अनुशासन पर्व · अध्याय 96
दान और प्रजा-रक्षा का राजधर्म
युधिष्ठिर पूछते हैं कि दान, यज्ञ और कर्मों में किसका फल सबसे बड़ा है और दान किन्हें देना चाहिए। भीष्म बताते हैं कि क्षत्रिय का कर्म कठोर है और दान उसे पवित्र करता है; उसे सुपात्र ब्राह्मणों का पोषण करना चाहिए, उनके साथ अपना धन बाँटना चाहिए और यज्ञ के लिए प्रजा से बलपूर्वक धन नहीं लेना चाहिए। जो राजा विद्वानों को भूखा रहने देता या प्रजा की रक्षा नहीं करता, वह अपना और राज्य का नाश करता है, और प्रजा के पाप और पुण्य का एक चौथाई भाग राजा को मिलता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.96.1)
दानं यज्ञः क्रिया चेह किंस्वित्प्रेत्य महाफलम् । कस्य ज्यायः फलं प्रोक्तं कीदृशेभ्यः कथं कदा ॥
dānaṃ yajñaḥ kriyā ceha kiṃsvitpretya mahāphalam | kasya jyāyaḥ phalaṃ proktaṃ kīdṛśebhyaḥ kathaṃ kadā
दान, यज्ञ और कर्म — इनमें से परलोक में महान् फल किससे मिलता है? किसका फल बड़ा बताया गया है, तथा किस प्रकार के पात्रों को, किस विधि से और कब दान देना चाहिए?
श्लोक 2 (13.96.2)
एतदिच्छामि विज्ञातुं याथातथ्येन भारत । विद्वञ्जिज्ञासमानाय दानधर्मान्प्रचक्ष्व मे ॥
etadicchāmi vijñātuṃ yāthātathyena bhārata | vidvañjijñāsamānāya dānadharmānpracakṣva me
हे भारत, मैं यह बात ठीक-ठीक जानना चाहता हूँ। हे विद्वान्, मैं जानने का इच्छुक हूँ; मुझे दान के धर्म समझाइए।
श्लोक 3 (13.96.3)
अन्तर्वेद्यां च यद्दत्तं श्रद्धया चानृशंस्यतः । किंस्विन्नैःश्रेयसं तात तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
antarvedyāṃ ca yaddattaṃ śraddhayā cānṛśaṃsyataḥ | kiṃsvinnaiḥśreyasaṃ tāta tanme brūhi pitāmaha
यज्ञवेदी के भीतर श्रद्धा से और निर्दयता के बिना जो दिया जाता है, क्या वही परम कल्याणकारी है? हे तात, हे पितामह, यह मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 4 (13.96.4)
रौद्रं कर्म क्षत्रियस्य सततं तात वर्तते । नास्य वैतानिकफलं विना दानं सुपावनम् ॥
raudraṃ karma kṣatriyasya satataṃ tāta vartate | nāsya vaitānikaphalaṃ vinā dānaṃ supāvanam
हे तात, क्षत्रिय का कर्म सदा कठोर होता है। वैदिक यज्ञों के फल के बिना उसके लिए दान जैसा पवित्र करने वाला कुछ नहीं है।
श्लोक 5 (13.96.5)
न तु पापकृतां राज्ञां याजका द्विजसत्तमाः । धने सत्यप्रदातॄणां प्रतिगृह्णन्ति साधवः ॥
na tu pāpakṛtāṃ rājñāṃ yājakā dvijasattamāḥ | dhane satyapradātṝṇāṃ pratigṛhṇanti sādhavaḥ
श्रेष्ठ द्विज पुरोहित पाप करने वाले राजाओं से दान नहीं लेते; सज्जन केवल उन्हीं के धन से ग्रहण करते हैं जो सत्य के साथ देते हैं।
श्लोक 6 (13.96.6)
प्रतिगृह्णन्ति न तु चेद्यद्रोषादाप्तदक्षिणैः । एतस्मात्कारणाद्यज्ञैर्यजेद्राजाऽऽप्तदक्षिणैः ॥
