अनुशासन पर्व · अध्याय 108
ब्रह्मा द्वारा गौओं के लोक का वर्णन
इन्द्र के गोदान-सम्बन्धी प्रश्न के उत्तर में ब्रह्मा गौओं के तेजस्वी लोकों का वर्णन करते हैं, जहाँ न बुढ़ापा है, न रोग, न थकान और हर इच्छा पूरी होती है; वे बताते हैं कि वहाँ कौन पहुँचता है और कौन नहीं। फिर वे गोदान का फल बताते हैं: दाता के गुणों और वर्ण के अनुसार फल कैसे बदलता है, उचित पात्र, काल और गौ कैसी हो, गौएँ पाने के उचित उपाय कौन-से हैं, तथा गौओं और ब्राह्मणों को संकट से बचाने और वन में गौ के पीछे चलने का पुण्य क्या है।
पितामह उवाच
श्लोक 1 (13.108.1)
योऽयं प्रश्नस्त्वया पृष्टो गोप्रदानादिकारितः । नान्यः प्रष्टास्ति लोकेस्मिंस्त्वत्तोन्यो हि शतक्रतो ॥
yo'yaṃ praśnastvayā pṛṣṭo gopradānādikāritaḥ | nānyaḥ praṣṭāsti lokesmiṃstvattonyo hi śatakrato
हे शतक्रतु, गोदान आदि के विषय में तुमने जो यह प्रश्न पूछा है, इस लोक में तुम्हारे सिवा इसे पूछने वाला दूसरा कोई नहीं है।
श्लोक 2 (13.108.2)
सन्ति नानाविधा लोका यांस्त्वं शक्र न पश्यसि । पश्यामि यानहं लोकानेकपत्न्यश्च याः स्त्रियः ॥
santi nānāvidhā lokā yāṃstvaṃ śakra na paśyasi | paśyāmi yānahaṃ lokānekapatnyaśca yāḥ striyaḥ
हे शक्र, अनेक प्रकार के ऐसे लोक हैं जिन्हें तुम नहीं देखते। मैं उन्हें देखता हूँ, और उन स्त्रियों को भी जो एक ही पति की होकर रहती हैं।
श्लोक 3 (13.108.3)
कर्मभिश्चापि सुशुभैः सुव्रता ऋषयस्तथा । सशरीरा हि तान्यान्ति ब्राह्मणाः शुभबुद्धयः ॥
karmabhiścāpi suśubhaiḥ suvratā ṛṣayastathā | saśarīrā hi tānyānti brāhmaṇāḥ śubhabuddhayaḥ
अत्यन्त शुभ कर्मों के द्वारा दृढ़ व्रत वाले ऋषि तथा शुद्ध बुद्धि वाले ब्राह्मण सशरीर उन लोकों में जाते हैं।
श्लोक 4 (13.108.4)
शरीरन्यासमोक्षेण मनसा निर्मलेन च । स्वप्नभूतांश्च ताँल्लोकान्पश्यन्तीहापि सुव्रताः ॥
śarīranyāsamokṣeṇa manasā nirmalena ca | svapnabhūtāṃśca tām̐llokānpaśyantīhāpi suvratāḥ
शरीर का त्याग और मोक्ष होने पर, निर्मल मन से व्रतधारी लोग यहाँ रहते हुए भी उन लोकों को स्वप्न की भाँति देखते हैं।
श्लोक 5 (13.108.5)
ते तु लोकाः सहस्राक्ष शृणु यादृग्गुणान्विताः । न तत्र क्रमते कालो न जरा न च पावकः ॥
te tu lokāḥ sahasrākṣa śṛṇu yādṛgguṇānvitāḥ | na tatra kramate kālo na jarā na ca pāvakaḥ
हे सहस्राक्ष, सुनो कि वे लोक कैसे गुणों से युक्त हैं। वहाँ न काल का प्रभाव चलता है, न बुढ़ापा, न अग्नि।
श्लोक 6 (13.108.6)
तथा नास्त्यशुभं किञ्चिन्न व्याधिस्तत्र न क्लमः । यद्यच्च गावो मनसा तस्मिन्वाञ्छन्ति वासव ॥
tathā nāstyaśubhaṃ kiñcinna vyādhistatra na klamaḥ | yadyacca gāvo manasā tasminvāñchanti vāsava
वहाँ कुछ भी अशुभ नहीं है; न रोग है, न थकान। और हे वासव, वहाँ गौएँ मन में जो-जो चाहती हैं,
श्लोक 7 (13.108.7)
