अनुशासन पर्व · अध्याय 95
न माँगनेवालों को दान
युधिष्ठिर पूछते हैं कि समान विद्या और आचरणवाले दो ब्राह्मणों में से, एक जो माँगता है और दूसरा जो नहीं माँगता, दान किसे दिया जाए। भीष्म कहते हैं कि न माँगनेवाले को दिया हुआ दान श्रेष्ठ है; ऐसे ब्राह्मण राख में छिपी अग्नि के समान हैं, जो अनादर होने पर पृथ्वी को भी जला सकते हैं, इसलिए युधिष्ठिर को उन्हें खोजकर सुखद निवासों और उपहारों के साथ आमन्त्रित करना चाहिए। वे उनके दान की तुलना दिन के तीन सवनों वाले यज्ञ से करते हैं, जिसका अवभृथ स्नान अहिंसा, संविभाग, दम, त्याग, धृति और सत्य है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.95.1)
यौ च स्यातां चरणेनोपपन्नौ । यौ विद्यया सदृशौ जन्मना च । ताभ्यां दानं कतरस्मै विशिष्ट- । मयाचमानाय च याचते च ॥
yau ca syātāṃ caraṇenopapannau | yau vidyayā sadṛśau janmanā ca | tābhyāṃ dānaṃ katarasmai viśiṣṭa- | mayācamānāya ca yācate ca
आचरण में समान, विद्या में समान और जन्म में भी समान दो पुरुषों में से किसे दान देना अधिक श्रेष्ठ है: जो माँगता नहीं उसे, या जो माँगता है उसे?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.95.2)
श्रेयो वै याचतः पार्थ दानमाहुरयाचते । अर्हत्तमो वै धृतिमान्कृपणादकृतात्मनः ॥
śreyo vai yācataḥ pārtha dānamāhurayācate | arhattamo vai dhṛtimānkṛpaṇādakṛtātmanaḥ
हे पार्थ, माँगनेवाले को दिए दान से न माँगनेवाले को दिया दान श्रेष्ठ कहा गया है; धैर्यवान् मनुष्य कृपण और असंयमी से कहीं अधिक योग्य है।
श्लोक 3 (13.95.3)
क्षत्रियो रक्षणधृतिर्ब्राह्मणोऽनर्थनाधृतिः । ब्राह्मणो धृतिमान्विद्वान्देवान्प्रीणाति तुष्टिमान् ॥
kṣatriyo rakṣaṇadhṛtirbrāhmaṇo'narthanādhṛtiḥ | brāhmaṇo dhṛtimānvidvāndevānprīṇāti tuṣṭimān
क्षत्रिय की धृति रक्षा करने में है, ब्राह्मण की धृति न माँगने में; धैर्यवान्, विद्वान् और सन्तुष्ट ब्राह्मण देवताओं को प्रसन्न करता है।
श्लोक 4 (13.95.4)
याच्यमाहुरनीशस्य अतिहारं च भारत । उद्वेजयन्ति याचन्ति यदा भूतानि दस्युवत् ॥
yācyamāhuranīśasya atihāraṃ ca bhārata | udvejayanti yācanti yadā bhūtāni dasyuvat
हे भारत, माँगना असमर्थ का काम और अपमान माना गया है; क्योंकि जब लोग माँगते हैं तो डाकुओं की भाँति प्राणियों को घबरा देते हैं।
श्लोक 5 (13.95.5)
म्रियते याचमानो वै तमनु म्रियतेऽददत् । ददत्संजीवयत्येनमात्मानं च युधिष्ठिर ॥
mriyate yācamāno vai tamanu mriyate'dadat | dadatsaṃjīvayatyenamātmānaṃ ca yudhiṣṭhira
माँगनेवाला मरता है और न देनेवाला उसके पीछे मरता है; हे युधिष्ठिर, देनेवाला उसे और अपने को भी जिला देता है।
श्लोक 6 (13.95.6)