pratigṛhṇanti na tu cedyadroṣādāptadakṣiṇaiḥ | etasmātkāraṇādyajñairyajedrājā''ptadakṣiṇaiḥ
यदि वे क्रोध या अप्रसन्नता के कारण ग्रहण न करें, तो इसी कारण राजा को पूरी दक्षिणा देकर यज्ञ करने चाहिए।
श्लोक 7 (13.96.7)
अथ चेत्प्रतिगृह्णीयुर्दद्यादहरहर्नृपः । श्रद्धामास्थाय परमां पावनं ह्येतदुत्तमम् ॥
atha cetpratigṛhṇīyurdadyādaharaharnṛpaḥ | śraddhāmāsthāya paramāṃ pāvanaṃ hyetaduttamam
और यदि वे ग्रहण करें, तो राजा परम श्रद्धा का आश्रय लेकर प्रतिदिन दान दे; क्योंकि यही सबसे उत्तम पवित्र करने वाला कर्म है।
श्लोक 8 (13.96.8)
ब्राह्मणांस्तर्पयन्द्रव्यैः स वै यज्ञोऽनुपद्रवः । मैत्रान्साधून्वेदविदः शीलवृत्ततपोर्जितान् ॥
brāhmaṇāṃstarpayandravyaiḥ sa vai yajño'nupadravaḥ | maitrānsādhūnvedavidaḥ śīlavṛttataporjitān
धन से ब्राह्मणों को तृप्त करना निश्चय ही निर्विघ्न यज्ञ है — उन मित्रभाव वाले, सज्जन, वेदज्ञ तथा शील, सदाचार और तप से सम्पन्न ब्राह्मणों को।
श्लोक 9 (13.96.9)
यत्ते ते न करिष्यन्ति कृतं ते न भविष्यति । यज्ञान्साधय साधुभ्यः स्वाद्वन्नान्दक्षिणावतः ॥
yatte te na kariṣyanti kṛtaṃ te na bhaviṣyati | yajñānsādhaya sādhubhyaḥ svādvannāndakṣiṇāvataḥ
यदि वे आपसे यह ग्रहण नहीं करेंगे, तो आपको उसका पुण्य नहीं मिलेगा। इसलिए सज्जनों के लिए मधुर अन्न और उचित दक्षिणा के साथ यज्ञ सम्पन्न कीजिए।
श्लोक 10 (13.96.10)
इष्टं दत्तं च मन्येथा आत्मानं दानकर्मणा । पूजयेथा यायजूकांस्तवाप्यंशो भवेद्यथा ॥
iṣṭaṃ dattaṃ ca manyethā ātmānaṃ dānakarmaṇā | pūjayethā yāyajūkāṃstavāpyaṃśo bhavedyathā
दान-कर्म से अपने को यज्ञ और दान करने वाला मानिए। यज्ञ करने वालों का सम्मान कीजिए, जिससे आपको भी उनके पुण्य का भाग मिले।
श्लोक 11 (13.96.11)
विद्वद्भ्यः सम्प्रदानेन तत्राप्यंशोऽस्य पूजया । यज्वभ्यश्चाथ विद्वद्भ्यो दत्त्वा लोकं प्रदापयेत् । प्रदद्याज्ज्ञानदातॄणां ज्ञानदानांशभाग्भवेत् ॥
vidvadbhyaḥ sampradānena tatrāpyaṃśo'sya pūjayā | yajvabhyaścātha vidvadbhyo dattvā lokaṃ pradāpayet | pradadyājjñānadātṝṇāṃ jñānadānāṃśabhāgbhavet
विद्वानों को दान देने और उनका सम्मान करने से दाता को भी उनके पुण्य का भाग मिलता है। यज्ञ करने वालों और विद्वानों को देकर वह अपने लिए लोक प्राप्त कराता है। जो ज्ञान देने वाले हैं उन्हें दान दे, तो वह ज्ञान-दान के पुण्य का भागी होता है।
श्लोक 12 (13.96.12)
प्रजावतो भरेथाश्च ब्राह्मणान्बहुभारिणः । प्रजावांस्तेन भवति यथा जनयिता तथा ॥
prajāvato bharethāśca brāhmaṇānbahubhāriṇaḥ | prajāvāṃstena bhavati yathā janayitā tathā