तत्सर्वं प्रापयन्ति स्म मम प्रत्यक्षदर्शनात् । कामगाः कामचारिण्यः कामात्कामांश्च भुञ्जते ॥
tatsarvaṃ prāpayanti sma mama pratyakṣadarśanāt | kāmagāḥ kāmacāriṇyaḥ kāmātkāmāṃśca bhuñjate
वह सब वे पूरा कर लेती हैं; मैंने इसे अपनी आँखों से देखा है। वे इच्छानुसार जाती हैं, इच्छानुसार विचरती हैं और संकल्प मात्र से अपनी कामनाओं का भोग करती हैं।
श्लोक 8 (13.108.8)
वाप्यः सरांसि सरितो विविधानि वनानि च । गृहाणि पर्वताश्चैव यावद्द्रव्यं च किञ्चन ॥
vāpyaḥ sarāṃsi sarito vividhāni vanāni ca | gṛhāṇi parvatāścaiva yāvaddravyaṃ ca kiñcana
वहाँ बावड़ियाँ, सरोवर, नदियाँ, अनेक प्रकार के वन, घर, पर्वत और सब प्रकार की वस्तुएँ हैं।
श्लोक 9 (13.108.9)
मनोज्ञं सर्वभूतेभ्यस्तद्वनं तत्र दृश्यते । ईदृशान्विद्धि ताँल्लोकान्नास्ति लोकस्तथाविधः ॥
manojñaṃ sarvabhūtebhyastadvanaṃ tatra dṛśyate | īdṛśānviddhi tām̐llokānnāsti lokastathāvidhaḥ
वहाँ का वन सब प्राणियों को मनोहर दिखाई देता है। उन लोकों को ऐसा ही जानो; उनके समान कोई दूसरा लोक नहीं है।
श्लोक 10 (13.108.10)
तत्र सर्वसहाः क्षान्ता वत्सला गुरुवर्तिनः । अहङ्कारैर्विरहिता यान्ति शक्र नरोत्तमाः ॥
tatra sarvasahāḥ kṣāntā vatsalā guruvartinaḥ | ahaṅkārairvirahitā yānti śakra narottamāḥ
हे शक्र, जो सब कुछ सह लेते हैं, क्षमाशील और स्नेहमय हैं, गुरुजनों के अनुगामी हैं और अहंकार से रहित हैं, ऐसे श्रेष्ठ पुरुष वहाँ जाते हैं।
श्लोक 11 (13.108.11)
यः सर्वमांसानि न भक्षयीत । पुमान्सदा भावितो धर्मयुक्तः । मातापित्रोरर्चिता सत्ययुक्तः । शुश्रुषिता ब्राह्मणानामनिन्द्यः ॥
yaḥ sarvamāṃsāni na bhakṣayīta | pumānsadā bhāvito dharmayuktaḥ | mātāpitrorarcitā satyayuktaḥ | śuśruṣitā brāhmaṇānāmanindyaḥ
जो पुरुष किसी भी प्राणी का मांस नहीं खाता, सदा भक्तिमान और धर्मयुक्त रहता है, माता-पिता का आदर करता है, सत्यनिष्ठ है, ब्राह्मणों की सेवा करता है और निन्दा से परे है,
श्लोक 12 (13.108.12)
अक्रोधनो गोषु तथा द्विजेषु । धर्मे रतो गुरुशुश्रूषकश्च । यावज्जीवं सत्यवृत्ते रतश्च । दाने रतो यः क्षमी चापराधे ॥
akrodhano goṣu tathā dvijeṣu | dharme rato guruśuśrūṣakaśca | yāvajjīvaṃ satyavṛtte rataśca | dāne rato yaḥ kṣamī cāparādhe
जो गौओं और ब्राह्मणों के प्रति क्रोध नहीं करता, धर्म में लगा रहता है, गुरुजनों की सेवा करता है, जीवन भर सत्य के आचरण में रत रहता है, दान में तत्पर है और अपराध को क्षमा कर देता है,
श्लोक 13 (13.108.13)
मृदुर्दान्तो देवपरायणश्च । सर्वातिथिश्चापि यथा दयावान् । ईदृग्गुणो मानवस्तं प्रयाति । लोकं गवां शाश्वतं चाव्ययं च ॥
mṛdurdānto devaparāyaṇaśca | sarvātithiścāpi yathā dayāvān | īdṛgguṇo mānavastaṃ prayāti | lokaṃ gavāṃ śāśvataṃ cāvyayaṃ ca