आनृशंस्यं परो धर्मो याचते यत्प्रदीयते । अयाचतः सीदमानान्सर्वोपायैर्निमन्त्रयेत् ॥
ānṛśaṃsyaṃ paro dharmo yācate yatpradīyate | ayācataḥ sīdamānānsarvopāyairnimantrayet
माँगनेवाले को जो दिया जाता है उसमें दया सबसे बड़ा धर्म है; पर जो माँगते नहीं और कष्ट में हैं, उन्हें सब उपायों से आमन्त्रित करना चाहिए।
श्लोक 7 (13.95.7)
यदि वै तादृशा राष्ट्रे वसेयुस्ते द्विजोत्तमाः । भस्मच्छन्नानिवाग्नींस्तान्बुध्येथास्त्वं प्रयत्नतः ॥
yadi vai tādṛśā rāṣṭre vaseyuste dvijottamāḥ | bhasmacchannānivāgnīṃstānbudhyethāstvaṃ prayatnataḥ
यदि ऐसे श्रेष्ठ द्विज तुम्हारे राष्ट्र में रहते हों, तो उन्हें राख से ढकी हुई अग्नि के समान यत्नपूर्वक पहचानना।
श्लोक 8 (13.95.8)
तपसा दीप्यमानास्ते दहेयुः पृथिवीमपि । अपूज्यमानाः कौरव्य पूजार्हास्तु तथाविधाः ॥
tapasā dīpyamānāste daheyuḥ pṛthivīmapi | apūjyamānāḥ kauravya pūjārhāstu tathāvidhāḥ
तप से दीप्त होते हुए वे पृथ्वी को भी जला सकते हैं; हे कौरव, जब ऐसे पूजा के योग्य पुरुषों की पूजा नहीं होती तब वे ऐसा कर सकते हैं।
श्लोक 9 (13.95.9)
पूज्या हि ज्ञानविज्ञानतपोयोगसमन्विताः । तेभ्यः पूजां प्रयुञ्जीथा ब्राह्मणेभ्यः परन्तप ॥
pūjyā hi jñānavijñānatapoyogasamanvitāḥ | tebhyaḥ pūjāṃ prayuñjīthā brāhmaṇebhyaḥ parantapa
ज्ञान, विज्ञान, तप और योग से युक्त पुरुष पूजा के योग्य हैं; हे परन्तप, उन ब्राह्मणों की पूजा करो,
श्लोक 10 (13.95.10)
ददद्बहुविधान्देयानुपच्छन्दयते च तान् ॥
dadadbahuvidhāndeyānupacchandayate ca tān
उन्हें अनेक प्रकार के दान देते हुए और उन्हें प्रसन्न करते हुए।
श्लोक 11 (13.95.11)
यदग्निहोत्रे सुहुते सायंप्रातर्भवेत्फलम् । विद्यावेदव्रतवति तद्दानफलमुच्यते ॥
yadagnihotre suhute sāyaṃprātarbhavetphalam | vidyāvedavratavati taddānaphalamucyate
सायं और प्रातः भली-भाँति किए गए अग्निहोत्र से जो फल होता है, वही फल विद्या, वेद और व्रत से सम्पन्न पुरुष को दिए दान का कहा जाता है।
श्लोक 12 (13.95.12)
विद्यावेदव्रतस्नाता न व्यापाश्रयजीविनः । गूढस्वाध्यायतपसो ब्राह्मणान्संशितव्रतान् ॥
vidyāvedavratasnātā na vyāpāśrayajīvinaḥ | gūḍhasvādhyāyatapaso brāhmaṇānsaṃśitavratān
जो विद्या, वेद और व्रत के स्नातक हैं, दूसरों पर आश्रित होकर नहीं जीते, जिनका स्वाध्याय और तप छिपा रहता है और जिनके व्रत कठोर हैं, ऐसे ब्राह्मणों को:
श्लोक 13 (13.95.13)
कृतैरावसथैर्हृद्यैः सप्रेष्यैः सपरिच्छदैः । निमन्त्रयेथाः कौरव्य कामैश्चान्यैर्द्विजोत्तमान् ॥
kṛtairāvasathairhṛdyaiḥ sapreṣyaiḥ saparicchadaiḥ | nimantrayethāḥ kauravya kāmaiścānyairdvijottamān
हे कौरव, उन श्रेष्ठ द्विजों को उनके लिए बनवाए हुए सुन्दर आवासों, सेवकों, साज-सामान और अन्य इच्छित वस्तुओं के साथ आमन्त्रित करो।