संतान वाले और बहुत लोगों का भरण-पोषण करने वाले ब्राह्मणों का भी पोषण कीजिए; इससे आप संतानवान हो जाते हैं, मानो उनके जनक हों।
श्लोक 13 (13.96.13)
यावतः साधुधर्मान्वै सन्तः संवर्धयन्त्युत । सर्वस्वैश्चापि भर्तव्या नरा ये बहुकारिणः ॥
yāvataḥ sādhudharmānvai santaḥ saṃvardhayantyuta | sarvasvaiścāpi bhartavyā narā ye bahukāriṇaḥ
जितने भी सज्जन साधुओं के धर्मों को बढ़ाते हैं, और जो लोग दूसरों का बहुत उपकार करते हैं, उनका पोषण अपना सर्वस्व देकर भी करना चाहिए।
श्लोक 14 (13.96.14)
समृद्धः सम्प्रयच्छ त्वं ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिर । धेनूरनडुहोऽन्नानि च्छत्रं वासांस्युपानहौ ॥
samṛddhaḥ samprayaccha tvaṃ brāhmaṇebhyo yudhiṣṭhira | dhenūranaḍuho'nnāni cchatraṃ vāsāṃsyupānahau
हे युधिष्ठिर, समृद्ध होकर ब्राह्मणों को गायें, बैल, अन्न, छाता, वस्त्र और जूते दीजिए।
श्लोक 15 (13.96.15)
आज्यानि यजमानेभ्यस्तथाऽन्नानि च भारत । अश्ववन्ति च यानानि वेश्मानि शयनानि च ॥
ājyāni yajamānebhyastathā'nnāni ca bhārata | aśvavanti ca yānāni veśmāni śayanāni ca
हे भारत, यज्ञ करने वालों को घी और अन्न दीजिए; घोड़ों से जुते रथ, घर और शय्याएँ भी दीजिए।
श्लोक 16 (13.96.16)
एते देयाः पुष्टिमद्भिर्लघूपायाश्च भारत । अजुगुप्सांश्च विज्ञाय ब्राह्मणान्वृत्तिकर्शितान् ॥
ete deyāḥ puṣṭimadbhirlaghūpāyāśca bhārata | ajugupsāṃśca vijñāya brāhmaṇānvṛttikarśitān
हे भारत, ये वस्तुएँ समृद्ध लोगों को देनी चाहिए, और अल्प साधन वालों को भी, जब वे जान लें कि ब्राह्मण निर्दोष हैं और जीविका के अभाव से क्षीण हो गए हैं।
श्लोक 17 (13.96.17)
उपच्छन्नं प्रकाशं वा वृत्त्या तान्प्रतिपालय । राजसूयाश्वमेधाभ्यां श्रेयस्तत्क्षत्रियान्प्रति ॥
upacchannaṃ prakāśaṃ vā vṛttyā tānpratipālaya | rājasūyāśvamedhābhyāṃ śreyastatkṣatriyānprati
चाहे छिपाकर हो या खुले रूप से, जीविका देकर उनका पालन कीजिए। क्षत्रियों के लिए यह राजसूय और अश्वमेध यज्ञों से भी श्रेष्ठ है।
श्लोक 18 (13.96.18)
एवं पापैर्विनिर्मुक्तस्त्वं पूतः स्वर्गमाप्स्यसि । सञ्चयित्वा पुनः कोशं यद्राष्ट्रं पालयिष्यसि ॥
evaṃ pāpairvinirmuktastvaṃ pūtaḥ svargamāpsyasi | sañcayitvā punaḥ kośaṃ yadrāṣṭraṃ pālayiṣyasi
इस प्रकार पापों से मुक्त और पवित्र होकर आप स्वर्ग पाएँगे — खजाने को फिर भरकर, क्योंकि आप राज्य की रक्षा करेंगे।
श्लोक 19 (13.96.19)
तेन त्वं ब्रह्मभूयत्वमवाप्स्यसि धनानि च । आत्मनश्च परेषां च वृत्तिं संरक्ष भारत ॥
tena tvaṃ brahmabhūyatvamavāpsyasi dhanāni ca | ātmanaśca pareṣāṃ ca vṛttiṃ saṃrakṣa bhārata
इससे आप ब्रह्मभाव और धन भी प्राप्त करेंगे। हे भारत, अपनी और दूसरों की जीविका की रक्षा कीजिए।