जो कोमल, संयमी, देवताओं के परायण, सब अतिथियों का सत्कार करने वाला और दयालु है, ऐसे गुणों वाला मनुष्य गौओं के शाश्वत और अविनाशी लोक को पहुँचता है।
श्लोक 14 (13.108.14)
न पारदारी पश्यति लोकमेतं । न वै गुरुघ्नो न मृषा सम्प्रलापी । सदापवादी ब्राह्मणेष्वात्तवैरो । दोषैरन्यैर्यश्च युक्तो दुरात्मा ॥
na pāradārī paśyati lokametaṃ | na vai gurughno na mṛṣā sampralāpī | sadāpavādī brāhmaṇeṣvāttavairo | doṣairanyairyaśca yukto durātmā
परस्त्रीगामी इस लोक को नहीं देखता; न गुरु का हत्यारा, न झूठ बकने वाला, न ब्राह्मणों की सदा निन्दा करने और उनसे वैर रखने वाला, और न अन्य दोषों से युक्त दुरात्मा।
श्लोक 15 (13.108.15)
न मित्रध्रुङ्नैकृतिकः कृतघ्नः । शठोऽनृजुर्धर्मविद्वेषकश्च । न ब्रह्महा मनसाऽपि प्रपश्ये- । द्गवां लोकं पुण्यकृतां निवासम् ॥
na mitradhruṅnaikṛtikaḥ kṛtaghnaḥ | śaṭho'nṛjurdharmavidveṣakaśca | na brahmahā manasā'pi prapaśye- | dgavāṃ lokaṃ puṇyakṛtāṃ nivāsam
न मित्र से द्रोह करने वाला, न ठग, न कृतघ्न, न शठ, न कुटिल, न धर्म से द्वेष करने वाला; और ब्राह्मण की हत्या करने वाला तो मन से भी पुण्यात्माओं के निवास उस गौओं के लोक को नहीं देख सकता।
श्लोक 16 (13.108.16)
एतत्ते सर्वमाख्यातं नैपुण्येन सुरेश्वर । गोप्रदानरतानां तु फलं शृणु शतक्रतो ॥
etatte sarvamākhyātaṃ naipuṇyena sureśvara | gopradānaratānāṃ tu phalaṃ śṛṇu śatakrato
हे देवेश्वर, यह सब मैंने तुम्हें विस्तार से बता दिया। अब हे शतक्रतु, गोदान में लगे हुए लोगों का फल सुनो।
श्लोक 17 (13.108.17)
दायाद्यलब्धैरर्थैर्यो गाः क्रीत्वा सम्प्रयच्छति । धर्मार्जितधनैः क्रीतान्स लोकानाप्नुतेऽक्षयान् ॥
dāyādyalabdhairarthairyo gāḥ krītvā samprayacchati | dharmārjitadhanaiḥ krītānsa lokānāpnute'kṣayān
जो पैतृक सम्पत्ति से प्राप्त धन से गौएँ खरीदकर उनका दान करता है, वह धर्मपूर्वक कमाए हुए धन से खरीदे हुए अक्षय लोकों को पाता है।
श्लोक 18 (13.108.18)
यो वै द्यूते धनं जित्वा गाः क्रीत्वा सम्प्रयच्छति । स दिव्यमयुतं शक्र वर्षाणां फलमश्नुते ॥
yo vai dyūte dhanaṃ jitvā gāḥ krītvā samprayacchati | sa divyamayutaṃ śakra varṣāṇāṃ phalamaśnute
हे शक्र, जो जुए में धन जीतकर उससे गौएँ खरीदकर दान करता है, वह दस हज़ार वर्षों तक स्वर्ग का फल भोगता है।
श्लोक 19 (13.108.19)
दायाद्याद्याः स्म वै गावो न्यायपूर्वैरुपार्जिताः । प्रदद्यात्ताः प्रदातॄणां सम्भवन्त्यपि च ध्रुवाः ॥
dāyādyādyāḥ sma vai gāvo nyāyapūrvairupārjitāḥ | pradadyāttāḥ pradātṝṇāṃ sambhavantyapi ca dhruvāḥ
जो गौएँ उत्तराधिकार में मिली हों और न्यायपूर्वक पाई गई हों, उनका दान करना चाहिए; दाताओं के लिए वे स्थायी फल देने वाली होती हैं।
श्लोक 20 (13.108.20)