श्लोक 14 (13.95.14)
अपि ते प्रतिगृह्णीयुः श्रद्धोपेतं युधिष्ठिर । कार्यमित्येव मन्वाना धर्मज्ञाः सूक्ष्मदर्शिनः ॥
api te pratigṛhṇīyuḥ śraddhopetaṃ yudhiṣṭhira | kāryamityeva manvānā dharmajñāḥ sūkṣmadarśinaḥ
हे युधिष्ठिर, वे धर्म को जाननेवाले सूक्ष्मदर्शी ब्राह्मण श्रद्धा से भरे तुम्हारे दान को कर्तव्य मानकर स्वीकार करें।
श्लोक 15 (13.95.15)
अपि ते ब्राह्मणा भुक्त्वा गताः सोद्धरणान्गृहान् । येषां दाराः प्रतीक्षन्ते पर्जन्यमिव कर्षकाः ॥
api te brāhmaṇā bhuktvā gatāḥ soddharaṇāngṛhān | yeṣāṃ dārāḥ pratīkṣante parjanyamiva karṣakāḥ
वे ब्राह्मण भोजन करके अपने घरों को लौटें और घर के लिए सामग्री भी ले जाएँ, जिनकी पत्नियाँ उनकी प्रतीक्षा वैसे ही करती हैं जैसे किसान वर्षा की।
श्लोक 16 (13.95.16)
अन्नानि प्रातःसवने नियता ब्रह्मचारिणः । ब्राह्मणास्तात भुञ्जानास्त्रेताग्निं प्रीणयन्त्युत ॥
annāni prātaḥsavane niyatā brahmacāriṇaḥ | brāhmaṇāstāta bhuñjānāstretāgniṃ prīṇayantyuta
प्रातःसवन में संयमी ब्रह्मचारी अन्न ग्रहण करते हैं, और हे तात, उसे खाते हुए ब्राह्मण त्रेताग्नि को तृप्त करते हैं।
श्लोक 17 (13.95.17)
माध्यंदिनं ते सवनं ददतस्तात वर्तताम् । गोहिरण्यानि वासांसि तेनेन्द्रः प्रीयतां तव ॥
mādhyaṃdinaṃ te savanaṃ dadatastāta vartatām | gohiraṇyāni vāsāṃsi tenendraḥ prīyatāṃ tava
हे तात, गौ, सोना और वस्त्र देते हुए तुम्हारा माध्यन्दिन सवन चलता रहे; उससे इन्द्र तुम पर प्रसन्न हों।
श्लोक 18 (13.95.18)
तृतीयं सवनं ते वै वैश्वदेवं युधिष्ठिर । यद्देवेभ्यः पितृभ्यश्च विप्रेभ्यश्च प्रयच्छसि ॥
tṛtīyaṃ savanaṃ te vai vaiśvadevaṃ yudhiṣṭhira | yaddevebhyaḥ pitṛbhyaśca viprebhyaśca prayacchasi
हे युधिष्ठिर, देवताओं, पितरों और ब्राह्मणों को तुम जो देते हो, वही तुम्हारा तीसरा सवन, वैश्वदेव है।
श्लोक 19 (13.95.19)
अहिंसा सर्वभूतेभ्यः संविभागश्च सर्वशः । दमस्त्यागो धृतिः सत्यं भवत्यवभृथाय ते ॥
ahiṃsā sarvabhūtebhyaḥ saṃvibhāgaśca sarvaśaḥ | damastyāgo dhṛtiḥ satyaṃ bhavatyavabhṛthāya te
सब प्राणियों के प्रति अहिंसा, सबके साथ बाँटकर भोगना, दम, त्याग, धृति और सत्य, ये तुम्हारे यज्ञ का अवभृथ स्नान होंगे।
श्लोक 20 (13.95.20)
एष ते विततो यज्ञः श्रद्धापूतः सदक्षिणः । विशिष्टः सर्वयज्ञानां नित्यं तात प्रवर्तताम् ॥
eṣa te vitato yajñaḥ śraddhāpūtaḥ sadakṣiṇaḥ | viśiṣṭaḥ sarvayajñānāṃ nityaṃ tāta pravartatām
हे तात, यह तुम्हारा फैला हुआ यज्ञ है, जो श्रद्धा से पवित्र और दक्षिणा सहित है; यह सब यज्ञों में श्रेष्ठ है, यह तुम्हारे यहाँ सदा चलता रहे।