श्लोक 20 (13.96.20)
पुत्रवच्चापि भृत्यान्स्वान्प्रजाश्च परिपालय । योगः क्षेमश्च ते नित्यं ब्राह्मणेष्वस्तु भारत ॥
putravaccāpi bhṛtyānsvānprajāśca paripālaya | yogaḥ kṣemaśca te nityaṃ brāhmaṇeṣvastu bhārata
अपने सेवकों और प्रजा का पुत्रों के समान पालन कीजिए। हे भारत, ब्राह्मणों के योग और क्षेम की, अर्थात् उन्हें पाने और बचाए रखने की, चिन्ता आपको सदा रहे।
श्लोक 21 (13.96.21)
तदर्थं जीवितं तेऽस्तु मा तेभ्योऽप्रतिपालनम् । अनर्थो ब्राह्मणस्यैष यद्वित्तनिचयो महान् ॥
tadarthaṃ jīvitaṃ te'stu mā tebhyo'pratipālanam | anartho brāhmaṇasyaiṣa yadvittanicayo mahān
आपका जीवन उसी के लिए हो; उनकी उपेक्षा न हो। ब्राह्मण के पास बड़ा धन-संचय उसके लिए अनर्थ है।
श्लोक 22 (13.96.22)
श्रिया ह्यभीक्ष्णं संवासो दर्पयेत्सम्प्रमोहयेत् । ब्राह्मणेषु प्रमूढेषु धर्मो विप्रणशेद्ध्रुवम् । धर्मप्रणाशे भूतानामभावः स्यान्न संशयः ॥
śriyā hyabhīkṣṇaṃ saṃvāso darpayetsampramohayet | brāhmaṇeṣu pramūḍheṣu dharmo vipraṇaśeddhruvam | dharmapraṇāśe bhūtānāmabhāvaḥ syānna saṃśayaḥ
क्योंकि समृद्धि के साथ निरन्तर रहना मनुष्य को घमण्डी बनाता और मोह में डालता है। ब्राह्मणों के मोहग्रस्त होने पर धर्म निश्चय ही नष्ट हो जाता है, और धर्म के नष्ट होने पर प्राणियों का अस्तित्व ही न रहेगा — इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 23 (13.96.23)
यो रक्षिभ्यः सम्प्रदाय राजा राष्ट्रं विलुम्पति । यज्ञे राष्ट्राद्धनं तस्मादानयध्वमिति ब्रुवन् ॥
yo rakṣibhyaḥ sampradāya rājā rāṣṭraṃ vilumpati | yajñe rāṣṭrāddhanaṃ tasmādānayadhvamiti bruvan
जो राजा राज्य को अपने अधिकारियों को सौंपकर यह कहता हुआ कि "यज्ञ के लिए राष्ट्र से धन लाओ" उसे लूटता है,
श्लोक 24 (13.96.24)
यच्चादाय तदाज्ञप्तं भीतं दत्तं सुदारुणम् । यजेद्राजा न तं यज्ञं प्रशंसन्त्यस्य साधवः ॥
yaccādāya tadājñaptaṃ bhītaṃ dattaṃ sudāruṇam | yajedrājā na taṃ yajñaṃ praśaṃsantyasya sādhavaḥ
और उस आज्ञा से लिए गए, भय से दिए गए और अत्यन्त कष्ट से जुटाए गए धन से यज्ञ करता है, उसके उस यज्ञ की सज्जन प्रशंसा नहीं करते।
श्लोक 25 (13.96.25)
अपीडिताः सुसंवृद्धा ये ददत्यनुकूलतः । तादृशेनाप्युपायेन यष्टव्यं नोद्यमाहृतैः ॥
apīḍitāḥ susaṃvṛddhā ye dadatyanukūlataḥ | tādṛśenāpyupāyena yaṣṭavyaṃ nodyamāhṛtaiḥ
जो लोग पीड़ित हुए बिना, सम्पन्न होकर अपनी इच्छा से देते हैं, उन्हीं साधनों से राजा को यज्ञ करना चाहिए; बलपूर्वक प्रयत्न से इकट्ठा किए धन से नहीं।
श्लोक 26 (13.96.26)
यदा परिनिषिच्येत निहितो वै यथाविधि । तदा राजा महायज्ञैर्यजेत बहुदक्षिणैः ॥