प्रतिगृह्य तु यो दद्याद्गाः संशुद्धेन चेतसा । तस्यापीहाक्षयाँल्लोकान्ध्रुवान्विद्धि शचीपते ॥
pratigṛhya tu yo dadyādgāḥ saṃśuddhena cetasā | tasyāpīhākṣayām̐llokāndhruvānviddhi śacīpate
और जो गौएँ दान में लेकर भी अत्यन्त शुद्ध मन से उन्हें दे देता है, हे शचीपति, जानो कि उसे भी अक्षय और स्थायी लोक प्राप्त होते हैं।
श्लोक 21 (13.108.21)
जन्मप्रभृति सत्यं च यो ब्रूयान्नियतेन्द्रियः । गुरुद्विजसहः क्षान्तस्तस्य गोभिः समा गतिः ॥
janmaprabhṛti satyaṃ ca yo brūyānniyatendriyaḥ | gurudvijasahaḥ kṣāntastasya gobhiḥ samā gatiḥ
जो जन्म से ही इन्द्रियों को वश में रखकर सत्य बोलता है, गुरुओं और ब्राह्मणों को सह लेता है और क्षमाशील है, उसकी गति गौओं के दान से मिलने वाली गति के समान होती है।
श्लोक 22 (13.108.22)
न जातु ब्राह्मणो वाच्यो यदवाच्यं शचीपते । मनसा गोषु न द्रुह्येद्गोवृत्तिर्गोनुकम्पकः ॥
na jātu brāhmaṇo vācyo yadavācyaṃ śacīpate | manasā goṣu na druhyedgovṛttirgonukampakaḥ
हे शचीपति, ब्राह्मण से कभी वह नहीं कहना चाहिए जो कहने योग्य नहीं है; मन से भी गौओं से द्रोह नहीं करना चाहिए; गौओं के सहारे जीवन चलाने वाला और उन पर दया करने वाला होना चाहिए।
श्लोक 23 (13.108.23)
सत्ये धर्मे च निरतस्तस्य शक्र फलं शृणु । गोसहस्रेण समिता तस्य धेनुर्भवत्युत ॥
satye dharme ca niratastasya śakra phalaṃ śṛṇu | gosahasreṇa samitā tasya dhenurbhavatyuta
हे शक्र, सत्य और धर्म में लगे हुए मनुष्य का फल सुनो: उसकी एक गौ एक हज़ार गौओं के बराबर हो जाती है।
श्लोक 24 (13.108.24)
क्षत्रियस्य गुणैरतैरन्वितस्य फलं शृणु । सप्तार्धशततुल्या गौर्भवतीति विनिश्चयः ॥
kṣatriyasya guṇairatairanvitasya phalaṃ śṛṇu | saptārdhaśatatulyā gaurbhavatīti viniścayaḥ
इन गुणों से युक्त क्षत्रिय का फल सुनो: उसकी गौ साढ़े सात सौ के बराबर हो जाती है, यह निश्चित है।
श्लोक 25 (13.108.25)
वैश्यस्यैते यदि गुणास्तस्य पञ्चशतं भवेत् । शूद्रस्यापि विनीतस्य चतुर्भागफलं स्मृतम् ॥
vaiśyasyaite yadi guṇāstasya pañcaśataṃ bhavet | śūdrasyāpi vinītasya caturbhāgaphalaṃ smṛtam
यदि वैश्य में ये गुण हों तो उसकी गौ पाँच सौ के बराबर होगी; और संयमी शूद्र के लिए फल चौथाई भाग का माना गया है।
श्लोक 26 (13.108.26)
एतच्चैनं योऽनुतिष्ठेत युक्तः । सत्ये रतो गुरुशुश्रूषया च । दक्षः क्षान्तो देवतार्थी प्रशान्तः । शुचिर्बुद्धो धर्मशीलोऽनहंवाक् ॥
etaccainaṃ yo'nutiṣṭheta yuktaḥ | satye rato guruśuśrūṣayā ca | dakṣaḥ kṣānto devatārthī praśāntaḥ | śucirbuddho dharmaśīlo'nahaṃvāk
जो इस नियम का दृढ़ता से पालन करता है — सत्य में रत, गुरु की सेवा करने वाला, कुशल, क्षमाशील, देवताओं की उपासना करने वाला, शान्त, पवित्र, ज्ञानी, धर्मशील और अहंकारपूर्ण वाणी से रहित —
श्लोक 27 (13.108.27)
