कभी न रुकने वाली आज्ञा, जय-घोष और धन प्राप्त होते हैं।
श्लोक 94 (13.97.94)
भूमिदानस्य पुण्यानि फलं स्वर्गः पुरन्दर । हिरण्यपुष्पाश्चौषध्यः कुशकाञ्चनशाद्वलाः ॥
bhūmidānasya puṇyāni phalaṃ svargaḥ purandara | hiraṇyapuṣpāścauṣadhyaḥ kuśakāñcanaśādvalāḥ
हे पुरन्दर, ये भूमिदान के पुण्य हैं और उसका फल स्वर्ग है: सुनहरे फूलों वाली औषधियाँ, कुश, सोना और हरी घास के मैदान।
श्लोक 95 (13.97.95)
अमृतप्रसवां भूमिं प्राप्नोति पुरुषो ददत् ॥
amṛtaprasavāṃ bhūmiṃ prāpnoti puruṣo dadat
पृथ्वी का दान करता हुआ मनुष्य अमृत को जन्म देने वाली भूमि को प्राप्त करता है।
श्लोक 96 (13.97.96)
नास्ति भूमिसमं दानं नास्ति मातृसमो गुरुः । नास्ति सत्यसमो धर्मो नास्ति दानसमो निधिः ॥
nāsti bhūmisamaṃ dānaṃ nāsti mātṛsamo guruḥ | nāsti satyasamo dharmo nāsti dānasamo nidhiḥ
भूमि के समान कोई दान नहीं, माता के समान कोई गुरु नहीं, सत्य के समान कोई धर्म नहीं और दान के समान कोई निधि नहीं।
भीष्म उवाच
श्लोक 97 (13.97.97)
एतदाङ्गिरसाच्छ्रुत्वा वासवो वसुधामिमाम् । वसुरत्नसमाकीर्णां ददावाङ्गिरसे तदा ॥
etadāṅgirasācchrutvā vāsavo vasudhāmimām | vasuratnasamākīrṇāṃ dadāvāṅgirase tadā
अंगिरा के पुत्र (बृहस्पति) से यह सुनकर वासव (इन्द्र) ने धन और रत्नों से भरी यह पृथ्वी तब आंगिरस को दान कर दी।
श्लोक 98 (13.97.98)
य इदं श्रावयेच्छ्राद्धे भूमिदानस्य संस्तवम् । न तस्य रक्षसां भागो नासुराणां भवत्युत ॥
ya idaṃ śrāvayecchrāddhe bhūmidānasya saṃstavam | na tasya rakṣasāṃ bhāgo nāsurāṇāṃ bhavatyuta
जो श्राद्ध में भूमिदान की यह स्तुति सुनाता है, उसके श्राद्ध में राक्षसों और असुरों का कोई भाग नहीं होता।
श्लोक 99 (13.97.99)
अक्षयं च भवेद्दत्तं पितृभ्यस्तन्न संशयः । तस्माच्छ्राद्धेष्विदं विद्वान्भुञ्जतः श्रावयेद्द्विजान् ॥
akṣayaṃ ca bhaveddattaṃ pitṛbhyastanna saṃśayaḥ | tasmācchrāddheṣvidaṃ vidvānbhuñjataḥ śrāvayeddvijān
पितरों को दिया हुआ अक्षय हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। इसलिए विद्वान् श्राद्धों में भोजन करते हुए द्विजों को यह सुनाए।
श्लोक 100 (13.97.100)
इत्येतत्सर्वदानानां श्रेष्ठमुक्तं तवानघ । मया भरतशार्दूल किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
ityetatsarvadānānāṃ śreṣṭhamuktaṃ tavānagha | mayā bharataśārdūla kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
हे अनघ, हे भरतशार्दूल, इस प्रकार मैंने तुम्हें सब दानों में श्रेष्ठ यह दान बता दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?