yadā pariniṣicyeta nihito vai yathāvidhi | tadā rājā mahāyajñairyajeta bahudakṣiṇaiḥ
जब प्रजा का हितैषी राजा विधिपूर्वक अभिषिक्त हो जाए, तब वह बहुत दक्षिणा वाले महान् यज्ञ करे।
श्लोक 27 (13.96.27)
वृद्धबालधनं रक्ष्यमन्धस्य कृपणस्य च । न खातपूर्वं कुर्वीत न रुदन्तीधनं हरेत् ॥
vṛddhabāladhanaṃ rakṣyamandhasya kṛpaṇasya ca | na khātapūrvaṃ kurvīta na rudantīdhanaṃ haret
वृद्धों, बालकों, अन्धों और दीनों के धन की रक्षा करनी चाहिए। उसे अपने अधिकार में न ले, और रोते हुए का धन न छीने।
श्लोक 28 (13.96.28)
हृतं कृपणवित्तं हि राष्ट्रं हन्ति नृप श्रियम् । दद्याच्च महतो भोगान्क्षुद्भयं प्रणुदेत्सताम् ॥
hṛtaṃ kṛpaṇavittaṃ hi rāṣṭraṃ hanti nṛpa śriyam | dadyācca mahato bhogānkṣudbhayaṃ praṇudetsatām
हे राजन्, दीनों का छीना हुआ धन राज्य की श्री का नाश कर देता है। राजा बड़े-बड़े भोग दे और सज्जनों की भूख का भय दूर करे।
श्लोक 29 (13.96.29)
येषां स्वादूनि भोज्यानि समवेक्ष्यन्ति बालकाः । नाश्नन्ति विधिवत्तानि किन्नु पापतरं ततः ॥
yeṣāṃ svādūni bhojyāni samavekṣyanti bālakāḥ | nāśnanti vidhivattāni kinnu pāpataraṃ tataḥ
जिनके बच्चे स्वादिष्ट भोजन को देखते ही रह जाते हैं और उसे यथाविधि खा नहीं पाते, उससे बढ़कर पाप क्या होगा?
श्लोक 30 (13.96.30)
यदि ते तादृशो राष्ट्रे विद्वान्त्सीदेत्क्षुधा द्विजः । भ्रूणहत्यां च गच्छेथाः कृत्वा पापमिवोत्तमम् ॥
yadi te tādṛśo rāṣṭre vidvāntsīdetkṣudhā dvijaḥ | bhrūṇahatyāṃ ca gacchethāḥ kṛtvā pāpamivottamam
यदि आपके राज्य में ऐसा विद्वान् ब्राह्मण भूख से कष्ट पाए, तो आप भ्रूणहत्या के भागी होंगे, मानो आपने सबसे बड़ा पाप किया हो।
श्लोक 31 (13.96.31)
धिक्तस्य जीवितं राज्ञो राष्ट्रे यस्यावसीदति । द्विजोऽन्यो वा मनुष्योऽपि शिबिराह वचो यथा ॥
dhiktasya jīvitaṃ rājño rāṣṭre yasyāvasīdati | dvijo'nyo vā manuṣyo'pi śibirāha vaco yathā
धिक्कार है उस राजा के जीवन को जिसके राज्य में कोई ब्राह्मण या दूसरा मनुष्य भी कष्ट में डूबता है — जैसा शिबि ने कहा था।
श्लोक 32 (13.96.32)
यस्य स्म विषये राज्ञः स्नातकः सीदति क्षुधा । अवृद्धिमेति तद्राष्ट्रं विन्दते सह राजकम् ॥
yasya sma viṣaye rājñaḥ snātakaḥ sīdati kṣudhā | avṛddhimeti tadrāṣṭraṃ vindate saha rājakam
जिस राजा के देश में कोई स्नातक भूख से कष्ट पाता है, वह राज्य अवनति को प्राप्त होता है और उसी समय शत्रु राजाओं के समूह का सामना करता है।
श्लोक 33 (13.96.33)
क्रोशन्त्यो यस्य वै राष्ट्राद्ध्रियन्ते तरसा स्त्रियः । क्रोशतां पतिपुत्राणां मृतोऽसौ न च जीवति ॥
krośantyo yasya vai rāṣṭrāddhriyante tarasā striyaḥ | krośatāṃ patiputrāṇāṃ mṛto'sau na ca jīvati