महत्फलं प्राप्यते सद्द्विजाय । दत्त्वा दोग्ध्रीं विधिनाऽनेन धेनुम् । नित्यं दद्यादेकभक्तः सदा च । सत्ये स्थितो गुरुशुश्रूषिता च ॥
mahatphalaṃ prāpyate saddvijāya | dattvā dogdhrīṃ vidhinā'nena dhenum | nityaṃ dadyādekabhaktaḥ sadā ca | satye sthito guruśuśrūṣitā ca
वह इस विधि से सुपात्र ब्राह्मण को दुधारू गौ देकर महान फल पाता है। वह सदा एक ही समय भोजन करे, सत्य में स्थित रहे, गुरु की सेवा करे और नित्य दान दे।
श्लोक 28 (13.108.28)
वेदाध्यायी गोषु यो भक्तिमांश्च । नित्यं दत्त्वा योऽभिनन्देत गाश्च । आजातितो यश्च गवां नमेत । इदं फलं शक्र निबोध तस्य ॥
vedādhyāyī goṣu yo bhaktimāṃśca | nityaṃ dattvā yo'bhinandeta gāśca | ājātito yaśca gavāṃ nameta | idaṃ phalaṃ śakra nibodha tasya
जो वेद का अध्ययन करता है, गौओं में भक्ति रखता है, गौओं का दान करके सदा आनन्दित होता है और जन्म से ही गौओं को प्रणाम करता है, हे शक्र, उसका यह फल सुनो।
श्लोक 29 (13.108.29)
यत्स्यादिष्ट्वा राजमूये फलं तु । यत्स्यादिष्ट्वा बहुना काञ्चनेन । एतत्तुल्यं फलमप्याहुरग्र्यं । सर्वे सन्तस्त्वृषयो ये च सिद्धाः ॥
yatsyādiṣṭvā rājamūye phalaṃ tu | yatsyādiṣṭvā bahunā kāñcanena | etattulyaṃ phalamapyāhuragryaṃ | sarve santastvṛṣayo ye ca siddhāḥ
राजसूय यज्ञ करने से जो फल मिलता है और बहुत स्वर्ण देकर यज्ञ करने से जो फल मिलता है, उनके समान फल को सब सत्पुरुष, ऋषि और सिद्ध सर्वोत्तम कहते हैं।
श्लोक 30 (13.108.30)
योऽग्रं भक्तं किञ्चिदप्राश्य दद्या- । द्गोभ्यो नित्यं गोव्रती सत्यवादी । शान्तोऽलुब्धो गोसहस्रस्य पुण्यं । संवत्सरेणाप्नुयात्सत्यशीलः ॥
yo'graṃ bhaktaṃ kiñcidaprāśya dadyā- | dgobhyo nityaṃ govratī satyavādī | śānto'lubdho gosahasrasya puṇyaṃ | saṃvatsareṇāpnuyātsatyaśīlaḥ
जो भोजन का पहला अंश बिना खाए प्रतिदिन गौओं को दे देता है, गौओं का व्रत रखता है, सत्य बोलता है, शान्त है और लोभ से रहित है, ऐसा सच्चरित्र मनुष्य एक वर्ष में हज़ार गौओं के दान का पुण्य पा लेता है।
श्लोक 31 (13.108.31)
यदेकभक्तमश्नीयाद्दद्यादेकं गवां च यत् । दशवर्षाण्यनन्तानि गोव्रती गोनुकम्पकः ॥
yadekabhaktamaśnīyāddadyādekaṃ gavāṃ ca yat | daśavarṣāṇyanantāni govratī gonukampakaḥ
जो एक ही समय भोजन करता है और उसका एक भाग गौओं को दे देता है, गौओं का व्रत रखता है और उन पर दया करता है, वह दस वर्षों तक अनन्त पुण्य प्राप्त करता है।
श्लोक 32 (13.108.32)
एकेनैव च भक्तेन यः क्रीत्वा गां प्रयच्छति । यावन्ति तस्या रोमाणि सम्भवन्ति शतक्रतो ॥
ekenaiva ca bhaktena yaḥ krītvā gāṃ prayacchati | yāvanti tasyā romāṇi sambhavanti śatakrato
और जो एक समय का भोजन छोड़कर गौ खरीदकर देता है, हे शतक्रतु, उस गौ के जितने रोम होते हैं,
श्लोक 33 (13.108.33)
तावच्छतानां स गवां फलमाप्नोति शाश्वतम् । ब्राह्मणस्य फलं हीदं क्षत्रियस्य तु वै शृणु ॥
tāvacchatānāṃ sa gavāṃ phalamāpnoti śāśvatam | brāhmaṇasya phalaṃ hīdaṃ kṣatriyasya tu vai śṛṇu
उतने सैकड़ों गौओं का शाश्वत फल वह पाता है। यह ब्राह्मण का फल है; अब क्षत्रिय का फल सुनो।
श्लोक 34 (13.108.34)
पञ्चवार्षिकमेवं तु क्षत्रियस्य फलं स्मृतम् । ततोऽर्धेन तु वैश्यस्य शूद्रो वैश्यार्धतः स्मृतः ॥
pañcavārṣikamevaṃ tu kṣatriyasya phalaṃ smṛtam | tato'rdhena tu vaiśyasya śūdro vaiśyārdhataḥ smṛtaḥ
क्षत्रिय के लिए इसका फल पाँच वर्ष का माना गया है; वैश्य के लिए उसका आधा, और शूद्र के लिए वैश्य का आधा माना गया है।
श्लोक 35 (13.108.35)
यश्चात्मविक्रयं कृत्वा गाः क्रीत्वा सम्प्रयच्छति । यावत्संदर्शयेद्गां वै स तावत्फलमश्नुते ॥
yaścātmavikrayaṃ kṛtvā gāḥ krītvā samprayacchati | yāvatsaṃdarśayedgāṃ vai sa tāvatphalamaśnute
जो अपने आपको बेचकर गौएँ खरीदकर देता है, वह जितनी गौएँ दिखाकर दान करता है, उतने विस्तार का फल पाता है।
श्लोक 36 (13.108.36)
रोम्णि रोम्णि महाभाग लोकाश्चास्याक्षयाः स्मृताः । सङ्ग्रामेष्वर्जयित्वा तु यो वै गाः सम्प्रयच्छति । आत्मविक्रयतुल्यास्ताः शाश्वता विद्धि कौशिक ॥
romṇi romṇi mahābhāga lokāścāsyākṣayāḥ smṛtāḥ | saṅgrāmeṣvarjayitvā tu yo vai gāḥ samprayacchati | ātmavikrayatulyāstāḥ śāśvatā viddhi kauśika
हे महाभाग, एक-एक रोम के हिसाब से उसके अक्षय लोक माने गए हैं। और जो युद्धों में गौएँ जीतकर उन्हें दान करता है, हे कौशिक, जानो कि वे गौएँ शाश्वत हैं और अपने को बेच देने के तुल्य हैं।
श्लोक 37 (13.108.37)
अभावे यो गवां दद्यात्तिलधेनुं यतव्रतः । दुर्गात्स तारितो धेन्वा क्षीरनद्यां प्रमोदत्ते ॥
abhāve yo gavāṃ dadyāttiladhenuṃ yatavrataḥ | durgātsa tārito dhenvā kṣīranadyāṃ pramodatte
गौएँ न मिलें तो जो व्रतनिष्ठ मनुष्य तिलधेनु का दान करता है, वह उस धेनु द्वारा संकट से पार उतारा जाता है और दूध की नदी में आनन्द करता है।
श्लोक 38 (13.108.38)
न त्वेवासां दानमात्रं प्रशस्तं । पात्रं कालो गोविशेषो विधिश्च । कालज्ञानं विप्रगवान्तरं हि । दुःखं ज्ञातुं पावकादित्यभूतम् ॥
na tvevāsāṃ dānamātraṃ praśastaṃ | pātraṃ kālo goviśeṣo vidhiśca | kālajñānaṃ vipragavāntaraṃ hi | duḥkhaṃ jñātuṃ pāvakādityabhūtam
केवल गौ दे देना प्रशंसनीय नहीं है; पात्र, काल, गौ की विशेषता और विधि भी देखनी चाहिए। काल को जानना और ब्राह्मण तथा गौ के भेद को जानना कठिन है, क्योंकि वे अग्नि और सूर्य के समान हैं।
श्लोक 39 (13.108.39)
स्वाध्यायाढ्यं शुद्धयोनिं प्रशान्तं । वैतानस्थं पापभीरुं बहुज्ञम् । गोषु क्षान्तं नातितीक्ष्णं शरण्यं । वृत्तिग्लानं तादृशं पात्रमाहुः ॥
svādhyāyāḍhyaṃ śuddhayoniṃ praśāntaṃ | vaitānasthaṃ pāpabhīruṃ bahujñam | goṣu kṣāntaṃ nātitīkṣṇaṃ śaraṇyaṃ | vṛttiglānaṃ tādṛśaṃ pātramāhuḥ