जिस राजा के राज्य से रोती-चिल्लाती स्त्रियाँ बलपूर्वक उठा ली जाती हैं, और उनके पति तथा पुत्र चिल्लाते रहते हैं, वह राजा मरा हुआ है, जीवित नहीं।
श्लोक 34 (13.96.34)
अरक्षितारं हर्तारं विलोप्तारमनायकम् । तं वै राजकलिं हन्युः प्रजाः सन्नह्य निर्घृणं ॥
arakṣitāraṃ hartāraṃ viloptāramanāyakam | taṃ vai rājakaliṃ hanyuḥ prajāḥ sannahya nirghṛṇaṃ
जो राजा रक्षा नहीं करता, केवल छीनता और लूटता है और नेतृत्व नहीं देता, उस निर्दयी राज-कलि को प्रजा एकजुट होकर मार डाले।
श्लोक 35 (13.96.35)
अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिपः । स संहत्य निहन्तव्यः श्वेव सोन्माद आतुरः ॥
ahaṃ vo rakṣitetyuktvā yo na rakṣati bhūmipaḥ | sa saṃhatya nihantavyaḥ śveva sonmāda āturaḥ
जो राजा "मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा" कहकर रक्षा नहीं करता, उसे सब मिलकर पागल और रोगी कुत्ते की तरह मार डालें।
श्लोक 36 (13.96.36)
पापं कुर्वन्ति यत्किञ्चित्प्रजा राज्ञा ह्यरक्षिताः । चतुर्थं तस्य पापस्य राजा विन्दति भारत ॥
pāpaṃ kurvanti yatkiñcitprajā rājñā hyarakṣitāḥ | caturthaṃ tasya pāpasya rājā vindati bhārata
हे भारत, राजा द्वारा रक्षित न होने पर प्रजा जो कुछ पाप करती है, उस पाप का एक चौथाई राजा को लगता है।
श्लोक 37 (13.96.37)
अथाहुः सर्वमेवैति भूयोऽर्धमिति निश्चयः । चतुर्थं मतमस्माकं मनोः श्रुत्वानुशासनम् ॥
athāhuḥ sarvamevaiti bhūyo'rdhamiti niścayaḥ | caturthaṃ matamasmākaṃ manoḥ śrutvānuśāsanam
कुछ कहते हैं कि सारा पाप राजा को लगता है; कुछ का निश्चय है कि उससे भी अधिक, आधा। मनु का उपदेश सुनकर हमारा मत एक चौथाई का है।
श्लोक 38 (13.96.38)
शुभं वा यच्च कुर्वन्ति प्रजा राज्ञा सुरक्षिताः । चतुर्थं तस्य पुण्यस्य राजा चाप्नोति भारत ॥
śubhaṃ vā yacca kurvanti prajā rājñā surakṣitāḥ | caturthaṃ tasya puṇyasya rājā cāpnoti bhārata
और राजा से भलीभाँति रक्षित प्रजा जो शुभ कर्म करती है, उस पुण्य का एक चौथाई राजा को भी मिलता है, हे भारत।
श्लोक 39 (13.96.39)
जीवन्तं त्वानुजीवन्तु प्रजाः सर्वा युधिष्ठिर । पर्जन्यमिव भूतानि महाद्रुममिवाण्डजाः ॥
jīvantaṃ tvānujīvantu prajāḥ sarvā yudhiṣṭhira | parjanyamiva bhūtāni mahādrumamivāṇḍajāḥ
हे युधिष्ठिर, समस्त प्रजा आपके जीवित रहने से जिए, जैसे प्राणी मेघ पर और पक्षी विशाल वृक्ष पर जीते हैं।
श्लोक 40 (13.96.40)
कुबेरमिव रक्षांसि शतक्रतुमिवामराः । ज्ञातयस्त्वाऽनुजीवन्तु सुहृदश्च परन्तप ॥
kuberamiva rakṣāṃsi śatakratumivāmarāḥ | jñātayastvā'nujīvantu suhṛdaśca parantapa
हे परन्तप, आपके जातिबन्धु और मित्र आप पर वैसे ही निर्भर होकर जिएँ, जैसे राक्षस कुबेर पर और देवता इन्द्र पर जीते हैं।