उसे सुपात्र कहते हैं जो स्वाध्याय से सम्पन्न, शुद्ध कुल का, शान्त, वैदिक अग्नियों का रक्षक, पाप से डरने वाला, बहुश्रुत, गौओं के प्रति सहनशील, अत्यन्त उग्र न होने वाला, शरणदाता और जीविका के कष्ट में पड़ा हुआ हो।
श्लोक 40 (13.108.40)
वृत्तिग्लाने सीदति चातिमात्रं । तुष्ट्यर्थं वा होम्यहेतोः प्रसूतेः । गुर्वर्थं वा बालसंवृद्धये वा । धेनुं दद्याद्देशकाले विशिष्टे ॥
vṛttiglāne sīdati cātimātraṃ | tuṣṭyarthaṃ vā homyahetoḥ prasūteḥ | gurvarthaṃ vā bālasaṃvṛddhaye vā | dhenuṃ dadyāddeśakāle viśiṣṭe
जब जीविका से दुर्बल मनुष्य अत्यन्त कष्ट में हो, तब उसके सन्तोष के लिए, या हवन के लिए, या प्रसव के लिए, या गुरु के प्रयोजन से, या बालक के पालन के लिए, उत्तम स्थान और समय पर गौ का दान करना चाहिए।
श्लोक 41 (13.108.41)
अन्तर्जाताः सुक्रयज्ञानलब्धाः । प्राणैः क्रीतास्तेजसा यौतकाश्च । कृच्छ्रोत्सृष्टाः पोषणाभ्यागताश्च । द्वारैरेतैर्गोविशेषाः प्रशस्ताः ॥
antarjātāḥ sukrayajñānalabdhāḥ | prāṇaiḥ krītāstejasā yautakāśca | kṛcchrotsṛṣṭāḥ poṣaṇābhyāgatāśca | dvārairetairgoviśeṣāḥ praśastāḥ
घर में जन्मी हुई, भली-भाँति खरीदी हुई, विद्या से प्राप्त, प्राण देकर खरीदी हुई, पराक्रम से पाई हुई, दहेज में मिली हुई, संकट में छोड़ी हुई और पालन-पोषण से आई हुई — इन द्वारों से आई हुई विशेष गौएँ प्रशस्त मानी गई हैं।
श्लोक 42 (13.108.42)
बलान्विताः शीलवयोपपन्नाः । सर्वाः प्रशंसन्ति सुगन्धवत्यः । यथा हि गङ्गा सरितां वरिष्ठा । तथाऽर्जुनीनां कपिला वरिष्ठा ॥
balānvitāḥ śīlavayopapannāḥ | sarvāḥ praśaṃsanti sugandhavatyaḥ | yathā hi gaṅgā saritāṃ variṣṭhā | tathā'rjunīnāṃ kapilā variṣṭhā
बलवान, अच्छे स्वभाव और आयु वाली, सुगन्धयुक्त सभी गौओं की प्रशंसा होती है। जैसे नदियों में गंगा श्रेष्ठ है, वैसे गौओं में कपिला श्रेष्ठ है।
श्लोक 43 (13.108.43)
तिस्रो रात्रीस्त्वद्भिरुपोष्य भूमौ । तृप्ता गावस्तर्पितेभ्यः प्रदेयाः । वत्सैः पुष्टैः क्षीरपैः सुप्रचारा- । स्त्र्यहं दत्त्वा गोरसैर्वर्तितव्यम् ॥
tisro rātrīstvadbhirupoṣya bhūmau | tṛptā gāvastarpitebhyaḥ pradeyāḥ | vatsaiḥ puṣṭaiḥ kṣīrapaiḥ supracārā- | stryahaṃ dattvā gorasairvartitavyam
तीन रात केवल जल पीकर भूमि पर उपवास करके, तृप्त की हुई, पुष्ट दूध पीते बछड़ों वाली और अच्छी चराई पाई हुई गौएँ तृप्त किए हुए ब्राह्मणों को देनी चाहिए; और गौएँ देकर तीन दिन गोरस पर निर्वाह करना चाहिए।
श्लोक 44 (13.108.44)
दत्त्वा धेनुं सुव्रतां साधुदोहां । कल्याणवत्सामपलायिनीं च । यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या- । स्तावन्ति वर्षाणि भवन्त्यमुत्र ॥
dattvā dhenuṃ suvratāṃ sādhudohāṃ | kalyāṇavatsāmapalāyinīṃ ca | yāvanti romāṇi bhavanti tasyā- | stāvanti varṣāṇi bhavantyamutra
उत्तम स्वभाव वाली, सहज दुही जाने वाली, सुन्दर बछड़े वाली और न भागने वाली धेनु का दान करके मनुष्य उसके जितने रोम होते हैं, उतने वर्ष परलोक में रहता है।
श्लोक 45 (13.108.45)
तथाऽनड्वाहं ब्राह्मणाय प्रदाय । धुर्यं युवानं बलिनं विनीतम् । हलस्य वोढारमनन्तवीर्यं । प्राप्नोति लोकान्दशधेनुदस्य ॥
tathā'naḍvāhaṃ brāhmaṇāya pradāya | dhuryaṃ yuvānaṃ balinaṃ vinītam | halasya voḍhāramanantavīryaṃ | prāpnoti lokāndaśadhenudasya
इसी प्रकार जो ब्राह्मण को जुए का भार उठाने वाला, युवा, बलवान, सधा हुआ, हल खींचने वाला और अपार शक्ति वाला बैल देता है, वह दस गौएँ देने वाले के लोकों को पाता है।
श्लोक 46 (13.108.46)
कान्ताराद्ब्राह्मणान्गाश्च यः परित्राति कौशिक । क्षेमेण स विमुच्येत तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
kāntārādbrāhmaṇāngāśca yaḥ paritrāti kauśika | kṣemeṇa sa vimucyeta tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu
हे कौशिक, जो घोर वन में ब्राह्मणों और गौओं को बचाता है, वह कुशलपूर्वक संकट से छूट जाता है; उसके पुण्य का फल सुनो।
श्लोक 47 (13.108.47)
अश्वमेधक्रतोस्तुल्यं फलं भवति शाश्वतम् । मृत्युकाले सहस्राक्ष यां वृत्तिमनुकाङ्क्षते ॥
aśvamedhakratostulyaṃ phalaṃ bhavati śāśvatam | mṛtyukāle sahasrākṣa yāṃ vṛttimanukāṅkṣate
उसे अश्वमेध यज्ञ के समान शाश्वत फल मिलता है। और हे सहस्राक्ष, मृत्यु के समय वह जिस जीविका की इच्छा करता है,
श्लोक 48 (13.108.48)
लोकान्बहुविधान्दिव्यान्यच्चास्य हृदि वर्तते । तत्सर्वं समवाप्नोति कर्मणैतेन मानवः ॥
lokānbahuvidhāndivyānyaccāsya hṛdi vartate | tatsarvaṃ samavāpnoti karmaṇaitena mānavaḥ
अनेक प्रकार के दिव्य लोक और जो कुछ उसके हृदय में रहता है, वह सब मनुष्य इसी कर्म से पा लेता है।
श्लोक 49 (13.108.49)
गोभिश्च समनुज्ञातः सर्वत्र च महीयते । यस्त्वेतेनैव कल्पेन गां वनेष्वनुगच्छति ॥
gobhiśca samanujñātaḥ sarvatra ca mahīyate | yastvetenaiva kalpena gāṃ vaneṣvanugacchati
गौओं की अनुमति पाकर वह सर्वत्र सम्मानित होता है — जो इसी विधि से वनों में गौ के पीछे-पीछे चलता है,
श्लोक 50 (13.108.50)
तृणगोमयपर्णाशी निस्पृहो नियतः शुचिः । अकामं तेन वस्तव्यं मुदितेन शतक्रतो ॥
tṛṇagomayaparṇāśī nispṛho niyataḥ śuciḥ | akāmaṃ tena vastavyaṃ muditena śatakrato
तृण, गोबर और पत्तों पर निर्वाह करता हुआ, इच्छारहित, संयमी और पवित्र रहकर। हे शतक्रतु, उसे निष्काम और प्रसन्न होकर वहाँ रहना चाहिए,
श्लोक 51 (13.108.51)
मम लोके वसति स लोके वा यत्र चेच्छति ॥
mama loke vasati sa loke vā yatra cecchati
और वह मेरे लोक में निवास करता है, अथवा जिस लोक में चाहे वहाँ रहता है।